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रविवार, 27 अक्टूबर 2013

नरेंद्र मोदी अकेला फेंकू नहीं है

अगले आम चुनाव में करीब आठ महीने रह गए हैं। अभी 11 नवंबर और 4 दिसंबर के बीच देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। लोकतंत्र के नाते ऐसे में जरूरी है देश के सामने दरपेश समस्याओं और चुनौतियों पर गंभीर राजनीतिक बहस हो। बहस के केंद्र में ऐसे विचार, नीतियां और कार्यक्रम हों जिनसे विशोषकर देश की मेहनतकश जनता, जो थोड़ेसे उच्च और उच्च मध्यवर्ग को छोड़कर देश की अधिकांश आबादी है और गरीब है, का जीवन जल्द से जल्द सुखसुविधापूर्ण हो; वह शिक्षित, स्वस्थ, सुरक्षित और स्वाभिमानी बने; और उसके संविधानप्रदत्त अधिकार सहजता से उपलब्ध हों। आजादी के बाद करीब सात दशकों में यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है, बहस में इसकी ईमानदारी से गहरी जांचपड़ताल हो, ताकि लक्ष्य जल्द से जल्द हासिल किया जा सके।
गंभीर बहस की जिम्मेदारी मुख्यतः राजनीतिक पार्टियों, बुद्धिजीवियों और सचेत नागरिक समाज की बनती है। इनके द्वारा की जाने वाली बहस का प्रभाव सामान्य जनता पर होता है और वह उसमें अपने स्तर से हिस्सेदारी और योगदान करती है। प्रबुद्ध वर्ग और सामान्य जनता के सम्मिलित विमशर से चुनाव में अच्छी बहस का माहौल बन सकता है, जिसमें से नए विचार और समाधान निकल कर आ सकते हैं। भारत की राजनीति में, खास कर चुनावों के वक्त, जब तक यह होता रहा, नीतिनिर्धारण का काम कुछ हद तक संविधान के नीतिनिर्देशक तत्वों की रोशनी में होता रहा। उस दौर में कोई भी पार्टी या नेता जनता और उसके हित के मुद्दों को छोड़ कर कारपोरेट घरानों की चापलूसी और ताबेदारी की वैसी हिम्मत नहीें दिखा सकता था जो आज दिखई जा रही है।
नवउदारवादी दौर में भारत की राजनीति भारत के संविधान के निर्देशानुसार भारत की मेहनतकश जनता के लिए नहीं चलाई जा रही है। इस सच्चाई को छिपाने के लिए गंभीर और टिकाऊ बहस की जगह उत्तरोत्तर थोथी बहस ने ले ली है। मुख्यधारा प्रिंट और इलैक्टॉनिक मीडिया दोनों में यह देखा जा सकता है। इस बार 2009 के आमचुनाव के समय की बहस से भी स्तर काफी नीचे चला गया है। इस बार नीतियों की नहीं, केवल नामों को लेकर ॔बहस’ चल रही है। ॔कलियुग केवल नाम अधारा’ की टेक पर कांग्रेस और भाजपा ने अगला चुनाव जीतने का मंसूबा बांधा है। ज्यादातर नागरिक समाज उनके तय किए गए नामों तक राजनीतिक बहस को सीमित किए हुए है।
हम लोगों ने जेपी की पुण्यतिथि 8 अक्तूबर से लेकर उनकी जयंती 11 अक्तूबर तक आयोजित सोशलिस्ट पार्टी के ॔समाजवाद लाओपूंजीवाद हराओ’ अभियान के तहत दिल्ली के कुछ इलाकों में 11 सूत्री परचा बांटा और नुक्कड़ सभाएं की। हमारा मकसद आने वाले आम चुनाव में कारपोरेट पूंजीवाद और उसकी एजेंट सरकारों और राजनीति के बरक्स समाजवादी विचारों पर बहस छेड़ने का था। रिक्शा वालों और रेहड़ीपटरी-खोका वालों ने परचा उत्साह से लिया और उसे तुरंत पॄा। लेकिन सुबह पाकोर्ं में हवाखोरी करने वाले शहरियों में कई ने हमारी कवायद की उपेक्षा करते हुए कहा कि यह सब छोड़ो, मोदी को लाओ; वह सब कुछ ठीक कर देगे। परचे की सामग्री पॄना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा। कांग्रेस ॔सोनिया मैया’ और ॔राहुल भैया’ का नाम भजने में लगी रहती है और चाहती है कि बाकी लोग भी वैसा ही करें। कांग्रेसभाजपा की राजनीति के साथ संगत करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों में भी एक ही व्यक्ति/परिवार का नाम चलता है।
