बुधवार, 22 अगस्त 2012

दो पड़ोसी और अल्पसंख्यक

भारत और पाकिस्तान ये दोनों पड़ोसी सन 1947 के अगस्त महीने के मध्य में स्वतंत्र हुए थे। आज, स्वतंत्रता के 65 साल बाद, इन दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है? बेहतर प्रजातंत्र की स्थापना के लिए इस प्रश्न का उत्तर जानना महत्वपूर्ण होगा।
विगत 11 अगस्त को मुंबई के आज़ाद मैदान में 50,000 से अधिक लोग इकठ्ठा हुए। इनमे से अधिकांश मुसलमान थे और वे म्यानमार और असम में मुसलमानों के खिलाफ हो रही हिंसा पर अपना विरोध जताने के लिए जुटे थे। सभा में कुछ उत्तेजक पोस्टर प्रदर्शित किये गए और भडकाऊ भाषण हुए। इसके बाद, भीड़ हिंसक हो गयी और उसने मीडिया को अपना निशाना बनाया। यह इसलिए किया गया क्योंकि श्रोताओं का ख्याल था कि मीडिया ने असम के उन मुसलमानों की बदहाली को पर्याप्त तरजीह नहीं दी, जो कि जुलाई में वहां बोडो और मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा के कारण विस्थापित हो गए हैं। असम में हुई हिंसा में 70 लोग मारे जा चुके हैं और 4 लाख से अधिक मुसलमान और बोडो अपने घरबार छोड़ कर शरणार्थी शिविरों में शरण लेने पर मजबूर हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम में असम सरकार की भूमिका निहायत शर्मनाक रही है।
मुंबई में भीड़ ने कुछ ओ़बी़ वैनो को आग के हवाले कर दिया। हिंसक भीड़, पुलिसकर्मियों से भी भिड़ गई। महिला पुलिसकर्मियों के साथ अश्लील व अशालीन व्यवहार किया गया व पुरूष पुलिसवालो के साथ मारपीट हुई। हिंसा पर नियंत्रण पाने के लिये पुलिस को गोलीचालन करना पड़ा जिसमें दो युवक मारे गये। भीड़ और पुलिस के बीच हुई भिडं़त में कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए। रैली की आयोजक, रज़ा अकादमी, ने हिंसा के लिये माफी मांगी है और कहा है कि भीड़ में कुछ अवांछित व असामाजिक तत्व घुस आये थे। परन्तु आयोजक इस त्रासदी के लिये अपनी जिम्मेदारी से बच नही सकते। किसी भी विरोध प्रदर्शन का पूरी तरह प्रजातांत्रिक और अहिंसक होना आवश्यक है। आम सभाओं में दिये जाने वाले भाषणों में संतुलित भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। घृणा फैलाने वाली और भड़काऊ बाते करने की इज़ाज़त किसी को नही दी जा सकती।
उसी हफ्ते में यह खबर आयी कि करीब 300 हिन्दू, पाकिस्तान की सीमा लांघ कर भारत आ गये हैं। वे तीर्थ यात्रा के लिये भारत आये थे परन्तु उनमें से कई ने कहा है कि वे वापिस नही जायेंगे क्योंकि पाकिस्तान में वे स्वयं को सुरक्षित महसूस नही करते। इनमें से अधिकांश हिन्दू, सिंध व बलूचिस्तान से हैं। ऐंसी खबरें हैं कि पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर उन्हें जबरन मुसलमान बनाने का सिलसिला जारी है। ऐसा भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे के नागरिकों के तरह जीना पड़ रहा है। पाकिस्तान में जिन धार्मिक अल्पसंख्यकों का दमन हो रहा है, उनमें हिन्दू, सिक्ख और ईसाईयों के अतिरिक्त शिया और अहमदिया भी शामिल हैं।
स्वतंत्रता के समय, हमने प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने का संकल्प लिया था। आज, 65 वर्ष बाद स्थिति क्या है। भारत तो धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया ही था पाकिस्तान जिसका निर्माण इस्लाम के नाम पर भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों को मिला कर किया गया था की नींव भी धर्मनिरपेक्ष सिद्घांतों पर रखी गई थी। मोहम्मद अली जिन्ना का 11 अगस्त 1947 का प्रसिद्ध भाषण इस तथ्य को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में राज्य का धर्म से कोई लेनादेना नही होगा और लोग मस्जिदो, मंदिरो, चर्चों या जहाँ भी चाहें वहां ईश आराधना के लिये जाने को स्वतंत्र होंगे। उन्होंने कहा था कि धर्म, नागरिको का व्यक्तिगत मसला है जिससे राज्य को कोई मतलब नही होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि पाकिस्तान के झंडे में सफेद रंग अल्पसंख्यकों का प्रतीक है। परन्तु तथ्य यह है कि पाकिस्तान का संपूर्ण तंत्र सांप्रदायिक था। जिन्ना ने अपने भाषणों में चाहे जो भी कहा हो परन्तु पाकिस्तान के निर्माण का आधार वहां के सामंती तत्व थे और उनका नज़रिया बिल्कुल स्पष्ट था। शनै:शनै: पाकिस्तान का सांप्रदायिकीकरण होता गया और सन 1970 के दशक के अंत तक, वहां ज़िया उल हक़ और मौलाना मौदूदी जैसे लोगों का बोलबाला हो गया। मुल्ला, समाज के नेता बन गए और मुल्लामिलिट्री गठबंधन, जिसे अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त था और जिसकी मर्जी पाकिस्तान में चलती थी, ने जिन्ना के भाषण के परखच्चे उड़ा दिये। यहां तक कि शिया और अहमदिया जैसे मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भी पाकिस्तान में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है और धार्मिक असहिष्णुता के चलते, राजनीति में उनका दखल बहुत कम हो गया है।
