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सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

का॰ रामशरण शर्मा मुंशी’ : एक विलक्षण संपादक



मुझे ठीकठीक याद नहीं कि वह साल और तिथि क्या थी जब मैं दिल्ली जा कर पिपुल्स पब्लिशंग हाउस (पीपीएच) में उसके हिन्दी संपादकीय विभाग में सहायक के रूप में भत्तीर हुआ था। मगर, यह बात 25 वर्ष के ऊपर की तो है ही। हालांकि का॰ अनिल राजिमवाले के बुलावे पर मैं दैनिक जनयुग को ज्वॉयन करने की उम्मीद में दिल्ली गया था। लेकिन मेरे वहां पहुंचने पर का॰ अनिल ने मुझे फुसलाते हुए सीधे पीपीएच में धकेल दिया। मैं खिन्न तो बहुत था परंतु जब उन्होंने बताया कि पीपीएच हिन्दी विभाग के सम्पादक हैं प्रख्यात माक्र्सवादी आलोचक डा॰ रामविलास शर्मा के छोटे भाई का॰ रामशरण मुंशी’ तो मेरी सारी खिन्नता जाती रही । मैं रोमांचित हो उठा कि का॰ पी.सी.जोशी के जमाने से ही पीपीएच के हिन्दी सम्पादकीय विभाग को संभालने वाले और हिन्दी साहित्य के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण माक्र्सवादी आलोचक के अनुज का॰ मुंशी के नेतृत्व में मुझे काम करने का अवसर मिलेगा।
मुझे याद है जिस दिन का॰ अनिल ने मुझे पीपीएच ले जाकर का॰ मुंशी से मिलवाया था और मेरा यह कह कर परिचय करवाया कि यह बिहार के कवि कन्हैया के पुत्र हैं तो मुंशी जी ने पूरी वात्सल्यता के साथ मेरी पीठ पर थपकी दे डाली। आज जब का॰ अरूणा के कहने पर दिल्ली से फोन पर मेरी बेटी ने मुंशी जी की मृत्यु की खबर सुनायी तो लगा जैसे मेरी पीठ की सारी तंतुएं लगभग 25 वर्ष पूर्व की उस वाल्सल्य भरी थपकियों के आभास से पुनः स्पंदित होने लगी हैं। वे सारे लंबे क्षण मेरी आंखों के सामने यकायक साकार होने लगे जिन्हें मैंने मुंशी जी की अभिभावकतुल्य देखरेख में गुजारे थे तथा लेखन और संपादन कला की बारकियों पर अपनी पकड़ बनाने की कवायद शुरू की थी।
का॰ मुंशी की संपादकीय टीम में हम चार लोग थे का॰ चंदना झा जो अभी बिहार में किसी कॉलेज की प्रि्रंसिपल हैं, का॰ अरूणा जो अभी महिला समाज के केन्द्रीय कार्यालय में कार्यरत हैं और पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की सदस्य हैं, का॰ यश चौहान जो हिन्दी के यशस्वी रचनाकार कवि हैं तथा मैं स्वयं। हम चारों प्रायः समवयस्क थे और मुंशी जी हमसे उम्र में लगभग दुगुनेपितातुल्य। उन दिनों पीपीएच का हिन्दीअंग्रेजी संपादकीय विभाग आज के मुकाबले पूरे उरूज पर था। मुंशी जी हिन्दी संपादकीय विभाग संभालने के अलावा पीपीएच पार्टी ब्रांच के सचिव भी हुआ करते थे संभवतः पीपीएच के मुंबई में रहने के दिनों से ही। इस नाते मुंशी जी की व्यस्तता देखते ही बनती थी। वे जब संपादकीय विभाग में बैठे किसी पांडुलिपि को संवारने सुधारने के काम में पूरे तल्लीन हुए होते तभी प्रेस का कोई साथी अपनी समस्या को लेकर उनके सामने एकदम से आ खड़ा होता। मुंशी जी चेहरे पर बिना कोई खीज भाव लाये पांडुलिपि समेट कर उस साथी के साथ चल पड़ते। उसी तरह जब वे मैनेजमेंट के लोगों से किसी गंभीर विचार विमशर में डूबे हुए होते तो संपादकीय के हम कोई साथी दौड़ पड़ते उन्हें बुला ले आने के लिए कि फोन पर या विभाग में कोई लेखक या अनुवादक उनसे बातचीत की खातिर प्रतीक्षारत हैं। इस दोहरे दायित्व के भारी दबाव को झेलते हुए मुंशी जी यूं तो अपने स्वभाव से हमेशा नमनीय बने रहें मगर उनके शरीर ने इसे और अधिक झेलने से इंकार करना शुरू कर दिया था।
