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सोमवार, 18 जुलाई 2011

सीमा आजाद कब होगी आजाद ?


सीमा आजाद कब होगी आजाद ?
सीमा आजाद

निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन केः जहाँ

चली है रस्म केः कोई न सर उठाके चले

जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले

नजर चुरा के चले वो जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

आज मुल्क की हालत कमोबेश ऐसी ही है, जैसा फैज अपनी इस नज्म में बयान कर रहे हैं। हमारे शासकों ने जिन नीतियों पर अमल किया है, उनसे अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। आज ऐसी व्यवस्था है जहाँ साम्प्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कॉरपोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी, बाहुबली व माफिया सŸाा की शोभा बढ़ा रहे हैं, सम्मानित हो रहे हैं, देशभक्ति का तमगा पा रहे हैं, वहीं इनका विरोध करने वाले, सर उठाकर चलने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है, उनके लिए उम्रकैद है, जेल की काल कोठरी है। उŸार प्रदेश की जेल की ऐसी ही काल कोठरी में लेखक, पत्रकार व मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद अपने पति विश्वविजय के साथ कैद हैं। इनकी कैद का डेढ़ साल पूरा होने वाला है। पर ये कब आजाद होंगे, इस काल कोठरी से कब बाहर आयेंगे, कोई नहीं बता सकता।

पिछले साल 6 फरवरी 2011 के दिन सीमा आजाद को विश्वविजय के साथ इलाहाबाद में गिरफ्तार किया गया था। वे दिल्ली पुस्तक मेले से लौट रही थीं। उनके पास मार्क्सवादी व वामपंथी साहित्य था। उनकी यह गिरफ्तारी गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून के तहत की गई। पुलिस का आरोप था कि इनके माओवादियों से सम्बन्ध हैं तथा ‘राज्य के खिलाफ हिंसा व युद्ध’ भड़काने जैसी गैरकानूनी गतिविधियों व क्रियाकलाप में लिप्त हैं। तब हमारे लिए यह स्वाभाविक सवाल है कि क्या सीमा आजाद की गतिविधियाँं व क्रियाकलाप गैरकानूनी व संविधान विरुद्ध हैं ? पुलिस की कार्रवाई कहाँ तक न्यायसंगत है या फिर मात्र बदले की भावना से की गई कार्रवाई है ?

इस सम्बन्ध में जो तथ्य सामने आये हैं, उनका उल्लेख जरूरी है। सीमा आजाद द्वैमासिक पत्रिका ‘दस्तक’ की सम्पादक तथा पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पी यू सी एल) उŸार प्रदेश के संगठन सचिव के बतौर नागरिक अधिकार आंदोलनों से जुड़ी समाजिक कार्यकर्ता रही हैं। सीमा आजाद के पति छात्र आंदोलन और इंकलाबी छात्र मोर्चा के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। सीमा आजाद ने जिन विषयों को अपने लेखन, पत्रकारिता, अध्ययन तथा जाँच का आधार बनाया है, वे पूर्वी उŸार प्रदेश में मानवाधिकारों पर हो रहे हमले, दलितों खासतौर से मुसहर जाति की दयनीय स्थिति, पूर्वी उŸार प्रदेश में इन्सेफलाइटिस जैसी जानलेवा बीमारी से हो रही मौतों व इस सम्बन्ध में प्रदेश सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति, औद्योगिक नगरी कानपुर के कपड़ा मजदूरों की दुर्दशा, प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना गंगा एक्सप्रेस द्वारा लाखों किसान जनता का विस्थापन आदि रहे हैं।

