गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

मुज़़फ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा - भाग-4

हमारी पाँच सदस्यीय टीम ने शरणार्थी कैम्पों का दौरा कर कैम्पों में रह रहे पुरुषों और महिलाओं से बात की
होग़ी
दौलत मदरसा कैम्प
काँधला से 4 कि0मी0 आगे ग़ी दौलत गाँव कैम्प में 800 शरणार्थी रह रहे हैं। जहाँ पर मदरसे के प्रबन्धक, स्थानीय लोग और आसपास के क्षेत्रों के लोग उनके खानेपीने और सभी ज़रूरत के सामान का प्रबन्ध कर रहे हैं। कैम्प के प्रबन्धक ने हमें बताया कि कुछ दिन पहले सरकार की ओर से जो राशन आया था वह ऐसा था कि शायद उस राशन को जानवर भी न खाएँ। शरणार्थियों ने अपने घर में वापस लौटने की बात पर कहा कि वह वापस अपने घर कैसे जाएँ जब उनके घर जला दिए गए हैं।
प्रबन्धन कमेटी : मौलाना कामिल,
सबसे पहले हमारी बात गाँव लिसा़ निवासी इकराम से हुई उसके ताऊ और ताई दोनों की काटकर हत्या की गई और बाद में उनकी लाशों को और घर को उनकी नज़रों के सामने जला दिया गया। ख़ौफ की वजह से जंगल के रास्ते इकराम अपने परिवार की महिलाओं और बच्चो समेत ग़ी दौलत मदरसे में पहुँचे।
गाँव लिसा़ के ही दूसरे व्यक्ति मो0 शमशाद ने हमें बताया कि 5 सितम्बर की पंचायत लिसा़ में आयोजित की गई थी यहीं से इस पंचायत की भीड़ को देखते हुए 7 सितम्बर नंगला मंदौड़ पंचायत का ऐलान भी किया गया। 7 तारीख़ को शाम लने के बाद व्यक्तियों से लदी एक ट्राली नगला मंदौड़ से हसनपुर पहुँची, बहुसंख्यक समुदाय के अन्य व्यक्तियों को अपने साथ लेकर उन लोगों ने हथियारों और तमन्चों के साथ अराजकता का नंगा नाच करते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों को चुनचुन कर निशाना बनाना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने नजरू जुलाहा और उसकी पत्नी का गला काटकर उनके घर में आग लगा दी। इसके बाद बहुसंख्यक समुदाय का एक लड़का बबलू अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के पास गया और उसने लोगों को जानकारी दी कि बहुसंख्यक समुदाय के लोगों की मीटिंग चल रही है और गाँव के प्रधान ने घोषणा की है कि एकएक मुसलमान को हम काट देंगे और जला देंगे। बबलू (जाट समुदाय का लड़का) ने अपनी कार से कुछ लोगों को सुरक्षित निकाला, थोड़ी ही देर में नसरुल जुलाहे के घर में दंगाई दाखिल हुए उसका तलवारोंगड़ासों से गला काटकर उसके घर में आग लगा दी। इसके बाद सुक्खन धोबी, अक्लू धोबी, नब्बू लुहार, ज़रीफ़न, सिराजुल और निकट ही यामीन की पत्नी को भी काटकर जला दिया गया और करमू और नब्बू की दो नवासियों को दंगाई उठा कर ले गए।
शमशाद ने बताया कि, 3050 की अल्पसंख्यक आबादी वाले लिसा़ गाँव में शमशाद और इकराम की जानकारी के मुताबिक उनकी नज़रों के सामने लगभग 12 पुरुषों और महिलाओं को काटा और जलाया गया। घरों से सभी सामान और पशु उनसे छीनकर उनके घरों को आग लगा दी। सिर्फ अपनी जान बचाकर लगभग 350 लोग काँधला की ओर भाग गए।इसके बाद ज़िला बाग़पत के वज़ीरपुर गाँव के नूर हसन ने हमें बताया क 8 सितम्बर 2013 को इशा की नमाज़ के समय दंगाइयों ने नमाज़ियों से भरी हुई एक मस्जिद पर अंधाधुंध फ़ायरिंग करके बड़ी संख्या में नमाज़ियों को घायल कर दिया, एक 7 साल के बच्चे समेत 4 लोगों की हत्या की गई और इसके अलावा मस्जिद में तोड़फोड़ और आगज़नी भी की गई। जब नमाज़ी अपनों की लाशों को उठा कर अपने घर ले गए तो पुलिस का भारी अम्ला उनके घरों पर गया और उनसे कहा कि इन चारों लोगों को अभी दफनाओ। लोगों ने उनका विरोध करते हुए कहा कि अभी इनके कफ़न और ग़ुस्ल का इन्तेज़ाम नहीं है और अभी किसी और को मारना है तो अभी मार दो। इस पर पुलिस ने उन लोगों को डराया, धमकाया और उनको जान से मारने तक की धमकी दी, और अर्द्धरात्री को उन चारों लाशों को एक ही कब्र में दफ़नाया गया।
-डा0 मोहम्मद आरिफ




क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (13-12-13) को "मजबूरी गाती है" (चर्चा मंच : अंक-1460) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'