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रविवार, 7 जुलाई 2013

रुस्तमेहिन्द जफर खान


विश्वासघात ही उस युग की राजनीति और समाज का प्रथम व्यवहार था |

दिल्ली के मध्ययुगीन तुर्क साम्राज्य में उन दिनों ईर्ष्याद्वेष , विश्वासघात और छलप्रपंच के बिना कोई काम ही नही चल सकता था | यदि अमीरों को मौका मिल गया तो वे अपने सुलतान के साथ छल और विश्वासघात करने से नही चुकते और यदि सुलतान का दाँव लग गया तो वह भी अपने अमीरों की खाल उधेड़ लेता , खून की
प्यास दोनों ओर थी | लेकिन इन दोनों रक्तपिपासु दलों के बीच कभी कभी निर्दोष , निरीह व सज्जन भी पिस जाते , जफरखान ऐसा ही सूरवीर ईमानदार कर्तव्यपरायण सेनानायक था | जिस ने बड़ी बहादुरी से मंगोलों को कई बार हराया और अपने शत्रुओ से ही '' रुस्तमेहिन्द '' की खिताब भी प्राप्त की , लेकिन उस जैसे वीर सेनापति को भी कुटिल सुलतान अलाउद्दीन खिलजी की ईर्ष्या का शिकार बनकर प्राणों से हाथ धोना पडा |

