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रविवार, 21 दिसंबर 2014

एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल। मशरिकी फ़न में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल -3

गोंडा में  लोकसंघर्ष  पत्रिका के कार्यक्रम में हाथ में पीछे पत्रिका लिए है
‘सरयू पार की मोनालिसा’ में कला का एक अनूठापन है जो साधारण होकर भी असाधारण है। गोंडा के एक ग्रामीण परिवेश में ‘मोनालिसा’ की परिकल्पना कितनी सौंदर्यात्मक है और यही अदम की कला का उरूज है। ‘मोनालिसा’ की मुस्कान के पैमाने से दलित लड़की कृष्णा के सौंदर्य को मापने का यह तरीका कवि की कल्पना का उत्कर्ष है।
    ‘गाँव का परिवेश’ ‘समय से मुठभेड़’ की अंतिम रचना है। अड़तीस पदों की यह रचना गाँव के परिवेश के जीवंत चित्र खींचती है-
व्याख्या ये भ्रम में रखने का अनोखा दाँव है।
नर्क से बदतर तो अपने देश का हर गाँव है।।

    इस कविता की ये पंक्तियाँ भीम राव अंबेडकर की याद दिलाती हैं। उन्होंने भारतीय गाँवों को अमानुषिक कहकर दलितों को शहर की ओर जाने की बात कही थी। इस प्रकार इन तीनों नज्मों का रचाव अदम की ग़्ाज़लों का ही एक विस्तार है क्योंकि ग़ज़लों में बंदिश, विस्तारपूर्वक अपनी अनुभूति को ढालने का मौका नहीं देती यह नज्मों में ही संभव था।
कला पक्षः 
   गज़लगो का काम वकालत का पेशा होता है। मिसरे उला में वह अपनी दलील देता है और मिसरे सानी में उसकी वकालत करता है। इसे हिन्दी में हम तर्क और स्थापना के जरिए भी मोटे तौर पर समझ सकते हैं। ग़ज़ल मुहावरे से बात करती है जबकि हिन्दी की कविता बिम्बात्मक होती है। ग़्ाज़ल उर्दू की चीज है इसलिए उर्दू से दूर रहकर ग़्ाज़ल को नहीं पाया जा सकता। हिन्दी के कई ग़्ाज़लकार इसीलिए फ्लॉप हुए। अदम से पहले दुष्यंत ने भी इस बात को बखूबी समझा था और उनकी ग़ज़लगोई हिन्दी गज़ल के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। अदम दुष्यंत से और आगे गए हैं। उन्होंने न केवल उर्दू और बोलचाल की ‘हिन्दुस्तानी’ के मुहावरों को चुना है बल्कि क्लासिक उर्दू शायरी के प्रतीक भी अपनी गज़लों में इस्तेमाल किए हैं। उदाहरण के लिए‘यूसुफ और ‘जुलेखा’ प्रतीकों को लेते हैं। उर्दू गज़ल की परंपरा में इन प्रतीकों की भरमार है। इन का धार्मिक महत्व भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदम शेर कहते हैं-
सियासी बज़्म में अक्सर जुलेखा के इशारों पर,
हकीकत ये है यूसुफ आज भी नीलाम होता है।

    उर्दू के इन परंपरागत प्रतीकों के प्रयोग से शेर लाजवाब हो गया है इसलिए इन प्रतीकों के महत्व को रेखांकित करना भी अभीष्ट होगा- “यूसुफ पैगंबर याकूब के पुत्र थे। ये बहुत ही सुंदर, सुशील और गुणवान व्यक्ति थे। इन के सरल, सौम्य स्वभाव के कारण इन के पिता का इन पर विशेष स्नेह था। यह बात इनके भाइयों को न भाती थी। अतः उन्होंने षड्यंत्र किया और यूसुफ को अंधे कुएँ में धकेल दिया। पिता से आकर कह दिया कि यूसुफ को भेडि़या खा गया। याकूब पुत्र-वियोग में रो-रोकर अंधे हो गए। उधर राह चलते कुछ व्यापारियों ने यूसुफ को देख लिया और उन्हें अंधे कुएँ से बाहर निकाला। वे इन्हें अपने साथ मिस्र ले गए और वहाँ के बाजार में बेंच दिया। मिस्र के वजीर आज़म की पत्नी जुलेखा इनके रूप पर आसक्त हो गयी और जुलेखा के इशारे पर वजीर आज़म ने यूसुफ को खरीद लिया। मगर यूसुफ सदाचारी थे। जुलेखा द्वारा लगाए गए आरोपों को उन्होंने निराधार सिद्ध कर दिया। इससे यूसुफ को बहुत सम्मान मिला। मिस्र का बादशाह भी इन का बहुत आदर करने लगा। इन्होंने मिस्र की जनता की अकाल से रक्षा की। इनकी पैगम्बर के रूप में प्रतिष्ठा हुई। साहित्य में यूसुफ सौंदर्य और सदाचार का प्रतीक हैं। एक उदाहरण देखिए-
दामन उस यूसुफ का आया पुर्जे होकर हाथ में
उड़ गई सोने की चिडि़या रह गए पर हाथ में।

-आरजू लखनवी
प्रिय को यूसुफ भी कहा जाता है और उसके सौंदर्य की तुलना यूसुफ से की जाती है:-
यूसुफ से कोई क्योंकर उस माह को मिला दे,
है वक्त रात दिन का अजदीदा-ता-शुनीदा।

