शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

बाबा जी-अवधी कहानी

-घर की बात -
                                                                 हमै यह तौ पता ना हीं कि पंडित स्वामी प्रसाद मिसिर कै नाव कब से बाबा जी होइ गवा, मुला गाँव और जेंवार मा उइ आज यही नाव से जाने औ पहिचाने जात हैं। लरिका, बूढ़, जवान, मिहरिया सबै उनके खातिर यहै नाव बैपरत हैं। यह नाव लेय मा सुविधा है बड़े-बूढ़े कै नाव लेय कै रेवाज नाहीं हैं। हमैं तो लागत है ‘उपनाम’ कै यह परम्परा आजौ तक यही कारण चली आई है।
                                                        बाबा जी बड़े तजुर्बेकार जानकार और घूमे-घामे आदमी हंै। तगादे की नौकरी मा उइ पूरा अवध प्रांत मंझाय डारिन। जब उइ अपनी उगाही (वसूली) के किस्सा सुनावै लागैं तौ घण्टन मनई उनकी बातन मा अरझा रहै। उनकै संस्मरण सुनत बेरिया कुछ जने तौ आँखिन आँखी मा बाबा जी पर तानौ मारैं औ उठि के चलि देंय, मुला होसियार मनई सब कुछ बड़े ध्यान से सुना करंै, बाबा जी कै मान राखै खातिर। बाबा जी बड़े काम के आदमी हैं-कउनौ बिमारी-अजारी होय तौ दवाई बताय देयँ, टोना-टटका हुवै झारि देंय, शुभ साइत विचारि देंय, कोहू से कउनौ काम होय या सिपारिस तुरन्तै मदद करैं का तयार होइ जायँ। कवनेउ बिमरिहा का देखतै दवाई बतावै लागैं बिना पूछे। यक दईं भाई साहेब बिमार परिगें, बड़ा तेज बोखार आय गवा। पखवारा भर डाक्टर से दवाई कराइन बोखार उतरबै न करै। बाबा जी का खबरि मिली, तुरन्तै आय गें, हाल-चाल पूछिन औ कहै लाग-का कही! अब तौ कुछौ झूंठौ मूठ बिमारी होय जाय-चलौ डाक्टर के पास औ डाक्टरौ ससुर अस हैं कि बीस रुपया कै दवाई अपने लगे से दिहिन और दुइ सौ रुपया कै बाहेर से लिखि दिहिन, यक्कै दिन मा दुइ ढाई सौ लागि गे। रुपया फूंकि उठा औ फायदा तौ भगवानै जानैं। हमरी बैदकी मा अस-अस दवाई हैं कि बिना पैसा खर्च किहेन ठीक होइ जाव। मानौ तौ हमरिव दवाई दुइ दिन कइके देखि लेव, सेंत मा! पैसा यक न लागे। भैया बाबाजी का यक टक देखत रहे कुछ जने अनखियात रहे। बाबा जी थोरी देर का रुके फिर बोलै लाग-हाँ हमारि दवाई जानि लेव। गुर्च-चिरैता, पाढ़ी बोखार कै जारै दाढ़ी। बगलै जंगल मा तीनौ चीजै मिलि जइहैं। तीन दिन लगातार काढ़ा बनाय के बासी मुहें पियौ। हड्डी के बोखार सार भागि जाये। अतना कहिके बाबा जी उठे, बिना पूछे पछोरे जंगल ओरिया लपकें औ घण्टा भर बाद तीनौ औषधि लइके लौटे। भइया का समझायिन-अइसा किहेउ-सेर भरे पानी मा तीनौ चीजै डारि के उबालेउ, जब पौवा भर पानी रहि जाये बस वही का दाँत दबाय के पी जायो। सुवाद तौ जरुर खराब लागे मुला तीनिन दिन के पिये से बोखार भागि न जाय तौ हमरे भये चमारिन नाहीं आई। भइया का काढ़ा पर बिसुवास रहा, अंगरेजी दवाई से ऊबि गये रहैं। गुर्च चिरैता पाढ़ी कै काढ़ा बनवाय-बनवाय तीन दिन तक पीन, साँचै चैथे दिन बोखार गायब, तबियत चकाचक। बाबा जी सबेरे आये हाल-चाल पूछिन उनकै नुस्खा कामयाब रहा।, सोलह आना बाबा जी के चेहरे पर विजयी मुस्कान फैलिगै।
