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शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

यह कौन सी देश भक्ति है....

कामोव-226टी वर्ग के 400 हेलीकाप्टर भारत में बनाए जा सकते हैं- रगोज़िनप्रधानमंत्री मोदी ने भारत में कामोव 226टी के निर्माण के लिए अनिल अम्बानी की कंपनी रिलायंस डिफेन्स को चुना था. इस सम्बन्ध में रूसी सरकार से सरकारी स्तर पर बातचीत भी चल रही थी। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग ने 15 दिसंबर को ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता को दर्शाने वाली एक रिपोर्ट ने रिलायंस डिफेंस को कामोव 226 टी के साझा निर्माण की जिम्मेदारी सौंप दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, “ रूस की सरकार ने करीब 200 कामोव 226 टी के साझा निर्माण के लिए रिलायंस डिफेंस एंड एयरोस्पेस का चुनाव किया है किन्तु मोदी व उनके रणनीतिकारों की रूस सरकार के सामने उनकी कोई बात नहीं चली. उस प्रस्ताव को ख़ारिज करते हुए रूस की कंपनी रोसटेक ने भारत में कामोव 226टी के निर्माण के लिए हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को अपना साझीदार चुना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूस जाने वाले मुख्य कार्यकारी अधिकारीयों के प्रतिनिधि-मंडल में रिलायंस डिफेंस के अनिल अंबानी भी शामिल थे और अम्बानी यह उम्मीद कर रहे थे कि उन्ही की कंपनी को हेलीकाप्टर बनाने का कार्य मिलेगा.
रसियन कंपनी को इस बात की जानकारी हुई कि रिलायंस कंपनी को कार्य करने का कोई अनुभव नहीं है. उस पर ऋण काफी ज्यादा है। रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर, रिलायंस पावर और रिलायंस कम्युनिकेशन जैसी कंपनियों पर कर्ज काफी ज्यादा है। यह राज भी खुला कि रिलायंस अपने पावर, रोड और सीमेंट जैसे कुछ उद्यमों को बेचने की कोशिश कर रहा है।  कंपनी के पास 200 हेलिकॉप्टर बनाने के लिए वित्तीय पूँजी नहीं है. 
 भारतीय रक्षा मंत्रालय के अधीन थिंक टैंक आई डी एस ए के उपमहानिदेशक रूमेल दहिया कहते हैं,“रिलायंस डिफेंस के पास किसी भी तरह का अनुभव नहीं है। नए सिरे से अगर साझा करते हैं तो उसको टेक्नोलॉजी समझने में दिक्कत होगी। एच ए एल को रूस निर्मित हथियारों को बनाने का काफी अनुभव है। मिग सीरिज के हवाई जहाजों  के अलावा चीता और चेतक हेलीकॉप्टरों  पर काम किया है। मौजूदा समय में ध्रूव हेलिकॉप्टर पर काम कर रहे हैं। जबकि रिलायंस के पास इस तरह के काम का कोई अनुभव नहीं है”।
              इसके अलावा अनिल अंबानी के रिलायंस ग्रूप की खराब वित्तीय हालात भी साझीदार नहीं बन पाने में बड़ा कारण है. रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 25 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। भारत की कंपनियों से जुड़ी जानकारी इकठ्ठा करने वाली कैपिटल लाइन के द्वारा जारी एक आंकड़े के मुताबिक अनिल अंबानी के अधीन कंपनियों पर कुल कर्ज एक लाख 14 हजार करोड़ रुपए के करीब है।
                हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के उपर किसी तरह का कर्ज नहीं है और जरूरत पड़ने पर सरकार कंपनी को मदद दे सकती है।
हमारे प्रधानमंत्री जी अनिल अम्बानी से लेकर टाटा तक मदद करने के लिए बेताब हैं और उनकी सारो विदेश यात्राओं का मुख्य उद्देश्य यह भी है की यहाँ की बड़ी कर्जदार मल्टी नेशनल कंपनियों को विदेशों के प्रोजेक्ट भारत में दिलाये जा सके. देश के सार्वजानिक उद्योगों को चाहे नष्ट करना पड़े. प्राइवेट कम्पनियाँ उस काम को करने की माहिर भी न हो लेकिन काम उन्ही से कराया जायेगा ताकि जो फायदा हो वह उन कंपनियों को हो देश को नहीं. मोदी साहब की यह नीति कौन सी नीति है इसका खुलासा सरकार को करना चाहिए. अगर इस तरह की नीतियां जारी रही तो निश्चित रूप से देश का भला नहीं होगा. वहीँ उनका थिंक टैंक देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति की कौन से परिभाषा इन कामो के लिए तय कर रहा है. 