-”मीर तकी मीर”-8
सियासी बज़्म में अक्सर जुलेखा के इशारों पर,
हकीकत ये है यूसुफ आज भी नीलाम होता है।

    अदम के इस शेर में प्रतीक वही ईरानी गज़ल परंपरा के यूसुफ और जुलेखा हैं लेकिन यहाँ आकर उनके मानी बदल गए हैं। अदम के शेर में जुलेखा पूँजी का प्रतीक है और युसुफ सर्वहारा का। सत्य यह है राजनीति की महफिल में जुलेखा (पूँजी) के इशारों पर यूसुफ (सर्वहारा या जन) आज भी नीलाम होता है। उर्दू शायरी की परंपरा का एक ऐसा किरदार जो आध्यात्मिक प्रेम, प्रिय के सौंदर्य और सदाचार के लिए प्रयुक्त होता आया है, अदम ने उसे सर्वहारा के लिए प्रयोग करके मानों एक युग का अंत कर दूसरे युग का सूत्रपात किया हो।
    अदम की गज़लों की कलात्मकता सिर्फ भाषा, मुहावरों और शेर की रवानी के आधार पर नहीं आँकी जा सकती। शेर की गहराई की थाह उनकी बारीक निगाही से भी नापी जा सकती है। एक किसान के तजुर्बात प्रगतिशील कविता के लिए कितने उपयोगी हो सकते हैं अदम का यह शेर बताएगा-
बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई,
रमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चैपाल में।

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए,
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में।

    रमसुधी की झोंपड़ी का सरपंच की चैपाल में खो जाना उसी तरह की प्रक्रिया है जैसे जमींदारी उन्मूलन के दौरान प्रारम्भ की गई सीलिंग यानी ‘अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम’। इस कानून के तहत जिस किसी के भी पास साढ़े बारह एकड़ से अधिक कृषि योग्य भूमि थी, सरकार द्वारा उसका अधिग्रहण कर भूमिहीन किसानों में बाँट दिया जाता था। यह कानून 1960 ई॰ में आया था लेकिन इसके क्रियान्वयन में जो भ्रष्टाचार राजस्व कर्मियों और जमींदारों की साँठ-गाँठ से हुआ उसको नंगा करने के लिए अदम का यह शेर ही काफी है। यह वही दौर था जब जमींदारों ने गर्भ के बच्चों के नाम भी अपनी जमीनों के पट्टे करा दिए थे और भूमिहीनों को बकौल अदम पट्टे की सनद ताल (तालाब) में मिलती थी। वे उसमें खेती कर पाएँ तो करें नहीं तो कूदकर आत्महत्या कर लें। यह जो बात कहने का चुटीला और चमकता हुआ ढंग है यह अदम की ग़ज़ल का कलात्मक मेयार ऊँचा करता है। रमसुधी की झोंपड़ी के खोने का साक्षी जो बूढ़ा बरगद है वह माक्र्सवादियों का प्रिय प्रतीक है। यह मुक्तिबोध जैसे कवियों के यहाँ बार-बार आया है-
दीखता है सामने ही अंधकार-स्तूप-सा
भयंकर बरगद-
सभी उपेक्षितों, समस्त वंचितों,
गरीबों का वही घर, वही छत,
उसके ही तल-खोह-अँधेरे में सो रहे
गृहहीन कई प्राण।-

(‘अँधेरे में’-मुक्तिबोध)
    यह भी वही बरगद है, जो रमसुधी की झोंपड़ी के सरपंच की चैपाल में खोने का गवाह है।
    इसी तरह अदम ने कई शेरों में ‘नखाश’ शब्द का इस्तेमाल किया है। लखनऊ की विक्टोरिया रोड पर प्रत्येक रविवार को लगने वाली बाजार को ‘नखाश की बाजार’ कहा जाता है, जहाँ प्रत्येक वस्तु की सस्ती ‘सेकेंड हैंड’ उपलब्धता प्रसिद्ध है। अपने शेर में व्यंग्य की धार तेज करने के लिए ‘नखाश की बाजार’ को अदम इस तरह प्रयोग करते हैं-
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें।
संसद बदल गई है यहाँ की नखाश में।।

    ये अदम कीगज़लगोई की नायाब नजीर है। भाषा के भी विविध आयाम अदम की गज़लों में दिखते हैं। एक तरफ तो वे कहते हैं-
अर्ध तृप्ति उद्दाम वासना ये मानव जीवन का सच है।
धरती के इस खंडकाव्य पर विरह दग्ध उच्छ्वास लिखा है।

और दूसरी ओर-
बहरे बेकराँ में ताकयामत का सफर ठहरा।
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाये सफीने से।

