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गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अन्ना आंदोलन: संदेहास्पद मंतव्य व चरित्र

अपनी टीम द्वारा तैयार जनलोकपाल बिल को जस का तस स्वीकार करने की मांग को लेकर, दिल्ली में अन्ना हजारे के दूसरे अनशन (अगस्त 2011) ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है। इस जनांदोलन की प्रकृति क्या है? समाज के विभिन्न वर्गों के मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत सामाजिक संगठनों को इस आंदोलन से जुड़ना चाहिए अथवा नहीं? इस आंदोलन का कोई छिपा हुआ एजेन्डा तो नहीं है? इसके पीछे कोई राजनैतिक ताकत तो काम नहीं कर रही हैं? इन सभी और कुछ अन्य प्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर खोजना ज़रूरी ही नहीं अनिवार्य भी है।
इसके पहले, अन्ना ने अप्रैल 2011 में इसी मुद्दे को लेकर जंतरमंतर पर अनशन किया था। उस समय, अन्ना के प्रतिस्पर्धी बाबा रामदेव ने अपना अलग आंदोलन प्रारंभ किया था। उनका घोषित लक्ष्य था विदेशों में जमा कालेधन की वापिसी। अन्ना तो राज्य के दबाव के आगे नहीं झुके और पुनः मैदान में आ गए परंतु रामदेव की हवा निकलते देर नहीं लगी। उन्हें महिलाओं के कपड़े पहनकर आंदोलन स्थल से भागना पड़ा।
“टीम अन्ना“ में कई लोग शामिल हैं। इनकी पृष्ठभूमियां अलग-अलग हैं। कुछ न्याय प्रणाली में सुधार के लिए काम कर रहे हैं तो कुछ बंधुआ मजदूरों के लिए। कुछ अन्य साम्प्रदायिकता-विरोधी आंदोलन का हिस्सा हैं। इनमें से अधिकांश, मैदानी स्तर के सामाजिक कार्यकर्ताओं से जुड़े हुए हैं। इस बार जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी खुलकर अन्ना के साथ आ गई हैं। वे भी अन्ना समर्थकों की भीड़ का हिस्सा बन र्गइं हैं। कई ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना के साथ हैं जिनकी मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता पर असंदिग्ध है। दूसरी ओर शबनम हाशमी, महेश भट्ट, आनंद तेलतुमड़े व प्रसिद्ध लेखिका अरूंधती राय ने अन्ना के आंदोलन की कटु आलोचना की है। अरूणा राय और उनके साथियों ने लोकपाल विधेयक का अपना अलग मसौदा भी प्रस्तुत किया है। देश भर के सामाजिक कार्यकर्ता दुविधा में हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे क्या करें। क्या वे अन्ना का साथ दें और उनके जनलोकपाल बिल को कानून बनाने के संघर्ष में कूद पड़ें? या फिर वे इस आंदोलन से दूरी बनाए रखें। इसमें कोई संदेह नहीं कि अन्ना के आंदोलन ने आमजनों के एक बड़े वर्ग को आकर्षित ही नहीं बल्कि सम्मोहित कर लिया है।
लोकपाल जैसी कोई संस्था होनी चाहिए, यह विचार दशकों पुराना है। इस अवधि में कई विभिन्न पार्टियां सत्ता में रहीं परंतु लोकपाल बिल की ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। चाहे वह जनता पार्टी हो, वी. पी. सिंह या भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए - सभी ने लोकपाल बिल के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालकर रखा। अन्ना अचानक राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे और उनके आंदोलन को भाजपा-आरएसएस-विहिप गठजोड़ ने एक बड़े जनांदोलन का स्वरूप दे दिया। अन्ना के मेले को मीडिया ने खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित-प्रसारित किया। अन्ना को मानों महामानव बना दिया गया। उनको मिले कव्हरेज की तुलना केवल क्रिकेट मैचों को मिलने कव्हरेज से की जा सकती है। शायद ही कोई ऐसा चैनल हो जिसने अन्ना के भाषणों का सीधा प्रसारण न किया हो। अतिउत्साहित टी. वी. एंकर अपना गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे चाहते हैं कि हम सब अपने-अपने काम धंधे छोड़कर रामलीला मैदान में डेरा डाल दें। आरएसएस