बुधवार, 7 दिसंबर 2016

फिडेल के क्यूबा की यात्रा का संस्मरण

सन् 1969 में भोपाल में अखिल भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के अधिवेशन के सफल आयोजन से संघ का केन्द्रीय नेतृत्व काफी प्रसन्न था। मैं सम्मलेन की आयोजन समिति का महामंत्री था और स्वर्गीय धन्नालाल शाह अध्यक्ष थे। उस समय संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूषण राव थे। भूषण राव ‘द टाईम्स आॅफ इंडिया‘ में महत्वपूर्ण पद पर थे। एक दिन देर रात राव का फोन आया कि मुझे सात दिन के अंदर क्यूबा जाना है। मैंने पूछा ‘‘क्यों‘‘? इसपर उन्होंने कहा कि ‘‘सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए मैं तुम्हें पुरस्कृत कर रहा हूं‘‘ं क्यूबा में अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार सम्मेलन है। यह बात 1971 की है। उन्होंने सूचित किया कि मेरे साथ अखिल भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के महासचिव एस.बी. कोलपे जा रहे हैं। क्यूबा जाने के लिए पहले हमें मास्को जाना पड़ा। वहां से हमें एयरोफ्लोट (सोवियत एयरलायन्स) की फ्लाइट से क्यूबा की राजधानी हवाना के लिए रवाना होना था। हमें बताया गया था कि मास्को से हवाना पहॅुचने में 15 से 18 घंटे का समय लगेगा। लगभग सारी यात्रा के दौरान हमें समुद्र के ऊपर ही उड़ना है।
रास्ते में हमारी उड़ान को बरमूडा नामक द्वीप में आपातकालीन लैंडिग करनी पड़ी। काफी देर के बाद पायलट ने आपातकालीन लैंडिग का कारण बताया। पायलट ने बताया कि उड़ान के दौरान अनेक बार तूफान आये इसलिए हवाई जहाज की रफ्तार धीमी हुई। रफ्तार धीमी होने से ईधन ज्यादा जल गया। चूॅकि कम ईधन बचा था अतः रिफ्यूलिंग के लिए बरमूडा में उतरना पड़ा। यह भी बताया गया कि बरमूडा में उतरने की इजाजत बड़ी मुश्किल से मिली। बरमूडा द्वीप पर अमरीका व ब्रिटेन का संयुक्त कब्जा था। बताया गया कि बरमूडा में परमाणु हथियारों का अड्डा था इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से वह अत्यधिक संवेदनशील स्थान था।
हमारे हवाई जहाज में हम लोगों के साथ ‘प्रावदा‘ के संपादक भी थे। ‘प्रावदा‘ सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी का मुखपत्र  था। हमें बताया गया कि ‘प्रावदा‘ के संपादक ने सोवियत राष्ट्रपति ब्रेजनेव से संपर्क कर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया। उन्हें बताया गया कि हवाई जहाज में ईधन बड़ी दुªतगति से खत्म हो रहा है और यदि शीघ्र ही बरमूडा पर उतरने की अनुमति नहीं मिली तो जहाज समुद्र में गिर जायेगा।
इस पर ब्रेजनेव ने स्वयं अमरीकी राष्ट्रपति तथा ब्रिटिश प्रधानमंत्री से संपर्क कर हमें बरमूडा हवाई अड्डे पर उतरने की इजाजत दिलवाई। हमारे हवाई जहाज के बरमूडा मंे उतरते ही अनेक सुरक्षाकर्मी जहाज में घुस आये। उन सबने चेतावनी दी कि हममें से कोई भी जहाज के बाहर न जाए। हवाई जहाज के सभी यात्री पत्रकार थे। सुरक्षाकर्मियों का मानना था कि हम बहुत ही खतरनाक लोग हंै। सुरक्षाकर्मी सभी यात्रियों के कैमरे ले गये। बरमूडा में हमारा विमान लगभग आठ घंटे खड़ा रहा। इस दरम्यान हम लोगों को पानी तक नहीं दिया गया। बड़ी मुश्किल से बरमूडा के अधिकारियों ने हवाई जहाज में ईधन भरा। ईधन मिलने के बाद पायलट ने उड़ने की इजाजत मांगी। परंतु वह भी हमें काफी मुष्किल से मिली। बरमूडा के अधिकारियों ने लंदन व वाशिंगटन संपर्क किया और वहां से क्लियरेन्स मिलने के बाद ही हमारा हवाई जहाज उड़ सका।
इस दरम्यान हवाना में यह खबर पहॅुच चुकी थी कि हम पत्रकारों के साथ बरमूडा में काफी दुव्र्यवहार किया गया। जब हम लोग हवाना पहुॅचे तो हम लोगों ने देखा कि एक विशाल भीड़ हवाई अड्डे पर पहॅुच चुकी थी। हमें यह भी बताया गया कि हम लोगों के स्वागत के लिए क्यूबा के राष्ट्रपति तथा वहां की कम्यूनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता फिडेल केस्ट्रो स्वयं हवाई अड्डे आये हुए हैं। भीड़ अत्यंत गुस्से की मुद्रा में थी। भीड़ नारे लगा रही थी “अमरीकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद“। हवाई अड्डे पर फिडेल केस्ट्रो ने भाषण भी दिया।