सीमा आजाद और विश्वविजय का कार्यक्षेत्र इलाहाबाद व कौसाम्बी जिले का कछारी क्षेत्र रहा है जहाँ माफिया, राजनेता व पुलिस की मिलीभगत से अवैध तरीके से बालू खनन तथा काले धन की अच्छी.खासी कमाई की जा रही है। इस गठजोड़ द्वारा खनन कार्यों में लगे मजदूरों का शोषण व दमन यहाँ का यथार्थ है। सीमा आजाद ने न सिर्फ इस अवैध खनन का विरोध किया बल्कि यहाँ हो रहे मानवाधिकार के उलंघन पर जोरदार तरीके से आवाज उठाया। सीमा आजाद और विश्वविजय ने सेज से लेकर ‘आपरेशन ग्रीनहंट’ का भी लगातार विरोध किया और वैश्वीकरण, उदारीकरण व निजीकरण के खिलाफ मोर्चा खोला। अपनी गिरफ्तारी से कुछ ही दिन पूर्व उन्होंने ‘आपरेशन ग्रीनहंट’ के विरुद्ध एक पुस्तिका प्रकाशित किया था जिसमें अरुंधती राय, गौतम नवलखा, प्रणय प्रसून बाजपेई आदि के लेख संकलित हैं।

ये ही सीमा आजाद और उनके साथी विश्वविजय के क्रियाकलाप और उनकी गतिविधियाँ हैं जिन्हे ‘राज्य के खिलाफ हिंसा व युद्ध’ की संज्ञा देते हुए पुलिस.प्रशासन द्वारा इन्हें नक्सली व माओवादी होने के आधार के रूप में पेश किया जा रहा है। इनके माओवादी होने के लिए पुलिस ने कुछ और तर्क दिये हैं। जैसे, पुलिस का कहना है कि ये ‘कामरेड’ तथा ‘लाल सलाम’ का इस्तेमाल करते हैं जबकि सभी कम्युनिस्ट र्पािर्टयों तथा उनके संगठनों में ‘कामरेड’ संबोधन तथा ‘लाल सलाम’ अभिवादन के रूप में आमतौर पर इस्तेमाल होता है। इसी तरह का तर्क सीमा आजाद के पास से मिले वामपंथी व क्रान्तिकारी साहित्य को लेकर भी दिया गया, पर पुलिस यह बताने में असफल रही है कि वहाँ बरामद साहित्य में कौन सा प्रतिबंधित है।

ऐसे ही आरोप पुलिस द्वारा डॉ विनायक सेन पर भी लगाये गये थे तथा इनके पक्ष में पुलिस की ओर से जो तर्क पेश किये गये, वे बहुत मिलते.जुलते हैं। देखा जा रहा है कि सरकारों द्वारा नक्सलवाद व माओवाद लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने.कुचलने का हथकण्डा बन गया है तथा जन आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर राज्य के खिलाफ हिंसा व युद्ध भड़काने, राजद्रोह, देशद्रोह जैसे आरोप आम होते जा रहे है। छŸाीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा लोकतांत्रिक व मानवाधिकारों को दबाने का जो प्रयोग शुरू किया गया था, उŸार प्रदेश और अन्य राज्यों की सरकारों द्वारा उसी नुस्खे को अमल में लाया जा रहा है।

सीमा आजाद की जिन गतिविधियों को गैरकानूनी कहा जा रहा है, वे कहीं से भी भारतीय संविधान द्वारा अपने नागरिकों को दिये गये अधिकारों के दायरे से बाहर नहीं जाती हैं बल्कि इनसे सीमा आजाद की जो छवि उभरती है वह आम जनता के हितों के लिए संघर्ष करने वाली लेखक, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता की है। बेशक ये गतिविधियाँ सŸाा और समाज के माफिया सरदारों व बाहुबलियों के हितों के विरुद्ध जाती हैं। इसीलिए लोकतांत्रिक समाज, मानवाधिकार संगठन, बुद्धिजीवी, लेखक आदि मानते हैं कि सीमा आजाद पर जो आरोप गढ़े गये हैं तथा गैरकानूनी गतिविधि ;निवारकद्ध कानून के तहत जो गिरफ्तारी की गई है, वह दमन के उद्देश्य से तथा बदले की भावना से की गई कार्रवाई है।

