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सोमवार, 10 अगस्त 2015

बाराबंकी पुलिस भयभीत

उत्तर प्रदेश में हजारों मुसलमानों की गिरफ्तारी जानबूझ कर की जा रही है जबकि उनके द्वारा किये गए अपराध का विचारण प्रदेश के न्यायालयों में लंबित है. उसके बावजूद बगैर उनको दोषी करार दिए गए उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम में जेल भेजा जा रहा है. इस छोटे अपराध में उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम का प्रयोग कर छोटे-छोटे गरीब लोगों को प्रदेश की जेलों में निरुद्ध किया जा रहा है . इस सम्बन्ध मे सपा सरकार ने उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 2 में खंड (ख)में उपखंड १५ के पश्चात कई खान बढ़ा दिए हैं . जिसके खंड 17 में गौ वध निवारण अधिनियम और पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में मवेशियों के अवैध परिवहन और / तस्करी के कार्यों में संलिप्तता किओ शामिल किया गया है.
पशु अतिचार अधिनियम की अधिकांश धाराएं जमानतीय हैं या गौ वध के छोटे छोटे मामलों में जमानत पा चुके लोगों को इस अधिनियम के तहत यह लिख कर जेल भेजा जा रहा है कि इनके बाहर रहने से समाज में भय का वातावरण कायम हो रहा है. गवाह गवाही देने से कतरा रहे हैं इसलिए 3  (1) उत्तर प्रदेश गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम के तहत वाद दर्ज कर गिरफ्तार किया जा रहा है, जबकि दिलचस्प बात यह है कि थाना मसौली जनपद बाराबंकी के रहने वाले पीर गुलाम को कुछ दिन पूर्व गौ वध निवारण अधिनियम में जेल भेजा गया था वह जमानत प्राप्त कर एक आटा चक्की पर मजदूरी का काम कलर जीवन यापन कर रहा था कि थाना अध्यक्ष राय सिंह यादव ने उसके खिलाफ गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम का प्रयोग करते हुए रिपोर्ट जिला मजिस्ट्रेट को भेजी कि इसके बाहर रहने से गवाहों में भय व्याप्त है, गवाह गवाही देने से मुकर सकते हैं जबकि गौ वध निवारण अधिनियम में थाना अध्यक्ष राय सिंह यादव व दो अन्य दरोगा व कुछ सिपाही गवाह हैं . पीर गुलाम के बाहर रहने से यह पुलिस के अधिकारी, कर्मचारी भयभीत हैं और गवाही देने से मुकर सकते हैं. उसके बाद पीर गुलाम को घर से बुला कर जेल भेज दिया गया.
सपा सरकार हर वक्त अल्पसंख्यकों की सुरक्षा व रक्षा करने की बात करती है वहीँ, गौ वध निवारण अधिनियम, पशु क्रूरता अधिनियम जो गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियमके तहत नहीं आते थे.  उन अपराधों को इस अधिनियम के माध्यम से काफी समय से जेल में निरुद्ध किया जा रहा है. इस तरह से पूरे प्रदेश में कई हजार लोगों की गिरफ्तारियां अभियान चला कर की जा चुकी हैं और अभी लाखों लोगों को बगैर किसी अपराध के फर्जी कहानियां गढ़ कर जेलों में निरुद्ध किया जायेगा.  सपा सरकार की मंशा है कि वह वोट भी ले और वोट लेने के बाद उन्ही लोगों को जेल में निरुद्ध रखे.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 19 जून 2015

