रविवार, 8 अप्रैल 2018

महापंडित राहुल सान्क्रत्यायन

9 अप्रेल जन्मदिवस पर-

अद्भुत घुमक्कड़, प्रखर साहित्यकार और समाजवादी क्रान्ति के अग्रदूत थे

महापंडित राहुल सान्क्रत्यायन


बहुभाषाविद, अग्रणी विचारक, यायावर, इतिहासविद, तत्वान्वेषी, युगपरिवर्तनकारी साहित्य के रचयिता, किसान नेता, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साम्यवादी चिन्तक बहुमुखी प्रतिभा के धनी महापंडित राहुल सान्क्रत्यायन की 125 वीं जन्मशती इस वर्ष सारा देश और विश्व मनाने जारहा है. लेकिन बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी इस मनीषी के बारे में युवा पीढ़ी पूरी तरह अनभिज्ञ है. जबकि गत शताब्दी के उत्तरार्ध्द में उनकी पुस्तक “ वोल्गा से गंगा” के प्रति नौजवानों की दीवानगी देखते बनती थी और बुक स्टालों पर उसका स्टाक निल होते देर नहीं लगती थी.
9 अप्रेल 1893 में उत्तर प्रदेश के जनपद- आजमगढ़ के ग्राम- पन्दहा में अपनी ननिहाल में जन्मे राहुल सान्क्रत्यायन का बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय था. लेकिन जीवन के हर क्षेत्र में चरैवेति चरैवेति सिध्दांत को व्यवहार में उतारने वाले राहुल जी के नाम में भी क्रमशः परिवर्तन होता गया जो अंततः महापंडित राहुल सान्क्रत्यायन पर जाकर थमा. बचपन में परिवारियों द्वारा रचाये विवाह की प्रतिक्रिया में घर से भागे बालक केदार जब मठ की शरण में गये तो उनका नाम राम उदार दास होगया. जब बौध्द धर्म अपनाया तो राहुल कहलाये और जब काशी की पंडित सभा ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी तो वे महापंडित राहुल बने और अपने सान्क्रत्यायन गोत्र के चलते महापंडित राहुल सान्क्रत्यायन नाम से पुकारे जाने लगे. बाद में इसी नाम से उनकी ख्याति हुयी.
वैष्णव परिवार में जन्मे राहुल जी की वैचारिक यायावरी भी कम रोचक नहीं है. वेदान्त अध्ययन के बाद मंदिरों में पशु बलि दिए जाने के खिलाफ जब उन्होंने भाषण दिया तो अयोध्या के सनातनी पुरोहितों ने उन्हें लाठियों से पीटा. तदुपरांत वे आर्य समाजी होगये. जब आर्य समाज उनकी ज्ञान पिपासा को शांत नहीं कर सका तो उन्होंने बौध्द धर्म अपना लिया. अंततः जीवन संघर्षों ने उन्हें मार्क्सवादी बना दिया.
हिन्दी भाषा और साहित्य को राहुल जी ने जो कुछ दिया वह अभी तक अकेले किसी विद्वान ने नहीं दिया. लगभग दो सौ पुस्तकों की रचना और अनुवाद का श्रेय उन्हें जाता है. यात्रा वृत्तान्त, यात्रा साहित्य, कहानियां, उपन्यास, निबन्ध, आत्मकथा, जीवनियाँ, विश्व दर्शन आदि सभी पर उन्होंने लिखा और अनुवाद किया. किन्नर देश की ओर, कुमाऊँ, दार्जिलिंग परिचय, यात्रा के पन्ने, घुमक्कड़ शास्त्र तथा मध्य एशिया का इतिहास जैसी पुस्तकें उनके घुमक्कड़ी के ज्ञान पर आधारित हैं. उन्हें भारत का ह्वेनसांग कहा जाए तो कम है. घुमक्कड़ों के लिये उन्होंने सन्देश दिया कि “ कमर बांध लो घुमक्कड़ो संसार तुम्हारे स्वागत के लिये बेकरार है”. वे हिंदी यात्रा साहित्य के पितामह थे. मध्य एशिया और काकेशस भ्रमण पर भी उन्होंने ग्रन्थ लिखे. उनकी दो खण्डों में लिखी पुस्तक “मध्य एशिया का इतिहास” तत्कालीन सोवियत संघ के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल थी.
वोल्गा से गंगा उनकी कालजयी रचना है. छठवीं ईसा पूर्व के बोल्गा नदी तट से लेकर 1942 के पटना के गंगाघाट तक की मानव की ढाई हजार वर्ष की ऐतिहासिक- सांस्कृतिक यात्रा को रोचक 20 कहानियों में निबध्द कर देना राहुल के ही वश की बात है. ज्ञान की भूख में भारत और विश्व का निरंतर भ्रमण करने वाले राहुलजी जहाँ भी जाते वहां की भाषा बोली सीख जाते और उन पर निबंध और टिप्पणियाँ लिखते जाते. वे 36 भाषाओं के ज्ञाता थे. भारत की संस्कृति, साहित्य और समाज का उन्होंने गूढ़ अध्यन किया. प्राचीन और वर्त्तमान साहित्य के चिंतन को आत्मसात कर उन्होंने उसे मौलिक द्रष्टि दी.
बौध्द धर्म की ओर झुकाव होने के बाद उन्होंने तिब्बत और श्रीलंका की यात्रायें कीं. उनकी घुमक्कड़ी, शोध, खोज और लेखन साथ साथ चलते थे. उन्होंने ड्राइंग रूम में बैठ कर शायद ही कुछ लिखा हो. अपनी चार बार की तिब्बत यात्रा के दौरान उन्होंने तिब्बती भाषा में अनूदित वे ग्रन्थ खोज निकाले जो भारत में नष्ट कर दिए गए थे. आर्थिक और तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुये वे इस ज्ञान- राशि को 18 खच्चरों पर लाद कर भारत ले आये जो पटना संग्रहालय में रखी गयीं हैं और शोधार्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.
