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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

अलीगढ़ विश्वविद्यालय, राजा महेन्द्र प्रताप और धु्रवीकरण के प्रयास

सांप्रदायिक राजनीति के झंडाबरदारों को न केवल धार्मिक आधार धु्रवीकरण करवाने की कला में महारत हासिल है वरन् वे इसके नए-नए तरीके भी ईजाद करते रहते हैं। मुजफ्फरनगर में इसके लिए ‘लव जिहाद’ का इस्तेमाल किया गया तो अलीगढ़ में अतुलनीय गुणों के धनी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नाम का उपयोग इसी उद्देष्य से किया जा रहा है।
भाजपा और उसके साथी संगठनों ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के केम्पस में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की याद में एक कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की। विश्वविद्यालय के कुलपति ने आयोजकों के कुत्सित इरादों को नाकामयाब करने के लिए यह घोषणा कर दी कि   विश्वविद्यालय स्वयं अपने इस पूर्व छात्र के स्वाधीनता संग्राम में योगदान पर सेमीनार का आयोजन करेगा। भाजपा ने इस जानेमाने व्यक्तित्व का दुरूपयोग करने का इरादा इसलिए बनाया क्योंकि उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी आम लोगों के मन में उनके प्रति बहुत सम्मान का भाव है। ठीक इसी मौके पर यह मुद्दा क्यों उठाया गया, इस प्रश्न का उत्तर दिलचस्प है। महेन्द्र प्रताप की 29 अप्रैल 1979 को मृत्यु हो गई थी। इतने वर्ष बाद, भाजपा को अचानक उनकी याद आ गई क्योंकि उसे लगा कि उनकी जाट और हिंदू पहचान का उपयोग, पार्टी अपने राजनीतिक खेल के लिए कर सकती है। महेन्द्र प्रताप अप्रितम स्वाधीनता संग्राम सेनानी, पत्रकार और लेखक थे। वे मानवतावादी थे और धार्मिक व राष्ट्रीय सीमाओं से परे, दुनिया के सभी देशों का महासंघ बनाने के विचार से प्रेरित थे। वे माक्र्सवादी थे और सामाजिक सुधार और पंचायतों के सशक्तीकरण के पक्षधर थे। वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम सेनानी संगठन के अध्यक्ष थे। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने काबुल में सन् 1915 में भारत की निर्वासित सरकार बनायी थी। यहां यह याद रखना प्रासंगिक होगा कि इसके काफी वर्षों बाद, सन् 1929 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा गठित निर्वासित सरकार को हुकूमत-ए-मुख्तर-ए-हिंद कहा जाता था। इस सरकार के मुखिया महेन्द्र प्रताप थे, मौलवी बरकतउल्लाह इसके प्रधानमंत्री और मौलाना औबेदुल्ला सिंधी आतंरिक मामलों के मंत्री थे।
स्वाधीनता के बाद, राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 1957 के लोकसभा चुनाव में मथुरा लोकसभा क्षेत्र में अटल बिहारी वाजपेयी को पराजित किया था। यह तथ्य कि वे तत्कालीन भारतीय जनसंघ के नेता वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़े और जीते ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि वे सांप्रदायिक ताकतों के धुर विरोधी थे। यह विडंबना ही है कि ऐसे व्यक्ति को योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा नेता अपनी संकीर्ण राजनीति के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि अगर राजा महेन्द्र प्रताप ने अपनी जमीन दान न दी होती तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) आज अस्तित्व में न होता। यह दावा तथ्यों के विपरीत है। एएमयू के पूर्ववर्ती ‘‘मोहम्मडन एंग्लो ओरिएन्टल काॅलेज’’ की स्थापना सन् 1886 में हुई थी और इसका भवन, ब्रिटिश  केन्टोरमेंट की लगभग 74 एकड़ जमीन को खरीदकर बनाया गया था। इसके काफी बाद, सन् 1929 में, प्रताप ने अपनी 3.04 एकड़ भूमि, जिसे तिकोनिया ग्राउण्ड कहा जाता है, एएमयू को दान दी। इस जमीन का उपयोग एएमयू के सिटी हाईस्कूल के खेल के मैदान के रूप में किया जाता है। उन्होंने सन् 1895 में इस काॅलेज में दाखिला लिया था परंतु वे वहां अपनी स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। उन्होंने 1905 में इस काॅलेज को छोड़ दिया। सन् 1920 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएन्टल काॅलेज (एमएओ), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बन गया और यह विश्वविद्यालय आज भी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को अपना पूर्व छात्र मानता है। सन् 1977 में एमएओ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह में एएमयू के तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर ए.एम. खुसरो ने राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का सम्मान किया था।
जिस समय एएमओ की स्थापना हुई थी, उस समय राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का जन्म भी नहीं हुआ था अतः उनके द्वारा इस संस्था को कोई जमीन दान दिए जाने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। हां, यह जरूर है कि महेन्द्र प्रताप के पिता मुरसान के राजा घनश्याम सिंह ने इस काॅलेज के होस्टल में एक कमरे का निर्माण करवाया था जो आज सर सैय्यद हाॅल (दक्षिण) का कमरा नंबर 31 है।
भाजपा की मांग है कि एएमयू को राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती उसी तरह मनानी चाहिए जिस तरह वहां विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान की जयंती मनाई जाती है। आरएसएस और भाजपा के नेताओं ने ऐसा करने के लिए एएमयू के कुलपति पर दबाव बनाया। कुलपति का तर्क यह था कि एएमयू अपने हर पूर्व छात्र या दानदाता की जयंती नहीं मना सकता, यद्यपि वह, विश्वविद्यालय के निर्माण में उनकी भूमिका का सम्मान करता है। प्रताप के विश्वविद्यालय के निर्माण में योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए यूनिवर्सिटी में सर सैय्यद के चित्र के बगल में महेन्द्र प्रताप का चित्र भी लगाया गया है।
गत 17 नवंबर को उत्तरप्रदेश  भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और महासचिव स्वतंत्र देव सिंह अलीगढ़ पहुंचे और उन्होंने पार्टी की जिला इकाई को यह निर्देष दिया कि महेन्द्र प्रताप की जयंती मनाने के लिए एएमयू के प्रांगण में कार्यक्रम आयोजित किया जाए। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह, जाट नेता भी माने जाते हैं। आम धारणा यह है कि एएमयू एक मुस्लिम संस्थान है। सांप्रदायिक ताकतों द्वारा जाटों और मुसलमानों के बीच विवाद पैदा कर, मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगे भड़काएं गए थे। अब, भाजपा एक जाट राजा का महिमामंडन कर इस तनाव को बढ़ाना चाहती थी। यह एक सुनियोजित चाल थी जिसके तहत  भाजपा, इलाके के एक सम्मानित व्यक्ति को अपनी राजनीति का अंग बना लेती और अगर राज्य सरकार इस समारोह के आयोजन पर रोक लगाती तो उस पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का आरोप जड़ दिया जाता।
इस षड़यंत्र को विफल करने के लिए एएमयू के कुलपति लेफ्टिनंेट जनरल जमीरउद्दीन शाह ने यह प्रस्ताव किया कि राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती को मनाने के लिए एएमयू, भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका पर एक सेमिनार का आयोजन करेगा। यह एक स्वागत योग्य पहल थी। इससे कम से कम कुछ समय के लिए विवाद टल गया। अगर कुलपति यह प्रस्ताव नहीं करते तो भाजपा का इरादा एएमयू के मुख्य द्वार पर रैली करने का था जिससे तनाव बढ़ने और हिंसा भड़कने की संभावना होती।
इस घटनाक्रम के कई सबक हैं। पहला तो यह कि भाजपा अपनी सांप्रदायिक राजनीति के हित साधने के लिए राष्ट्रीय नेताओं के नाम का इस्तेमाल कर रही है, फिर चाहे वे सरदार पटेल हों, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी या इस मामले में राजा महेन्द्र प्रताप। इन नेताओं के जीवन के केवल उस पक्ष को प्रचारित किया जा रहा है जिससे सांप्रदायिक ताकतों को लाभ मिले। महेन्द्र प्रताप एक मार्क्सवादी थे परंतु उन्हें केवल एक जाट नेता बताया जा रहा है। वे धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति के खिलाफ थे और यह इससे स्पष्ट है कि उन्होंने भारतीय जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ा और वाजपेयी को पराजित किया था।
दूसरा यह कि भाजपा और उसके साथी, व्यक्तियों की केवल धार्मिक पहचान को प्रमुखता देने का षड़यंत्र रच रहे हैं चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान। मुजफ्फरनगर में जाटों को लव जिहाद के नाम पर हिंदुत्ववादी झंडे के नीचे लाने का प्रयास किया गया। हिंदू धार्मिक पहचान को ‘दूसरी’ धार्मिक पहचान के विरूद्ध खड़ा किया जाता है जो मुस्लिम और कभी-कभी ईसाई होती है। यही खेल दिल्ली के कुछ हिस्सों में भी खेला जा रहा है जहां दलितों को मुसलमानों के खिलाफ भडकाया जा रहा है। इस तरह दो वंचित समुदायों को ‘उनके धर्म’ या आस्था से जुड़े किसी भी मुद्दे के बहाने एक दूसरे से लड़वाया जा रहा है।
सांप्रदायिक राजनीति न केवल आम लोगों को उनकी धार्मिक पहचान से जोड़ने की कोशिश  कर रही है वरन् जानीमानी हस्तियों के साथ भी ऐसा ही किया जा रहा है, जैसा कि राजा महेन्द्र प्रताप के मामले में किया गया। तीसरा सबक जो हमारे समाज को सीखना चाहिए वह यह है कि सांप्रदायिक शक्तियां विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक-दूसरे से लड़वाने के लिए मुद्दों की तलाश  में हैं। जहां इन ताकतों का शीर्ष  नेतृत्व सभी प्रकार की हिंसा पर रोक की बात करता रहता है वहीं इसी नेतृत्व के चेले चपाटी सांप्रदायिकता की आग को भड़काने के उपाय ढूंढते रहते हैं।
इस माहौल में हम सब को सावधान रहने और धैर्य व समझदारी से काम करने की जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि महेन्द्र प्रताप जैसे लोग प्रेम, शान्ति और वैशिविक मानवतावाद के पैरोकार थे न कि किसी धर्म या जाति के नेता। केवल धार्मिक पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रीय नेताओं का वर्गीकरण करना घोर अनैतिक है चाहे फिर वे नेता किसी भी धर्म के क्यों न हों।
-राम पुनियानी
        