    कोई भी उर्दू शायरी का पाठक यह नहीं कह सकता कि यह शेर उर्दू का नहीं है। यहाँ सफीने शब्द पर भी गौर करना होगा जो एक धार्मिक इस्लामी प्रतीक है और हिजरत से जुड़ा है। ऐसी भाषा हिन्दी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद को ही सधी थी। इसीलिए अदम बार-बार अपने शेरों में मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों के पात्रों को बुला लेते हैं। घीसू, होरी, धनिया, मंगल, गोबर के साथ-साथ एक स्थान पर रेणु का हीरामन भी आया है। उर्दू शायरी के तमाम प्रचलित अरबी, फारसी कचराही शब्द अदम ने जमकर प्रयोग किए हैं जैसे-
    रजअत, इलहाम, जदीद, इजारेदार, कुदूरत, नीलगूँ, जाफ़ाश, जद, शफ़क़त, गरानी,  पैहम, हैय्यत, रवायतआहनी, खुदसरी, तबीब, मरदूद, बेजार, फैसलाकुन, फसील, जाँफिशानी, लन्तरानी, सहकार, मर्तबा, इदारा, फर्द, कबा, शिगूफा, नीलोफर, रकाबी, बरहना, जिना, तमद्दुन, बहरे-बेकराँ, तख़य्युल, शीराजा, दहकान, गंदुम आदि। ये सभी शब्द क़स्बाई और कचराही मिठास रखते हैं।  इजाफत जो थोड़ी-बहुत अदम के शेरों में मिलती है वह उर्दू ग़्ाज़ल से प्रेरित है। बोलचाल के शब्दों और मुहावरों का निखरा हुआ रूप है। मुहावरे हिंदी और उर्दू  दोनों के खिले हैं जैसे-बापू  के बंदर, फैसलाकुन जंग, कल तलक, वक्त के सैलाब, साहिबे किरदार, आग का दरिया, ठंडा  चूल्हा, रँगीले शाह का हम्माम, आँख पर पट्टी, अक्ल पर ताला, तालिबे-शोहरत, जाए भाड़ में, खुदा  का वास्ता, शिगूफा उछालना, ढ़ोल पीटना, ढीला गरारा, तवज्जो दीजिए, जहन्नुम में, शीराजा बिखर जाए, दीगर नस्ल, गरीब की आह, रामनामी ओढ़कर आदि।
    ठेठ देहाती गँवई-गँवार, अवधी के मुहावरे भी मिलते हैं जैसे-पट्टे की सनद, खेतों में बेगार, दीवार फाँदने में (किसी की बहू-बेटी के प्रति बुरी निगाह या व्यभिचार सूचक), कुर्बोजवार, सोलह-उन्नीस, आक-थू आदि। अंतर इतना है कि मूल मुहावरों को ग़्ाज़ल की बंदिश के अनुसार थोड़ा-बहुत परिवर्तित कर लिया गया है। अंग्रेजी के शब्द भी कहीं-कहीं प्रयोग किए गए हैं मसलन-जजमेंट, रिकार्ड, ब्रेसरी, स्कॉच आदि। साहित्यकारों के नाम और उनके साहित्य के बारे में कसीदे के शेर भी अदम ने कहे हैं। अमृता प्रीतम और प्रेमचंद में उनकी अगाध श्रद्धा है। मंटो को भी उन्होंने अपने एक शेर में याद किया है। कहीं-कहीं व्यंग्य की बारंबारता मोनोटोनी (नीरसता) प्रकट करती है और रचनात्मक व्याकरण भी कभी-कभी बिखर जाता है। फिर भी बहर से खारिज होने के बाद भी शेर दहाड़ता रहता है।   
    निष्कर्ष यह कि भाषा और भाव के स्तर पर अदम की गज़लें संतुलित हैं जो ‘समय से मुठभेड़’ को  एक शाहकार कृति का दर्जा दिलाती हैं। क्रांतिधर्मा साहित्य उम्रदराज होता है। निश्चय ही अदम की शायरी आने वाली पीढ़ी की रहबरी को आकुल रहेगी। उनमें क्रांति और व्यवस्था को बदल डालने की जो बेचैनी है वह मिट्टी की महक से मह-मह महकती रहेगी। समाज के लिए उपयोगी कलावादी संस्कृति के विकास में अदम की शायरी धीरे-धीरे अपना अव्वल स्थान बनाएगी। क्योंकि बकौल अदम-
इसकी अस्मत वक्त के हाथों न नंगी हो सकी।
यूँ समझिए द्रौपदी की चीर है मेरी
गज़ल।।
संदर्भ- 1.प्रभात रवीन्द्र 2.सिंह विजय बहादुर, भूमिका, ‘समय से मुठभेड़’ वाणी प्रकाशन 2010 संस्करण पृष्ठ-9 3.नसीम कमल, उर्दू साहित्य कोष, वाणी प्रकाशन 1998 संस्करण पृष्ठ-114 4. सिंह विजय बहादुर, भूमिका, ‘समय से मुठभेड़’ वाणी प्रकाशन 2010 संस्करण, पृष्ठ-14 5. प्रभात रवीन्द्र, गद्यकोष 6.सिंह नामवर (संपादक) कला और साहित्य चिंतन कार्ल माक्र्स, राजकमल प्रकाशन 2010 संस्करण, पृष्ठ-124 7.नसीम कमल, उर्दू साहित्य कोष, वाणी प्रकाशन, 1998 संस्करण, पृष्ठ-90 8.वही, पृष्ठ-261, 262             मोबाइल: 09033510239
-संतोष अर्श
समाप्त
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल। मशरिकी फ़न में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल -2

कैप्शन जोड़ें
कहीं-कहीं व्यंग्य इतना संवेदनात्मक है कि पाठक को रुला दे, बिल्कुल के.पी. सक्सेना के गद्य जैसा। ऐसी अनुभूतियों को कविता में लाने का कारण हृदय को टूटने से बचाने का अंतिम उपाय होता है, और कहीं-कहीं इतना तीव्र कि घृणा से थूकने पर मजबूर कर दे, निजाम और परिदृश्य पर। उदाहरण स्वरूपः-
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है,
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी,
ये सुबहे फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।