की मशीनरी-जिसका अधिकांश हिस्सा अद्रश्य रहता है - भी सक्रिय हो गई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह मशीनरी गणेश को दूध पिलाने में सक्षम है। अपने हाथों में जलती हुई मोमबत्तियां लिए मध्यमवर्ग के लोग रामलीला मैदान में जुट गए हैं। यह वही वर्ग है जिसे इंडिया काफी समय से शाईनिंग नजर आ रहा था। मंच की पृष्ठभूमि में थे भारत माता और वंदे मातरम् के नारे गुंजायमान हो रहे हैं। संघ और उससे जुड़े बाबा लोग भी पहुंच गए हैं। वे अपनी कथित आध्यात्मिक शक्ति का इस्तेमाल एक विशेष प्रकार की राजनैतिक सोच को बढ़ावा देने के लिए करते हैं-उसी सोच को जिसके चलते बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी।
“शाईनिंग इंडिया“ वर्ग के सदस्यों के अतिरिक्त और लोग भी इस आंदोलन से जुड़े हैं। इनमें से कई तो यह भी नहीं जानते कि वे किस उद्धेष्य के लिए लड़ रहे हैं। टीम अन्ना ने सफलतापूर्वक ऐसा वातावरण बना दिया है मानो जो उसके साथ नहीं है, वह भ्रष्टाचार का समर्थक है। धुआंधार प्रचार की इस धुंध मे यह तथ्य गुम हो गया है कि अन्ना का एकमात्र घोषित लक्ष्य है उनके द्वारा प्रस्तुत लोकपाल बिल के मसौदे को ही कानून का जामा पहनाना।
इस आंदोलन के संदर्भ में कुछ मुद्दों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। क्या कारण है कि अन्ना और रामदेव, दोनों ने भ्रष्टाचार का मुद्दा तब उठाया जब कारपोरेट दुनिया के कुछ शीर्ष अधिकारी जेलों में डाल दिए गए और उद्योग जगत के शहंशाहों के भी सलाखों के पीछे जाने के आसार नजर आने लगे। क्या यह मात्र संयोग है कि यह आंदोलन उस समय उभरा जब मोदी के पुराने पापों पर से पर्दा उठना शुरू ही हुआ था और ऐसा लग रहा था कि अंततः उन्हें अपनी करनी का फल भुगतना पड़ेगा।
अन्ना आंदोलन के समर्थकों के दो तबके हैं। पहला वह जिसे राजनीतिविज्ञानी “शाईनिंग इंडिया“ तबका कहते हैं। एमबीए व ब्लैकबैरी धारी ये लोग भारी-भरकम पैकेज पाते हैं और सामाजिक मुद्दों से इनका सरोकार, नरेगा और दलितों के लिए आरक्षण जैसे सकारात्मक कदमों के विरोध तक सीमित है। यह वही वर्ग है जिसका एक बड़ा हिस्सा जुलाई 2010 के मुंबई धमाकों के बाद पाकिस्तान पर तुरत-फुरत आक्रमण करने की वकालत कर रहा था। दूसरा तबका बहुत छोटा है और मध्यमवर्गीय तबके की तुलना में कहीं कम मुखर है। इस तबके में वे वंचित समूह शामिल हैं जो बढ़ती कीमतों और अपने रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं से हलकान हैं और अपने दुःख-दर्द को सामने लाने के लिए मंच की तलाश में हैं।
अन्ना के आंदोलन का उद्धेष्य चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो यह समझना मुश्किल है कि वे यह क्यों चाहते हैं कि उनके द्वारा तैयार किया गया बिल का मसौदा ही कानून बने और वह भी उनके द्वारा निर्धारित समयसीमा के अंदर। अन्ना का समूह, सिविल सोसायटी का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं है। लोकपाल बिल के कई अन्य मसौदे भी सामने आए हैं जिनमें से कुछ अन्ना के मसौदे से बेहतर भी हो सकते हैं। ये मसौदे, अन्ना के मसौदे के तानाशाहीपूर्ण चरित्र से मुक्त हैं। इनमें सरकारी मसौदे की कमियों को दूर करने का प्रयास भी किया गया है। इनमें से एक मसौदा अरूणा राय और उनके साथियों द्वारा तैयार किया गया है। क्या कारण है कि अन्ना, संसदीय नियम-कानूनों की अवहेलना कर अपने मसौदे को देश पर थोपना चाहते हैं। हम सब जानते हैं कि सूचना का अधिकार और कई अन्य विधेयकों को कानून बनने में सालों लगे। हम यह भी जानते हैं कि लोकपाल बिल जितने ही महत्वपूर्ण कई अन्य बिल जैसे साम्प्रदायिक हिंसा विधेयक तथा भोजन का अधिकार विधेयक आदि काफी समय से लंबित हैं। अन्ना की जल्दबाजी का केवल एक उद्धेशय हो सकता है और वह है संसदीय प्रजातंत्र को कमजोर करना।
