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शुक्रवार, 19 जून 2015

आतंक के खिलाफ वो 121 दिन

 ‘मौलाना खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस और आई.बी. अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए धरना’ लिखा हुआ रिहाई मंच के काले रंग के बैनर, जिस पर दाढ़ी-टोपी वाले एक शख्स की फोटो लगी थी को हर उस शख्स ने देखा होगा, जो 22 मई से लेकर 19 सितंबर 2013 के बीच यूपी विधानसभा के सामने स्थित
धरना स्थल से गुजरा होगा। यूपी ही नहीं देश के इतिहास में आतंकवाद के नाम पर मारे गए किसी बेगुनाह के न्याय के लिए 121 दिन तक चलने वाला यह सबसे बड़ा अनिश्चित कालीन धरना था।
    18 मई 2013 को शाम में यह खबर आई कि उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए
सिलसिलेवार धमाकों के आरोपी मौलाना खालिद मुजाहिद की फैजाबाद में पेशी के बाद लखनऊ जेल लाते वक्त हत्या कर दी गई है। पूरे प्रदेश में धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। क्योंकि खालिद मुजाहिद वह शख्स थे, जिनकी गिरफ्तारी को आर.डी. निमेष जाँच आयोग ने संदिग्ध माना है और उनको आतंकवाद के आरोप में फर्जी फँसाने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तक की माँग की है। निमेष आयोग आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारी को जाँचने वाला पहला आयोग था, जिसकी रिपोर्ट सरकार ने दबा रखी थी, जिसको रिहाई मंच ने अंदरखाने से प्राप्तकर जनहित में सार्वजनिक कर दिया था। यूपी की इंसाफ पसन्द अवाम के लिए गहरा झटका था कि जिस बेगुनाह को न्याय
दिलाने के लिए उन्होंने 2007-2008 में आजमगढ़-जौनपुर जैसे दूर दराज के जनपदों से लेकर राजधानी लखनऊ तक में विरोध प्रदर्शनों के बल पर तत्कालीन मायावती सरकार को आरडी निमेष जाँच आयोग गठन करने पर मजबूर किया, उसके कहने के बाद कि खालिद निर्दोष है यूपी सरकार ने उसे बरी नहीं किया। जिससे हौसला पाए पुलिस व आई.बी. अधिकारियों ने खालिद की हत्या करवा दी। 19 मई 2013 को जिस खालिद मुजाहिद को आतंकवादी कहा गया था, के जनाजे में 60-70 हजार के हुजूम के नारों ने तय कर दिया कि आखिर आतंकी कौन है?  यूपी सरकार ने इस आपाधापी में मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की सी.बी.आई. जाँच कराने की बात कह आक्रोश को शांत करने का प्रयास किया। पर सरकार और उसका तंत्र यह नहीं भाँप पाया कि इंसाफ पसन्द अवाम ने अपने शोक को संकल्प में तब्दील कर लिया है और इसी संकल्प के साथ शुरू हुआ खालिद के इंसाफ के लिए रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना।
    121 दिन यानी 4 महीना 1 दिन तक चलने वाले धरने के पहले दिन 22 मई को जब उत्तर भारत में भयंकर गर्मी और लू भरी आधियाँ चल रही थी उस वक्त किसी के
लिए यह भाँपना मुश्किल था कि यह धरना कितने दिनों चलेगा। पर आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाए गए लोगों के परिजनों, उनके गाँवों, कस्बों, यूपी के विभिन्न शहरों व देश के विभिन्न प्रदेशों के लोगों के इंसाफ लेने के जज्बे ने इसे मजबूती दी। शुरुआती दो महीने तक 24-24 व उसके बाद 48-48
घंटों की भूख हड़ताल का दौर शुरू हुआ। जिसमें परिजन, मानवाधिकार व राजनैतिक संगठनों के नेता, साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मियों व आम अवाम ने भूख हड़ताल की लंबी श्रृंखला बना डाली। खालिद सिर्फ एक पीडि़त का नाम नहीं था, बल्कि गिरफ्तारी के बाद से वह विरोध प्रदर्शनों की आवाज बन गया था। वह आवाज, जिससे आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से मुस्लिम युवाओं को उठाने वाली एटीएस, एसटीएफ ही नहीं, खुफिया एजेंसियाँ भी भय खाती थीं। 12 दिसंबर 2007 को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर 2007 को मडि़याहूं, जौनपुर से खालिद मुजाहिद को यूपी एसटीएफ ने अगवा करके 22 दिसंबर 2007 को फर्जी तरीके से बाराबंकी से विस्फोटकों के साथ गिरफ्तारी का दावा किया था। लेकिन यह दावा शुरू से ही कटघरे में आ गया क्योंकि इन दोनों को अगवा किए जाते वक्त कई लोगों ने देखा था। लिहाजा उनकी फर्जी गिरफ्तारी के साथ ही आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के आंदोलन के प्रतीक भी तारिक-खालिद बन गए। यूपी की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद बार एसोसिएशनों ने फतवा जारी कर दिया कि आतंक के आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ा जाएगा और न ही लड़ने दिया जाएगा। ऐसे में लखनऊ के
अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब सबसे पहले सामने आए तो वहीं बाराबंकी में रणधीर सिंह सुमन और फैजाबाद में एडवोकेट जमाल ने आतंक के आरोपियों के मुकदमे की वकालत की। सितंबर 2008 में दिल्ली में बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद जो सिलसिला आजमगढ़ समेत देश के विभिन्न इलाकों से गिरफ्तारियों का शुरू हआ उसके साथ ही पूरे देश में एक सिलसिलेवार आवाज बेगुनाहों की रिहाई के लिए भी उठने लगी। उसी सिलसिले से पैदा हुए आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की रिहाई के लिए रिहाई मंच ने एक बड़े आंदोलन की रूप रेखा तय की। जिसे हम इसके शुरुआती बयानों में देख सकते हैं कि अब किसी कतील सिद्दीकी को पुणे की यर्वदा जेल में हत्या, किसी इशरत की फर्जी मुठभेड़ में हत्या या फिर ऐसे तमाम बेगुनाहों की हत्याओं का जो सिलसिला खालिद तक पहुँचा, न सिर्फ उसे हम रोकेंगे बल्कि एक कड़ा संदेश आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों को फँसाने वालों को देंगे कि जेलें बेगुनाहों के लिए नहीं, गुनहगारों के लिए हैं।
    इन स्थितियों को भाँपकर 4 जून 2013 को यूपी सरकार के कैबिनेट ने आरडी
निमेष कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार लिया। आंदोलन के वेग को इससे समझा जा सकता है कि चाहें यूपी की बहुचर्चित हाशिमपुरा, मलियाना सांप्रदायिक ंिहंसा हो या फिर मुरादाबाद, कानपुर, बिजनौर दंगों की जाँच कमीशन की रिपोर्टें कई दशकों से सरकारी तहखानों में धूल फाँक रही हैं वहीं निमेष आयोग की रिपोर्ट को एक साल के भीतर स्वीकारा गया, जिसमें दर्जन भर से ज्यादा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। बहरहाल, रिपोर्ट स्वीकारने के बाद सपा सरकार ने सोचा कि यह धरना खत्म हो जाएगा। सरकार ने उन मुस्लिम उलेमाओं को फिर से सक्रिय किया जिन्होंने
इसके पहले खालिद के घर जाकर सरकार की तरफ से दिए गए 6 लाख रुपए लेने का
दबाव बनाया, जिसे खालिद के परिजनों ने नकार दिया था। वहीं खालिद के इंसाफ की लड़ाई अब सिर्फ यूपी विधानसभा ही नहीं, बल्कि दो-दो बार जेएनयू छात्रसंघ व अन्य छात्र संगठनों, युवा संगठनों व अन्य प्रदर्शन कारियों द्वारा दिल्ली में यूपी भवन को घेरने तक पहुँच गया था, ने पूरे देश में चल रहे विभिन्न आंदालनों को भी आकर्षित किया। जिन्होंने एक स्वर में रिहाई मंच की आवाज में आवाज मिलाई और सपा सरकार पर सवाल उठाया कि जब आर.डी. निमेष रिपोर्ट को  सरकार ने स्वीकार कर लिया है, यानी उसे सही मान लिया है तो फिर दोषी पुलिस अधिकारियों जिन्होंने अपने को बचाने के लिए खालिद मुजाहिद की हत्या करवा दी, को सरकार गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है।
    मौलाना खालिद की हत्या पर दर्ज एफ.आई.आर. बहुत अहम था। जिसमें हत्या के आरोपियों के बतौर पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी बृजलाल, मनोज कुमार झा समेत पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ ही आईबी अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ। क्योंकि खालिद को फंसाने का पूरा झूठा षड्यंत्र आई.बी. ने रचा था। इसलिए प्रदर्शनकारियों के निशाने पर खुफिया एजेंसियाँ प्रमुखता से थीं। रिहाई मंच के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता व जीत इसी बात की है कि इसने आई.बी. समेत खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की आपराधिक व देशद्रोही भूमिका को बहस के केन्द्र में लाया है। इसे धरने के दौरान तख्तियों पर लिखे उन वाक्यों से समझ सकते हैं कि ‘निमेष आयोग से खतरा, आखिर किसको’। प्रदर्शनकारियों के हाथों में आरोपी पुलिस वालों के नाम लिखी वो तख्तियाँ हर वक्त नजर आती थीं, जिन पर उनके गिरफ्तारी की माँग दर्ज थी। जिससे बौखलाए पूर्व डी.