और
सुरा और सुंदरी के शौक में डूबे हुए रहबर,
दिल्ली को रंगीलेशाह का हम्माम कर देंगे।

        दिल्ली हमारी राजनैतिक, प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र है जिसे रंगीलेशाह प्रतीक से भोग-विलास में डूबी हुई  बताया गया है। रजनीश या ‘ओशो’ जो कि भारत के आध्यात्मिक  गुरुओं में शुमार होते हैं। उनके आश्रम में ‘भोग से योग तक’ के पर्दे में होने वाले व्यभिचार को अदम ने अपने कई शेरों में निशाना बनाया है-
डाल पर मजहब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल,
सभ्यता रजनीश के हम्माम में है बेनकाब।
अथवा,
‘प्रेमचंद’ की रचनाओं को, एक सिरे से खारिज करके,
ये ओशो के अनुयायी हैं, कामसूत्र पर भाष्य लिखेंगे। 
दोस्तों अब और क्या तौहीन होगी रीश की।
ब्रेसरी के हुक पे ठहरी चेतना रजनीश की।।
मोहतरम यूँ पाँव लटकाए हुए हैं कब्र में।
चाहिए लड़की कोई सोलह कोई उन्नीस की।।

    कहा जाता है अदम ‘ओशो’ का आश्रम अपनी आँखों से देखकर आए थे। अदम उसी प्रकार ‘पीड़ा से परिहास’ करते हैं जिस प्रकार ग़ालिब जैसे उर्दू के बड़े शायरों ने अपनी शायरी में किया है। भूख अदम के यहाँ सबसे बड़ा सच है। भूख तमाम ज्ञान की जननी है। बुद्ध को भी ज्ञान भूख से मिला। भूख उनकी हर ग़्ाज़ल में आई है, अपने उसी भयानक रूप में जिस रूप में वह भारत की सत्तर फीसदी आबादी का सत्य रही है। शायद इसीलिए अदम के बहुत से शेरों में भूख बार-बार चीखती है:-
इन्द्रधनुष के पुल से गुजरकर उस बस्ती तक आए हैं।
जहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है बिंदास भी है।।
कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद,
जो है संगीन के साए की चर्चा इश्तहारों में,
जुल्फ, अँगड़ाई, तबस्सुम, चाँद, आईना, गुलाब,
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इन का शबाब।
भुखमरी की जद में है या दार के साये में है,
अहले हिंदुस्तान अब तलवार के साए में है।
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को।

    भूख क्रांति का कारण बनेगी यह विश्वास भी शायर को है-
सत्ता के जनाजे़ को ले जाएँगे मरघट तक।
जो लोग भुखमरी के आगोश में आए हैं

    इसीलिए वे भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलने की बात करते हैं-
भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो।
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो।

इसीलिए उन्हें गर्म रोटी की महक पागल कर देती है। गंध की कितनी मादक अनुभूति है, ऐसी भी प्रगतिशील कविता कहीं होगी क्या?
गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे।
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें

    अदम गँवई-गँवार के अगुवा, अलमबरदार कवि हैं, इसलिए वे श्रम की महत्ता जानते हैं। उन्हें किसान के श्रम की फिक्र भी है और झोंपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार करने की कोशिश भी है। माक्र्सवादियों ने श्रम की गरिमा और महिमा बखान की है। “माक्र्स ने बताया कि जब श्रम अलगाव का रूप अख्तियार कर लेता है तब श्रमिक और श्रम के बीच एक विरोध की स्थिति ज़रूर बनती है। लेकिन ऐसा तब नहीं होता जब श्रम रचनात्मक होता है और जब उन वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनमें मनुष्य अपने को वस्तुरूपांतरित और व्यक्त करता है। इसके अलावा मनुष्य कलाकृतियों में ही नहीं बल्कि श्रम में भी आनंद ले सकता है। पूँजी में माक्र्स ने श्रमिक के काम में मिलने वाले सुख के बारे में लिखते हुए कहा कि श्रम ‘ऐसी क्रिया है जो उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को खुलकर सक्रिय होने का अवसर देती है’।”6 दुनिया में जो कुछ भी सुंदर है वह श्रम से निर्मित हुआ है। किन्तु मेहनतकश को जब उसके श्रम के एवज में भुखमरी के सिवाय कुछ नहीं मिलता तो अदम की शायरी अपने चिर-परिचित अंदाज में कहती है-
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है।
उसी के दम से रौनक आपके बँगलों में आई है।

    यहाँ तक सभ्यता का निर्माण भी घीसू के पसीने से ही हुआ है-
न महलों की बुलंदी से न लफ्जों के नगीने से।
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

    गाँव के अमानुषिक वातावरण, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, शोषण, दमन सबको देखने की बारीक निगाह अदम में है इसीलिए वे जनकवि हैं। सरयू नदी  की बाढ़ का कैसा जीवंत चित्र है, इस शेर में जो हश्र (प्रलय) का प्रभाव  पैदा कर रहा है-
कितनी वहशतनाक है सरयू की पाकीजा कछार।
मीटरों लहरें उछलतीं हश्र का आभास है