जब वे दक्षिण भारत गए तो उन्होंने संस्कृत भाषा और उसके सम्रध्द साहित्य का अध्ययन किया. तिब्बत में पाली भाषा और पालिग्रंथों का अध्यन किया, लाहौर में उन्होंने अरबी भाषा सीखी और इस्लामिक ग्रन्थोंका अध्ययन किया. उन्होंने “इस्लाम धर्म की रूपरेखा” नामक पुस्तक लिखी जो मुस्लिम और गैर मुस्लिम दोनों कट्टरपंथियों को जबाव है. उनकी औपचारिक शिक्षा मात्र प्राथमिक थी लेकिन अपनी विद्वता के बल पर वे लेनिनग्राद में संस्कृत के अध्यापक बने. श्रीलंका के विश्वविद्यालय ने उन्हें बौध्द दर्शन का प्रोफेसर नियुक्त किया जहां वे बहुत कम वेतन पर पढ़ाते थे. उनकी विद्वता से प्रभावित नेहरूजी उन्हें किसी विश्विद्यालय का कुलपति बनाना चाहते थे मगर उनके शिक्षामंत्री ने औपचारिक डिग्रियां न होने के कारण हाथ खड़े कर दिये.
राहुल जी की राजनैतिक यात्रा कम रोचक नहीं है. 1917 की रूस की समाजवादी क्रांति ने उन्हें गहरे से झकझोरा. 1940 नें अखिल भारतीय किसान सभा, बिहार कमेटी के अध्यक्ष के रूप में वे जमींदारों के जुल्म के खिलाफ लड़ने को किसानों के साथ हंसिया लेकर खेतों में उतर पड़े. उन पर लाठियों से हमला हुआ और वे गंभीर रूप से घायल हुये. उन्होंने कई जनसंघर्षों का सक्रिय नेतृत्व किया. किसानों कामगारों की आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी. इन आन्दोलनों में सक्रीय भागीदारी के चलते उन्हें एक साल की जेल हुयी.  देवली कैम्प ( जेल ) में उन्होंने विश्व प्रसिध्द पुस्तक “दर्शन- दिग्दर्शन” लिख डाली.
1942 के भारत छोडो आन्दोलन के बाद किसान सभा के संस्थापक स्वामी सहजानंद सरस्वती के साप्ताहिक अखबार “हुंकार” का उन्हें संपादक बनाया गया. अंग्रेजी हुकूमत ने उस समय फूट डालो और राज करो की नीति के तहत एक विज्ञापन जारी किया जिसमें हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं की विक्रत तस्वीर पेश की गयी थी. राहुल जी ने इस विज्ञापन को छापना मंजूर नहीं किया और वह अख़बार ही छोड़ दिया.
मार्क्सवाद, अनात्मवाद, बुध्द के जनतंत्र में विश्वास और व्यक्तिगत संपत्ति के विरोध जैसी सामान बातों के चलते वे बौध्द दर्शन और मार्क्सवाद को साथ लेकर चले. उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा को भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों का आकलन करके ही लागू करने पर जोर दिया.  उनकी पुस्तकों “वैज्ञानिक भौतिकवाद” और “दर्शन दिग्दर्शन” में इस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है. उन्होंने समाज परिवर्तन के सिपाहियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से “भागो नहीं दुनियां को बदलो” और “तुम्हारी क्षय” जैसी पुस्तकें लिखीं.
राहुलजी एक राष्ट्रभाषा के सिध्दांत के प्रबल हिमायती थे. वे कहते थे कि बिना भाषा के राष्ट्र गूंगा है. उनका कहना था कि राष्ट्रभाषा और जनपदीय भाषाओं के विकास में कोई विरोधाभाष नहीं. अपने भाषागत सिध्दांतों पर अटल राहुल जी ने 1947 के अखिल भारतीय साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष के रूप में पहले से लिखित भाषण को पढ़ने से मना कर दिया. उन्होंने जो भाषण दिया वह अल्पसंख्यक संस्कृति और भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था. अतएव उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता से वंचित कर दिया गया. परन्तु इससे न उन्होंने अपने विचार बदले और न ही तेबर. वे निरंतर संघर्षरत रहे. नए भारत के निर्माण का उनका मधुर स्वप्न उनकी पुस्तक “बाईसवीं सदी” में देखने को मिलता है. 1953- 54 के दौरान वे पुनः भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल कर लिए गए.
आजीवन देश विदेश घूमने वाले राहुल जी अपने पिता के गाँव कनैला अधेढ़ अवस्था में गये और अपनी विवाहिता पत्नी से मिले जिन्हें उन्होंने पहली बार देखा था. उनके अजस्र त्याग को देख वे भावुक होगये. अपनी भावुकता को उन्होंने अपनी पुस्तक “कनैला की कथा” में बेहद भावुक शब्दों में लिखा है. उन्हें पद्मभूषण और पद्म विभूषण जैसे पुरुष्कारों से नवाजा गया. 1993 में उनकी जन्मशती पर एक डाक टिकिट भी जारी किया गया.
स्मृति लोप होजाने पर उन्हें इलाज के लिये मास्को लेजाया गया. पर उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ. मास्को से लौटने के बाद 14 अगस्त 1963 में 70 वर्ष की आयु में दार्जिलिंग में उनका निधन होगया. आज इस बेजोड़ शख्सिय्त को युवा पीढी से रूबरू कराने की ख़ास जरूरत है.
डा. गिरीश

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (10-04-2017) को "छूना है मुझे चाँद को" (चर्चा अंक-2936) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'