बुधवार, 16 नवंबर 2016

क्या देश में अघोषित आपातकाल है?

हिंदी न्यूज चैनल एनडीटीवी इंडिया पर लगाए गए एक दिन के प्रतिबंध, जिसे बाद में वापस ले लिया गया, से देश को गहरा धक्का लगा है। इस चैनल पर यह आरोप लगाया गया कि उसने पठानकोट हमले के अपने कवरेज के दौरान गुप्त व संवेदनशील जानकारियां सार्वजनिक कीं। यह दिलचस्प है कि भारत सरकार ने पठानकोट के उसी इलाके में पाकिस्तान के एक जांच दल को जाने की इजाजत दी थी। चैनल का कहना था कि उसका कवरेज संतुलित था और उसके द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कोई ऐसी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई जो अन्य मीडिया से लोगों तक नहीं पहुंच चुकी थी। ऐसा लगता है कि इस प्रतिबंध के चौतरफा विरोध से घबराकर सरकार ने अपने कदम वापस खींच लिए। शायद सरकार एनडीटीवी द्वारा भारत माता की जय के नारे, राष्ट्रवाद, जेएनयू, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और ऊना के मुद्दों पर एनडीटीवी द्वारा शासक दल की आलोचना से परेशान थी। 
मोदी सरकार के शासन में आने के बाद से, देश की राजनैतिक फिज़ा में गुणात्मक परिवर्तन आया है। सरकार के सत्ता सम्हालने के कुछ ही समय बाद, कई स्थानों पर चर्चों पर हमले हुए। सरकार ने भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, आईआईटी, जेएनयू, एचसीयू सहित कई राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों की स्वायत्तता पर डाका डालने की कोशिश की। सर्वथा अयोग्य ‘दक्षिणपंथी’ व्यक्तियों को इन संस्थानों में उच्च पदों पर नियुक्त किया गया। शैक्षणिक संस्थान इस सरकार के निशाने पर हैं। जेएनयू को राष्ट्रविरोधियों का अड्डा बताया गया और वहां के विद्यार्थी नेताओं को बदनाम करने के लिए एक नकली वीडियो प्रसारित किया गया। रोहित वेम्युला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया गया। समाज में बढ़ती असहिष्णुता के प्रति अपना विरोध व्यक्त करने के लिए कई प्रतिष्ठित कलाकारों, वैज्ञानिकों आदि ने उन्हें मिले पुरस्कार लौटाए। गौमांस के मुद्दे पर बवाल खड़ा कर दिया गया। इस मुद्दे पर भड़काए गए जुनून के नतीजे में मोहम्मद अखलाक की हत्या हुई, देश के कई हिस्सों में हिंसक वारदातें हुईं और ऊना का भयावह घटनाक्रम हुआ। मीडिया का एक तबका, उदारवादियों और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को बुरा-भला कहने और हिन्दू राष्ट्रवादियों की शान में कसीदे काढ़ने में जुटा हुआ है।
इसी बीच, भोपाल में आठ मुस्लिम विचाराधीन बंदियों को एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया। इस मुठभेड़ के
संबंध में जो तथ्य सामने आए हैं उनसे ऐसा लगता है कि पुलिस की कहानी में कई छेद हैं। जेएनयू का विद्यार्थी नजीब पिछले तीन हफ्तों से गायब है और उसकी मां के साथ दिल्ली पुलिस ने घोर दुर्व्यवहार किया। क्या केवल आपातकाल में मानव और प्रजातांत्रिक अधिकारों का इस तरह का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन होता है? आपातकाल एक निंदनीय तानाशाहीपूर्ण शासन था, जिसके दौरान देश  में प्रेस सेंसरशिप लगाई गई थी। आज का दौर, उस आपातकाल से कई मामलों में भिन्न है।