कांग्रेस और भाजपा के भीतर से निकल कर उन्हीं के नक्शोकदम पर चलने वाली आम आदमी पार्टी (आप) में भी एक के अलावा दूसरा नाम नहीं है। सामंती संस्कारों पर पलने वाली भारत की कारपोरेट पॉलिटिक्स में कांग्रेस भाजपा से आगे निकलने की हड़बड़ी में आम आदमी के नाम पर जमा हुए लोगों ने नीति की जगह नाम की महिमा को अच्छी तरह पहचान लिया है। भारत में नाम की महिमा पुरानी और खासी रही है जो धर्म से निकल कर समाज को अपनी गिरफ्त में लेते हुए राजनीति में गहरी जड़ जमा चुकी है। ध्यान दिया जा सकता है पिछले दिनों हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में अन्ना नाम की कैसी पुकार मची थी। उसी आंदोलन से यह पार्टी निकल कर आई है और अन्ना उसके साथ नहीं आए तो अन्ना को लाने वाले का नाम आगे किया गया है।
एक मायने में इस पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा को भी पीछे छोड़ दिया है। उसने चुनाव के कई महीने पहले पोस्टरों और होडिरंगों पर प्रचार कर दिया कि दिल्ली के मतदाताओं ने उनके नेता को भारी बहुमत से मुख्यमंत्री चुन लिया है। चुनाव की घोषणा नहीं हुई थी, अधिसूचना तो अभी तक जारी नहीं हुई है; अन्य पार्टियों की बात छोड़िये, खुद ॔भावी मुख्यमंत्री’ की पार्टी का एक भी विधानसभा क्षेत्र से एक भी उम्मीदवार घोषित नहीं हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री चुन लिए जाने का फतवा जारी कर दिया गया। इसकी परवाह किए बगैर कि लोकतंत्र और दिल्ली के मतदाताओं की इससे ज्यादा तौहीन नहीं हो सकती। मजेदारी यह कि भाजपा ने अब जाकर अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया है। लेकिन आप ने भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष को बतौर मुख्यमंत्री ॔आप’ और कांग्रेस से फिसड्डी घोषित कर दिया। कांग्रेस ने भी अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा आज तक नहीं की है। ॔आप’ के सर्वेशूरवीरों ने वर्तमान मुख्यमंत्री को कांग्रेस की अगली मुख्यमंत्री घोषित करके उन्हें करारी शिकस्त दे दी। बतौर मुख्यमंत्री ही नहीं, बतौर विधायक भी।
यह हमारे दौर का बड़ा विद्रूप है कि लोकतंत्र के इस उपहास को मुख्यधारा मीडिया दिनरात ॔गंभीरतापूर्वक’ परोस रहा है। हिंदी के एक लेखकबुद्धिजीवी ने ॔आप’ को बुद्धिजीवियों की शरणस्थली बताते हुए अफसोस जाहिर किया है कि दो नाम यानी अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल मिल कर चलते तो व्यवस्था बदल जाती। पता नहीं क्यों उन्होंने रामदेव का नाम छोड़ दिया, दोनों जिनके साथ मिल कर व्यवस्था परिवर्तन कर रहे थे? विश्व बैंक और फोर्ड फाऊंडेशन से धन लेकर ॔मेरा गांव मेरा देश’ की सेवा करने वालों को उन्होंने गांधी, जेपी, लोहिया और नेहरू जी के समकक्ष बिठा दिया है। बेहतर होता इस नामावली में भगत सिंह और बाबा साहब को भी शामिल कर लेते।
