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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

आपातकाल कुछ दिलचस्प पहलू

अटल बिहारी बाजपेई की दुर्गा
ब्रिटेन के चार बार प्रधानमंत्री रहे विलियम ग्लेड्सटन ;1809.1898 से पूछा गया कि देश के विभिन्न राजनीतिज्ञों से उनके कैसे संबंध हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि राजनीतिज्ञों से संबंध, स्वयं एवं अपनी पार्टी के हितों को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं।
लगभग यही बात हमारे देश पर भी लागू होती है। आपातकाल के संदर्भ में यदि राजनीतिज्ञों के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण किया जाए तो एक अजीबोगरीब चित्र उपस्थित होता है।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में अनेक नवयुवकों ने आपातकाल का विरोध किया था और जेल की यंत्रणा भी भोगी थी। इनमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव आदि शामिल हैं। इनमें लालू प्रसाद यादव तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं और अब ऐसे लक्षण स्पष्ट नजर आ रहे हैं कि बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी, कांग्रेस से हाथ मिलाकर विधानसभा चुनाव लड़ेगी।
आपातकाल के दौरान एक लोकप्रिय नारा था 'संजय, विद्या, बंसीलाल- आपातकाल के तीन दलाल'। इनमें से विद्याचरण शुक्ल ने भारतीय जनता पार्टी के टिकिट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा था। संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी, जो आपातकाल की प्रबल समर्थक रहीं, वे बरसों पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुकी हैं और भाजपा की टिकिट पर चुनाव लड़ती हैं। वे वर्तमान में मंत्री भी हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि वे आपातकाल की प्रबल समर्थक थीं और शायद आज भी हैं ;उन्होंने पिछले वर्षों में कभी भी आपातकाल के विरोध में कुछ नहीं कहा। विद्याचरण तो आपातकाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। उनका काम ही था आपातकाल को सही ठहराना। वे एक शक्तिशाली मंत्री थे और इंदिरा गांधी के काफी नजदीक थे। आपातकाल की ज्यादतियों की जांच करने के लिए जो आयोग बना था उसके समक्ष अपना बयान देते हुए उन्होंने आपातकाल में हुई अनेक ज्यादतियों की जिम्मेदारी खुद पर ली थी। बाद में राजीव गांधी से मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और विश्वनाथ प्रताप सिंह का दामन थामा। इस दरम्यान भी उन्होंने कभी आपातकाल की निंदा नहीं की। इस तथ्य के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें लोकसभा के छत्तीसगढ़ के एक संसदीय क्षेत्र से टिकिट दिया थाए यद्यपि वे चुनाव जीत नहीं पाए।
इसी तरहए बंसीलाल आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के सर्वाधिक नजदीकी राजनेता समझे जाते थे। बाद में उन्होंने भी कांग्रेस छोड़ दी और एक दौर ऐसा भी आया जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर हरियाणा में सरकार बनाई। बंसीलाल ने भी शायद कभी भी आपातकाल की निंदा नहीं की।
इस तरह आपातकाल का विरोध करने वालेए कांग्रेस . जिसने आपातकाल लागू किया था के साथ हो लिए और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, वे आपातकाल के सर्वाधिक तीखे विरोधी राजनीतिक दल भाजपा के साथ चले गए। इससे ही ग्लेड्सटन का वह कथन सही साबित होता है कि राजनैतिक नेता अपना नजरियाए सिद्धांतों और आदर्शों के आधार पर नहीं बल्कि अपने संकुचित हितों से तय करते हैं।