देश  में आज कारपोरेट घरानों का राज चल रहा है। श्रमिकों और किसानों के अधिकार उनसे छीने जा रहे हैं। मनरेगा, भोजन का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार और शिक्षा का अधिकार के तहत चलने वाली योजनाओं पर सरकार के रूख को देखकर ऐसा लगता है कि वह बड़े पूंजीपतियों के साथ है। इसके साथ ही, हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। मोदी ने कहा था, ‘‘मैं राष्ट्रवादी हूं और एक हिन्दू परिवार में जन्मा था, इसलिए मैं हिन्दू राष्ट्रवादी हूं।’’ मोदी के इस कथन से आने वाले समय में क्या होने वाला है, इसका अंदाज़ा हो गया था। समान नागरिक संहिता और गोमांस के मुद्दे पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। कश्मीर और पाकिस्तान के साथ रिष्तों को लेकर अतिराष्ट्रवाद भड़काया जा रहा है। ऊरी पर आतंकी हमले और उसके बाद हुई सर्जिकल स्ट्राईक का इस्तेमाल सरकार राजनैतिक उद्देष्यों के लिए कर रही है। सामाजिक क्षेत्र में काम कर रहे हज़ारों एनजीओ के रास्ते में बाधाएं खड़ी की जा रही हैं। कई का पंजीकरण रद्द कर दिया गया है। पाकिस्तानी कलाकारों पर हो रहे हमले भी अतिराष्ट्रवाद के उभार का एक पहलू हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान के साथ हमारे हज़ारों करोड़ रूपए के व्यापारिक संबंध हैं। चीन के मामले में भी वहां से आने वाले उत्पादों के बहिष्कार की बात की जा रही है। यह इस तथ्य के बावजूद कि अरब सागर में सरदार पटेल की प्रस्तावित प्रतिमा को लगाने का कई हज़ार करोड़ रूपए का काम चीन की एक कंपनी को दिया गया है। लोगों को हमारे पड़ोसी देषों, धार्मिक अल्पसंख्यकों और
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ भड़काया जा रहा है।
प्रजातांत्रिक अधिकारों का गला घोंटा जा रहा है, गरीबों की भलाई की योजनाओं में कमी की जा रही है और अल्पसंख्यकों और मानवाधिकारों के रक्षकों को डराया-धमकाया जा रहा है। शासकदल के एजेंडे को लागू करने के लिए देश में जुनून पैदा किया जा रहा है। सरकार के किसी भी कदम पर प्रश्न  उठाने वालों को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, सरकार सेप्रश्न  पूछने का अधिकार, उसके निर्णयों को चुनौती देने का अधिकार प्रजातंत्र की मूल आत्मा है। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि यद्यपि देश में घोषित तौर पर आपातकाल नहीं लगाया गया है तथापि हालात शायद आपातकाल जितने या उससे भी अधिक खराब हैं।
हाल में सीपीएम नेता प्रकाश  कारत ने कहा कि वर्तमान शासन तानाशाह तो है परंतु फासीवादी नहीं। तानाशाही और फासीवाद के बीच का अंतर बहस का विषय हो सकता है। फासीवाद के मुख्य लक्षण हैं लोगों की जिंदगियों पर राज्य का अतिनियंत्रण, अतिराष्ट्रवाद, पड़ोसी देशों के प्रति आक्रामक नीतियां, बड़े उद्योगपतियों का बोलबाला और गरीबों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला। जो लोग प्रजातंत्र और भारतीय संविधान की रक्षा करना चाहते हैं उन्हें ऐसे सामाजिक और राजनैतिक गठबंधन बनाने होंगे जिनसे हिंसा और संकीर्ण राष्ट्रवाद की राजनीति पर रोक लग सके।
सन 1990 के दशक में भाजपा ने अपने को ‘पार्टी विथ ए डिफरेंस’ घोषित किया था। आज सचमुच ऐसा लग रहा है कि भाजपा सभी अन्य पार्टियों से अलग है। यह एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसका नियंत्रण किसी दूसरी संस्था के हाथ में है। भाजपा का नियामक हिन्दू राष्ट्रवादी आरएसएस है जो प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता को इस आधार पर खारिज करता है कि वे पष्चिमी आयात हैं और हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के नियमों और परपंराओं को देश पर लादना चाहता है। ये वही ग्रंथ हैं जिनमें से एक को अंबेडकर ने इसलिए जलाया था क्यांकि वे जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच के मूल्यों को बढ़ावा देते हैं। बहसें जारी रह सकती हैं परंतु भारतीय संविधान की रक्षा करने का अभियान तुरंत शुरू किया जाना चाहिए।
         
-राम पुनियानी

1 टिप्पणी:

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