पिछले दो साल से यह लगातार हो रहा है कि आजादी के महान सेनानियों और विश्व स्तरीय चिंतको को अनर्गल ंग से नवउदारवाद के एजेंटों के साथ घसीटा जा रहा है। यह शायद ही कोई स्वीकार करे कि ये स्वतंत्रता सेनानी और चिंतक इन स्वनामधन्यों जैसे ही ॔देशभक्त’ थे। दरअसल, इन फर्जी देशभक्तों के नाम को ऊंचा उठाने के लिए देश के मूर्द्धन्य नेताओं को सस्ता बनाया जा रहा है। हमें बताया गया कि एक टीवी चैनल की ॔बहस’ में हिंदी के एक अखबार के संपादक ने ॔आप’ की आलोचना करने के लिए हम पर परोक्ष कटाक्ष किया। नाम शायद उन्होंने इसलिए नहीं लिया बड़े नामों के बीच छोटा नाम नहीं आना चाहिए। ऐसे लोगों का तर्क है कि ॔आप’ के नेता फलां तारीख तक विदेशी फंडिंग लेते थे, उसके बाद लेना बंद कर दिया है। यानी, नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली है! जहिर है, ॔आप’ के ये समर्थक पिछली फंडिंग की बात करके अभी की विदेशी फंडिंग और चुनाव क्षेत्रों को अनिवासी भारतीयों द्वारा गोद लेने के ॔प्रयोग’ से जनता का ध्यान हटाना और उसका औचित्य प्रतिपादन करना चाहते हैं।
॔आप’ द्वारा चुनाव के लिए विदेशों से धन लेने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक वकील की जनहित याचिका स्वीकार कर सरकार को जांच के आदेश दिए हैं। एक अन्य वकील ने गृह सचिव और मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रतिवेदन देकर अविलंब जांच और कार्रवाई की मांग की है। लेकिन यह चर्चा मीडिया में जोर नहीं पकड़ती। जोर पकड़ेगी तो कांग्रेसभाजपा से परेशान लोग ॔आप’ के बजाय अन्य पार्टियों की तरफ रुख कर सकते हैं जिनमें कुछ अभी भी समाजवाद/सामाजिक न्याय की बात करती हैं। कुछ छोटी पार्टियां भी देश में हैं जो जड़मूल से कारपोरेट पूंजीवाद का विरोध करती हैं और समाजवादी व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध हैं।
॔बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा’ सत्ता में हिस्सेदारी का यह नवउदारवादी नुस्खा, जिसे आत्मसात करने में कांग्रेसभाजपा और क्षेत्रीय क्षत्रपों को काफी लंबा समय लगा, ॔आप’ और उसके समर्थकों ने घुट्टी में ही पी लिया है। हमने कुछ साल पहले ॔युवा संवाद’ में लिखा था कि नवउदारवाद के दौर में निर्लज्जता ही उसके समर्थकों का आभूषण बन गई है। सत्ता की चादर समस्त निर्लज्जताओं को ंक देती हैं कारपोरेट राजनीति का यह मूल पाठ अच्छी तरह पॄ कर ॔आप’ ने राजनीति की शुरुआत की है। ॔आप’ का बड़बोलापन भी गौर करने लायक है। डरा हुआ आदमी ज्यादा जोर से हनुमान चालीसा पॄता है। ॔आप’ और उसके मुख्यमंत्री को इतने प्रतिशत वोट मिले हैं, ॔आप’ बहुमत की सरकार बनाएगी, रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण का जलसा होगा, वहीं जनलोकपाल बना दिया जाएगा, उसी दिन से देश से भ्रष्टाचार का बीजनाश हो जाएगा ये सब डरे हुए मन की आवाजें हैं। एनजीओ चलाने वाले जब राजनीति चलाने का काम करेंगे तो शुरू में उनका डरना स्वाभाविक है। हारने पर ॔घर के रहेंगे न घाट के’!