वे रहते भी बहुत दूर थे। घर से पीपीएच आने में घंटा भर से ऊपर तो लग ही जाता था। दो एक बार हम उनके घर जा चुके थे। एक बार की मजेदार घटना है। वे गंभीर बीमार हो कर घर में ही रह रहे थे। मैं और का॰ चंदना झा उन्हें देखने गये थे। उसी बीमारी में हमने का॰ मुंशी के व्यक्तित्व में एक कवि और संस्कृतिकर्मी के गहरे रूप का दशर्न भी किया। उस दिन उन्होंने हमें अपनी कुछ कविताएं सुनायीं तो मुंबई के दिनों में इप्टा से जुड़े कुछ दिग्गज कलाकारों के बारे में एक से एक दिलचस्प संस्मरण भी सुनाये। पर पता नहीं क्यों मेरे एक दो बार कुरेदने के बावजूद वे अपने बड़े भाई डा॰ रामविलास शर्मा के बारे में कुछ खास बताने से कतराते रहें। अपनी बारी खत्म होने के बाद उन्होंने हम दोनों से भी कुछ सुनाने को कहा। मैंने अपने पिता की दो एक कविताएं सुना दीं। उन्हें मालूम था कि का॰ चंदना झा गाती बहुत बिया हैं तो उन्होंने गाने की फर्माइश कर दीं। चंदना झा को न जाने क्या सूझी कि वह निर्गुण गा बैठी ........... चार कहार मिल डोलियां उठावें।’’ गाना सुनकर मुंशी जी विहंस उठे। मगर हम दोनों जब उनके घर से बाहर निकले तो देर तक इस बात पर माथापच्ची करते रहे कि बीमारी की इस गंभीर अवस्था में कबीर का यह भजन मुंशी जी को सुनाना उचित था कि नहीं! बहरहाल, मुंशी जी ने कुछ ही दिनों के बाद कुछ ठीकठाक होकर ऑफिस आना शुरू कर दिया था।
पीपीएच ने हिन्दी प्रकाशन के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया था। अनुवाद की वैसी श्रेष्ठता और उत्कृष्ट अनुवादकों की वैसी टीम उस समय के बड़े से बड़े प्रकाशकों के यहां भी देखना प्रायः दुर्लभ था। पीपीएच के प्रकाशन में हिन्दी का जो विपुल और उत्कृष्ट साहित्य देखने को मिलता है उसमें अनुवादित पुस्तकों की ही मात्रा सर्वाधिक है। हिन्दी संपादकीय विभाग का दायित्व मुख्यतः सोवियत प्रकाशन के अंगे्रजी पुस्तकों के हिन्दी अनुवाद को संपन्न करने कराने का ही था। अनुवाद वैसे भी एक बेहद जटिल और धैर्य की मांग वाला कार्य होता है। मगर, उससे भी कही अधिक दुरूह कार्य उन अनुवादों में मौलिकता और भाषा के सहज सौंदर्य का रंग भरने का होता है जो शुद्धतः एक विलक्षण संपादक ही सम्पन्न कर सकता है। इस दृष्टि से यदि का॰ मुंशी के योगदान को देखा जाये तो यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि उनके हिमालयी परिश्रम तथा विलक्षण संपादन कौशल के बगैर प्रकाशन के क्षेत्र में पीपीएच को इतनी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त करना शायद संभव न हो पाता । का॰ मुंशी की भाषा पर अद्भुत पकड़ थी और जब वह किसी पांडुलिपि को लेकर बैठ जाते तो उसके छपने के बाद उसमें उनकी भाषायी कीमियागीरी की झलक साफ नजर न आये यह संभव न था।
एक लंबे समय तक उनके साथ काम करते हुए मैंने महसूस किया कि का॰ मुंशी यदि मौलिक लेखन के काम में जुटे रहते तो शायद उनकी गिनती श्रेष्ठ साहित्यकारों से कमतर न होती। मगर, का॰ मुंशी को यह नसीब न हुआ। इसे हम साहित्य की क्षति भी बता सकते हैं। मगर तब उस अपार क्षति का क्या होता जब पीपीएच के अत्यंत उत्कृष्ट एवं विपुल हिन्दी साहित्य के अभाव में साहित्यकारोंलेखकों की अनगिन पौध पनपने से रह जाती । इस दुर्घटना को टालना इसलिए संभव हो सका क्योंकि का॰ मुंशी जैसी शख्सियत ने श्रेष्ठ साहित्यकार बनने की अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को तिलाजंलि देते हुए एक अतुलनीय संपादक के रूप में अपनी समस्त शक्ति एवं मेधा पीपीएच में झोंक दी थीं। अपनी मृत्यु के उपरांत का॰ मुंशी इसी रूप में पूरी पार्टी तथा पीपीएच साहित्य के असंख्य पाठकों के बीच सदैव याद किये जाते रहेंगे; प्रतिष्ठा पाते रहेंगे।
का॰ रामशरण शर्मा मुंशी’ की स्मृति को लाल सलाम।
-सुमन्त

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

