बुधवार, 15 अगस्त 2012

शहर और देहात तथा मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के विभेदों का अंत भाग 2


कुछ साथियों की धारणा है कि कालक्रम में उद्योग और कृषि के बीच के तथा मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के न केवल मूलभूत विभेद समाप्त हो जाएँगे बल्कि उनके बीच के सभी विभेद समाप्त हो जाएँगे। यह सही नहीं है। कृषि और उद्योग के मूलभूत विभेदों की समाप्ति से उनके बीच के सभी विभेदों का अंत नहीं होगा। उद्योग और कृषि के कामों की स्थितियों में भिन्नता के चलते कुछ ऐसे विभेद, जो मूलभूत नहीं हो सकते हैं, अवश्य ही आगे बने रहेंगे। उद्योग में भी श्रम की स्थितियाँ इसकी सभी प्रशाखाओं के समान नहीं है। उदाहरण के लिए कोयला मजदूरों की श्रम स्थिति मशीनीकृत जूता कारखाने में काम करने वालों की श्रम स्थिति से भिन्न हैं। इसी तरह कच्चा लोहा के खनिज मजदूरों की श्रम स्थिति अभियंत्रण उद्योग में कार्यरत मजदूरों की श्रमस्थिति से भिन्न होती है। अगर उद्योग के अंदर विभिन्न प्रशाखाओं की श्रम स्थितियों में भिन्नता है तो फिर उद्योग और कृषि के बीच निश्चय ही कुछ ज्यादा भिन्नताएँ होंगी।
निश्चय ही ऐसा शारीरिक और मानसिक श्रम के विभेदों के बारे में भी कहा जाएगा। इनके बीच के मूलभूत विभेद और इनके सांस्कृतिक और प्राविधिक स्तर का फर्क निश्चिय ही मिट जायगा। किन्तु कुछ विभेद जो मूलभूत नहीं होंगे (गौण प्रकृति के विभेद) बने रहेंगे। ऐसा इसलिए रहेगा क्योंकि प्रबंधन कर्मियों और मजदूरों की श्रम स्थितियाँ जब भी बिल्कुल एक समान नहीं रहेंगी।
कुछ कामरेड जो इसके विपरीत धारणा रखते हैं, वे शायद मेरे पूर्व के कतिपय बयानों को आधार बना रहे हों जिनमें, उद्योग और कृषि के बीच तथा मानसिक एवं शारीरिक श्रम के बीच के विभेदों के विलोपन की अवधारणा व्यक्त की गई है, इसके बारे में अब बिना किसी हिचक के स्पष्टता के साथ कहा जाना चाहिए कि उसका जो अर्थ है, वह यह कि मूलभूत विभेदों का विलोपन न कि सभी प्रकार के विभेदों का। मेरी अवधारणा को उन कामरेडों ने ठोस रूप में समझा कि यह सभी प्रकार के विभेदों की समाप्ति पर लागू है। कामरेडों ने इसे उस रूप में समझा यह साबित करता है किमेरी उन अवधारणाओं की अभिव्यक्ति सुस्पष्ट नहीं थी और इसलिए असंतोष जनक थी। अब उसे निश्चय ही छोड़ दिया जाना चाहिए और उसकी जगह यह अवधारणा बनानी चाहिए जो बताती है कि उद्योग और कृषि तथा शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के मूलभूत विभेदों का विलोपन होता है और गैर मूलभूत (अर्थात गौण) विभेदों की अवस्थिति कायम रहती है।

क्रमश:
अनुवादक- सत्यनारायणठाकुर

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा हैसमाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थीइस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया थाइस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैंआप के सुझाव विचार सादर आमंत्रित हैं
-सुमन

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!