शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

नवल जी! पचहत्तर पर भी ऐसी दरिद्रता





अवसर था, 75वाँ वर्ष पूरा करने पर पिछले पखवारे पटना में आयोजित चर्चित हिन्दी आलोचक डा॰ नंदकिषोर नवल का दो दिवसीय अभिनंदन समारोह। कुछ दिनों पहले से ही पटना के हिन्दी अखबारों में इस बात की खबर आने लगी थी कि नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, अषोक वाजपेयी, पुरूषोत्तम अग्रवाल जैसे हिन्दी के नामी गिरामी आलोचकों कवियों का जमावड़ा लगने वाला है इस अवसर पर। और फिर, जिस समारोह के लिए अपूर्वानंद जैसे लोग घनघोर रूप से लगे हों, उस समारोह की सफलता के झंडे गड़ने ही थे। मित्र अपूर्वानंद ने जनषक्ति भवन आकर पार्टी तथा प्रगतिषील लेखक संघ के लोगों के नाम ठेरों आमंत्रण पत्र छोड़ा था।
    नवल जी ने जमाना पहले पार्टी (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) तथा प्रगतिषील लेखक संघ (प्रलेस) से अपना नाता तोड़ रखा है - इस बात को सभी लोग भलीभांति जानते हैं। फिर भी पार्टी या प्रलेस के भीतर आम तौर पर यह समझ रहीं है कि नवल जी कुछ दुराग्रहों के बावजूद हिन्दी आलोचना की प्रगतिषील धारा का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए और मित्र अपूर्वानंद द्वारा व्यक्तिगत रूप से आमंत्रण-पत्र दिये जाने के कारण भी यह स्वाभाविक था कि अपने एक पुराने पार्टी साथी, बिहार प्रलेस के नेता तथा आज के दौर के एक महत्वपूर्ण आलोचक के 75वें वर्षगांठ समारोह के गरिमापूर्ण अवसर पर पार्टी तथा प्रलेस के लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराते और शायद, इससे भी कही अधिक आकर्षण उनके लिए नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, पुरूषोत्तम अग्रवाल, श्याम कष्यप जैसे दिग्गज प्रगतिषील आलोचकों कवियों का इस समारोह में एक साथ उपस्थित होना भी था। कुल  मिलाकर, समारोह में बिहार के कई वामपंथी संगठनों के कार्यकत्र्ता तथा साहित्यकारों का जुटाव देखने लायक था।
    वैसे भी, उम्र के 75वंे पड़ाव तक पहुंचना आज के दौर में किसी के लिए कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। परंतु इस उम्र में पहुँच कर अपनी लेखकीय सक्रियता को गुणात्मक रूप  से प्रायः उसी स्तर पर बनाये रखना तो शायद चमत्कार ही है। इसकी झलक तो समारोह में ही दिख गयी जब नवल जी द्वारा लिखित पांच पुस्तकों का लोकार्पण किया गया है। इसके अलावा यह भी बताया गया कि तुलसीदास पर उनकी एक महत्वपूर्ण पुस्तक इस अवसर पर प्रकाषित होकर आते -आते रह गयी है।
