गुरुवार, 7 जनवरी 2021

सुधा राय क्रांति नेत्री - अनिल राजिमवाले



सुधा रॉय का जन्म 1914 में फरीदपुर ;अब बांग्लादेश मेंद्ध हुआ था। वे जमींदार परिवार की थीं। उन्होंने ईडन गार्डन कॉलेज, ढाका में बंग्ला में ऑनर्स किया। मनोरंजन गुहा-ठाकुरता उन्हें राजनीति में ले आए। पिता की असमय मृत्यु के बाद उन्होंने अपनी मॉं और भाई-बहनों को संभाला। वे दक्षिण कलकत्ता के कमला गर्ल्स स्कूल में 1932 और 1958 के बीच पढ़ाया करतीं थीं। उन्हें ‘बहिनजी’ पुकारा जाता और बंदरगाह मजदूरों में बड़ी ही लोकप्रिय थीं। वे यूनियन के काम से प्रतिदिन दोपहर किद्दरपुर डॉक जाया करतीं। उन्हें उनके भाई शिशिर रॉय ने श्रमिक आंदोलन से परिचित कराया। शिशिर बाद में बोल्शेविक पार्टी के महासचिव बने।

1933 में बंगला लेबर पार्टी ;बी. एल.पी. की स्थापना की गई। दोनों भाई-बहन इसके नेता बने। इसकी स्थापना निहारेंदु दत्त मजूमदार ने की थी। इनके अलावा इसमें विश्वनाथ दुबे, कमल सरकार, नंदलाल बोस इ. शामिल थे।

इस पार्टी ने कई ट्रेड यूनियनों का गठन किया जिनमें सुधा रॉय की सक्रिय भूमिका रही। इनमें बंदरगाह मजदूर, जूट, आयरन एंड स्टील, मेटल एंड इंजीनियरिंग, केमिकल, रेलवे, बर्ड कं., सफाई कर्मचारी, इ. शामिल थे।

तीस के दशक में बंगाल लेबर पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गई लेकिन 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस और सुभाषचंद्र बोस के सवाल पर मतभेद पैदा हो गए। उन्होंने फारवर्ड ब्लॉक के गठन के प्रश्न पर सुभाषचंद्र

बोस का साथ न देने के लिए भा.क. पा. की आलोचना की। इस ग्रुप ने 1939 में पार्टी से अलग होकर बोल्शेविक पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना की। बंगाल लेबर पार्टी खुले तौर पर बरकरार रही।

टी.यू. आंदोलन में

सुधा रॉय 1933 में ही लेबर पार्टी ;बाद में बोल्शेविक पार्टी में शामिल हो गईं। उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ किद्दरपुर-मोटिया बुर्ज इलाके में काम किया। समाज-विरोधी तत्वों के प्रकोप से एक महिला के लिए उस

इलाके में रात में तो क्या दिन में भी घूमना खतरे से खाली नहीं था। वहां बंगला-भाषी मजदूर कम थे,

अधिकतर उर्दू या हिन्दी बोलते थे। मार्च 1934 में पोर्ट एंड डॉक वर्कर्स यूनियन का गठन किया गया। अजीज सरदार इसके अध्यक्ष थे, शिशिर रॉय सचिव। सुधा रॉय ने इस यूनियन में सक्रिय काम किया। 1934 में पोर्ट और डॉक मजदूरों ने मई दिवस मनाया। 20 हजार बंदरगाह मजदूरों में से 15000 ने हड़ताल कर दी।

मटियाबुर्ज के जहाज निर्माण के 5000 में से 2000 ने हड़तालकी। 50 जहाज खड़े रह गए। भा. क.पा के नेता ज्योतिर्मय नंदी लिखते है कि हड़ताल के दिनों में उस इलाके में जाना खतरे से खाली नहीं था। हड़ताल तोड़ने के लिए अपराधी तत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा था। वह एक छोटे कमरे में नंदी, सुधा और शिशिर रहा करते और घर नहीं जाते।लेकिन सुधा ने सब परिस्थितियों का सामना किया।

हाजरा लेन ;द. कलकत्ता में अपने निवास से सुधा हर दिन किद्दरपुर डॉक एरिया जाया करतीं। वे मजदूर बस्तियों में जाकर समाजवाद के विचारों का प्रचार और व्याख्या किया करती। उन्होंने उन्हें लेनिन तथा रूसी क्रांति के बारे में बहुत कुछ समझाया। उन्होंने विश्व कमयुनिस्ट आंदोलन के बारे में जानकारी दी। सुधा रॉय उन थोड़े-से मजदूरा नेताओं में थीं जिन्होंने सचेत रूप से मजदूर आंदोलन में राजनीति और विचारधारा फैलाई।

16 दिसंबर 1934 को हड़तालियों के खिलाफ कोई कदम न उठाने की शर्त पर हड़ताल वापस ले ली गई। एक अनौपचारिक जांच कमेंटी का गठन किया गया। सुधा रॉय तथा अन्य की मेहनत से रहीम, युसूफ, शेर खान, अबदर रहमान खान, नारायण राव जैसे मजदूर और कम्युनिस्ट नेता उभरे।

