सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

गौवध और संघ

एक समय था जब गुजरात का सबसे बड़ा जिला कच्छ सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता था। गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम के दौरान भी कच्छ जिले में शांति बनी रही थी। सांप्रदायिक तत्व केवल जिले के अंजर कस्बे में एक छोटा-सा फसाद करा पाए थे। जिले के हाजीपुर और गांधीधाम में दोनों समुदायों के बीच मामूली झड़पें हुई थीं। इनके अलावा, जिले मेंशांति और सद्भाव बना रहा था। जाहिर है कि संघ परिवार को यह अच्छा नहीं लगा। इसलिए सन् 2002 के बाद से उसने कच्छ का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की रणनीति बनाई और उस पर अमल किया। इनमें से एक रणनीति, जिसकी हम इस लेख में चर्चा करेंगे, वह थी अखबारों में लगातार इस आषय की खबरें छपवाना कि मुसलमान, बड़े पैमाने पर गौवध कर रहे हैं।
उदाहरणार्थ, ‘‘वल्र्ड हिन्दू न्यूज पोर्टल’’ में प्रकाशित एक खबर कहती है, ‘‘गौरक्षकों ने कल गुजरात के कच्छ से लगे हुए पाटन जिले से 13,000 गायों को पकड़ा है। इन गायों को राजस्थान के सिरोही जिले से लाया गया था और उन्हें कच्छ जिले में इस बहाने से ले जाया जा रहा था कि उन्हें वहां चराया जाएगा। ये जानवर कच्छ से कभी नहीं लौटते। गौरक्षकों के एक दल द्वारा किए गए आपरेशन से यह पता चला कि इन पशुओं को काटने के लिए पाकिस्तान ले जाया जा रहा था। इनमें से 80 प्रतिशत नंदी बैल थे और 20 प्रतिशत गायें थीं। इन गायों के मालिक मुस्लिम कारोबारी हैं और वे उन्हें समुद्री रास्ते से भी पाकिस्तान ले जाते हैं’’ (डब्ल्यू.एच.एन रिपोर्टर 2013)। ‘कच्छ मित्र’ और कई अन्य दैनिकों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा। और ऐसी ही खबरें नियमित रूप से वहां के अखबारों में छपती रहती हैं।
जिस तरह कच्छ में  गौवध के मुद्दे का भावनाएं भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है उसी तर्ज पर कुछ समय पहले तक, आतंकवाद के मुद्दे का गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे भारत में इस्तेमाल किया जाता था। गुजरात के अखबारों और यहां तक कि राष्ट्रीय मीडिया में नियमित रूप से खबरें प्रकाशित होती थीं कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादी, नरेन्द्र मोदी की हत्या करने के इरादे से गुजरात में घुसे थे परंतु मोदी के सुशासन में कार्यरत गुजरात पुलिस के कार्यकुशल और साहसी कर्मियों ने उन्हें पहले ही ढूंढ निकाला और वे सब मुठभेड़ में मारे गए। उनके फोटो व वीडियो खींच लिए जाते थे और यह खबर बड़े-बड़े राष्ट्रीय अखबारों मंे सुर्खियों में छपा करती थी। राष्ट्रीय मीडिया, जो कि खबरें इकट्ठा करने के लिए करोड़ों रूपए खर्च करता है, बिना सोचे-विचारे इन काल्पनिक कथाओं को निगल लेता था कि हिन्दू हृदय सम्राट मोदी, दुष्ट और कुटिल मुसलमानों के निषाने पर हैं।प्रॆस काउंसिल आॅफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने यह कहा है कि अधिकांश मीडियाकर्मियों का आईक्यू, औसत से कम होता है। ऐसी ही एक मुठभेड़ में मारे गए सोहराबुद्दीन के भाई ने सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी और पूरे मामले की कलई खुल गई। जैसे ही सोहराबुद्दीन, तुलसीराम प्रजापति और इशरत जहां मुठभेड़ मामले में कुछ पुलिस अधिकारी सींखचों के पीछे गए, ‘मुठभेड़ें’ तुरंत बन हो गईं। नियमित रूप से मुस्लिम युवाओं को मारकर, उन्हें आतंकवादी घोषित कर दिए जाने का सिलसिला एकदम रूक गया। इन फर्जी मुठभेड़ों के जरिए मोदी के प्रचार मैनेजर उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे जो कि ‘आतंकवादियों’ से कड़ाई से निपटता है।
मोदी की ‘‘आतंकवादियों से कड़ाई से निपटने वाले नेता’’ की छवि बनाने का सिलसिला रूक गया। परंतु बिना पड़ताल के खबरें छापने वाले अखबारों और अपने राजनैतिक आकाओं के हर गलत-सही हुक्म को सिर आंखों पर लेने वाले पुलिसकर्मियों के चलते, ऐसे मुद्दों की कमी नहीं है जिनका इस्तेमाल मुसलमानों को दानव के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जा सकता है। अब आम लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काने के लिए ‘‘गायों को बूचड़खाने ले जा रहे मुसलमानों को पकड़ा गया’’-ऐसी खबरें लगातार मीडिया में आ रही हैं।