                                  बाबा पक्के सरवरिया बाभन, स्वपाकी। बाहर कोहू के हाथ कै बनावा भोजन नाहीं खात। जाड़ा, गरमी, बरसात-बारहौ मास कपड़ा उतारि के खात हैं। पूड़ी बनावै मा तौ उइ बहुतै माहिर हैं। उनके पास सात-आठ मनइन कै जफड़ी है। गाँव या जेंवार मा कोहू के घर बरमभोज, मूड़न, बियाह या तेरहीं-बरखी कुछौ परै सबै जन बाबा जी से सलाह लेत हैं और उनहिन से भोजन बनुवावत हैं। बाबा जी का बस अतना बतावै क परत है कि कतने मनई का नेउते हौ। बस उइ बाकी हिसाब बतावै लागत हैं-दुइ मने कै सैकड़ा गरमी के दिन मा औ तीन मने कै सैकड़ा जाड़े मा लागत है (सौ आदमी पर दुइ मन औ तीन मन) पाँच मन मैदा के उप्पर कुन्तल भर तरकारी लागे। चालीस सेर घोटी शक्कर। साठ सेर आलू औ चालीस सेर कदुवा। अगर कदुवा हरेर होय तौ पचास किलो लागे। वह जादा गलत है। पाक कदुवा जादा सैरियात है। अतना तौ तुमका हम बताइत है आगे जौन तुम्हार औकात होय गलका, चटनी, माठा, रसेदार सब्जी। मुला यक बात जानि लेव। हमरे साथी जौन आदमी पूड़ी सब्जी मनावै अइहैं, उनकी खातिर मा कौनउ कोताही न होय क चही। घण्टा-घण्टा भरे के बाद कराहे (कड़ाही) पर सरबत पानी जरुर मिलै और साथेन पान-सुपारी-कत्था, पान-पुकार। आदमी सूधे चहै टेढ़े बाबा जी कै हिदायत मानै। बाबा जी कै एक खासयित और रही उनकी करहिया (रसोइया) मा गाँव जेंवार के सबै लोग खाय लेत रहैं, नाहीं तौ तीन-चार करहिया चढ़ै, कहावत है- आठ कनवजिया नौ चूल्हा। यक फायदा और रहा, बाबा जी यक टीन डालडा मा पूरा पाँच मन मैदा कै पूड़ी निकारत रहे, यह कमाल उनहिन मा रहा। यही गुन खातिर उनकै जेंवार मा धाक रही। जेंवार मा उइ करहियादार की हैसियत से जाने जात रहे।
                                          बाबा जी के सबसे पक्के वफादार शार्गिद रहे घाघरपारी तेवारी। तेवारी जी अपनी ससुरारी मा रहत रहे। गोण्डा जिले के रहवइया घाघरा नदी के पार होय के नाते उनका घाघरा पारी कहा जाय। गाँव जेंवार मा उइ यही नाव से जाने जात रहे। गाँवन मा नामकरण बहुतै सटीक होत है, सीधे विशेषण से जोड़ दीन जात है। छोटी बहू का छोटका, बड़ी का बड़का, मझली का मँझिकला। यही मेर स्थान कै विसेषण दीन जात है, घाघरा पार से घाघर पारी, जमुना पार से जमुना पारी, गंगा से गंगापारी, बांस के बंसवारी, महुवा से महुवारी आदि-आदि। बाबा जी औ घाघरपारी मा खुब पटै। कुछ दिन तक दुइनौ जने तगादे मा साथे रहें। बाबा जी कहौं जायँ घाघरपारी परछाहीं की तिना बाबा जी के पीछे-पीछे रहैं। बाबा जी जब कबौ बेमार परि जायँ या कउनौ जरुरी काम परि जाय तौ पूड़ी बनावै मा बाबा जी की जफड़ी कै अगुवाई घाघरा पारी करैं, पूरी मुस्तैदी के साथ। उइ बाबा जी के सेनापति बनि गये रहें। बाबा जी कउनौ हुकुम देयँ घाघरपारी बिना देर किहे वहिका पूरा करैं। घाघरपारी बाबा जी का कउनौ सलाह मसबिरा देंय बाबा जी तुरन्त वहि पर अमल करैं। दूनौ जने कै दोस्ती दाँत काटी रही।