1936 में बोल्शेविक पार्टी भा. क.पा. में शामिल हो गई। सुधा रॉय संभवतः दूसरी ऐसी महिला नेता थीं जो बंगाल में गैर-कानूनी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बनीं बंगाल में प्रथम महिला पार्टी मेंबर लतिका सेन थीं। वे 27 अप्रैल 1949 को पुलिस फायरिंग में शहीद हो गईं।

1939 में सुधा रॉय वापस बोल्शेविक पार्टी में चली गईं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने एटक के नेतृत्व वाली चटकल मजदूर यूनियन में सक्रिय कार्य किया। नंदलाल बोस ने इसका विस्तृत वर्णन किया है। गुप्त पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार सुधा रॉय कलकत्ता विश्वविद्यालय की ग्रेजुएटथीं और बंगाल लेबर पार्टी तथा भा. क.पा. की सक्रिय कार्यकर्ता थीं। वे नियमित बैठकें आयोजित करतीं और मजदूरों को राजनैतिक चेतना से लैस करतीं। 1938 में सुधा रॉय ने त्रिपुरी कांग्रेस में कम्युनिस्ट प्रतिनिधि की हैसियत से हिस्सा लिया। वहां उन्होंने भा.क.पा. की बैठकों में भी भाग लिया।

उन्होंने1938 में जेसोर-खुलना राजनैतिक कार्यकर्ता सम्मेलन में भाग लिया। वहां एक दुखद घटना घटी। नरेश सेन नामक एक कार्यकर्ता की,जो कम्युनिज्म की ओर झुक रहा था,  प्रतिद्वंद्वी गुट ने 28 मई 1938 को हत्या कर दी। 10 जून 1938 को बालीगंज में विरोध सभा हुई। भाकपा की ओर से सुधा रॉय तथा मुजफ्फर अहमद और रायवादियों ने सभा को संबोधित किया। सुधा रॉय ने कहा कि ये झगड़े खत्म होने चाहिए। इससे  बंगाल की राजनीति बर्बाद हो रही है। विचारधारा नष्ट नहीं की जा सकती। आतंकवादियों ने लेनिन की हत्या की कोशिश् की लेकिन लेनिनवाद को नहीं मार सके। 1939-40 में वे आसाम  रेलवे मेन्स फेडरेशन में काम करने लगीं। उन्होंने जूट मिल वर्कर्स यूनियन में काम किया। वे डॉक लेबर बोर्ड की प्रथम महिला सदस्य थीं।

7 अक्टूबर 1942 को सुधा रॉय ने पटना से मुजफ्फरपुर में उमा घोष को लिखा कि सभी फासिज्म- विरोधियों को एक जगह आना चाहिए रायवादी, बी.एल.पी और भा.क.पा. एक जगह आएें। पी.सी.जोशी ने संयुक्त कार्य पर जोर दिया था।

महिला आंदोलन में

सुधा रॉय 1943 में महिला आंदोलन में शामिल हुईं। वे ऑल इंडिया वीमेन्स कॉन्फ्रेंस में काम करने लगीं। उन्होंने ‘‘बच्चों की रक्षा करो’’ आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने 1945 में वयस्क साक्षरता के लिए ‘‘लोक शिक्षा परिषद’’ का गठन किया। उन्होंने अखिल भारतीय महिला फेडरेशन ;एन.एफ.आई.डब्ल्यू के संस्थापना सम्मेलन ;1954 में

हिस्सा लिया। वे महिला सांस्कृतिक सम्मेलन की ओर से महिला आत्मरक्षा समिति में सक्रिय थीं और बारीसाल में इसके दूसरे सम्मेलन में शामिल हुईं। वहां भाषण भी हुआ। साथ ही देश के विभाजन के बाद शरणार्थी शिविरों में भी उन्होंने काम किया। सुधा रॉय सम्मेलन की स्वागत समिति की सदस्य भी थीं।

सुधा रॉय स्थापना सम्मेलन में ही एन.एफआई.डब्ल्यू की उपाध्यक्ष चुनी गई।

चुनावों में 1951-52 के आम चुनावों में संसद के लिए सुधा रॉय बोल्शेविक पार्टी की एकमात्र उम्मीदवार थीं। वे बरकपुर से खड़ी हुई और उन्हें 25,792 वोट मिले। 1957 में वे प. बंगाल विधान सभा के लिए फोर्ट चुनाव क्षेत्र से खड़ी हुईं और चौथे नंबर पर आईं।

पुनः भा.क.पा. में

वे 1939 में भा.क.पा. से निकलकर बोल्शेविक पार्टी में शामिल हो गई थीं। 1965 में बोल्शेविक पार्टी के सम्मेलन में उन्होंने दोनों पार्टियों के विलयन का आवाहन किया। सम्मेलन ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।

इस पर सुधा रॉय अपने सहयोगियों के साथ भा.क.पा.में शामिल हो गईं। वे एटक का काम करने लगी। 

 यू.टी.यू.सी. का काम1958 में 

 सुधा रॉय की यूनियन डॉक मजदूर यूनियन में फूट पड़ गई। सुधा और शिशिर एक ओर थे, विश्वनाथ दुबे दूसरी ओर। शिशिर रॉय की मृत्यु के बाद सुधा रॉय यू.टी.सू.सी. की महासचिव बनीं। सुधा रॉय की मृत्यु 7 जून 1987 को लंबी बीमारी के बाद हो गई।

-अनिल राजिमवाले

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