नवल जी! पचहत्तर पर भी ऐसी दरिद्रता





अवसर था, 75वाँ वर्ष पूरा करने पर पिछले पखवारे पटना में आयोजित चर्चित हिन्दी आलोचक डा॰ नंदकिषोर नवल का दो दिवसीय अभिनंदन समारोह। कुछ दिनों पहले से ही पटना के हिन्दी अखबारों में इस बात की खबर आने लगी थी कि नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, अषोक वाजपेयी, पुरूषोत्तम अग्रवाल जैसे हिन्दी के नामी गिरामी आलोचकों कवियों का जमावड़ा लगने वाला है इस अवसर पर। और फिर, जिस समारोह के लिए अपूर्वानंद जैसे लोग घनघोर रूप से लगे हों, उस समारोह की सफलता के झंडे गड़ने ही थे। मित्र अपूर्वानंद ने जनषक्ति भवन आकर पार्टी तथा प्रगतिषील लेखक संघ के लोगों के नाम ठेरों आमंत्रण पत्र छोड़ा था।
    नवल जी ने जमाना पहले पार्टी (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) तथा प्रगतिषील लेखक संघ (प्रलेस) से अपना नाता तोड़ रखा है - इस बात को सभी लोग भलीभांति जानते हैं। फिर भी पार्टी या प्रलेस के भीतर आम तौर पर यह समझ रहीं है कि नवल जी कुछ दुराग्रहों के बावजूद हिन्दी आलोचना की प्रगतिषील धारा का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए और मित्र अपूर्वानंद द्वारा व्यक्तिगत रूप से आमंत्रण-पत्र दिये जाने के कारण भी यह स्वाभाविक था कि अपने एक पुराने पार्टी साथी, बिहार प्रलेस के नेता तथा आज के दौर के एक महत्वपूर्ण आलोचक के 75वें वर्षगांठ समारोह के गरिमापूर्ण अवसर पर पार्टी तथा प्रलेस के लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराते और शायद, इससे भी कही अधिक आकर्षण उनके लिए नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, पुरूषोत्तम अग्रवाल, श्याम कष्यप जैसे दिग्गज प्रगतिषील आलोचकों कवियों का इस समारोह में एक साथ उपस्थित होना भी था। कुल  मिलाकर, समारोह में बिहार के कई वामपंथी संगठनों के कार्यकत्र्ता तथा साहित्यकारों का जुटाव देखने लायक था।
    वैसे भी, उम्र के 75वंे पड़ाव तक पहुंचना आज के दौर में किसी के लिए कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। परंतु इस उम्र में पहुँच कर अपनी लेखकीय सक्रियता को गुणात्मक रूप  से प्रायः उसी स्तर पर बनाये रखना तो शायद चमत्कार ही है। इसकी झलक तो समारोह में ही दिख गयी जब नवल जी द्वारा लिखित पांच पुस्तकों का लोकार्पण किया गया है। इसके अलावा यह भी बताया गया कि तुलसीदास पर उनकी एक महत्वपूर्ण पुस्तक इस अवसर पर प्रकाषित होकर आते -आते रह गयी है।
    दो दिनों के इस समारोह को कुल चार सत्रों में बांटा गया था। अंतिम सत्र में नंदकिषोर नवल से सीधी बातचीत का कार्यक्रम था जोकि उनके चाहने वाले ठेरों श्रोताओं के लिए विषेष आकर्षण का केन्द्र था। मगर इसी सत्र में नवल जी ने अपना वह रूप दिखाया जिसकी कल्पना इस दो दिवसीय समारोह में भाग लेने वाले लोगों में शायद ही किसी ने की हो। सम्मान समारोह वैसे भी एक मर्यादित या कहें गरिमापूर्ण वातावरण के निर्माण का अवसर होता है। अपेक्षा यह होती है कि सम्मानित होने वाला शख्स इस अवसर पर अपने व्यक्तिगत रागद्वेषों से ऊपर उठ कर पूरे समाज और जन को संबोधित करते हुए अपने सबल मनोभावों से उपस्थित श्रोताओं को उद्वेलित करे। और वह शख्स नवल जी जैसे आज की हिन्दी आलोचना का एक शीर्ष पुरूष हो और जिसके सम्मान समारोह में नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, अषोक वाजपेयी सरीखे हिन्दी जगत के अति सौम्य, षिष्ट तथा सुचिंतित व्यक्तित्व की मौजूदगी हो तो इस समारोह की भव्यता/सभ्यता के बारे में अंदाजा ही लगाया जा सकता है।