जी.पी. के समर्थक व संघ परिवार से जुड़े लोगों ने रिहाई मंच के धरने की मांगों के खिलाफ भी कई बार जी.पी.ओ. लखनऊ पर धरने दिए। अखिलेश सरकार ने यह आश्वासन दिया कि मानसून सत्र में निमेश कमीशन पर कार्रवाई रिपोर्ट लाई जाएगी। पर लगातार सरकार के झूठे वादे जो बेगुनाहों की मौत की वजह तक बन गए, पर अब किसी प्रकार का भरोसा नहीं रह गया था। क्योंकि सपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि
आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को वह रिहा करेगी, पर सत्ता में आने के बाद वह वादे से मुकर गई। ऐसे में रिहाई मंच ने तय किया कि जब तक सरकार कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाती धरना चलता रहेगा। 20 जून को धरने के तीस दिन होने पर यह धरना राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सुर्खियों में इस मुद्दे पर होने वाले सबसे बड़े धरने के रूप में आया। धरने का विश्लेषण करते हुए कई समाचार पत्रों ने इसके तीस दिन होने पर परिशिष्ट भी निकाला। धरने में देश के विभिन्न हिस्सों से शामिल होने वाले प्रदर्शनकारियों ने
इसे और सशक्त प्रतिरोध के केन्द्र के रूप में स्थापित किया। दिशा छात्र संगठन का सांस्कृतिक दस्ता हो या फिर जेएनयू के आरडीएफ द्वारा ‘बाटला हाउस’ नाटक का मंचन, ऐसे कई मौके आए जब लखनऊ शहर व बाहर की एक बड़ी बौद्धिक जमात समर्थन में आई। जेएनयू स्टूडेंट यूनियन समेत देश के विभिन्न कोनों से विभिन्न छात्र, राजनैतिक मानवाधिकार संगठन भी समर्थन में लखनऊ पहुँचे। चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, फिल्म निर्देशक अनुशा रिजवी, साहित्यकार नूर जहीर समेत विभिन्न शख्सियतें भी समर्थन में धरने में शामिल हुईं। मानसून आ गया था, पर धरने ने यूपी की सियासत का ताप गर्म कर दिया था। धरने के 50वें दिन इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ समेत गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों और बेगुनाहों के सवाल उठाने वाले जन संधर्श मंच और प्रख्यात लोकतांत्रिक अधिकारवादी टेªड यूनियन नेता मुकुल सिन्हा के सहयोगी अधिवक्ता शमशाद पठान गुजरात से तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडि़या और हस्तक्षेप के संपादक अमलेन्दु उपाध्याय भी शामिल हुए। धरने के समर्थन में माकपा सांसद मोहम्मद सलीम, माकपा नेता व पूर्व सांसद सुभाषिनी अली, पीयूसीएल नेता कविता श्रीवास्तव, अनहद की शबनम हाशमी भी आईं। उधर सरकार मानसून सत्र बुलाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, क्योंकि वह अपने वादे से पीछे हटने की फिराक में थी। 15 जुलाई को धरने के समर्थन में 55वें दिन पहुँचकर सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि हमारे देश में आईबी, सेक्योरिटी एजेंसी, एटीएस के लोग बेलगाम तरीके से काम कर रहे हैं। वे आम लोगों को निशाना बना रहे हैं। हमारे पास इस बात के उदाहरण हैं। इस खतरनाक माहौल में यह जरूरी है कि इन एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। उनकी देख-रेख के लिए संसदीय कमेटियाँ बनाई जाएँ। उन्हें गृह मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लगातार धरने का बढ़ता समर्थन, वह भी रमजान के महीने में, जब मुस्लिम समुदाय धार्मिक जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाता है, सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा था। क्योंकि सरकारी तंत्र यही प्रचार कर रहा था कि धरना मुसलमान चला रहे हैं पर वास्तविकता बिल्कुल इसके उलट थी। जो रमजान के महीने ने प्रमाणित कर दिया। रमजान के महीने में जब सामूहिक दुआ का आयोजन धरने के 60 वें दिन होने वाला था, उसके ठीक दो दिनों पहले सरकार द्वारा रिहाई मंच के मंच को उखाड़ने की बौखलाहट ने साफ कर दिया कि सरकार नीतिगत स्तर पर बढ़ती गोलबंदी से भयभीत
