गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल। मशरिकी फ़न में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल

गोंडा में  लोकसंघर्ष  पत्रिका के कार्यक्रम में हाथ में पीछे पत्रिका लिए है 



‘समय से मुठभेड़’ करती सरयू पार की मोनालिसा

    अपनी ग़ज़ल के प्रति यह एतमाद और फ़ख्ऱ भरा शेर कहने वाले रामनाथ सिंह ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लों में सचमुच एशियाई कविता की भाव-धारा और हिन्दी की संवेदनशील आक्रामकता अपने वास्तविक रूप में दिखती है। ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें जिस समय से मुठभेड़ कर रही हैं, वह समय कविता में प्रतिरोध की जिस क्षमता की माँग करता है ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लें उस प्रतिरोधात्मक भाषा की शक्ति से भरी-पूरी हैं। यह क्षमता हिन्दी के बहुत कम कवियों के पास रही है, शायद इसीलिए ‘अदम गोंडवी’ कबीर, मुक्तिबोध, नागार्जुन और धूमिल की परंपरा के कवि हैं। वही कबीर सी फक्कड़ मस्ती और सच कहने का हुनर जो बड़ी साधना के बाद, जीवन के कटु यथार्थ से दो-दो हाथ करने के बाद हासिल होता है, अदम के शेरों में मिलती है। जनवादी कविता जन की कसौटी पर कसी जाने के बाद अपने-आपको प्रासंगिक और प्रमाणित करने के लिए जन के बीच में उतरती है, इसलिए समकालीन कविता में ‘अदम गोंडवी’ की लोकप्रियता उन्हें सच्चे अर्थों में जनकवि की पदवी प्रदान  करती है।
छंद के रूप में ग़ज़ल को अपना लेना आसान है लेकिन इसे साधना बोधा के शब्दों में ‘तरवारि की धारि पै धावनो’ है। हिन्दी में ग़ज़ल कहने की परंपरा भारतेन्दु ही से प्रारम्भ हो जाती है। हिन्दी के निराला जैसे बड़े कवि भी-
‘खुला भेद विजयी कहाए हुए जो,
लहू दूसरों का पिए जा रहे हैं।

    जैसी ग़ज़लें कहने से अपने आपको नहीं रोक पाए हैं। यह सिलसिला शमशेर और त्रिलोचन से होते हुए दुष्यंत तक पहुँचता है। दुष्यंत की ग़ज़लों से हिन्दी में ग़ज़ल को स्वीकृति मिल जाती है। ‘अदम गोंडवी’ ने दुष्यंत के विनम्र प्रतिरोध को धार और आक्रामकता के साथ व्यंग्य का जो दर्प दिया है, वह उन्हें हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार घोषित करता है। ‘‘एक ज़माना था जब आशिक और माशूक़ा की मुहब्बत भरी गुफ्तगू को ग़ज़ल कहा जाता था। हुस्न, इश्क और साकी-शराब की रसीली अभिव्यक्ति उसकी भाव-भूमि हुआ करती थी, जिससे परे जाकर दूसरी भाव-भूमि पर ग़ज़ल कहना ग़ज़लकारों के लिए दुस्साहस भरा कार्य हुआ करता था। ऐसी स्थिति में नई क्रांति की प्रस्तावना किसी भी कवि के लिए संभव नहीं थी। सच तो यह है कि ग़ज़ल के रूप में उसी कलाम को स्वीकार किया जाता था जो औरतों के हुस्न और जमाल की तारीफ करे। यहाँ तक कि जो हिन्दी की ग़ज़लें हुआ करती थीं उसमें उर्दू ग़ज़लों का व्यापक प्रभाव देखा जाता था। यही कारण था जब पहली बार शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार से उठकर ग़ज़ल रचना की तो डॉक्टर रामविलास शर्मा ने यह कहकर खारिज़ कर दिया कि ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है।” 1 ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें रामविलास शर्मा जी की उस बात को ही खारिज़ कर देती हैं।  क्योंकि ये ग़ज़लें कविता की उस प्रगतिशीलता की पराकाष्ठा को छूती हैं जिसे बड़े पैमाने का प्रगतिशील साहित्य अपनी प्रगतिशीलता की चादर ओढ़कर भी नहीं छू पाता। “किताबी माक्र्सवाद सिर्फ उन्हें आकृष्ट कर सकता है, जिनकी रुचि ज्ञान बटोरने और नया दिखने तक है। पर जो सचमुच बदलाव चाहते हैं और मौजूदा व्यवस्था से बुरी तरह तंग और परेशान हैं, वे अपने आस-पास के सामाजिक भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण के खिलाफ  लिखना ज़रूर चाहेंगे। वे सचमुच के सर्वहारा हैं, जिनके पास खोने को न ऊँची डिग्रियाँ और ओहदे हैं, न प्रतिष्ठित जीवन शैली। अदम इन्हीं धाराओं के शायर हैं।” 2 अदम किताबी माक्र्सवादी नहीं हैं, यह उन्होंने अपनी कविता और जीवन दोनों से सिद्ध किया है। विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मुक्तिबोध प्रभृति कवियों को भी पीछे छोड़ देती है। अदम का एक-एक शेर यथार्थवादी प्रगतिशील कविता की आबरू है। ग़ज़ल कहने की ज़मीन (मीटर और व्याकरण) होती है, लेकिन अदम ज़मीन (धरती) पर पाँव जमा कर ग़ज़ल कहते हैं शायद तभी उनकी ग़ज़लों का एक संग्रह ‘धरती की सतह पर’ नाम से प्रकाशित हुआ।
    ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें मनुष्य और यथार्थ के बीच के संबंध को बहुत सहजता से व्यक्त करती हैं। इन सहज सम्बन्धों को व्यक्त करने के लिए बड़े-बड़े दार्शनिकों और समाज शास्त्रियों को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है, लेकिन अदम का एक शेर इन्हें तरलता के साथ बेरोक-टोक हमारे हृदय पर तारी कर देता है। अदम बार-बार साहित्यकारों को ज़मीन की ओर लौटने के लिए कहते हैं-
अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ।
मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद तारों में ।।