आतंक के खिलाफ वो 121 दिन

 ‘मौलाना खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस और आई.बी. अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए धरना’ लिखा हुआ रिहाई मंच के काले रंग के बैनर, जिस पर दाढ़ी-टोपी वाले एक शख्स की फोटो लगी थी को हर उस शख्स ने देखा होगा, जो 22 मई से लेकर 19 सितंबर 2013 के बीच यूपी विधानसभा के सामने स्थित
धरना स्थल से गुजरा होगा। यूपी ही नहीं देश के इतिहास में आतंकवाद के नाम पर मारे गए किसी बेगुनाह के न्याय के लिए 121 दिन तक चलने वाला यह सबसे बड़ा अनिश्चित कालीन धरना था।
    18 मई 2013 को शाम में यह खबर आई कि उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए
सिलसिलेवार धमाकों के आरोपी मौलाना खालिद मुजाहिद की फैजाबाद में पेशी के बाद लखनऊ जेल लाते वक्त हत्या कर दी गई है। पूरे प्रदेश में धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। क्योंकि खालिद मुजाहिद वह शख्स थे, जिनकी गिरफ्तारी को आर.डी. निमेष जाँच आयोग ने संदिग्ध माना है और उनको आतंकवाद के आरोप में फर्जी फँसाने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तक की माँग की है। निमेष आयोग आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारी को जाँचने वाला पहला आयोग था, जिसकी रिपोर्ट सरकार ने दबा रखी थी, जिसको रिहाई मंच ने अंदरखाने से प्राप्तकर जनहित में सार्वजनिक कर दिया था। यूपी की इंसाफ पसन्द अवाम के लिए गहरा झटका था कि जिस बेगुनाह को न्याय
दिलाने के लिए उन्होंने 2007-2008 में आजमगढ़-जौनपुर जैसे दूर दराज के जनपदों से लेकर राजधानी लखनऊ तक में विरोध प्रदर्शनों के बल पर तत्कालीन मायावती सरकार को आरडी निमेष जाँच आयोग गठन करने पर मजबूर किया, उसके कहने के बाद कि खालिद निर्दोष है यूपी सरकार ने उसे बरी नहीं किया। जिससे हौसला पाए पुलिस व आई.बी. अधिकारियों ने खालिद की हत्या करवा दी। 19 मई 2013 को जिस खालिद मुजाहिद को आतंकवादी कहा गया था, के जनाजे में 60-70 हजार के हुजूम के नारों ने तय कर दिया कि आखिर आतंकी कौन है?  यूपी सरकार ने इस आपाधापी में मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की सी.बी.आई. जाँच कराने की बात कह आक्रोश को शांत करने का प्रयास किया। पर सरकार और उसका तंत्र यह नहीं भाँप पाया कि इंसाफ पसन्द अवाम ने अपने शोक को संकल्प में तब्दील कर लिया है और इसी संकल्प के साथ शुरू हुआ खालिद के इंसाफ के लिए रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना।
    121 दिन यानी 4 महीना 1 दिन तक चलने वाले धरने के पहले दिन 22 मई को जब उत्तर भारत में भयंकर गर्मी और लू भरी आधियाँ चल रही थी उस वक्त किसी के
लिए यह भाँपना मुश्किल था कि यह धरना कितने दिनों चलेगा। पर आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाए गए लोगों के परिजनों, उनके गाँवों, कस्बों, यूपी के विभिन्न शहरों व देश के विभिन्न प्रदेशों के लोगों के इंसाफ लेने के जज्बे ने इसे मजबूती दी। शुरुआती दो महीने तक 24-24 व उसके बाद 48-48
घंटों की भूख हड़ताल का दौर शुरू हुआ। जिसमें परिजन, मानवाधिकार व राजनैतिक संगठनों के नेता, साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मियों व आम अवाम ने भूख हड़ताल की लंबी श्रृंखला बना डाली। खालिद सिर्फ एक पीडि़त का नाम नहीं था, बल्कि गिरफ्तारी के बाद से वह विरोध प्रदर्शनों की आवाज बन गया था। वह आवाज, जिससे आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से मुस्लिम युवाओं को उठाने वाली एटीएस, एसटीएफ ही नहीं, खुफिया एजेंसियाँ भी भय खाती थीं। 12 दिसंबर 2007 को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर 2007 को मडि़याहूं, जौनपुर से खालिद मुजाहिद को यूपी एसटीएफ ने अगवा करके 22 दिसंबर 2007 को फर्जी तरीके से बाराबंकी से विस्फोटकों के साथ गिरफ्तारी का दावा किया था। लेकिन यह दावा शुरू से ही कटघरे में आ गया क्योंकि इन दोनों को अगवा किए जाते वक्त कई लोगों ने देखा था। लिहाजा उनकी फर्जी गिरफ्तारी के साथ ही आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के आंदोलन के प्रतीक भी तारिक-खालिद बन गए। यूपी की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद बार एसोसिएशनों ने फतवा जारी कर दिया कि आतंक के आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ा जाएगा और न ही लड़ने दिया जाएगा। ऐसे में लखनऊ के
अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब सबसे पहले सामने आए तो वहीं बाराबंकी में रणधीर सिंह सुमन और फैजाबाद में एडवोकेट जमाल ने आतंक के आरोपियों के मुकदमे की वकालत की। सितंबर 2008 में दिल्ली में बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद जो सिलसिला आजमगढ़ समेत देश के विभिन्न इलाकों से गिरफ्तारियों का शुरू हआ उसके साथ ही पूरे देश में एक सिलसिलेवार आवाज बेगुनाहों की रिहाई के लिए भी उठने लगी। उसी सिलसिले से पैदा हुए आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की रिहाई के लिए रिहाई मंच ने एक बड़े आंदोलन की रूप रेखा तय की। जिसे हम इसके शुरुआती बयानों में देख सकते हैं कि अब किसी कतील सिद्दीकी को पुणे की यर्वदा जेल में हत्या, किसी इशरत की फर्जी मुठभेड़ में हत्या या फिर ऐसे तमाम बेगुनाहों की हत्याओं का जो सिलसिला खालिद तक पहुँचा, न सिर्फ उसे हम रोकेंगे बल्कि एक कड़ा संदेश आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों को फँसाने वालों को देंगे कि जेलें बेगुनाहों के लिए नहीं, गुनहगारों के लिए हैं।