    बातचीत के इस अंतिम सत्र  का संचालन स्वयं अपूर्वानंद कर रहे थे। अपूर्वानंद की संचालन क्षमता या कहे कौषल से जो लोग वाकिफ हैं प्रायः वे सभी उनका लोहा मानते हैं। प्रष्न पूछने के क्रम में जब काॅलेज के एक प्राध्यापक ने आचार्य (स्व.) जानकीवल्लव शास्त्री जी के नवल जी पर एक गंभीर आक्षेप के संदर्भ में स्पष्टीकरण की मांग की तो जैसे एकदम से वीटो लगाते हुए अपूर्वानंद बीच में कूद पड़ें। उन्होंने कहा कि संचालक की हैसियत से प्राप्त अपने विषेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए वह इस अवसर पर वैसे किसी भी प्रष्न को पूछने की इजाजत नहीं देंगे जो व्यक्तिगत आक्षेप पर आधारित हो। अपूर्वानंद के इस हस्तक्षेप पर प्रायः सभी ने संतोष व्यक्त किया।
    मगर, ठीक इसी बिन्दु पर आगे जो कुछ हुआ लगा जैसे समारोह का सारा तिलस्म किसी बदबूदार गाढ़े मलवे में तब्दील होने लगा। नवल जी से किसी प्रष्नकत्र्ता ने प्रगतिषील लेख संघ से उनके संबंधों के बारे में पूछ लिया। नवल जी ने इस प्रष्न को जिस तत्परता और जिस विस्तार से लिया लगा जैसे वह इस तरह के किसी प्रष्न के आने के इंतजार मेें काफी व्यग्रता से बैठे थे।  उन्होंने सत्र के संचालक अपूर्वानंद के संकल्प कीे लगभग धज्जियां उड़ाते हुए माक्र्सवाद, कम्युनिस्ट पार्टियों, प्रगतिषील लेखक संघ से होते हुए बाबा नागार्जुन, खगेन्द्र ठाकुर, अरूण कमल आदि जैसे कभी के अपने घनिष्ठ संपर्क के प्रियजनों तक पर ऐेसे-ऐसे घिनौने जुमले उछाले जिसकी अपेक्षा किसी हारे हुए जुआरी से ही की जा सकती है। उन्होंने कहा कि माक्र्सवाद पर उन्होंने जितनी भी पुस्तके पढ़ीं वे प्रायः सोवियत संघ से छपी हुई होती थीं। इसलिए उनमें माक्र्सवाद का मौलिक साहित्य न होकर भारत में कम्युनिस्टों की भरती के उद्देष्य से तोड़मरोड़ कर पेष की जाने वाली सामग्रियां होती थीं। हालंाकि, उन्होंने इस बात को भी स्वीकारा कि माक्र्सवाद की उन पुस्तकों के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए जिस विद्वान ने उनमें सही समझ पैदा की वह थे पटना विष्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर ओ.पी. जायसवाल। भई वाह, क्या बात है! एक तरफ तो एकदम से यह नकार कि सोवियत संघ से छप कर आने वाले माक्र्सवादी साहित्य मौलिक न हो कर तोड़मरोड़ कर पेष किया जाने वाला साहित्य हुआ करता था और दूसरी तरफ यह स्वीकृति भी कि इस तोड़मरोड़ वाले माक्र्सवाद के वैज्ञानिक अध्ययन की सही ‘समझ ’ प्रो॰ जायसवाल ने उन्हें दी। यह शोध का ही विषय हो सकता है कि क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वह जिस साहित्य का अध्ययन करने जा रहा है वह मौलिक तो न था मगर उसने उसके वैज्ञानिक अध्ययन की सही ‘समझ’ जरूर हासिल कर ली थी। उस शाम नवल जी की इस मौलिक ‘समझ’ की झलक पा कर उनके चाहने वालों पर क्या गुजरी होगी -इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। उनसे पूछना यह भी चाहिये कि बाद में उन्होंने माक्र्सवाद के मौलिक साहित्य का अध्ययन भी किया क्या और यदि हां तो वे कहां से छपे हुए थे? यहां नवल जी की समझ की तुच्छता को साबित करने के लिए क्या मात्र एक उदाहरण देना पर्याप्त नहीं होगा कि शहीदे आजम भगत सिंह अपनी फांसी पड़ने की आखिरी घड़ी तक अपने जेल वार्ड में जिस पुस्तक को पढ़ने में तल्लीन  रहे थे वह पुस्तक कोई और नहीं महान कम्युनिस्ट नेता लेनिन की जीवनी थी जो सोवियत संघ से ही छप कर आयी थी। उन्होंने फांसी चढ़ाने के लिए ले जाने आये जेल अधिकारियों से सगर्व कहा था- ‘‘रूको! अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।’’ लेकिन नवल जी को इससे क्या? वह तो अब इस ‘परिपक्व ’ अवस्था में पहुंच कर शहीदे आजम की समझ पर भी ऊंगली उठा सकते हैं?
