सोमवार, 29 अगस्त 2011

एक दिन बंदूकों से पानी जरूर निकलेगा

शायद वहां मान्यताएं इतिहास से भी ज्यादा मजबूत हैं। वे ऐसी मान्यताएं हैं जिसने जीने और लड़ने की ललक पैदा की थी। ये सहज जिन्दगियों के लिए आसान रास्ते थे जिस पर चलकर वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उतर रहे थे। ऐसे अतीत में बीता हुआ इतिहास उनके लिए एक किस्सा है जिसे वे रोज दुहराते हैं और हर दुहराव के साथ यह थोड़ा बदल जाता है और हर बदलाव के साथ एक इतिहास टूट जाता है। आखिर इतिहास को दिनों और तारीखों में सजोने से क्या फ़ायदाण् विस्मृतियां कई बार मनुष्य को मजबूत बनाती हैं जबकि स्मृतियां एक घायल इतिहास को लगातार ढोती रहती हैं। वे हर वक्त जिंदगी को कुरेदती है और कुढ़न पैदा करती हैंए कोई सीख देने के बजाय वे आतंकित करती हैं और एक डरावने स्वप्न की तरह गहरी नीदों में उतर आती हैंण् विद्रोहों की कहानियों में जश्न और हताशा दोनों होती है पर विद्रोहों का रुख ही जश्न और हताशा में किसी एक के चेहरे को उभार देता हैण् रात दुहराती है अंधेरे को और अंधेरा पुत जाता है समय की पीठ परए ठीक उसी अंधेरे के साथ नही बल्कि रात जाने कहां से हर रोज नया और इतना ढेर सारा अंधेरा लाती है। यहां घटनाएं एक कटे हुए पेड़ सरीखी हैं जिसमे से कई कोपलें निकल आई हैं ठीक पेड़ सरीखी पर जाने कितनी जिनकी पत्तियांए तने और आकार मिलते।जुलते लगते हैंण् किसी एक घटना की कई।कई गाथाएं हैं हर बदली हुई आवाज एक नई गाथा पेश करती हैण् आसमान का रंग नीला है इसके अपने वैग्यानिक कारण हो सकते हैं पर यहां के लोगों के लिए इससे भी ज्यादा मौजू कारण यह हो सकता है कि ढेर सारे नील गायों ने आसमान पर अपनी पीठ रगड़ी हैण् ऐसे में विग्यान औंधे मुंह गिर पड़ता है। दण्डकारण्य के आदिवासियों के पास जंगल की कोई पुरानी आग है जिसकी रोशनी में वे एक नया स्वप्न देख रहे हैंण् पर आंच हैए आग है जिसमे वे झुलस भी रहे हैं.
सोड़ी दीपक का नाम कुछ और भी हो सकता है उन्हे अपनी उम्र तक का पता नही वे अपने उम्र का मापन आपकी आंखों पर छोड़ देते हैं। जिंदगी जीने का उम्र से कोई वास्ता हो सकता है क्याघ् शायद इसकी उन्हें जरूरत ही नहीं महसूस होतीण् क्योंकि वहां मौत उम्र और गुनाह पूंछ कर नहीं आतीण् अपनी जमीन पर जिंदा रहना ही उनका गुनाह हो सकता हैए उनका गुनाह हो सकता है माओवादियों के सहयोग से बने तालाबों में मछली पकड़नाए उनका गुनाह हो सकता है कि अपने गांव मसले को फैसले में बदलना जो सब मिलजुल कर आपस में निबटा लेते हैं और वहां गुनाहों की लम्बी फेहरिस्त हैए जहां आदिवासियों ने सरकार से अब उम्मीदें छोड़ दी है। सरकार से उम्मीदों के प्रबल दावेदार वे हैं जो इनकी जमीनों पर अपनी मशीने खड़ा करना चाहते हैंए जिनके लिए देश एक कच्चा माल है और देश का हर नागरिक संसाधनण् शायद इस कच्चे माल को उन्हें खोदना हैए पकाना है और राख की शक्ल में उसे फेंक देना हैण् लाल किले से १५ अगस्त को हर बार दुहराया जाने वाला प्रगति और विकास का कोई संदेस इन आदिवासियों के लिए नहीं होता। वे प्रधानमंत्री की जुबान में बस एक भयानक खतरे की तरह आते हैं और एक दिन किसी नाले के किनारे उनकी लाश मिल सकती है या संभव है लाश भी न मिले जिंदा पकड़े जाने पर वे उन छत्तीस वारदातों के दोषी हो सकते हैं जिन इलाकों को उन्होंने देखा तक नहीं वे कई अनाम नामों के साथ महान गुनाहों की श्रेणी में शामिल हैं यह नवम्बर २०१० के किसी घटना की स्मृति है जिसे सोडी दीपक साझा कर रहे हैं इससे पहले की ढेर सारी स्मृतियां धुंधली पड़ चुकी हैं या शायद वे उसमे लौटना नहीं चाहते।