लेकिन यह सŸाा का भ्रम है कि दमन से वह विरोध की आवाज को दबा देगी। देखा गया है कि दमन ने हमेशा प्रतिरोध का रूप लिया है। ऐसा हम सीमा आजाद के संदर्भ में भी देखते हैं। पिछले दिनों हिन्दी कवि नीलाभ को लिखे अपने पत्र में सीमा आजाद ने अपने बारे में कहा है – ‘मै और विश्वविजय दोनों ने जेल से बाहर आने का इंतजार करते हुए अच्छा.खासा अनुभव हसिल किया है। एक बात हमने साफतौर महसूस किया है कि दमन आदमी को मजबूत, अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ तथा और अधिक संघर्षशील बनाता है। इस सम्बन्ध में दुनिया की सरकारें बड़े भ्रम में जीती हैं और हमारी सरकार भी। हमने महसूस किया है कि सामाजिक परिवर्तन की हमारी इच्छा को सरकार दबा नहीं सकती बल्कि सरकार के उत्पीड़न की इस तरह की कार्रवाई कालिदास की उस कथा की तरह है जिसमें सरकार पेड़ की उस डाल को ही काट रही है जिस पर वह बैठी है।’

सीमा आजाद जिन कारणों से डेढ़ साल से कैद है, वे कहीं से भी भारतीय संविधान द्वारा अपने नागरिकों को दिये गये अधिकारों के दायरे से बाहर नहीं जाती। फिर यह कैद और इस पर हमारी लम्बी चुप्पी क्यों ? अखिरकार यह लड़ाई लड़ेगा कौन ?

14 जुलाई के ‘,में प्रकाशित


-कौशल किशोरkaushal kishor,कौशल किशोर

मंगलवार, 14 जून 2011

उत्तर प्रदेश में पुलिस थानों में पीट-पीट कर मार डालने की प्रतियोगिता प्रारंभ

खीरी लखीमपुर जनपद में थाने के अन्दर एक युवती की हत्या का मामला थमा नहीं था कि बाराबंकी जनपद में घुंघटेर थाने में भिठोकर निवासी गया प्रसाद सूरमा को पूछताछ के नाम पर पुलिस वालों ने पीट-पीट कर मार डाला। उसकी हत्या हो जाने के बाद पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों इस हत्या के मामले पर लीपापोती शुरू कर दी। पुलिस अधिकारीयों ने कहना शुरू किया कि बीती रात 12 बजे गया प्रसाद को ह्रदयघात हो जाने के कारण उसकी मौत हो गयी। जनता ने थाने का घेराव शुरू कर दिया तो पुलिस वालों को पोस्टमार्टम करा कर हत्या का मुकदमा थाना अध्यक्ष हरी लाल करदम, दरोगा बी.एन वर्मा, सिपाही संदीप अवधेश तीन अन्य लोगों के ऊपर कायम करना पड़ा।
पुलिस अधिकारीयों की भूमिका हत्या जैसे जघन्य अपराध के साक्ष्यों को नष्ट करने की होती है। यही काम इस केस में भी प्रारंभ हो गया था। अपराधिक विधि के अनुसार सबूतों को नष्ट करने वाले व्यक्तियों को अंतर्गत धारा 401 आई.पी.सी के तहत अभियुक्त होते हैं। ज्ञातव्य है कि भिठोकर गाँव में पांच वर्षीय सविता की हत्या हो गयी थी जिसकी पूछताछ के नाम पर एस..जी, पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी गाँव से कई व्यक्तियों को पकड़ लाये थे और थाने में उनकी पिटाई का कार्यक्रम चल रहा था। मृतक गया प्रसाद सूरमा पुलिस की पिटाई बर्दाश्त कर पाया और काल के गाल में समा गया। फिर उसके बाद पुलिस अधिकारीयों का बचाव का प्रबंधन शुरू हुआ। तरह-तरह के उपाय निकाले जाने लगे। हर छान अधिकारीयों ने अपने बयान बदले। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों के पास जुगाड़ शुरू हुआ और हो सकता है कि मृतक गया प्रसाद सूरमा का पोस्टमार्टम पुन: कराना पड़े।
उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्तिथि बेहद ख़राब है उच्च अधिकारीयों के खिलाफ गंभीर से गंभीर अपराधिक मामलों में उनके खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं होती इसीलिए प्रदेश भर के थानों में पूछताछ के नाम पर तब तक पीता जाता है जबतक मोती रकम देना लोग स्वीकार कर लें अन्यथा मृत्यु ही उनको उस पिटाई से मुक्ति दिला पाती है। अधिकांश मामलों में कोई कार्यवाई संभव नहीं हो पाती है। जिससे पुलिस के हौसले इस तरह कामो को करने के लिये बुलंद रहते हैं।