    उन्होंने अपनी ‘समझ’ का खुलासा करते हुए आगे यह भी कहा कि वह अभी तक इस इंतजार में बैठे हैं कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां अपने नाम और अपने झंडे कब बदलेंगी क्योंकि सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया की अधिकांष कम्युनिस्ट पार्टियों ने ऐसा ही किया है। दरअसल, दोष इसमें  नवल जी के दृष्टिबोध का नहीं है। वह तो शुरू से ही ‘ध्वजभंग’ के प्रवर्तक रहे हैं। इसलिए उन्हें हर वक्त दुःस्वप्न की तरह लगता है कि कम्युनिस्ट पार्टियों का लाल ध्वज आज भी उसी गरिमा और लालिम के साथ दुनिया भर के लाखों करोड़ों-मेहनकष लोगों को आकर्षित क्यों  किये जा रहा है? उनकी दृष्टि में यदि कालिमा न होती तो वह भला दूर की छोडि़ये बिहार से हाथ भर की दूरी पर अवस्थित अपने पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में अत्यंत क्रूर तथा घृणित राजषाही पर कम्युनिस्ट पार्टियों तथा लाल झंडे के ऐतिहासिक विजय की वीरोचित गाथा से अनभिज्ञ न रह पाते।
    माक्र्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टियों पर बरसने के बाद नवल जी बेहद व्यक्तिगत प्रसंगों पर उतर कर ओछे आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी लगा दी । इस जोम में उन्होंने बिहार के कुछ कम्युनिस्ट नेताओं सहित बाबा नागार्जुन जैसे कालजयी कवि को भी अपने जानते लतियाने/ गलियाने में कोई कसर न रहने दी। इस लपेटे में उन्होंने सामने बैठे नामवर जी का नाम भी ले लिया। नवल जी ने विस्तार से बताया कि एक दौर में पार्टी के साथ बाबा नागार्जुन के तीखे अनबन के कारण प्रगतिषील लेख संघ के खगेन्द्र जी, अरूण कमल आदि ने बाबा के खिलाफ एक पुस्तिका लिखने के लिए उन्हें उकसाया था। उन्होंने अपनी भूमिका के साथ बाबा के खिलाफ एक पुस्तिका अपूर्वानंद से लिखवाई। पुस्तिका छपने के बाद खगेन्द्र जी, अरूण कमल ने तो इसके पीछे अपना हाथ होने से साफ इंकार कर दिया और इस पुस्तिका को लेकर चारों तरफ से हो रही तीव्र निंदा के चलते अपूर्वानंद तथा उन पर प्रलेस से निकालने की कार्रवाई हो गयी। बाबा तो ऐसे बमके कि एकदम से राजकमल प्रकाषन की संचालिका शीला संधु के यहां जा धमके । शीला जी से उन्होंने दो टूक शब्दों में आलोचना से ‘नवल और नामवर’ दोनों को तत्काल निकालने की बात कही। शीला जीे ने नवल जी को तो निकाल दिया लेकिन नामवर जी को निकालना उनके बूते की बात नहीं थी। परंतु बाबा अपनी जिद पर डटे रहें। फलतः नामवर जी को निकालने की जगह शीला जी को आलोचना के प्रकाषन को ही कुछ समय के लिए स्थगित कर देना पड़ा। इस लंबे तथा सनसनीखेजष् प्रसंग को पूरे नाटकीय उतार चढ़ाव के साथ प्रस्तुत किये जाने के आखिर में नवल जी ने इसमें यह तड़का लगाना भी नहीं छोड़ा कि नामवर जी की उपस्थिति में वह बिलकुल आज ही इस रहस्य पर से पर्दा उठा रहे हैं। इस तड़का के पीछे नवल जी की समझ शायद यह रही हो कि यदि नामवर जी यहां उनकी बातों की ताक़ीद कर दे ंतो जन जन के कवि बाबा नागर्जुन को विलेन साबित करने की उनकी मंषा पर कोई ऊंगली उठाने का साहस न कर सके। पर खिलाडि़योें के खिलाड़ी नामवर जी अपने सर्वज्ञात आचरण के मुताबिक पूरे इत्मीनान भाव से भारी मौन साधे बैठे रहें।
    इस प्रसंग के दो अवतरण हैं। पहला यह कि नवल जी ने बाबा के खिलाफ जिस पुस्तिका को अपनी भूमिका के साथ छपवायी उसमें यदि कलंक की कोई बात है तो यह कि उसके पीछे प्रगतिषील लेख संघ के कुछ लोगों का उकसावा और बाद में उससे उनका मुकर जाना था। पुस्तिका यदि छप भी गयी तो हिन्दी जगत को उसे श्रेष्ठ साहित्य के रूप में मूल्यांकन किये जाने की आवष्यकता थी जो न हो सका। दूसरा यह कि बाबा जैसे इतने महान जन कवि का मन भी इतना क्षुद्र निकला कि उन्होंने इसे लेकर इतना बड़ा वितंडा खड़ा कर दिया। उन्हें तो उनके इस वीरोचित दायित्व के लिए शीला संधु के पास जाकर कहना यह चाहिये था कि ‘‘नामवर को हटा कर नवल को प्रधान संपादक बनाओ।’’ शीला जी गुजर गयीं, बाबा गुजर गयें। बचे एकमात्र गवाह नामवर जी। नब्बे पार करने के बाद वह भी इस प्रसंग पर यदि मुंह नहीं खोलते तो यह प्रसंग तो जैसे प्रेत-प्रसंग ही बन कर रह जायेगा?