    इन स्थितियों को भाँपकर 4 जून 2013 को यूपी सरकार के कैबिनेट ने आरडी
निमेष कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार लिया। आंदोलन के वेग को इससे समझा जा सकता है कि चाहें यूपी की बहुचर्चित हाशिमपुरा, मलियाना सांप्रदायिक ंिहंसा हो या फिर मुरादाबाद, कानपुर, बिजनौर दंगों की जाँच कमीशन की रिपोर्टें कई दशकों से सरकारी तहखानों में धूल फाँक रही हैं वहीं निमेष आयोग की रिपोर्ट को एक साल के भीतर स्वीकारा गया, जिसमें दर्जन भर से ज्यादा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। बहरहाल, रिपोर्ट स्वीकारने के बाद सपा सरकार ने सोचा कि यह धरना खत्म हो जाएगा। सरकार ने उन मुस्लिम उलेमाओं को फिर से सक्रिय किया जिन्होंने
इसके पहले खालिद के घर जाकर सरकार की तरफ से दिए गए 6 लाख रुपए लेने का
दबाव बनाया, जिसे खालिद के परिजनों ने नकार दिया था। वहीं खालिद के इंसाफ की लड़ाई अब सिर्फ यूपी विधानसभा ही नहीं, बल्कि दो-दो बार जेएनयू छात्रसंघ व अन्य छात्र संगठनों, युवा संगठनों व अन्य प्रदर्शन कारियों द्वारा दिल्ली में यूपी भवन को घेरने तक पहुँच गया था, ने पूरे देश में चल रहे विभिन्न आंदालनों को भी आकर्षित किया। जिन्होंने एक स्वर में रिहाई मंच की आवाज में आवाज मिलाई और सपा सरकार पर सवाल उठाया कि जब आर.डी. निमेष रिपोर्ट को  सरकार ने स्वीकार कर लिया है, यानी उसे सही मान लिया है तो फिर दोषी पुलिस अधिकारियों जिन्होंने अपने को बचाने के लिए खालिद मुजाहिद की हत्या करवा दी, को सरकार गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है।
    मौलाना खालिद की हत्या पर दर्ज एफ.आई.आर. बहुत अहम था। जिसमें हत्या के आरोपियों के बतौर पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी बृजलाल, मनोज कुमार झा समेत पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ ही आईबी अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ। क्योंकि खालिद को फंसाने का पूरा झूठा षड्यंत्र आई.बी. ने रचा था। इसलिए प्रदर्शनकारियों के निशाने पर खुफिया एजेंसियाँ प्रमुखता से थीं। रिहाई मंच के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता व जीत इसी बात की है कि इसने आई.बी. समेत खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की आपराधिक व देशद्रोही भूमिका को बहस के केन्द्र में लाया है। इसे धरने के दौरान तख्तियों पर लिखे उन वाक्यों से समझ सकते हैं कि ‘निमेष आयोग से खतरा, आखिर किसको’। प्रदर्शनकारियों के हाथों में आरोपी पुलिस वालों के नाम लिखी वो तख्तियाँ हर वक्त नजर आती थीं, जिन पर उनके गिरफ्तारी की माँग दर्ज थी। जिससे बौखलाए पूर्व डी.जी.पी. के समर्थक व संघ परिवार से जुड़े लोगों ने रिहाई मंच के धरने की मांगों के खिलाफ भी कई बार जी.पी.ओ. लखनऊ पर धरने दिए। अखिलेश सरकार ने यह आश्वासन दिया कि मानसून सत्र में निमेश कमीशन पर कार्रवाई रिपोर्ट लाई जाएगी। पर लगातार सरकार के झूठे वादे जो बेगुनाहों की मौत की वजह तक बन गए, पर अब किसी प्रकार का भरोसा नहीं रह गया था। क्योंकि सपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि
आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को वह रिहा करेगी, पर सत्ता में आने के बाद वह वादे से मुकर गई। ऐसे में रिहाई मंच ने तय किया कि जब तक सरकार कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाती धरना चलता रहेगा। 20 जून को धरने के तीस दिन होने पर यह धरना राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सुर्खियों में इस मुद्दे पर होने वाले सबसे बड़े धरने के रूप में आया। धरने का विश्लेषण करते हुए कई समाचार पत्रों ने इसके तीस दिन होने पर परिशिष्ट भी निकाला। धरने में देश के विभिन्न हिस्सों से शामिल होने वाले प्रदर्शनकारियों ने
इसे और सशक्त प्रतिरोध के केन्द्र के रूप में स्थापित किया। दिशा छात्र संगठन का सांस्कृतिक दस्ता हो या फिर जेएनयू के आरडीएफ द्वारा ‘बाटला हाउस’ नाटक का मंचन, ऐसे कई मौके आए जब लखनऊ शहर व बाहर की एक बड़ी बौद्धिक जमात समर्थन में आई। जेएनयू स्टूडेंट यूनियन समेत देश के विभिन्न कोनों से विभिन्न छात्र, राजनैतिक मानवाधिकार संगठन भी समर्थन में लखनऊ पहुँचे। चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, फिल्म निर्देशक अनुशा रिजवी, साहित्यकार नूर जहीर समेत विभिन्न शख्सियतें भी समर्थन में धरने में शामिल हुईं। मानसून आ गया था, पर धरने ने यूपी की सियासत का ताप गर्म कर दिया था। धरने के 50वें दिन इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ समेत गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों और बेगुनाहों के सवाल उठाने वाले जन संधर्श मंच और प्रख्यात लोकतांत्रिक अधिकारवादी टेªड यूनियन नेता मुकुल सिन्हा के सहयोगी अधिवक्ता शमशाद पठान गुजरात से तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडि़या और हस्तक्षेप के संपादक अमलेन्दु उपाध्याय भी शामिल हुए। धरने के समर्थन में माकपा सांसद मोहम्मद सलीम, माकपा नेता व पूर्व सांसद सुभाषिनी अली, पीयूसीएल नेता कविता श्रीवास्तव, अनहद की शबनम हाशमी भी आईं। उधर सरकार मानसून सत्र बुलाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, क्योंकि वह अपने वादे से पीछे हटने की फिराक में थी। 