नरेंद्र मोदी को कांग्रेस के एक नेता ने ठीक ही ॔फेंकू’ नाम दिया है जो चल निकला है। लेकिन नरेंद्र मोदी अकेला फेंकू नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर जंतरमंतर और फिर रामलीला मैदान पर जुटे एक से एक फेंकुओं को याद किया जा सकता है। उन्होंने न केवल दूसरी, बल्कि किसी तीसरी आजादी को भी एक डग में नाप लिया था! आजादी और क्रांति आंधी के आमों से भी सस्ते शब्द हो गए थे। कहने का आश्य यह है कि नरेंद्र मोदी और नामीगिरामी लोगों की आनुवंशिकी एक ही है।
नवउदारवादी बहस में तैरने वाले ये सभी नाम, जाहिर है, नवउदारवादी नीतियों के समर्थक हैं, जो ऊपर से बन कर आती हैं। पार्टियां ओर उनके नेताओं के नाम भले अलगअलग हों, वर्गस्वार्थ सबका एक है। भारत की मुख्यधारा राजनीति में वर्गस्वार्थ की प्रबलता का यह प्रमाण है। और साथ ही इस बात की गारंटी कि इनके चलते देश की मेहनतकश जनता को, समाजवादी क्रांति तो दूर की कौड़ी है, कभी उसका संवैधानिक देय भी नहीं मिल सकता। यह तर्क, जो ॔आप’ के समर्थकों ने चलाया हुआ है, कि किसी भी तरह कांगेस भाजपा से निजात मिले, दरअसल, कारपारेट पूंजीवाद के विरोध की राजनीति से निजात पाने का तर्क है। वर्ग स्वार्थ की इस ताकत को तोड़ने के लिए समाजवाद के समर्थकों को और ज्यादा प्रतिबद्धता के साथ गंभीर बहस और संघर्ष चलाने की जरूरत है। पूंजीवादी बर्बरता से बचने का यही रास्ता है।
-प्रेम सिंह



गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अन्ना आंदोलन: संदेहास्पद मंतव्य व चरित्र

अपनी टीम द्वारा तैयार जनलोकपाल बिल को जस का तस स्वीकार करने की मांग को लेकर, दिल्ली में अन्ना हजारे के दूसरे अनशन (अगस्त 2011) ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है। इस जनांदोलन की प्रकृति क्या है? समाज के विभिन्न वर्गों के मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत सामाजिक संगठनों को इस आंदोलन से जुड़ना चाहिए अथवा नहीं? इस आंदोलन का कोई छिपा हुआ एजेन्डा तो नहीं है? इसके पीछे कोई राजनैतिक ताकत तो काम नहीं कर रही हैं? इन सभी और कुछ अन्य प्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर खोजना ज़रूरी ही नहीं अनिवार्य भी है।
इसके पहले, अन्ना ने अप्रैल 2011 में इसी मुद्दे को लेकर जंतरमंतर पर अनशन किया था। उस समय, अन्ना के प्रतिस्पर्धी बाबा रामदेव ने अपना अलग आंदोलन प्रारंभ किया था। उनका घोषित लक्ष्य था विदेशों में जमा कालेधन की वापिसी। अन्ना तो राज्य के दबाव के आगे नहीं झुके और पुनः मैदान में आ गए परंतु रामदेव की हवा निकलते देर नहीं लगी। उन्हें महिलाओं के कपड़े पहनकर आंदोलन स्थल से भागना पड़ा।
“टीम अन्ना“ में कई लोग शामिल हैं। इनकी पृष्ठभूमियां अलग-अलग हैं। कुछ न्याय प्रणाली में सुधार के लिए काम कर रहे हैं तो कुछ बंधुआ मजदूरों के लिए। कुछ अन्य साम्प्रदायिकता-विरोधी आंदोलन का हिस्सा हैं। इनमें से अधिकांश, मैदानी स्तर के सामाजिक कार्यकर्ताओं से जुड़े हुए हैं। इस बार जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी खुलकर अन्ना के साथ आ गई हैं। वे भी अन्ना समर्थकों की भीड़ का हिस्सा बन र्गइं हैं। कई ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना के साथ हैं जिनकी मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता पर असंदिग्ध है। दूसरी ओर शबनम हाशमी, महेश भट्ट, आनंद तेलतुमड़े व प्रसिद्ध लेखिका अरूंधती राय ने अन्ना के आंदोलन की कटु आलोचना की है। अरूणा राय और उनके साथियों ने लोकपाल विधेयक का अपना अलग मसौदा भी प्रस्तुत किया है। देश भर के सामाजिक कार्यकर्ता दुविधा में हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे क्या करें। क्या वे अन्ना का साथ दें और उनके जनलोकपाल बिल को कानून बनाने के संघर्ष में कूद पड़ें? या फिर वे इस आंदोलन से दूरी बनाए रखें। इसमें कोई संदेह नहीं कि अन्ना के आंदोलन ने आमजनों के एक बड़े वर्ग को आकर्षित ही नहीं बल्कि सम्मोहित कर लिया है।
लोकपाल जैसी कोई संस्था होनी चाहिए, यह विचार दशकों पुराना है। इस अवधि में कई विभिन्न पार्टियां सत्ता में रहीं परंतु लोकपाल बिल की ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। चाहे वह जनता पार्टी हो, वी. पी. सिंह या भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए - सभी ने लोकपाल बिल के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालकर रखा। अन्ना अचानक राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे और उनके आंदोलन को भाजपा-आरएसएस-विहिप गठजोड़ ने एक बड़े जनांदोलन का स्वरूप दे दिया। अन्ना के मेले को मीडिया ने खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित-प्रसारित किया। अन्ना को मानों महामानव बना दिया गया। उनको मिले कव्हरेज की तुलना केवल क्रिकेट मैचों को मिलने कव्हरेज से की जा सकती है। शायद ही कोई ऐसा चैनल हो जिसने अन्ना के भाषणों का सीधा प्रसारण न किया हो। अतिउत्साहित टी. वी. एंकर अपना गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे चाहते हैं कि हम सब अपने-अपने काम धंधे छोड़कर रामलीला मैदान में डेरा डाल दें। आरएसएस की मशीनरी-जिसका अधिकांश हिस्सा अद्रश्य रहता है - भी सक्रिय हो गई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह मशीनरी गणेश को दूध पिलाने में सक्षम है। अपने हाथों में जलती हुई मोमबत्तियां लिए मध्यमवर्ग के लोग रामलीला मैदान में जुट गए हैं। यह वही वर्ग है जिसे इंडिया काफी समय से शाईनिंग नजर आ रहा था। मंच की पृष्ठभूमि में थे भारत माता और वंदे मातरम् के नारे गुंजायमान हो रहे हैं। संघ और उससे जुड़े बाबा लोग भी पहुंच गए हैं। वे अपनी कथित आध्यात्मिक शक्ति का इस्तेमाल एक विशेष प्रकार की राजनैतिक सोच को बढ़ावा देने के लिए करते हैं-उसी सोच को जिसके चलते बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी।
“शाईनिंग इंडिया“ वर्ग के सदस्यों के अतिरिक्त और लोग भी इस आंदोलन से जुड़े हैं। इनमें से कई तो यह भी नहीं जानते कि वे किस उद्धेष्य के लिए लड़ रहे हैं। टीम अन्ना ने सफलतापूर्वक ऐसा वातावरण बना दिया है मानो जो उसके साथ नहीं है, वह भ्रष्टाचार का समर्थक है। धुआंधार प्रचार की इस धुंध मे यह तथ्य गुम हो गया है कि अन्ना का एकमात्र घोषित लक्ष्य है उनके द्वारा प्रस्तुत लोकपाल बिल के मसौदे को ही कानून का जामा पहनाना।