-महंत बी.पी दास
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

सेना का प्रयोग या मानवाधिकारों की हत्या

पिछले दिनों भारत में कनाडा के उच्चायोग ने कई सैन्य व खुफिया सेवा के अधिकारियों को अपने देश का वीजा देने से मना कर दिया। उच्चायोग का कहना था कि कुछ भारतीय सैन्य, अर्द्धसैन्य व खुफिया एजेंसियाँ मानवाधिकारों के हनन व चुनी सरकारों के खिलाफ काम कर रही हैं। उच्चायोग की इस टिप्पणी पर विदेश मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जाहिर की। लेकिन अभी हाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी जम्मू-कश्मीर की यात्रा के दौरान अपरोक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि इस सीमावर्ती राज्य में सेना मानवाधिकारों का हनन कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
प्रधानमंत्री को यह बयान उन परिस्थितियों में देना पड़ा जब कि सेना पर कई फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोष कश्मीरियों की हत्या के आरोप लग रहे हैं और वहाँ की जनता उद्वेलित है। कश्मीर के माछिल इलाके में तीन निर्दोष युवकों को आतंकी बताकर मार दिया गया। काफी दबाव व प्रधानमंत्री की कश्मीर यात्रा को देखते हुए सेना ने आरोपी सैन्य अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करने की अनुमति दी। इससे पहले शोपिया में दो महिलाओं के साथ बलात्कार व हत्या की घटना को भी सेना ने दबाने की कोशिश की थी। जम्मू-कश्मीर में ऐसी फर्जी मुठभेड़ें या सेना द्वारा मानवाधिकारों का हनन नई बात नहीं है। ऐसे में हम कल्पना कर सकते हैं कि सेना को माओवादियों से निपटने के काम में लगाया जाए तो परिणाम क्या होंगे।
माओवाद के खतरे से निपटने के लिए देश में सुनियोजित तरीके से सैन्य बलों के प्रयोग का माहौल तैयार किया जा रहा है। सरकारी तंत्र हर माओवादी घटना के बाद कूटनीतिक तरीके से ‘सेना के प्रयोग न करने’ की बात कहता है और मीडिया का एक खेमा सेना का प्रयोग न करने पर सरकार की आलोचना करता है, लेकिन इस पूरी बहस में ऐसे अभियानों में सेना या अर्द्धसैनिक बलों के कलंकित इतिहास को छोड़ दिया जाता है। क्या हम पंजाब को भूल गए हैं, जहाँ खालिस्तानी उग्रवादियों से निपटने के लिए सेना के प्रयोग का दंश अभी भी वहाँ की जिंदगी का हिस्सा है, या कि हम मणिपुर की ओर देखना नहीं चाहते जहाँ की बूढ़ी महिलाएँ भारतीय सेना को बलात्कार करने के लिए निमंत्रित कर चुकी हैं। जम्मू कश्मीर को हम जानबूझ कर भूल जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि उसे सेना के माध्यम से ही अपने कब्जे में रखा जा सकता है। लेकिन यहीं हम वहाँ के नागरिकों के दर्द को महसूस नहीं कर पाते जो कभी-कभी हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद मीडिया की सुर्खियाँ बनती हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या माओवाद से निपटने के नाम पर आधे देश को सेना के बूटों तले रौंदे जाने की छूट दी जा सकती है।