    गाँव के बारे में महानगरों में बैठकर आँकड़े जुटाने और बनाने वाले लोगों को यह खबर नहीं है कि कितने लोग गाँव छोड़कर शहरों की ओर कमाने निकल गए हैं। विस्थापन की यह पीड़ा और लाचारी कैसी होती है, यह महानगरीय अफसरशाही और मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसी की पहुँच से दूर की बात हैः-
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।
हमारे गाँव का ‘गोबर’ तुम्हारे लखनऊ में है,
जवाबी ख़त में लिखना किस मोहल्ले का निवासी है।

    सिर्फ एक प्रतीक के रूप में प्रेमचंद के किसान जीवन पर लिखे गए महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ के पात्र ‘गोबर’ का प्रयोग करने मात्र से शेर कितना प्रभावी और वजनदार हो गया है। पूरे गोदान का सत्व ही इसमें निचुड़कर आ गया है। अपसंस्कृति, साहित्यकारों की खेमेबाजी और हवाई साहित्य, सांप्रदायिकता, लालफीताशाही, पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश, क्रांतिधर्मी चेतना और राजनैतिक अगुवाकारी की विफलता से जन-सामान्य में उपजा संत्रास अदम की ज़लों का बीज-भाव है। सर्वत्र विद्रोह और नकार, प्रतिरोध और मुक्ति की कामना उनके शेर-शेर में व्यंजित होती है:-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत।
ये बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में।।

    क्रांति की यह उद्दाम चाह जीवन में तमाम मानसिक और भावनात्मक यातनाओं से गुजरने के बाद पैदा होती है। यही हिन्दी ग़्ाज़ल का मिजाज भी रही है, दुष्यंत भी ‘यातनाओं’ के अँधेरे में सफर करते थे। यह अँधेरा अदम के यहाँ और स्पष्ट है लेकिन, प्रकाश के साथ अचेतन मन में प्रज्ञा कल्पना की लौ जलाती है। सहज अनुभूति के स्तर में कविता जन्म पाती है-
उठाता पाँव है विज्ञान संशय के अँधेरे में।
अचानक उस अँधेरे में ही बिजली कौंध जाती है
    धर्म, इतिहास और शास्त्र का नकार बहुत कड़े शब्दों में है। शायद दलितों के हवाले से-
वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं,
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें।
लोकरंजन हो जहाँ शंबूक वध की आड़ में,
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें।

    दलित-विमर्श पर संग्रह में एक अकेली लंबी नज़्म ‘चमारों की गली’ भी है, जिस पर आगे चर्चा होगी। कुछ ग़्ाज़लों के शेर भी दलित-चिंतन की ओर ले जाते हैं मसलन-
अंत्यज कोरी पासी हैं हम, क्यूँ कर भारतवासी हैं हम।
छाया भी छूना गर्हित है, ऐसे सत्यानासी हैं हम।

    कुल मिलाकर अदम की  ज़लें उस हिंदुस्तान का साफ नफीस आईना हैं जहाँ रहकर उन्होंने अपनी ग़्ाज़ल को रवानी दी है और जिन पर मुख्तसर चर्चा पर्याप्त नहीं है। उनकी शायरी को कविता की मुख्य धारा की चर्चा में शामिल करना बहुत जरूरी है क्योंकि-
दिल लिए शीशे का देखो संग से टकरा गई।
बर्गे गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी
ग़ज़ल

    अदम की ग़ज़ल सम्पूर्ण मानवता की ग़ज़ल है।
कत्आत और नजमें
    कत्आ हिन्दी में मुक्तक के आस-पास ठहरता है। “यह भी रुबाई की तरह चार मिसरों में होता है और इसके दूसरे और चैथे मिसरे समान रदीफ-काफिये के होते हैं। यह रुबाई से इस तरह भिन्न है कि ग़ज़ल की सभी बहरों में कहा जा सकता है। अगर क़ते का पहला शेर मतला बन जाए तो पहले दूसरे और चैथे मिसरे का रदीफ काफिया एक ही हो जाता है। कई बार कोई एक भाव दो मिसरों में न समा पाने पर उसे क़तेे में बखूबी व्यक्त किया जा सकता है। इसे ग़्ाज़ल के रंग में कहकर उसके साथ ही लिखा पढ़ा जा सकता है।”7 ‘समय से मुठभेड़ में चैदह क़ते हैं। इनमें भी सर्वहारा की हिमायत शायराना रंग-ढंग में मिलती है-
रोटी के लिए बिक गई धनिया की आबरू।
‘लमही’ में प्रेमचंद का ‘होरी’ उदास है।

    शायर की जो ग़्ाज़लें गैर मुकम्मल रह जाती हैं वे कते की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। लेकिन इनमें भी अदम का तेवर कमजोर नहीं पढ़ा है-
भुखमरी की रुत में नग्में लिख रहे हैं प्यार के,
आज के फनकार भी हैं दोगले किरदार के।
दोस्तों इस मुल्क में जम्हूरियत के नाम पर,
सिक्के कितने दिन चलेंगे एक ही परिवार के।।