इस आंदोलन के संदर्भ में कुछ मुद्दों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। क्या कारण है कि अन्ना और रामदेव, दोनों ने भ्रष्टाचार का मुद्दा तब उठाया जब कारपोरेट दुनिया के कुछ शीर्ष अधिकारी जेलों में डाल दिए गए और उद्योग जगत के शहंशाहों के भी सलाखों के पीछे जाने के आसार नजर आने लगे। क्या यह मात्र संयोग है कि यह आंदोलन उस समय उभरा जब मोदी के पुराने पापों पर से पर्दा उठना शुरू ही हुआ था और ऐसा लग रहा था कि अंततः उन्हें अपनी करनी का फल भुगतना पड़ेगा।
अन्ना आंदोलन के समर्थकों के दो तबके हैं। पहला वह जिसे राजनीतिविज्ञानी “शाईनिंग इंडिया“ तबका कहते हैं। एमबीए व ब्लैकबैरी धारी ये लोग भारी-भरकम पैकेज पाते हैं और सामाजिक मुद्दों से इनका सरोकार, नरेगा और दलितों के लिए आरक्षण जैसे सकारात्मक कदमों के विरोध तक सीमित है। यह वही वर्ग है जिसका एक बड़ा हिस्सा जुलाई 2010 के मुंबई धमाकों के बाद पाकिस्तान पर तुरत-फुरत आक्रमण करने की वकालत कर रहा था। दूसरा तबका बहुत छोटा है और मध्यमवर्गीय तबके की तुलना में कहीं कम मुखर है। इस तबके में वे वंचित समूह शामिल हैं जो बढ़ती कीमतों और अपने रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं से हलकान हैं और अपने दुःख-दर्द को सामने लाने के लिए मंच की तलाश में हैं।
अन्ना के आंदोलन का उद्धेष्य चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो यह समझना मुश्किल है कि वे यह क्यों चाहते हैं कि उनके द्वारा तैयार किया गया बिल का मसौदा ही कानून बने और वह भी उनके द्वारा निर्धारित समयसीमा के अंदर। अन्ना का समूह, सिविल सोसायटी का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं है। लोकपाल बिल के कई अन्य मसौदे भी सामने आए हैं जिनमें से कुछ अन्ना के मसौदे से बेहतर भी हो सकते हैं। ये मसौदे, अन्ना के मसौदे के तानाशाहीपूर्ण चरित्र से मुक्त हैं। इनमें सरकारी मसौदे की कमियों को दूर करने का प्रयास भी किया गया है। इनमें से एक मसौदा अरूणा राय और उनके साथियों द्वारा तैयार किया गया है। क्या कारण है कि अन्ना, संसदीय नियम-कानूनों की अवहेलना कर अपने मसौदे को देश पर थोपना चाहते हैं। हम सब जानते हैं कि सूचना का अधिकार और कई अन्य विधेयकों को कानून बनने में सालों लगे। हम यह भी जानते हैं कि लोकपाल बिल जितने ही महत्वपूर्ण कई अन्य बिल जैसे साम्प्रदायिक हिंसा विधेयक तथा भोजन का अधिकार विधेयक आदि काफी समय से लंबित हैं। अन्ना की जल्दबाजी का केवल एक उद्धेशय हो सकता है और वह है संसदीय प्रजातंत्र को कमजोर करना।
कई प्रतिबद्ध व ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता यह मानते हैं कि हमारे देश की वर्तमान व्यवस्था असफल साबित हो चुकी है और इसे बदला जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान व्यवस्था में कई खामियां हैं। यह व्यवस्था बहुत धीमी गति से काम करती है। परंतु सवाल यह है कि इस व्यवस्था का विकल्प क्या है? क्या यह विकल्प “लाओ या जाओ“ है, जैसा कि अन्ना कह रहे हैं। क्या “लाओ या जाओ” नारे की मूल प्रकृति राजनैतिक नहीं है? क्या इसका अंतिम लक्ष्य उस पार्टी को शासन में लाना नहीं है जिससे जुड़े तत्व “मैं अन्ना हूं“ टोपियां और टी शर्टें बांट रहे हैं और घर-घर जाकर मध्यम और अन्य वर्गों का समर्थन जुटा रहे हैं?