                                                           यक कहावत है, ‘‘बहुत मिठाई मा किरवा परत है’’। ई कहावत बाबा जी औ घाघरपारी की मिताई पर लागू होइगै। गाँव मा यक अस घटना घटिगै जउनी वजह से बाबा जी और घाघरपारी यक दूसरे कै जरि उखारै लाग। सुरुवात घाघरपारी से भै, बाबा जी इहमा तनिकौ दोषी नाहीं रहे। गाँव मा यक विधवा पँड़ाइन रही। उनकी बिटिया कै बिटिया साथेन रहत रही। घर मा पँड़ाइन औ वहै लौडिया सोलह साल की। पड़ाइन के घर मा कउनेउ समय मा ठेलुहन कै दरबार लागत रहा। पांडे परदेस मा रहे, पँड़ाइन के हियाँ पर कइयउ बेउहारी रहैं। नानी के खून कै असर कुछ न कुछ लौंडियौ पर भवा। बहिक गय। नवधा लौंडा आगे-पीछे पछुवाये रहैं, जइसे कातिक मा एक कुकुरिया के पाछे दर्जन भर कूकुर बौरान फिरत हैं। जब वह आम की बगिया मा जाय दसन लौंडा वहिके आगे-पीछे लागि रहैं, वह सबका चारा डारै लाग। तमामन छैला वहिका चोरी छिपे लाली, पाउडर, लिपिस्टिक, चोली, क्रीम, सेन्ट, इतर जइसन उपहार दियै लाग, कुछ मिठाई कै डेब्बा दियैं तो कुछ रुपया पैसा। लौंडिया बहिक गै। बगिया मा रास रचावै लाग। कबौ-कबौ खेलावन मिसिर के खंडहर मा या फिर कबौ डेउहार बाबा के डीहा पर अपने रसिकन से मिलै लाग। गाँव भर जानिगा मुला पँडाइन माल काटत रहीं या तौ उनका खबर नाहीं या फिर लालच मा बोलत नाहीं रहीं। लौंडिया का पूरी छूट दिहे रहीं। लौंडिया पूरी बज्जाद, पक्की छिनार और जालिम होइ गय। रोजै दुइ चार जने का चरका देय लाग। गाँव मा मुँहामुही होय लाग, मुला को कोहिका कहै, मुहल्ला भरे के लौंडा वहिमा फँसे।
                                              यक दिन लौंडिया रात मा पँड़ाइन कै जेवर-गहना, रुपया-पैसा लइके उड़न छू होइगै। होत सवेरे पँड़ाइन बंबाय लागीं-लौंडिया हमका चापर कइके भागिगै, नाक कटाय लिहिस, गाँव मा, कौन मुँह देखाई यहै कहि-कहि अपने चैतरा पर बैठि बुंबुवायं लागीं। सगरा टोला-मोहल्ला और गाँव यकट्ठा होइ गवा। मामला घाघरापारी के परोस कै रहा। सबसे ज्यादा चिंतित वई रहें। कुछौ होय घाघरा पारी बहुत नीक मनई रहे, पेटे मा कउनौ मइल नाहीं, सबके कामे कारज मा हाथ बटावैं। सबसे हंसिके मिलै और ईमान धरम के पक्के। न कोहू से दोस्ती न कोहू से बैर। यह किस्सा सुनतै बड़े असमंजस मा परि गये, मामला जोड़ी जनेऊ कै रहा। गाँव भरे की इज्जति कै सवाल। जगह-जगह कमेटी लागि रहै गाँव भर मा। मेहररुवै फुसफुसाय लागीं। संता बुवा हथली दै-दै ई घर ऊ घर जाय के बतावै लागीं-हमतौ जनतै रहिन पक्की हरजाई, सत्तर भतार राखे रही, वहिके चैबिसो घंटा आगि बरत रही, चली गईं बुजरौ, गाँव पाख भवा, नाहीं तौ दुइ-यक कतल होइ जाती।
