गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

अलीगढ़ विश्वविद्यालय, राजा महेन्द्र प्रताप और धु्रवीकरण के प्रयास

सांप्रदायिक राजनीति के झंडाबरदारों को न केवल धार्मिक आधार धु्रवीकरण करवाने की कला में महारत हासिल है वरन् वे इसके नए-नए तरीके भी ईजाद करते रहते हैं। मुजफ्फरनगर में इसके लिए ‘लव जिहाद’ का इस्तेमाल किया गया तो अलीगढ़ में अतुलनीय गुणों के धनी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नाम का उपयोग इसी उद्देष्य से किया जा रहा है।
भाजपा और उसके साथी संगठनों ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के केम्पस में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की याद में एक कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की। विश्वविद्यालय के कुलपति ने आयोजकों के कुत्सित इरादों को नाकामयाब करने के लिए यह घोषणा कर दी कि   विश्वविद्यालय स्वयं अपने इस पूर्व छात्र के स्वाधीनता संग्राम में योगदान पर सेमीनार का आयोजन करेगा। भाजपा ने इस जानेमाने व्यक्तित्व का दुरूपयोग करने का इरादा इसलिए बनाया क्योंकि उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी आम लोगों के मन में उनके प्रति बहुत सम्मान का भाव है। ठीक इसी मौके पर यह मुद्दा क्यों उठाया गया, इस प्रश्न का उत्तर दिलचस्प है। महेन्द्र प्रताप की 29 अप्रैल 1979 को मृत्यु हो गई थी। इतने वर्ष बाद, भाजपा को अचानक उनकी याद आ गई क्योंकि उसे लगा कि उनकी जाट और हिंदू पहचान का उपयोग, पार्टी अपने राजनीतिक खेल के लिए कर सकती है। महेन्द्र प्रताप अप्रितम स्वाधीनता संग्राम सेनानी, पत्रकार और लेखक थे। वे मानवतावादी थे और धार्मिक व राष्ट्रीय सीमाओं से परे, दुनिया के सभी देशों का महासंघ बनाने के विचार से प्रेरित थे। वे माक्र्सवादी थे और सामाजिक सुधार और पंचायतों के सशक्तीकरण के पक्षधर थे। वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम सेनानी संगठन के अध्यक्ष थे। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने काबुल में सन् 1915 में भारत की निर्वासित सरकार बनायी थी। यहां यह याद रखना प्रासंगिक होगा कि इसके काफी वर्षों बाद, सन् 1929 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा गठित निर्वासित सरकार को हुकूमत-ए-मुख्तर-ए-हिंद कहा जाता था। इस सरकार के मुखिया महेन्द्र प्रताप थे, मौलवी बरकतउल्लाह इसके प्रधानमंत्री और मौलाना औबेदुल्ला सिंधी आतंरिक मामलों के मंत्री थे।
स्वाधीनता के बाद, राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 1957 के लोकसभा चुनाव में मथुरा लोकसभा क्षेत्र में अटल बिहारी वाजपेयी को पराजित किया था। यह तथ्य कि वे तत्कालीन भारतीय जनसंघ के नेता वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़े और जीते ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि वे सांप्रदायिक ताकतों के धुर विरोधी थे। यह विडंबना ही है कि ऐसे व्यक्ति को योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा नेता अपनी संकीर्ण राजनीति के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि अगर राजा महेन्द्र प्रताप ने अपनी जमीन दान न दी होती तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) आज अस्तित्व में न होता। यह दावा तथ्यों के विपरीत है। एएमयू के पूर्ववर्ती ‘‘मोहम्मडन एंग्लो ओरिएन्टल काॅलेज’’ की स्थापना सन् 1886 में हुई थी और इसका भवन, ब्रिटिश  केन्टोरमेंट की लगभग 74 एकड़ जमीन को खरीदकर बनाया गया था। इसके काफी बाद, सन् 1929 में, प्रताप ने अपनी 3.04 एकड़ भूमि, जिसे तिकोनिया ग्राउण्ड कहा जाता है, एएमयू को दान दी। इस जमीन का उपयोग एएमयू के सिटी हाईस्कूल के खेल के मैदान के रूप में किया जाता है। उन्होंने सन् 1895 में इस काॅलेज में दाखिला लिया था परंतु वे वहां अपनी स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। उन्होंने 1905 में इस काॅलेज को छोड़ दिया। सन् 1920 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएन्टल काॅलेज (एमएओ), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बन गया और यह विश्वविद्यालय आज भी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को अपना पूर्व छात्र मानता है। सन् 1977 में एमएओ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह में एएमयू के तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर ए.एम. खुसरो ने राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का सम्मान किया था।
जिस समय एएमओ की स्थापना हुई थी, उस समय राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का जन्म भी नहीं हुआ था अतः उनके द्वारा इस संस्था को कोई जमीन दान दिए जाने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। हां, यह जरूर है कि महेन्द्र प्रताप के पिता मुरसान के राजा घनश्याम सिंह ने इस काॅलेज के होस्टल में एक कमरे का निर्माण करवाया था जो आज सर सैय्यद हाॅल (दक्षिण) का कमरा नंबर 31 है।