15 जुलाई को धरने के समर्थन में 55वें दिन पहुँचकर सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि हमारे देश में आईबी, सेक्योरिटी एजेंसी, एटीएस के लोग बेलगाम तरीके से काम कर रहे हैं। वे आम लोगों को निशाना बना रहे हैं। हमारे पास इस बात के उदाहरण हैं। इस खतरनाक माहौल में यह जरूरी है कि इन एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। उनकी देख-रेख के लिए संसदीय कमेटियाँ बनाई जाएँ। उन्हें गृह मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लगातार धरने का बढ़ता समर्थन, वह भी रमजान के महीने में, जब मुस्लिम समुदाय धार्मिक जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाता है, सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा था। क्योंकि सरकारी तंत्र यही प्रचार कर रहा था कि धरना मुसलमान चला रहे हैं पर वास्तविकता बिल्कुल इसके उलट थी। जो रमजान के महीने ने प्रमाणित कर दिया। रमजान के महीने में जब सामूहिक दुआ का आयोजन धरने के 60 वें दिन होने वाला था, उसके ठीक दो दिनों पहले सरकार द्वारा रिहाई मंच के मंच को उखाड़ने की बौखलाहट ने साफ कर दिया कि सरकार नीतिगत स्तर पर बढ़ती गोलबंदी से भयभीत
थी। लेकिन सरकार के इस लोकतंत्रविरोधी रवैये ने लोगों के हौसले को और बढ़ा दिया और जैसे ही यह खबर फैली आंदोलन के समर्थक भारी संख्या में धरना स्थल पर पहुँच गए और भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच ही सभा आयोजित हुई। वहीं धरने के दौरान दो बार सामूहिक इफ्तार का भी आयोजन हुआ जहाँ आंदोलन के समर्थक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुँचे। जिन्होंने खुद अपने हाथों से धरनास्थल पर फैली गंदगी जिसे पुलिस के दबाव में नगर निगम के सफाईकर्मियों ने साफ करने से मना कर दिया था, को खुद अपने हाथों में झाड़ू लेकर साफ किया और नमाज पढ़ सकने लायक बनाया। सबसे अहम कि गंदगी साफ करने वालों में शहर के तमाम हकपसंद उलेमा और बुजुर्गवार लोग शामिल थे। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकारी इफ्तार के आयोजन के जरिए इस मसले पर मुसलमानों को गुमराह करने की ‘इफ्तार पाॅलिटिक्स’ विफल हो गई क्योंकि आम अवाम ने रिहाई मंच के इफ्तार को सरकारपरस्त मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं
के इफ्तार के समानांतर हकपसंद लोगों का इफ्तार माना। 22 जुलाई को सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या धरने के समर्थन में पहुँचे और आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन टेकन रिपोर्ट यूपी सरकार से लाने को कहते हुए कहा कि यह कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं जहाँ बेगुनाह जेलों में और गुनहगारों का सरकार संरक्षण कर रही है। स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त का दिन इस धरने का एक खास दिन रहा। जब
रिहाई मंच ने तिरंगा फहराया और वहीं पर ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहाँ हैं’ विषय पर जनसुनवाई किया। जिसमें आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए लोगों के परिजनों खास कर अक्षरधाम हमले के आरोप में फांसी की सजा पाए बरेली के चाँद खान की नग्मा और उनके बच्चे, संकटमोचन कांड के आरोपी वलीउल्लाह के ससुर के अलावा कोसी कलाँ, मथुरा, अस्थान, प्रतापगढ़, फैजाबाद, परसपुर,
गांेडा के साम्प्रदायिक हिंसा से पीडि़त लोग भी शामिल हुए। धरने के 100वें दिन यूपी
विधानसभा पर रिहाई मंच ने हजारों लोगों का एक बड़ा विधान सभा चेतावनी मार्च निकालकर संदेश दिया कि सरकार अपने वादे से पीछे जाएगी तो अवाम सड़कों पर आ जाएगी। इस मार्च में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गताडे, अभिषेक श्रीवास्तव, जाहिद खान आदि शामिल हुए। जहाँ सरकार मानूसन सत्र से भाग रही थी वहीं प्रदेश में मानसून सत्र बुलाकर निमेश कमीशन रिपोर्ट पर कार्रवाई रिपोर्ट लाने की माँग को लेकर पत्र लिखने का अभियान शुरू हुआ। अन्ततः मानसून सत्र बुलाने की अंतिम समय सीमा जब खत्म होने लगी तो हार मानकर सरकार को 16 सितंबर को सत्र बुलाना पड़ा। 15 सितंबर की शाम रिहाई मंच के तत्वावधान में हजारों सामाजिक, राजनैतिक व मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं ने यूपी विधानसभा पर मशाल मार्च निकालकर सरकार को चेतावनी दी कि वह अपने वादे कोे अमल में लाए। 16 सितंबर को सरकार ने आर.डी. निमेष कमीशन की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जिसने साफ कर दिया कि पुलिस और आईबी एक पाॅलिसी के तहत मुस्लिमों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाती है। अब यह बात जुबानी नहीं रही, बल्कि निमेष कमीशन इसका एक प्रमाणित दस्तावेज, जनता के बीच आ गया था। सपा सरकार अपने वादे से फिर पीछे हट गई। उसने उन दोषी पुलिस व आई.बी. अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई जिन्होंने अपने पास मौजूद खतरनाक विस्फोटकों को तारिक-खालिद के पास से झूठी बरामदगी दिखाकर उन्हें गिरफ्तार किया था। इस बात से आक्रोशित रिहाई मंच के नेताओं ने इसे देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का सरकारी कदम बताते हुए यूपी विधानसभा पर घेरा डालो-डेरा डालो का आह्वान करते हुए अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। 19 सितंबर 2013 को रिहाई मंच के विधानसभा घेरने के आह्वान के बाद सरकार ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया और एक ऐतिहासिक धरने की समाप्ति का दिन 19 सितंबर बना। यह वही दिन था जिस दिन पाँच साल पहले दिल्ली में बाटला हाउस में फर्जी मुठभेड़ हुआ था। रिहाई मंच की मुहिम अनवरत जारी है और ऐसे आंदोलन, नींव की वो ईटें हैं जिस पर हमारा लोकतंत्र खड़ा है।
 -अनिल यादव
मो0-09454292339
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