                                         संझा बेरिया घाघरपारी के बंगला मा बैठक रही। दस-पाँच पुरनिया और कुछ नये जन। सलाह मसबिरा भवा कोऊ तौ ई लौंडिया का भगाइस, पक्का भेदिहा रहा। बभनन कै नाक कटिगै। आखिर मा तय भवा कि पता लगावा जाय औ जेहिकै इहमा हाथ होय वहिकै लोटिया बंद, बिरादरी से बहिष्कार। धीरे-धीरे घाघरपारी के खुफिया अपने-अपने ढंग से पता लगावै लाग। तिसरे दिन रात मा 9 बजे यक गुप्तचर आयके बताइस अब का कही? घाघरपारी। इहमा सब हाथ तुम्हरे गुरु बाबा जी के भतीजे इंदर कै है। वह लौंडिया घास तौ तमामन लौंडन का डारत रही मुला इंदरवा वहिकै सबसे पुरान बेउहारी आय। लौंडिया ससुरी वहिके साथे साइकिल के डंडा पर बैठिके नौटंकी, रामलीला औ सनीमा देखइ जात रही। रसगुल्ला काटत रही, फूहर बात का बताई, इंदरवा अस्पताल मा लै जाय के यक दई वहिकै पेटौ गिरवाइस। इंदरवा का यह पता रहा कि लौंडिया कइयउ जने का पटाये है मुला वहिका तौ आपन काम निकारै का रहा। पेट गिरवाये के बाद इंदरवा दुइ पाकिट कंडूम लाय के दिहिस औ ताकीद किहिस अब ई के बिना काम न करायौ। ई सब बातैं हमैं सबका मालुम रही मुला का जानत रहिन ई नककटवल होइ जाये। अरे! अब तौ ई गाँव जउने कै झंडा बभनइया खातिर चैहद्दी मा फहरात रहा.... सब माटी मा मिलि गवा। हमरे गाँव से कुलीन बाभन पूरी जेंवार मा नाहीं, मुला अब कौन मुह देखावा जाये।
                        घाघरा पारी यक बार तौ चैंके, मुला तुरन्तै उनकै पारा चढि़ गवा और बोले-बस काल्हि सबेरेन से बाबा जी कै लोटिया पानी बंद, कथा कै बलौवा बंद, जे उनका नेवता देय वहिका गाँव भर छोड़ देय। यह पंचाइत रात 12 बजे बंद भै। सबेरे-सबेरे गाँव भरे मा लौंडिया के भगावै औ बाबा जी कै लोटिया बंद होय कै खबर फैलिगै। मुँहा-मुँही होय लाग। बेचारे बाबा जी का सफाई देयक मौका तक न मिला। बाबा जी कै लोटिया बंद। पुलिस केस भवा। पुलिस आई। बाबा जी जे कबौ अपने आगे कोहू क कुछ समझिन नाहीं आज घर मा मुँह लपेटे परे हैं। कोहू से न बात करैं न कोऊ उनके घर आवै। सगरा गाँव उनकै दुवार बराय दिहिस। सबेरे होय या संझा अंधेरे मा दिशा मैदान होइ आवैं। अपने घरहिन मा नजर बंद होइ गये। बाबा जी कै हालत तौ यहै रही-का देखाय बिधि काह देखावा। इधर घाघरपारी मोंछे फर्राये, सीना फुलाये दिन भर अइसी, वइसी, इहसे-वहिसे, याकै रागिनी छाँड़े रहंै-‘देखेउ। बाबा जी का, दिन भर दुसरे का परबचन सुनावत रहें, अपना गड़हा मा फाटि परें। अब भोगैं अपने करमन कै फल।
                                           बाबा जी के ई खराब दिनन मा सुमिरन पांडे बड़ी ईमानदारी से बाबा जी कै साथ दिहिन। बाबा जी कै साथ दियै के नाते सुमिरन पांडे़व कै लोटिया बंद होइ गय। अब यह हालत होइगै कि बाबा जी गाँव मा अकेल परि गयें, न उनसे कोऊ पैलगी करै, न दुवारे जाय। बाबा जी सबसे मिलै खातिर दुवारे-दुवारे जायँ, मुला मनई उनसे कतराय जाय। उनका देखतै रास्ता बदलि देय। बाबाजी के कौनौ गलती नाहीं मुला ‘कउवा कान लै गा’ वाली कहावत लागू होइगै। गतानुगतिकोलोक: कउनौ बात फैली मनई बिसुवास कइ लिहिस, सच्चाई जानै कै कोसिस नाहीं करत और जब सच्चाई सामने आवत है तौ पछितात है। यहै लोकरीति आय।