रफीक रमजा व हाशिम हुसैन का मामला मौखा गांव के सरपंच के अनुरोध पर रफीक और हाशिम मौखा पहुुंचे और उन्होंने अपने टैम्पो और जीप में क्रमस: 11 व 9 मवेसियों को लादा। ये जानवर आवारा थे और ग्रामवासियों की फसलों को नुकसान पहुंचाते थे। उन्हें अंजर के निकट एक पंजरापोल (ऐसा परोपकारी संगठन जो बूढ़े मवेशियों की देखभाल करता है) में छोड़ा जाना था। उन्हें सरपंच द्वारा एक पत्र दिया गया जिसमें यह कहा गया था कि इन मवेशियों को पंजरापोल में छोड़े जाने के लिए अंजर ले जाया जा रहा है। सरपंच के पत्र की प्रति हमारे पास उपलब्ध है। सरपंच ने करसन सुमर नाम के दलित चरवाहे को भी रफीक और हाशिम के साथ भेजा।
हाषिम और रफीक की गाडि़यों को लगभग साढ़े सात बजे षाम को वावरपाटिया में बजरंग दल के 15 कार्यकर्ताओं ने रोक लिया। वे सड़क को रोककर बैठे हुए थे क्योंकि उन्हें मौखा गांव से किसी ने यह सूचना दे दी थी कि वहां से मवेशियों को अंजर ले जाया जा रहा है। उन्होंने रफीक और हाशिम को उनकी गाडि़यों से खींचकर बाहर निकाला और यह कहते हुए कि वे मवेशियों को काटने के लिए ले जा रहे हैं, लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। जल्दी ही 40-50 और लोग भी वहां इकशिट्ठा हो गए। उनमें से कुछ के पास वीडियो कैमरे थे। उन्होंने रफीक और हाशिम पर यह दबाव डाला कि वे यह स्वीकार करें कि वे मवेशियों को 10,000 रूपए में एक बूचड़खाने में बेचने के लिए ले जा रहे थे। दोनों  ने भीड़ को सरपंच का पत्र भी दिखाया परंतु उनकी किसी ने नहीं सुनी। हाशिम और रफीक की पिटाई लगाने के पहले उन्हें नंगा कर दिया गया। भीड़ में कुछ लोगों के पास पेट्रोल भी था जिसे वे रफीक और हाशिम के घावों पर छिड़क रहे थे जिससे उन्हें और जलन हो। उनके पूरे शरीर, विशेषकर उनके कानों के पास व पेट में, गंभीर चोंटे पहुंची। उनकी गाडि़यों के कांच फोड़ दिए गए और बोनट को लाठियां बरसाकर नुकसान पहुंचाया गया। करसन सुमर को वहां से भगा दिया गया।
लगभग साढ़े नौ बजे पुलिस की एक गाड़ी वहां पहुंची। उसमें तीन पुलिसवाले थे। पुलिसवालों के सामने भी दोनों की पिटाई जारी रही। पुलिसवालों ने हाशिम और रफीक को उनकी गाड़ी में डाला और उन्हें मुनदरा पुलिस थाने  ले गए। जाने के पहले उन्होंने भीड़ से वायदा किया कि पुलिस थाने में भी हाशिम और रफीक की पिटाई की जाएगी।  पुलिस की गाड़ी में हाशिम बेहोश  हो गया परंतु उन्हें किसी अस्पताल में ले जाने की बजाए, पुलिस थाने ले जाया गया। पुलिस थाने पहुंचने के बाद थाना प्रभारी के निर्देश पर उन्हें मुनदरा के अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी प्राथमिक चिकित्सा की गई। चूंकि उनकी हालत गंभीर थी इसलिए उन्हें बाद में भुज सिविल अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। वहां 6 दिन इलाज के बाद थाना प्रभारी ने उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाया। उस अस्पताल में दो दिन इलाज के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई। अस्पताल से छुट्टी के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया, जिसने उन्हें 9 और 10 अगस्त की दो दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया। अंततः 21 अगस्त 2013 को उन्हें जमानत पर रिहा किया गया। करसन सुमर, जो उनके साथ था, उस पर भी अपराध कारित करने में सहायता करने का आरोप लगाया गया। हाशिम और रफीक पर भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास, 506 (2) (मृत्यु या गंभीर चोट कारित करने की
आपराधिक धमकी देना) व पशु  अत्याचार निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11 के अंतर्गत मुकदमा कायम किया गया। धारा 11 कहती है कि कोई व्यक्ति, पशु  पर क्रूरता करने का दोषी होगा यदि वहः
डी-किसी वाहन या अन्यथा किसी पशु को इस तरह ले जाता है जिससे उसे अनावश्यक कष्ट हो या            