    नज़्मों में ‘चमारों की गली’ नज्म अधिक मजबूत है क्योंकि इसमें दलित-चिंतन के साथ एक कथानक भी है। ‘हथियार उठा लंे’ दस पदों की एक पोस्टर-छाप राजनैतिक रचना है। इसकी निस्बत ‘गाँव का परिवेश’ कहीं अच्छी रचना है।
    ‘चमारों की गली’ दलितों के शोषण और सामंती सवर्ण जातियों द्वारा उन पर ढाए गए जुल्मों का बयान करने वाली रचना है। पचपन पदों वाली इस रचना में कृष्णा नाम की एक दलित लड़की की करुण कहानी है जिसके साथ गाँव ही के ठाकुर ने बलात्कार किया है, और पुलिसिया दमन का सामना भी पीडि़त और उसके परिवार को करना पड़ रहा है। कहते हैं यह रचना अदम के गाँव में घटी एक घटना पर आधारित है जिस पर पुलिस, मीडिया और प्रशासन का ध्यान नहीं गया था। ठाकुरों की सामंती ठसक और पुलिस की नपुंसक, भ्रष्ट छवि को उजागर करती यह रचना अपनी भाषा, शैली और कथ्य में भी ठोस है। रचना के पहले ही बंद में एक विशिष्ट ओज है-
आइये महसूस करिए जिंदगी के ताप को।
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आप को।।

    दलित लड़की कृष्णा के लिए उन्होंने यूरोपीय नवजागरण काल के प्रसिद्ध चित्रकार लिओनार्दो द विंची के प्रसिद्ध चित्र ‘मोनालिसा’ का बिम्ब प्रयोग किया है जो अपनी सादगी के बावजूद चित्रकला के इतिहास में कालजयी रचना है-
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा।
मैं इसे कहता हूँ सरयू पार की मोनालिसा।।
-संतोष अर्श
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल। मशरिकी फ़न में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल

गोंडा में  लोकसंघर्ष  पत्रिका के कार्यक्रम में हाथ में पीछे पत्रिका लिए है 



‘समय से मुठभेड़’ करती सरयू पार की मोनालिसा

    अपनी ग़ज़ल के प्रति यह एतमाद और फ़ख्ऱ भरा शेर कहने वाले रामनाथ सिंह ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लों में सचमुच एशियाई कविता की भाव-धारा और हिन्दी की संवेदनशील आक्रामकता अपने वास्तविक रूप में दिखती है। ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें जिस समय से मुठभेड़ कर रही हैं, वह समय कविता में प्रतिरोध की जिस क्षमता की माँग करता है ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लें उस प्रतिरोधात्मक भाषा की शक्ति से भरी-पूरी हैं। यह क्षमता हिन्दी के बहुत कम कवियों के पास रही है, शायद इसीलिए ‘अदम गोंडवी’ कबीर, मुक्तिबोध, नागार्जुन और धूमिल की परंपरा के कवि हैं। वही कबीर सी फक्कड़ मस्ती और सच कहने का हुनर जो बड़ी साधना के बाद, जीवन के कटु यथार्थ से दो-दो हाथ करने के बाद हासिल होता है, अदम के शेरों में मिलती है। जनवादी कविता जन की कसौटी पर कसी जाने के बाद अपने-आपको प्रासंगिक और प्रमाणित करने के लिए जन के बीच में उतरती है, इसलिए समकालीन कविता में ‘अदम गोंडवी’ की लोकप्रियता उन्हें सच्चे अर्थों में जनकवि की पदवी प्रदान  करती है।
छंद के रूप में ग़ज़ल को अपना लेना आसान है लेकिन इसे साधना बोधा के शब्दों में ‘तरवारि की धारि पै धावनो’ है। हिन्दी में ग़ज़ल कहने की परंपरा भारतेन्दु ही से प्रारम्भ हो जाती है। हिन्दी के निराला जैसे बड़े कवि भी-
‘खुला भेद विजयी कहाए हुए जो,
लहू दूसरों का पिए जा रहे हैं।