इस नारे का एक दूसरा अर्थ भी हो सकता है। वह यह कि “जाओ“ सत्ताधारी दल नहीं बल्कि संसदीय व्यवस्था पर लक्षित है। दूसरे शब्दों में, यह एक क्रांति का आव्हान है जिसके जरिए एक बिल्कुल नई व्यवस्था अस्तित्व में आएगी। कई सामाजिक कार्यकर्ता इस दूसरी व्याख्या को सही मान रहे हैं। यह, दरअसल, वर्तमान हालात के प्रति कुंठा और गुस्से व प्रजातांत्रिक व्यवस्था के शनैः-शनैः परिपक्व होने की प्रक्रिया से अनभिज्ञता का प्रतीक है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था का स्थान कोई अन्य व्यवस्था ले सकती है परंतु वह व्यवस्था तानाशाही ही होगी।
इसी तरह, अन्ना आंदोलन की तुलना मिस्त्र और ट्यूनीशिया में अधिनायकवादी सरकारों के विरूद्ध चल रहे आंदोलन से किया जाना भी अनुचित है। इन देशों में प्रजातंत्र लाने के लिए संघर्ष हो रहा है। यह मान्यता कि हर जनांदोलन, प्रजातंत्र या एक बेहतर दुनिया का आगाज करता है, गलत है। जर्मनी में हिटलर ने एक जबरदस्त जनांदोलन खड़ा किया था। इस जनांदोलन ने जर्मनी में प्रजातंत्र का ही खात्मा कर दिया। हर जनांदोलन हमें बेहतरी की ओर नहीं ले जाता। क्या रामजन्मभूमि आंदोलन, अन्ना “क्रांति“ से कमतर था? परंतु इसके नतीजे में हमें क्या मिला? केवल नफरत की सियासत और भयावह हिंसा।
हम जनांदोलनों का स्वागत करते हैं पंरतु केवल उन्हीं जनांदोलनों का जिनका चरित्र प्रजातांत्रिक हो और जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को बढ़ावा देने वाले हों। हमारा स्वाधीनता आंदोलन एक ऐसा ही जनांदोलन था। इसके विपरीत, हजारे का आंदोलन दूसरे के विचारों के प्रति असहिष्णु व घोर अधैर्यवान है। हमें हमारे संसदीय प्रजातंत्र को जीवित रखना है और उसकी शान में कोई कमी नहीं आने देनी है। इस मामले में कोई समझौता नहीं हो सकता। रामलीला मैदान में जो लीला हो रही है उसकी प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था संदेहास्पद है। इसके पीछे विघटनकारी शक्तियां हैं और इसके समर्थकों की फौज में “शाईनिंग इंडिया“ वर्ग का बहुमत है।
सामाजिक आंदोलनों का उद्धेष्य प्रजातांत्रिक व्यवस्था, सरकार और संसद को सही दिशा दिखाना होना चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र की नींव को चोट पहुंचाना अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है। इस आंदोलन के समर्थक भ्रष्टाचार के कैंसर की अत्यंत सतही समझ रखते हैं। भ्रष्टाचार की समस्या को समग्र रूप से देखा जाना ज़रूरी है। हमें यह याद रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार, बीमारी का लक्षण मात्र है। वह बीमारी नहीं है। असली बीमारी है वह व्यवस्था जिसमें असमानता है, पारदर्शिता का अभाव है और अपने कृत्यों की जिम्मेदारी लेने से हिचकिचाने वालों की भरमार है। ये वे मुद्दे हैं जिनपर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक नया, अतिशक्तिशाली संगठन, जो किसी के प्रति जवाबदेह न हो, खड़ा करने से कुछ होने वाला नहीं है। यह इलाज, रोग से भी ज्यादा खतरनाक है।

-राम पुनियानी
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