                                                बाबा जी बेचारे हलाकान। जिन्दगी भर अपने आचरन से जउन पूँजी बनाये रहैं, भरभराय के गिरिगै। बड़ी मुसीबत झेलिन, गरीबी देखिन, परिवार कै बोझा जिम्मेदारी से उठाइन, बड़ी-बड़ी बहिया खेइ लिहिन मुला ईमान-धरम नाहीं छोडि़न। बाबा जी कै सतसंग अकसर हमहू करत रहिन, उनका छल, कपट, परपंच, इरषा, कबौ नाहीं देखा, बस यक्कै कमी उनमा रही-गुस्सात जल्दी रहैं। यक दिन धरम-करम पर बाबा जी से सतसंग होत रहा। बाबाजी कहै लाग-देस और समाज कतना बदलि गवा, न कोऊ कोहू कै लिहाज करत है, न आदर करत है, यक दुसरे का पावैं तौ खाय लियैं। मनई धन संपदा के पीछे अँधराय गवा है। जा-बेजा कउनौ बिचार नाहीं, बस तिजोरी भरै के होड़ लागि है। अरे ई देहीं कै कौन भरोसा। सामान सौ बरस कै पल कै खबर नाहीं। आज मरौ काल्हि दूसर दिन मुला काव कही। कबीर कै वह बानी याद आवत है-केहि समझावाँ सब जग अंधा। कबीर जउनी-जउनी बातै कहि गये हैं वहि पर  ध्यान धरौ तौ हियैं सरग मिलि जाई, जीते जी। कबीर कै यक निरगुन सुनौ बीच बजरिया षट मल काटै, कैसे निकारुँ चोला से। अब इहकै मतलब सुनौ। ‘बीच बजरिया’ यह दुनिया आय। ई दुनिया म आये पर जउन चोला (शरीर) मिला है, इहका छः खटकिरवा काटि रहे है और उइ खटकिरवा निकारे नाहीं निकरत।
                                               ई खटकिरवा का कबीर  षटमल कहिन। षट माने छः मल माने गन्दगी। अब ई छः गन्दगी कउन कउन अहीं उनहू का सुनि लेव-काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मत्सर। कबीरै काहे तुलसी बाबौ तौ इन पर बहुत कुछ लिखिन काम, क्रोध, अरु लोभ सब नाथ नरक के पंथ और तुलसी बाबा क्रोध क तौ पाप कै जरि बताइन-क्रोध पाप कर मूल। हमरे हँसी आयगै, बाबा जी चैकि परें-भइया हँसेउ काहे? हम कहा बाबा जी तुम मा अउर सब नीकै नीक है मुला क्रोध तौ तुम्हरे रोंवा-रोवां म भरा परा है। परसुराम बाबा की तिना।
    बाबा जी मुसकियान, कहिन हाँ। बात तौ तुम सही कहत हौ। मुला यक बात यहौ जानि लेव! कुरोध (क्रोध) बभने कै सोभा आय।
    बभने कै सोभा आय? इहकै मतलब अउर सबके खातिर पाप, बभनन खातिर सोभा।
                              बाबा जी असमंजस मा परिगे। सफाई दिहिन। कहिन देखौ! बाभन सगरे समाज के बारे म सोचत रहा, जौ समाज मा कोऊ गलत काम करत रहा तौ वहिकी गलती पर बाभन  कुरोध करत रहा। बाबा जी कै तर्क हमरे गटई नाहीं उतरा मुला उनकै बात ऊँची राखै खातिर उनकी हाँ मा हाँ मिलाय लीन।