सुमन 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

सैंया भये कोतवाल तो अब डर काहे का

पेट्रोल पंप पर कार्यरत एक कर्मचारी पर तत्कालीन वित्तमंत्री की कृपा हुई और आज वह देश का सबसे बड़ा उद्योगपति बन बैठा . सरकार की गोद में बैठ कर बढे हुए अम्बानी समूह हमेशा सरकार को आर्थिक नुकसान पहुँचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया है. अभी हाल में जासूसी प्रकरण में उसी कंपनी के कर्मचारी, पत्रकार व पेट्रोलियम मंत्रालय के जूनियर अधिकारी जासूसी में पकडे गए. मामला यह है कि रिलायंस कंपनी अपने शुरुवाती दौर से करों की चोरी से लेकर निम्न कोटि के हथकंडे अपनाती रही. केंद्र में इस सरकार को लाने के लिए इस कंपनी व उसके मीडिया ने भरपूर प्रयास किया है और उसी की बदौलत अम्बानी प्रधानमंत्री की पीठ ठोकते नजर आते हैं .
      "लागत वसूली की पाबंदी" के रूप में पेट्रोलियम मंत्रालय ने रिलायंस के नेतृत्व वाली ठेका कंपनी पर लगभग 15,000 करोड़ रुपये के दंड के लगाने पर लंबित मध्यस्थता कार्यवाही कर रहे हैं। रिलायंस गैस की बिक्री के माध्यम से खर्च कुछ खर्च की वसूली के लिए पात्र है। सरकार  रिलायंस समूह से कितनी वसूली करे वह तय होना अभी बाकी है .
मामला यह है कि के जी बेसिन से 30 हजार करोड़ रुपये की प्राकृतिक गैस की चोरी का आरोप रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के ऊपर है . यह आरोप ओ एन जी सी ने लगाया है . जिसकी मध्यस्था का मामला भी चल रहा है . रिलायंस समूह के काले कारनामो की जांच अगर की जाए तो हर मामले में टैक्स चोरी से लेकर जासूसी और अपराधिक मामलों में लिप्त लोग हैं, लेकिन कार्यवाई कौन करे . जो भी सत्तारूढ़ दल होता है . वह उनकी मुट्ठी व कृपा की बदौलत सत्तारूढ़ होता है. इन आर्थिक अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि मंत्री अपने घर में क्या कर रहा है और मंत्रालय क्या कर रहा है और कौन सा फैसला कब लिया जायेगा यह जानने के लिए कर्मचारियों और अधिकारीयों की खरीद-फरोख्त भी करते हैं .
  आरआईएल के शैलेश सक्सेना, अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप के ऋषि आनंद, एस्सार ग्रुप के विनय कुमार, केयर्न इंडिया के केके नाइक को भी गिरफ्तार किया है।
       रिलायंस समूह की कोशिश यह है कि सरकार जो भी फैसले करे उसकी जानकारी उसको पहले हो जाए और उसी आधार पर वह अपने समूह को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा वसूलने के लिए प्रयास करे . पूर्व में सरकारी नीतियों की जानकारी हो जाने से कुछ जर खरीद नेताओं के माध्यम से नीतियों को बदलने का कार्य करते हैं और रिलायंस समूह के लिए यह सरकार ' सैंया भये कोतवाल तो अब डर काहे का ' वाली स्तिथि है. उसकी  यह भी स्तिथि है कि चोर चोरी से जाए हेराफेरी से बाज नहीं आता है . 

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