वेटिंग प्रधानमंत्री संख्या- 3



 विलय फिर कर लेंगे
भारत में भारतीय जनता पार्टी ने एक नयी परंपरा की शुरुवात की थी कि प्रधानमन्त्री के पद पर वेटिंग होगी जिसके तहत सबसे पहले उम्मीदवार पार्टी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण अडवाणी रहे हैं लेकिन वेटिंग कन्फर्म नहीं हो पायी, तब पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को वेटिंग प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बनाया है लेकिन वेटिंग कन्फर्म हो पानी मुश्किल है। वहीँ, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव वेटिंग प्रधानमंत्री के तीसरे उम्मीदवार हैं वह तीसरे मोर्चे के वेटिंग प्रधानमंत्री हैं। उत्तर प्रदेश में बड़ी जोर-शोर से तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की पैरवी की जा रही है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मुलायम सिंह यादव ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश शाखा का विलय समाजवादी पार्टी में कई वर्ष पूर्व कर दिया था तत्कालीन पार्टी के सचिव मित्रसेन यादव समेत कई दिग्गज कम्युनिस्ट नेताओं ने रवीन्द्रालय में कम्युनिस्ट पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय कर दिया था। जनता दल को तोड़ने का भी काम सपा प्रमुख ने बखूबी निपटाया था। आज कितनी चालाकी से सपा तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की बात चुनाव के बाद कर रही है इसका मतलब यह है कि अगर कम्युनिस्ट पार्टियाँ उत्तर प्रदेश में एक आध सीट अपने दम पर जीत कर आये और उसके बाद उनको प्रधानमंत्री बनाने के लिए सपोर्ट करें और चुनाव में आमने सामने अपने दमखम का प्रदर्शन करें। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी का कोई अस्तित्व अन्य प्रदेशों में नही है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांग्रेस और भाजपा का ललकारते हुए ऐलान किया कि लोकसभा चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा सबसे बड़े समूह के रूप में उभरेगा। केंद्र में अगली सरकार तीसरे मोर्च की ही बनेगी। समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा, 2014 लोकसभा चुनाव में न तो कांग्रेस और न ही भाजपा की सरकार बनेगी। आम चुनाव के बाद तीसरा मोर्चे की सरकार बनेगी। हम लेफ्ट पार्टियों के संपर्क में हैं, चुनाव के बाद तीसरा मोर्चा का गठन होगा।
 सन 2011 में यह बयान काबिलेगौर है कि समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अवसरवादी है, वह अल्पसंख्यकों का वोट बटोरने के लिए तरह-तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि सपा को इस प्रकार की बयानबाजी से अधिक फायदा नहीं मिलने वाला है। भाकपा ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की तुलना करते हुये दिये बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए यही बात कही। भाकपा प्रदेश सचिव गिरीश और वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा कि सपा प्रमुख उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ताकतों को वाक ओवर देना चाहते हैं।
 अगर वाम ब्लाक को और भी अपनी दुर्गति करनी होगी और राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी पार्टी में अपनी अपनी पार्टियों का विलय करना होगा तो निश्चित रूप से तीसरे मोर्चे का वेटिंग प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव को बनायेगे। अब वेटिंग प्रधानमंत्री वेटिंग ही रहते हैं। 

सुमन 

शनिवार, 7 सितंबर 2013

लोकसभा चुनाव की पृष्टभूमि तैयार करने में लगे हैं सपा - भाजपा

उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के आने के बाद आये दिन सांप्रदायिक दंगो की बाढ़ आ गयी है उसका मुख्य कारण  यह है कि आगामी लोकसभा चुनाव में धार्मिक आधार पर वोटों का विभाजन करना है। इसी रणनीति को लेकर दंगे हो रहे हैं विगत दिनों मुजफ्फरनगर में दो मोटरसाइकिलो की टक्कर के बाद भड़की हिंसा ने तीन व्यक्तियों की जान ले ली थी और अब तक फिर दोनों सम्प्रदायों की व प्रशासन की मंशा के अनुरूप हुई हिंसा में12व्यक्तियों की जान ले ली जिसमें एक न्यूज़ चैनल के स्ट्रिंगर राजेश वर्मा की गोली मारकर हत्या हो गयी तथा एक फोटोग्राफर इसरार अहमद की भी मृत्यु कारित कर दी गयी। 35 व्यक्तियों से अधिक लोग घायल हो गए। कर्फ्यू लगा दिया गया है।
अगर शासन और प्रशासन निष्पक्ष व विधि सम्मत तरीके से काम कर रहा होता तो कोई भी बवाल या हिंसा होने का प्रश्न नही उठता है जब प्रशासन के अधिकारीगण समुदाय विशेष की तरफ से उनका उत्साह बढ़ाते हैं तभी सांप्रदायिक हिंसा उनके सहयोग से होती है। इस मामले में प्रदेश की पिछली सरकार का रिकॉर्ड बेहतर था क्यूंकि दंगों के लिए जिला प्रशासन को जिम्मेदार मानने की व्यवस्था थी। जब जिला मजिस्ट्रेट को यह मालूम होता है कि अगर दंगा हुआ तो मेरे खिलाफ कड़ी कार्यवाई होगी तो दंगे नहीं होते हैं। भाजपा उकसाती है और फिर सामान्य जनता में धार्मिक आधार पर उत्तेजना फैलती है। सरकार अगर चाहे तो अपनी सूझ बूझ से उत्तेजना को अपने कार्यों से निष्फल कर भाजपा की समस्त रणनीति को विफल कर सकती है लेकिन ताबड़तोड़ घटनाओ से यह सन्देश जा रहा है कि सरकार व सरकार के अधिकारीयों को उनका संरक्षण प्राप्त है। 
                       यदि अखिलेश सरकार वास्तव में दंगे रोकना चाहती है तो अविलम्ब अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था अरुण कुमार तथा डीजीपी देवराज नागर के खिलाफ सख्त करवाई कर प्रशसन को सख्त सन्देश देना चाहिए लेकिन यह दम अखिलेश सरकार में नहीं है।  84 कोसी परिक्रमा के मामले में भी सरकार की मंशा ध्रुवीकरण को ही लेकर थी।  अखिलेश सरकार नहीं चाहती है कि प्रदेश में कांग्रेस या धर्म निरपेक्ष दलों का उदय हो और उनकी पकड़ प्रदेश में हो, इसके लिए जातिवादी व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण आवश्यक है जो सपा के सरकार में आने के बाद किया जा रहा है।

