रविवार, 21 दिसंबर 2014

एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल। मशरिकी फ़न में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल -3

गोंडा में  लोकसंघर्ष  पत्रिका के कार्यक्रम में हाथ में पीछे पत्रिका लिए है
‘सरयू पार की मोनालिसा’ में कला का एक अनूठापन है जो साधारण होकर भी असाधारण है। गोंडा के एक ग्रामीण परिवेश में ‘मोनालिसा’ की परिकल्पना कितनी सौंदर्यात्मक है और यही अदम की कला का उरूज है। ‘मोनालिसा’ की मुस्कान के पैमाने से दलित लड़की कृष्णा के सौंदर्य को मापने का यह तरीका कवि की कल्पना का उत्कर्ष है।
    ‘गाँव का परिवेश’ ‘समय से मुठभेड़’ की अंतिम रचना है। अड़तीस पदों की यह रचना गाँव के परिवेश के जीवंत चित्र खींचती है-
व्याख्या ये भ्रम में रखने का अनोखा दाँव है।
नर्क से बदतर तो अपने देश का हर गाँव है।।

    इस कविता की ये पंक्तियाँ भीम राव अंबेडकर की याद दिलाती हैं। उन्होंने भारतीय गाँवों को अमानुषिक कहकर दलितों को शहर की ओर जाने की बात कही थी। इस प्रकार इन तीनों नज्मों का रचाव अदम की ग़्ाज़लों का ही एक विस्तार है क्योंकि ग़ज़लों में बंदिश, विस्तारपूर्वक अपनी अनुभूति को ढालने का मौका नहीं देती यह नज्मों में ही संभव था।
कला पक्षः 
   गज़लगो का काम वकालत का पेशा होता है। मिसरे उला में वह अपनी दलील देता है और मिसरे सानी में उसकी वकालत करता है। इसे हिन्दी में हम तर्क और स्थापना के जरिए भी मोटे तौर पर समझ सकते हैं। ग़ज़ल मुहावरे से बात करती है जबकि हिन्दी की कविता बिम्बात्मक होती है। ग़्ाज़ल उर्दू की चीज है इसलिए उर्दू से दूर रहकर ग़्ाज़ल को नहीं पाया जा सकता। हिन्दी के कई ग़्ाज़लकार इसीलिए फ्लॉप हुए। अदम से पहले दुष्यंत ने भी इस बात को बखूबी समझा था और उनकी ग़ज़लगोई हिन्दी गज़ल के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। अदम दुष्यंत से और आगे गए हैं। उन्होंने न केवल उर्दू और बोलचाल की ‘हिन्दुस्तानी’ के मुहावरों को चुना है बल्कि क्लासिक उर्दू शायरी के प्रतीक भी अपनी गज़लों में इस्तेमाल किए हैं। उदाहरण के लिए‘यूसुफ और ‘जुलेखा’ प्रतीकों को लेते हैं। उर्दू गज़ल की परंपरा में इन प्रतीकों की भरमार है। इन का धार्मिक महत्व भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदम शेर कहते हैं-
सियासी बज़्म में अक्सर जुलेखा के इशारों पर,
हकीकत ये है यूसुफ आज भी नीलाम होता है।

