गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

श्री राम पुनियानी से लम्बा साक्षात्कार

राम पुनियानी से संवाद-1
राम पुनियानी के बारे में हम क्या जानते हैं
नासिरूद्दीन
यह हमारे मुल्क की आजादी की उम्र से लगभग दो साल बड़े हैं। हमारी आजादी मुल्क के बंटवारे के साथ आई थी। आज के मुताबिक, यह बंटवारे की सीमा की दूसरी तरफ के रहने वाले हैं। जाहिर है, इनके और इनके परिवारजनों के पास बंटवारे की अनेक कहानियां कहने को हैं लेकिन ये कहानियां दूसरे समुदाय के बारे में नफरत की कहानियों में कभी तब्दील नहीं हुईं। ...और अब तो यह शख्स अमन के दूत बन गए है। जिस उम्र में ज्यादातर मध्यमवर्गीय नौकरी पेशा लोग रिटायर होने के बाद आराम की पारिवारिक जिंदगी गुजारते हैं, इन्होंने एक अलग ही रास्ता अख्तियार किया। वह अब देश के दूर-दराज इलाकों में घूम-घूम कर अपने खास ‘अमन कथा’ के जरिए नफरत फैलाने वाली बातों, भ्रम, भ्रांतियों को दूर करने और लोगों को इसकी राजनीति की सच्चाई से रूबरू कराने का काम कर रहे हैं।
कुछ महीने पहले वे जन जागरण शक्ति संगठन (जेजेएसएस) के बुलावे पर बिहार के उत्तर पूर्वी हिस्से में अमन कथा के लिए गए थे। तीन दिनों में वे दर्शकों के तीन अलग-अलग समूहों से मुखातिब हुए। इनमें आम जन महिला और पुरुष थे। विद्यार्थी और टीचर थे। पढ़े-लिखे थे। जो किन्हीं वजहों से पढ़ नहीं पाए, वे भी अच्छी तादाद में थे। इन्होंने पूरे दिन की दो कार्यशालाएं की और एक आम सभा भी। इस दौरान वे कभी थके नहीं मिले। हमेशा लोगों से संवाद और उनकी जिज्ञासाएं दूर करने को तैयार दिखे। टेढ़े से टेढ़े सवालों का जवाब बिना किसी उत्तेजना के शालिनता के साथ तार्किक तरीके से देने की कोशिश की। जैसा सुनने वाले, वैसी ही उनके तर्क के तथ्यक होते। नतीजतन, अपने संवाद कौशल की बदौलत वे बहुत जल्दी सुनने वालों के जहन में अपने विचारों के लिए जगह बना लेते हैं। 
जी, ये प्रोफेसर (डॉक्टर) राम पुनियानी हैं। हमारे दौर के सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय कुछ लोगों में से एक अहम शख्सीयत। इनसे हम सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर आसानी से  बात कर सकते हैं। इनकी दिलचस्पी और जानकारी का दायरा काफी बड़ा है। बिहार की यात्रा के दौरान उनसे बात हुई। फिर मैंने उनके सामने सवालों की लम्बी फेहरिस्त रख दी। उन्होंने सभी सवालों का बहुत ध्यान से जवाब दिया है। हम इस लम्बे इंटरव्यू को चार हिस्सों में बांट कर पेश करेंगे। इसके जरिए हम न सिर्फ उनके मौजूदा काम को जानने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि उनके यहां तक के सफर को देखने जानने की भी कोशिश होगी।
राम पुनियानी के बारे में आप क्या जानते हैं
आमतौर पर हम सामाजिक कार्यकर्ताओं की निजी जिंदगी के बारे में बहुत कम जानते हैं। उनकी भी अपनी यात्रा होती है। आप अपने बारे में बताइए ताकि हमें आपका सफर पता चले। जैसे- आप लोग कहां के रहने वाले हैं?
मेरी पैदाइश 25 अगस्त 1945 की है। हमारा पुश्तैनी इलाका अब पाकिस्तान में है। आप कह सकते हैं, मैं एक रिफ्यूजी खानदान में पैदा हुआ। 1947 में मेरे घरवाले पंजाब के झंग इलाके से आए थे। वहां से आने के बाद हमारे परिवार ने नागपुर में ठिकाना बनाया। घर का गुजर-बसर चलाने के लिए मेरे पिता को लम्बे अरसे तक कड़ी मेहनत-मशक्कत करनी पड़ी। हमारा संयुक्त परिवार था। इसके फायदे भी थे और परेशानियां भी। हम सब बहुत ही लाड़-प्यार वाले माहौल में पले-बढ़े। हमारा बिजनेस था और बचपन में हम बिजनेस में पिता जी का हाथ बंटाते थे। 
देश के बंटवारे का जिंदगी और मुसलमानों के साथ रिश्ते पर कोई असर पड़ा? बचपन के उस दौर के बारे में कुछ और बताइए?
बचपन की कुछ बातों की छाप आज भी मेरे जेहन में पैबस्त  है। एक बात तो यह कि हालांकि हम पाकिस्तान से आए थे लेकिन उसके बारे में बहुत बातें नहीं होती थीं। उस वक्त जिंदगी की जद्दोजहद ही घर की मुख्य चिंता थी। बंटवारे की तकलीफदेह बातें कई बार गुस्से की वजह बनती थीं। कई नजदीकी रिश्तेतदारों के लिए भी यह खौफनाक था। हालांकि, इसकी वजह से मुसलमानों के लिए किसी तरह की दुश्मनी का ख्याल नहीं पनपा। बाद में कई मुसलमान मेरे अच्छे दोस्त, बने। मेडिकल कॉलेज के दिनों में मेरा एक गहरा दोस्त मुसलमान था। वह मेरी मां का भी बहुत दुलारा था।
शुरुआती जद्दोजेहद के दिनों में हमारे पड़ोसी हिन्दू थे। इसके बावजूद उनका हमसे बहुत मेलजोल नहीं था। हालांकि, बाद के दिनों में उनसे हमारा काफी अच्छा रिश्ता बन गया। मेरे घरवाले धार्मिक रुझान के थे। रामलीला का हमें बेसब्री से इंतजार रहता था। इसमें हम बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे। दीवाली और दूसरे त्यौहार भी हम काफी धूमधाम से मनाते थे।
सामाजिक मुद्दों की तरफ रुझान कैसे और कब हुआ?
