रविवार, 10 जून 2012

झारखंड:संगीनों पर सुरक्षित गाँव -1



नैतिकता की रक्षा के करने के लिए कुरुक्षेत्र में 18 अक्षौहिणी सेना के विनाश लीला की भी हम निंदा नहीं करते बल्कि उन सबों से हम राष्ट्रहित की सीख लेते हैं-जी.एस.रथ (डी.जी.पी. झारखण्ड, 30 मार्च 2012, )
‘‘भारतीय राज्य हमारे आंदोलन को हिंसा के नाम पर दुष्प्रचारित करता है क्योंकि वह हिंसा पर एकाधिकार चाहता है, जबकि राज्य के परमाणु बम से लेकर वृहद सैन्य बल अहिंसा के लिए नहीं हैं।’’ प्रशांत, (माओवादी पार्टी के सदस्य)। यह मार्च की पतझड़ का मौसम है। पेड़ों की पत्तियाँ सूख कर गिर चुकी हैं और रात के तकरीबन नौ बजे हैं जब हम जंगल में अपना रास्ता भूल चुके हैं। झारखण्ड झाड़ों का प्रदेश है और यहाँ घूमते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि यहाँ राज्य, नौकरशाही और लोकतंत्र सब अपना रास्ता भूल चुके हैं। यह गड़वा और लातेहार के बीच की कोई जगह है। मेरे साथ दैनिक के पत्रकार सतीश हैं जिन्हें कुछ महीने पहले माओवादी होने के आरोप में पुलिस द्वारा प्रताडि़त किया जा चुका है। सड़क जैसी कोई चीज इन्हीं पत्तियों के नीचे दबी है जो साहस के साथ बगैर किसी पुल के नदी और नालों के उस पार निकल जाती है, मसलन नदी को सड़क नहीं, सड़क को नदी पार करती है। हम मोटरसाइकिल को बार-बार रोक, पीछे मुड़कर देखते हैं और स्वाभाविक भय के साथ आगे बढ़ जाते हैं। सूखी पत्तियों पर घूँमते पहिए किसी के पीछा करने का आभास देते हैं। यह पहियों के रौंदने से पत्तियों के चरमराने की आवाज है। साखू के फूल पूरे जंगल को खुशबू से भरे हुए हैं पर खौफ और भय किसी भी खुशबू और आनंद पर भारी होता है। सतीश को इन इलाकों में जंगली जानवरों का उतना भय नहीं है जितना कि कोबरा बटालियन का, जो कई बार ग्रीन हंट अभियान के दौरान रात को जंगलों में रुक जाते हैं। यह अभियान “माओवादियों के सफाए” के लिए इन इलाकों में पिछले दो वर्षों से चलाया जा रहा है। सतीश एक घटना का जिक्र करते हैं जिसमें सी.आर.पी.एफ. ने एक गूँगे बहरे चरवाहे की कुछ दिन पहले गोली मारकर हत्या कर दी है। 20-25 कि.मी. भटकने के बाद हमें वह रास्ता मिल जाता है जिसके सहारे हम जंगल से बाहर निकल पाते हैं।
हम अपने यात्रा की शुरुआत कर रहे थे जबकि यहाँ के स्थानीय पत्रकारों ने मुलाकात की और वे इन इलाकों की कहानियाँ सुनाते रहे। मौत और हत्याओं की कहानियाँ, बरसों पहले के किस्से, झारखण्ड बनने के बाद से कल परसों तक के किस्से। कहना मुश्किल है कि झारखण्ड बना या बिगड़ गया। जबकि राज्य और ज्यादा असुरक्षित हुआ और स्कूलों-गाँवों में सी.आर.पी.एफ. व कोबरा कमांडो लगा दिए गए। लोगों की सुरक्षा यह है कि इन इलाकों से अक्सर कोई गायब हो जाता है और हफ्ते-दस दिन बाद गाँव वालों को अखबारों से पता चलता है कि उसकी लाष किसी नदी किनारे या किसी नाले में सड़ चुकी है या जिले पार किसी जेल में उसे कैद कर दिया गया है। सैन्य बल उसे ‘माओवादी’ बताते हैं जो एक “मुठभेड़” में मारा गया और यदि वह कैद है तो जाने कितने ‘इल्जामों’ का दोषी। वह उन घटनाओं का भी दोषी है जो उसके सूरत या बम्बई में किसी फैक्ट्री में काम करते हुए घटित हुई। गाँव के लोगों को तब थोड़ा सुकून होता है जब गायब शख्स जेल में पहुँच जाता है। यहाँ जेल में पहुँचना ही सुरक्षित होने का प्रमाण है। जबकि कुछ प्रमाण ऐसे भी हैं कि वर्षों पहले गायब लोग अभी तक जेल नहीं पहुँचे और न ही उनकी लाश मिली है। पिता, पत्नी और परिवार के अलावा ऐसे लोगों का इंतजार अब कोई गाँव वाला नहीं करता, क्योंकि लोगों को पता हैं कि किसी भी इंतजार की एक उम्र होती है।
लातेहार जिले में जिस जगह पर हम रुके हुए हैं वहाँ से बरवाडीह तकरीबन 20 किमी. है। जयराम प्रसाद अपने छोटे बेटे के साथ तड़के ही हमसे मिलने पहुँचते हैं और बातचीत शुरु हो इससे पहले उनका गला रुँध जाता है, वे देर तक रोते रहते हैं। फिर वे बताते हैं कि 21 मार्च को पुलिस ने उनके बड़े बेटे संजय को थाने में बुलाया था और आज पाँच दिन से वह लापता है। संजय बरवाडीह में मोबाइल की एक दुकान चलाता था। कोई अधिकारी कहता हैं कि बातचीत के बाद उन्होंने उसे उसी रात छोड़ दिया था, एस.पी. क्रांति कुमार कहते हैं कि उसे मंडल के आसपास जंगल से 23 की रात को पकड़ा गया है। जयराम कानून का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर एस.पी. की ही बात को सही मान लें तो 24 घंटे में उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए था पर पाँच दिन बीत चुके हैं। यदि उसे छोड़ दिया गया तो 35 साल की उम्र में क्या वह अपने घर का रास्ता भूल जाएगा। जयराम की आशंकाएं कुछ और हैं पर अभी तक किसी लावारिस लाश की खबर किसी भी अखबार में नहीं छपी है। उस दोपहर हमे पता चला कि संजय को माओवादियों का सहयोग करने के आरोप में जेल भेज दिया गया है। पकड़े जाने के पूरे छः दिन बाद, इन इलाकों में ‘सहयोग’ सबसे बड़ा जुल्म है। यह ‘सहयोग’ किसी अपराध में सहयोग करना नहीं है

-चन्द्रिका,
क्रमश:

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