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रविवार, 25 सितंबर 2016

सरकारें किसानो के वोट से बनती हैं

 सरकारें किसानो के वोट से बनती हैं लेकिन सरकार में आने के बाद राजनीतिक दल उद्योगपतियों के हाथ के मोहरे हो जाते हैं. केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद लगभग दो लाख से अधिक किसानो ने आत्महत्याएं कर ली हैं. 
यह विचार किसान सभा के प्रांतीय महासचिव राजेंद्र यादव पूर्व विधायक ने गाँधी मूर्ती हजरतगंज लखनऊ के समक्ष किसानो के दुसरे दिन के धरना सभा को संबोधित करते हुए कहा कि किसानो को आत्महत्या से बचाने के लिए दस हज़ार रुपये प्रतिमाह की पेंशन केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर अविलम्ब घोषित करें. जब समय आता है तो कभी केंद्र सरकार लाखों-लाख करोड़ रुपये के कर व कर्जे उद्योगपतियों के माफ़ कर देती है और समय आने पर राज्य सरकारें भी यह कार्य करती हैं. किसानो व खेत मजदूरों की बात आते ही इनके खजाने में दमड़ी भी नहीं बचती है.
किसान सभा के संरक्षक व पूर्व विधायक जयराम सिंह ने कहा कि मोदी सरकार की प्रमुखता से ध्यान  कॉरपोरेट और मैन्यूफैक्चरिंग पर है, उसकी प्राथमिकता में कृषि क्षेत्र  नहीं आता है. यही कारण है कि मोदी सरकार के पहले साल में किसानों का संकट घटने की बजाय बढ़ा है.
किसान सभा के अध्यक्ष इम्तियाज बेग ने कहा कि पिछले बजट में सरकार ने 1,000 करोड़ रुपए की प्रधानमंत्री सिंचाई योजना का ऐलान किया था, लेकिन जिस देश में करीब 60 फीसदी कृषि योग्य भूमि ग़ैर-सिंचित है वहां हर खेत को पानी पहुँचाने के लिए यह राशि बेहद कम है.
 किसान सभा मथुरा की नेता सुश्री राधा चौधरी ने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के दो ही उपाय हैं. पहला, उसकी पैदावार और उपज का दाम बढ़ाना और दूसरा, उत्पादन लागत को कम करना. इन दोनों मोर्चों पर मोदी सरकार ने अभी तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है. जबकि कृषि क्षेत्र का संकट बढ़ा है. किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं. 
किसानो की सभा को अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने संबोधित करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि किसान संघर्ष को नयी दिशा देते हुए वैचारिक आधार भी देने की आवश्यकता है. जिससे सशक्त किसान आन्दोलन पैदा हो सके. 
बाराबंकी किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि गेंहू के दाम प्रति कुंतल 7600 रुपये तथा धान के दाम 5100 रुपये प्रति कुंतल दिलाया जाए.
किसान सभा द्वारा 24 सितम्बर से 28 सितम्बर 2016 तक विधानसभा के बगल में स्थित गाँधी मूर्ति के समक्ष धरना प्रदर्शन चल रहा है. किसान सभा की मांग है कि राष्ट्रीय किसान आयोग की संस्तुतियों को केंद्र और राज्य सरकारें तत्काल लागू करें, साठ वर्ष के सभी स्त्री-पुरुष किसानो, खेत मजदूरों, ग्रामीण दस्तकारों को 10 हजार मासिक पेंशन केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर देना सुनिश्चित करें. , किसानो के सभी सहकारी और सरकारी कर्जे माफ़ किये जाए और कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य दिया जाए., भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को तत्काल वापस लिया जाए., केरल राज्य की भांति किसान कर्ज एवं आपदा रहत ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाए., नहरों में टेल तक पानी पहुँचाया जाए खेती किसानी के लिए बढ़ी बिजली दरें तुरंत वापस लिया जाए, नंदगंज, रसड़ा, छाता, देवरिया और औराई चीनी मिलों को तुरंत चालू किया जाए,  शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था को सरकार अपने हाथ में ले, गन्ने का मूल्य 850 रु प्रति कुंतल कर दिया जाए तथा बकाया भुगतान किसानो को शीघ्र किया जाय, आपदा राहत प्रदेश के सभी किसानो तथा राज्य और केंद्र सरकार की घोषणा के अनुसार पहुँचाया जाए., प्रदेश सरकार द्वारा पूर्वांचल समाजवादी एक्सप्रेस वे छ: लेन की बनायीं जा रही है इसमें किसानो की उपजाऊ जमीन जा रही है, इसको मऊ-मुहम्मदबाद रोड में जोड़कर बनाया जाए जिससे सरकारी योजना भी पूरी हो जाएगी और किसानो की जमीन भी बच जाएगी, कृषि को बढ़ावा देने हेतु प्रत्येक न्याय पंचायत में एम्.एस.सी. कृषि पास नौजवानों को किसान सहायक के रूप में रखा जाए. खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत 80 प्रतिशत लोगों को इस योजना का लाभ मिलना है जिसमें पात्र गृहस्थों की सूची बनने में बड़े पैमाने पर अनियमितता हुई है इसे सही किया जाए तथा राशन वितरण में धांधली हुई जिनकी जांच करायी जाए, समेजित बाल दिवस परियोजना के तहत आंगनबाड़ी केन्द्रों को सक्रिय किया जाए तथा मिलने वाली सुविधाओं में अधिकारियों के स्तर से कमीशनखोरी बंद किया जाए तथा बाल पुष्टाहार बच्चों को दिया जाए इसकी व्यवस्था की जाय, कानून व्यवस्था सत्ता पक्ष के नेताओं, मंत्रियों के हस्तक्षेप के कारण अधिक ख़राब है इसे दुरुस्त किया जाए, फसल बीमा की धनराशि किसानो को तत्काल दिया जाए, प्रदेश के समस्त साधन सहकारी समितियों पर रासायनिक खादों के साथ कीटनाशक दवा प्रमाणिक कंपनियों से व कृषि उपकरण उपलब्ध कराये जाए तथा जो साधन सहकारी समितियां डिफाल्टर हैं उन्हें चालू किया जाए. 

