गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अन्ना आंदोलन: संदेहास्पद मंतव्य व चरित्र

अपनी टीम द्वारा तैयार जनलोकपाल बिल को जस का तस स्वीकार करने की मांग को लेकर, दिल्ली में अन्ना हजारे के दूसरे अनशन (अगस्त 2011) ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है। इस जनांदोलन की प्रकृति क्या है? समाज के विभिन्न वर्गों के मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत सामाजिक संगठनों को इस आंदोलन से जुड़ना चाहिए अथवा नहीं? इस आंदोलन का कोई छिपा हुआ एजेन्डा तो नहीं है? इसके पीछे कोई राजनैतिक ताकत तो काम नहीं कर रही हैं? इन सभी और कुछ अन्य प्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर खोजना ज़रूरी ही नहीं अनिवार्य भी है।
इसके पहले, अन्ना ने अप्रैल 2011 में इसी मुद्दे को लेकर जंतरमंतर पर अनशन किया था। उस समय, अन्ना के प्रतिस्पर्धी बाबा रामदेव ने अपना अलग आंदोलन प्रारंभ किया था। उनका घोषित लक्ष्य था विदेशों में जमा कालेधन की वापिसी। अन्ना तो राज्य के दबाव के आगे नहीं झुके और पुनः मैदान में आ गए परंतु रामदेव की हवा निकलते देर नहीं लगी। उन्हें महिलाओं के कपड़े पहनकर आंदोलन स्थल से भागना पड़ा।
“टीम अन्ना“ में कई लोग शामिल हैं। इनकी पृष्ठभूमियां अलग-अलग हैं। कुछ न्याय प्रणाली में सुधार के लिए काम कर रहे हैं तो कुछ बंधुआ मजदूरों के लिए। कुछ अन्य साम्प्रदायिकता-विरोधी आंदोलन का हिस्सा हैं। इनमें से अधिकांश, मैदानी स्तर के सामाजिक कार्यकर्ताओं से जुड़े हुए हैं। इस बार जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी खुलकर अन्ना के साथ आ गई हैं। वे भी अन्ना समर्थकों की भीड़ का हिस्सा बन र्गइं हैं। कई ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना के साथ हैं जिनकी मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता पर असंदिग्ध है। दूसरी ओर शबनम हाशमी, महेश भट्ट, आनंद तेलतुमड़े व प्रसिद्ध लेखिका अरूंधती राय ने अन्ना के आंदोलन की कटु आलोचना की है। अरूणा राय और उनके साथियों ने लोकपाल विधेयक का अपना अलग मसौदा भी प्रस्तुत किया है। देश भर के सामाजिक कार्यकर्ता दुविधा में हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे क्या करें। क्या वे अन्ना का साथ दें और उनके जनलोकपाल बिल को कानून बनाने के संघर्ष में कूद पड़ें? या फिर वे इस आंदोलन से दूरी बनाए रखें। इसमें कोई संदेह नहीं कि अन्ना के आंदोलन ने आमजनों के एक बड़े वर्ग को आकर्षित ही नहीं बल्कि सम्मोहित कर लिया है।
लोकपाल जैसी कोई संस्था होनी चाहिए, यह विचार दशकों पुराना है। इस अवधि में कई विभिन्न पार्टियां सत्ता में रहीं परंतु लोकपाल बिल की ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। चाहे वह जनता पार्टी हो, वी. पी. सिंह या भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए - सभी ने लोकपाल बिल के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालकर रखा। अन्ना अचानक राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे और उनके आंदोलन को भाजपा-आरएसएस-विहिप गठजोड़ ने एक बड़े जनांदोलन का स्वरूप दे दिया। अन्ना के मेले को मीडिया ने खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित-प्रसारित किया। अन्ना को मानों महामानव बना दिया गया। उनको मिले कव्हरेज की तुलना केवल क्रिकेट मैचों को मिलने कव्हरेज से की जा सकती है। शायद ही कोई ऐसा चैनल हो जिसने अन्ना के भाषणों का सीधा प्रसारण न किया हो। अतिउत्साहित टी. वी. एंकर अपना गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे चाहते हैं कि हम सब अपने-अपने काम धंधे छोड़कर रामलीला मैदान में डेरा डाल दें। आरएसएस की मशीनरी-जिसका अधिकांश हिस्सा अद्रश्य रहता है - भी सक्रिय हो गई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह मशीनरी गणेश को दूध पिलाने में सक्षम है। अपने हाथों में जलती हुई मोमबत्तियां लिए मध्यमवर्ग के लोग रामलीला मैदान में जुट गए हैं। यह वही वर्ग है जिसे इंडिया काफी समय से शाईनिंग नजर आ रहा था। मंच की पृष्ठभूमि में थे भारत माता और वंदे मातरम् के नारे गुंजायमान हो रहे हैं। संघ और उससे जुड़े बाबा लोग भी पहुंच गए हैं। वे अपनी कथित आध्यात्मिक शक्ति का इस्तेमाल एक विशेष प्रकार की राजनैतिक सोच को बढ़ावा देने के लिए करते हैं-उसी सोच को जिसके चलते बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी।