सोमवार, 25 अगस्त 2014

क्या प्रेम को धर्म की सीमाओं में बांधा जा सकता है ?

सारे विश्व में,संबंधित समुदाय के 'सम्मान' को, उस समुदाय की महिलाओं के शरीर से जोड़कर, संकीर्ण व सांप्रदायिक ताकतें,हिंसा और तनाव फैलाती आईं हैं। यह सांप्रदायिक राजनीति में निहित पितृसत्तात्मक मूल्यों का प्रकटीकरण है। हमें यह याद है कि किस प्रकार अलग.अलग समुदायों के दो युवकों के वाहनों की टक्कर को 'हमारी लड़की' की इज्जत को 'दूसरों' द्वारा लूटने का स्वरूप दे दिया गया था। पंचायतें हुईं, जिनमें खुलेआम घातक हथियार लहराये गए और मुजफ्फरनगर को हिंसा के दावानल में ढकेल दिया गया। और यहए 'हमारी महिलाएं बनाम उनकी महिलाएं' मानसिकता और उसके दुरूपयोग का अंत नहीं था। आज भी उत्तरप्रदेश में कई ऐसी गतिविधियां जारी हैंए जिनका उद्देश्य समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करना है।
एक मदरसा शिक्षिका ने आरोप लगाया कि उसे कुछ मुस्लिम युवकों ने अगवा किया और उसके साथ बलात्कार किया। वह अपने बयान बार.बार बदलती रही और अंत में उसने स्वीकार कर लिया कि वह अपने प्रेमी के साथ भागी थी। इस रक्षाबंधन ;अगस्त 2014 पर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में आरएसएस कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में लोगों की कलाईयों पर राखी बांधी और उनसे कहा कि उन्हें मुसलमान लड़कों द्वारा 'लव जिहाद' के लिए हिन्दू लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाने की कोशिशों के प्रति सावधान रहना चाहिए। मुसलमान युवकों द्वारा हिन्दू लड़कियों के साथ छेड़छाड़ और उन्हें फंसाने के प्रयास, इन दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश में, आरएसएस के प्रचार का मुख्य मसाला बन गए हैं। जहां प्रधानमंत्री, लालकिले की प्राचीर से, सांप्रदायिकता व जातिवाद पर दस साल के लिए रोक लगाने की बात कर रहे हैं वहीं उनकी ही पार्टी के चंद्रमोहन, जो कि उत्तरप्रदेश में भाजपा प्रवक्ता हैं, फरमाते हैं कि'मदरसा शिक्षिका के साथ जो कुछ हुआ वह'वैश्विक लव जिहाद' का हिस्सा है,जिसके निशाने पर भोलीभाली हिंदू नवयुवतियां हैं।'भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस की शाखाओं के बाद, उसके स्वयंसेवक घर.घर जाकर लोगों को 'लव जिहाद के खतरे' के प्रति आगाह करते हैं और'हमारी लड़कियों' की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। मुजफ्फरनगर हिंसा पर'अनहद' की रपट 'ईविल स्टाक्स द लैण्ड'  इस झूठ का पर्दाफाश करती है कि 'मुसलमान युवक, हिंदू लड़कियों से इसलिए बात करते हैं ताकि वे उन्हें बहला.फुसला कर उनके साथ शादी कर लें और बाद में उन्हें मुसलमान बना लें।' यही वह मुद्दा है जिसका इस्तेमाल दंगे भड़काने के लिए किया गया था। पश्चिमी उत्तरप्रदेश के सहारानपुर में इन दिनों एक बाबा रजकदास बड़ी चर्चा में हैं। वे उन हिंदू लड़कियों का 'इलाज' करते हैं जो मुस्लिम लड़कों से प्रेम करती हैं!
हिंदुओं को हिंसा करने के लिए भड़काने हेतु जिस 'लव जिहाद' शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसका अजीबोगरीब इतिहास है। इस शब्द के दो हिस्से हैं.लव और जिहाद। और जिसने भी इस शब्द को गढ़ाए उसे शायद यह नहीं मालूम था कि इन दोनों शब्दों के नितान्त विपरीत अर्थ हैं। 9-11-2001 के बाद से जिहाद शब्द का इस्तेमालए मीडिया द्वारा नकारात्मक अर्थ में किया जाता रहा है और यह नकारात्मक अर्थ, धीरे.धीरे सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया है। कुरान के अनुसार जिहाद का अर्थ है कोशिश या प्रयास करना। परंतु मीडिया में उसे गैर.मुसलमानों को मारने के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। लव जिहाद शब्द किसी शैतानी दिमाग की उपज है और इसका इस्तेमाल मुसलमानों के दानवीकरण के लिए किया जा रहा है। ऐसा प्रचार किया जा रहा है कि कुछ मुस्लिम संगठन, मुसलमान युवकों को इसलिए धन उपलब्ध करवाते हैं ताकि वे गैर.मुस्लिम लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसायें और उनसे शादी कर मुसलमानों की आबादी में बढ़ोत्तरी करें। यह अफवाह भी फैलाई जा रही है कि मुसलमान युवकों को धन इसलिये दिया जाता है ताकि वे नईए चमकीली मोटरसाइकिलें और महंगें मोबाइल सेट खरीद सकें।
अगर गूगल पर आप यह टाईप करें कि ष्ष्वाय हिन्दू गर्ल्सष्ष् ;क्यों हिंदू लड़कियांद्ध तो सर्च इंजन अपने आप इस वाक्य को कुछ यूं पूरा कर देता है 'आर अट्रेक्टिड टू मुस्लिम बायस' ;मुसलमान युवकों के प्रति आकर्षित होती हैं!  महाराष्ट्र में 'हिन्दू रक्षा समिति' नामक एक संस्था ऐसे हिन्दू.मुस्लिम विवाहित जोड़ों में तलाक करवाने की मुहिम चला रही है जिनमें कि पत्नी हिन्दू है। संस्था का दावा है कि वह हिन्दू धर्म को बचाने के लिए यह कर रही है। ऐसा नहीं है कि इस तरह के दंपत्तियों की संख्या बहुत बड़ी है परंतु केवल संदेह के आधार पर हीए हिंदू धर्म के स्वनियुक्त रक्षक,संबंधित युवक पर हिंसक हमले करने से नहीं चूकते। मराठी में लव जिहाद पर प्रकाशित एक पुस्तिका में एक मुस्लिम युवक को मोटरसाईकिल चलाते हुए दिखाया गया है और उसके पीछे एक हिन्दू लड़की बैठी है। यह शब्द इतना प्रचलन में आ गया है कि संघ से जुड़े केरल के एक ईसाई संगठन नेए संघ परिवार की एक सदस्य विहिप से लव जिहाद रोकने के लिए कहा है। सच यह है कि लव जिहाद जैसी कोई चीज ही अस्तित्व में नहीं है।
भारत में इस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल तटवर्ती कर्नाटक के मैंगलोर शहर व केरल के कुछ हिस्सों में शुरू हुआ। आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक प्रमोद मुताल्लिक द्वारा स्थापित श्री राम सेना ने हिंदू पत्नी.मुस्लिम पति दंपतियों पर हमले करने शुरू किए। इस तरह की शादियों को संदेह की निगाह से देखा जाने लगा और अगर लड़की के माता.पिता इस तरह के विवाह के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करते, तो श्रीराम सेने उन्हें मामले को अदालत में ले जाने में मदद भी करती थी। बहाना यह बनाया जाता था कि हिन्दू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों के साथ शादी करने पर'मजबूर' किया जा रहा है। सिजालराज व अजहर के मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक जज ने अपने फैसले में यहां तक कह डाला कि तथ्य ;लव जिहाद राष्ट्रव्यापी महत्व के हैं......इनका संबंध देश की सुरक्षा व महिलाओं की गैर.कानूनी तस्करी से है'! इसलिए अदालत ने कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक व महानिरीक्षक को यह आदेश दिया कि वे 'लव जिहाद' की विस्तृत जांच करें। जांच पूरी होने तक लड़की को उसके माता.पिता के पास ही रहने का आदेश दिया गया। मामला एक सामान्य हिन्दू.मुस्लिम विवाह का था। लड़की अपनी बात पर दृढ़ रही और सामाजिक दबाव के आगे नहीं झुकी। पुलिस जांच में यह सामने आया कि लव जिहाद जैसी कोई चीज अस्तित्व में नहीं है।