मैं स्कूल में पढ़ने में अच्छा था। इसी दौरान मुझे अलग-अलग साहित्य से रूबरू होने का भी मौका मिला। मेरे चाचा ने काफी कम उम्र में मुझे अखबार भी पढ़ने की आदत लगवा दी थी। मुझे महान लोगों की जीवनियां पढ़ना पसंद था। हम सब भाई और हमारे चाचा दुकान पर बैठते थे। यही हमारी पढ़ाई की जगह भी थी। यहां से हम समाज को काफी नजदीक से देख रहे थे। स्कूल जाते वक्त हम ऐसे मोहल्लों से गुजरते थे, जहां के रहने वाले काफी गरीब थे। हमारे पास किताब या ऐसी दूसरी सुविधाएं बहुत नहीं थी लेकिन ये हमारी पढ़ाई के रास्ते में बाधा नहीं बन पाईं।
धीरे-धीरे सामाजिक मुद्दे, मेरी सोचने की प्रक्रिया में जगह बनाने लगे। मैं अपनी छुट्टियां दुकान पर काम करने और हिन्दी साहित्य पढ़ने में बिताता था। पढ़ने की ये आदत, जुनून में तब्दील हो गई। धीरे-धीरे सामाजिक मुद्दों के बारे में समझदारी की परतें खुलने लगीं। मुझे स्कूल में डिबेट कम्पीटिशन में भाग लेना अच्छा लगता था। इसके लिए भी मुझे पढ़ना पड़ता था। इसने भी समाज को समझने में काफी मदद की। 
कॉलेज तक पहुंचते-पहुंचते मैंने सोचा कि अपना ज्यादा वक्त् सामाजिक मुद्दों में लगाऊंगा। कॉलेज ने मुझे अपना नजरिया व्यापक करने का और मौका दिया। कॉलेज की लाइब्रेरी तो मैं इस्तेमाल करता ही था, मैं एक और पब्लिक लाइब्रेरी का भी सदस्य् बन गया। यहां मुझे हिन्दी साहित्य के अलावा अपनी दिलचस्बीह की और जरूरी किताबें भी मिल जाया करती थीं। इसी बीच कॉलेज की पढ़ाई के अलावा मैंने हिन्दी में विशारद के इम्तेहान की भी तैयारी करनी शुरू की।
मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने के साथ ही साथ, मैंने अलग-अलग धर्मों के दर्शन की पढ़ाई करने का भी विचार किया। मेरे जहन में सवाल था कि आखिर क्यों लोग उसी धर्म के बारे में सोचते हैं और अपना ध्यान लगाते हैं, जिस धर्म में वे पैदा हुए हैं। इनके जवाब आसान नहीं थे। मैं अलग-अलग धर्मों की कुछ आमफहम किताबों में अपने सवालों के जवाब तलाशने लगा। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि ‘इंसानीयत ही सबसे अच्छा धर्म है’। इसी के साथ-साथ मुझे लगा कि हमारे समाज को सामाजिक काम करने वालों की जरूरत है। मैंने मिशनरी बनकर किसी दूर-दराज के इलाके में काम करने का ख्वाब देखना शुरू कर दिया। अफ्रीका में काम कर रहे एक डॉक्टर अल्बर्ट श्विसटर की जिंदगी मेरे लिए प्रेरणा बन गई।
आपके इस ख्वाब के वैचारिक प्रक्रिया क्या रही?
मुझे लगने लगा कि दुनिया को एक वैश्विक सरकार की जरूरत है। मुझे इस विचार को आगे बढ़ाने के लिए और इस तरह की संस्था के विकास के लिए काम करना चाहिए। इस बीच मैं गरीबी और इसे खत्म करने के उपायों के बारे में ज्यादा सोचने लगा था। संयोग से अमरीकी राजदूत चेस्टिर बॉवेल्स की किताब मेरे हाथ लग गई। इसमें साम्य वाद के बारे में एक चैप्टर था। इसने मुझ पर जादू सा असर किया। मैं ऐसे साम्यवादी समाज के विचार से रोमांचित था, जहां लोगों को जीने की जरूरी चीजों के लिए परेशान नहीं होना पड़ता है।
इस तरह मार्क्सवाद, लेनिनवाद, अस्तित्वोवाद और अन्य सामाजिक दर्शनों के बारे में पढ़ने के लम्बे सफर की शुरुआत हुई। इसकी वजह से मैं इस नतीजे पर भी पहुंचा कि जिस समाज की जड़ों में लोकतंत्र है- भले ही वह लोकतंत्र शुरुआती दौर में ही क्यों न हो- वहां साम्यवादी क्रांति मुमकिन नहीं है। इसलिए सामाजिक आंदोलनों के जरिए ही समाज बदल सकता है। यह बदलाव, रोजमर्रा की जिंदगी में इज्जत और अधिकार के लिए संघर्षों के जरिए ही आएगा। मैं इस नतीजे पर भी पहुंचा कि सामाजिक आंदोलनों के खड़े होने और इसके विस्तार के लिए भी लोकतंत्र का होना जरूरी है। 
बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुझे लगा कि साम्प्रदायिकता, समाज से लोकतंत्र लोकतंत्र ही खत्म करने में लगी है। इसीलिए इसे रोकना निहायत जरूरी है। यह जरूरत मुझे भारत में साम्प्रदायिकता के बारे में पढ़ने और समझने के रास्ते पर ले गई। जब यह अध्ययन मैंने शुरू किया तो इसके साथ ही जाति, जेण्डर जैसे मुद्दे भी सामने आए। साम्प्रदायिकता के खतरे और उसकी प्रकृति के बारे में अपनी समझ मजबूत करने और भारतीय इतिहास, खासकर मध्य कालीन और आधुनिक भारत के इतिहास को समझने में भारतीय इतिहासकारों के काम ने मेरी काफी मदद की। भारत में फिरका परस्ती के बारे में असगर अली इंजीनियर के विस्तृत और महत्वपूर्ण काम का मेरी समझदारी बनाने में बड़ा योगदान रहा।
आईआईटी-मुंबई में नौकरी के दौरान मुझे अपने काम में काफी मदद मिली। मैंने 1976 में बतौर डॉक्टर आईआईटी ज्वाइन किया। बाद में मैं बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में पढ़ाने लगा। साम्प्रदायिकता के बारे में समझने और विचार बनाने की जद्दोजेहद मुख्यतः आईआईटी में रहने के दौरान ही हुई।
यह प्रक्रिया सोच के स्तर पर ही रही या आपने सक्रिय रूप से सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में भी हिस्सा लिया?
बचपन से ही मेरे आसपास रहने वाले समुदायों की जिंदगी ने मुझ पर काफी असर डाला था। उनकी गुरबत ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। मेरे पढ़ने की आदत और अलग-अलग विचारधाराओं की पड़ताल ने इसमें और मजबूती पैदा की। सत्तर के दशक में छात्र-युवा आंदोलनों के इर्द-गिर्द बड़े पैमाने पर जन उभार हुआ। इसने सामाजिक काम को और गंभीरता से लेने की चिंगारी पैदा की। आगे चलकर जब मजदूर आंदोलन में सक्रिय हुआ तो मजदूरों की जिंदगी ने सामाजिक जीवन के कई रूप से परिचय कराया। इस बीच मैं मेडिकल कॉलेज नागपुर में पढ़ाने लगा। मजदूर संगठन में पूरा वक्त कार्यकर्ता के रूप में काम करने के लिए मैंने 1973 में नौकरी छोड़ दी। इसके बाद अपने दिवंगत दोस्त प्रफुल बिदवई की सलाह पर मैंने 1976 की शुरुआत में मुंबई आने का फैसला किया। यह फैसला इसलिए था ताकि मैं मजदूरों के आंदोलन में ज्यादा गंभीरता और सक्रियता से हिस्सा ले सकूं। मैंने 1973 से 1976 तक पहले नागपुर और फिर मुंबई में पूरावक्त कार्यकर्ता के तौर पर काम किया। इस दौरान मजदूर संगठन में काम करने के अलावा मैंने समाजवादी आंदोलन के बारे में और पढ़ना शुरू किया। नतीजतन, समाज के बारे में मेरी समझदारी लगातार मंथन के प्रक्रिया से गुजरती रही। आईआईटी से जुड़ने के बाद मैंने मजूदर संगठन के काम और अपनी नौकरी को साथ-साथ लेकर चलने की कोशिश की।
नौकरी छोड़कर पूरा वक्त सामाजिक काम में लगाने का ख्याल कब और कैसे आया?