कई प्रतिबद्ध व ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता यह मानते हैं कि हमारे देश की वर्तमान व्यवस्था असफल साबित हो चुकी है और इसे बदला जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान व्यवस्था में कई खामियां हैं। यह व्यवस्था बहुत धीमी गति से काम करती है। परंतु सवाल यह है कि इस व्यवस्था का विकल्प क्या है? क्या यह विकल्प “लाओ या जाओ“ है, जैसा कि अन्ना कह रहे हैं। क्या “लाओ या जाओ” नारे की मूल प्रकृति राजनैतिक नहीं है? क्या इसका अंतिम लक्ष्य उस पार्टी को शासन में लाना नहीं है जिससे जुड़े तत्व “मैं अन्ना हूं“ टोपियां और टी शर्टें बांट रहे हैं और घर-घर जाकर मध्यम और अन्य वर्गों का समर्थन जुटा रहे हैं?
इस नारे का एक दूसरा अर्थ भी हो सकता है। वह यह कि “जाओ“ सत्ताधारी दल नहीं बल्कि संसदीय व्यवस्था पर लक्षित है। दूसरे शब्दों में, यह एक क्रांति का आव्हान है जिसके जरिए एक बिल्कुल नई व्यवस्था अस्तित्व में आएगी। कई सामाजिक कार्यकर्ता इस दूसरी व्याख्या को सही मान रहे हैं। यह, दरअसल, वर्तमान हालात के प्रति कुंठा और गुस्से व प्रजातांत्रिक व्यवस्था के शनैः-शनैः परिपक्व होने की प्रक्रिया से अनभिज्ञता का प्रतीक है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था का स्थान कोई अन्य व्यवस्था ले सकती है परंतु वह व्यवस्था तानाशाही ही होगी।
इसी तरह, अन्ना आंदोलन की तुलना मिस्त्र और ट्यूनीशिया में अधिनायकवादी सरकारों के विरूद्ध चल रहे आंदोलन से किया जाना भी अनुचित है। इन देशों में प्रजातंत्र लाने के लिए संघर्ष हो रहा है। यह मान्यता कि हर जनांदोलन, प्रजातंत्र या एक बेहतर दुनिया का आगाज करता है, गलत है। जर्मनी में हिटलर ने एक जबरदस्त जनांदोलन खड़ा किया था। इस जनांदोलन ने जर्मनी में प्रजातंत्र का ही खात्मा कर दिया। हर जनांदोलन हमें बेहतरी की ओर नहीं ले जाता। क्या रामजन्मभूमि आंदोलन, अन्ना “क्रांति“ से कमतर था? परंतु इसके नतीजे में हमें क्या मिला? केवल नफरत की सियासत और भयावह हिंसा।
हम जनांदोलनों का स्वागत करते हैं पंरतु केवल उन्हीं जनांदोलनों का जिनका चरित्र प्रजातांत्रिक हो और जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को बढ़ावा देने वाले हों। हमारा स्वाधीनता आंदोलन एक ऐसा ही जनांदोलन था। इसके विपरीत, हजारे का आंदोलन दूसरे के विचारों के प्रति असहिष्णु व घोर अधैर्यवान है। हमें हमारे संसदीय प्रजातंत्र को जीवित रखना है और उसकी शान में कोई कमी नहीं आने देनी है। इस मामले में कोई समझौता नहीं हो सकता। रामलीला मैदान में जो लीला हो रही है उसकी प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था संदेहास्पद है। इसके पीछे विघटनकारी शक्तियां हैं और इसके समर्थकों की फौज में “शाईनिंग इंडिया“ वर्ग का बहुमत है।
सामाजिक आंदोलनों का उद्धेष्य प्रजातांत्रिक व्यवस्था, सरकार और संसद को सही दिशा दिखाना होना चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र की नींव को चोट पहुंचाना अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है। इस आंदोलन के समर्थक भ्रष्टाचार के कैंसर की अत्यंत सतही समझ रखते हैं। भ्रष्टाचार की समस्या को समग्र रूप से देखा जाना ज़रूरी है। हमें यह याद रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार, बीमारी का लक्षण मात्र है। वह बीमारी नहीं है। असली बीमारी है वह व्यवस्था जिसमें असमानता है, पारदर्शिता का अभाव है और अपने कृत्यों की जिम्मेदारी लेने से हिचकिचाने वालों की भरमार है। ये वे मुद्दे हैं जिनपर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक नया, अतिशक्तिशाली संगठन, जो किसी के प्रति जवाबदेह न हो, खड़ा करने से कुछ होने वाला नहीं है। यह इलाज, रोग से भी ज्यादा खतरनाक है।