इसके पहले, इसी तरह के मामले में दो अभिभावकों की अपील पर केरल उच्च न्यायालय ने भी ऐसा ही निर्णय दिया था। दो हिन्दू लड़कियां अपने घर से भाग गईं। उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया और उनका इरादा मुस्लिम लड़कों से शादी करने का था। केरल उच्च न्यायालय ने भी पुलिस को इस तरह की घटनाओं की जांच करने का आदेश दिया। पुलिस जांच में फिर यह सामने आया कि लव जिहाद जैसी कोई अवधारणा नहीं है। यह आरोप बेबुनियाद है कि इस तरह के विवाहों को किसी संगठन या समूह द्वारा प्रोत्साहित किया जा रहा है। परंतु दुर्भाग्यवश ऐसी आम धारणा बन गई है कि देश में लव जिहाद चल रहा है।
श्रीराम सेना ने यह दावा किया कि लगभग 4000 हिन्दू लड़कियों को मुसलमान बना लिया गया है। इस झूठ को हर संभव तरीके से फैलाया गया। इस हास्यास्पद,काल्पनिक दावे का इतना प्रचार हुआ कि हिन्दू लड़कियों के अभिभावक डर गये। कई मामलों में, जिनमें कि लड़कियां सचमुच मुसलमान लड़कों से प्रेम करती थीं और अपनी इच्छा से मुसलमान बनना चाहती थीं, उन्हें भी अपने अभिभावकों के साथ रहने पर मजबूर होना पड़ा। अभिभावकों द्वारा लड़कियों का इस हद तक भावनात्मक ब्लेकमेल किया गया कि कुछ लड़कियों ने हथियार डाल दिये और यह कह दिया कि उन्हें फंसाया गया थाए जिहादी सीडी दिखाई गई थी इत्यादि।
इसी तरह का प्रचार, गुजरात कत्लेआम के बाद भी किया गया था। यह कहा जाता था कि 'मुस्लिम लड़के आदिवासी लड़कियों को फंसा रहे हैं।' विहिप.बजरंग दल के एक कार्यकर्ता बाबू बजरंगी ने गुण्डों की एक सेना तैयार की थी जो ऐसे प्रेमी युगलों पर हमले करती थी और उन्हें डराती धमकाती थीए जिनमें लड़के और लड़की अलग.अलग धर्मों के होते थे। बाबू बजरंगी ने गुजरात कत्लेआम में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। मजे की बात यह है कि इस हिंसा और गैरकानूनी कार्यवाहियों को धर्मरक्षा का नाम दिया जाता था। तथ्य यह है कि किसी भी बहुवादी समाज में अंतर्जातीय और अंतर्धामिक विवाह होना सामान्य और स्वाभाविक है। सांप्रदायिक राजनीति के परवान चढ़ने के साथ हीए अंतर्धामिक विवाह कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गये हैं। हम सब को रिजवान.उर.रहमान और प्रियंका तोडी का त्रासद विवाह याद है। प्रियंका, कलकत्ता के एक अत्यंत धनी व प्रभावशाली व्यवसायी की पुत्री हैं। अपने अभिभावकों व रिश्तेदारों के दबाव में आकर वे पलट गईं। उसके बाद क्या और कैसे हुआ यह किसी को ज्ञात नहीं है परंतु जो ज्ञात है वह यह है कि रिजवान.उर.रहमान को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा। इस तरह के सभी मामलों में पुलिस और राज्यतंत्र का व्यवहार, कानूनी प्रावधानों व कानून की आत्मा के विरूद्ध ही रहा है। जिन्हें कानून की रक्षा करनी चाहिए वे गैर.कानूनी कार्यवाहियां करने वालों का साथ देते नजर आते हैं।
अंतर्जातीय व अंतर्धामिक विवाहों के खिलाफ इस तरह के अभियान न केवल राष्ट्रीय एकता को कमजोर करते हैं वरन् वे पितृसत्तात्मकता के सिद्धांतों के अनुरूप,लड़कियों के जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश भी हैं। महिलाओं के शरीर को संबंधित समुदाय के सम्मान से जोड़ दिया जाता है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ भावनाएं भड़काई जाती हैं और समाज को विभाजित किया जाता है। इससे संप्रदायवादी राजनीति कई तरह से लाभांवित होती है। चूंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं को पुरूषों की संपत्ति समझा जाता है और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे पुरूषों द्वारा निर्धारित सीमाओं में रहें, अतः इस तरह के मुद्दों पर भावनाएं भड़काना आसान होता है। अल्पसंख्यकों को निशाना बनानाए सांप्रदायिक राजनीति के एजेण्डे का हिस्सा है। जाहिर है कि काल्पनिक 'लव जिहाद' के खिलाफ अभियान से एक तरफ मुसलमान घृणा के पात्र बनते हैं तो दूसरी ओर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूती मिलती है।
कुछ समय पूर्व तक यह सब कुछ हिन्दू लड़कियों के जीवन को नियंत्रित करने के लिए किया जाता था.यह सुनिश्चित करने के लिए कि लड़कियां अपनी पसंद का जीवनसाथी न चुन सकें। परंतु अब इससे एक कदम और आगे बढ़करए लव जिहाद का इस्तेमाल सांप्रदायिक दंगे करवाने के लिए किया जा रहा है जैसा कि हमने मुजफ्फरनगर में देखा। लगभग हमेशा ही सांप्रदायिक दंगे, झूठी अफवाहें फैलाकर भड़काए जाते हैं। यही लव जिहाद के मामले में भी हो रहा है। वाट्सएप और फेसबुक पर यह आरोप लगाया जाना आम है कि लव जिहाद,मुसलमानों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रचे गए षडयंत्र का हिस्सा है। यहां तक कि जोधा और अकबर के विवाह को भी इस तरह के षडयंत्र का हिस्सा बताया जा रहा है। हम सब जानते हैं कि राजा और बादशाह,राजनैतिक गठबंधन बनाने के लिए इस तरह के वैवाहिक संबंध बनाया करते थे परंतु जोधा अकबर की कथा का भी सांप्रदायिक ताकतें अपने निहित स्वार्थ पूरा करने के लिए निहायत कुटिलतापूर्वक इस्तेमाल कर रही हैं।
जहां तक महिलाओं के अधिकारों को कुचलने का प्रश्न है, इस मामले में भारत में संघ परिवार,अफगानिस्तान में तालिबान, पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथी तत्व और पूरी दुनिया के ईसाई कट्टरपंथी एकमत हैं। वे सभी महिलाओं को पुरूषों का गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। चाहे श्रीराम सेना  हो या बाबू बजरंगी या मुजफ्फरनगर में हिंसा भड़काने वाले तत्व. सभी यह मानकर चलते हैं कि महिलाएं, पुरूषों की संपत्ति हैं और उनके जीवन पर नियंत्रण रखना पुरूषों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस तरह के मामलों में इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि सच क्या है। मिथकों को लोगों के दिमाग में बैठा दिया जाता है। आरएसएस और उससे जुड़े संगठन,लव जिहाद के नाम पर सांप्रदायिकता का जहर घर.घर और मोहल्ले.मोहल्ले फैला रहे हैं।
-राम पुनियानी