भाजपा की मांग है कि एएमयू को राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती उसी तरह मनानी चाहिए जिस तरह वहां विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान की जयंती मनाई जाती है। आरएसएस और भाजपा के नेताओं ने ऐसा करने के लिए एएमयू के कुलपति पर दबाव बनाया। कुलपति का तर्क यह था कि एएमयू अपने हर पूर्व छात्र या दानदाता की जयंती नहीं मना सकता, यद्यपि वह, विश्वविद्यालय के निर्माण में उनकी भूमिका का सम्मान करता है। प्रताप के विश्वविद्यालय के निर्माण में योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए यूनिवर्सिटी में सर सैय्यद के चित्र के बगल में महेन्द्र प्रताप का चित्र भी लगाया गया है।
गत 17 नवंबर को उत्तरप्रदेश  भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और महासचिव स्वतंत्र देव सिंह अलीगढ़ पहुंचे और उन्होंने पार्टी की जिला इकाई को यह निर्देष दिया कि महेन्द्र प्रताप की जयंती मनाने के लिए एएमयू के प्रांगण में कार्यक्रम आयोजित किया जाए। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह, जाट नेता भी माने जाते हैं। आम धारणा यह है कि एएमयू एक मुस्लिम संस्थान है। सांप्रदायिक ताकतों द्वारा जाटों और मुसलमानों के बीच विवाद पैदा कर, मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगे भड़काएं गए थे। अब, भाजपा एक जाट राजा का महिमामंडन कर इस तनाव को बढ़ाना चाहती थी। यह एक सुनियोजित चाल थी जिसके तहत  भाजपा, इलाके के एक सम्मानित व्यक्ति को अपनी राजनीति का अंग बना लेती और अगर राज्य सरकार इस समारोह के आयोजन पर रोक लगाती तो उस पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का आरोप जड़ दिया जाता।
इस षड़यंत्र को विफल करने के लिए एएमयू के कुलपति लेफ्टिनंेट जनरल जमीरउद्दीन शाह ने यह प्रस्ताव किया कि राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती को मनाने के लिए एएमयू, भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका पर एक सेमिनार का आयोजन करेगा। यह एक स्वागत योग्य पहल थी। इससे कम से कम कुछ समय के लिए विवाद टल गया। अगर कुलपति यह प्रस्ताव नहीं करते तो भाजपा का इरादा एएमयू के मुख्य द्वार पर रैली करने का था जिससे तनाव बढ़ने और हिंसा भड़कने की संभावना होती।
इस घटनाक्रम के कई सबक हैं। पहला तो यह कि भाजपा अपनी सांप्रदायिक राजनीति के हित साधने के लिए राष्ट्रीय नेताओं के नाम का इस्तेमाल कर रही है, फिर चाहे वे सरदार पटेल हों, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी या इस मामले में राजा महेन्द्र प्रताप। इन नेताओं के जीवन के केवल उस पक्ष को प्रचारित किया जा रहा है जिससे सांप्रदायिक ताकतों को लाभ मिले। महेन्द्र प्रताप एक मार्क्सवादी थे परंतु उन्हें केवल एक जाट नेता बताया जा रहा है। वे धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति के खिलाफ थे और यह इससे स्पष्ट है कि उन्होंने भारतीय जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ा और वाजपेयी को पराजित किया था।
दूसरा यह कि भाजपा और उसके साथी, व्यक्तियों की केवल धार्मिक पहचान को प्रमुखता देने का षड़यंत्र रच रहे हैं चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान। मुजफ्फरनगर में जाटों को लव जिहाद के नाम पर हिंदुत्ववादी झंडे के नीचे लाने का प्रयास किया गया। हिंदू धार्मिक पहचान को ‘दूसरी’ धार्मिक पहचान के विरूद्ध खड़ा किया जाता है जो मुस्लिम और कभी-कभी ईसाई होती है। यही खेल दिल्ली के कुछ हिस्सों में भी खेला जा रहा है जहां दलितों को मुसलमानों के खिलाफ भडकाया जा रहा है। इस तरह दो वंचित समुदायों को ‘उनके धर्म’ या आस्था से जुड़े किसी भी मुद्दे के बहाने एक दूसरे से लड़वाया जा रहा है।
सांप्रदायिक राजनीति न केवल आम लोगों को उनकी धार्मिक पहचान से जोड़ने की कोशिश  कर रही है वरन् जानीमानी हस्तियों के साथ भी ऐसा ही किया जा रहा है, जैसा कि राजा महेन्द्र प्रताप के मामले में किया गया। तीसरा सबक जो हमारे समाज को सीखना चाहिए वह यह है कि सांप्रदायिक शक्तियां विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक-दूसरे से लड़वाने के लिए मुद्दों की तलाश  में हैं। जहां इन ताकतों का शीर्ष  नेतृत्व सभी प्रकार की हिंसा पर रोक की बात करता रहता है वहीं इसी नेतृत्व के चेले चपाटी सांप्रदायिकता की आग को भड़काने के उपाय ढूंढते रहते हैं।
इस माहौल में हम सब को सावधान रहने और धैर्य व समझदारी से काम करने की जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि महेन्द्र प्रताप जैसे लोग प्रेम, शान्ति और वैशिविक मानवतावाद के पैरोकार थे न कि किसी धर्म या जाति के नेता। केवल धार्मिक पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रीय नेताओं का वर्गीकरण करना घोर अनैतिक है चाहे फिर वे नेता किसी भी धर्म के क्यों न हों।
-राम पुनियानी
        


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