फिडेल केस्ट्रो का कहना था कि हम लोगों के साथ इसलिए अपमानजनक व्यवहार किया गया क्योंकि हम लोग मास्कों से एक ऐसे सम्मेलन में भाग लेने आ रहे थे, जिसका आतिथ्य क्यूबा कर रहा था। उस समय संयुक्त राज्य अमरीका, क्यूबा को अपना नंबर एक का दुश्मन मानता था। आज क्यूबा में कम्यूनिस्ट राज्य की स्थापना हुये 60 वर्ष हो गये हैं परंतु अभी तक अमरीका ने क्यूबा में कम्यूनिस्ट राज को मान्यता नहीं दी है। अमरीका ने इतना ज्यादा समय सोवियत संघ तथा कम्यूनिस्ट चीन को मान्यता देने में भी नहीं लगाया था। अमरीका को यह भय था-और आज भी है- कि यदि कम्यूनिस्ट व्यवस्था उनके पड़ोस के एक देश (क्यूबा, अमरीकी सीमा से मात्र 90 किलोमीटर दूर है) में सफल हो जाती है तो वह संक्रामक रोग की तरह सारे अमरीकी महाद्वीप में फैल सकती है।
अमरीका ने क्यूबा को नष्ट करने का भरसक प्रयास किया। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उसने सर्वप्रथम फिडेल केस्ट्रो की हत्या की कोशिश की। यह बात अमरीका की सुरक्षा एजेन्सियों ने भी स्वीकार की है कि उनकी ओर से फिडेल केस्ट्रो पर अनेक बार कातिलाना हमले किए गए। परंतु अमरीका के सभी प्रयास असफल रहे। उस समय हमें क्यूबा में बताया गया था कि सुरक्षा कारणों से फिडेल केस्ट्रो एक स्थान पर एक से ज्यादा रातें नहीं बिताते।
फिडेल केस्ट्रो उस समय क्यूबा में असाधारण रूप से लोकप्रिय थे। क्यूबावासी, फिडेल केस्ट्रों को उनके पहले नाम से ही पुकारते हैं। वे अपने देश के और शायद दुनिया के भी किसी देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। फिडेल केस्ट्रो कहते हैं कि कम्यूनिस्ट क्रांति के पहले क्यूबा, अमरीका के रईसजादों का चकलाघर था। वेश्यावृति क्यूबा का सबसे बड़ा उद्योग था। क्यूबा में भारी गरीबी थी। कम्यूनिस्ट क्रांति के पहले क्यूबा में साक्षरता का प्रतिशत मात्र 20 था। क्रांति होते ही वहां की महिलाओं को सम्मान का जीवन व्यतीत करने का अवसर मिला। शनैः-शनैः गरीबी के अभिशाप से उन्हें छुटकारा मिल गया। एक वर्ष में क्यूबा के समस्त निवासियों को साक्षर बना दिया गया।
साक्षरता अभियान में क्यूबा के प्रत्येक साक्षर नागरिक ने भाग लिया। वहां के मंत्रियों, उच्च अधिकारियों और यहां तक कि स्वयं फिडेल केस्ट्रो ने साक्षरता के अभियान में हिस्सेदारी की। दुनिया में शायद ही  कोई साक्षरता अभियान इतने बडे़ पैमाने पर चला होगा, जितना कि क्यूबा में चला। फिडेल केस्ट्रो एक अत्यधिक प्रभावशाली वक्ता हैं। वे तीन-तीन घंटे तक लगातार बोलते हंै और उनके भाषण वहां की जनता ध्यान व बड़े चाव से सुनती है। भाषण के बीच अनेक बार तालियां बजती हैं और फिडेल केस्ट्रो जिन्दाबाद के नारे लगते हैं। उनके भाषण के अनेक अंश मुझे आज भी याद हैं। जैसे, उन्होंने एक भाषण में कहा था कि कम्यूनिस्ट इसी धरती पर इंसान को सुखी बनाने का प्रयास करता है और धर्म, स्वर्ग में। क्यूबा में डाक्टरों की कमी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि हमारे देश के अनेक डाक्टर अपने धनी रोगियों के साथ क्यूबा छोड़कर चले गये हैं।
क्यूबा सम्मेलन में अनेक मुद्दों पर विचार किया गया। इन मुद्दों का संबंध सिर्फ पत्रकारिता जगत से नहीं था। सम्मेलन में विश्व शांति से संबंधित अनेक समस्याओं पर भी विचार किया गया। सम्मेलन को समाजवादी देशों का जोरदार समर्थन प्राप्त था। (यह लेख श्री एल एस हरदेनिया की सन् 2014 में प्रकाशित आत्मकथा ‘‘फूल और कांटों से भरी जीवन यात्रा‘‘ से उद्धृत है)
-एल. एस. हरदेनिया

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