आपातकाल के बाद जो चुनाव हुए उनमें इंदिरा जी और कांग्रेस की हार हुई। उसके बाद मोरारजी भाई के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस सरकार का क्या हश्र हुआ, यह किसी से छुपा नहीं है। तीन साल से भी कम समय में इंदिरा.विरोधी सरकार का पतन हो गया। पतन दो कारणों से हुआ। आज की भारतीय जनता पार्टी, उस समय जनसंघ के नाम से जानी जाती थी। आपातकाल में हुए चुनावों के बाद सभी पार्टियों ने मिलकर एक दल बनाया और अपनी.अपनी पुरानी पार्टियों को भंग कर दिया। जनसंघ ने भी ऐसा ही किया परंतु जनसंघ के बहुसंख्यक सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे इसलिए मधु लिमये और अन्य समाजवादियों ने मांग की कि जनसंघ के ऐसे सदस्य, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैंए  संघ से अपना नाता तोड़ें। परंतु यह बात जनसंघ के नेतृत्व को मंजूर नहीं थी। इस मतभेद के कारण जो मिलीजुली पार्टी थी वह समाप्त हो गई।
उस समय की मंत्रिपरिषद के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण सदस्य चौधरी चरणसिंह थे। चरणसिंह की जिद के कारण ही इंदिरा जी को गिरफ्तार किया गया था। उस समय कुछ लोगों का यह मत था कि इंदिरा जी को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करके उन्हें जिंदा शहीद बना दिया जायेगा जिसका वे पूरा लाभ उठाने की कोशिश करेंगी। परंतु चरणसिंह की जिद के कारण इंदिरा जी की गिरफ्तारी हुई। उन्हीं चरणसिंह ने सबसे पहले जनता पार्टी से अपना नाता तोड़ा और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। थोड़े समय के बाद कांग्रेस ने चरणसिंह से अपना समर्थन वापिस ले लिया। यह भी दिल्ली में पहली बार बनी गैर.कांग्रेसी सरकार के पतन का एक प्रमुख कारण था।
इस प्रकार जिन लोगों ने इंदिरा जी को तानाशाह कहा, जिन्होंने उन्हें प्रजातंत्र.विरोधी कहा, वे स्वयं देश को एक स्थायी सरकार नहीं दे सके। सन् 1980 के चुनाव में इंदिरा जी पूरे दमखम से जीतकर आईं और प्रधानमंत्री बनी। इस घटनाक्रम से आम लोगों को काफी निराशा हुई। यदि गैर.कांग्रेसी सरकार, देश को एक स्थायी और जनहितैषी शासन दे पाती तो शायद देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आता। परंतु ऐसा नहीं हो पाया।
जहां तक आपातकाल लगाने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इसका मुख्य उद्देश्य इंदिरा जी का प्रधानमंत्री पद बचाना था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने इंदिरा जी के चुनाव को अवैध घोषित कर दियाए जिसके कारण उनका इस्तीफा देना जरूरी हो गया था। उनके चुनाव को प्रसिद्ध समाजवादी नेता राजनारायण ने चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति जगमोहन सिन्हा ने उनके विरूद्ध लगाए गए 14 आरोपों में से दो सही पाए। जो आरोप सही पाए गए उनमें से पहला था सरकारी खर्च से भाषण के लिए मंच बनवाना और दूसरा यह कि इंदिरा जी के चुनाव एजेंट यशपाल कपूर सरकारी नौकरी में थे। हाईकोर्ट ने उन्हें 20 दिन का समय सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए दिया। इस दरम्यान उन्होंने अपील की और सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय को पलट दिया। इस तरह इंदिरा जी प्रधानमंत्री के पद पर कायम रहीं। इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी। उस समय आपातकाल का विरोध करने वालों की पहली पंक्ति में जो लोग शामिल थे, वे आज कांग्रेस के साथ हैं और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, उनमें से कई भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं, जिसके तत्कालीन अवतार जनसंघ ने पूरे दमखम से आपातकाल का अफवाहबाजी फैला कर  विरोध किया था।
 प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रामचंद्र गुहा, अपनी किताब 'इंडिया ऑफ्टर गांधी' में लिखते हैं कि आपातकाल लगाने की जिम्मेदारी इंदिरा जी के साथ जयप्रकाश नारायण की भी थी। दोनों ने प्रजातांत्रिक संस्थाओें में अपनी आस्था नहीं दिखाई। हाईकोर्ट के फैसले के एकदम बाद इंदिरा जी का इस्तीफा मांगना उचित नहीं था' वहीं उनका इस्तीफा मांगने के कारण इंदिरा जी द्वारा जनप्रतिनिधियों को गिरफ्तार कर जेल में डालना भी उचित नहीं था।
-एल.एस. हरदेनिया