    दो दिनों के इस समारोह को कुल चार सत्रों में बांटा गया था। अंतिम सत्र में नंदकिषोर नवल से सीधी बातचीत का कार्यक्रम था जोकि उनके चाहने वाले ठेरों श्रोताओं के लिए विषेष आकर्षण का केन्द्र था। मगर इसी सत्र में नवल जी ने अपना वह रूप दिखाया जिसकी कल्पना इस दो दिवसीय समारोह में भाग लेने वाले लोगों में शायद ही किसी ने की हो। सम्मान समारोह वैसे भी एक मर्यादित या कहें गरिमापूर्ण वातावरण के निर्माण का अवसर होता है। अपेक्षा यह होती है कि सम्मानित होने वाला शख्स इस अवसर पर अपने व्यक्तिगत रागद्वेषों से ऊपर उठ कर पूरे समाज और जन को संबोधित करते हुए अपने सबल मनोभावों से उपस्थित श्रोताओं को उद्वेलित करे। और वह शख्स नवल जी जैसे आज की हिन्दी आलोचना का एक शीर्ष पुरूष हो और जिसके सम्मान समारोह में नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, अषोक वाजपेयी सरीखे हिन्दी जगत के अति सौम्य, षिष्ट तथा सुचिंतित व्यक्तित्व की मौजूदगी हो तो इस समारोह की भव्यता/सभ्यता के बारे में अंदाजा ही लगाया जा सकता है।
    बातचीत के इस अंतिम सत्र  का संचालन स्वयं अपूर्वानंद कर रहे थे। अपूर्वानंद की संचालन क्षमता या कहे कौषल से जो लोग वाकिफ हैं प्रायः वे सभी उनका लोहा मानते हैं। प्रष्न पूछने के क्रम में जब काॅलेज के एक प्राध्यापक ने आचार्य (स्व.) जानकीवल्लव शास्त्री जी के नवल जी पर एक गंभीर आक्षेप के संदर्भ में स्पष्टीकरण की मांग की तो जैसे एकदम से वीटो लगाते हुए अपूर्वानंद बीच में कूद पड़ें। उन्होंने कहा कि संचालक की हैसियत से प्राप्त अपने विषेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए वह इस अवसर पर वैसे किसी भी प्रष्न को पूछने की इजाजत नहीं देंगे जो व्यक्तिगत आक्षेप पर आधारित हो। अपूर्वानंद के इस हस्तक्षेप पर प्रायः सभी ने संतोष व्यक्त किया।
    मगर, ठीक इसी बिन्दु पर आगे जो कुछ हुआ लगा जैसे समारोह का सारा तिलस्म किसी बदबूदार गाढ़े मलवे में तब्दील होने लगा। नवल जी से किसी प्रष्नकत्र्ता ने प्रगतिषील लेख संघ से उनके संबंधों के बारे में पूछ लिया। नवल जी ने इस प्रष्न को जिस तत्परता और जिस विस्तार से लिया लगा जैसे वह इस तरह के किसी प्रष्न के आने के इंतजार मेें काफी व्यग्रता से बैठे थे।  उन्होंने सत्र के संचालक अपूर्वानंद के संकल्प कीे लगभग धज्जियां उड़ाते हुए माक्र्सवाद, कम्युनिस्ट पार्टियों, प्रगतिषील लेखक संघ से होते हुए बाबा नागार्जुन, खगेन्द्र ठाकुर, अरूण कमल आदि जैसे कभी के अपने घनिष्ठ संपर्क के प्रियजनों तक पर ऐेसे-ऐसे घिनौने जुमले उछाले जिसकी अपेक्षा किसी हारे हुए जुआरी से ही की जा सकती है। उन्होंने कहा कि माक्र्सवाद पर उन्होंने जितनी भी पुस्तके पढ़ीं वे प्रायः सोवियत संघ से छपी हुई होती थीं। इसलिए उनमें माक्र्सवाद का मौलिक साहित्य न होकर भारत में कम्युनिस्टों की भरती के उद्देष्य से तोड़मरोड़ कर पेष की जाने वाली सामग्रियां होती थीं। हालंाकि, उन्होंने इस बात को भी स्वीकारा कि माक्र्सवाद की उन पुस्तकों के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए जिस विद्वान ने उनमें सही समझ पैदा की वह थे पटना विष्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर ओ.