                                         बाबा जी कै कुरोध उनकै सोभा जरुर रहा मुला यह नई मुसीबत आये पै उनके सोभा न जानी कहाँ चली गै। अब रात-दिन अपनी चैपारी मा परे रहंै! न उनके लगे कोऊ जाय औ न उइ कोहू के लगे जायँ। मनई, लरिका, बच्चा, बहुरिया उनसे बोलइकै हिम्मति न करैं। बाबा जी बिना कौनेउ गुनाह के सजा काटि रहे, अपमान सहि रहे। अपनी जिन्दगी मा बड़ी मुसीबत झेलिन, जवानी म मेहरारु मरिगै सगा छोट भाय मरि गवा, पचीस-तीस मनइन के परिवार कै खर्चा अधम मुला बाबा परिवार कै गाड़ी अपने बल भर नीकै नीक चलाइन, पटेइत  सूधे बैठै न देय मुला, बाबा जी बड़े धीरज से सब कुछ सहिन। अब बेटवा कमाय लाग तौ तंगी दूर होइ गइ। दिन के तीन पन होत हैं अब बाबा जी के दिन सुधर होइ गये सब दुख दलिदुर दूरि होइ गा मुला बिना बलाये आई यह आफत उनकै अकिल बुद्धि सब हरि लिहिस। गाँव-जेवार, रिश्तेदारी-नातेदारी, टोला-परोस कोहू के ऊपर कउनौ मुसीबत आवै बाबा जी वहिकै समाधान कइ दियत रहे मुला आज उनके ऊपर जब मुसीबत आई तौ सब किनारा, कसि लिहिन मदद क को कहै सब ठिल्लै लेय। गरीबी अमीरी तौ चला करत है मुला अकारन यह अपमान उनके सहै के बाहेर रहा-‘‘सबसे कठिन जाति अपमाना’’ लोटिया बंद होइगै, यहै सोचि-सोचि बाबा जी महीना भरे मा झुराय के काँटा होइ गये। घाघरपारी मोछ फर्राये चारिउ कइती जेंवार म बस बाबा जी के पाछे परे रहैं। जे कोऊ बाबा जी कै नेउता गाँव जेंवार म दैं दियै घाघरपारी वहिकै लोटिया बंद करावै खातिर एड़ी चोटी कै जोर लगाय दियैं बाबा जी बेचारे का करैं। पेटे मा मसूमा दै-दैके रहि जायँ। उहि साइत घाघरपारी कै रुतबा अतना जोर रहै कि उनकी मर्जी के खिलाफ कोऊ बाबा जी से दुवौ सलाम नाहीं कइ सकत रहा। हमहूँ महीना-डेढ़ महीना न गइन। यक दिन संझा बेरिया पहुँचि गइन पैलगी कीन। भला आज अतने दिन पर आयेव तौ? कुछौ खाय-पियै क तौ पूछि नाहीं सकित, हमतौ फंसेन हन! तुम काहे छीछालेदार म फंसौ? तुम्हार तौ पटेइतै अहीं घाघरपारी। तुरन्तै तुम्हारौं लोटिया बंद कइ दीहैं। बाबा जी की भलमनसाहत औ निरछल सुभाव देखिकै हमैं बड़ा तरास आवा। आतिमा से आवाज आई। जब बाबा जी कै कउनौ दोष नाहीं तौ उनके साथ दिहें कौनउ बुराई नाहीं। आज नाहीं तौ काल्हि सब सामने आय जाये। पानी कै पानी, दूध कै दूध, अलग होइ जाये। बाबा जी अतना हिरासे परिगे कि कोहू कै आव भगत करै कै हिम्मति न रहिगै। यक लोटिया पानी नाहीं पियाय सकत। कउन अपराध किहिन? बिना अपराध के उनका डंड काहे दीन गवा? मन मा ‘यक विचार आवा, कुछो होय बाबा जी कै मदद करब। गाँव जेंवार से मुहड़ा लेब। यक दिन तौ सच्चाई सामने अउबै करे।’