थी। लेकिन सरकार के इस लोकतंत्रविरोधी रवैये ने लोगों के हौसले को और बढ़ा दिया और जैसे ही यह खबर फैली आंदोलन के समर्थक भारी संख्या में धरना स्थल पर पहुँच गए और भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच ही सभा आयोजित हुई। वहीं धरने के दौरान दो बार सामूहिक इफ्तार का भी आयोजन हुआ जहाँ आंदोलन के समर्थक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुँचे। जिन्होंने खुद अपने हाथों से धरनास्थल पर फैली गंदगी जिसे पुलिस के दबाव में नगर निगम के सफाईकर्मियों ने साफ करने से मना कर दिया था, को खुद अपने हाथों में झाड़ू लेकर साफ किया और नमाज पढ़ सकने लायक बनाया। सबसे अहम कि गंदगी साफ करने वालों में शहर के तमाम हकपसंद उलेमा और बुजुर्गवार लोग शामिल थे। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकारी इफ्तार के आयोजन के जरिए इस मसले पर मुसलमानों को गुमराह करने की ‘इफ्तार पाॅलिटिक्स’ विफल हो गई क्योंकि आम अवाम ने रिहाई मंच के इफ्तार को सरकारपरस्त मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं
के इफ्तार के समानांतर हकपसंद लोगों का इफ्तार माना। 22 जुलाई को सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या धरने के समर्थन में पहुँचे और आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन टेकन रिपोर्ट यूपी सरकार से लाने को कहते हुए कहा कि यह कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं जहाँ बेगुनाह जेलों में और गुनहगारों का सरकार संरक्षण कर रही है। स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त का दिन इस धरने का एक खास दिन रहा। जब
रिहाई मंच ने तिरंगा फहराया और वहीं पर ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहाँ हैं’ विषय पर जनसुनवाई किया। जिसमें आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए लोगों के परिजनों खास कर अक्षरधाम हमले के आरोप में फांसी की सजा पाए बरेली के चाँद खान की नग्मा और उनके बच्चे, संकटमोचन कांड के आरोपी वलीउल्लाह के ससुर के अलावा कोसी कलाँ, मथुरा, अस्थान, प्रतापगढ़, फैजाबाद, परसपुर,
गांेडा के साम्प्रदायिक हिंसा से पीडि़त लोग भी शामिल हुए। धरने के 100वें दिन यूपी
विधानसभा पर रिहाई मंच ने हजारों लोगों का एक बड़ा विधान सभा चेतावनी मार्च निकालकर संदेश दिया कि सरकार अपने वादे से पीछे जाएगी तो अवाम सड़कों पर आ जाएगी। इस मार्च में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गताडे, अभिषेक श्रीवास्तव, जाहिद खान आदि शामिल हुए। जहाँ सरकार मानूसन सत्र से भाग रही थी वहीं प्रदेश में मानसून सत्र बुलाकर निमेश कमीशन रिपोर्ट पर कार्रवाई रिपोर्ट लाने की माँग को लेकर पत्र लिखने का अभियान शुरू हुआ। अन्ततः मानसून सत्र बुलाने की अंतिम समय सीमा जब खत्म होने लगी तो हार मानकर सरकार को 16 सितंबर को सत्र बुलाना पड़ा। 15 सितंबर की शाम रिहाई मंच के तत्वावधान में हजारों सामाजिक, राजनैतिक व मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं ने यूपी विधानसभा पर मशाल मार्च निकालकर सरकार को चेतावनी दी कि वह अपने वादे कोे अमल में लाए। 16 सितंबर को सरकार ने आर.डी. निमेष कमीशन की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जिसने साफ कर दिया कि पुलिस और आईबी एक पाॅलिसी के तहत मुस्लिमों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाती है। अब यह बात जुबानी नहीं रही, बल्कि निमेष कमीशन इसका एक प्रमाणित दस्तावेज, जनता के बीच आ गया था। सपा सरकार अपने वादे से फिर पीछे हट गई। उसने उन दोषी पुलिस व आई.बी. अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई जिन्होंने अपने पास मौजूद खतरनाक विस्फोटकों को तारिक-खालिद के पास से झूठी बरामदगी दिखाकर उन्हें गिरफ्तार किया था। इस बात से आक्रोशित रिहाई मंच के नेताओं ने इसे देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का सरकारी कदम बताते हुए यूपी विधानसभा पर घेरा डालो-डेरा डालो का आह्वान करते हुए अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। 19 सितंबर 2013 को रिहाई मंच के विधानसभा घेरने के आह्वान के बाद सरकार ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया और एक ऐतिहासिक धरने की समाप्ति का दिन 19 सितंबर बना। यह वही दिन था जिस दिन पाँच साल पहले दिल्ली में बाटला हाउस में फर्जी मुठभेड़ हुआ था। रिहाई मंच की मुहिम अनवरत जारी है और ऐसे आंदोलन, नींव की वो ईटें हैं जिस पर हमारा लोकतंत्र खड़ा है।