दूसरी ओर, भारत में गांधी और नेहरू जिन्होंने कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों को ग़ा था की धर्मनिरपेक्षता के प्रति संपूर्ण और अडिग प्रतिबद्धता थी। गांधी, धर्मप्राण हिन्दू थे तो नेहरू नास्तिक, परन्तु उन दोनो का यह स्पष्ट विचार था कि राज्य को सभी धमोर्ं के लोगो को बराबरी की नजर से देखना चाहिये और आस्था से संबंधित मुद्दों की राज्य के नीति निर्धारण में कोई भूमिका नही होनी चाहिए। इस नीति को लागू करने में नेहरू को दो तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। पहली यह कि यद्यपि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष था तथापि समाज पर धार्मिकता का गहरा रंग च़ा हुआ था। इससे धर्मनिरपेक्ष नीतियों को पूरी तरह लागू करने में समस्या आई। दूसरी, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में आस्था रखने वाली कांग्रेस में कई सांप्रदायिक तत्वों ने घुसपैठ कर ली थी। इस सिलसिले में नेहरू द्वारा कई बार चेतावनियां दी गइंर परन्तु उन पर पार्टी के नेताओं ने कोई ध्यान नही दिया और नतीजतन कुछ वषोर्ं बाद, कांग्रेस के कुछ नेताओं और साम्प्रदायिक संगठनो के कर्ताधर्ताओं के बीच कुछ खास अंतर नहीं बचा।
किसी भी देश में प्रजातंत्र की सफलता का मानक होता है वहां अल्पसंख्यकों को प्राप्त सुरक्षा और बराबरी का दर्जा। पिछले तीन दशकों में कई जटिल कारणों से समाज में साम्प्रदायिक तत्वों का बोलबाला हैं। परन्तु इस मामले में पाकिस्तान में स्थिति काफी अलग हैं। पाकिस्तान की राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतों के लिये हमेशा से जगह रही है। वहां सैनिक तानाशाहों का राज स्थापित हो जाने से फिरकापरस्त ताकतों का काम और आसान हो गया। अमेरिका के पाकिस्तान के आंतरिक मामलो में हस्तक्षेप और अमेरिका की अफगान नीति के कारण पाकिस्तान में सांप्रदायिक तत्वों की ताकत में और इजाफा हुआ।
भारत में साम्प्रदायिकता में ब़ढोत्तरी के पीछे अन्य कारण थे। इनमें शामिल हैं राजनैतिक अवसरवाद, चुनाव प्रणाली में कमियां, सांप्रदायिक ताकतों की बहुसंख्यक वर्ग के मन में अल्पसंख्यकों का डर पैदा करने में सफलता और राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति। आज यद्यपि मुसलमान कुल आबादी का केवल 13़4 प्रतिशत हैं तथापि सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वालों में उनका प्रतिशत 90 से अधिक है। सभी सामाजिकआर्थिक मानकों पर मुसलमानों की स्थिति बहुत खराब है। सच्चर समीति की रिपोर्ट से यह तथ्य पूरी तरह साबित हो गया है। पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों का आबादी में प्रतिशत लगातार घटता जा रहा है। सुरक्षा और सामाजिक दर्जे की दृष्टि से उनकी हालत बहुत खराब है। परन्तु किसी एक देश में अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय, किसी दूसरे देश में ऐसा ही करने का औचित्य नही बन सकता। इस तरह की प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिकता का इस्तेमाल राजनैतिक ताकतें करती रहीं हैं। भारत में साम्प्रदायिक ताकते, हिन्दुओं के पाकिस्तान से पलायन और असम हिंसा को हिन्दुओं पर आक्रमण बताती हैं तो पाकिस्तान में भारत के मुसलमानों के खिलाफ हो रही ज्यादतियों की खबरों का इस्तेमाल वहां के हिन्दू अल्पसंख्यकों का और अधिक दमन करने के लिये किया जाता है। भारत में बाबरी मस्जिद के हाए जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में कई मंदिर जमींदोज़ कर दिये गये थे।
इसमें कोई दो मत नही कि धर्मनिरपेक्षता के मामले मे भारत और पाकिस्तान की स्थिति में जमीन आसमान का फर्क है। अनेक कमियों के बावजूद, धर्मनिरपेक्षप्रजातांत्रिक मूल्य आज भी भारत की व्यवस्था की नींव बने हुए हैं। हालांकि यह भी सही है कि पिछले कुछ समय से ये कमजोर होते जा रहे हैं। पाकिस्तान में तो नाममात्र का प्रजातंत्र हैं और वहां प्रजातंत्र के जड़ें पकड़ने की कोई संभावनाएं भी नज़र नही आ रहीं हैं। दोनो ही देशो में अल्पसंख्यक परेशानहाल हैं। परन्तु पाकिस्तान में उनकी हालत भारत से कहीं बदतर है।
इस सब का अंतिम नतीजा क्या होगा? साम्प्रदायिकता किसी भी देश के विकास में एक बड़ा रोड़ा होती है। समाज के कमजोर वर्गों को आगे ब़ने के मौके उपलब्ध कराने के लिये सकारात्मक कदम उठाये जाना आवश्यक है। उन्हें सुरक्षा और आगे ब़ने के अवसर मुहैय्या कराये जाने चाहिये। हमें हमारे स्वाधीनता आंदोलन के स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता के मूल्यों को याद रखना होगा। भारत में हमारी सामाजिक और राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप, चुनाव प्रणाली में व्यापक परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता है। सांप्रदायिक हिंसा और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव से न केवल हमारे राष्टी्रय हितो को नुकसान पहुंचता है वरन ये मानवता के विरूद्ध भी हैं। हमें इन प्रवॢत्तियों को रोकना होगा और उन मूल्यों को ब़ावा देना होगा जिनके कारण हम एक उदार, सहिष्णु और प्रगतिशील समाज कहे जाते हैं। पाकिस्तान को भी चाहिये कि वह जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण में वर्णित मूल्यों को पुनर्स्थापित करे। वहां अल्पसंख्यकों का आबादी में घटता प्रतिशत और उनका देश से पलायन, पाकिस्तान के संस्थापक का घोर अपमान है।
-राम पुनियानी