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

सपा को सबक सिखाएंगे मुसलमान

सपा को सबक सिखाएंगे मुसलमान : मो. सुलेमान
8 महीने में दस दंगे सपा की मुस्लिम विरोधी साजिश को उजागर करती हैं: मो. सुलेमान
आर.डी. निमेष आयोग की रिपोर्ट जारी करने से बच रही है सरकार : मो. सुलेमान

 “मौजूदा सपा सरकार के आठ महीने के शासन में 10 बड़े दंगे होना कोई मामूली बात नहीं बल्कि एक सोची समझी साजिश का हिस्सा है” ये आरोप इंडियन नेशनल लीग के अध्यक्ष मो. सुलेमान ने अखिलेश सरकार पर लगाए। उन्होंने कहा कि इस मुस्लिम विरोधी साजिश का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि आतंकवाद के नाम पर बंद दो युवाओं की गिरफ्तारी पर उठे सवाल की जाँच के लिए गठित निमेष आयोग की रिपोर्ट सरकार के पास पड़ी हुई है। सरकार उसे सार्वजनिक करने से बच रही है। मो. सुलेमान, लीग द्वारा यूपी प्रेस क्लब में आयोजित सेमिनार हिन्दुस्तानी मुसलमान आजादी से पहले व आजादी से बाद विषयक सेमिनार में बोल रहे थे। सुलेमान ने  फैजाबाद के दंगों के लिए कथित सेकुलर सरकार की कारगुजारियों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि मुलायम का कुनबा फैजाबाद की हिंसा के पीड़ितों का हाल जानने भी नहीं पहुँचा। उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार में मुस्लिम अधिकारियों के शून्य प्रतिनिधित्व पर मो. सुलेमान ने सवाल भी खड़ा किया और मुसलमानों के उत्पीड़न पर एक न्यायिक आयोग भी बनाने की माँग की। उन्होने दावा किया कि 2014 के संसदीय चुनावों में मुसलमान सपा को सबक सिखाएंगे।   
सेमिनार को संबोधित करते हुए पूर्व आईपीएस अधिकारी एस. आर. दारापुरी  ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि आजादी के बाद मुसलमानों की स्थिति में चिंताजनक गिरावट आई है। इसका कारण सत्ता से मुसलमान तबके का दूर होना रहा। सांप्रदायिक दंगों के जरिए राज्य ने मुसलमानों को बदनाम किया जबकि हकीकत में दंगों की बड़ी कीमत सिर्फ मुसलमानों को चुकानी पड़ी। दारापुरी ने दावा किया कि इसमें पुलिस की भी खास भूमिका रही है।  क्योंकि निजी राजनीतिक फायदे के लिए पुलिस ने सत्ता तंत्र के इशारों पर दंगे भड़काने का काम किया है। अब मुसलमानों को आतंकवाद के नाम पर उत्पीड़ित किया जा रहा है। राज्य की भूमिका बहुत ही सांप्रदायिक और संवेदनशील हो गई है। इनके खिलाफ मुहिम चलाने की वकालत करते हुए आगे कहा की संवेधानिक अधिकारों के लिए यह बेहद जरूरी है कि बड़े पैमाने पर लोग इसके लिए आगे आए।
सेमिनार को संबोधित करते हुए अधिवक्ता मो. शुयेब ने कहा कि आजादी से पहले सरकारी नौकरियों मे मुसलमानों की हालत बेहतर थी। और मुसलमानों ने सेकुलर हिन्दुस्तान में रहना तय किया था क्योंकि उन्हें सांप्रदायिक सामजस्य का भरोसा था। मुसलमानों को दहशतगर्त साबित करने वाले लोग आखिर  कौन हैं? देश को इस बात का पता चलना चाहिए। शुऐब ने आगे कहा कि आजादी के बाद सिर्फ कुछ वक्त छोड़कर मुसलमान हमेशा कांग्रेस के साथ रहा। लेकिन कांग्रेस के साथ ही तमाम दूसरे धर्मनिरपेक्ष दलों ने जनसंघ, भाजपा का भय दिखा कर मुसलमानों को बरगलाया। ताकि सत्ता के दलाल अमेरिकी पूंजी परस्त कार्पोरेटों के लिए भारत में लूटपाट के लिए माहौल तैयार कर सकें। उन्होने कहा कि आतंकवाद और  इस्लाम के खिलाफ जंग का अमेरिकी प्रचार दरअसल मुसलमानों को उलझाकर साम्राज्यवाद की नीतियों को आगे बढ़ाने की साजिश है। दुर्भाग्य से उनकी मुहिम में अपने को राष्ट्रभक्त घोषित करने वाले सांप्रदायिक दल भी शामिल हैं। मो. शुऐब ने कहा कि मुसलमानों को साम्राज्यवादियों की साजिश को समझते हुए समाज की दूसरी क़ौमों के साथ आगे आना होगा। मुसलमान अपने किरदार से साबित करेंगे कि वे दहशतगर्द नहीं हैं। इसके लिए पूंजीवादी गिरोहों के मंसूबे को भी ध्वस्त करना होगा।
मैगसेसे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय ने  कहा कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति कमोबेश अमेरिका में रहने वाले अश्वेतों की तरह है। शैक्षणिक संथानों, नौकरियों , व्यवसाय आदि में उनकी भागीदारी नहीं है दूसरी ओर आबादी के अनुपात में सबसे ज्यादा लोग इसी समुदाय से हैं जो जेलों में बंद हैं। सपा सरकार पर चुटकी लेते हुए कहा कि शासन करने वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टियां भी इसका हल नहीं ढूंढ पा रही हैं। ईमानदारी से मुसलमानों की हालत को सुधारने के लिए विभिन्न कमेटेयों की सिफ़ारिशे लागू की जानी चाहिए। सेमिनार को प्रमुखता से संबोधित करने वालों में इ.ने.लीग के राष्ट्रीय सचिव रामजी यादव, ताहिरा हसन, शाहनवाज आलम, ज़ियाउल्ला रफ़ीक, डी.एम. खान, रफी अहमद आदि भी शामिल रहें।  कार्यक्रम की अध्यक्षता नेशनल लीग के प्रदेश अध्यक्ष जनाब मोहम्मद समी ने किया। जबकि संचालन कमरूद्दीन कमर ने किया।