    जैसी ग़ज़लें कहने से अपने आपको नहीं रोक पाए हैं। यह सिलसिला शमशेर और त्रिलोचन से होते हुए दुष्यंत तक पहुँचता है। दुष्यंत की ग़ज़लों से हिन्दी में ग़ज़ल को स्वीकृति मिल जाती है। ‘अदम गोंडवी’ ने दुष्यंत के विनम्र प्रतिरोध को धार और आक्रामकता के साथ व्यंग्य का जो दर्प दिया है, वह उन्हें हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार घोषित करता है। ‘‘एक ज़माना था जब आशिक और माशूक़ा की मुहब्बत भरी गुफ्तगू को ग़ज़ल कहा जाता था। हुस्न, इश्क और साकी-शराब की रसीली अभिव्यक्ति उसकी भाव-भूमि हुआ करती थी, जिससे परे जाकर दूसरी भाव-भूमि पर ग़ज़ल कहना ग़ज़लकारों के लिए दुस्साहस भरा कार्य हुआ करता था। ऐसी स्थिति में नई क्रांति की प्रस्तावना किसी भी कवि के लिए संभव नहीं थी। सच तो यह है कि ग़ज़ल के रूप में उसी कलाम को स्वीकार किया जाता था जो औरतों के हुस्न और जमाल की तारीफ करे। यहाँ तक कि जो हिन्दी की ग़ज़लें हुआ करती थीं उसमें उर्दू ग़ज़लों का व्यापक प्रभाव देखा जाता था। यही कारण था जब पहली बार शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार से उठकर ग़ज़ल रचना की तो डॉक्टर रामविलास शर्मा ने यह कहकर खारिज़ कर दिया कि ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है।” 1 ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें रामविलास शर्मा जी की उस बात को ही खारिज़ कर देती हैं।  क्योंकि ये ग़ज़लें कविता की उस प्रगतिशीलता की पराकाष्ठा को छूती हैं जिसे बड़े पैमाने का प्रगतिशील साहित्य अपनी प्रगतिशीलता की चादर ओढ़कर भी नहीं छू पाता। “किताबी माक्र्सवाद सिर्फ उन्हें आकृष्ट कर सकता है, जिनकी रुचि ज्ञान बटोरने और नया दिखने तक है। पर जो सचमुच बदलाव चाहते हैं और मौजूदा व्यवस्था से बुरी तरह तंग और परेशान हैं, वे अपने आस-पास के सामाजिक भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण के खिलाफ  लिखना ज़रूर चाहेंगे। वे सचमुच के सर्वहारा हैं, जिनके पास खोने को न ऊँची डिग्रियाँ और ओहदे हैं, न प्रतिष्ठित जीवन शैली। अदम इन्हीं धाराओं के शायर हैं।” 2 अदम किताबी माक्र्सवादी नहीं हैं, यह उन्होंने अपनी कविता और जीवन दोनों से सिद्ध किया है। विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मुक्तिबोध प्रभृति कवियों को भी पीछे छोड़ देती है। अदम का एक-एक शेर यथार्थवादी प्रगतिशील कविता की आबरू है। ग़ज़ल कहने की ज़मीन (मीटर और व्याकरण) होती है, लेकिन अदम ज़मीन (धरती) पर पाँव जमा कर ग़ज़ल कहते हैं शायद तभी उनकी ग़ज़लों का एक संग्रह ‘धरती की सतह पर’ नाम से प्रकाशित हुआ।
    ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें मनुष्य और यथार्थ के बीच के संबंध को बहुत सहजता से व्यक्त करती हैं। इन सहज सम्बन्धों को व्यक्त करने के लिए बड़े-बड़े दार्शनिकों और समाज शास्त्रियों को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है, लेकिन अदम का एक शेर इन्हें तरलता के साथ बेरोक-टोक हमारे हृदय पर तारी कर देता है। अदम बार-बार साहित्यकारों को ज़मीन की ओर लौटने के लिए कहते हैं-
अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ।
मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद तारों में ।।

    ग़ज़ल उर्दू का छंद है और जाहिरी तौर पर उर्दू से ही हिन्दी में दाखिल हुआ है। ‘ग़ज़ल एक संकेतात्मक कविता है। यह गागर में सागर भरने की कला है। ग़ज़ल के संक्षिप्त कलेवर में प्रतीकों के माध्यम से वह बात कही जा सकती है जिसके लिए एक लंबी नज़्म दरकार है। इस तरह कुछ निश्चित प्रतीकों की सीमा में बँधकर भी ग़ज़ल में व्यापकता है। प्रभाव ग़ज़ल का गुण विशेष है, क्योंकि प्रेम, समर्पण और करुणा ग़ज़ल की आत्मा है, इनकी अभिव्यक्ति के लिए कोमल, सरस शब्दों का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। शब्द केवल अर्थ के लिहाज से ही नहीं, ध्वनि में भी कोमल होने चाहिए। गीतात्मकता ग़ज़ल का प्राण है। शब्दों के सही रख-रखाव, बन्दिशों की चुस्ती, और अनुभूति के तीखेपन के साथ एक खास रंग होता है ग़ज़ल का, जिसके बिना ग़ज़ल निष्प्राण देह है। तग़ज़्जुल से शेर में जीवन का संचार होता है।”3 अदम ने ग़ज़ल की इस क्लासिक परिभाषा को तोड़ा ज़रूर है लेकिन ग़ज़ल उनकी ग़ज़लों में मौजूद है। उर्दू में ग़ज़ल शब्द की उत्पत्ति को ग़ज़ल से माना गया है जिसका अर्थ है प्रेमियों का आत्मीय वार्तालाप। अदम की ग़ज़लें गुफ्तगू  करती हैं लेकिन, महबूब से नहीं हाकिमों से, मुख्तारों से, पूँजीपतियों से और आततायी सत्ता से। उनकी ग़ज़ल यहाँ प्रतीकों और मुहावरों में तो शास्त्रीयता का निर्वाह करती है लेकिन लीक से हटकर तीखेपन के साथ! उर्दू की ग़ज़लगोई  की  ग़ज़ल बरकरार रखते हुए। वे हिन्दी की ग़्ाज़ल में दुष्यंत के उत्तराधिकारी बनकर आए थे। “दुष्यंत ने अपनी ग़्ाज़लों से शायरी की जिस नई ‘राजनीति’ की शुरुआत की थी, अदम ने उसे मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है जहाँ से एक-एक चीज बगैर किसी धुँधलके के पहचानी जा सके। यह शायरी, एक अर्थ में, सचमुच शायरी कम है सीधी बात कहीं अधिक है। इस रूप में यह एक ऐसी आपदधर्मी कला है, जो आग की लपटों के बीच धूँ-धूँ जलती बस्तियों को बचाने के लिए आगे आती है।”4
    नई भाषा, रचाव और मुहाविरेदानी के साथ ग़्ाज़ल की मुलायमियत को आक्रामक तेवर में तब्दील कर अदम हिन्दी ग़्ाज़ल परंपरा का विकास तो करते हैं लेकिन परंपरा भंजक बनकर। उसका अनुसरण करके नहीं। रवीन्द्र प्रभात हिन्दी और उर्दू ग़्ाज़ल की परंपरा में भेद करते हुए इस प्रकार टिप्पणी करते हैं-“उर्दू ग़्ाज़ल मुख्यतः प्रेम-भावनाओं का चित्रण है। अच्छी ग़्ाज़लें वही समझी जाती हैं, जिसमें इश्को-मुहब्बत की बातें सच्चाई के साथ लिखी जाएँ, जबकि हिन्दी ग़्ाज़लकार इस परिभाषा को नहीं मानते। इनका उर्दू ग़्ाज़लकारों से सैद्धान्तिक मतभेद है।’’ नचिकेता का मानना है कि ‘हिन्दी ग़्ाज़ल उर्दू ग़्ाज़लों की तरह न तो असम्बद्ध कविता है और न इसका मुख्य स्वर पलायनवादी है, इसका मिजाज समर्पणवादी भी नहीं हैं। ज़हीर कुरैशी का मानना है कि-‘हिन्दी प्रकृति की ग़्ाज़लें आम आदमी की जनवादी  अभिव्यक्ति हैं, जो सबसे पहले अपना पाठक तलाश करती हैं।’ जबकि ज्ञान प्रकाश विवेक का कहना है कि हिन्दी कवियों द्वारा लिखी जा रही ग़्ाज़ल में शराब का जिक्र नहीं होता, जिक्र होता है गंगाजल में धुले तुलसी के पत्तों का, पीपल की छाँव का, नीम के दर्द का, आम-आदमी की तकलीफों का। हिन्दी भाषा में लिखा जा रहा हर शेर जिंदगी का अक्स होता है। बहुत नज़दीक से महसूस किए गए दर्द की अभिव्यक्ति होता है।”5 लेकिन क्या इन परिभाषाओं से अदम की शायरी मेल खाती है? गंगाजल के विषय में वे क्या कहते हैं?-
गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है।
तिश्नगी को वोदका के आचमन तक ले चलो।।