पी. जायसवाल। भई वाह, क्या बात है! एक तरफ तो एकदम से यह नकार कि सोवियत संघ से छप कर आने वाले माक्र्सवादी साहित्य मौलिक न हो कर तोड़मरोड़ कर पेष किया जाने वाला साहित्य हुआ करता था और दूसरी तरफ यह स्वीकृति भी कि इस तोड़मरोड़ वाले माक्र्सवाद के वैज्ञानिक अध्ययन की सही ‘समझ ’ प्रो॰ जायसवाल ने उन्हें दी। यह शोध का ही विषय हो सकता है कि क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वह जिस साहित्य का अध्ययन करने जा रहा है वह मौलिक तो न था मगर उसने उसके वैज्ञानिक अध्ययन की सही ‘समझ’ जरूर हासिल कर ली थी। उस शाम नवल जी की इस मौलिक ‘समझ’ की झलक पा कर उनके चाहने वालों पर क्या गुजरी होगी -इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। उनसे पूछना यह भी चाहिये कि बाद में उन्होंने माक्र्सवाद के मौलिक साहित्य का अध्ययन भी किया क्या और यदि हां तो वे कहां से छपे हुए थे? यहां नवल जी की समझ की तुच्छता को साबित करने के लिए क्या मात्र एक उदाहरण देना पर्याप्त नहीं होगा कि शहीदे आजम भगत सिंह अपनी फांसी पड़ने की आखिरी घड़ी तक अपने जेल वार्ड में जिस पुस्तक को पढ़ने में तल्लीन  रहे थे वह पुस्तक कोई और नहीं महान कम्युनिस्ट नेता लेनिन की जीवनी थी जो सोवियत संघ से ही छप कर आयी थी। उन्होंने फांसी चढ़ाने के लिए ले जाने आये जेल अधिकारियों से सगर्व कहा था- ‘‘रूको! अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।’’ लेकिन नवल जी को इससे क्या? वह तो अब इस ‘परिपक्व ’ अवस्था में पहुंच कर शहीदे आजम की समझ पर भी ऊंगली उठा सकते हैं?
    उन्होंने अपनी ‘समझ’ का खुलासा करते हुए आगे यह भी कहा कि वह अभी तक इस इंतजार में बैठे हैं कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां अपने नाम और अपने झंडे कब बदलेंगी क्योंकि सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया की अधिकांष कम्युनिस्ट पार्टियों ने ऐसा ही किया है। दरअसल, दोष इसमें  नवल जी के दृष्टिबोध का नहीं है। वह तो शुरू से ही ‘ध्वजभंग’ के प्रवर्तक रहे हैं। इसलिए उन्हें हर वक्त दुःस्वप्न की तरह लगता है कि कम्युनिस्ट पार्टियों का लाल ध्वज आज भी उसी गरिमा और लालिम के साथ दुनिया भर के लाखों करोड़ों-मेहनकष लोगों को आकर्षित क्यों  किये जा रहा है? उनकी दृष्टि में यदि कालिमा न होती तो वह भला दूर की छोडि़ये बिहार से हाथ भर की दूरी पर अवस्थित अपने पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में अत्यंत क्रूर तथा घृणित राजषाही पर कम्युनिस्ट पार्टियों तथा लाल झंडे के ऐतिहासिक विजय की वीरोचित गाथा से अनभिज्ञ न रह पाते।
    माक्र्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टियों पर बरसने के बाद नवल जी बेहद व्यक्तिगत प्रसंगों पर उतर कर ओछे आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी लगा दी । इस जोम में उन्होंने बिहार के कुछ कम्युनिस्ट नेताओं सहित बाबा नागार्जुन जैसे कालजयी कवि को भी अपने जानते लतियाने/ गलियाने में कोई कसर न रहने दी। इस लपेटे में उन्होंने सामने बैठे नामवर जी का नाम भी