“शाईनिंग इंडिया“ वर्ग के सदस्यों के अतिरिक्त और लोग भी इस आंदोलन से जुड़े हैं। इनमें से कई तो यह भी नहीं जानते कि वे किस उद्धेष्य के लिए लड़ रहे हैं। टीम अन्ना ने सफलतापूर्वक ऐसा वातावरण बना दिया है मानो जो उसके साथ नहीं है, वह भ्रष्टाचार का समर्थक है। धुआंधार प्रचार की इस धुंध मे यह तथ्य गुम हो गया है कि अन्ना का एकमात्र घोषित लक्ष्य है उनके द्वारा प्रस्तुत लोकपाल बिल के मसौदे को ही कानून का जामा पहनाना।
इस आंदोलन के संदर्भ में कुछ मुद्दों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। क्या कारण है कि अन्ना और रामदेव, दोनों ने भ्रष्टाचार का मुद्दा तब उठाया जब कारपोरेट दुनिया के कुछ शीर्ष अधिकारी जेलों में डाल दिए गए और उद्योग जगत के शहंशाहों के भी सलाखों के पीछे जाने के आसार नजर आने लगे। क्या यह मात्र संयोग है कि यह आंदोलन उस समय उभरा जब मोदी के पुराने पापों पर से पर्दा उठना शुरू ही हुआ था और ऐसा लग रहा था कि अंततः उन्हें अपनी करनी का फल भुगतना पड़ेगा।
अन्ना आंदोलन के समर्थकों के दो तबके हैं। पहला वह जिसे राजनीतिविज्ञानी “शाईनिंग इंडिया“ तबका कहते हैं। एमबीए व ब्लैकबैरी धारी ये लोग भारी-भरकम पैकेज पाते हैं और सामाजिक मुद्दों से इनका सरोकार, नरेगा और दलितों के लिए आरक्षण जैसे सकारात्मक कदमों के विरोध तक सीमित है। यह वही वर्ग है जिसका एक बड़ा हिस्सा जुलाई 2010 के मुंबई धमाकों के बाद पाकिस्तान पर तुरत-फुरत आक्रमण करने की वकालत कर रहा था। दूसरा तबका बहुत छोटा है और मध्यमवर्गीय तबके की तुलना में कहीं कम मुखर है। इस तबके में वे वंचित समूह शामिल हैं जो बढ़ती कीमतों और अपने रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं से हलकान हैं और अपने दुःख-दर्द को सामने लाने के लिए मंच की तलाश में हैं।
अन्ना के आंदोलन का उद्धेष्य चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो यह समझना मुश्किल है कि वे यह क्यों चाहते हैं कि उनके द्वारा तैयार किया गया बिल का मसौदा ही कानून बने और वह भी उनके द्वारा निर्धारित समयसीमा के अंदर। अन्ना का समूह, सिविल सोसायटी का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं है। लोकपाल बिल के कई अन्य मसौदे भी सामने आए हैं जिनमें से कुछ अन्ना के मसौदे से बेहतर भी हो सकते हैं। ये मसौदे, अन्ना के मसौदे के तानाशाहीपूर्ण चरित्र से मुक्त हैं। इनमें सरकारी मसौदे की कमियों को दूर करने का प्रयास भी किया गया है। इनमें से एक मसौदा अरूणा राय और उनके साथियों द्वारा तैयार किया गया है। क्या कारण है कि अन्ना, संसदीय नियम-कानूनों की अवहेलना कर अपने मसौदे को देश पर थोपना चाहते हैं। हम सब जानते हैं कि सूचना का अधिकार और कई अन्य विधेयकों को कानून बनने में सालों लगे। हम यह भी जानते हैं कि लोकपाल बिल जितने ही महत्वपूर्ण कई अन्य बिल जैसे साम्प्रदायिक हिंसा विधेयक तथा भोजन का अधिकार विधेयक आदि काफी समय से लंबित हैं। अन्ना की जल्दबाजी का केवल एक उद्धेशय हो सकता है और वह है संसदीय प्रजातंत्र को कमजोर करना।
कई प्रतिबद्ध व ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता यह मानते हैं कि हमारे देश की वर्तमान व्यवस्था असफल साबित हो चुकी है और इसे बदला जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान व्यवस्था में कई खामियां हैं। यह व्यवस्था बहुत धीमी गति से काम करती है। परंतु सवाल यह है कि इस व्यवस्था का विकल्प क्या है? क्या यह विकल्प “लाओ या जाओ“ है, जैसा कि अन्ना कह रहे हैं। क्या “लाओ या जाओ” नारे की मूल प्रकृति राजनैतिक नहीं है? क्या इसका अंतिम लक्ष्य उस पार्टी को शासन में लाना नहीं है जिससे जुड़े तत्व “मैं अन्ना हूं“ टोपियां और टी शर्टें बांट रहे हैं और घर-घर जाकर मध्यम और अन्य वर्गों का समर्थन जुटा रहे हैं?