-राम पुनियानी

सोमवार, 22 अगस्त 2011

अन्ना गाँधी नहीं हैं : हसन कमाल

देश के मशहूर सहाफी हसन कमाल ने अपने एक लेख में प्रिंट इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जरिये अन्ना हजारे की तहरीक के हक़ में ली जा रही गैर मामूली दिलचस्पी को उनका सरमायेदारी प्रेम बतलाया हैउनके अनुसार मीडिया यह काम अपने सरमायेदार आकाओं के इशारे पर कर रहा है जिनके आर्थिक हित देश में निवेश करते हैं
हसन कमाल की यह बात ठीक लगती हैजिस प्रकार कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू.पी. सरकार ने भ्रष्टचार के मामले में कड़ी कार्यवाई की और पूंजीपतियों की कंपनियों को जो करार अघात 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले कामन वेल्थ के ठेकों को लेकर पहुंचा, जिसमें देसी सरमायेदारों से लेकर विदेशी सरमायेदार भी शामिल रहे, उससे बौखला कर ही यह जवाबी हमला कांग्रेस यू.पी. सरकार पर आना हजारे को सामने रख कर सरमायेदारों की और से किया गया है
हसन कमाल ने अन्ना को रातोरात गाँधी बन जाने को भी हास्यापद बताते हुए लिखा है कि खुद अन्ना हजारे ने कभी खुद को गाँधी होने का दवा नहीं कियागाँधी जी ने कभी भी देश को क्षेत्रियता अथवा भाषा की संकीर्ण विचारधारा के हक़ में ले जाने की वकालत नहीं की बल्कि वह हमेशा एक देश एक समाज भारतीयता की बात करते रहे, परन्तु इसके विपरीत अन्ना हजारे ने राज ठाकरे के उस मत के हक़ में अपना समर्थन दिया था जो उन्होंने महाराष्ट्र से गैर महाराष्ट्रीय लोगों को बहार निकलने के बारे में रखा था
अन्ना हजारे के पीछे कौन ताकते काम कर रही हैं यह बात जब तक साफ़ होगी शायद बहुत देर हो चुकी होगी और देश की आर्थिक उन्नति तब तक काफी क्षतिग्रस्त हो चुकी होगीअन्ना की मुहिम की राष्ट्रीयता पर इससे बड़ा प्रश्न चिन्ह और क्या होगा कि उन्होंने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर रात्रि 8 से 9 के बीच बत्ती बुझाने का निर्देश देशवासियों को दिया जिस दिन प्रत्येक देशवासी अपने घरों पर प्रफुल्लित होकर चिराग करता रहा हैक्या यह स्वतंत्रता दिवस के अपमान देश द्रोहिता के दायरे में नहीं आता है