मैंने सबसे पहले 1973 में नौकरी छोड़ी थी। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, मैंने तय कर लिया कि अब साम्प्रदायिकता के खतरे से लड़ने में अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त लगाऊंगा। हालांकि मैंने इससे पहले भी यह सोचा था कि जैसे ही मेरे परिवार की हालत थोड़ी बेहतर हो जाएगी, बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे और मैं कुछ पैसा बचा लूंगा तो सामाजिक कामों में पूरा वक्त देने के लिए नौकरी छोड़ दूंगा। जैसे-जैसे साम्प्र दायिकता विरोधी कामों में मेरी सक्रियता बढ़ती गई, नौकरी छोड़ कर सामाजिक काम करने का हौसला मजबूत होता गया। सामाजिक कामों में अपने को लगाए रखने के लिए जरूरी बचत मैंने तब तक कर ली थी। इसलिए इस बार नौकरी छोड़ने का फैसला थोड़ा सोचा-समझा था।
अमन कथा यानी नफरत के खिलाफ सच का सफर
आमतौर पर प्रवचन साधु-संत, धार्मिक लोग करते हैं। इसका दायरा भी मजहबी होता है। तो आपको ‘अमन कथा’ पर आधापरित प्रवचन का तरीका अपनाने का ख्याल कैसे आया?
जब मैं साम्प्रदायिकता विरोधी काम में सक्रिय हुआ तो दिन पर दिन मुझे यह साफ होने लगा कि साम्प्रदायिक हिंसा समाज में फैली नफरत की देन है। इस नफरत का आधार साम्प्रादायिक ताकतों द्वारा इतिहास की गलत व्याख्या और मौजूदा समय की विकृत प्रस्तुति है। मैं इससे मुकाबला करना चाहता था। मैंने साम्प्रदायिकता की समस्या पर अलग-अलग पर्चे लिखने शुरू किए। जैसे-सच बनाम मिथक। मैंने इस थीम पर भारतीय इतिहास के बारे में लिखा। यह नामचीन भारतीय इतिहासकारों के काम के आधार पर तैयार किया गया था।
इसके बाद मैंने कार्टून और तस्वीरों के जरिए लोकप्रिय किताबें लिखने के बारे में सोचा। यह विचार बाद में सम्प्रदायवाद और आतंकवाद पर ग्राफिक नॉवेल के रूप में सामने आया। मेरे दोस्त। शरद शर्मा ने मेरे शब्दों को इलेस्ट्रेशन और ग्राफिक के साथ पेश किया है।
यह सब करते हुए मैं ऐसे तरीके आजमाने की कोशिश में लगा था जिससे इतिहास की सच्चाई और एक समुदाय के बारे में बनी-बनाई छवि (स्टीरियोटाइप) की हकीकत दूसरे समुदाय तक पहुंचाई जा सके। एक बार मेरी बिल्डिंग के एक गार्ड ने मुझसे पढ़ने के लिए कुछ किताबें मांगीं। मेरे सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। ज्यादातर किताबें आमजन के लिए नहीं थी, जिन्हें कोई औसत शख्स  पढ़कर आसानी से समझ सके। तब मुझे हनुमान चालिसा जैसी छोटी पॉकेट बुक का ख्याल आया। ये किताबें आसानी से पढ़ी और पॉकेट में रखी जा सकती हैं। यहीं से अमन- कथा का विचार आकार लेने लगा। लोगों के अलग-अलग समूहों से बात करते हुए, मैं उनके बराबर जाकर सीधे संवाद करने की कोशिश करने लगा। प्रवचन का जो प्रचलित तरीका है, उसमें धार्मिक लोग संवाद का तरीका नहीं अपनाते हैं। अपनी बातचीत के दौरान मैंने ज्यादा से ज्यादा दोतरफा संवाद का तरीका अपनाने की कोशिश की ताकि लोगों की दिलचस्बीह बनी रहे। मेरी कोशिश होती कि किसी मुद्दे पर इस संवाद के जरिए ही बातचीत चलती रहे। मैंने देखा कि लोगों को यह तरीका अच्छा लगा और वे बातचीत के दौरान सजग भागीदार बने रहे।
अमन कथा के जरिए आप किन मुद्दों पर बात करते हैं?
अमन कथा का मकसद है, लोग खुद सोचें। जो दिख रहा है या बताया जा रहा है, लोग उससे अलग हट कर देखें। जो दिख रहा है या जो कहा या बताया जा रहा है, जरूरी नहीं कि वह हकीकत या सच ही हो- इस कथा का असली मकसद यही है। मेरी कोशिश होती है कि लोगों को सच के सफर तक ले जाने के लिए मैं कथा की शुरुआत उनसे सवाल पूछ कर करूं। मैं जानने की कोशिश करता हूं कि समाज में फैले ढेर सारे मिथकों, स्टींरियोटाइप और पूर्वग्रहों से जुड़े मुद्दों के बारे में वे क्या  सोचते हैं।
लोगों की इतिहास के बारे में क्या राय है। मंदिरों को तोड़ा जाना, जबरन धर्म परिवर्तन, मुसलमान राजाओं के अत्याचार, मुसलमानों के परिवार का आकार, भारत के बंटवारे की त्रासदी, गांधी की हत्या क्यों  हुई, कश्मीर से जुड़े मुद्दे क्या हैं और आतंकवाद क्यों  है या इन जैसे मुद्दे पर लोगों की सोच क्या है। मीटिंगों में इनमें से कई विषय दर्शक ही उठा देते हैं। मैं विचार-विमर्श को ऐसी शक्ल  देने की कोशिश करता हूं, जिसमें दर्शक भी बराबर का भागीदार बना रहे और विमर्श को आगे बढ़ाए ताकि  बातचीत एक पूरी शक्ल अख्तियार कर सके। आमतौर पर मीटिंग इस चर्चा के साथ खत्म होती है कि भविष्य  में क्या किया जाए ताकि देश के सभी लोगों की जिंदगी में अमन, खुशहाली आए और सभी को सम्मान हासिल हो।

राम पुनियानी से संवाद-2
आज वे ही देशभक्ति का नारा सबसे जोर से उछाल रहे हैं, जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में शामिल नहीं रहे
देश के मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक हालात के बारे में आपके क्या विचार हैं?