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

सपा सरकार दंगाइयों की सरकार

फैजाबाद 29 अक्टूबर 2012/ फैजाबाद में हुए दंगों की जांच के लिए रिहाई मंच के एक जांच दल ने 28 अक्टूबर को फैजाबाद के कफर््यू ग्रस्त इलाकों का दौरा किया। जांच दल ने पाया कि दंगा पूर्वनियोजित था, जिसकी तस्दीक यह बात करती है कि बहुत कम समय में फैजाबाद के कई स्थानों पर टकराव, व तनाव का होना है। 21-22 सितंबर की रात देवकाली मंदिर की मूर्ती के चोरी होने और 23 अक्टूबर को उसके मिलने का प्रकरण और उस पर हुई सांप्रदयिक राजनीति इस दंगे की प्रमुख वजहों में से एक थी। हिन्दुत्वादी समूहों के अफवाह तंत्र ने आमजनमानस के भीतर इस बात को भड़काया कि देवकाली की प्रतिमा को मुसलमानों ने चोरी किया। केंद्रिय दुर्गा पूजा समिति फैजाबाद ने भी कहा था कि वो पूजा पांडालों पर विरोध स्वरुप पांडालों को कुछ घंटों तक दर्शन के लिए बंद रखा जाएगा। यहां गौरतलब है कि केंद्रिय दुर्गा पूजा समिति फैजाबाद के अध्यक्ष मनोज जायसवाल समाजवादी पार्टी के भी नेता हैं। पर ऐन वक्त 23 अक्टूबर को मूर्तियों के बरामद होने के बाद हिन्दुत्वादी शक्तियों के मंसूबे पस्त हुए। क्योंकि मूर्ति की चोरी में पकड़े गए लोग हिंदू निकले ऐसे में ऐन वक्त में पहले से प्रायोजित दंगों के लिए अफवाहों का बाजार गर्म करके जगह-जगह पथराव करके दंगे की शुरुआत की गई। पहले से तैयार भीड़ ने प्रायोजित तरीके से सैकड़ो साल पुरानी मस्जिद हसन रजा खां पर हमला बोला ओर उसके आस-पास की तकरीबन तीन दर्जन से ज्यादा दुकानों में लूटपाट व आगजनी की और पूरे फैजाबाद को दंगे की आग में झोक दिया।

पुलिस की निस्क्रियता का यह आलम रहा कि चैक इलाके की साकेत स्टेशनरी मार्ट को दंगे के दूसरे दिन 25 अक्टूबर को पुलिस की मौजूदगी में फूंका गया। बाद में जब दुकान के मालिक खलीक खां ने प्रशासन से एफआईआर दर्ज करने की मांग की तो यह कहकर पुलिस ने हिला हवाली की कि बिजली की शार्ट शर्किट की वजह से आग लगी।

जांच दल के आलोक अग्निहोत्री, राजीव यादव और सुब्रत गुप्ता ने कहा कि प्रथम दृष्ट्या प्रयोजित दंगों में अफवाह तंत्र के सक्रिय होने और फैजाबाद प्रशासन की निष्क्रियता के चलते दंगाइयों का मनोबल बढ़ा और कुछ घंटों में उन्होंने प्रायोजित तरीके से आगजनी और लूट-पाट की। जांच दल के सामने यह तथ्य आये, कि दंगे को दशहरा-ईद-दीपावली के ऐन वक्त कराने के पीछे दंगाइयों की यह मानसिकता भी सामने आई की ज्यादा से ज्यादा लूट और आगजनी करके मुस्लिम समुदाय को नुकसान पहुंचाना।

रिहाई मंच द्वारा फैजाबाद दंगों के तथ्य संकलन का काम जारी है। मंच ने प्रथम दृष्ट्या तथ्यों के आधार पर यह वक्तव्य जारी करते हुए देश के विभिन्न मानवाधिकार सामाजिक व राजनीतिक संगठनों से अपील की है कि वो फैजाबाद के उक्त घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए अपनी जनपक्षीय प्रतिबद्धताओं व सरोकारों के साथ साम्प्रदायिक ताकतों का प्रतिरोध करें।
-राजीव यादव

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

वामपंथ का नाश हो ?