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

चाहे जो कुर्बानी देनी पड़े।




 
बाराबंकी। जल, जंगल, जमीन बचाने की लड़ाई किसान सभा के नेतृत्व में लड़ी जा रही है जिसके तहत जनपद के विभिन्न गांव में क्रमिक भूख हड़ताल दूसरी दिन भी जारी रही।
यह जानकारी देते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सह सचिव रणधीर सिंह सुमन ने बताया कि ग्राम चन्दनपुरवा, मुबारकपुर, भगौतीपुरवा व कोना गांव में कल से क्रमिक भूख हड़ताल जारी है।
आज निम्न गांवों में क्रमिक भूख हड़ताल प्रारम्भ किया गया है। जिसमें बिशुनपुर में विष्णू त्रिपाठी, उमाकान्त प्रजापति, रमेश, रामू, मसौली में रशीद, मो0 शरीफ, सुग्रीव प्रसाद, मेराज अहमद, दयाशंकर, चन्दनपुरवा में सन्तराम, मुरली, सुखमी, रामप्रकाश, शिवप्रसाद, जगदीश, जियनपुर गांव में धनवासी, सोनावती, तारावती, रामसागर, राममनोरथ मोहम्मदपुर गांव में रामलखन, सुरेन्द्र पाल, देशराज, मलके, रामगोपाल अलीपुर गांव में राममनोहर, अर्जुन सिंह मुनेश्वर, कपिल वर्मा, पंचमलाल मलूकपुर गांव में अवधेश कुमार, विश्राम, रामनरेश, बुधराम, सुन्दरलाल व मुबारकपुर, कोनागांव, भगौतीपुर, अजगना आदि गांवों में सैकड़ों किसान क्रमिक भूख हड़ताल कर रहे हैं।
उन्होनें आगे बताया कि जनपद के किसान अपना जमीन को किसी भी कीमत पर लखनऊ विकास प्राधिकरण या बाराबंकी विकास प्राधिकरण को अधिग्रहण नहीं करने देंगे। चाहे इसके लिए जो कुर्बानी देनी पड़े।


 नीरज वर्मा
    मंत्री
अखिल भारतीय किसान सभा
जनपद-बाराबंकी

शनिवार, 14 सितंबर 2013

हम लूटने आये हैं लूट कर जायेंगे

उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण 
धान की जगह आवास बनायेंगे