 -अनिल यादव
मो0-09454292339
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

शनिवार, 8 नवंबर 2014

मुसलमानों की राजनैतिक लामबंदी: बदलता स्वरूप


स्वतंत्रता के बाद से,भारत में, राजनीतिज्ञों ने मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए पारंपरिक रूप से मुख्यतः तीन श्रेणियों के मुद्दों का उपयोग किया है.सुरक्षा,धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान व मुसलमानों को देश की समृद्धि में उनका वाजिब हक दिलवाना। हाल में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में आल इंडिया मजलिस.इत्तिहादुल.मुसलमीन के उम्मीदवारों की विजय ने यह साबित किया है कि एक चौथे मुद्दे का उपयोग भी मुस्लिम मतों को पाने के लिए किया जा सकता है और वह है, हिन्दू राष्ट्रवादियों का मुकाबला करने के लिए धार्मिक आधार पर एक होना। अलग.अलग समय पर इन मुद्दों का उपयोग, बदलती हुई रणनीतियों के तहत किया जाता रहा है। ये हैं 1. चुनावी राजनीति से दूरी बनाना 2. उन राजनैतिक पार्टियों की सदस्यता लेना, जिनमें मुसलमानों का बहुमत नहीं है व 3. मुसलमानों की अपनी राजनैतिक पार्टियां बनाना।
राजनैतिक रणनीतियां 
पाकिस्तान में बसने के लिए भारत छोड़ने से पहले,मौलाना मौदूदी ने कहा था कि यदि भारत के मुसलमान अपने अधिकारों पर जोर देंगे तो उनके प्रति हिन्दुओं का पूर्वाग्रह बढ़ेगा। अतः, उनकी यह सलाह थी कि मुसलमानों को सरकार और प्रशासन से दूर ही रहना चाहिए ताकि हिन्दू राष्ट्रवादी आश्वस्त रहें कि उनके मुकाबिल मुस्लिम राष्ट्रवादी ताकतें लामबंद नहीं हो रही हैं। मौलाना के अनुसार, यही वह एकमात्र रास्ता था जिसके जरिए मुसलमान, इस्लाम के संबंध में बहुसंख्यक समुदाय के पूर्वाग्रहों को दूर करने में सफल हो सकते थे। साम्प्रदायिक राष्ट्रवादियों की दृष्टि में समाज में या तो किसी सम्प्रदाय का वर्चस्व हो सकता है या वह पराधीन हो सकता है। उन्हें बीच का यह रास्ता दिखता ही नहीं है कि दो समुदायों के सदस्य,मिलजुलकर,शांतिपूर्वक रह भी सकते हैं। यही समस्या मौलाना मौदूदी के साथ थी। मौलाना मौदूदी के पाकिस्तान जाने के बाद, उनके द्वारा स्थापित जमायते इस्लामी ने चुनावी राजनीति में भाग नहीं लिया। परंतु मौलाना की सलाह उन मुसलमानों के लिए किसी काम की नहीं थी जो कि अपनी रोजाना की जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगे हुए थे।
देवबंदी उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा.ए.हिन्द ने हमेशा पाकिस्तान का विरोध किया। जमात ने कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन का इस उम्मीद में समर्थन किया कि स्वाधीन भारत में मुसलमानों को उनके धर्म का पालन करने की आजादी होगी और उनके पर्सनल लॉ से कोई छेड़छाड़ नहीं की जायेगी। जमायत का यह मानना था कि मुस्लिम सांस्कृतिक पहचान के लिएए गैर.मुस्लिम साथी देशवासी उतना बड़ा खतरा नहीं हैं जितने कि अंग्रेज। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद में आस्था ने जमायत को यह विश्वास करने का और मजबूत आधार दिया। राजनैतिक व्यवस्था में मुस्लिम समुदाय को उसका वाजिब हिस्सा दिलवाने में जमायत की कोई रूचि नहीं थी। उसकी रूचि केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ को संरक्षित रखने में थी। दूसरी ओर,जिन्ना और अन्य मुस्लिम राष्ट्रवादियों का लक्ष्य मुसलमानों को सत्ता में उनका वाजिब हक दिलवाना था और वे आधुनिक विचारों का स्वागत करते थे। जहां देवबंदी उलेमा मुसलमानों की एक विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान बनाना और उसकी रक्षा के लिए समुदाय को एक रखना चाहते थे,वहीं जिन्ना और मुस्लिम राष्ट्रवादी, मुसलमानों को एक अलग राजनैतिक समुदाय और अलग राष्ट्र मानते थे।