मोदी सरकार के आने के बाद पिछले कुछ सालों में राजनीतिक हालात और बिगड़े हैं। भाजपा के नेतृत्व  वाली एनडीए के सत्ता में आने और भाजपा को अपने बलबूते मिली बहुमत के बाद इससे जुड़े संगठन और संघ परिवार काफी सक्रिय हो गए हैं। अल्पसंख्यकों और उनसे वैचारिक रूप से मतभेद रखने वालों के खिलाफ तरह-तरह के बयान दिए जा रहे हैं। चुनाव के दौरान किए गए लम्बे  चौड़े वादे हवा हो गए हैं। खराब होती आर्थिक हालत, रोजगार के नए मौके पैदा न होने और जन विरोधी नीतियों की वजह से लोगों में जबरदस्त असंतोष है।
अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है। पांसारे, डाभोलकर, कलबुर्गी जैसे बुद्धिजीवियों की हत्याएं कर दी गईं। ...और कई प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, जैसे- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विद्वानों, पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। विश्व विद्यालयों की स्वायत्तता को खत्म  किया जा रहा है। हमारे चारों ओर, गोमांस, लव जिहाद, घर वापसी जैसे मुद्दे छाए हुए हैं। यही नहीं, एक-एक कर विश्ववविद्यालयों पर हमले किए जा रहे हैं। एफटीआईआई से इसकी शुरुआत हुई। इसके बाद आईआईटी मद्रास, जेएनयू और एचसीयू की स्वायत्तता को कुंद करने की कोशिश हुई ताकि बेखौफ सोचने वालों को काबू में किया जा सके और शैक्षणिक संस्थानों में आरएसएस के विचार को थोपा और संघ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को स्थापित किया जा सके।  इन सभी जगहों पर खास तरह का तरीका देखने को मिल रहा है। प्रगतिशील छात्र संगठनों के खिलाफ एबीवीपी शिकायत दर्ज कराती है। इस शिकायत पर स्थानीय भाजपा नेता हंगामा करते हैं और विश्वविद्यालयों पर प्रगतिशील छात्र संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव डालते हैं। एफटीआईआई की हड़ताल को तोड़ना या जेएनयू, एचसीयू पर हमला, इसके जीते-जागते उदाहरण हैं।
इसके साथ ही राष्ट्रवाद और देशभक्ति के इर्दगिर्द नए भावनात्मक मुद्दे भी खड़े किए जा रहे हैं। ‘भारत माता की जय’ बोलने को किसी की देशभक्ति सिद्ध करने का पैमाना बनाने की कोशिश, हिन्दुत्व राजनीति और हिन्दू राष्ट्रवाद के बढ़ते प्रभुत्व  का संकेत है। लगातार ऐसी घटनाएं देखने में आ रही हैं जब लोकतांत्रिक माहौल को खत्म करने के लिए ऐसे मुद्दों का इस्तेमाल किया गया। साध्वी, साक्षी, योगी और कैलाश विजयवर्गीय जैसे लोग इन सबमें अगुआ हैं। हालांकि कुछ लोगों के लिए यह हाशिए पर हैं, लेकिन वे बार-बार साबित कर रहे हैं कि वे ही हिन्दू राष्ट्रवाद के असली चेहरे हैं।
साम्प्रादायिकता और धर्मनिरपेक्षता हाल के दिनों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में हैं। क्या ये महज शब्द हैं या कुछ और?
धर्म के नाम पर दकियानूसी और संकीर्णतावादी विचार की पैरवी के लिए साम्प्रादायिकता शब्दो का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी ओर, हमारे संविधान की रूह में पैबस्त बहुलतावादी मूल्यों  की हिफाजत की कोशिश धर्मनिरपेक्षता है। इन शब्दों का गहरा वैचारिक अर्थ है। ये शब्द  अलग-अलग सामाजिक समूहों के राजनीतिक एजेण्डों और मकसद को बताते हैं।
राम मंदिर, शाहबानो केस, लव जिहाद, घर वापसी जैसे बांटने वाले मुद्दों के जरिए साम्प्रदायिकता ने अपनी जड़ें मजबूत की हैं। यह साम्प्रदायिक राजनीति, इस संकीर्ण समझदारी पर आधारित है कि एक धर्म के लोग ही एक राष्ट्र बनते हैं।  इस विचारधारा ने दूसरे धर्म के लोगों के प्रति नफरत फैलाई है। यह विचार दूसरे के प्रति नफरत और हिंसा की वजह बनती है। नतीजतन, समुदाय धार्मिक आधार पर अलग-अलग समूहों में बंट जाते हैं। इन सब में बेगुनाह पिसते हैं। यह मौजूदा समाज का बड़ा रुझान बनता जा रहा है।
दूसरी ओर, धर्मनिरपेक्षता वह विचारधारा है जहां राज्य या सरकार किसी धर्म से रहनुमाई या निर्देशित नहीं होती है। जहां राज्य  धार्मिक बहुलता की इज्जत करता है। बहुलतावादी मूल्यों  को बरकरार रखता है। इसीलिए, साम्प्रदायिकता के विचार को मानने वाले सामाजिक समूह, धर्मनिरपेक्ष विचारों और ऐसे मूल्यों की राजनीति करने वालों पर हमले करते हैं।
अभी राष्ट्र, देशभक्ति पर काफी बहस हो रही है। आज तो राष्ट्रो के कई विचार सुनने को मिलते हैं। वैसे राष्ट्र का विचार क्या है?
जी हां, राष्ट्र  और देशभक्ति के विचार को भावनात्माक मुद्दे के रूप में उछाला जा रहा है। इन मुद्दों के इर्दगिर्द दीवानगी पैदा की जा रही है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) पर हमले के बाद लगातार ऐसी चीजें देखने में आ रही हैं। देखा जाए तो राष्ट्र एक आधुनिक अवधारणा है। यानी एक खास भौगोलिक इलाके में रहने वाले लोग जब बेहतर समाज बनाने के लिए जब एक खास मकसद को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ आते हैं तब राष्ट्र बनता है। दूसरी ओर देशभक्ति राष्ट्र  राज्य के प्रति वफादारी का नाम है। इसकी भावना लोगों में पैदा की जाती है। देशभक्ति के पैमाने में कोई एकरूपता नहीं है। संयोग से आज जो सबसे ज्यादा जोर से देशभक्ति का नारा उछाल रहे हैं, ये वही हैं जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया से पूरी तरह अलग रहे हैं। औपनिवेशिक दौर में भारत धीरे-धीरे राष्ट्र  के रूप में तब्दील हुआ। उससे पहले तो हमारे यहां राजशाही थी। राजा और प्रजा की व्यवस्था जन्मआधारित थी। यह व्यवस्था, राजनीतिक, सामाजिक और जेण्डर गैरबराबरी पर आधारित थी।
जब यह इलाका ब्रितानी उपनिवेश का हिस्सा  बना तो साथ ही साथ आधुनिक उद्योग और शिक्षा बढ़ी। समाज में उद्योगपतियों, मजदूरों, आधुनिक शिक्षित लोगों का नया समूह पैदा हुआ। ये सभी वर्ग स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचार पर आधारित भारतीय राष्ट्र  के वास्ते औपनिवेशिक ताकत के खिलाफ संघर्ष के लिए एक साथ आए।
जमीदारों, राजाओं और ऊंची जातियों के रूप में पुराने वर्गों ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचार वाले इस नए उभार को अपने सामाजिक दबदबे के खिलाफ चुनौती के रूप में देखा और इसका विरोध किया। ये एकजुट हुए और राष्ट्रवाद के नाम पर अपने-अपने धर्मों का चोला ओढ़ लिया। इन्होंने सामंती दौर की प्रथाओं और मूल्यों को बढ़ाने की कोशिश की। इन्होंने नई शब्दावलियों के साथ जाति और जेण्डर की ऊंच-नीच की व्यरवस्था को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। ये भारतीय राष्ट्र के निर्माण से अलग रहे। वे तो मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद का राग अलापते रहे। 
आज हमारे मुल्क में मोदी सरकार के रूप में नई सत्ता व्यवस्था  आने के बाद हिन्दू राष्ट्रवादी फिर जोर लगा रहे हैं। वे भारतीय राष्ट्र  के उस विचार पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं जो सबको साथ लेकर चलने में यकीन करता है और बराबरी पर आधारित है। जहां तक भारत का सवाल है, यह राष्ट्र  का आधुनिक विचार है। दूसरी ओर, मुस्लिम राष्ट्रवादी और हिन्दू राष्ट्रवादी   अतीत का भ्रामक गौरव गान करते हैं। वे ऐसा गैरबराबरी के विचार को छिपाने के लिए करते हैं। यह गैरबराबरी उनके राजनीतिक एजेण्डे का अंतर्निहित गुण है।
वैसे, हमारे संविधान में राष्ट्र की क्या अवधारणा है?