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से मिला हुआ बाराबंकी जनपद है. लखनऊ-बाराबंकी की सीमा  प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारीयों ने सड़क के दोनों तरफ के ज़मीने फैजाबाद तक खरीद डाली हैं. कुछ ज़मीने या फार्म हाउस उनके नाम हैं और बाकी सब बेनामी संपत्ति है. अब इन अधिकारीयों की निगाहें दूर दराज के गाँवों में किसानो की ज़मीनों पर लगी हुई है इसके लिए वह चाहते यह हैं कि  मेट्रो सिटी की योजना बना कर या विकास प्राधिकरण की योजना बनाकर सरकारी पैसे से आधारभूत ढांचा खड़ा कर अपनी घूसखोरी की रकम से किसानो की बेशकीमती जमीन रोजगार को छीन लिया जाए. जनपद में धान, गेंहू, पिपरमिंट, सब्जियों की रिकॉर्ड पैदावार होती है. केला उत्पादन में भी जनपद प्रगति की ओर अग्रसर है, आम की बागों के लिए भी मशहूर है, सबका महाविनाश करना चाहते हैं विकास के नाम पर
 
 किसी भी तरह से किसानों की उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण और उनके रोजगार छीन लेना प्रशासन की मुख्य मंशा है चाहे बाराबंकी विकास प्राधिकरण बनाकर  या लखनऊ बाराबंकी मेट्रो सिटी बनाकर 163 गांवों के किसानो की जमीन को छीन लेना मुख्य उद्देश्य है।
अधिकारियों का तर्क यह है कि प्रति वर्ष 500 करोड़ रूपये का राजस्व किसानों की जमीन छीन लेने से ब़च  जायेगा, किन्तु उन्हें यह बात रखनी चाहिए कि कमीशन खोरी व घूसखोरी बंद कर दें तो
प्रतिवर्ष लगभग 1500 करोड़ रूपये की सीधी बचत राज्य सरकार को होगी और किसी किसान के खेत भी नहीं छीनने पड़ेंगे। इन अधिकारीयों का पेट उपरी कमाई से अब नहीं भर रहा है तो जनपद के कई अधिकारी अपने भाई-भतीजों के आड़ में प्रॉपर्टी डीलिंग, बिल्डर्स का काम शुरू कर दिए हैं और स्तिथि यह हो गयी है कि हम लूटने आये हैं लूट कर जायेंगे
बागों को काट डालेंगे ज़मीन की लूट के लिए
     बिजली नहीं, पानी नहीं, नालियों की सफाई नहीं, स्कूलों में अध्यापक नहीं, अस्पताल में डाक्टर नहीं, जनपद में कानून व्यवस्था नहीं आदि इन्हीं कामों को देखने के लिए प्रशासन होता है। लेकिन इनकी प्राथमिकता बदल गयी है कि किसानों की उपजाऊ जमीन कैसे छीनी जाये, खनिज सम्पदा की लूट कैसे की जाये ? जनपद में गोमती घाघरा सहित कई नदियाँ जिनकी बालू अवैध रूप से बेचवाने का काम शासन व प्रशासन करता है जिससे करोडो रुपये की अवैध कमाई होती है. कानून सिर्फ उनके लिए है जो इस अवैध कार्य में अधिकारीयों के मेली मददगार नहीं होते हैं
भूमि अधिग्रहण के कारण देश में खेती के लायक जमीन कम हो रही है। सरकार कृषि भूमि का अधिग्रहण करने की जगह आधारभूत परियोजनाओं के लिए बंजर भूमि की पहचान करे या बंजर जमीन का उपचार कर उसे कृषि योग्य बनाए।

  उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण के बारे में फैसला लेने का अधिकार राज्यों पर छोड़ा गया है। 

सुमन
लो क सं घ र्ष !
 