भारत के स्वतंत्र होने के बाद, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद जैसे लोगों के सत्तासीन होने के कारण मुसलमान अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त थे। वैसे भीए विभाजन के दौर में हुए दंगे शांत होने के बाद से,सुरक्षा, मुस्लिम नेताओं के लिए चिंता का कोई बड़ा मुद्दा नहीं थी। उस समय जोर इस बात पर था कि अल्पसंख्यक तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब उन्हें बहुसंख्यकों का सद्भाव हासिल हो। जो मुसलमान भारत में रह गए थे उनमें मुख्यतः कारीगर, मजदूर, भूमिहीन किसान और पिछड़ी जातियां थीं और उनके लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि वे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में अपने वाजिब हिस्से की मांग उठा सकते हैं। जमायत और मुस्लिम राजनैतिक नेताओं ने मुसलमानों को उनकी धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को लेकर कांग्रेस का साथ देने के लिए राजी कर लिया। इस मुद्दे के तीन भाग थे.पहला यह कि भारतीय राज्य,मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरा, उर्दू भाषा को प्रोत्साहन देने के प्रयास किए जाएंगे और तीसरा, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। सन 1990 के दशक में इस सूची में एक और मुद्दा जुड़ गया और वह था बाबरी मस्जिद की रक्षा का.जिसे अंततः सन् 1992 में ढ़हा दिया गया।
मुस्लिम नेतृत्व, समुदाय की शैक्षणिक और आर्थिक उन्नति के लिए कुछ भी करने का इच्छुक नहीं था। वह केवल मुसलमानों की धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखना चाहता था और इसके लिए वह समुदाय के गौरवपूर्ण अतीत का गुणगान करता रहता था। इसमें शामिल था भारत को महान बनाने में मुस्लिम शासकों का योगदान, ताजमहल जैसी इमारतें और स्वाधीनता संग्राम में समुदाय की हिस्सेदारी। नेतृत्व के सामने एक चुनौती यह थी कि मुस्लिम समुदाय अत्यंत विविधतापूर्ण था। इसमें अनेक पंथ और बिरादरियां थीं। इसके अतिरिक्तए भाषाई, सांस्कृतिक व नस्लीय अंतर भी थे और कई अलग.अलग परंपराएं और रीतिरिवाज भी।
कांग्रेस के भीतर का मुस्लिम नेतृत्व इस तथ्य पर ध्यान नहीं दे रहा था कि मुसलमानों और गैर.मुसलमानों के बीच के सांस्कृतिक अंतर पर जोर देने और मुसलमानों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करने की कोशिश से, हिन्दू राष्ट्रवादी मजबूत हो रहे थे। उस समय महात्मा गांधी की हत्या में उनका हाथ होने और स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी न करने के कारण, हिन्दू राष्ट्रवादी समाज के हाशिए पर थे। वे शनैः.शनैः आमजनों के बीच यह प्रचार करने लगे कि मुसलमानों द्वारा अपनी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को मजबूती देने से अलगवावादी प्रवृत्ति बढ़ेगी। जबकि तथ्य यह है किधार्मिक.सांस्कृतिक स्वतंत्रता के आश्वासन ने ही देवबंदी उलेमाओं को मिलेजुले भारतीय राष्ट्रवाद की ओर आकर्षित किया था और उन्हें विभाजन व मुस्लिम लीग के साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद का विरोध करने के लिए प्रेरित किया था। देवबंदी उलेमाओं का प्रयास यह था कि वे संस्कृति का इस्तेमाल एक धार्मिक समुदाय को राजनैतिक समुदाय के रूप में पुनर्परिभाषित करने के लिए करें और राजनैतिक व्यवस्था में अपना वाजिब हक मांगें। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने मुसलमानों का दानवीकरण शुरू कर दिया। वे कहने लगे कि मुसलमानए मूलतः अलगाववादी हैं, वे पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और बहुपत्नी प्रथा का इस्तेमाल कर अपनी आबादी को इतना बढ़ा लेना चाहते हैं कि उनकी संख्या हिन्दुओं से अधिक हो जाए और वे भारत को इस्लामिक राज्य में बदल सकें। कांग्रेस इस बेजा प्रचार का मुकाबला करने की अनिच्छुक व इसमें असमर्थ थी। बल्कि कांग्रेस को लगता था कि अगर मुसलमान असुरक्षित महसूस करेंगे तो वे मजबूर होकर उसके साथ जुड़ेंगे। कांग्रेस ने मुसलमानों को