जो लोग अतीत के गौरव और मूल्यों  का राग अलापते रहे हैं, वे आज देशभक्ति का पैमाना तय कर रहे हैं। वे लोगों को खौफजदा कर देशभक्ति का टेस्ट ले रहे हैं। देशभक्ति का यह इम्तेहान भारतीय संविधान के मूल्यों  के दायरे से पूरी तरह बाहर की चीज है। भारतीय संविधान यह शब्द  इस्तेमाल करता है, ‘हम भारत के लोग’ और इसमें ‘हम’ बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। ‘हम’ यानी हम सभी लोग चाहे वे किसी धर्म, जाति और लिंग के हों।
संविधान, राष्ट्र के विचार के मामले में बहुत साफ है। यह ‘हम’ हैं। और यह हम इस देश के सभी नागरिक हैं। यह ‘हम’ भारत की नींव है। भारतीय संविधान की नींव हैं। इसके उलट सम्प्रदायवादियों का हम, एक धर्म के मानने वाले ही हैं। यही नहीं, उनके हम का दायरा, समाज की उच्च और ऊंची जाति के मर्द तक सीमित है।
राम पुनियानी से संवाद-3
हां, तुष्टीकरण तो हुआ लेकिन मुसलमानों की कट्टरपंथी लीडरशिप का
संघ से जुड़े सभी संगठनों ने मान लिया है कि यह उनकी सरकार है, उन्हें कोई छू नहीं सकता

देशभक्ति, राष्ट्र भक्ति जैसे शब्द  भी इस वक्त काफी चर्चा में हैं। क्या ये एक ही शब्द हैं या अलग-अलग हैं?
जब से मौजूदा सरकार ने जेएनयू प्रकरण के इर्दगिर्द मुद्दों को उठाना शुरू किया है तब से यह शब्द हमारे सामाजिक बहस का प्रमुख मुद्दा बन गया है। जेएनयू में नौ फरवरी को एक मीटिंग हुई। इसमें कुछ नकाबपोश लोगों ने कश्मीर के समर्थन में और भारत के विरोध में नारे लगाए। इसके बाद कन्हैया कुमार जैसे छात्र नेताओं पर मुकदमा कर दिया गया। उन्हें राष्ट्रद्रोही बताया गया है। उनकी गिरफ्तारी हुई। इनमें से कुछ लोगों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा भी किया गया।
देखा जाए तो, राष्ट्रवाद का विचार ब्रितानी दौर में उपनिवेश विरोधी आंदोलन के रूप में आया। यह भारतीय राष्ट्रवाद था। इसी के साथ मुस्लिम राष्ट्रवादी और हिन्दू् राष्ट्रवादी भी उभरे लेकिन ये कभी भी ब्रितानी विरोधी आंदोलन का हिस्सा नहीं रहे। यही नहीं, संविधान तो हमें राज्य/सरकार की नीतियों की आलोचना का हक देता है। राष्ट्रवाद जैसा शब्द संविधान का हिस्सा  नहीं है। राष्ट्रद्रोह जैसी शब्दावली उनके लिए इस्तेमाल की जाती है जो राज्य  से अंसतुष्ट हैं और हिंसा को बढ़ावा देते हैं या जहरीला भाषण देते हैं। इस वक्त यह प्रावधान, उन सभी लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है जो सरकार से असहमत हैं। शुरू से ही उत्तर पूर्व के राज्यों में सरकार की काफी आलोचना होती थी और वहां अलगाववादी संगठन भी थे। पिछले कई दशकों से कश्मीर की भी यही कहानी है। अलगाव की सबसे पहले मजबूत आवाज तो तमिलनाडु से उठी जब हिन्दी को थोपने की कोशिश की गई।
महज भारत विरोधी नारे लगाना, अलगाववाद नहीं है। हां, अगर इसके साथ हिंसक उकसावा होता है तो इसे राष्ट्रद्रोह माना जाता है।
आप कहते हैं कि ब्रितानी शासन से पहले भारत में मिलीजुली संस्कृति की मजबूत परम्परा थी। ब्रितानी लोगों के आने के बाद हिन्दू-मुसलमानों में संघर्ष शुरू हुए। इसकी व्याख्या करें।
ब्रितानी साम्राज्य के पहले यहां अलग-अलग राजा अलग-अलग हिस्सों में राज करते थे। इस भारतीय समाज में लोग बिना किसी धार्मिक भेदभाव के आपसी मेलजोल के साथ रहते थे। राजा या जमींदार सिर्फ सत्ता और धन के लिए शासन करते थे। राजा के यहां काम करने वालों की वफादारी का उनके धर्म से लेना-देना नहीं था। समाज के भी अलग-अलग लोग आपस में संस्कृति, धर्म और धार्मिक रीति-रिवाजों के जरिए एक-दूसरे से मिलते-जुलते थे।
इस्लाम तो पहली बार केरल के मालाबार तट पर अरब व्यापारियों के मार्फत आया। यहां के लोग कई धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले थे। बाद में राजाओं ने वफादारियों और रिश्तेदारियों के आधार पर अपने दोस्त और काम करने वाले बनाए। अकबर के सेनापति राजा मानसिंह थे। बीरबल और टोडरमल दरबार में ऊंचे पदों पर थे। औरंगजेब के दरबार में तो हिन्दू पदाधिकारियों की तादाद बढ़कर 34 फीसदी तक थी। राणा प्रताप के जनरल हकीम खान सूर थे। शिवाजी के जनरलों में दौलत खान और इब्राहिम गार्दी शामिल थे।
रसखान, रहीम जैसे कई मुसलमान कवियों ने हिन्दू  देवी-देवताओं की तारीफ में कविताएं लिखीं। हिन्दुस्तानी संगीत में भी हिन्दू  और मुसलमान दोनों मजहबों के महारथियों का योगदान है। खान-पान की आदतें एक-दूसरे से मिलीं। धार्मिक स्तर पर यह मेल-जोल भक्ति और सूफी परम्पराओं में दिखाई दिया। इन सभी परम्पराओं को हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों ने बढ़ाया और विकसित किया। तुलसीदास जैसे कवियों ने तो राम की भक्ति करते हुए एलान किया कि वे तो मस्जिद में भी रह सकते हैं।
ब्रितानी शासकों ने बांटो और राज करो की नीति अपनाई। उन्होंने साम्प्रदायिक आधार पर इतिहास लेखन करवाया। ब्रितानी साम्राज्य  की नीतियों ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बंटवारे का बीज बोया और बाद में इसमें खाद-पानी डालकर सींचा। ये तो ब्रितानी ही थे जिन्होंने मुसलमान नवाबों के संगठन मुस्लिम लीग को मुसलमानों के असली प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी। इस चीज ने हिन्दू उच्च वर्ग को साम्प्रदायिक पंजाब हिन्दू सभा, हिन्दू महासभा और आगे चलकर आरएसएस जैसा संगठन बनाने में मदद की।
ऐसा कहा जाता है भारत में दलितों और मुसलमानों का बड़ा ख्याल रखा जाता है। महज वोट की खातिर उनका तुष्टीकरण होता है। यह भी कहा जाता है कि हिन्दु्ओं की परेशानियों को दरकिनार किया जाता रहा है। इन सबमें कितनी सचाई है?