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

प्रेमचंद :साहित्य में समाज का दर्द छिपा हुआ है

उपन्यास सम्राट के तौर पर विख्यात मुंशी प्रेमचंद  आज भी हिन्दी साहित्य में पढ़े जाने वाले साहित्यकार है | इतने लम्बे समय तक लोगो के बीच लोकप्रियता का कारण उनका स्वंय का यथार्थवादी लेखन है | वह अपनी रचनाओं में सिर्फ समस्याओं को उभारने का काम नही करते बल्कि उनसे कैसे निपटा जाए उसे भी बखूबी  बताते है  \ वह भावनाओं को सीचने  वाले ऐसे साहित्यकार थे जो आम जीवन के सरोकारों को लिखते थे |मुंशी जी सिर्फ संघर्ष की ही बात नही करते थे बल्कि सृजनात्मक और सौहार्द पर भी उतना ही जोर देते थे | प्रेमचन्द्र ने अपनी रचनाओं में जिन समस्याओं और चुनौतियों  को उभारा है , वह आज भी इस समाज में मौजूद है | प्रेमचन्द्र की कहानिया आज भी इसीलिए प्रासंगिक है क्योंकि उन्होंने भावी परिस्थितियों को एक संदर्भ के रूप में देखा था | वर्तमान में जो साहित्यकार है वो संघर्ष और समस्याओं की बात तो करते है , लेकिन उनका समाधान कैसे और क्या हो वह नही बता सकते है | आज भी उनकी कहानिया हर वर्ग को आंदोलित करती है |
31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गाँव में पैदा होने वाले मुंशी प्रेमचन्द्र 1894 में अपने पिता के साथ गोरखपुर आ गये और यहाँ नार्मल स्थित एक पाठशाला में उन्होंने शिक्षा ग्रहण किया | बाद में दूसरी बार वह गोरखपुर व बस्ती जिले में उनका पदार्पण अध्यापक के रूप में हुआ | इस प्रकार प्रेमचन्द्र 1911 में बस्ती आये और उन्ही दिनों उनकी मुलाक़ात डुमरियागंज तहसील में तहसीलदार मनन दिवेदी गजपुरी से हुई | श्री द्दिवेदी से उनकी साहित्य के विषयों पर खूब चर्चा होती थी | गोरखपुर में एक अध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई और यहाँ उर्दू के सम्पादक दशरथ प्रसाद जी से उनकी मुलाक़ात हुई | इसके बाद उनकी रूचि साहित्य के प्रति बढती गयी | गोरखपुर में रहने के दौरान ही उनकी मुलाक़ात महावीर प्रसाद पोद्दार से हुई और कहने पर ही प्रेमचन्द्र ने '' सेवा सदन '' जैसा उपन्यास लिखा | गोरखपुर में नार्मल स्कूल के करीब एक मकान में रहते थे जहा एक पुरानी ईदगाह थी और ईदगाह के बगल में एक मजार थी जहा ईद पर मेला लगता था | आज यह मजार मुबारक खा शहीद कहलाती है | प्रेमचन्द्र जहा रहते थे उस स्थान को अब प्रेम चन्द्र पार्क बना दिया गया है | यही रहते हुए 1920 में गांधी जी के असहयोग आन्दोलन के  दौरान जब गांधी यहाँ स्थित बाले के मैदान में आये तो प्रेमचन्द्र  ने उनके भाषण  को सुना और फिर चार दिन बाद सरकारी सेवा से त्यागपत्र देकर स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही बन गये | बाद में वह पोद्दार जी के साथ उनके गाँव चले गये जहा चरखा कातते और गांधी जी के असहयोग आन्दोलन पर केन्द्रित कहानिया और उपन्यास लिखते थे | मुंशी प्रेमचन्द्र में पूर्वांचल में गरीबी . किसानो का उत्पीडन , जमीदारो का शोषण , महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार बेमेल विवाह व कर्ज लेकर जीवन यापन करने वालो लोगो के जिन्दगी को करीब से देखा था | इसीलिए पूर्वांचल का यही दबा कुचला वर्ग प्रेमचन्द्र की उपन्यासों में और इनकी कहानियों में अनेक स्वरूपों में  मौजूद है | 8 अक्तूबर 1936 में कलम का यह सिपाही हमेशा के लिए सो गया , लेकिन उनकी प्रासंगिकता आज भी कायम है | उन्होंने पहली बार साहित्य को जनता की आवाज बनाई | उनकी कहानियो और उपन्यासों में किसानो , मजदूरों और वर्ग में बटे हुए  समाज का दर्द छिपा हुआ था और यही दर्द आज भी मुंशी प्रेमचन्द्र को दूसरे लेखको से कही अलग बड़ा बनाती है  | बीसवी सदी की भारतीय पीड़ा त्रासदी और संघर्ष के महान साहित्यिक  प्रवक्ता | हिन्दी और उर्दू दोनों में समान अधिकार रहने वाले कथा साहित्य की रचना | बाल विधवा से विवाह 1908 में सोजेवतन  का प्रकाशन , यह राष्ट्रभक्ति के स्वर के कारण सरकार द्वारा जब्त | 1921 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा | अलवर नरेश का निमंत्रण अस्वीकार करना और '' माधुरी  और ' हंस का सम्पादन करना लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन ( 1936 ) की अध्यक्षता करना | 300 सेअधिक कहानिया और विभिन्न विषयों पर लिखना उनके बस की बात थी | उनके महत्वपूर्ण उपन्यासों में सेवा सदन , प्रेमाश्रम , रंगभूमि , गबन , कर्मभूमि और गोदान है |
  आज उनकी पुण्य तिथि पे इस देश के महान साहित्यकार को मेरा शत-शत नमन !