ले लिया। नवल जी ने विस्तार से बताया कि एक दौर में पार्टी के साथ बाबा नागार्जुन के तीखे अनबन के कारण प्रगतिषील लेख संघ के खगेन्द्र जी, अरूण कमल आदि ने बाबा के खिलाफ एक पुस्तिका लिखने के लिए उन्हें उकसाया था। उन्होंने अपनी भूमिका के साथ बाबा के खिलाफ एक पुस्तिका अपूर्वानंद से लिखवाई। पुस्तिका छपने के बाद खगेन्द्र जी, अरूण कमल ने तो इसके पीछे अपना हाथ होने से साफ इंकार कर दिया और इस पुस्तिका को लेकर चारों तरफ से हो रही तीव्र निंदा के चलते अपूर्वानंद तथा उन पर प्रलेस से निकालने की कार्रवाई हो गयी। बाबा तो ऐसे बमके कि एकदम से राजकमल प्रकाषन की संचालिका शीला संधु के यहां जा धमके । शीला जी से उन्होंने दो टूक शब्दों में आलोचना से ‘नवल और नामवर’ दोनों को तत्काल निकालने की बात कही। शीला जीे ने नवल जी को तो निकाल दिया लेकिन नामवर जी को निकालना उनके बूते की बात नहीं थी। परंतु बाबा अपनी जिद पर डटे रहें। फलतः नामवर जी को निकालने की जगह शीला जी को आलोचना के प्रकाषन को ही कुछ समय के लिए स्थगित कर देना पड़ा। इस लंबे तथा सनसनीखेजष् प्रसंग को पूरे नाटकीय उतार चढ़ाव के साथ प्रस्तुत किये जाने के आखिर में नवल जी ने इसमें यह तड़का लगाना भी नहीं छोड़ा कि नामवर जी की उपस्थिति में वह बिलकुल आज ही इस रहस्य पर से पर्दा उठा रहे हैं। इस तड़का के पीछे नवल जी की समझ शायद यह रही हो कि यदि नामवर जी यहां उनकी बातों की ताक़ीद कर दे ंतो जन जन के कवि बाबा नागर्जुन को विलेन साबित करने की उनकी मंषा पर कोई ऊंगली उठाने का साहस न कर सके। पर खिलाडि़योें के खिलाड़ी नामवर जी अपने सर्वज्ञात आचरण के मुताबिक पूरे इत्मीनान भाव से भारी मौन साधे बैठे रहें।
    इस प्रसंग के दो अवतरण हैं। पहला यह कि नवल जी ने बाबा के खिलाफ जिस पुस्तिका को अपनी भूमिका के साथ छपवायी उसमें यदि कलंक की कोई बात है तो यह कि उसके पीछे प्रगतिषील लेख संघ के कुछ लोगों का उकसावा और बाद में उससे उनका मुकर जाना था। पुस्तिका यदि छप भी गयी तो हिन्दी जगत को उसे श्रेष्ठ साहित्य के रूप में मूल्यांकन किये जाने की आवष्यकता थी जो न हो सका। दूसरा यह कि बाबा जैसे इतने महान जन कवि का मन भी इतना क्षुद्र निकला कि उन्होंने इसे लेकर इतना बड़ा वितंडा खड़ा कर दिया। उन्हें तो उनके इस वीरोचित दायित्व के लिए शीला संधु के पास जाकर कहना यह चाहिये था कि ‘‘नामवर को हटा कर नवल को प्रधान संपादक बनाओ।’’ शीला जी गुजर गयीं, बाबा गुजर गयें। बचे एकमात्र गवाह नामवर जी। नब्बे पार करने के बाद वह भी इस प्रसंग पर यदि मुंह नहीं खोलते तो यह प्रसंग तो जैसे प्रेत-प्रसंग ही बन कर रह जायेगा?
    बहरहाल, आयोजन की समाप्ति के बाद बाहर निकलते अधिकांष श्रोताओं की तिक्त भाव भंगिमाओं को देखकर लगा कि इस पूरे आयोजन का निचोड़ मानो इस एक प्रष्न में सिमट कर रह गया - ‘‘नवल जी, पचहत्तर पर भी ऐसी दरिद्रता!’’
- सुमन्त

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