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

वेटिंग प्रधानमंत्री संख्या- 3



 विलय फिर कर लेंगे
भारत में भारतीय जनता पार्टी ने एक नयी परंपरा की शुरुवात की थी कि प्रधानमन्त्री के पद पर वेटिंग होगी जिसके तहत सबसे पहले उम्मीदवार पार्टी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण अडवाणी रहे हैं लेकिन वेटिंग कन्फर्म नहीं हो पायी, तब पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को वेटिंग प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बनाया है लेकिन वेटिंग कन्फर्म हो पानी मुश्किल है। वहीँ, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव वेटिंग प्रधानमंत्री के तीसरे उम्मीदवार हैं वह तीसरे मोर्चे के वेटिंग प्रधानमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश में बड़ी जोर-शोर से तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की पैरवी की जा रही है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मुलायम सिंह यादव ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश शाखा का विलय समाजवादी पार्टी में कई वर्ष पूर्व कर दिया था तत्कालीन पार्टी के सचिव मित्रसेन यादव समेत कई दिग्गज कम्युनिस्ट नेताओं ने रवीन्द्रालय में कम्युनिस्ट पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय कर दिया था। जनता दल को तोड़ने का भी काम सपा प्रमुख ने बखूबी निपटाया था। आज कितनी चालाकी से सपा तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की बात चुनाव के बाद कर रही है इसका मतलब यह है कि अगर कम्युनिस्ट पार्टियाँ उत्तर प्रदेश में एक आध सीट अपने दम पर जीत कर आये और उसके बाद उनको प्रधानमंत्री बनाने के लिए सपोर्ट करें और चुनाव में आमने सामने अपने दमखम का प्रदर्शन करें। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी का कोई अस्तित्व अन्य प्रदेशों में नही है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांग्रेस और भाजपा का ललकारते हुए ऐलान किया कि लोकसभा चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा सबसे बड़े समूह के रूप में उभरेगा। केंद्र में अगली सरकार तीसरे मोर्च की ही बनेगी। समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा, 2014 लोकसभा चुनाव में न तो कांग्रेस और न ही भाजपा की सरकार बनेगी। आम चुनाव के बाद तीसरा मोर्चे की सरकार बनेगी। हम लेफ्ट पार्टियों के संपर्क में हैं, चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा का गठन होगा।
 सन 2011 में यह बयान काबिलेगौर है कि समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अवसरवादी है, वह अल्पसंख्यकों का वोट बटोरने के लिए तरह-तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि सपा को इस प्रकार की बयानबाजी से अधिक फायदा नहीं मिलने वाला है। भाकपा ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की तुलना करते हुये दिये बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए यही बात कही। भाकपा प्रदेश सचिव गिरीश और वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा कि सपा प्रमुख उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ताकतों को वाक ओवर देना चाहते हैं।
 अगर वाम ब्लाक को और भी अपनी दुर्गति करनी होगी और राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी पार्टी में अपनी अपनी पार्टियों का विलय करना होगा तो निश्चित रूप से तीसरे मोर्चे का वेटिंग प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव को बनायेगे। अब वेटिंग प्रधानमंत्री वेटिंग ही रहते हैं। 

सुमन 

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

मुलायम को प्रधानमंत्री बनाने के लिए तीसरा मोर्चा बनेगा

मुलायम सिंह यादव देश की अवसरवादी राजनीति का प्रतीक हैं जब उन्हें राजनीति में लाभ उठाना होता है तो वह  उसी पाले में जाकर बैठ जाते हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों ने क्रांतिकारी मोर्चा बना कर प्रदेश स्तर का नेता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। शासन में आने क बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश शाखा का समाजवादी पार्टी में विलय कराने का काम भी मुलायम सिंह यादव ने किया था। वाम दलों में जब यूपीए सरकार से परमाणु करार के मुद्दे पर समर्थन वापस लिया तो सरकार बचाने में समाजवादी पार्टी सबसे आगे थी। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने बुधवार को कहा कि तीसरे मोर्चे के गठन पर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ही निर्णय किया जायेगा।

समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की दो दिवसीय बैठक के बाद यादव ने कहा, ‘‘तीसरे मोर्चे के गठन के बारे में निर्णय 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद लिया जायेगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘ हम अभी गठबंधन की बात नहीं कर रहे हैं और वामपंथी या दक्षिणपंथी दलों से सहयोग नहीं करेंगे।’’ सपा सुप्रीमो ने कहा कि दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा कमजोर हो रही है और आपस में संघर्ष कर रही है, ऐसे में लोकसभा के समय से पहले चुनाव होने की संभावना है। मुलायम सिंह यादव ने कहा, ‘‘ कांग्रेस और भाजपा दोनों लोगों की आकांक्षओं को पूरा करने में विफल रही है और इसके लिए सपा को आगे आना पड़ेगा।’’ यादव ने कहा कि सपा अपने दम पर चुनाव लड़ेगी।
      वस्तुस्तिथि यह है कि जहाँ  उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की  सरकार जैसे जनता की इच्छा  को पूरा कर रही हो। केंद्र में यूपीए व एन डी ए सरकार फेल रही हैं तो प्रदेश में समाजवादी सरकार भी फेल है।  कानून व्यवस्था का बुरा हाल है, भ्रष्टाचार बढ़ा  है, घोटालेबाजों को संरक्षण का काम समाजवादी सरकार ही कर रही है।  आइ ए एस प्रदीप शुक्ला से लेकर अन्य घोटालेबाजों को भी सरकारी संरक्षण प्राप्त है। बेरोजगारी भत्ता से लेकर किसान कर्ज तक चुनाव पूर्व की गयी बातें हवा हवाई हो गई हैं। बेगुनाह मुस्लिम नवजवानों को अभी तक रिहा नहीं किया गया है। मुसलमानों का उत्पीडन एस टी ऍफ़ व ए टी ऍफ़ द्वारा किया जा रहा है. चुनाव लड़ने में समझौता नहीं करेंगे क्यूंकि उसमें अन्य दलों को भी सीटें देनी पड़ेंगी और चुनाव बाद उन्ही दलों की मदद से तीसरा मोर्चा बना कर प्रधानमंत्री बनने  की उनकी ख्वाहिश भी पूरी नहीं होगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 8 जुलाई 2012