- सुनील दत्ता

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

बुद्धि की झोरिया : कहाँ टांग दिहो

आज कल घटित हो रही घटनाओ से यह लग रहा है कि अफवाहबाजों तथा कट्टरपंथियों की हरकतों से देश की एकता और अखंडता को जबरदस्त खतरा हैमहाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत में रह रहे पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों को जिस तरह अफवाहबाजों की हरकतों के कारण पलायन करना पड़ा वह अद्भुद है इससे यह कहीं भी नहीं प्रतीत हुआ की हमारे समाज में वैज्ञानिक सोच का भी कहीं विकास हुआ हैसमय-समय पर कथित धार्मिक कट्टरवादी अफवाहों के माध्यम से गणेश को दूध पिलाने से लेकर तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं और सरकारी तंत्र जबतक चले चलाये जाओ वाली स्तिथि में मूक रहता हैसमाज के जिम्मेदार प्रबुद्ध लोग इस वजह से चुप रहते हैं कि कहीं उनके बोलने से उनकी शरीफाना छवि को धक्का लग जायेशरीफाना का मतलब यह होता है कि जो व्यक्ति गलत को गलत कह सके और सही को सही वही सबसे शरीफ व्यक्ति होता हैजर्मन नाजीवाद से प्रेरित विचारधारा के लोग इन्टरनेट से लेकर मीडिया तक में जाति, धर्म, प्रांतीयता, क्षेत्रिययता, भाषा के सवाल को लेकर नफरत फ़ैलाने के अलावा कोई कार्य नहीं करते हैं और आज कल यही लोग अमेरिकन साम्राज्यवाद की विचारधारा की सेवा में हैं जो इस देश की एकता और अखंडता को नष्ट करना चाहते हैं
मुंबई में असाम म्यांमार की दुर्भाग्यशाली घटनाओ को लेकर धरना प्रदर्शन होता है और उसके बाद तोड़ फोड़ की घटनाएं शुरू हो जाती हैंयह इस बात का प्रतीक है की तालिबानी तबका भारतीय समाज में अपना घर मजबूत बना रहा है और हद की सीमाएं टूट जाती हैं कि सरकारी तंत्र चुप चाप उनकी गुंडागर्दी को बर्दाश्त करता रहता है और पिटता भी हैलखनऊ में अलविदा की नमाज पढ़कर लोग निकले उनके हाथ में तलवारे थीं और जेबों में पत्थर थे और उन्होंने गौतम बुद्ध की मूर्ति तोड़ दी, आग लगनी शुरू कर दी, कई हजार पुलिस के जवान और प्रशासनिक अफसर चुपचाप तमाशा देखते रहेसवाल यह उठता है कि अलविदा की नमाज पढने गए लोग ऊपर वाले से प्रार्थना करने गए थे या तलवार, पत्थर, चाकू लेकर युद्ध करने की तैयारी के साथ गए थेइस बात का कोई भी जवाब इन लोगों के पास नहीं हैवहीँ राजनीतिक लोगों की स्तिथि यह है कि वोट बैंक गड़बड़ाने पाए इस वजह से वह कुछ भी बोलने की स्तिथि में नहीं रहते हैंअभी कुछ दिन पूर्व मायावती की मूर्ती तोड़ दी गयी थी जिस पर मायावती की पार्टी ने आन्दोलन खड़ा कर दिया जिस पर 24 घंटे के अन्दर उनकी नयी मूर्ती स्थापित कर दी गयी किन्तु गौतम बुद्ध की कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है इसलिए उनकी मूर्ति पुन: स्थापित हो पाई और ही अखिलेश यादव की सरकार ने कोई नोटिस ही लिया और सरकार उन अराजक तत्वों को बचाने की कोशिश में है
इन सब घटनाओ से यह पता लगता है कि समाज में हिन्दुवत्व वादी तालिबानी संस्कृति की जडें कितनी गहरी हो गयी हैं कि वह देश की एकता और अखंडता के लिये खतरा हैं और आम जनता की बुद्धि की झोरिया कहाँ खो गयी है यह मालूम ही नहीं देता है या कहाँ टांग दी गयी है कि जो वैज्ञानिक चीजों को भी समझ नहीं पाती हैहमें सावधान रहना चाहिए अफवाहबाजों से इन कट्टर पंथियों से

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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