शिक्षा, बैंक कर्जों,सार्वजनिक नियोजन,सरकारी ठेकों इत्यादि में बराबरी के अवसर दिलवाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए और ना ही यह कोशिश की कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ मुसलमानों तक पहुंचें। इस दिशा में पहली बार कुछ अनमने से प्रयास सन् 2006 में सच्चर समिति की रपट आने के बाद किए गए और इन प्रयासों का मुख्य लक्ष्य भी प्रचार पाना था। नौकरशाहों ने मुसलमानों के लिए बनाई गई विशेष कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में पर्याप्त दिलचस्पी नहीं दिखाई और मुसलमानों को बहुत कम वास्तविक लाभ मिला।
सन् 1961 के जबलपुर दंगों ने पहली बार मुसलमानों की कांग्रेस के प्रति आस्था को झकझोरा। नेहरू के हस्तक्षेप के बाद भी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा जारी रही। उस मुस्लिम नेतृत्व, जो अपनी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान बनाने की कोशिशों में लगा हुआ था, के लिए जबलपुर दंगे एक चेतावनी थे। परंतु उन्होंने उसे नजरअंदाज कर दिया। सन् 1952 के चुनाव में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को,  बिहार,उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और संपूर्ण भारत में मुस्लिम उम्मीदवारों को मिले मतों का क्रमश:64,72,56 व 57 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हुआ। सन् 1957 के चुनाव में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को इन्हीं राज्यों व संपूर्ण भारत में सभी मुस्लिम उम्मीदवारों को मिले मतों के क्रमश: 65, 58, 51 व 52 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। सन् 1962 में यह प्रतिशत क्रमश: 52,47, 52 व 52 रह गया। सन् 1967 में कांग्रेस को मिलने वाले मुसलमानों के मतों में भारी कमी आई और इन तीन राज्यों और संपूर्ण भारत में क्रमश: उसे केवल 39, 36, 47 और 40 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। सन् 1960 के दशक के अंत में देश में कांग्रेस के विरूद्ध वातावरण था और इसका असर मुसलमानों पर भी पड़ा। जैसा कि आंकड़ों से स्पष्ट हैए खासी मुस्लिम आबादी वाले इन तीन राज्यों में मुसलमानों में कांग्रेस की पैठ तेजी से कम हुई।
मुसलमान बहुत तेजी से कांग्रेस से दूर खिसकने लगे क्योंकि पार्टी उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में तो असफल रही ही थी, शासन व्यवस्था और आर्थिक संपन्नता में भी उन्हें उनका वाजिब हक नहीं दिलवा सकी थी। कांग्रेस का जोर केवल उनकी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने पर थाए जिसकी मांग पितृसत्तात्मक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले देवबंदी उलेमा करते थे। धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के बदलेए राजनैतिक समर्थन पाने की कोशिशों के उदाहरण थे सलमान रूशदी के उपन्यास 'सेटेनिक वर्सेस' पर रोक और शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलटने के लिए नए कानून का निर्माण आदि।
सन् 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद,मुसलमानों का कांग्रेस से पूरी तरह मोहभंग हो गया। इस घटना से मुसलमानों को यह लगने लगा कि कांग्रेस उनकी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने में भी सक्षम नहीं है।
पिछड़े मुसलमान
जहां देववंदी उलेमाओं के लिए मुसलमानों की विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ, उर्दू व अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इर्दगिर्द घूमता था, वहीं पिछड़े मुसलमानों, जो कि कुल आबादी के 85 फीसदी से ज्यादा थे, की सांस्कृतिक पहचान की परिभाषा भिन्न थी। वे जातिगत ऊँचनीच और भेदभाव का सामना कर रहे थे। जहां इस्लाम उन्हें समान दर्जा और न्याय का वायदा करता था वहीं अशरफ मुसलमान.जो कि या तो ऊँची जातियों के हिंदुओं से धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बने थे या दावा करते थे कि उनकी रगों में बादशाहों का खून बह रहा है.