    उर्दू के इन परंपरागत प्रतीकों के प्रयोग से शेर लाजवाब हो गया है इसलिए इन प्रतीकों के महत्व को रेखांकित करना भी अभीष्ट होगा- “यूसुफ पैगंबर याकूब के पुत्र थे। ये बहुत ही सुंदर, सुशील और गुणवान व्यक्ति थे। इन के सरल, सौम्य स्वभाव के कारण इन के पिता का इन पर विशेष स्नेह था। यह बात इनके भाइयों को न भाती थी। अतः उन्होंने षड्यंत्र किया और यूसुफ को अंधे कुएँ में धकेल दिया। पिता से आकर कह दिया कि यूसुफ को भेडि़या खा गया। याकूब पुत्र-वियोग में रो-रोकर अंधे हो गए। उधर राह चलते कुछ व्यापारियों ने यूसुफ को देख लिया और उन्हें अंधे कुएँ से बाहर निकाला। वे इन्हें अपने साथ मिस्र ले गए और वहाँ के बाजार में बेंच दिया। मिस्र के वजीर आज़म की पत्नी जुलेखा इनके रूप पर आसक्त हो गयी और जुलेखा के इशारे पर वजीर आज़म ने यूसुफ को खरीद लिया। मगर यूसुफ सदाचारी थे। जुलेखा द्वारा लगाए गए आरोपों को उन्होंने निराधार सिद्ध कर दिया। इससे यूसुफ को बहुत सम्मान मिला। मिस्र का बादशाह भी इन का बहुत आदर करने लगा। इन्होंने मिस्र की जनता की अकाल से रक्षा की। इनकी पैगम्बर के रूप में प्रतिष्ठा हुई। साहित्य में यूसुफ सौंदर्य और सदाचार का प्रतीक हैं। एक उदाहरण देखिए-
दामन उस यूसुफ का आया पुर्जे होकर हाथ में
उड़ गई सोने की चिडि़या रह गए पर हाथ में।

-आरजू लखनवी
प्रिय को यूसुफ भी कहा जाता है और उसके सौंदर्य की तुलना यूसुफ से की जाती है:-
यूसुफ से कोई क्योंकर उस माह को मिला दे,
है वक्त रात दिन का अजदीदा-ता-शुनीदा।

-”मीर तकी मीर”-8
सियासी बज़्म में अक्सर जुलेखा के इशारों पर,
हकीकत ये है यूसुफ आज भी नीलाम होता है।

    अदम के इस शेर में प्रतीक वही ईरानी गज़ल परंपरा के यूसुफ और जुलेखा हैं लेकिन यहाँ आकर उनके मानी बदल गए हैं। अदम के शेर में जुलेखा पूँजी का प्रतीक है और युसुफ सर्वहारा का। सत्य यह है राजनीति की महफिल में जुलेखा (पूँजी) के इशारों पर यूसुफ (सर्वहारा या जन) आज भी नीलाम होता है। उर्दू शायरी की परंपरा का एक ऐसा किरदार जो आध्यात्मिक प्रेम, प्रिय के सौंदर्य और सदाचार के लिए प्रयुक्त होता आया है, अदम ने उसे सर्वहारा के लिए प्रयोग करके मानों एक युग का अंत कर दूसरे युग का सूत्रपात किया हो।
    अदम की गज़लों की कलात्मकता सिर्फ भाषा, मुहावरों और शेर की रवानी के आधार पर नहीं आँकी जा सकती। शेर की गहराई की थाह उनकी बारीक निगाही से भी नापी जा सकती है। एक किसान के तजुर्बात प्रगतिशील कविता के लिए कितने उपयोगी हो सकते हैं अदम का यह शेर बताएगा-
बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई,
रमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चैपाल में।

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए,
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में।

    रमसुधी की झोंपड़ी का सरपंच की चैपाल में खो जाना उसी तरह की प्रक्रिया है जैसे जमींदारी उन्मूलन के दौरान प्रारम्भ की गई सीलिंग यानी ‘अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम’। इस कानून के तहत जिस किसी के भी पास साढ़े बारह एकड़ से अधिक कृषि योग्य भूमि थी, सरकार द्वारा उसका अधिग्रहण कर भूमिहीन किसानों में बाँट दिया जाता था। यह कानून 1960 ई॰ में आया था लेकिन इसके क्रियान्वयन में जो भ्रष्टाचार राजस्व कर्मियों और जमींदारों की साँठ-गाँठ से हुआ उसको नंगा करने के लिए अदम का यह शेर ही काफी है। यह वही दौर था जब जमींदारों ने गर्भ के बच्चों के नाम भी अपनी जमीनों के पट्टे करा दिए थे और भूमिहीनों को बकौल अदम पट्टे की सनद ताल (तालाब) में मिलती थी। वे उसमें खेती कर पाएँ तो करें नहीं तो कूदकर आत्महत्या कर लें। यह जो बात कहने का चुटीला और चमकता हुआ ढंग है यह अदम की ग़ज़ल का कलात्मक मेयार ऊँचा करता है। रमसुधी की झोंपड़ी के खोने का साक्षी जो बूढ़ा बरगद है वह माक्र्सवादियों का प्रिय प्रतीक है। यह मुक्तिबोध जैसे कवियों के यहाँ बार-बार आया है-
दीखता है सामने ही अंधकार-स्तूप-सा
भयंकर बरगद-
सभी उपेक्षितों, समस्त वंचितों,
गरीबों का वही घर, वही छत,
उसके ही तल-खोह-अँधेरे में सो रहे
गृहहीन कई प्राण।-