आतंक की राजनीति-मुस्लिम नौजवानों पर निशाना

देश की खुफिया एजेंसी द्वारा मुस्लिम नवजवानों का उत्पीडन गिरफ्तारियां पूरे देश में बढ़ रही हैंमुस्लिम नौजवानों को बिना किसी आरोप के पुलिस कस्टडी में कर लेती हैमारती पिट्टी है और टॉर्चर करती है और अंत में कई वर्षों के लिये जेलों में डाल दिया जाता हैबहुत से नौजवान कस्टडी में ही मर जाते हैं, अभी हाल ही में कतील सिद्दीकी नाम का व्यक्ति रहस्यमय परिस्तिथियों में यरवदा जेल पुणे में मार डाला जाता हैवह पिछले नवम्बर को गिरफ्तार किया गया था और जेल में मारा जाता था जो की अभी तक रहस्य बना हुआ है
फसीह मोहम्मद के बारे में अभी सब कुछ शांत है (घटना में शामिल था या नहीं) यह इंजिनियर सउदी अरब में उठा लिया जाता है उसके द्वारा घटना में शामिल होने के इनकार के बावजूद यू.पी. सरकार द्वारा कोई भी जिम्मेदारी भरा प्रयास नहीं किया गया कि उसके एक भारतीय नागरिक होने के कारण कुछ जरुरी कदम उठातीउसका परिवार न्याय के लिये इधर-उधर भटक रहा है
उर्दू पत्रकार सै. काजमी आतंक के आरोप में अब भी जेल में हैं जबकि अब भी उनके विरुद्ध पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल करना हैतारिक कासमी खालिद मुजाहिद को सोची समझी रणनीति के तहत कचहरी सीरियल बम विस्फोट में घरों से पकड़कर बाद में फर्जी बरामदगी दिखाई गयीप्रतापगढ़ के शौकत अली के विरुद्ध .टी.एस द्वारा साक्ष्य तैयार करने के उद्देश्य से फर्जी नाम से उसे लश्कर--तैयबा का एरिया कमांडर पत्र भेजकर नियुक्त किया गया और फिर उसे गिरफ्तार करने की तैयारी चल रही थी कि .टी.एस का भांडा फूट गया
ये सिर्फ बानगी भर है, अधिकृत रिपोर्ट बताती है कि कई मुस्लिम नौजवान भारतीय जेलों में कैद हैंमुस्लिम नागरिकों के साथ उत्पीडन यातनाएं बढ़ी है जहाँ अल्पसंख्यक अपने ही घर में सुरक्षित महसूस नहीं करता हैंजिस कारण अन्याय के विरुद्ध और आतंकी कौन है ? बताने के लिये एक संगठन बना कर मीटिंग करने का निर्णय लिया गया हैउक्त मीटिंग 9 जुलाई को कांस्टीट्यूशनल क्लब नई दिल्ली में होगी
मीटिंग में विभिन्न स्तरों पर एक त्वरित हल के लिये कार्ययोजना बनायीं जाएगी तथा "आतंक की राजनीति-मुस्लिम नौजवानों पर निशाना " गोष्ठी होगीगोष्ठी को श्री मुलायम सिंह यादव, श्री .बी बर्धन, श्री एच.डी. देवगौड़ा, श्री शरद यादव, श्री प्रकाश करात, श्री डी राजा, श्री गुरुदास गुप्ता, श्री मणिशंकर अय्यर, श्री हनुमन्त राव, श्री रामविलास पासवान समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधि संबोधित करेंगे
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