गुरुवार, 25 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-14

अम्बेडकरवाद  की ओर..
    मैं वापस गाँव आ गया पुनः भीलवाड़ा में सक्रिय होने के लिए। अब राजनैतिक रूप से जवाब देने की इच्छा थी, धार्मिक प्रयोग सफल नहीं रहा था, दलित मुस्लिम गठजोड़ परवान ही नहीं चढ़ा और ईसाइयत के आडम्बर भी हिन्दू धर्म जैसे ही लगे, सब प्रकार के धर्म कट्टरता से भरे पड़े हैं, सिर्फ बाहर दिखाने के लिए सर्वधर्म समभाव की बातें करते हैं, वरना तो हरेक का छिपा एजेंडा अपनी संख्या या अपने अनुयायी बढ़ाकर पूरी दुनिया मुट्ठी में कर लेने का ही हैै। कोई पूरी दुनिया को दार उल इस्लाम बनाने की कोशिश में है तो कोई पूरे विश्व को सुसमाचार सुनाने को बेताब है, हिन्दू भी कम नहीं है वे भी कर्ण्वन्तोविश्वमआर्यम‘ का उद्घोष करके पूरी पृथ्वी को आर्य बनाने पर तुले हुए है सब विस्तारवादी, सब स्वर्ग नरक का डर दिखा रहे हैं, मुझे भय भाग्य और भगवान की इन कपोल कल्पनाओं से दूर जाना था, इसलिए वैकल्पिक साहित्य टटोलना शुरू किया, सबसे पहले अम्बेडकर साहित्य से शुरुआत हुई, अब तक अम्बेडकर से मेरा दो तरह से परिचय हुआ था, पहला आरएसएस में रहते हुए, जहाँ प्रातः स्त्रोत में अम्बेडकर को याद करते थे और दत्तोपंत ठेंगी रचित बाबा साहब की जीवनी पढ़ी थी, दूसरा परिचय ओशो के साहित्य के जरिये हुआ जहाँ पर वे गाँधी की आलोचना करते हुए बाबा साहब अम्बेडकर को वैज्ञानिक और तर्कशील व्यक्ति बताते हैं।
अब तक मैंने बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के बारे में संघ के प्रकाशनों पांचजन्य, पाथेयकण, राष्ट्रधर्म, जाह्नवी इत्यादि में यत्र तत्र कुछ कुछ पढ़ा था, जिससे पता चला था कि बाबा साहब भी अन्य महापुरुषों की ही तरह महान राष्ट्रभक्त व्यक्ति थे, उनका भी संविधान को लिखने में योगदान रहा था, वे संस्कृत को राष्ट्रभाषा और भगवा झंडे को राष्ट्रध्वज बनवाना चाहते थे, उन्होंने तमाम प्रलोभनों के बावजूद मुस्लिम या ईसाई बनने के बजाए हिन्दू धर्म की ही एक शाखा बौद्ध धर्म को अपनाया, वे कश्मीर में धारा 370 लगाने के भी कड़े
विरोधी थे उन्होंने अपने साहित्य में कई जगह पर साफ साफ लिखा कि मुस्लिम अलग राष्ट्रीयता की बात हर जगह पर करते हैं इसी तरह की बातें मुझे संघ में रहते हुए मालूम पड़ी थीं लेकिन अब अम्बेडकर को स्वयं को पढ़ते हुए तो मेरा मस्तिष्क चकराने लग गया, पहली ही किताब ‘रिडल्स ऑफ हिन्दुइज्म‘ ने तो दिमाग खराब कर दिया, फिर तो बाबा साहब का जो भी साहित्य जहाँ भी मिला, उसे पढ़ डाला, बाबा साहब के जीवन के कटु प्रसंगों से दो चार होने का मौका मिला, जातिभेद का उच्छेद पुस्तक ने मुझे भारत में जाति जैसी घृणित व्यवस्था के जनक ब्राह्मणवाद को समझने का अवसर दिया, अब मुझे आरएसएस का पूरा खेल समझ में आने लगा, उनके ‘समरसता‘ के नारे में छिपे सामाजिक समानता और न्याय तथा सामाजिक परिवर्तन की धार को कुंद करने का षड्यंत्र समझ में आने लगा, दलितों को ‘वंचित‘ और आदिवासियों को ‘वनवासी‘ नाम देने की राजनीति भी समझ में आने लगी, संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले गीत ‘मनुष्य तू बड़ा महान है, तू मनु की संतान है’ के खिलाफ भी अन्तःकरण की अतल गहराइयों से अस्वीकार का भाव उठा कि जिस मनु ने जाति आधारित पूरी व्यवस्था को संहिताबद्ध किया तथा शूद्रों और औरतों तथा अवर्ण अछूतों को जानवर से भी कम आँका, उस हरामी को महर्षि मनु कहकर इंसानों का पूर्वज बताना कितना बड़ा कुकर्म था? मेरे दिमाग के बंद द्वार अब खुलने लगे थे, मैंने मनुस्मृति को पढ़ा तो बाबा साहब सही लगे, उसका दहन जरुरी लगा, ज्यों ज्यों मैं बाबा साहब को पढ़ते जाता, वैसे वैसे मेरे विद्रोही विचार और अधिक मजबूत होते जाते थे, अम्बेडकर साहित्य ने मुझमें प्रगतिशीलता के बीज बोए, दलित दृष्टिकोण ने मेरी आरएसएस के खिलाफ अब तक लड़ी गई व्यक्तिगत लड़ाई को एक सामाजिक गरिमा, अस्मिता और पहचान की सामूहिक लड़ाई बनाने में मदद की, फिर तो कबीर, फुले, पेरियार को भी पढ़ा, अब मैं सिर्फ बागी नहीं था, अब प्रतिशोध की आग परिवर्तन की चाह में ढलने लगी, मनोरंजन के लिए या खुद की खुशी के लिए लिखी गई कविताओं की जगह जलते हुए प्रश्न खड़े करने वाली कविताओं ने ले ली, मैंने ‘श्यामल सुरभित सी अलकें मदिरा घट सी पलकें’ वाली श्रृंगार रस की कविताएँ जला डाली, अब मेरे काव्य का मुख्य स्वर बगावत हो गया था, उन दिनों तब मैंने लिखा-
‘केवल मनुस्मृति को ही जला कर,
रुक क्यों गए बाबा साहब?
क्यों नहीं जला डाले
वे सब मनु, जो बसे हैं
कथित उच्चों के मनों में ’
(एकलव्य की गुरु भक्ति पर)
‘एकलव्य क्यों दिया तूने
दक्षिणा में अपना अँगूठा,
क्यों नहीं काटा
द्रोणाचार्य का सिर
ताकि और किसी एकलव्य का
अँगूठा माँगने आता ही नहीं,
फिर कोई द्रोण
और पैदा ही नहीं होते
फिर कोई भी द्रोणवादी लोग‘
(राम शबरी प्रसंग पर )
‘राजा रामचंद्र तुमने
उस आदिवासिन शबरी के पास
जूठे बेर भी नहीं छोड़े
इस तरह निभा ही लिया
तुमने भी हमसे सच्चा बैर‘