बुधवार, 18 सितंबर 2013

मुजफ्फरनगर हिंसा : एक अलग तरह का धु्रवीकरण

साम्प्रदायिक हिंसा, भारतीय समाज का अभिशाप बनी हुई है, विशोषकर पिछले तीन दशकों से। भारत में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत सन 1893 में हुई और तब से समयसमय पर इसमें ब़ोत्तरी और कमी होती रही। सन 1937 के बाद से इसमें तेजी से वृद्धि हुई और इसका चरम थे सन 1946 में भड़के दंगें, जिनकी आग देश के विभाजन के बाद भी शांत नहीं हुई और जिनने लाखों परिवारों को उजाड़ दिया। स्वतंत्रता के बाद एक दशक से भी कुछ लंबे समय तक देश साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्त रहा। दंगों के दानव ने स्वतंत्रता के बाद, पहली बार सिर उठाया सन 1961 में, जब जबलपुर में साम्प्रदायिक दंगा भड़क उठा। सन 1984 की सिक्खविरोधी हिंसा को दंगा नहीं कहा जा सकता। वह तो कत्ल ए आम था।
सन 1961 से लेकर अब तक देशभर में सैकड़ों छोटेबड़े दंगे हुए, जिनमें सबसे भयावह थे मेरठ, मलियाना, भागलपुर, मुंबई व गोधरा के बाद गुजरात में हुए दंगे। स्वतंत्रता के पहले साम्प्रदायिक हिंसा का कुत्सित खेल मुस्लिम लीग व हिंदू महासभा खेलती थीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस हिंसा के कारण समाज का धार्मिक आधार पर धुव्रीकरण हुआ और इस धुव्रीकरण से हिंसा को और ब़ावा मिला। इस तरह, यह दुष्चक्र चलता रहा। ॔दूसरे’ समुदाय के बारे में गलत धारणाएं और मिथक इस हिंसा के लिए काफी हद तक जिम्मेदार थे। परन्तु हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और चौड़ा व गहरा किया 1992 के बाद से हुई साम्प्रदायिक हिंसा ने। शहरों में अल्पसंख्यक अपने मोहल्लो में सिमटने लगे और उनके बारे में कई तरह के झूठ और गलत धारणाएं सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गईं। इस दौर की साम्प्रदायिक हिंसा का एक महत्वपूर्ण लक्षण यह था कि यह धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति की उपज थी और यह मुख्यतः शहरों तक सीमित थी। कई समाजविज्ञानियों ने साम्प्रदायिक दंगों के शहरों तक सीमित रहने के तथ्य को महत्वपूर्ण मानते हुए, साम्प्रदायिक हिंसा का दोष अनियंत्रित शहरीकरण के सिर म़ दिया।
हालिया मुजफ्फरनगर हिंसा ने यह साबित किया है कि साम्प्रदायिक हिंसा का शहरों और कस्बों तक सीमित रहने का दौर समाप्ति पर है। शहरी आबादी को पूरी तरह ध्रुवीकृत कर देने के बाद, साम्प्रदायिक संगठनों ने अपना ध्यान ग्रामीण क्षेत्रों पर केन्द्रित कर लिया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि साम्प्रदायिक हिंसा के ग्रामीण भारत में फैलने के हमारे देश के लिए बहुत भयावह परिणाम होंगे। मुजफ्फरनगर हिंसा के कई ऐसे पहलू हैं जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
अब तक देश के विभिन्न भागों में होने वाली साम्प्रदायिक हिंसा का मुख्य लाभार्थी संघ परिवार होता था और इसका प्रमाण यह था कि इन क्षेत्रों में संघ से जुड़े संगठनों की उपस्थिति और शक्ति ब़ जाती थी और भाजपा को चुनावों में लाभ होता था। इस परिघटना का जीताजागता उदाहरण गुजरात है, जहां गोधरा के पश्चात हुए दंगों ने भाजपा की जड़ों को जबरदस्त मजबूती दी और वहां की सड़कों और चौराहों पर आज भी संघ परिवार से जुड़े असामाजिक तत्वों का राज चल रहा है।
शतरंज के खेल में हमेशा एक खिलाड़ी की हार होती है और दूसरे की जीत। परन्तु राजनीति की शतरंज में मुजफ्फरनगर हिंसा की चाल चलने वाले दोनों खिलाड़ियों को इस खेल में जीत की उम्मीद है। इस खेल में एक ओर थी दंगों से हमेशा लाभान्वित होने वाली भाजपा, जो 84 कोसी परिक्रमा की चाल के असफल हो जाने के बाद, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के किसी रास्ते की तलाश में थी। दूसरी ओर थी समाजवादी पार्टी, जिसने भाजपा की ही तर्ज पर यह सोचा कि अगर भाजपा हिन्दुओं का धु्रवीकरण कर राजनैतिक लाभ उठा सकती है तो उसे भी मुसलमानों का ध्रुवीकरण कर यही क्यों नहीं करना चाहिए? इन दोनों खिलाड़ियों के सामूहिक प्रयासों से मुजफ्फरनगर में दंगे भड़के। यहां यह याद रखना मौंजू होगा कि लगभग ड़े साल पहले समाजवादी पार्टी ने उत्तरप्रदेश में सत्ता सम्हाली है और तब से राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा में वृद्धि हुई है।
मुजफ्फरनगर हिंसा की शुरूआत हुई एक लड़की को सड़क पर छेड़े जाने के विवाद में तीन लड़कों की हत्या से। इस घटनाक्रम के दो अलगअलग विवरण उपलब्ध हैं। इस घटना से साम्प्रदायिक हिंसा भड़क सकती है, इसका अंदाजा सरकार और प्रशासन को था और उसे रोकने के लिए सरकारी तंत्र के पास पर्याप्त समय भी था। परन्तु ऐसा लगता है कि जानतेबूझते हिंसा को भड़कने से रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई। क्षेत्र में धारा 144 लागू होने के बाद भी, अधिकारियों ने कानून का उल्लंघन करते हुए, एक लाख से अधिक लोगों की महापंचायत का आयोजन होने दिया। सभी जातिवादीसाम्प्रदायिक संगठन मूलतः पितृसत्तात्मक मूल्यों में विश्वास रखते हैं। अतः आश्चर्य नहीं कि ॔॔बहूबेटी बचाओ’’ के नारे से भड़के हजारों जाट हथियारबंद होकर महापंचायत में इकट्ठा हो गए। साम्प्रदायिक दुष्प्रचार ने गति पकड़ी और देश में पहली बार, ग्रामीण क्षेत्रो में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। भाजपा की जाटों में पैठ नहीं है परन्तु उसने अत्यंत कुटिलतापूर्वक इस घटना का उपयोग अपनी विभाजनकारी राजनीति को मजबूती देने के लिए किया। मोदी को हिन्दुओं के उद्घारक के रूप में प्रस्तुत किया गया और जाटों को अपनी जातिगत पहचान त्याग कर, हिन्दू पहचान पर जोर देने के लिए प्रेरित किया गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुस्लिम गुटों ने भी हिंसा में भाग लिया। परन्तु पूर्वाग्रहग्रस्त पुलिसतंत्र ने एकतरफा कार्यवाही की। नतीजा यह हुआ कि हिंसा के शिकार मुख्यतः अल्पसखंयक बने। उनमें से कई को अपने घरबार छोड़कर भागना पड़ा और उनमें असुरक्षा के भाव में वृद्धि हुई।