    बहरहाल, आयोजन की समाप्ति के बाद बाहर निकलते अधिकांष श्रोताओं की तिक्त भाव भंगिमाओं को देखकर लगा कि इस पूरे आयोजन का निचोड़ मानो इस एक प्रष्न में सिमट कर रह गया - ‘‘नवल जी, पचहत्तर पर भी ऐसी दरिद्रता!’’
- सुमन्त

सोमवार, 14 मार्च 2011

विष कन्याओं का पतित खेल और अमरीकी साम्राज्यवाद

विश्व के सबसे ताकतवर और घृणित साम्राज्यवाद अर्थात् अमरीका के ऊपर एक बेजान और अदना-से नेट हमलावर ने जैसा सांघातिक आक्रमण किया है वह संभवतः अमरीका के लिए इतिहास का अब तक का सर्वाधिक शर्मिंदगी भरा आघात साबित हुआ है। विश्व की अनेक सरकारों, देशों, नागरिकों, शासकों और यहाँ तक कि सभ्यताओं को तहस-नहस करने की असीम नंगई प्रदर्शित करते रहने वाला अमरीकी साम्राज्यवाद आज इस अदना-से नेट हमलावर की करनी से खुद इस कदर हिल उठा है- मानो वह ब्रह्मांड में अपने पथ से भटक कर आवारा विचरण करने वाले किसी क्षुद्रतम उल्का पिंड से छू गया हो। कहने की जरुरत नहीं कि आप भलीभाँति जानते हैं कि वह अदना-सा नेट हमलावर विकीलीक्स नामक इंटरनेट सेवा का संस्थापक और आस्ट्रेलिया निवासी जूलियन असांजे है। लेकिन ये अंसाजे महोदय अब अदना-सा प्राणी नहीं रह गए हैं। वे उस संसार में जिसे सूचनाओं का महाकाश कहा जाता है, एक ऐसा भीमकाय रुप ग्रहण कर चुके हैं जिस पर आज के सर्वाधिक शक्तिशाली अमरीकी साम्राज्यवाद की सीधे हाथ डालने के नाम पर रुह काँप रही है।
लेकिन आज हम क्या देखते हैं कि नेट संसार का यह भीमकाय प्राणी अर्थात् असांजे महोदय कुछ समय पहले तक चूहे की तरह एक ऐसे जाल में फँसे नजर आ रहे थे जिसकी हमारे जैसे परंपरागत एशियाई समाज में तो कम से कम अत्यंत घिनौने रूप में पहचान होती है। वह है बलात्कार का आरोप। कहते हैं असांजे महोदय परम प्रसिद्धि हासिल करने के बाद संस्थाओं के बुलावे पर लेक्चर देने स्वीडन की यात्रा पर गए। उसी दौरान वहाँ वे दो स्वीडिश महिलाओं के साथ हम बिस्तर हुए जिसे बाद में इन महिलाओं ने इसे अपने साथ बलात्कार किए जाने का कृत्य बताकर असांजे महोदय के खिलाफ शिकायतें दर्ज करा दीं। फिर क्या था, असांजे महोदय को किसी पगलाए कुत्ते की तरह पीछा किया जाने लगा। कहते हैं, यह घिनौना जाल अमरीका की सर्वाधिक खूँखार और बदनाम जासूसी संस्था सी0आई0ए0 ने बिछाया था और असांजे महोदय को इस घिनौने आरोप के तहत गिरफ्तार करने का भयंकर दबाव भी उसी का था। काफी लुकने-छिपने के बाद अंततः असांजे महोदय के पास अपने को ब्रिटिश पुलिस के हवाले करने के सिवाय कोई चारा नहीं रहा। हालाँकि ‘सूचनाओं के महाकाश’ अर्थात् नेट की दुनिया के योद्धाओं ने असांजे महोदय के समर्थन में ऐसी भारी ब्यूह रचना की कि सी0आई0ए0 के जबर्दस्त दबाव के बावजूद उन्हें जमानत पर छोड़ना पड़ा।
यह गर्हित घटनाक्रम क्या हमें पुराने समय के हिंदी के एक सर्वाधिक पढ़े जाने वाले उपन्यासकार देवकी नंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यासों की याद ताजा नहीं करा देता है? लेकिन जरा ठहरिए! यह सवाल मैं किससे पूछ रहा हूँ? अपने समय की आज की उस पढ़ी-लिखी पीढ़ी से जिसका बहुलांश नेट की इसी असीम दुनिया की नागरिकता लेने के अंध-दौड़ में शामिल है और जिसका भारतीय साहित्य और संस्कृति से नाममात्र का रिश्ता रह गया है। वह भला देवकी नंदन खत्री के नाम और उनके उन उपन्यासों को क्यों कर जानने