-मोहम्मद तारिक खान

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

अन्ना लोकतंत्र के नाम पर नाटो सेनायें यहाँ नहीं आ सकती हैं

अन्ना आप भी गांधीवादी हो और डॉ मनमोहन सिंह गांधीवाद की ही विरासत पर सत्तानसीन हैं फिर झगडा किस बात का दोनों गांधीवादी एक साथ मिल जुल कर मामले को हल कर लेते लेकिन आपके आन्दोलन के पीछे जिन ताकतों का हाथ हैउन ताकतों की तरफ या तो आप देख नहीं रहे हैं या देख कर भी अनदेखी कर रहे हैं भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक मुल्क है आपके अनशन के पीछे फोर्ड फाउण्डेशन, ब्लैक ऑथोर फाउण्डेशन सहित दुनिया के तमाम साम्राज्यवादी मुल्कों से मदद लेने वाले गैर सरकारी संगठन (एन.जी.) हैं और मीडिया अपनी खबरें बेचने का काम कर रहा है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं हैभ्रष्टाचार तो सिर्फ बहाना है एन.जी. का मतलब ही भ्रष्टाचार है और आपके पीछे अधिकांश एन.जी. वाले ही हैंदेश की बहुसंख्यक जनता का लोकपाल या जन लोकपाल से कोई लेना देना नहीं है
आज अमेरिका दिवालियेपन की और बढ़ रहा है, फ्रांस ऋण ग्रस्त हो रहा है भारत पूंजीवादी विकास के पथ पर एक शक्तिशाली आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा हैसाम्राज्यवादी शक्तियां उस पूंजीवादी आर्थिक विकास को रोकने के लिये हर तरह के हथकंडे अपना रही हैं जिसका एक औजार आप भी बन गए हैंसाम्राज्यवादियों के आका अमेरिका को अब लोकतंत्र याद आने लगा हैभारतीय दौरे पर आए अमेरिकी सीनेटर जॉन मैक्‍केन ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि भारत में इस समय हर ओर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। देश के लोकतंत्र के लिए यह चिंता की बात है। उन्‍होंने कहा है कि देश में लोकतंत्र के लिए यह सही संकेत नहीं है। वे इस समय दिल्‍ली में हैं। उन्‍होंने कहा कि उनके होटल के सामने हजारों लोग भ्रष्‍टाचार के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं।
अन्‍ना हजारे की गिरफ्तारी पर अमेरिका की तरफ से यह बयान आया था कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और वहां किसी को अनशन करने की इजाजत मिलने में रुकावट नहीं आनी चाहिए।
क्या अब अमेरिका बताएगा कि किसको अनशन करने की इजाजत होगी किसको नहींईराक से लेकर अफगानिस्तान तक लोकतंत्र का ठेका अमेरिका ने ले रखा है और इन मुल्कों की दशा और दुर्दशा किसी से छिपी नहीं हैलीबिया में नाटो सेनायें लोकतंत्र के लिये बम्बार्ड कर रही हैंअधिकांश एशियाई अफ्रीकी मुल्क अमेरिकन साम्राज्यवादियों के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से गुलाम हैंआप अनशन अवश्य करिए सिर्फ 21 दिन का नहीं 121 दिन का कर दीजिये तो भी इस देश की मेहनतकश जनता का आपको समर्थन नहीं मिलने वाला है और समर्थन हैसिर्फ हिन्दुवत्व वादी शक्तियों का आपको समर्थन प्राप्त है जो बेनकाब हो चुकी हैं और आप का लोकपाल बिल भारतीय संविधान की मूल भावना के विपरीत है आपकी ज़िद है, ज़िद का राजनीति में कोई स्थान नहीं है अगर अमेरिकन इशारे पर यह तय होने लगेगा की लोकतंत्र है या नहीं तो देश नहीं चलेगाभारत अमेरिकन साम्राज्यवाद से टक्कर लेने में असमर्थ नहीं है इस देश की जनताअमेरिका को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि यदि उसने अपने एजेंटों के माध्यम से देश में गड़बड़ी करने की कोशिश की तो दुनिया के नक़्शे पर अमेरिकन साम्राज्यवाद का नामोनिशान मिट जायेगा