                               जब हम बाबा जी के घरै गयेन तौ घाघरपारी के जासूस अगल-बगल लाग रहें, कान पारे हमार औ बाबा जी कै बात सुनते रहें, लखन, सुकुल, बड़े तेवारी, सोभा मिसिर, राम सहाय पांडे तिलोकी औ कइव जने ताड़त रहैं। ई सब न हमहिन जाना न बाबा जी! हमार औ बाबा जी कै बात-चीत चलत रही। जउन बाबा जी पहुँचतै खन कउनौ न कउनौ धार्मिक प्रसंग या कथा सुनावै लागत रहैं, अब उनकै बोलती बंद रहै। उनकी दसा-दुरदसा देखि के हमैं बड़ा दुख भवा। बाबा जी से कहा-हम तुम्हरे साथे हन। जस चहौ मदद करबै, हमैं कोहू के डेर नाहीं। जउन होये देखा जाये, कर नाहीं तौ डेर नाहीं। यह सुनतै बाबा जी कै रौंछा हरियाय उठा, अँसुवाय के बोले! भइया ई साइत हमैं भगवान के अलावा कोहू पर भरोसा नाहीं रहिगा। पता नाहीं कतने जनेन के बुरे समय मा उनके मदद कीन मुला सब अकारथ होइगा। मदद करब तौ दूर कोउ मुँह से बोलइया नाहीं। हम कहा बाबाजी सब समय कै फेर होत हैं। धीरज धरौ, भगवान पर भरोसा राखौ, उनके घर मन्दिर मा देर है अंधेर नाहीं। बाबा का ढाँढस बँधावा। हमरी बातन से उनकै मनोबल बढ़ा। हम कहा बाबा जी आज अतने दिन पर आइन है चाय वाय न मिले का? बाबा जी हमरी कइती घूरै लाग। समझिन मजाक करत हैं, बड़े दीन भाव से बोले-भइया तुमहूँ जरे म लोन लगावत हौ, हम कहा-बाबा जी समझा नाहीं। बाबाजी कहिन सगरा गाँव दुवा-पैलगी औ बोल-चाल बंद कह दिहिस। चाय पानी तौ बड़ी दूर कै बात। बाबाजी कै लाचारगी समझि गइन। कहा-बाबा जी, झूठ नाहीं कहित। आज हम चाय पानी कइके बतावा चाहित है कि तुम्हारे साथे तन-मन-धन से खड़े हन। बाबा जी का सब बिसुवास होइगा तौ दौरि के घर मा गये और चाय बनावैं कै हुकुम दै आये। उनके घर के लरिका-मिहरिया आँखी फारि-फारि हमका देखै लाग। उनका तौ सपनेउ मा उम्मीद न रही कि हम ई तिना उनकै साथ दियब। चाय आई, पिया। बाबा जी कै पाँव छुइ के आसिरबंद लीन। चलै कै इजाजत माँगा। बाबा जी की आँखी से भरभराय के आँस बहै लाग। हमका छाती से लगाय लिहिन, हमहूँ अँसुवाय आइन। बाबाजी अपनी सच्ची आतमा से आसिरबाद दिहिन। हमै लागत है उनकै वह आसिरबाद आजौ हमरे साथे है।’’
                                                बाबा जी कै हमार सतसंग घाघरपारी के जासूस सुनत रहैं सब हाल-चाल तुरंतै जाय के घाघरपारी से बताइन, नोन-मिरचा लगाय के। घाघरपारी आग-बबूला होइगै। रातिन क लाठी उठाय के हमसे मिलै खातिर, उठि परे, मुला उनके सलाहकार रोंकि दिहिन। रात मा न जाव। का सबेर न होये? सबेरे खबर लिहौ अपने पटेइत कै। रात भर घाघरपारी के मन मा उथल-पुथल मची रहै। होत सबेरे दुवारे पहुँचि के ललकारिन-तुमहिन यक बड़े मर्द हौ। अतनी बड़ी जेवार औ गाँव मा। काल्हि के लौंडा। अब पता लगो सब तुम्हरेन मूड़े पर बिसाई। आज से तुम्हार लोटिया बंद। चलौ भोगौ। पियौ जाय चाह बाबा जी कै हियाँ, देखित है को सार तुम्हार मदद करे।’’ हमतौ जनतै रहिन कुछौ नाहीं बोलेन-अतनै कहा-‘जाव तुम्हार मन जउन कहिस वह तुम किहेउ, हमार मन जौन किहिस वह हम कीन। न तुम्हरे घर हम खाइत है न तुम हमरे घर।
                                 गोड़ पटकत घाघरपारी चले गें। बिना कुल्ला दतुइन किहे दिन भर गाँव भरे मा घूमे वहि दिन संझा बेरिया नहाइन धोइन और खाइन। दिन भर घूमि-घूमि गाँव भरे का रात वाली बात बताइन।