यह सब महज प्रचार है। अगर हम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के वक्त  से देखें तो हिन्दू  साम्प्रंदायिक ताकतों ने शुरू से कहा कि मुसलमानों को कांग्रेस में शामिल करना उनका तुष्टीकरण है। जहां तक दलितों का मामला है, अलग-अलग स्तरों पर आरक्षण की व्यवस्था ने उनकी थोड़ी मदद की है। इसके बाद भी आज जब हम सामाजिक पैमाने को देखें तो पता लग जाएगा कि आर्थिक और सामाजिक पैमाने पर दलित बहुत पीछे हैं। जिस पार्टी ने इस मुल्क में सबसे ज्यादा सालों तक शासन किया है, उसने कई बार कई मुद्दों पर समझौते किए हैं। इसलिए ईमानदारी से आरक्षण की नीतियां लागू नहीं हो पाईं।
किसी भी नीति के कामयाबी के साथ लागू होने के लिए जरूरी  है कि अलग-अलग स्तरों पर मौजूद सत्ताधारी केन्द्रों  द्वारा उस नीति को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत में नौकरियों और आर्थिक नीतियों के मामले उच्च  जातियों के वर्चस्व की वजह से दलितों को सही अनुपात में उनका वाजिब हक नहीं मिला।
जहां तक मुसलमानों का मामला है, यह सही है कि अलग-अलग पार्टियों ने मुसलमानों के कट्टरपंथी लीडरशिप का तुष्टीकरण करने की कोशिश की है। जहां तक आम मुसलमानों से जुड़ी रोजगार और सामाजिक नीतियों का सवाल है,  उन्हें हाशिए पर ढकेल दिया गया। गोपाल सिंह आयोग (1980), सच्चर समिति (2006) और रंगनाथ मिश्र आयोग (2007) की रिपोर्ट ने मुसलमानों की इस हालत का सच दिखाया है।
जहां तक हिन्दुओं की बात है, वे कोई एकरूप समुदाय नहीं हैं। इनमें से कुछ, खासतौर पर ऊपरी तबके ने काफी फायदा उठाया है जबकि नीचे के लोग जहां के तहां ही हैं। नीचे के लोगों की यह हालत इसलिए नहीं है कि सरकार ने मुसलमानों और दलितों का पक्ष लिया है बल्कि इसकी वजह तो वे आर्थिक नीतियां रहीं हैं जिनका मकसद समाज के ऊपरी तबके को फायदा पहुंचाना रहा है।
यह इल्जाम लगाया जाता है कि धर्मनिरपेक्ष लोगों और संगठनों द्वारा कट्टरपंथ के नाम पर हिन्दू संगठनों को तो निशाना बनाया जाता है जबकि मुस्लिम संगठनों को नजरंदाज कर दिया जाता है। क्या आपको नहीं लगता है कि मुसलमानों में भी कट्टरपंथी/पुरातपंथी संगठन या समूह हैं?
जी, एक बार फिर यह छवि लगातार चल रहे प्रचार का नतीजा है। कुछ सालों में दकियानूसी समूहों का उभार तेज हुआ है। इनके संचार का ताना-बाना काफी मजबूत है। अगर हम विश्व  हिन्दू परिषद, बजरंग दल जैसे संगठनों पन नजर डालें तो पिछले कुछ सालों में ये काफी मजबूत हुए हैं। जो धर्मनिरपेक्ष लोग हैं वे बखूबी जानते हैं कि समाज में हिन्दू और मुस्लिम दोनों तरह की साम्प्रदायिकताएं हैं। ये दोनों साम्प्रदायिकताएं, समुदायों के बीच धु्रवीकरण का काम करती हैं।
बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता आक्रामक है। यह हिन्दू  भावनाओं को ठेस पहुंचाने का भ्रम पैदा करती है और इसे फैलाती है। यह जिन हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचाने की बात करती है, वह गढ़ी-गढ़ाई हुई है।
अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता भी खतरनाक है। हालांकि इसका खतरा, बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की तुलना में काफी कम है। अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता ज्यादातर बचाव में की गई प्रतिक्रिया का नतीजा है। यह कुछ-कुछ अलगाव की ओर ढकेलती है। दूसरी ओर, बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता अपने को राष्ट्रवाद के रूप में पेश करती है। साथ ही, यह लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद को खत्म करने की कोशिश करती है। वहीं अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता, मुस्लिम समुदाय को पिछड़ेपन के चंगुल में फंसाए रखती है।
इन दोनों का विरोध किया जाना चाहिए। साथ ही साथ, सभी धर्मों के बीच धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और विचारों को फैलाने और बढ़ावा देने की जरूरत है।
लव जिहाद, घर वापसी, गो रक्षा, असहिष्णुता या फिर राष्ट्रवाद- अचानक ये सारे मुद्दे एक-एक कर क्यों उठने लगे। आप इस पूरी प्रक्रिया को किस रूप में देख रहे हैं?
अगर असहिष्णुता और राष्ट्रवाद के मुद्दे को छोड़ दें तो बाकि मुद्दे काफी समय से उठाए जा रहे हैं। राम मंदिर का मुद्दा उभारने के दौरान, धु्रवीकरण के लिए इन मुद्दों का खूब इस्तेमाल हुआ। इसका काफी चुनावी फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला। साम्प्रदायिकता हमेशा भावनात्मक मुद्दों पर जिंदा रहती है। इसका समाज के वंचित तबकों की मूलभूत जरूरतों से कोई मतलब नहीं होता है। इसलिए वे इस तरह के मुद्दे उठाते हैं। केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद ये मुद्दे काफी तेजी से उठने लगे हैं। इनकी आक्रामकता बढ़ गई है। अब आरएसएस से जुड़े सभी संगठनों ने मान लिया है कि चूंकि यह उनकी सरकार है, इसलिए उन्हें  कोई छू नहीं सकता है। इसलिए हम देखते हैं कि उनकी सभी साध्वी, साक्षी और दूसरे बड़बोले नेता ज्यादा जहरीले बोल बोल रहे हैं।
संघ परिवार की इन गतिविधियों की वजह से देश में ऐसा माहौल तैयार हो गया जहां असहमति की आवाज के खिलाफ सामान्य सहिष्णुता ने भयानक रूप लेना शुरू कर दिया। नतीजतन, कई हत्याएं हुईं। लोगों को धमकाया गया। दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी और इसके बाद अखलाक की हत्या ने लोगों का संयम तोड़ दिया। इसने लोगों में बेचैनी पैदा कर दी। कई माहिर शख्सीयतों ने इस पूरी प्रक्रिया को देश में असहिष्णुता का बढ़ते असर के रूप में देखा और अपने सम्मान लौटा दिए। असहमति को दबाने के लिए आरएसएस ने राष्ट्रवाद को बतौर एक नारा फिर उछालने की कोशिश की है। वे इसके जरिए एक और भावनात्मक मुद्दा उठाना चाहते हैं ताकि समाज को और बांटा जा सके।
राम पुनियानी से संवाद-4
जाति व्ययवस्था  से बड़ी असहिष्णु ता क्या होगी
इस्लामी आतंकवाद शब्द अमरीकी मीडिया ने गढ़ा है
अभी के दौर का विश्लेषण करते हुए कुछ लोगों को इस वक्त का माहौल यूरोप के फासीवाद की याद दिलाता है। दूसरी ओर, कुछ लोग मानते हैं कि भारत में फासीवाद नहीं आ सकता है। आपकी क्या  राय है?
