रविवार, 17 जुलाई 2016

गाँव समाप्त होना ---किसान समाप्त

सुप्रसिद्ध साहित्यकार शिवमूर्ति
बाराबंकी। पहले बडे़ आदमी शेर, हिरन, चीता, भालू आदि का शिकार करते थे और अब वहीं लोग कारपोरेट सेक्टर बनकर आदमियों का शिकार करते है। शिकार का स्वरूप बदला है आदमी को मजबूर किया जा रहा है कि वो स्वयं हत्या कर ले। आज किसान इस व्यवस्था का शिकार है और इसी लिए वो आत्महत्या करने के लिए मजबूर है।
    यह बात लोक संघर्ष पत्रिका के किसान अंक को प्रसारित करते हुए हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा कि तेली, नाई, भड़भुजें व्यवस्था का शिकार होकर गांव से पलायन कर रहे है। किसानों को जब तक उनकी फसलों का लाभकारी मूल्य नहीं दिया जाता है तब तक गांवों को बचाया नहीं जा सकता है। गांव समाप्त होने का मतलब किसान की समाप्ति है।
    उत्तर प्रदेश किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश त्रिपाठी ने कहा कि प्रेम चन्द्र लिखा है कि किसान कर्र्जे में पैदा होता है, कर्जे में ही जिन्दगी गुजारता हैं और कर्जे में ही मर जाता है। किसान के पक्ष में पूंजीवादी नेताओं ने यह किया है कि किसान कर्जे में पैदा हो, कर्जे में ही जिन्दगी जिये और कर्जा न अदा होने पर आत्महत्या करले। श्री त्रिपाठी ने कहा कि स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू की जाये तथा किसानों को दस हजार रूपये मासिक पेंशन दी जाये।
    इस अवसर पर डा0 अशोक गुलशन, श्याम सुन्दर दीक्षित, अजय सिंह, डा0 कौसर हुसैन, बृजमोहन वर्मा ने सम्बोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता छिब्बन रिजवी तथा कार्यक्रम का संचालन रणधीर सिंह सुमन ने किया। इस अवसर पर विनय दास, अम्बरीश अम्बर, जियालाल, डा0 उमेश चन्द्र वर्मा, दलसिंगार, गिरीश चन्द्र, नीरज वर्मा, सत्येन्द्र यादव, पुष्पेन्द्र सिंह, विनय कुमार सिंह, राजेन्द्र सिंह, मुनेश्वर वर्मा सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।

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