समाजवादी पार्टी द्वारा खेला गया यह दांव, उसे लाभ पहुंचायेगा या नहीं, यह तो केवल समय ही बताएगा। परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में साम्प्रदायिक हिंसा का जिन्न बोतल से बाहर निकल आया है। अखिलेश सरकार के राज में औसतन हर महीने साम्प्रदायिक हिंसा की दो घटनाएं हुई हैं। यहां प्रश्न यह उठता है कि इसके पूर्व की बसपा सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा के दानव पर नियंत्रण कैसे बनाए रखा। अधिकारी वही थे, जो आज हैं और प्रदेश के रहवासी भी वही थे, जो आज हैं परन्तु बसपा के राज में प्रदेश में साम्प्रदायिक शांति बनी रही। साफ है कि यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह हिंसा होने दे या नहीं। साम्प्रदायिक ताकतें, भाजपा व उसके साथी तो हमेशा दंगे भड़काने की ताक में रहते हैं। उत्तरप्रदेश में एक अतिरिक्त कारक है अमित शाह की उपस्थिति। अमित शाह जमानत पर रिहा हैं और उन्हें गुजरात में कत्लओम करवाने का अनुभव प्राप्त है। संघ परिवार को भी दंगे भड़काने की कला में महारत हासिल है। एक ओर मुजफ्फरनगर क्षेत्र में यह प्रचार किया गया कि ॔हमारी’ बेटियां और बहुएं सुरक्षित नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर एक भाजपा विधायक ने इन्टरनेट पर एक वीडियो क्लिप डाल दी, जिसमें मुसलमानों जैसे दिखने वाले लोगों को दो युवाओं को अत्यंत क्रुरतापूर्वक मौत के घाट उतारते दिखाया गया था। यह वीडियो, दरअसल, कुछ साल पहले पाकिस्तान में हुई एक घटना का था, जिसमें हिंसक भीड़ ने दो युवकों को उनके डकैत होने के शक में घेरकर मार डाला था। सोशल मीडिया, जिसकी पहुंच अब गांवों तक भी हो गई है, में यह वीडियो क्लिप जंगल की आग की तरह छा गई और इससे मुसलमानों के विरूद्ध शत्रुतापूर्ण माहौल बन गया।
जाटों और मुसलमानों में लंबे समय से मधुर संबंध थे। पिछले चंद सालों में घटी कुछ घटनाओं ने इन दोनों समुदायों के आपसी संबंधों में खटास घोल दी थी। और हालिया हिंसा ने इन्हें एक दूसरे के खून का प्यासा बना दिया है। पिश्चमी उत्तरप्रदेश के गांवगांव में जाट और मुसलमान रहते हैं और अगर यह हिंसा गांवों में बड़े पैमाने पर फैल गई तो सरकार के लिए भी इसे रोकना मुश्किल हो जाएगा।
इस क्षेत्र में यह प्रचार भी किया जा रहा है कि मोदी एक ॔शक्तिशाली’ नेता हैं जो हिन्दुओं की रक्षा कर सकते हैं। क्या मजाक है! क्या छोटासा अल्पसंख्यक समुदाय, कभी बहुसंख्यकों के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है? मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जो बहुसंख्यक समुदाय की रक्षा करने में सक्षम है। यह सफेद झूठ है परन्तु अनवरत प्रचार के कारण लोग इसे सच मान बैठे हैं और इसका खंडन प्रभावी ंग से नहीं किया जा रहा है।
जहां तक पुलिस और प्रशासन की भूमिका का प्रश्न है, उसके बारे में जितना कम कहा जाए उतना बेहतर। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं हो सकता कि प्रशासन और सरकार के पास इतनी ताकत होती है कि वह यह सुनिश्चित कर सके कि हिंसा शुरू ही न हो और अगर हो भी जाए तो 24 घंटे के अंदर उस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया जाए। परन्तु समस्या यह है कि प्रशासन और पुलिस में नीचे से लेकर ऊपर तक, पूर्वाग्रहग्रस्त अधिकारीकर्मचारी भरे हुए हैं। और अगर सरकार को यह लगने लगे कि हिंसा से उसे चुनावी लाभ प्राप्त होगा तो जाहिर है हिंसा भड़केगी ही और उसे तब तक चलने दिया जाएगा जब तक कि संबंधित पक्षों को यह न लगने लगे कि उन्हें जो लाभ मिलना था, वह मिल चुका है।
यूपीए सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक कानून बनाने का वायदा किया था। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) की एक उपसमिति ने काफी लगन और परिश्रम से इस कानून का मसौदा तैयार कर सरकार को सौंपा था। नि:संदेह मसौदे पर आम राय नहीं बन सकी है परन्तु उसके बारे में विभिन्न मंचों पर विचार विमशर कर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि यह कानून जल्दी से जल्दी बने ताकि वे सत्ताधारी, जो हिंसा रोकने और समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा नहीं करते, उन्हें दंडित किया जा सके। यह आवश्यक है कि इस कानून में उन अधिकारियों के लिए सजा का प्रावधान हो जो अपने कर्तव्यपालन में लापरवाही बरतते हैं या जानबूझ कर वह नहीं करते, जो उन्हें करना चाहिए या वह करते हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। इस सिलसिले में अगर राजनैतिक नेतृत्व भी नाजुक मौकों पर सही व त्वरित निर्णय लेने में लेतलाली करता है तो उसे भी कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। साम्प्रदायिक ताकतों से वैचारिक, सामाजिक व राजनैतिक स्तर पर मुकाबला किए जाने की जरूरत है। तभी समाज में साम्प्रदायिक सद्भाव और शांति बनी रह सकेगी।

-राम पुनियानी

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

ऑपरेशन दंगा. मुजफ्फरनगर दंगों पर आज तक का सबसे बड़ा खुलासा.-आज तक

ऑपरेशन दंगा. मुजफ्फरनगर दंगों पर आज तक का सबसे बड़ा खुलासा. सबसे बड़ा स्टिंग ऑपरेशन. सुलगते मुजफ्फरनगर का सबसे बड़ा और सबसे गहरा राज. आज तक पर दंगों की हर परत की पोल मुलायम सिंह और अखिलेश के अफसरों ने खोली.
सियासत के स्याह होते रंगों में एक जलता हुआ शहर, जिसकी आंच 15 दिन बाद लखनऊ पहुंची तो अखिलेश मुजफ्फरनगर पहुंचे और 17 दिन बाद आंच दिल्ली दरबार पहुंची तो प्रधानमंत्री इस शहर पहुंचे. शहर की फिजा बता रही है कि दंगे की आंच में अब राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही हैं.
इस दंगे में अब तक चालीस से ज्यादा मौतें हुई और चालीस हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गये. पहली बार यहां लोग अपने ही गांव और अपने ही कस्बों में रिफ्यूजी हो गये. कई सवाल हैं जिनके जवाब आज तक ने खोजने की कोशिश की. क्या इन दंगों को सरकार रोक सकती थी? क्या बेगुनाहों को मरने से बचाया जा सकता था? क्या पुलिस के हाथ बंधे थे? क्या दंगाइयों पर गोली चालने से डर गई थी पुलिस?