इस नारे का एक दूसरा अर्थ भी हो सकता है। वह यह कि “जाओ“ सत्ताधारी दल नहीं बल्कि संसदीय व्यवस्था पर लक्षित है। दूसरे शब्दों में, यह एक क्रांति का आव्हान है जिसके जरिए एक बिल्कुल नई व्यवस्था अस्तित्व में आएगी। कई सामाजिक कार्यकर्ता इस दूसरी व्याख्या को सही मान रहे हैं। यह, दरअसल, वर्तमान हालात के प्रति कुंठा और गुस्से व प्रजातांत्रिक व्यवस्था के शनैः-शनैः परिपक्व होने की प्रक्रिया से अनभिज्ञता का प्रतीक है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था का स्थान कोई अन्य व्यवस्था ले सकती है परंतु वह व्यवस्था तानाशाही ही होगी।
इसी तरह, अन्ना आंदोलन की तुलना मिस्त्र और ट्यूनीशिया में अधिनायकवादी सरकारों के विरूद्ध चल रहे आंदोलन से किया जाना भी अनुचित है। इन देशों में प्रजातंत्र लाने के लिए संघर्ष हो रहा है। यह मान्यता कि हर जनांदोलन, प्रजातंत्र या एक बेहतर दुनिया का आगाज करता है, गलत है। जर्मनी में हिटलर ने एक जबरदस्त जनांदोलन खड़ा किया था। इस जनांदोलन ने जर्मनी में प्रजातंत्र का ही खात्मा कर दिया। हर जनांदोलन हमें बेहतरी की ओर नहीं ले जाता। क्या रामजन्मभूमि आंदोलन, अन्ना “क्रांति“ से कमतर था? परंतु इसके नतीजे में हमें क्या मिला? केवल नफरत की सियासत और भयावह हिंसा।
हम जनांदोलनों का स्वागत करते हैं पंरतु केवल उन्हीं जनांदोलनों का जिनका चरित्र प्रजातांत्रिक हो और जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को बढ़ावा देने वाले हों। हमारा स्वाधीनता आंदोलन एक ऐसा ही जनांदोलन था। इसके विपरीत, हजारे का आंदोलन दूसरे के विचारों के प्रति असहिष्णु व घोर अधैर्यवान है। हमें हमारे संसदीय प्रजातंत्र को जीवित रखना है और उसकी शान में कोई कमी नहीं आने देनी है। इस मामले में कोई समझौता नहीं हो सकता। रामलीला मैदान में जो लीला हो रही है उसकी प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था संदेहास्पद है। इसके पीछे विघटनकारी शक्तियां हैं और इसके समर्थकों की फौज में “शाईनिंग इंडिया“ वर्ग का बहुमत है।
सामाजिक आंदोलनों का उद्धेष्य प्रजातांत्रिक व्यवस्था, सरकार और संसद को सही दिशा दिखाना होना चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र की नींव को चोट पहुंचाना अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है। इस आंदोलन के समर्थक भ्रष्टाचार के कैंसर की अत्यंत सतही समझ रखते हैं। भ्रष्टाचार की समस्या को समग्र रूप से देखा जाना ज़रूरी है। हमें यह याद रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार, बीमारी का लक्षण मात्र है। वह बीमारी नहीं है। असली बीमारी है वह व्यवस्था जिसमें असमानता है, पारदर्शिता का अभाव है और अपने कृत्यों की जिम्मेदारी लेने से हिचकिचाने वालों की भरमार है। ये वे मुद्दे हैं जिनपर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक नया, अतिशक्तिशाली संगठन, जो किसी के प्रति जवाबदेह न हो, खड़ा करने से कुछ होने वाला नहीं है। यह इलाज, रोग से भी ज्यादा खतरनाक है।

-राम पुनियानी

3 टिप्‍पणियां:

Vijai Mathur ने कहा…

एकदम सही दृष्टिकोण दिया है ,लेकिन गांठ के पूरे और अक्ल के अधूरे तथा आँख के अंधे लोग तो कोई अक्ल की बात सुनना -समझना ही नहीं चाहते।

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

वाह ! अक्ल तो सिर्फ वामपंथियों के पास ही है बाकि तो सब अक्ल से पैदल है !!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था संदेहास्पद है।
ये प्रजातांत्रिक मूल्य क्या हैं? और उन में आस्था का क्या अर्थ है। पुनियानी जी जरा समझाएंगे?