एक भूखे ने गंदे तालाब से एक मोटी मछली पकड़ी। दौड़ता हुआ भूखे बीबी-बच्चों के पास आया। बीबी से मछली पकाकर भूखे बच्चों का पेट भरने को कहा। बीबी बोली " न गैस, न केरोसिन, न तेल, न बिजली, न चावल, न आटा। मै क्या करूँ इसका।" भूखा वापस तालाब गया, मछली को वापस तालाब में फेंक दिया। मछलियों ने नारा लगाया -
" सप्रंग 2 जिंदाबाद !
 राजग जिंदाबाद !
 सपा-बसपा अमर रहे !
 वामपंथ का नाश हो !"

एक एसएमएस

सोमवार, 30 जुलाई 2012

सपा राज में शुरु हुई दंगों की राजनीति


यूपी के सपा राज में महीने दर महीने साम्प्रदायिक दंगों की रोज नई घटनाएं सामने आ रही हैं। अभी मथुरा के कोसी कला और प्रतापगढ़ के अस्थान के दंगों की आग बुझी भी नहीं थी कि बरेली फिर दंगों की आग में झुलस गया।
दंगे की मुख्य वजह यह थी कि नमाजियों का कहना था कि नमाज के वक्त कावरिए तेज आवाज में लाउडर न बजाएं, पर वे माने नहीं। एक बार फिर पूर्व नियोजित फिरकापरस्त ताकतों ने पूरे शहर को दंगे में झोक दिया।
गौर किया जाए तो इस इलाके में कावरियों को लेकर पिछले कई सालों से तनाव होते आ रहे हैं। दरअसल इसके पीछे हिन्दुत्वादी ताकतों का हाथ है। जिस तरह से शाहबाद इलाके में नमाज के वक्त तेज साउंड सिस्टम को बजाने व बंद करने को लेकर यह तनाव शुरु हुआ, ऐसा प्रयोग हिन्दुत्वादी शक्तियां आजादी के बाद ही नहीं उससे पहले भी करती रही हैं। तीस-चालीस के दशक में तो एक पूरा अभियान ही चलाया गया था कि जुमे की नमाज के वक्त मस्जिदों के सामने जाकर भजन-कीर्तन और नगाड़े बजाने का। उस दौर में इलाहाबाद के कर्नलगंज इलाके में हुए दंगे के गर्भ में भी यही साजिश थी। जिसमें मुख्य अभियुक्त के रुप में हिंदुत्ववादी मदन मोहन मालवीय थे।

बरेली में दूसरे दिन यानी 23 जुलाई को भी दंगा अपनी गति में रहा पर दिन के उजाले में जो मंजर देखने को आया उसने साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी की सरकार दंगे पर काबू नहीं पाना चाहती। जहां एक ओर दंगे में मारे गए इमरान के जनाजे को रोका गया तो वहीं कावरियों के जत्थे को तेज आवाज के साउंड सिस्टम बजाते हुए कर्फ्यू क्षेत्र से पुलिस के प्रोत्साहन में निकाला गया।
मंजर पर बरेली कालेज के शिक्षक और पीयूसीएल नेता जावेद साहब की बातें चुभ जाती हैं कि यह ‘मुस्लिम कर्फ्यू’ है। बंद घरों में लोग अपने आंगन में आसमान में धुंआ उठता देखते हैं, और जलती दुकानों-घरों की आंच को महसूस करते हैं और अंदाजा लगाते हैं कि किसका आसियाना जला। एक लंबे समय अन्तराल के बाद पुलिस के सायरन की आवाजों के बीच फायर ब्रिगेड की घंटी की आवाज की टन-टनाहट उन्हें पागल कर देती है। यह सब उस सपा सरकार में हो रहा है, जिसके मुखिया मुलायम सिंह कहते हैं कि उन्हें मुसलमानों ने सौ फीसदी वोट देकर सत्ता में लाया है।
23 जुलाई को ही प्रतापगढ़ के अस्थान गांव में भी प्रवीण तोगडि़या जाते हैं और खुलेआम मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलते हैं। पिछले महीने अस्थान में हुए दंगे में दर्जनों मुस्लिमों के घरों को दंगाइयों ने खाक कर दिया था। इस दंगे में प्रदेश के कारागार मंत्री रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया के लोगों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।
सपा के राज में एक बार फिर से हिन्दुत्ववादी ताकतें प्रायोजित तरीके से दंगें भड़कानें का काम कर रही हैं। फैजाबाद जो पिछले तीन दशक से सांप्रदायिक राजनीति की राजधानी बन गया है वहां भी 23 जुलाई की शाम दंगा भड़काने की कोशिश हुई। अयोध्या शहर से सटे हुए शहादतगंज के पास के गांव मिर्जापुर में नवाज के ऐन वक्त पुलिस मस्जिद में ताला जड़ देती है। भारी तनाव के बाद ईशा की नवाज तो अदा हो गई पर शहर एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा के अंदेशे से सहम गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक इस मस्जिद की उम्र सौ साल से ज्यादा है। 22 जुलाई को अयोध्या में गोरखपुर के सांसद और हिंदू युवा वाहिनी के संचालक योगी आदित्यनाथ शहर में आए थे। शहर में हुए इस तनाव के पीछे भी हिन्दुत्वादी ताकतों का हाथ सामने आ रहा है।
पा राज में हो रहे दंगों में प्रशासन की उदासीनता यह बताती है कि एक बार फिर से आम-आवाम के बीच सांप्रदायिकता का जहर घोल करके मूलभूत मुद्दों से भटकाने की राजनीति शुरु हो गई है।

-राजीव यादव
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