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 17 अगस्त 2011

टोपियाँ बदलने का खेल है अन्ना

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आधीन भारत में जो लोग अंग्रेजों के साथ थे आजादी मिलने के पूर्व ही उन्होंने अपनी टोपी बदल दी थी और चालाक लोग गाँधी की टोपी में गए थेसर शोभा सिंह जैसे लोग भगत सिंह को फांसी कराने का इनाम भी लिया और आजाद भारत में कुछ टुकड़े फेंक कर सबसे बड़े परोपकारी के रूप में आये
भ्रष्टाचार आजादी के बाद एक भयानक महामारी के रूप में उभरा किन्तु लोकतान्त्रिक व्यवस्था में राजा से लेकर कनिमोझी तक जेल में हैंभ्रष्टाचार पूंजीवादी व्यवस्था का गुण है और इसी व्यवस्था में अमेरिका, इंग्लैंड समर्थित गाँधी टोपी के सहारे अन्ना पूँजीवाद को बचाने का सबसे बड़ा आन्दोलन चला रहे हैंगाँधी टोपी लगा लेने से कोई गाँधीवादी नहीं हो जाता और सर्वसाधन समपन्न लोकपाल के जाने से भ्रष्टाचार दूर नहीं होता हैगाँधी की हत्या करने वाले और उसके बाद गाँधी वध को जायज ठहराने वाले विचारधारा का साथ अन्ना का आन्दोलन चल रहा है इसका सीधा अर्थ है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जो जन आक्रोश है उसको गलत दिशा देना है कैंडल मार्च से लेकर तरह-तरह के मार्च हो रहे हैंइस आन्दोलन में ज्यादातर हिन्दुवत्व वाली विचारधारा के लोग हैं जिनको इस देश ने कभी स्वीकार नहीं किया है और भ्रष्टाचार के नाम पर बहुत बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी भी गाँधी टोपी लगा कर आन्दोलन के मैदान में हैं

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 16 जुलाई 2011

नव धनाढ्य उच्च स्तरीय धर्मगुरूओ ,सत्तासीन नेताओं और व्यवस्था के मदारियों से जनसाधारण को उम्मीद नही रखनी चाहिए