    ग़ज़ल उर्दू का छंद है और जाहिरी तौर पर उर्दू से ही हिन्दी में दाखिल हुआ है। ‘ग़ज़ल एक संकेतात्मक कविता है। यह गागर में सागर भरने की कला है। ग़ज़ल के संक्षिप्त कलेवर में प्रतीकों के माध्यम से वह बात कही जा सकती है जिसके लिए एक लंबी नज़्म दरकार है। इस तरह कुछ निश्चित प्रतीकों की सीमा में बँधकर भी ग़ज़ल में व्यापकता है। प्रभाव ग़ज़ल का गुण विशेष है, क्योंकि प्रेम, समर्पण और करुणा ग़ज़ल की आत्मा है, इनकी अभिव्यक्ति के लिए कोमल, सरस शब्दों का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। शब्द केवल अर्थ के लिहाज से ही नहीं, ध्वनि में भी कोमल होने चाहिए। गीतात्मकता ग़ज़ल का प्राण है। शब्दों के सही रख-रखाव, बन्दिशों की चुस्ती, और अनुभूति के तीखेपन के साथ एक खास रंग होता है ग़ज़ल का, जिसके बिना ग़ज़ल निष्प्राण देह है। तग़ज़्जुल से शेर में जीवन का संचार होता है।”3 अदम ने ग़ज़ल की इस क्लासिक परिभाषा को तोड़ा ज़रूर है लेकिन ग़ज़ल उनकी ग़ज़लों में मौजूद है। उर्दू में ग़ज़ल शब्द की उत्पत्ति को ग़ज़ल से माना गया है जिसका अर्थ है प्रेमियों का आत्मीय वार्तालाप। अदम की ग़ज़लें गुफ्तगू  करती हैं लेकिन, महबूब से नहीं हाकिमों से, मुख्तारों से, पूँजीपतियों से और आततायी सत्ता से। उनकी ग़ज़ल यहाँ प्रतीकों और मुहावरों में तो शास्त्रीयता का निर्वाह करती है लेकिन लीक से हटकर तीखेपन के साथ! उर्दू की ग़ज़लगोई  की  ग़ज़ल बरकरार रखते हुए। वे हिन्दी की ग़्ाज़ल में दुष्यंत के उत्तराधिकारी बनकर आए थे। “दुष्यंत ने अपनी ग़्ाज़लों से शायरी की जिस नई ‘राजनीति’ की शुरुआत की थी, अदम ने उसे मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है जहाँ से एक-एक चीज बगैर किसी धुँधलके के पहचानी जा सके। यह शायरी, एक अर्थ में, सचमुच शायरी कम है सीधी बात कहीं अधिक है। इस रूप में यह एक ऐसी आपदधर्मी कला है, जो आग की लपटों के बीच धूँ-धूँ जलती बस्तियों को बचाने के लिए आगे आती है।”4
    नई भाषा, रचाव और मुहाविरेदानी के साथ ग़्ाज़ल की मुलायमियत को आक्रामक तेवर में तब्दील कर अदम हिन्दी ग़्ाज़ल परंपरा का विकास तो करते हैं लेकिन परंपरा भंजक बनकर। उसका अनुसरण करके नहीं। रवीन्द्र प्रभात हिन्दी और उर्दू ग़्ाज़ल की परंपरा में भेद करते हुए इस प्रकार टिप्पणी करते हैं-“उर्दू ग़्ाज़ल मुख्यतः प्रेम-भावनाओं का चित्रण है। अच्छी ग़्ाज़लें वही समझी जाती हैं, जिसमें इश्को-मुहब्बत की बातें सच्चाई के साथ लिखी जाएँ, जबकि हिन्दी ग़्ाज़लकार इस परिभाषा को नहीं मानते। इनका उर्दू ग़्ाज़लकारों से सैद्धान्तिक मतभेद है।’’ नचिकेता का मानना है कि ‘हिन्दी ग़्ाज़ल उर्दू ग़्ाज़लों की तरह न तो असम्बद्ध कविता है और न इसका मुख्य स्वर पलायनवादी है, इसका मिजाज समर्पणवादी भी नहीं हैं। ज़हीर कुरैशी का मानना है कि-‘हिन्दी प्रकृति की ग़्ाज़लें आम आदमी की जनवादी  अभिव्यक्ति हैं, जो सबसे पहले अपना पाठक तलाश करती हैं।’ जबकि ज्ञान प्रकाश विवेक का कहना है कि हिन्दी कवियों द्वारा लिखी जा रही ग़्ाज़ल में शराब का जिक्र नहीं होता, जिक्र होता है गंगाजल में धुले तुलसी के पत्तों का, पीपल की छाँव का, नीम के दर्द का, आम-आदमी की तकलीफों का। हिन्दी भाषा में लिखा जा रहा हर शेर जिंदगी का अक्स होता है। बहुत नज़दीक से महसूस किए गए दर्द की अभिव्यक्ति होता है।”5 लेकिन क्या इन परिभाषाओं से अदम की शायरी मेल खाती है? गंगाजल के विषय में वे क्या कहते हैं?-
गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है।
तिश्नगी को वोदका के आचमन तक ले चलो।।