लगेगी जिनके पुनर्प्रकाशन का रिवाज भी जमाना पहले बंद हो चुका है? बहरहाल, मैं यहाँ आज की अत्याधुनिक दुनिया के इस गर्हित घटनाक्रम के लिए बीते जमाने के उपन्यासकार देवकी नंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यासों की याद इसलिए नहीं करा रहा हूँ कि युवा पीढ़ी उनकी ओर आकर्षित हो। यदि ऐसा होता है तो हिंदी प्रकाशकों के लिए तो कम से कम भारी मुनाफे का अवसर तो पैदा हो ही सकता है। यह तुलना मैं इसलिए कर रहा हूँ कि लोग यह देखें कि हर युग में षड्यंत्रकारी सत्ताएँ अपने राज्य-शत्रुओं से निबटने के लिए कितने घिनौने स्तर की ब्यूह रचनाएँ रच सकती हैं- यह इस विकीलीक्स प्रकरण से साफ जाहिर होता प्रतीत होता है। देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों में विष-कन्याओं की रोमांचकारी उपस्थिति ने भी उन तिलस्मी उपन्यासों की पठनीयता और लोकप्रियता में भारी इजाफा किया था। अमरीकी साम्राज्यवाद के कुख्यात सी0आई0ए0 एजेंटों के तर्ज पर खत्री रचित उपन्यासों की तरह मध्ययुगीन सम्राटों की निजी शासन-व्यवस्था में भी हम ऐय्यारों की एक पूरी सुगठित टोली पाते हैं जो राज्य शत्रुओं को तथा उनके षड्यंत्रों को नेस्तनाबूद कर देने के लिए किसी भी तौर तरीकों को अपनाने से बाज नहीं आती। उन्हीें में से एक तरीका था विष कन्याएँ पालना और उनके सांघातिक नागफाँस में फाँस कर राज्य शत्रुओं का निश्चित अंत करवाना। विष कन्याएँ परम सुंदरियाँ हुआ करती थीं और चपल-चतुर भी। वे राज्य पोषित थीं और उनकी परवरिश-प्रशिक्षण पर भारी राशि खर्च होती थी। ऐय्यारों को जब लगने लगता कि राज्य-शत्रु को घेरना अब उनके वश में नहीं रह गया है तब वे अंतिम और अचूक हथियार के रूप में विष कन्याओं को आगे बढ़ा देते थे। कहने की जरुरत नहीं कि विष कन्याएँ किन क्रियाओं द्वारा शत्रु के निश्चित नाश का खेल खेलती होंगी।
विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे के मामले में क्या हम ठीक यही चीज नहीं पाते हैं? कहते हैं कि सी0आई0ए0 के हथकंडे में एक ‘हनी ट्रैप’ भी शामिल है। जाहिर है, सी0आई0ए0 के एजेंटों का जब सीधे-सीधे अमरीकी साम्राज्यवाद के शत्रुओं पर हाथ डालना संभव नहीं हो पाता होगा तो वे आखिरी हथियार के रुप में इसी ‘हनी ट्रैप’ का सहारा लेते होंगे। जैसा कि नाम से ही आभास होता है यह ‘हनी ट्रैप’ सी0आई0ए0 द्वारा तैयार किया गया सुरा-सुंदरियों का ही वह मोहक-मारक जाल है जिसमें फँसकर शत्रु को एकबारगी ‘नंगा’ होने की शर्मिदंगी से उबर पाना कठिन हो जाता होगा। विकीलीक्स द्वारा अमरीकी साम्राज्यवाद के पापों-अपराधों का रहस्योद्घाटन किए जाने और आगे और भी अधिक किए जाने की संभावना से आज अमरीकी प्रशासन दुनिया के सामने पूरी तरह से ‘नंगा’ हो चुका है और अपनी इस नग्नता को ढकने के लिए वह जिस ‘नंगई’ पर उतर आया है उसने उसकी नग्नता की वीभत्सता में और इजाफा ही किया है। दुनिया ने अमरीकी नंगई का यह नमूना विकीलीक्स के मालिक जूलियन अंसाजे की दो स्वीडिश महिलाओं के साथ तथाकथित बलात्कार के आरोपों में गिरफ्तारी के रूप में देखा है। हम यह कतई नहीं कहेंगे कि वे दोनों महिलाएँ सी.आई.