शनिवार, 22 नवंबर 2014

गुजरात की जेलों में कैदियों की दुर्दशा

किसी देश में कानून की हुकमरानी को परखने के लिए उसकी जेलों में बंद कैदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार से बेहतर कोई कसौटी नहीं हो सकती। यह सही भी है क्योंकि कैदी के हाथ, पैर, ज़बान हर चीज़ जेल प्रशासन के अधीन हो जाता है। ऐसी ही स्थिति में  अधिकार प्राप्त व्यक्ति या समूह के आचरण की पहचान होती है। लोकतंत्र में हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि आपका आचरण कानून की मंशा के अनूरूप हो। लेकिन क्या ऐसा वास्तव में है?
हिरासत में मौत की घटनाएं, कैदियों के साथ मारपीट, अन्य प्रकार की शारीरिक एंव मानसिक यातनाओं की खबरें इसे नकारती हैं। अगर कैदी पर आतंकवादी या माओवादी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप है तो कुछ भी असम्भव नहीं। जेल में उन्हें किस प्रकार यातनाएं दी जाती हैं उसकी ताज़ा मिसाल अहमदाबाद जेल है जहां आतंकवाद के आरोप में बंद कैदियों ने 15 अक्तूबर से अनशन शुरू कर दिया।
इन कैदियों का आरोप है कि फरवरी 2013 से उन्होंने सूरज की रोशनी नहीं देखी। उनके बैरक में ही बने अंडा सेल में उन्हें कैद रखा जाता है और दिन में थोड़े समय के लिए सेल से बाहर बैरक में निकाला जाता है जहां सूर्य के प्रकाश का प्रवेश भी वर्जित है। इन विचाराधीन कैदियों को जेल में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की सुविधा को समाप्त कर दिया गया। घर से आने वाले जिन पत्रों को सेंसर के बाद उन्हें दिया जाता था वह भी जेल प्रशासन ने बंद कर दिया। दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के तहत पढ़ने वाले लड़कों की लाइब्रेरी की सुविधा पर भी विराम लगा दिया गया। कुल मिलाकर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी गई जिसमें कैदियों के लिए अपना मानसिक संतुलन बनाए रख पाना भी बड़ी चुनौती हो जाती है। अहमदाबाद जेल में फरवरी 2013 के सुरंग कांड
के बाद से ही यह स्थिति बनी हुई थी। इस बीच लड़कों ने कई बार जेल प्रशासन से इस अमानवीय व्यवहार को बंद करने और जेल मैनुअल लागू करने की बात की लेकिन इसका सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। हौसला डाट नेट के अनुसार जेल प्रशासन ने पहले तो अनशन करने वालों के खिलाफ हत्या के प्रयास का मुकदमा
दर्ज कर दमन करने की कोशिश की। लेकिन अनशन जारी रहा। कुछ कैदियों के बिगड़ते स्वास्थ को देख कर जेल प्रशासन ने गृहविभाग को पत्र लिख कर स्थिति से अवगत कराया। अंत में यह अनशन 24 अक्तूबर को तब समाप्त हुआ जब एडिशनल चीफ सेक्रेटरी एसके नन्दा ने इन कैदियों की मांगों को स्वीकार करते हुए दिन में एक बार दो-दो या तीन-तीन की संख्या में कैदियों को बाहर निकालने का आश्वासन दिया। इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद यह तो स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि मामला प्रशासनिक नहीं राजनीतिक है।
साबरमती जेल सुरंग कांड जिसकी लम्बाई, चैड़ाई और गहराई क्रमशः 220 फीट, 4 फीट और 7 फीट बताई गई और कहा गया कि उसकी खुदाई में चम्मच, टूथ ब्रश, थाली, लुंगी आदि औज़ारों का प्रयोग किया गया, जो अपने आप में एक बड़ा सवाल है। इसके अलावा इस खुदाई से निकलने वाली मिट्टी का आयतन आठ से नौ
हज़ार क्यूबिक फीट होता है जिसे किसी घास के नीचे छुपा देना किसी चमत्कार से कम नहीं हो सकता।
बम धमाकों के कैदियों के साथ इस तरह की साजि़शें पहले भी होती रही हैं। आजमग़ढ़ के सलमान पऱ तिहाड़ जेल में हमला, बिहार के दरभंगा निवासी कतील सिद्दीकी की पुणे जेल में हत्या, जेल प्रशासन द्वारा अन्य कैदियों को उनके साथ हिंसा करने के लिए उकसाने का ही नतीजा थी। खालिद मुजाहिद की फैज़ाबाद पेशी से लौटते हुए मौत जिसे परिजन और मानवाधिकार एंव सामाजिक संगठन हत्या मानते हैं तो इस संदर्भ में सबसे
चर्चित घटना है।
लखनऊ जेल में आतंकवाद के आरोप में विचाराधीन कैदी नौशाद को जेल के एक बड़े अधिकारी ने आतंकवाद के एक अन्य आरोपी तारिक कासमी पर हमला करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया था। नौशाद ने यह आरोप लगाते हुए अपने अधिवक्ता को एक पत्र भी लिखा था। तारिक कासमी ने बाद में इस आरोप की पुष्टि भी की थी। इतना ही नहीं उसी जेल में बंद पाकिस्तानी कैदियों से भी उन्हें लड़ाने कोशिश उक्त अधिकारी ने की थी, जिससे दो देशों के बीच कटुता उत्पन्न होने का भी खतरा पैदा हो सकता था। जाहिर है ये घटनाएं इस ओर
इशारा करती हैं कि राज्य अपने अधीन रह रहे कैदियों को जेल मैन्यूअल के मुताबिक उनके वाजिब अधिकार भले न देता हो लेकिन वह उनके नाम पर अपनी राजनीतिक जरूरतों को जरूर पूरा करने की फिराक में रहता है। देश के अंदर भी और बाहर भी।
आज जबकि ह्यूमन राइट्स चार्टर में भी कैदियों के अधिकारों को परिभाषित किया गया है। दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों में जेल मैनुअल का प्रावधान है, जिसके तहत उन्हें जेल में कई तरह के अधिकार दिए गए हैं।
भारत में अंग्रेज़ों का बनाया हुआ जेल मैनुअल है जो निश्चित रूप से भारतीय कैदियों के दमन के मकसद से तैयार किया गया था। लेकिन भारत की जेलों में कैदियों को उतने भी अधिकार पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जो अंग्रेज गुलाम भारत के कैदियों को देते थे। देश की आज़ादी के सिपाहियों को अंग्रज़ों की जेलों में इस प्रकार की यातनाएं नहंीं दी जाती थीं हालांकि उनका शुमार अंग्रेज़ सरकार दुश्मन और गद्दार के तौर पर ही
करती थी। क्या यह मान लिया जाए कि जेलों के मामले में हमारी समझ और सभ्यता अभी उस ज़माने के अंग्रेज़ों के स्तर तक नहीं पहुंची है।
-मसीहुददीन संजरी

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (24-11-2014) को "शुभ प्रभात-समाजवादी बग्घी पे आ रहा है " (चर्चा मंच 1807) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'