कई मौकों पर प्रधानमंत्री खुद नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बता चुके हैं। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार देश के 19 राज्य माओवाद से प्रभावित हैं। सेना के नागरिक क्षेत्रों में कलंकित इतिहास को देखते हुए इन राज्यों में सेना के प्रयोग की संभावनाओं पर व्यापक विरोध हो रहे हैं। सेना के अधिकारी खुद भी अपने ही देश में किसी व्यापक विध्वंसात्मक आॅपरेशन से नहीं जुड़ना चाहते हैं। सेना पर मानवाधिकारों के उल्लंघन को भी इसी आलोक में देखना चाहिए। अशांत क्षेत्रों में सेना व अन्य सुरक्षा एजेंसियों पर लगातार यह दबाव रहता है कि वे कुछ ऐसा कर दिखाएँ जिससे वहाँ उनके होने की उपयोगिता सिद्ध हो और दहशत कायम रहे। 1984 के दौर में अशांत पंजाब में सेना व खुफिया एजेंसियों ने अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिए राजनैतिक इशारों पर हजारों सिक्ख युवकों का कत्लेआम किया। इसके निशान अभी भी पंजाब की धरती में गड़े मिल जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में सेना कश्मीरी मुस्लिम युवकों की हत्याओं के लिए बदनाम है। सेना व सुरक्षा एजेंसियों के इस इतिहास को कनाडा उच्चायोग के सवालों की तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सच्चाई यही है कि हमारी सेना नागरिक क्षेत्रों में अपने ही देश के नागरिकों की हत्या करने से नहीं चूकती। यह अलग बात है कि हर दौर में इन हत्याओं के लिए अलग-अलग राजनैतिक कारण जिम्मेदार होते हैं। नागरिक क्षेत्रों में सेना का दमन शुद्ध रूप से राजनैतिक घटना होती है, इसके लिए अकेले सेना को दोषी नहीं करार दिया जा सकता। समय-समय पर अपने खिलाफ उठने वाले सवालों व जनाक्रोश से निपटने के लिए सत्ता सेना को पालतू कुत्ते की तरह इस्तेमाल करती है। माओवाद का हौव्वा खड़ा करने और फिर सैनिक व अर्द्धसैनिक बलों के प्रयोग के पीछे भी सत्ता का यही मकसद काम कर रहा है। खनिज सम्पदा वाले राज्य झारखण्ड, छत्तीसगढ, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा व आंध्र प्रदेश में करीब 70 हजार अर्द्धसैनिक बल लगाया जा चुका है। वहाँ खनिज बहुल इलाकों से आदिवासियों को उजाड़कर सरकारी कैम्पों में बसाया जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए पहली बार इतने बड़े पैमाने पर अर्द्धसैनिक बलों का प्रयोग किया गया। हालाँकि यह सबकुछ माओवादी हिंसा से निपटने के नाम पर किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे राजनैतिक कारणों को उन सवालों की तरह नजरअंदाज किया जा सकता है जो कनाडाई उच्चायोग ने मानवाधिकार हनन के संबंध में भारतीय सैन्य एजेंसियों पर उठाए थे। दरअसल ऐसा भी नहीं है कि केवल भारतीय सेना ही मानवाधिकारों का हनन करती है या कनाडा-अमेरिका की सेना नागरिक क्षेत्रों में मानवाधिकारों का सम्मान करती है। बल्कि किसी भी देश के नागरिक क्षेत्र में सेनाओं का यही इतिहास रहा है कि वे मानवाधिकारों की हत्या के बल पर ही वहाँ कथित शांति स्थापित करती हैं। संदेह के आधार पर निर्दोष लोगों की जान ले लेना उनकी कार्यपद्धति का हिस्सा है। कई ऐसे काले कानून बाकायदा उन्हें ऐसी हत्याओं की इजाजत भी देते हैं।

- विजय प्रताप
मोबाइल - 09015898445


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