आजाद तरीके से सोचने का माहौल सिकुड़ता जा रहा है, लोकतांत्रिक मूल्यों को रौंदा जा रहा है, विश्व विद्यालयों की स्वायत्तता खत्म  की जा रही है, अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, बुद्धिजीवियों में बेचैनी है। ये सारी बातें लोकतांत्रिक दायरे के खत्म होते जाने का संकेत दे रही हैं। फासीवाद की एक खास पहचान उसका गुरिल्ला दस्ता (ैजवतउजतववचमते) है। ये दस्ता असहिष्णुता की राजनीति को नुक्कड़ और चौराहों पर लागू करता है। ऐसा करते वक्त वे बखूबी जानते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। जब हम आज के माहौल की 1975 के आपातकाल के भयानक दौर से तुलना करते हैं तो एक बड़ा फर्क साफ दिखता है। अब राज्य तो अधिनायकवादी है ही। इसके साथ ही साथ सड़कों पर हिंसा भी हो रही है। जब कन्हैख्या कुमार, पुलिस की हिफाजत में थे तो कोर्ट परिसर में वकीलों और वकील जैसे दिख रहे लोगों ने उनकी पिटाई की। यह दिखाता है कि यह सब 1975 के दौर में जो हुआ था, उससे कुछ अलग और ज्यादा है।
राजनीतिक परिघटनाएं वैसे ही रूप में हमेशा नहीं दोहराई जाती लेकिन वे अपने रूप में वक्त के हिसाब से संशोधन कर लेती हैं। उम्मीद है कि भारत में यूरोप जैसा गैस चैम्बर नहीं दिखाई देगा लेकिन इसका बदला हुआ रूप धीरे-धीरे संवैधानिक मूल्यों  को खत्म  कर सकता है। अब भी हमारे पास बचाव के ऐसे उपाय हैं जो फासीवाद को पूरा शक्ल  अख्तियार करने से रोक सकते हैं। हालांकि, अभी कुछ भी साफ-साफ नहीं कहा जा सकता है। यह खतरनाक जंग है।
जब भी हम हिंसा की कोई बड़ी घटना देखते हैं, तो मुसलमानों या इस्लामी संगठनों या इस्लाम का नाम इस्तेमाल करने वाले संगठनों का नाम तुरंत सामने आ जाता है। ऐसा क्यों?
9/11 के हादसे के बाद आतंकवाद की घटनाओं पर ज्यादा बात होने लगी है। इस दुःखद घटना में करीब तीन हजार बेगुनाह लोगों की जानें गई थीं। आज वैश्विक स्तर पर जो आतंकवाद की परिघटना दिखाई दे रही है, वह तालिबान-मुजाहिदीन-अलकायदा की शाखाएं हैं। ये पाकिस्तानी मदरसों से प्रशिक्षित थीं।  अमरीका से इन्हें  पैसा मिलता था। इसकी मुख्य वजह थी कि अमरीका इनके मार्फत अफगानिस्तान में सोवियत सेना से लड़ना चाहता था। इस संगठन का दिमाग और नजरिए बदलने का पूरा सिलेबस वाशिंगटन में बना था। अमरीका ने इन्हें  जबरदस्त पैसा दिया था।
अगर आप ध्यान दें तो आपको दिखाई देगा कि आज के आतंकवाद का केन्द्र उन्हीं जगहों पर है जहां तेल के भंडार हैं। आपको यह भी दिखाई देना चाहिए कि अलग-अलग मुल्कों में आतंक की घटनाओं के सबसे ज्यादा शिकार मुसलमान ही हैं। अलकायदा को मूल संगठन माना जा सकता है जिससे निकलकर आईएसआईएस या दूसरे संगठन वजूद में आए। यह सब तेल की अकूत दौलत पर कब्जा करने की साजिश के लिए है जो ‘इस्लामी आतंकवाद’ के रूप में दिखाई देता है। दिलचस्प  बात यह है कि यह शब्द जिसमें धर्म और आतंकवाद दोनों का इस्तेमाल है, 9/11 के बाद अमरीकी मीडिया द्वारा गढ़ा गया था।  
आपकी नजर में क्या इस्लाम आतंकवाद को बढ़ावा देता है?
कोई भी मजहब आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देता है। आतंकवाद मुख्यतः एक राजनीतिक परिघटना है। सभी मजहबों की कुछ खास व्याख्याएं हैं। उन व्याख्याओं का इस्तेमाल असहिष्णुता बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसके साथ ही ऐसी व्याख्याएं भी हैं जो अमन और एकता की बात करती हैं। यह सभी मजहबों पर लागू होता है।
यह कहा जाता है कि हिन्दू सहिष्णु  हैं। हिन्दुओं में जो असहिष्णुता दिखाई दे जाती है, वह दरअसल मुसलमानों कट्टरपंथ-असहिष्णुता की प्रतिक्रिया का नतीजा है।
देखिए इस तरह का सतही विश्लेषण पूरी दुनिया के किसी भी भाग के लिए सच नहीं है। सोच-विचार के नजरिए के मामले में कोई समुदाय एकरूप नहीं है। हिन्दू धर्म को ही देखें। यहां जाति व्यवस्था है। इससे बड़ी असहिष्णुता क्या होगी। हमारे एक ओर गांधी जैसे हिन्दू भी हैं तो दूसरी ओर हमें तोगड़िया और साध्वी प्राची जैसी हिन्दू भी दिखाई देती हैं।
मुसलमानों में भी देखिए। हम एक ओर, सबको साथ लेकर चलने में यकीन रखने वाले मौलाना अबुल कलाम आजाद को देख सकते हैं तो दूसरी ओर मुसलमानों के लिए अलग राज्य की बात करने वाले जिन्ना  भी हैं। आज के दौर में,  हमारे साथ असगर अली इंजीनियर जैसे मुसलमान भी थे तो दूसरी ओर अकबरउद्दीन आवैसी भी हैं।
हम आजादी के आंदोलन के प्रतिनिधि संगठन को देख सकते हैं। इसमें हिन्दू  और मुसलमान एक साथ मिलकर राष्ट्रीय आंदोलन में जुटे थे। दूसरी ओर, हिन्दू  महासभा और आरएसएस थी, जो खास तरह के राष्ट्रवाद की पैरवी में लगी थी।
यह दावा कि कोई संगठन पूरे समुदाय का प्रतिनिधि है, आज भी पूरी तरह गलत है।  न तो पूरा हिन्दू आरएसएस के साथ है और न ही पूरा मुसलमान ओवैसी की पार्टी के साथ। दोनों दावा करते हैं कि वे एक-दूसरे का जवाब दे रहे हैं। उनका अपना एजेंडा है, इसलिए वे ऐसा करते हैं। वे दूसरे के नजरिए का इस्तेमाल अपनी कार्यवाहियों को जायज ठहराने के लिए करते हैं। इन सबके बावजूद आरएसएस की बहुसंख्यसक साम्प्रदायिकता आज ज्यांदा आक्रामक है।    
आप आज के माहौल में उन संगठनों को क्या कहना चाहेंगे जो धर्म के दायरे से अलग काम करते हैं?
