शनिवार, 9 जून 2012

सच लिखने की सजा सीमा आजाद को उम्रकैद


दस्तक मैगजीन की संपादक सीमा आजाद को फरवरी 2010 में उनके पति विश्विजय के साथ एस.ओ.जी ने गिरफ्तार कर लिया था और उनके ऊपर 121, 121 ए, 120 बी भारतीय दंड विधान संहिता के साथ-साथ विधि विरुद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 13, 48, 39, 18 व 20 के तहत चालान कर दिया था। फरवरी 2010 से वह दोनों लोग कारागार में थे। उन दोनों लोगों को जमानत नहीं मिली और अब इलाहाबाद के अपर जिला एवं सत्र न्यायधीश सुनील कुमार सिंह ने दोनों लोगों को उम्रकैद व 55-55 हजार रुपये के जुर्माने से दण्डित किया है।
अदालत ने नक्सालियों को सशस्त्र संघर्ष उकसाने के लिये मुख्यत: दोषी माना है। सरकार ने काल्पनिक आधारों पर सीमा आजाद की जनमुखी पत्रिका दस्तक को मुख्यत: विराम देने के लिये उक्त कार्यवाई की थी। 121 ए व 121 आई.पी.सी की धारा किसी के भी खिलाफ लगाई जा सकती है। ब्रिटिश कालीन भारत में उक्त धाराओं का प्रयोग सामान्यत: जो भी आदमी उनकी हुकूमत के खिलाफ बोलता था उसका इस्तेमाल उसके खिलाफ इन धाराओं का किया जाता था जो आज भी बरक़रार है। उक्त दोनों लोग खनन मफिययों के खिलाफ इलाहाबाद से लेकर सोनभद्र तक आन्दोलन चलाते थे जिससे माफिया अफसर गठजोड़ ने उनको मजा चखाने के लिये उनकी गिरफ्तारी कराई थी। हमारी न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह है कि पुलिस जो लिख दे और आकर अदालत में वही बयान कर दे तो उस आधार पर सजा हो सकती है। कई बार ऐसा भी होता है कि न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा हत्या के मामले में सुना दी और बाद में मृतक जिन्दा पाया गया। 364 आई.पी.सी के मामलों में भी अक्सर देखा जाता है की न्यायालय ने सजा सुना दी जबकि अपहरण हुआ ही नहीं होता है इसलिए आवश्यक है कि फर्जी वादों की छानबीन उचित तरीके से होनी चाहिए तथा पेपर जस्टिस की प्रक्रिया बंद होनी चाहिए।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

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