3 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

निरपेक्ष भाव से लेख पर, साधुवाद आभार |
खरी खरी बातें कहीं, पाकी दुर्व्यवहार |
पाकी दुर्व्यवहार, आइना उन्मादी को |
करे आज बदनाम, मिली इस आजादी को |
अल्प-संख्यको झाँक, पाक के कुल अल्प-संख्यक |
रहे यहाँ जस भोग, मिलेगा उनको कब हक़ ??

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

"आतंकवादी धर्मनिरपेक्षता "-डॉ .वागीश मेहता ,डी .लिट .,1218 ,शब्दालोक ,अर्बन एस्टेट ,गुडगाँव -122-001

आतंकवादी धर्मनिरपेक्षता

राजनीतिक लफ्फाज़ फैला रहें हैं भ्रम ,

कि आतंकवादी का नहीं होता कोई धर्म ,

मुबारक सबको सकल परिवार जनों को .

अभिप्राय : है यही और यही है संकेत ,

कि आतंकवादी होता है धर्मनिरपेक्ष .

धन्य है सरकार ,क्या खूब बहका रही है ,

आतंकवाद का क्या ,धर्मनिरपेक्षता तो बढ़ा रही है .

प्रस्तुति :वीरुभाई ,43,309 ,सिल्वरवुड ड्राइव ,कैंटन ,मिशिगन ,यू . एस. ए .48 188 -डॉ .वागीश मेहता ,1218 ,शब्दालोक ,सेक्टर -4 ,अर्बन एस्टेट ,गुडगाँव -122-001

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

"आतंकवादी धर्मनिरपेक्षता "-डॉ .वागीश मेहता ,डी .लिट .,1218 ,शब्दालोक ,अर्बन एस्टेट ,गुडगाँव -122-001

आतंकवादी धर्मनिरपेक्षता

राजनीतिक लफ्फाज़ फैला रहें हैं भ्रम ,

कि आतंकवादी का नहीं होता कोई धर्म ,


अभिप्राय : है यही और यही है संकेत ,

कि आतंकवादी होता है धर्मनिरपेक्ष .

धन्य है सरकार ,क्या खूब बहका रही है ,

आतंकवाद का क्या ,धर्मनिरपेक्षता तो बढ़ा रही है .

प्रस्तुति :वीरुभाई ,43,309 ,सिल्वरवुड ड्राइव ,कैंटन ,मिशिगन ,यू . एस. ए .48 188 -डॉ .वागीश मेहता ,1218 ,शब्दालोक ,सेक्टर -4 ,अर्बन एस्टेट ,गुडगाँव -122-001