इस गांव की सबसे बुजुर्ग महिला बंजामी बुधरी के आंखों की रोशनी जा चुकी हैए इसमे ७० साल का इतिहास था जिसे किसी कागज पर नहीं उतारा जा सकाए जो अब बस जेहन में बचा है उनके पास जंगलों में पूरे के पूरे गांव के टहलने के कई किस्से हैं। इसे पलायन नही कहा जा सकता इन जंगलों में बसने वाले गांवों की जनसंख्या जब बढ़ जाती थी तो उनमे से कुछ घर उठकर थोड़ी दूर जाकर बस जाते थे बंजामी 40 साल पहले गदरा सुकमा के नजदीक किसी जगह से आकर आखिरी बार इस गांव में बसी थी और तब से यहां रह रही हैं अब वे यहां से नहीं जाना चाहती दो साल पहले उनका पोते की पुलिस ने हत्या कर दी है वे बताती हैं कि वह तो बस पार्टी माओवादीद्ध वालों के साथ रहता था और सलवाजुडूम के खिलाफ था.
दण्डकारण्य का एक बड़ा हिस्सा आज माओवादी आंदोलन के प्रभाव में है और राज्य का एक बड़ा तंत्र इसके चिंता के प्रभाव में यहां माओवादी होना उतना ही सहज है जितना जंगल में पेड़ होना सबके सब आदिवासी और सबके सब माओवादी ये गांव मुरिया और कोया समुदाय का है जिसमे माओवादियों द्वारा नियुक्त एक अध्यापक तेलगू और हिन्दी दोनो जानता है यहां कोई नहीं जानता कि वह कितना खतरनाक है यह बात सिर्फ देश के प्रधान मंत्री को पता है जिसे वे बार-बार दुहराते रहते है।
इन सब बातों से अलग एक इतिहास है जो मिथक के साथ लगातार प्रभावी बना रहा है। पूर्ववर्ती विद्रोहों को इन मिथकों ने संबल दिया थाण् आदिवासियों का एक राजा जो कभी नहीं मारा गय. विद्रोह का एक नायक जिसके शरीर पर आते ही बंदूक की गोलियां पानी में बदल जाती थी. आम की टहनियां जो गांवों में पहुंचते ही लड़ाई का आगाज कराती थीये अब मौखिक कहानी बन गये हैंए इससे अलग जिंदगी एकदम उलट गयी हैण् जबकि उनके गांव खाली कराये जा रहे हैंए उन्हें कैम्पों में ढकेला जा रहा हैए उनके शिकार के लिए ग्रीन हंट चलाया जा रहा है और बंदूक की नालें उन पर तान दी गयी हैंण् वे बंदूकें छीनकर उनकी नालें मोड़ना सीख चुके हैंण् अब तक इन आदिवासियों को भारतीय राज्य सत्ता ने हमेशा एक ऐसे तत्व के रूप में देखा जो कभी किसी सत्ता के खांचे में फिट नहीं हो पाएण् यह एक देशज असमानता का परिणाम था जहां हमेशा से इन पर साशन करने के ही बारे में सोचा गया और ये स्वसाशन के बारे मे सोचते रहेण् विकास नाम की कोई चीज है जो इन तक कभी नहीं पहुंच पाई और जब भी वह इन तक आई इनके कई सारे विनाश को एक साथ लेकरण् जिसमे उस संस्कृति का विनासए उस सामूहिकता का विनाश और उस जंगल का विनाश समाहित थाए जहां वे अब तक जीते आ रहे थेण् १९१० के भूमकाल और उसके पूर्व में हुए विद्रोहों ने हमेशा एक बाहरी व्यवस्था को थोपने की अस्वीकार्यता को प्रकट किया हैण् जब अंग्रेजों के खिलाफ जंग छिड़ी तो आदिवासी यह सोच कर गोलियां खाते रहे कि उनका नायक गुंडाधुर कभी नहीं मारा जाएगा और गोलियां पानी में बदल जाएंगीए पर गोलियां पानी में नहीं बदलीण् वे चली और कुछ चीखें उठीए कुछ उनके बीच से हमेशा के लिए जाने कहां चले गए और फिर कभी लौटे भारतीय सत्ता से पहली बार ६० के दशक में शुरु हुए राजा भंजदेव के नेतृत्व में भी यही मान्यता रही कि राजा को मारा नहीं जा सकता और पुलिस की गोली पानी में बदल जाएगीण् भंजदेव की हत्या के बाद उन्हें कई वर्षों तक यह यकीन नहीं हुआ कि वह मारा जा चुका है और उसके तकरीबन १६ अवतार हुए जो यह दावा करते रहे कि वे राजा भंजदेव हैं अब जबकि ८० के दशक में माओवादियों ने यहां प्रवेश किया और धीरे.धीरे वे इनमे घुले मिले उन्होने आदिवासियों के सहयोग से उनका जो विकास कियाए उन्हें जिस तरह की व्यवस्था मुहैया कराई शायद वह उनके समाज के अनुरूप थीए वे इसे अपने समाज की व्यवस्था के रूप में स्वीकार्य कर चुके हैंण् वर्तमान में दण्डकारन्य इलाके में माओवादियों ने जो बड़ा फर्क लाया है वह यह है कि उन्होंने अधिकांस स्थानीय व्यवस्था को वहां की स्थानीय लोगों के साथ जोड़ दिया है और वे माओवादी पार्टी के और वहां की जनताना.सरकार के तमाम पदों पर स्थित हो गए हैं