    बगैर उर्दू की मुहाविरेदानी के गजल  कही जा सकती है। स्वयं अदम ने ही शुद्ध हिन्दी में ग़्ाज़लें कही हैं:-
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की।
ये समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की।।

    लेकिन, उनकी प्रभावी ग़्ाज़लें वही हैं जिनमें उर्दू गजल का लबो-लहज़ा है। यह बात और है कि उनकी भाषा क्लिष्ट नहीं होने पाती है। ‘प्रेमचंदी हिन्दुस्तानी’, जो गँवई-गँवार की, आम-अवाम की  भी भाषा है अपने रचाव और अनुभूति की तीव्रता से व्यंग्य की मारक क्षमता बढ़ाती है।
    ‘समय से मुठभेड़’ संग्रह में तिरसठ गजलें  हैं, चैदह कत्आत हैं और तीन लंबी नज़्में हैं-
(क)-हथियार उठा ले
(ख)-चमारों की गली, और
(ग)-गाँव का परिवेश
    सर्वप्रथम हम ग़्ाज़लों पर चर्चा करेंगे फिर क़त्आत और नज़्मों पर। ग़्ाज़लें प्रायः छोटी और मध्यम बहर की हैं। एक ग़्ाज़ल कुछ लंबी बहर की भी है-
कहीं फागुन की दिलकश शाम फाकों में गुजर जाए।
मेरा दावा है इसके हुस्न का जादू उतर जाए।।
तखय्युल में तेरे चेहरे का खाक़ा खींचने बैठे।
बड़़ी हैरत हुई जब अक्स रोटी के उभर आए।।

    किन्तु यह भी मध्यम बहर की ग़्ाज़ल ही कही जाएगी। लंबी बहर की ग़्ाज़लें उर्दू में फिराक, इकबाल जैसे शायरों  ने लिखी हैं। उदाहरण के लिए लंबी बहर का एक शेर द्रष्टव्य है-
मैं फासला हूँ मुझे मिटा दो कि मेरे मिटने से दिल मिलेंगे,
मैं जब तलक दरमियाँ रहूँगा न फस्ले-गुल में भी गुल खिलेंगे।
-फिराक गोरखपुरी

    अदम के यहाँ पहले तो व्यवस्था पर चोट है फिर श्रम की महत्ता है। किसान, मजदूर की पक्षधरता है। जनता (सर्वहारा) की शक्ति पर यकीन है क्योंकि वे प्रतिबद्ध माक्र्सवादी हैं। क्रांति करने के लिए वे हथियार उठाने तक के लिए तैयार हैं। सबसे मारक है व्यंग्य, जो तिलमिलाने पर मजबूर करता है। व्यंग्य इसलिए भी मजबूत है क्योंकि उनकी कर्मभूमि अवध है और मातृभाषा अवधी है। अवधीभाषी अच्छे व्यंग्य करते हैं क्योंकि अवधी भाषा अपने सामान्य वार्तालाप में ही व्यंग्यात्मक है। व्यंग्यात्मकता अदम के शेरों में चिंगारी की तरह व्याप्त है। उदाहरण के लिए कुछ शेर देखे जा सकते हैं-
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे,
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे।
    कुछ राजनैतिक और अत्यंत चर्चित व्यंग्यात्मक शेर-
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में।
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत,
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।

यथा
कोई भी सरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले,
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।

-संतोष अर्श
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित
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