पिछड़े मुसलमानों को अपने बराबर दर्जा देने के लिए तैयार नहीं थे। अजलफ ;नीची जातियों से धर्मपरिवर्तन कर बने मुसलमान, जिन्हें पसमांदा भी कहा जाता है, सांस्कृतिक दृष्टि से स्वयं को हिंदू नीची जातियों के सदस्यों के अधिक नजदीक पाते थे। उन्हें इस्लाम और बिरादरी की संस्कृति, दोनों विरासत में प्राप्त हुए थे। पसमांदाओं को लामबंद करने के लिए सामाजिक न्याय और सामाजिक समावेश के मुद्दों का इस्तेमाल किया गया। पिछड़े मुसलमानों को उर्दू से कोई विशेष प्रेम नहीं था और ना ही उन्हें दूरदराज स्थित एक विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र से कोई लेनादेना था, विशेषकर तब, जबकि उनके बच्चो के लिए पड़ोस के स्कूल में दाखिला पाना भी एक संघर्ष था। उन्हें वहाबी.देववंदी परिवार संहिता से भी कोई मतलब नहीं था। उनका जोर इस बात पर था कि उन्हें दो वक्त की रोटी मिल सके और उनके बच्चे पढ़ लिख सकें। दक्षिण भारतए विशेषकर तमिलनाडु और कर्नाटक व तेलगांना के ग्रामीण इलाकों में, मुसलमान अपनी द्रविड़ पहचान और सामाजिक न्याय के आंदोलनों से अधिक जुड़े हुए थे।

सुरक्षा का मुद्दा
बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बादए मुसलमान मतदाता कांग्रेस से दूर होते गए क्योंकि कांग्रेस उनके धार्मिक.सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा करने में असफल रही थी। सन् 1990 के दशक में सुरक्षा का मुद्दा,धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बन गया। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल मुसलमानों को यह आश्वासन देकर अपनी ओर खींचने में सफल रहे कि वे उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। यहां यह महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम राजनैतिक नेतृत्व ने उच्चतम न्यायालय के उन कई फैसलों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कि जिनके द्वारा मुसलमानों के धार्मिक.सांस्कृतिक चरित्र पर अतिक्रमण किया जा रहा था। उदाहरणार्थ,सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का कोई विरोध नहीं हुआ कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना राज्य द्वारा की गई है और इसलिए उसे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान नहीं माना जा सकता। इसी तरह,सलमान रूशदी और तस्लीमा नसरीन को वीजा दिए जाने का विरोध टीवी स्टूडियों में तो हुआ परंतु सड़कों पर नहीं। मुस्लिम महिला ;तलाक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1986,जिसे संसद ने शाहबानो प्रकरण में निर्णय को पलटने के लिए बनाया था, की उच्चतम न्यायालय ने इस तरह व्याख्या की कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं का अपने पूर्व पतियों से मुआवजा पाने का अधिकार और मजबूत हो गया। इस निर्णय का भी कोई विरोध नहीं हुआ। ऐसे अनेक धार्मिक.सांस्कृतिक मुद्दे हैंए जिनमें राज्य या न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप किया गया परंतु उन देववंदी उलेमाओं व अन्यों ने उनका कोई विरोध नहीं कियाए जो ये दावा करते थे कि वे मुसलमानों की विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करेंगे।
आरजेडी का बिहार में 15 साल का शासन दंगा मुक्त रहा। उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में भी सांप्रदायिक दंगों की संख्या और उनकी भयावहता में जबरदस्त गिरावट आयी। परंतु समाजवादी पार्टी व आरजेडी दोनों ने ही पूरे मुस्लिम समुदाय के प्रवक्ता के रूप में केवल अशरफ नेतृत्व को गले लगाना ही बेहतर समझा। उनकी निगाहों में मुसलमान एकसार धार्मिक.सांस्कृतिक समुदाय थे। यह धारणा उनके द्वारा प्रस्तावित एम.वाय गठजोड़ से भी जाहिर होती है। मुलायम सिंह यादव ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि स्कूलों के मुस्लिम विद्यार्थियों को रविवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश मिला करेगा। परंतु इस निर्णय का मुसलमानों द्वारा ही इतना विरोध किया गया कि उसे वापस लेना पड़ा। अगले अंक में जारी
-इरफान इंजीनियर
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