जानसठ तहसील का खुलासा

मुजफ्फरनगर का कवाल गांव, जानसठ तहसील में आता है. यही वो गांव है जहां से 27 अगस्त को दंगे दो समुदाए के बीच नफरत की चिंगारी भड़की और फिर उसे नेता हवा देते चले गए. ये वही कवाल गांव है जहां पिछले 66 साल से हिंदू और मुसलमान भाई-चारे और मुहब्बत के साथ रहते चले आ रहे थे. लेकिन अब वहां की धरती नफरत के लहू से लाल हो गई है. आज तक ने जानसठ तहसील के सर्किट हाउस में स्टिंग ऑपरेशन किया, फिर जो खुलासा हुआ, जानकर आप भी दंग रह जाएंगे.
मुजफ्फरनगर की जानसठ तहसील के कवाल गांव में 27 अगस्त को एक लड़की से छेड़छाड़ को लेकर दोनों समुदाय ऐसे भिड़े कि घंटेभर में मोहल्ले में तीन लाशें गिर गईं और अमन चैन तार-तार हो गया.
इलाके के एसडीएम आर.सी त्रिपाठी और सर्किल अफसर जे.आर जोशी दोनों कर्फ्यू में डूबे शहर का गश्त करके लौटे थे. 27 अगस्त को जे.आर जोशी ने दंगा करने वाले 8 लोगों को मौके से हिरासत में लिया था और थाने लाए थे. जोशी का कहना है ये दंगाई दोहरी हत्याओं के मुख्य संदिग्ध थे, लेकिन उस रात ऊपर से दबाव आया और दंगाइयों को थाने से छोड़ना पड़ा.
आज तक- एसडीएम साहब क्या (दंगाइयों के घरों की) तलाशी हुई थी, या तलाशी अवॉइड की गई?
सीओ- नहीं... नहीं.. बिल्कुल पूरी तलाशी हुई...
एसडीएम- तलाशी हुई, पकड़े गए.... अभियुक्त पकड़े गए...
सीओ- ऑफ द रिकॉर्ड पूरी बात हम बताएं, उस दिन जैसे ही घटना (हत्याएं) हुईं उसके बाद तलाशी हुई, उस दिन हमने 12 आदमी] जितने वहां आस-पास के जो भी थे, एक-एक आदमी को पकड़ा.... कोई अवैध असलाह नहीं मिला ये अलग बात है....
आज तक- एक्टचुअल मुलज़िम (पकड़े थे आपने)...
सीओ- बिल्कुल उन्हीं में थे.... और उसके बावजूद उनको ना ले जाकर उनकी एफआईआर इस ढंग से करा दी.... जिसकी वजह से सब (छूट गए).... इसके बाद SSP, DM का ट्रांसफर हो गया.... उन्होंने अपनी मौजूदगी में सर्च कराया था.
इन दोनों अधिकारियों का कहना था, मुलज़िम पकड़े जाने के राजनीतिक दबाव में फर्जी एफआईआर कराई गई और असली मुलज़िम छोड़ दिए गए.
आज तक- अच्छा...पकड़ लिया था (असली मुलज़िमों को)
सीओ- पकड़ लिया था... एफआईआर में नाम देखा तो मात्र एक आदमी का नाम देखा. हमारे सामने मजबूरी थी...
एसडीएम- Tainted एफआईआर हुई थी....
आज तक- फिर छोड़ दिया....
सीओ- उन्होंने कह दिया ठीक है कि (इनके नाम) नहीं है एफआईआर में, उनको बैठाने की डिटेन करने की जरूरत क्या है.
आज तक- तो जो 7-8 आदमी पकड़े गए थे....यानी लाए गए थे थाने वहां से....
सीओ- नहीं...थाने लाए थे...बातचीत की उसने....उसमें उन्होंने कहा कि हम वहां नहीं थे...हम फलानी जगह थे....लेकिन थे सब वहीं (घटना स्थल पर)
आज तक- बाद में सबको छोड़ दिया
3-3 लाशें गांव में बिछा दी गईं और मौके से संदिग्ध पकड़े गए, लेकिन दबाव में छोड़ दिया गया, सच तो ये है कि कुछ घरों की तलाशी लेने पर एसएसपी मंजीत सैनी और डीएम सुरेंद्र सिंह का तबादला कर दिया. बाद में नए डीएम ने आकर जांच की दिशा, कहीं और मोड़ दी.
आज तक- ये घटना (हत्याओं की) कब हुई थी, संदिग्धों को कितने बजे गिरफ्तार किया गया
सीओ- घटना 2 बजे की थी...
आज तक- नहीं...गिरफ्तारी कितने बजे की थी
सीओ- चार...साढ़े चार बजे के आसपास...जैसे ही Deadbody वहां से उठाई गईं थीं.
आज तक- और उन संदिग्धों को छोड़ा कैसे गया....
सीओ- लेट नाइट छोड़ दिया गया था. (ऊपर से) आदेश आ गए थे....
आज तक- डीएम के ट्रांसफर के बाद...
कवाल में कानून का मज़ाक उड़ाया गया. तलाशी लेने पर डीएम का ट्रांसफर किया गया, फर्जी एफआईआर लिखी गई, पकड़े गए आरोपी छोड़े गए, और बाद मे दंगा भड़क गया. अब आगे की दास्तान-
आज तक- जितने Accused को आपने पकड़ा था, क्या वो वास्तव में (सदिंग्ध) थे
सीओ- देखो... ऐसा है कि... कैसे कह दें... देखने वाले जब eyewitness कह रहे हैं कि मौके पर थे....
एसडीएम- they were prime suspects (वो मुख्य संदिग्ध थे)
आज तक- prime suspects....वही major mistake हुई और वो मैजेस दूसरी community में चला गया.
एसडीएम- ये तो मतलब दुर्भाग्य है पूरे देश का, इस सिस्टम का, जैसे की कोई घटना होती है, ये ***** नेता तुरंत आकर बैठ जाते हैं.....
इन अधिकारियों का मानना था कि दोहरी हत्याओं के मामले में कुछ घरों की तलाशी ली गई जिसपर कुछ रसूखदार नेता डीएम और एसएसपी से नाराज़ हो गए और दोनों का तबादला कर दिया गया. इस कार्रवाई से, इलाके में सांप्रदायिक तनाव भड़का. अगर डीएम और एसएसपी का उस रात तबादला ना होता तो अपराध की घटना सांप्रदायिक दंगे में ना तब्दील होती. लेकिन इससे बड़ा खुलासा किया फुगाना थाने के सैकेंड अफसर ने, जिनके सामने अल्पसंख्यकों के गांव के गांव राख कर दिए गए.
7 सितंबर की शाम महापंचायत में शामिल कुछ किसानों पर हमले के बाद अगली सुबह शाहपुर और बुढ़ाना तहसीलों में दंगे ने एक नया रंग लिया था. 7 सितंबर की प्रतिक्रिया में यहां गांव-गांव में हिंसा का ऐसा नंगा नाच हुआ जो इन कस्बों में 1947 के दंगों में भी देखने को नहीं मिला. 8 सिंतबर की हिंसा का सबसे ज़्यादा कहर फुगाना इलाके में मचा. आज तक- आपके यहां कितनी casuality हैं.
आर एस भगौर, सैकेंड अफसर- 16 हैं करीब...नहीं आपके क्षेत्र में कितनी casuality हैं....हमारे क्षेत्र में 16 हैं.....
आज तक- तो क्या....पुलिस फोर्स एकदम नहीं पहुंच पायी मौके पर.....
आर एस भगौर, सैकेंड अफसर- पुलिस मौके पर पहुंच गई थी, लेकिन पुलिस थोड़ी सी थी
आज तक- कम थी पुलिस....
आर एस भगौर, सैकेंड अफसर- हां....
आज तक- जब दंगा शुरु हुआ (उस वक्त वहां पर आपके कितने लोग थे)
आर एस भगौर, सैकेंड अफसर- उस समय जनपथ की क्या स्थिति थी, हम नहीं जानते, जब हमारे थाना क्षेत्र में काम शुरू हुआ तो दूसरे थाना क्षेत्र में भी काम शुरू हो गया. अब हमें ये नहीं पता कि दूसरे थाना क्षेत्र में या जनपद में क्या हो रहा है. जब अधिकारियों को इस बात का पता चला, तो अधिकारियों अपनी योजना, अपनी व्यवस्था करने में लगे. हमारा उनसे संपर्कि नहीं हो पाया. अब संपर्क करने के लिए कारण है, कि एक हाथ से गोली चला रहे हैं और दूसरे हाथ से मोबाइल (फोन) कर रहे है, तो मुसीबत की स्थिति है...
आज तक- बिल्कुल...
आर एस भगौर
, सैकेंड अफसर- देखो practical है सब practical है.....
आज तक- कितनी देर तक (आपका अधिकारियों) से संपर्क नहीं हुआ होगा....
आर एस भगौर
, सैकेंड अफसर- अरे भई...हम घंटे भर पर जूझते रहे....फंसे रहे....हमारी जान लगी रही. मोबाइल निकालते...ok करते और फिर जेब में रखते...ऐसी स्थिति थी हमारी.
आज तक- जब आप लोग (मौके पर) लगे हुए थे, तो असलाह की कमी थी
आर एस भगौर
, सैकेंड अफसर- देखो असलाह...तो मैं बता रहा हूं, असलाह तो कुछ है नहीं...... असलाह जो हमारे पास है, असलाह जो हमारे हैं ही नहीं....और जो हैं वो चलता ही नहीं...... भाई जो चल गया तो बढ़िया हमारी जान ऊपर वाले की कृपा है. तो चल भाई वो भी मन हो...नहीं चला तो नहीं....मैं आपको वो facts बता रहा हूं जो कोई नहीं बताएगा. आज तक- मेन रोल मेरे ख्याल से आज़म xxxxx का है, कि उन्होंने pressurise किया.
आर एस भगौर
, सैकेंड अफसर- बिल्कुल ठीक है...बिल्किल ठीक है.....
आज तक- आप कुछ नहीं करेंगे...जो हो रहा है होने दो....
आर एस भगौर
, सैकेंड अफसर- हां...यहीं हुआ...
आज तक- political है ये....रोटियां सेंक रहे हैं...
आर एस भगौर
, सैकेंड अफसर- सब रोटियां सेंक रहे हैं....
ज़ाहिर तौर पर सैकेंड अफसर जानते हैं कि दंगो में किसका क्या किरदार रहा है, लेकिन इस अफसर से भी बड़ा खुलासा पुलिस और प्रशासन के कुछ और अधिकारियों ने किया. जिस पर आप दंग रह जाएंगे.