हमें सामाजिक एजेंडे को वापस बहस के केन्द्र में लाना होगा। हमें समाज की मूलभूत जरूरतों और सम्मान के साथ समानता के मुद्दों को सामाजिक मुद्दे के रूप में मजबूती से उठाना होगा। काम, रोजी-रोटी, सेहत और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को सामने लाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि पहचान के मुद्दों को राजनीतिक दायरे में महत्व न दिया जाए।
पहचान का मुद्दा मुख्यतः समाज में व्योप्त सामंती सम्बंधों और धर्मगुरुओं के वर्चस्व  की वजह से सामने आता है। साम्प्रदायिक राजनीतिक मकसद लोकतांत्रिक दायरे को खत्म करना है। यह ‘दूसरों से नफरत’ करने के प्रचार के जरिए काम करती है। यह नफरत की प्रक्रिया इतिहास और वर्तमान दौर के बारे में भ्रामक तथ्यों पर आधारित है। इस भ्रम को दूर करने की जरूरत है। हमें मध्यकालीन भारत के इतिहास के बारे में तथ्यात्मक समझदारी पैदा करने की जरूरत है। मौजूदा हालात के कारणों की पड़ताल करते हुए यह बताने की जरूरत है कि इसकी जड़ें सांस्कृतिक नहीं बल्कि आर्थिक विषमता में है। इसलिए हमें चाहिए कि हम मिली-जुली संस्कृति से जुड़ी बातों को सामने लाएं। राजशाहियों और लोकतंत्र के अंतर को साफ करें। धर्म और धर्म और धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति के अंतर को बताएं। यह सब बातें और संदेश समाज के बड़े तबके तक पहुंचना चाहिए। लेक्चर, सेमिनार, सामाजिक बैठकों, पर्वों, फिल्म शो और अन्य सांस्कृतिक माध्यमों के जरिए जागरूकता का ऐसा अभियान चलाया जा सकता है।
धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अलग-अलग संगठनों को ऐसे कार्यक्रम के लिए एकजुट होना चाहिए। छोटे-छोटे मतभेद को इस वक्त  नजरंदाज करना चाहिए। सामाजिक आंदोलनों के जरिए बहुलतावाद, लोकतंत्र और मानवाधिकार को बढ़ाने वाले एक व्यापक मंच बनाए जाने की जरूरत है। इसी तरह साम्प्रदायिक राजनीतिक के उभरते ज्वारभाटा को असरदार तरीके से रोका जा सकता है।
यह बातचीत पहली बार टूसर्किल्स डॉट नेट
¼www.twocircles.net½ पर पोस्ट हुई।
(नासिरूद्दीन वरिष्ठ  पत्रकार हैं। सामाजिक मुद्दों खासतौर पर महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर लिखते रहे हैं। लम्बे वक्त तक हिन्दुस्तानी अखबार से जुड़े रहे। पिछले दिनों नौकरी से इस्तीफा देकर अब पूरावक्ती तौर पर लेखन और सामाजिक काम में जुटे हैं।)
राम पुनियानी सिर्फ अमन कथा वाचक नहीं हैं। वह कई रूपों में नफरत की राजनीति के खिलाफ काम करते हैं। लेख लिखते हैं। किताबें लिखते हैं। फिल्में बनाते हैं। इनकी रचनाएं कई भाषाओं में अनुवाद होकर लोगों तक पहुंच रही हैं। कार्यशालाएं करते हैं। मानवाधिकार उल्लंघन, साम्प्रदायिक हिंसा, आतंकी घटनाओं के लिए बनी कई नागरिक जांच समितियों के प्रमुख सदस्य रहे हैं। उनके इन कामों को समय समय पर सम्मान भी मिला है। हम उनकी कुछ महत्वपूर्ण किताबों की सूची यहां दे रहे हैं। उनके बारे ज्यादा जानकारी यहां मिल सकती है-
http://pluralindia.com/
इस मेल
ram.puniyani@gmail.com के जरिए उनसे सम्पर्क किया जा सकता है।

खास किताबें
ऽ    अमन कथा (हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी)
ऽ   
Communalism: What is False What is true? (अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, गुजराती, मलयालम)
ऽ  
Striving for Peace (सचित्र - अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी)
ऽ   
Communal Politics - सचित्र (अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, गुजराती, मलयालम और तमिल)
ऽ   

·         Fascism of Sangh Parivar
The Second Assassination of Gandhi (अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, गुजराती)
ऽ  

·        Terrorism: Facts versus Myths ¼vaxzsth] fgUnh] ejkBh½
·        Understanding Terrorism ¼vaxzsth vkSj fgUnh½
·         Fundamentalism
·         Dalits: Social Justice
·         Conversions: Anti Christian Violence
·         Religion and Politics
·         Contemporary India
·         Shivaji: Respecting all Religions
·         Quest for Social Justice,
·         Muslims in Indian Democracy,
·         Politics behind anti Christian Violence
·         Deconstructing Communalism; and Partition

हिन्दी
ऽ    भारतीय राष्ट्रवाद बनाम संघ का राष्ट्रवाद
ऽ    हिन्दुत्ववादी आतंकवाद
ऽ    धर्म का बाजार
ऽ    ओसामा, अमरीका और आतंकवाद
ऽ    दलित और हिन्दुत्व
ऽ    दीप सद्भावना के
ऽ    साझी विरासतः साझा संकल्प
ऽ    साझी संस्कृतिक के पक्ष में
ऽ    आतंकवाद समझें और समझाएं
ऽ    अम्बेडकर कथा
ऽ    गांधी कथा
सम्मान

राम पुनियानी को कई संगठनों की ओर से साम्प्रदायिक सौहाद्र, बंधुत्व, शांति के लिए लगातार काम के लिए कई सम्मान मिले हैं।

2002 - महाराष्ट्र फाउंडेशन (अमरीका) अवार्ड
2004 - एसोसिएशन फॉर कम्युनल हार्मोनी इन एशिया (एसीएचए) अवार्ड 
2005 - फादर माशियो मेमोरियल फाउंडेशन ह्यमेनिटेरियन अवार्ड
2006 - इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता सम्मान
2007 - नेशनल कम्युनल हार्मोनी अवार्ड
2015 - मुकुंद सी, मेनन ह्यूमन राइट्स अवार्ड


1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (14-10-2016) के चर्चा मंच "रावण कभी नहीं मरता" {चर्चा अंक- 2495} पर भी होगी!
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'