यदि इतिहास हमे भविष्य निर्मित करने की समझ देता है तो पिछले चार दशकों यानि ४० वर्षों में नक्सलवाडी से आज तक माओवादियों के संघर्ष और सत्ता द्वारा उनके उन्मूलन को लेकर अख्तियार किये गये अब तक के तरीकों से सीखना होगा जो कि मामूली नहीं रहे हैंण् छत्तीसगढ़ तब मध्यप्रदेश का हिस्सा था जब नक्सली उन्मूलन के महानीरिक्षक अयोध्यानाथ पाठक बनाये गये उस समय नक्सली इलाकों में पुलिस कर्मी शिक्षक के वेश में जाया करते थे और नक्सली गतिविधियों पर नजर रखते थेण् यह माना गया कि नक्सली गाँव वालों के साथ इतने घुले मिले होते हैं कि कई बार पहचान ही मुश्किल हो जाती है और इस तरीके को अपनाते हुए तत्काल पुलिस अधीक्षक सुदर्शन ने ग्रामीणों के साथ अपने तौर तरीकों में बदलाव लायाण् जब वे ग्रामीणों के बीच जाते तो जमीन पर बैठतेए पता नहीं गाँव वालों ने इस पुलिस के बदले हुए रूप किस तरह लिया पर मीडिया को यह तरीका कफी पसंद आया और पुलिस का यह उदार चरित्र बडे पैमाने पर प्रसारित किया गया तरीका यह भी अख्तियार किया गया कि पुलिस कई दिनों तक जंगलों में नक्सली दलम बनकर घूमती रही 1990.92 के आस.पास जनजागरण अभियन चलाये गये और गाँव.गाँव जाकर यह बताया गया कि नक्सली अपराधी हैंण् एनएसजी जैसी एजेंसी जो कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सुरक्षा प्रदान करती है उसे तैनात किया गया इस तरह के अन्य कई प्रयोग किये गए।
वहाँ के तत्कालीन डी.आइ.जी पन्ना लाल ने दावा किया कि बहुत जल्द ही राज्य इस समस्या से मुक्त हो जाएगा उस समय के गृह राज्य मंत्री गौरी शंकर शेजवार ने तो यह भी कह डाला कि नक्सलवाद आखिरी सांसें ले रहा है यह बात १९९३ की है तब से अब तक १६ वर्ष बीत चुके हैं ये सारे प्रयोग और दावे आज खारिज हो चुके हैंण् अगर जुनून में न हो तो वास्तविक स्थिति का अंदाजा कोई पुलिस वाला भी लगा सकता हैण् १९९७ में देव प्रकाश खन्ना जो वहाँ के डी.जी.पी थे ने अपनी पुस्तक 'हम सब अर्जुन हैं' में इसे स्पष्ट भी किया है और व्यवस्था की संरचना व नक्सलवाद की समस्या को नये दृष्टि से रखने का प्रयास किया है अंततः उस समय यह मान लिया गया कि नक्सलवाद के लिये कोई भी फौरी कार्यवाही महज आदिवासियों को नष्ट करना और उनका कत्लेआम होगा इसलिये इसका एलोपैथिक इलाज किया जाना चाहिये।
लिहाजा इस आंदोलन को बंदूकों से खत्म करना एक बड़े आदिवासी समाज की हत्या के रूप में ही आएगा। सरकार ने यहां के बड़े इलाके को कब्जे मे लेकर एक सैन्य प्रशिक्षण केन्द्र बना रही है ताकि इस प्रशिक्षण में आदिवासी उन्हें शिकार के तौर पर मुहैया हो सकें। देश की रक्षा के लिए जिन्हें हम सिपाही और प्रहरी से सम्बोधित करते हैं वे अपने ही देश के आदिम निवासियों का शिकार करने को तैयार हो रहे हैं और कुछ शिकार किए जा चुके हैं।


-चन्द्रिका
मीडिया विभाग महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व०विद्यालयए वर्धा

3 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice .

बहरहाल यह बहस तो चलती ही रहेगी।

ब्लॉगर्स मीट वीकली (6) Eid Mubarak में आपका स्वागत है।
इस मुददे पर कुछ पोस्ट्स मीट में भी हैं और हिंदी ब्लॉगिंग गाइड की 31 पोस्ट्स भी हिंदी ब्लॉग जगत को समर्पित की जा रही हैं।

Dr. Ayaz Ahmad ने कहा…

निकलने को तो बंदूक़ों से दूध भी निकल सकता है और घी भी निकल सकता है लेकिन योजना तो नेताओं को बनानी होगी और चलना पब्लिक को होगा और इसके लिए दोनों ही तैयार ही नहीं हैं।

Arvind Pande Wardha ने कहा…

Thoda our saral bhasha me likhte to achha hota.
manywar eska solution bhi batate to achha rahata