आर एस भगौर
, सैकेंड अफसर- सब रोटियां सेंक रहे हैं....
मुजफ्फरनगर का मीरापुर थाना क्षेत्र, सच्चाई आपको डरा देगी, सहमा देगी, इस थाने के हल्के में दंगाइयों ने मौत का जो खेल खेला, वो वाकई ख़ौफनाक भी है और दर्दनाक भी.
27 अगस्त से शुरू हुए दंगे 8 सितंबर तक मुजफ्फरनगर को दहलाते रहे, लेकिन प्रशासन से लेकर सरकार तक, दंगाइयों पर काबू पाने में नाकाम रही. जाहिर तौर पर दंगों की आड़ में नेता अपना अपना फायदा देख रहे थे. मीरापुर थाने के एसएचओ अनिरुद्ध कुमार गौतम के हल्के में भी दंगाइयों ने सड़कों पर मासूमों के मौत के घाट उतारा. और हैरतअंगेज़ बात ये है कि दंगाइयों पर कार्रवाई करने से पुलिस कतराती रही. गौतम मानते हैं कि डीएम एसपी को एक साथ हटाने की वजह से जिला प्रशासन नेतृत्वविहीन हो गया था. गौतम का कहना है कि समाजवादी पार्टी के कुछ नेता डीएम एसपी को कई दिनों से एसपी को हटाने का दबाव बना रहे थे, और उन्हें आखिरकार मौका मिल गया.
अनिरुद्ध कुमार गौतम, एसएचओ- पहले वाले डीएम और एसएसपी हमारे थे, दोनों मिलकर (घटना) को मैनेज कर सकते थे...आपने (सरकार) रात में चंद घंटों के अंदर...घटना के चंद घंटों के अंदर....उन्हें हटाया.
आज तक- उसकी इंस्पेक्टर साहब क्या वजह थी, उनकी क्या dealing सही नहीं थी...डीएम की.....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- डीएम की dealing बहुत बढ़िया था, दो साल कैसे निकाल जाते यहां. डेढ़ साल...दो साल...कैसे निकल गया यहां....अगर dealing बढ़िया ना होती. भाई इसी शासन नेउसे पोस्ट किया था डीएम. अगर इसकी dealing से लोग संतुष्ट ना होते तो डेढ़ पौने दो साल कैसे कट जाते.
आज तक- उस रात क्या वजह रही.....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- सब political stunt...
आज तक- मतलब उनको हटाना ग़लत फैसला था....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- भाई ये लोग उनको (DM/SSP) हटाने के लिए एक महीने से प्रयासरत थे....जब कांवड़ चल रही थी तबसे...political लोग समाजवादी पार्टी के, दोनों अधिकारियों को हटवाने के लिए लगे हुए थे....
आज तक- क्यों....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- भाई उनको लग रहा होगा....कि हमारे काम नहीं कर रहे है....right or wrong. यही कारण है और क्या है......
दरअसल 27 अगस्त को कवाल गांव की घटना छेड़छाड़ से शुरू हुई और दो गुटों के बीच झगड़े में तब्दील हो गई. ये सच है कि इस घटना में हत्या हुई, लेकिन ये भी सच है कि हत्या होने के बावजूद घटना ने कोई सांप्रदायिक रंग नहीं लिया. दिक्कत तब शुरु हुई जब डीएम और एसएसपी ने घर घर तलाशी लेनी शुरू की.
आज तक- सुनने में ये आया है कि डीएम साहब ने जो जो दंगाई थे....बवाली जो बवाल मचा रहे थे पकड़ लिए थे...गांव घेर लिया था पूरा..
समरपाल सिंह
, इंस्पेक्टर, भोपा- पूरा गांव घेरके...पुलिस सर्च कराई थी एसएसपी और डीएम ने....पकड़ लिए थे रात में.....
आज तक- ये तो अच्छा काम था.....
समरपाल सिंह
, इंस्पेक्टर, भोपा- और उसमें क्या कर सकते हैं ये हमारे से ऊपर की बात है.....
आज तक- वोट बैंक की राजनीति है, बहुत बुरी है...
समरपाल सिंह
, इंस्पेक्टर, भोपा- हां...
आज तक- दो दिन...चार दिन रुक करके हटाते तो शांत हो जाता मामला...
समरपाल सिंह
, इंस्पेक्टर, भोपा- हां...ये नौबत नहीं आती....
लेकिन दंगों की आड़ में ट्रांसफर, पोस्टिंग और सस्पेंशन का ही खेल नहीं हो रहा है, असली खेल तो वोट का था, और इसपर भी खुलासा किया उन लोगों ने जो मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे.
अनिरुद्ध कुमार गौतम, एसएचओ- पहले वाले डीएम और एसएसपी हमारे थे, दोनों मिलकर (घटना) को मैनेज कर सकते थे...आपने (सरकार) रात में चंद घंटों के अंदर...घटना के चंद घंटों के अंदर....उन्हें हटाया.
आज तक- उसकी इंस्पेक्टर साहब क्या वजह थी, उनकी क्या dealing सही नहीं थी...डीएम की.....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- डीएम की dealing बहुत बढ़िया था, दो साल कैसे निकाल जाते यहां. डेढ़ साल...दो साल...कैसे निकल गया यहां....अगर dealing बढ़िया ना होती. भाई इसी शासन नेउसे पोस्ट किया था डीएम. अगर इसकी dealing से लोग संतुष्ट ना होते तो डेढ़ पौने दो साल कैसे कट जाते.
आज तक- उस रात क्या वजह रही.....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- सब political stunt...
आज तक- मतलब उनको हटाना ग़लत फैसला था....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- भाई ये लोग उनको (DM/SSP) हटाने के लिए एक महीने से प्रयासरत थे....जब कांवड़ चल रही थी तबसे...political लोग समाजवादी पार्टी के, दोनों अधिकारियों को हटवाने के लिए लगे हुए थे....
आज तक- क्यों....
अनिरुद्ध कुमार गौतम
, एसएचओ- भाई उनको लग रहा होगा....कि हमारे काम नहीं कर रहे है....right or wrong. यही कारण है और क्या है......
आज तक- सुनने में ये आया है कि डीएम साहब ने जो जो दंगाई थे....बवाली जो बवाल मचा रहे थे पकड़ लिए थे...गांव घेर लिया था पूरा.....
आज तक का खुफिया कैमरा जहां-जहां पहुंचा, अखिलेश के अफसरों ने हमें भी चौंका दिया. और वही सच्चाई अब हम देश के सामने रख रहे हैं. बात मुजफ्फरनगर की बुढ़ाना कोतवाली की. यहां के इंस्पेक्टर ऋषिपाल सिंह ने दंगों का सच बताया तो एसपी क्राइम कल्पना सक्सेना ने भी दंगों पर सियासी खोल को उघाड़ डाला.
ये हैं मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना कोतवाली के इंस्पेक्टर ऋषिपाल सिंह. दंगे के सभी दिनों में ये इलाके में रात और दिन गश्त करते रहे. ज़ाहिर तौर पर इनपर भी हर तरह का राजनीतिक दबाव रहा.
किसको पकड़ना है, और किसको छोड़ना है, शायद ये फैसला यूपी में कोतवाल नहीं करते. इंस्पेक्टर ऋषिपाल का मानना है कि पहली बार शहर की जगह दंगे देहात में ज़्यादा फैले. अगर पर्याप्त संख्या में पुलिस फोर्स देहात के थानों में मुहैया कराई गई होती, जो कमज़ोर तबके के इतने लोग मारे ना गए होते. देर से पुलिस बल भेजे जाने के कारण गांव में हिंसा बिना रोक टोक चलती रही.
आज तक- (8 सितंबर को दंगा) सुबह 7 बजे से शुरु हो गया था
ऋषिपाल
, इंस्पेक्टर, बुढ़ाना- सुबह 7 बजे से कई गांव में...
आज तक- अच्छा...
ऋषिपाल
, इंस्पेक्टर, बुढ़ाना- वही तो मैंने बताया...
आज तक- फोर्स पहुंची नहीं थी...
ऋषिपाल
, इंस्पेक्टर, बुढ़ाना- 3-4 जगह...एक गांव में पहुंचकर control करा...
आज तक- अच्छा...सुबह सुबह फोर्स होगी नहीं थाने में....
ऋषिपाल
, इंस्पेक्टर, बुढ़ाना- नहीं..थाने में...
आज तक- देर तक गश्त में थे...
ऋषिपाल
, इंस्पेक्टर, बुढ़ाना- नहीं थाने में मेरे पास 20 सिपाही है, 3-4 दारोगा हैं, तो मैं कोशिश करूंगा कि पहले एक गांव में हिंसा हो गई तो मैं 4 सिपाही से हिंसा नहीं रुकवाउंगा.
मैं सोचता हूं कि पूरी फोर्स को लेकर हिंसा रोक दूं...लेकिन जबतक यहां हिंसा रोकता, तबतक दूसरी जगह हिंसा शुरु हो गई. दूसरी जगह पहुंते...तीसरी जगह हो गई.
आज तक- फोर्स कम थी...
ऋषिपाल
, इंस्पेक्टर, बुढ़ाना- फोर्स इतनी नहीं थी कि हर गांव में लगा दी जाती...
मुजफ्फरनगर की पुलिस अधीक्षक यानी एसपी क्राइम कल्पना सक्सेना के हाथों में दंगाग्रस्त कई थानों की कमान थी. कल्पना सक्सेना का मानना है कि दंगों पर कहीं ना कहीं सियासी रंग चढ़ा है.
कल्पना सक्सेना, एसपी क्राइम- देखिए कई तरीके की बातें हुईं, बहुत सी बाते हैं....इस समय हम लोग बहुत प्रेशर में हैं....वर्क बहुत सारा है करने को...फुर्सत से बात करेंगे किसी दिन....
आज तक- लेकिन मैडम उसका जवाब दीजिए हमें आप. मतलब मर्डर को ऐसा सांप्रदायिक रंग क्यों दे दिया गया.
कल्पना सक्सेना
, एसपी क्राइम- देखिए मैं क्या कहूं....बहुत गहराई से बताऊं...इसमें बहुत कुछ political है, और यहां ऐसा चल रहा है कि मुस्लिम को कुछ लग रहा है. हिंदुओं को लग रहा है कि मुस्लिम appeasement (तुष्टीकरण) बहुत हो रहा है.....
आज तक के ऑपरेशन दंगा में वो सच सामने आया, जिससे मुजफ्फरनगर सुलग उठा था. हिंसा भले ही सुनियोजित ना हो, लेकिन हिंसा भड़काने में साज़िश और सियासत का घालमेल ज़रूर था.
 साभार -आज तक