ऐसी ही दर्जनों कविताएँ इस दौर में लिखी र्गइं, मेरे गद्य लेखन का भी सुर बदला, वह भी बगावती हुआ, कपोल कल्पित कहानियों की जगह दलित जीवन से जुड़ी खुरदरी और तीखी कहानियों ने ले ली। मेरा पठन-पाठन भी निरंतर जारी था, पेरियार की सच्ची रामायण और फुले की गुलामगिरी तथा एल0आर0 बाली की ‘हिन्दुइज्म धर्म या कलंक‘ पढ़ी, सरिता मुक्ता रीप्रिंट भी पढ़े, बाबा साहब को तो पढ़ा ही, बाबा साहब पर आ रही अन्य पुस्तके भी पढ़ीं, ओशो को भी पढ़ा, कृष्णमूर्ति, लोहिया, जयप्रकाश नारायण, मधु लिमिये और किशन पटनायक, मार्क्स, एंजेल्स, फ्रायड और नीत्शे को भी पढ़ने लगा। हिंदी साहित्य के समकालीन कई रचनाकारों को भी पढ़ने का अवसर मिला, इन सबने मुझे वैचारिक रूप से मजबूती दी। आर0एस0एस0 की आलोचना में लिखा गया बहुत सारा साहित्य भी पढ़ने को मिला, अगर मैं कहूँ कि अम्बेडकरवादी और मानवतावादी साहित्य ने मुझे मानसिक गुलामी से निजात दिलाई तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी समतावादी शब्दों और रचनाओं ने मेरी जिन्दगी की दिशा बदल दी।
-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

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