(‘अँधेरे में’-मुक्तिबोध)
    यह भी वही बरगद है, जो रमसुधी की झोंपड़ी के सरपंच की चैपाल में खोने का गवाह है।
    इसी तरह अदम ने कई शेरों में ‘नखाश’ शब्द का इस्तेमाल किया है। लखनऊ की विक्टोरिया रोड पर प्रत्येक रविवार को लगने वाली बाजार को ‘नखाश की बाजार’ कहा जाता है, जहाँ प्रत्येक वस्तु की सस्ती ‘सेकेंड हैंड’ उपलब्धता प्रसिद्ध है। अपने शेर में व्यंग्य की धार तेज करने के लिए ‘नखाश की बाजार’ को अदम इस तरह प्रयोग करते हैं-
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें।
संसद बदल गई है यहाँ की नखाश में।।

    ये अदम कीगज़लगोई की नायाब नजीर है। भाषा के भी विविध आयाम अदम की गज़लों में दिखते हैं। एक तरफ तो वे कहते हैं-
अर्ध तृप्ति उद्दाम वासना ये मानव जीवन का सच है।
धरती के इस खंडकाव्य पर विरह दग्ध उच्छ्वास लिखा है।

और दूसरी ओर-
बहरे बेकराँ में ताकयामत का सफर ठहरा।
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाये सफीने से।