                                             यह पहिल मौका रहै कि बाबा जी के मामले मा कोऊ घाघरपारी से पंगा लिहिस। दूसरे दिन यक घटना घटी। हमार बछिया मरिगै। घाघरपारी का मौका मिलिगा। देखेउ मास्टरऊ अपने करमन कै फल भोगैं। अउर पियैं बाबा के घर मा चाह। अबै का! अबै इनकै अउर अनभल होये। बछिया मरै वाली बात गाँव-जेवार मा फैलिगै। टोला-परोस वाले हमहू से कतराय लाग। घरैतिन यक दिन कहिन-गाँव भर कहत है कि मास्टर अगुवाय के पाप के भागीदारी बनिगे। वही कै फल आय बछिया मरिगै। ई संजोग घाघरपारी कै मनोबल बढ़ाइस। हमहू मन मा सोचा ‘‘हवन किहे हाथ जरत है’’। बाबा जी के साथ दइके कउनौ गुनाह तौ कीन नाहीं। मन का धीरज दीन-होइहैं सोइ जो राम रचि राखा।’’ आपन मन पोढ़ कीन-जउन होये देखा जाये। भगवान तौ सच्चाई के साथ दियत हैं। ,
                                                  धीरे-धीरे दिन बीतत गये, घाघरपारी ढिलाय लगा, उनकै हेकड़ी सबका अखरै लाग। बाबा जी जिन्दगी मा कौनौ गलत काम नाहीं किहिन रहै, यह सबै जानत रहा, मुला वहै भवा, कौवा कान लैगा। आपन कान कोऊ नाहीं टोइस। सब बाबा जी के पीछे परिगे मुला अब बहुत जने पछिताय लाग। यही बीच यक दिन बड़ी खबर आई। लौंडिया जेहिके कारन अतना बवाल मचा वह खपरहिया गाँव मा रमेसर उपाध्याय के हियाँ है, उनकै पतोह बनिके, औ वहिका नगेसर दुबे बारह हजार रुपइया लइके बेचिन रहै। यह खबर पूरे गाँव जेंवार मा आगि की तिना फैलिगै। कुछ जन खपरहिया पहुँचि कै लौंडिया के बारे मा सब जानकारी लइ आयें। कुछ खास मनई तौ वहि से बातौ कइ आयें। जब पक्का पोढ़ होइगा कि नगेसर दुबे वहिका बेंचिन है तो यह सुनिकै घाघरपारी के फाड़ ढील होइगा। कुछ ठेलुहा दुवारे पहुँचि के मजा लियै लाग। अब घाघरपारी कै बोलती बंद, उनके लगुवा-भगुवा और जासूस दुइचार दिन खातिर गाँव छोडि़ दिहिन। घाघरपारी दुइ दिन उपासे रहें। जब सच्चाई जानिन तौ मुंह लपेटि के घर मा परि रहें। जउन हाल बाबा जी कै रहा वहै   अब उनकै होइगा, गाँव जेवार गरियावै लाग, बेचारे करैं का पानी कै हगा उतराय गा। घाघरपारी कै खाना-पानी जइसे छूटि गवा, मुँह मा करिखा लागि गवा। घाघरपारी रहे पानीदार मनई-चोरी चमारी अउ कउनौ कुकरम कबौ नाहीं किहिन, सदाचारी रहे मुला मुँह के फोंकहर होय के नाते अकसर मात खाय जात रहें। उनकै यह हाल होइगा जउन कबौ बाबा जी कै होइगा रहै। झुराय के  नाधा होइगें। यक दिन सन्निपात पकरि लिहिस बहुत दवाई-दरमत भै मुला बचि न पायें, कुकरे कै मौत मरिगे। अइसी बाबाजी जब सब किस्सा सुनिन तौ हाथ जोरि के आसमान कइती ताकिन औ बुंबकार छांड़ के रोय परे-भगवान तुम्हरे घर मा देर है अंधेर नाहीं।
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राम बहादुर मिश्र
सम्पादक-अवध-ज्योति

मो0-09450063632

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