गुरुवार, 7 जनवरी 2016

विश्वगुरु का सर्कस

विश्वगुरु की सवारी
नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकटरमण रामाकृष्णन ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस को सर्कस की संज्ञा दी और विज्ञान कांग्रेस में शामिल होने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, 'यह एक सर्कस था. मैंने पाया था कि यह ऐसी जगह है जहां साइंस पर ही बहुत कम बातचीत की गई. मैं अपने जीवन में दोबारा अब विज्ञान कांग्रेस कभी भी अटेंड नहीं करूंगा.'
              रामाकृष्णन को 2009 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में जीव विज्ञानी हैं
                  पिछली विज्ञान कांग्रेस में प्रधानमंत्री मोदी ने विज्ञान कांग्रेस को तर्क व बुद्धि से हटा कर भारतीय पौराणिक मिथकों से जोड़ने का काम किया था.उन्होंने कहा था कि उस समय अंगों का प्रत्यारोपण होता था। विमान में रिवर्स गियर होने, उनके दूसरे ग्रहों पर जाने जैसी तकनीक भारत में होने की बात भारतीय विज्ञान कांग्रेस में कही गई। गणेश और शिव का मिथक ईसा के बाद लिखे पुराण में वर्णित है. इस बार की विज्ञान कांग्रेस में शिव को सबसे बड़ा पर्यावरणविद घोषित करने का पेपर शामिल किया गया है.
एमपी प्राइवेट यूनिवर्सिटी रेग्युलेटरी कमिशन (भोपाल) के चेयरमैन अखिलेश के. पांडे का रिसर्च पेपर है। इस पेपर के मुताबिक शिव ने बहुत पहले ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे दिया था। इस पेपर के अंत में लिखा गया है, ‘यह बताता है कि प्राचीन भारतीय पारिस्थितिकी के प्रति काफी सचेत थे।’
        हम अपना दंभी स्वभाव नहीं छोड़ पा रहे हैं. हम अपने को विश्व गुरु का खिताब स्वयं देकर बहुत खुश होते हैं लेकिन वस्तुस्तिथि यह है कि बैलगाड़ी की एक बैरिंग का निर्माण हम नहीं कर पाए थे. बैलगाड़ी के डनलफ बनने की प्रक्रिया में बैरिंग की खोज दूसरे देशों में ही हुयी थी.
                 इस तरह नागपुर मुख्यालय और उसके कर्ता-धर्ता पौराणिक मिथकों को सत्य साबित करने और उसे इतिहास से जोड़ने का  जो प्रयास कर रहे हैं उसका असर विज्ञान व इतिहास की संस्थाओं पर पड़ रहा है. वैज्ञानिक चेतना का अभाव नई पीढ़ी पर बुरा असर डालेगी. आज जरूरत इस बात की है कि विज्ञान, इतिहास, भूगोल के अध्यापन में एकरूपता लायी जाये. यह बंद करना होगा कि साहित्य में गंगा शिव की जटाओं से निकली है और भूगोल में यह पढ़ाया जाए की गंगा गंगोत्री से निकली है. हमारे छात्र इसी भ्रम में रहेंगे की गंगा गंगोत्री से निकलना सही है या शिव की जटा से. नीति निर्धारकों को इस तरह के बहुत से सवालों को तय करना होगा. 

सुमन 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-01-2016) को "जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी" (चर्चा अंक-2216) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'