    कोई भी उर्दू शायरी का पाठक यह नहीं कह सकता कि यह शेर उर्दू का नहीं है। यहाँ सफीने शब्द पर भी गौर करना होगा जो एक धार्मिक इस्लामी प्रतीक है और हिजरत से जुड़ा है। ऐसी भाषा हिन्दी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद को ही सधी थी। इसीलिए अदम बार-बार अपने शेरों में मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों के पात्रों को बुला लेते हैं। घीसू, होरी, धनिया, मंगल, गोबर के साथ-साथ एक स्थान पर रेणु का हीरामन भी आया है। उर्दू शायरी के तमाम प्रचलित अरबी, फारसी कचराही शब्द अदम ने जमकर प्रयोग किए हैं जैसे-
    रजअत, इलहाम, जदीद, इजारेदार, कुदूरत, नीलगूँ, जाफ़ाश, जद, शफ़क़त, गरानी,  पैहम, हैय्यत, रवायतआहनी, खुदसरी, तबीब, मरदूद, बेजार, फैसलाकुन, फसील, जाँफिशानी, लन्तरानी, सहकार, मर्तबा, इदारा, फर्द, कबा, शिगूफा, नीलोफर, रकाबी, बरहना, जिना, तमद्दुन, बहरे-बेकराँ, तख़य्युल, शीराजा, दहकान, गंदुम आदि। ये सभी शब्द क़स्बाई और कचराही मिठास रखते हैं।  इजाफत जो थोड़ी-बहुत अदम के शेरों में मिलती है वह उर्दू ग़्ाज़ल से प्रेरित है। बोलचाल के शब्दों और मुहावरों का निखरा हुआ रूप है। मुहावरे हिंदी और उर्दू  दोनों के खिले हैं जैसे-बापू  के बंदर, फैसलाकुन जंग, कल तलक, वक्त के सैलाब, साहिबे किरदार, आग का दरिया, ठंडा  चूल्हा, रँगीले शाह का हम्माम, आँख पर पट्टी, अक्ल पर ताला, तालिबे-शोहरत, जाए भाड़ में, खुदा  का वास्ता, शिगूफा उछालना, ढ़ोल पीटना, ढीला गरारा, तवज्जो दीजिए, जहन्नुम में, शीराजा बिखर जाए, दीगर नस्ल, गरीब की आह, रामनामी ओढ़कर आदि।
    ठेठ देहाती गँवई-गँवार, अवधी के मुहावरे भी मिलते हैं जैसे-पट्टे की सनद, खेतों में बेगार, दीवार फाँदने में (किसी की बहू-बेटी के प्रति बुरी निगाह या व्यभिचार सूचक), कुर्बोजवार, सोलह-उन्नीस, आक-थू आदि। अंतर इतना है कि मूल मुहावरों को ग़्ाज़ल की बंदिश के अनुसार थोड़ा-बहुत परिवर्तित कर लिया गया है। अंग्रेजी के शब्द भी कहीं-कहीं प्रयोग किए गए हैं मसलन-जजमेंट, रिकार्ड, ब्रेसरी, स्कॉच आदि। साहित्यकारों के नाम और उनके साहित्य के बारे में कसीदे के शेर भी अदम ने कहे हैं। अमृता प्रीतम और प्रेमचंद में उनकी अगाध श्रद्धा है। मंटो को भी उन्होंने अपने एक शेर में याद किया है। कहीं-कहीं व्यंग्य की बारंबारता मोनोटोनी (नीरसता) प्रकट करती है और रचनात्मक व्याकरण भी कभी-कभी बिखर जाता है। फिर भी बहर से खारिज होने के बाद भी शेर दहाड़ता रहता है।   
    निष्कर्ष यह कि भाषा और भाव के स्तर पर अदम की गज़लें संतुलित हैं जो ‘समय से मुठभेड़’ को  एक शाहकार कृति का दर्जा दिलाती हैं। क्रांतिधर्मा साहित्य उम्रदराज होता है। निश्चय ही अदम की शायरी आने वाली पीढ़ी की रहबरी को आकुल रहेगी। उनमें क्रांति और व्यवस्था को बदल डालने की जो बेचैनी है वह मिट्टी की महक से मह-मह महकती रहेगी। समाज के लिए उपयोगी कलावादी संस्कृति के विकास में अदम की शायरी धीरे-धीरे अपना अव्वल स्थान बनाएगी। क्योंकि बकौल अदम-
इसकी अस्मत वक्त के हाथों न नंगी हो सकी।
यूँ समझिए द्रौपदी की चीर है मेरी
गज़ल।।
संदर्भ- 1.प्रभात रवीन्द्र 2.सिंह विजय बहादुर, भूमिका, ‘समय से मुठभेड़’ वाणी प्रकाशन 2010 संस्करण पृष्ठ-9 3.नसीम कमल, उर्दू साहित्य कोष, वाणी प्रकाशन 1998 संस्करण पृष्ठ-114 4. सिंह विजय बहादुर, भूमिका, ‘समय से मुठभेड़’ वाणी प्रकाशन 2010 संस्करण, पृष्ठ-14 5. प्रभात रवीन्द्र, गद्यकोष 6.सिंह नामवर (संपादक) कला और साहित्य चिंतन कार्ल माक्र्स, राजकमल प्रकाशन 2010 संस्करण, पृष्ठ-124 7.नसीम कमल, उर्दू साहित्य कोष, वाणी प्रकाशन, 1998 संस्करण, पृष्ठ-90 8.वही, पृष्ठ-261, 262             मोबाइल: 09033510239
-संतोष अर्श
समाप्त
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

Moti Suthar ने कहा…

अच्छा लिखा है मेरा भी देखे http://gyankablog.blogspot.com/