ए. द्वारा पालित-पोषित ‘विष कन्याएँ’ ही हैं लेकिन विश्व मीडिया में इस प्रकरण पर अधिकांशतः जो टिप्पणियाँ, व्याख्याएँ प्रस्तुत की गई हैं वे यही आभास देती लगती हैं कि असांजे महोदय को सी0आई0ए0 रचित ‘हनी ट्रैप’ में फँसाया गया है। यह एक तीर से दो शिकार करने की अमरीकी साम्राज्यवाद की घिनौनी चाल को प्रदर्शित करती है। एक तो यह कि दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्यवाद को ‘नंगा’ करने की धृष्टता करने वाले इस शत्रु को ऐसी जगह लाकर मारो जिससे शर्म के मारे वह अपनी गर्दन न उठा सके। दूसरा यह कि इस तथाकथित बलात्कारी शत्रु की ऐसे देश में गिरफ्तारी कराना जो अमरीका के साथ प्रत्यर्पण संधि से बँधा हो और जिसे बाद में अमरीका में घसीट कर लाया जा सके और उसका मुँह हमेशा के लिए बंद किया जा सके।
यह तो कहिए कि अमरीकी साम्राज्यवाद का यह शत्रु अर्थात् जूलियन असांजे नेट ब्रह्मांड का ऐसा महाबली निकला जिसकी असीम ताकतों को परखने में सी0आई0ए0 से भारी चूक हो गई। दरअसल, इस तरह के सांघातिक और प्रबलतम नेट प्रहार से अमरीकी साम्राज्यवाद का अपने सम्पूर्ण इतिहास में यह पहला ही सामना था जिसके आगे उसके कुख्यात सी0आई0ए0 एजेंटों के तमाम क्रूरतम और घृणास्पद फंदे रेत के ठेर साबित हो गए। असांजे महोदय के नेट योद्धाओं ने इस घिनौने और कुटिलतम ‘‘हनी ट्रैप’’ के विरुद्ध ऐसी एकजुटता प्रदर्शित की कि न सिर्फ विकीलीक्स का यह मालिक कैद से बाहर आ गया बल्कि सिर उठाकर यह कहने की स्थिति में भी कि यह बलात्कार का नहीं, आपसी सहमति से किए गए एक सामान्य कृत्य (योरोपीयन मानदंड के अनुसार) का मामला है।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। दुनिया में ऐसे लाखों लोग जिनमें हमारे देश के खाए-पिए-अघाए लोग भी शामिल हैं, अब तक तमाम अमरीकी बदमाशियों से आँख चुराए रहकर इसलिए उसके तीव्र मोहपाश में फँसे रहते हैं कि अंततः एक नई दुनिया और नई सभ्यता का अवतार यह अमरीकी धरती ही है, इस अमरीकी ‘नंगई’ के उजागर होने के बाद अपने ‘अवतार’ के बारे में अब क्या सोचेंगे? हम नहीं कह सकते कि जूलियन असांजे की तरफ से लगातार मिल रही धमकियों से महा आतंकित अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके कुख्यात सी.आई.ए. एजेंट बौखलाहट में अभी और कितने घिनौने और पतित हथकंडे अपनाएँगे। लेकिन यह तो तय है कि ‘हनी ट्रैप’ के प्रकरण ने कुछ बातें बिल्कुल साफ कर दी हैं-आईने की तरह। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, षड्यंत्रकारी सत्ताएँ चाहे वे किसी भी युग की क्यों न हों, अपने मूल चरित्र में एक समान होती हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद को चाहे जिस कारण नई दुनिया और नई सभ्यता के अवतार से अभिहित किया जाता हो, दरअसल उन मध्य युगीन सम्राटों, साम्राज्यों का ही आधुनिकतम रूप है जिनके यहाँ विष कन्याओं का निरघिन खेल खेलने से तनिक गुरेज नहीं किया जाता था। जूलियन असांजे ने लाखों अमरीकी गुप्त सूचनाएँ प्राप्त कर और उनका अल्पांश ही नेट पर जारी कर जितना नंगा किया है सी0आई0ए0 ने ‘हनी ट्रैप’ का पतित खेल रचकर अमरीकी साम्राज्यवाद की उस नग्नता की वीभत्सता के विस्तार का काम ही किया है। सैकड़ों साल के अंतराल के बाद नई दुनिया का एक आधुनिकतम ‘अवतार’ मध्य युगीन सत्ता, साम्राज्यों की नग्नता को भी मात देने में बाजी मार ले सकता है, यह बात तो देवकी नंदन खत्री के कल्पना लोक को छू तक नहीं सकी होगी।

-सुमन्त

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