    बगैर उर्दू की मुहाविरेदानी के गजल  कही जा सकती है। स्वयं अदम ने ही शुद्ध हिन्दी में ग़्ाज़लें कही हैं:-
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की।
ये समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की।।

    लेकिन, उनकी प्रभावी ग़्ाज़लें वही हैं जिनमें उर्दू गजल का लबो-लहज़ा है। यह बात और है कि उनकी भाषा क्लिष्ट नहीं होने पाती है। ‘प्रेमचंदी हिन्दुस्तानी’, जो गँवई-गँवार की, आम-अवाम की  भी भाषा है अपने रचाव और अनुभूति की तीव्रता से व्यंग्य की मारक क्षमता बढ़ाती है।
    ‘समय से मुठभेड़’ संग्रह में तिरसठ गजलें  हैं, चैदह कत्आत हैं और तीन लंबी नज़्में हैं-
(क)-हथियार उठा ले
(ख)-चमारों की गली, और
(ग)-गाँव का परिवेश
    सर्वप्रथम हम ग़्ाज़लों पर चर्चा करेंगे फिर क़त्आत और नज़्मों पर। ग़्ाज़लें प्रायः छोटी और मध्यम बहर की हैं। एक ग़्ाज़ल कुछ लंबी बहर की भी है-
कहीं फागुन की दिलकश शाम फाकों में गुजर जाए।
मेरा दावा है इसके हुस्न का जादू उतर जाए।।
तखय्युल में तेरे चेहरे का खाक़ा खींचने बैठे।
बड़़ी हैरत हुई जब अक्स रोटी के उभर आए।।

    किन्तु यह भी मध्यम बहर की ग़्ाज़ल ही कही जाएगी। लंबी बहर की ग़्ाज़लें उर्दू में फिराक, इकबाल जैसे शायरों  ने लिखी हैं। उदाहरण के लिए लंबी बहर का एक शेर द्रष्टव्य है-
मैं फासला हूँ मुझे मिटा दो कि मेरे मिटने से दिल मिलेंगे,
मैं जब तलक दरमियाँ रहूँगा न फस्ले-गुल में भी गुल खिलेंगे।
-फिराक गोरखपुरी

    अदम के यहाँ पहले तो व्यवस्था पर चोट है फिर श्रम की महत्ता है। किसान, मजदूर की पक्षधरता है। जनता (सर्वहारा) की शक्ति पर यकीन है क्योंकि वे प्रतिबद्ध माक्र्सवादी हैं। क्रांति करने के लिए वे हथियार उठाने तक के लिए तैयार हैं। सबसे मारक है व्यंग्य, जो तिलमिलाने पर मजबूर करता है। व्यंग्य इसलिए भी मजबूत है क्योंकि उनकी कर्मभूमि अवध है और मातृभाषा अवधी है। अवधीभाषी अच्छे व्यंग्य करते हैं क्योंकि अवधी भाषा अपने सामान्य वार्तालाप में ही व्यंग्यात्मक है। व्यंग्यात्मकता अदम के शेरों में चिंगारी की तरह व्याप्त है। उदाहरण के लिए कुछ शेर देखे जा सकते हैं-
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे,
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे।
    कुछ राजनैतिक और अत्यंत चर्चित व्यंग्यात्मक शेर-
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में।
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत,
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।

यथा
कोई भी सरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले,
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।

-संतोष अर्श
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (19-12-2014) को "नई तामीर है मेरी ग़ज़ल" (चर्चा-1832) पर भी होगी।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...

मन के - मनके ने कहा…


सुंदर पोस्ट.

मन के - मनके ने कहा…


सुंदर पोस्ट.