शनिवार, 7 सितंबर 2013

लोकसभा चुनाव की पृष्टभूमि तैयार करने में लगे हैं सपा - भाजपा

उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के आने के बाद आये दिन सांप्रदायिक दंगो की बाढ़ आ गयी है उसका मुख्य कारण  यह है कि आगामी लोकसभा चुनाव में धार्मिक आधार पर वोटों का विभाजन करना है। इसी रणनीति को लेकर दंगे हो रहे हैं विगत दिनों मुजफ्फरनगर में दो मोटरसाइकिलो की टक्कर के बाद भड़की हिंसा ने तीन व्यक्तियों की जान ले ली थी और अब तक फिर दोनों सम्प्रदायों की व प्रशासन की मंशा के अनुरूप हुई हिंसा में12व्यक्तियों की जान ले ली जिसमें एक न्यूज़ चैनल के स्ट्रिंगर राजेश वर्मा की गोली मारकर हत्या हो गयी तथा एक फोटोग्राफर इसरार अहमद की भी मृत्यु कारित कर दी गयी। 35 व्यक्तियों से अधिक लोग घायल हो गए। कर्फ्यू लगा दिया गया है।
अगर शासन और प्रशासन निष्पक्ष व विधि सम्मत तरीके से काम कर रहा होता तो कोई भी बवाल या हिंसा होने का प्रश्न नही उठता है जब प्रशासन के अधिकारीगण समुदाय विशेष की तरफ से उनका उत्साह बढ़ाते हैं तभी सांप्रदायिक हिंसा उनके सहयोग से होती है। इस मामले में प्रदेश की पिछली सरकार का रिकॉर्ड बेहतर था क्यूंकि दंगों के लिए जिला प्रशासन को जिम्मेदार मानने की व्यवस्था थी। जब जिला मजिस्ट्रेट को यह मालूम होता है कि अगर दंगा हुआ तो मेरे खिलाफ कड़ी कार्यवाई होगी तो दंगे नहीं होते हैं। भाजपा उकसाती है और फिर सामान्य जनता में धार्मिक आधार पर उत्तेजना फैलती है। सरकार अगर चाहे तो अपनी सूझ बूझ से उत्तेजना को अपने कार्यों से निष्फल कर भाजपा की समस्त रणनीति को विफल कर सकती है लेकिन ताबड़तोड़ घटनाओ से यह सन्देश जा रहा है कि सरकार व सरकार के अधिकारीयों को उनका संरक्षण प्राप्त है। 
                       यदि अखिलेश सरकार वास्तव में दंगे रोकना चाहती है तो अविलम्ब अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था अरुण कुमार तथा डीजीपी देवराज नागर के खिलाफ सख्त करवाई कर प्रशसन को सख्त सन्देश देना चाहिए लेकिन यह दम अखिलेश सरकार में नहीं है।  84 कोसी परिक्रमा के मामले में भी सरकार की मंशा ध्रुवीकरण को ही लेकर थी।  अखिलेश सरकार नहीं चाहती है कि प्रदेश में कांग्रेस या धर्म निरपेक्ष दलों का उदय हो और उनकी पकड़ प्रदेश में हो, इसके लिए जातिवादी व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण आवश्यक है जो सपा के सरकार में आने के बाद किया जा रहा है।

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 
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