7 जून के हिन्दी 'दैनिक हिन्दुस्तान ' के पहले पन्ने पर एक छोटी सी खबर छपी है | छतीसगढ़ के दुर्ग जिले के कलेक्ट्रेट परिसर में योग गुरु रामदेव की गिरफ्तारी के विरोध में उनके समर्थको ने सत्याग्रही अनशन किया था | उसमे दुर्ग जिले का एक किसान - सुखराम भी शामिल था |सत्याग्रह के दौरान ही सुखराम की तबीयत अचानक खराब हो गयी |अस्पताल ले जाने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया |उसके बैग में कीटनाशक की शीशी तथा एक पत्र मिला | उस पत्र में सुखराम ने रामदेव जी की गिरफ्तारी पर दुःख जताया है ,जिसके साथ ही सुखराम ने राज्य में पूंजीपतियों के लिए किये जा रहे कृषि भूमि के अधिग्रहण तथा भूमिहीन हुए और हो रहे लोगो पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है | पत्र में सुखराम ने खुद के भूमिहीन होने के बाद दर - दर की ठोकरे खाने की गहरी पीड़ा के चलते आत्महत्या के रास्ते को अपनाने की विवशता बताई है |
सुखराम , रामदेव जी का भक्त भी था और किसान भी | रामदेव जी की गिरफ्तारी के दुःख के साथ उसे अपनी भूमिहीनता की स्थिति का दुःख भी था | लेकिन अपनी आत्महत्या का कारण उसने अपनी भूमिहीनता और दर - दर की ठोकर को ही बताया है | उसने अपने पत्र में काले धन पर नही बल्कि कृषि भूमि को पूंजीपतियों को दिए जाने पर चिंता प्रकट की है | यह मनोभावना केवल सुखराम की ही नही है , बल्कि एक आम किसान की है |उसमे रामदेव जी के प्रति आस्था है |भ्रष्टाचार व काले धन का बिरोध भी है | लेकिन उसकी गम्भीर चिता बुनियादी समस्यायों को लेकर है |बढती भूमिहीनता व साधनहीनता को लेकर है | लेकिन समस्या यह है कि जनसाधारण किसानो , मजदूरों तथा छोटे कारोबारियों आदि की बढती बुनियादी समस्याओं पर कंही कोई चिंता या आन्दोलन अनशन नही है | सुखराम ने अपनी आत्महत्या से पहले योग गुरु रामदेव को लिखे पत्र में कृषि भूमि के अधिग्रहण और भूमिहीनता की समस्या को प्रमुखता देकर यह सन्देश जरुर दे दिया है कि ये मुद्दे ज्यादा बुनियादी है , ज्यादा महत्त्वपूर्ण है | लेकिन सुखराम शायद यह बात नही जानते थे की यह बुनियादी मुद्दा देश - समाज के बेहतर स्थिति में रहने वाले 20-25% लोगो कि समस्या ही नही है | इसमें धर्मगुरूओ , महात्माओं व धार्मिक लीडरो के उच्च स्तरीय लोग भी शामिल है |इसलिए धन , सत्ता व समाज की ऊचाइयो पर विराजमान तबको से तथा धनाढ्य एवं उच्च स्तरीय धर्मगुरूओ व लीडरो से भी सुखराम जैसे जनसाधारण को कोई उम्मीद ही नही रखनी चाहिए |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

शनिवार, 4 जून 2011

लोकतंत्र का शमशानघाट है लखनऊ

धरना स्थल पर लाठीचार्ज
लाठीचार्ज से बेहोश कर्मचारी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में झुलेलाल पार्क में प्रदेश के सभी धरना अनशन प्रदर्शन कार्यों को इकठ्ठा होकर अपनी बात कहने के लिये स्थल नियत किया गया है 23 मई से नवीन ओखला ओद्योगिक विकास प्राधिकरण के कर्मचारी अपनी नौकरी के नियमतिकरण लिये धरना दिए हुए थे शुक्रवार की सुबह धरनाकारी धर्मपाल की मृत्यु हो गयी एस.पी ट्रांस गोमती नितिन तिवारी के कुशल नेतृत्व में सी. महानगर, सी. गुड़म्बा सहित कई थानों के थाना प्रभारी अपने-अपने नेम प्लेट उतारकर धरना स्थल पर बैठे हुए कर्मचारियों पर पुलिस, पी.एस.सी के बल पर लाठी चार्ज कर दिया जिसमें आधा दर्जन कर्मचारियों की हालत गंबीर स्तिथि में पहुँच गयी डेढ़ सौ महिलाओं को इन अधिकारियो के नेतृत्व में पुलिस पी.एस.सी ने जमकर पीटा सारे कानून नियम धरे के धरे रह गए
लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने हमेशा समाज के हर तबके के ऊपर लाठी चार्ज किया है और किसी भी मामले में जिम्मेदार किसी भी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की गयी है। धरना स्थल पर धरनाकारी धर्मपाल की मौत के बाद पुलिस प्रशासन ने जिस तरह से धरनाकारी के ऊपर बुरी तरह से लाठीचार्ज किया है। उससे लगता है की उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ लोकतंत्र का शमशानघाट है और विपक्षी दलों की स्तिथि मुर्दों से भी बदतर है। जो न हिल सकते हैं न डुल सकते हैं अन्यथा सरकार की यह हिम्मत ही नहीं हो सकती थी कि वो हर सत्याग्रही के ऊपर लाठीचार्ज कर सके।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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