ई-किसी पशु को ऐसे पिंजरे या किसी अन्य वस्तु में रखता या बंद करता है जिसकी ऊंचाई, लंबाई व चैड़ाई पशु के चलने फिरने के लिए पर्याप्त न हो या
एफ-किसी पशु को अनावश्यक रूप से लंबे समय तक या अनावश्यक रूप से मोटी या भारी चैन या रस्सी से बांधकर रखता है।
जिस कारण से रफीक और हाशिम की पिटाई लगाई गई उसका, उस अपराध से कोई संबंध ही नहीं था जिसके लिए उन्हें दोषी ठहराया गया । उनके खिलाफ गौवध प्रतिशेध अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत प्रकरण दर्ज नहीं किया गया।  उन पर यह आरोप नहीं था कि वे मवेशियों को बूचड़खाने ले जा रहे थे परंतु अधिकांष अखबारों ने यही खबर छापी कि उन्हें गायों को वध के लिए ले जाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। जो मेडिकल सर्टिफिकेट रिकार्ड पर हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि उनके साथ जमकर मारपीट की गई थी और वह भी पुलिसकर्मियों के सामने। अखबारों में उनकी तस्वीरों छपी जिनमें वे पूरी तरह नग्न दिखाए गए थे। मेडिकल रिपोर्ट और अखबारों में छपे चित्रों से यह जाहिर है कि वे अपराधी नहीं बल्कि पीडि़त थे। उनके लिए यह संभव ही नहीं था कि वे किसी की हत्या का प्रयास करते या 50 लोगों की भीड़ को मार डालने की धमकी देते।
रफीक और हाशिम के विरूद्ध अदालत में दाखिल चालान को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस गाड़ी में वे मवेशियों को ले जा रहे थे, उसका पंचनामा नहीं किया गया। तब फिर पुलिस यह कैसे साबित करेगी कि पशु ओं के साथ क्रूरता की गई थी? उनके वाहनों को पुलिस ने जब्त कर लिया और लगभग एक माह तक वे अपनी जीविका के साधन से वंचित रहे। उन्हें इलाज पर और बाद में वकीलों पर भारी खर्च करना पड़ा। इस घटना के बाद से रफीक और हाशिम तो छोडि़ए, कोई भी मुस्लिम वाहन चालक किसी जानवर को, फिर चाहे वे बकरियां और भेड़ें ही क्यों न हों, ढोने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
रफीक और हाशिम ने भी अपनी शिकायत दर्ज कराई जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 143, 148, 149, 223, 295 व 504 के अंतर्गत दर्ज किया गया। इस मामले में आरोपी हिम्मत सिंह ने रफीक और हाशिम से कई बार संपर्क किया और यह कहा कि वे अपना मुकदमा वापस ले लें परंतु वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। रफीक और हाशिम उनके साथ अन्याय करने वालों को सजा दिलवाना चाहते हैं और इसलिए वे दोनों मुकदमों को पूरी गंभीरता से लड़ रहे हैं। हिम्मत सिंह और उनके साथी जानते हैं कि उन्होंने गलती की है और इसलिए वे समझौता करने के इच्छुक हैं।
जिस तरह फर्जी मुठभेड़ों के मामलों का इस्तेमाल मुसलमानों को आतंकवादी बताने के लिए और उनके प्रति घृणा फैलाने के उद्देश्य से किया जा रहा था, उसी तरह गौवध के झूठे प्रकरण कायम कर हिन्दुत्ववादी यह प्रयास कर रहे हैं कि कच्छ के शांतिपूर्ण माहौल में साम्प्रदायिकता का जहर घोला जा सके और मुसलमानों को बदनाम किया जा सके। गुजरात का मीडिया अपने मुख्यमंत्री का गुणगान करने में जुटा है और साम्प्रदायिकता फैलाने के प्रयासों को गति दे रहा है। इससे कच्छ के समाज में मुसलमान अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। कच्छ, पाकिस्तान से सटा हुआ जिला है और अधिकारी हर मुसलमान को पाकिस्तानी एजेण्ट मानकर चलते हैं। जिले के खवाड़ा इलाके में हर मुसलमान को अपना पहचानपत्र हमेशा  अपने साथ रखना पड़ता है। गांव में आने-जाने वालों को भी संदेह की निगाह से देखा जाता है और उनके मेजबानों से तरह-तरह की पूछताछ की जाती है। जब भी कोई मुस्लिम मौलवी गांव में आता है तो पुलिस उससे पूछताछ करती है और उसे गांव में रात नहीं गुजारने दी जाती। प्रषासन मानकर चलता है कि मौलवी के भेष   में पाकिस्तानी एजेण्ट लोगों को भड़काने आते हैं।
मुसलमानों के साथ सरकारी योजनाओं के मामले में भेदभाव किया जाता है और उन्हें राशनकार्ड आदि बहुत मुश्किल से मिलता है। कुल मिलाकर कच्छ में मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है।

-इरफान इंजीनियर



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