गुरुवार, 16 सितंबर 2010

पत्रकारों की हत्या का लोकतंत्र, भाग : 2

जब 26 जनवरी 1950 को लिखी गई एक मोटी पोथी का 19वाँ अनुच्छेद धुंधला पड़ने लगे और लोकतंत्र की एक संरचना में इतना कम लोकतंत्र बचे कि आँखों पर चढ़े चश्में का काँच सरकारी तस्वीर के अलावा कुछ भी देखने से मना कर दे तो जेहन के पत्थर पर अपनी भाषा और कलम की धार कुछ लोग तेज करते ही हैं जबकि यही एक स्थिर और जड़ संरचना का अतिवाद होता है, लोकतंत्र को पूरा का पूरा माँगना। छोटी-बड़ी कमियों को न तलाशने के बजाय पूरी संरचना का मूल्यांकन करना और उसके खिलाफ खड़े होना।
दुनिया में जब लोकतंत्र की बहस चल रही थी तो कई ऐसे विचारक थे जिन्होंने लोकतंत्र की व्यापकता के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अहम माना। 17वीं सदी में फ्रांस के विचारक वाल्तेयर की जुबान को भी हम जमीन पर नहीं उतार सके जिसमें उन्होंने कहा था कि “मैं जानता हूँ कि वह झूठ बोल रहा है, पर वह अपनी बात कह सके इसके लिए मैं अपनी जान दे दूँगा” वरना आज की स्थितियाँ इसके उलट पत्रकारों को यह चेतावनी दे रही हैं और सत्ता हेमचन्द्र की हत्या के साथ यह एलान कर रही है कि तुम अगर इतना सच बोलोगे तो वह तुम्हारी जान ले लेगी। जबकि हमारे समय में एक सच को स्थापित करने के लिए हजार बार बोले जा रहे झूठों को खण्डित कर, हजार बार, हजारों तरीके से सच बोलने की जरूरत है कितना मुश्किल है यह सब कुछ, मौत से बेपरवाह होकर ऐसा करना, किसी हत्या में मारा जाना और वर्तमान के इतिहास में दर्ज तक न होना।
एक पत्रकार के माओवादी या माओवाद समर्थक होने का मसला यहीं से जुड़ा है. 1828 में जब ब्रिटिश राजनैतिक एडमण्ड बर्क ने मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहा था तो वह इस रूप में कतई नहीं था कि मीडिया को लोकतंत्र की किसी एक संरचना का जनसम्पर्क माध्यम हो जाना चाहिए बल्कि उसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लगातार व्यापक आजादी के संघर्ष का सहयोगी बनना चाहिए और सत्ता तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने वाले लोकतंत्र से आगे जाकर सोचना चाहिए। ऐसी स्थिति में एक पत्रकार का आज के समय में यह अन्तद्र्वन्द्व है जब वह व्यक्ति की व्यापक आजादी के लिए संसदीय संरचना को नाकाफी पाता है तो उस जनपक्षधरता के साथ खड़ा होता है जो इस ढाँचे से संघर्ष कर रहे हैं, फिर तो माओवादी शक्तियाँ ही आज देश के फलक पर जुझारूपन के साथ सत्ता से लड़ती हुई दिखती हैं, भले ही इनमे कई खामियाँ हों और इनके क्षेत्र अभी सीमित हों, एक बौद्धिक तबका इन सीमित क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है और उन्हें मजबूत बनाता है, किसी समय में चल रहे संघर्ष की यह एक भूमिका है, अपने लिए उचित स्थान की तलाश करना जबकि सरकार द्वारा हत्या किए जाने की सम्भावनाएँ जंगलों और शहरों में कम-ओ-बेस बराबर हो चुकी हैं और लोकतंत्र व आजादी के स्वप्न हमारे प्रतिलोम में खड़े हैं।
ऐसे में यदि कोई पत्रकार उस आजादी को माँगेगा जिससे चंद लोगों या एक वर्ग की स्वछन्दता को खतरा हो तो वर्ग संघर्ष की लड़ाइयाँ और तीखी ही होंगी, तब हत्याओं के लिए मुठभेड़ का नाम नहीं दिया जाएगा, आफ्सपा जैसे कानून बनाकर हत्याएँ वैध कर दी जाएँगी, छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम जैसे कानून कई लोगों के जिन्दगी के उस हिस्से को सलाखों के पीछे धकेलने में काफी होंगे जिसमें सच बोलने का साहस जिंदा बचा रहता है।

चन्द्रिका
मो0: 09890987458
(समाप्त)
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
मो0: 09890987458

1 टिप्पणी:

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।