जब अक्तूबर 1296 ई . में
बैठा तो उसे एक बड़ी भारी विपत्ति का सामना करना पडा | देश में मगोलो क आक्रमण का भय छाया हुआ था | सीमांत पर आक्रमणकारियों के तुमान इकठ्ठे हो रहे थे |
मंगोलों ने सन 1296 -- 97 ई की सहित शीत ऋतू में सिन्धु नदी पार कर के पंजाब में लूटमार शुरू कर दी | सुलतान ने मंगोलों को मार भगाने के लिए अपने भाई अलगुखान तथा सेनापति जफ्र्खान को सीमांत की ओर भेजने का निश्चय किया |
सुलतान अलाउद्दीन खिलजी अपने शाही महल में मंत्रणा कक्ष में कुछ व्याकुल मुद्रा में टहल रहा था , साम्राज्य की उत्तरी पश्चिमी सीमा से आक्रमणकारी मंगोलों के दल के दल देश में घुस आये थे और लूटमार करके
हरे भरे सीमांत प्रदेशो को श्मशान भूमि में बदल रहे थे , अभी कुछ महीने पहले ही बहादुर सेनापति जफरखान ने इन को मारपीट कर सिन्धु नदी के पार धकेल दिया था लेकिन इस बार ये फिर दोगुनी ताकत के साथ हिन्दुस्तान को लुटने चले आये थे |
ये मंगोल आक्रमणकारी चंगेज के पुत्र हलाकू के खूंखार सैनिक थे , जिन्होंने एशिया महाद्दीप में सर्वनाश उपस्थित कर दिया था | मध्य एशिया और पूर्वी एशिया और पूर्वी यूरोप को लूटमार द्वारा राख में मिलाकर अब ये लोग हिन्दुस्तान की ओर बढे थे | हिन्दुस्तान की समृद्दी की खबरे उनके कानो तक पहुच चुकी थी | मंगोल शासक हलाकू की साम्राज्य लिप्सा विनाश लीला और खून की प्यास की भयंकर व रोमाचक खबरे सभी देशो में फ़ैल चुकी थी |
सारे भारत में यही आतंक फैला हुआ था कि क्या इन खून के प्यासे मंगोल भेडियो द्वारा दिल्ली के भी वही दुर्दशा होगी जैसी बगदाद की हुई थी | अलाउद्दीन खिलजी कुछ ऐसी ही उधेड़ बन में पड़ा हुआ अपने यशस्वी व वीर सेनापति जफरखान का इन्तजार कर रहा था जिसने कुछ महीने पहले ही मंगोलों को करारी हार दी थी |
थोड़ी देर बाद जफरखान ने प्रवेश किया लम्बी कद्दावर शरीर उन्नत मस्तिष्क विशाल आँखे यत्न से संभाली दाढ़ी उसके रोबदार चेहरे पर खूब जंच रही थी | वह जन्मजात सैनिक था युद्द उसका जीवन था विजय लक्ष्य और निर्भयता स्वभाव , शत्रु के सामने जमकर उसने पीछे हटना नही सीखा था | जफरखान ने सुलतान का अभिवादन किया और एक ओर खड़ा हो गया , सुलतान अलाउद्दीन की दृष्टि साम्राज्य के इस महान स्तम्भ पर पड़ी , वह उसके ओजस्वी व्यक्तित्व और रोम रोम से टपकते शौर्य को देखकर आस्वस्थ हुआ |
सुलतान ने उसके सामने अपनी चिंता व्यक्त की '' सीमांत पर फिर मंगोलों के दल के दल इकठ्ठे होकर उत्पात कर रहे है , इन दुष्ट लुटेरो से किस प्रकार अपने साम्राज्य की रक्षा हो सकती है सेनापति ?
अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन की हत्या करके सिहासन पर
जफरखान ने उत्तर दिया '' जहापनाह '', साम्राज्य की रक्षा का उत्तम उपाय यह है कि शत्रु को उसके घर में ही घुस कर पिटा जाए आक्रमण की प्रतीक्षा न की जाए , और उसे इतनी बुरी तरह पिटा जाये कि फिर कई पीढियों तक वह इस ओर आँख उठाने की हिम्मत भी न कर सके | सुलतान ने जिज्ञासा भरी दृष्टि से उसकी ओर'' देखकर कहा
'' अपनी बात को स्पष्ट करके कहो जफरखान ''
सेनापति ने कहा '' हमे हमलावर मंगोलों को सिन्धु नदी पार करने का मौक़ा ही नही देना चाहिए , बजाये इसके कि वे हमारे प्रदेश में घुसकर जब चाहे तब लूटमार करने आते जाते रहे , हम ही क्यों न सिन्धु को पार करके उनके सिविस्तान प्रदेश में घुसकर , उन्हें अच्छी तरह मारपीट कर ठीक कर आये और उस प्रदेश को अपने साम्राज्य का अटूट अंग बनाकर हमेशा के लिए मंगोलों का काटा निकाल दे ?
'' शाबाश ''
अलाउद्दीन की आँखों में चमक आ गयी , '' पंजाब और सिन्धु प्रदेशो की रक्षा के लिए सिविस्तान को अपने राज्य में मिलाना जरूरी है , तुरंत आक्रमण की तैयारी की जाए ''
ऐसे साहसिक अभियानों के लिए जफरखान हमेशा तैयार रहता था उसने थोड़े ही समय में अपनी सेनाये तैयार कर ली , हिन्दुस्तानी सेना पडाव डालती हुई तेजी से आगे बढ़ी जफरखान की नीति युद्द में द्दृत गति से चलने की थी , शत्रु को संभलने का मौका दिए बिना ही उस ने सिन्धु नदी को पार किया और सिविस्तान पर धावा बोल दिया | अपनी प्रचंड फ़ौज की सहायता से सेनापति ने सिविस्तान के दुर्ग को घेर लिया |
चंगेजखान के समय से अब तक मंगोल हिन्दुस्तान में आकर लूटमार करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे जब वे अपना खजाना खाली देखते तो के लिए इस देश में उतर जाते और डाकुओ की तरह
लूटमार करके लौट जाते | पहली बार हिन्दुस्तानी फ़ौज ने उनके राज्य में घुसने की हिम्मत की थी | उनमे इतना साहस कैसे आ गया कि चंगेज और हलाकू के प्रदेशो पर हमला कर दे ? यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी ? वास्तव में यह चंगेज और हलाकू की ही नीति थी कि शत्रु को उसके घर में घुसकर पीटो युद्द भूमि उसी के प्रदेश में न हो कि अपने राज्य में |
सिविस्तान का सूबेदार सिल्दी जफरखान के इस आकस्मिक आक्रमण से घबरा गया फिर भी उसने अपने भाई तथा अन्य मंगोलों सरदारों की सहायता से हिन्दुस्तानी सेना से लोहा लेने की तैयारी की | जफरखान की सेना ने तलवार , फरसे , भाले और नेजो की मार से मंगोलों के छक्के छुड़ा दिए|
सिविस्तान का सूबेदार सिल्दी जफरखान के इस आकस्मिक आक्रमण से घबराय।था
मंगोलों ने भी किले के बुर्जो से वाणों की ऐसी वर्षा की कि किले के भीतर एक चिड़िया भी घुसने का साहस नही कर सकती थी | लेकिन जफरखान के बहादुर योद्दाओ ने अद्भुत पराक्रम से किले को जीत लिया सिल्दी अपने साथियो के साथ कैद कर लिया गया सिविस्तान के दुर्ग के बाद हिन्दुस्तानी सेनाओं ने स्वात पाशेब
और गर्मच के किलो पर भी अधिकार जमा लिया | सिविस्तान के प्रदेश पर हिन्दुस्तानियों की इस विजय से सारे मध्य एशिया में तहलका मच गया चंगेज खान और हलाकू के खूनी जंगबाज मंगोल अपने ही घर में पहली बार पिटे थे | एक बहुत बड़ा प्रदेश उनके साम्राज्य से टूटकर हिन्दुस्तान में मिल गया था | सिल्दी
अपने भाई तथा बहुत से मंगोल सरदारों और उनके स्त्री बच्चो के साथ बंदी बनाया गया प्रत्येक मंगोल कैदी को तौक और जंजीर में बंधवा कर दिल्ली भेज दिया गया |
आधी शताब्दी से भी अधिक समय तक एशिया में हत्याकांड लूटमार और आग का भयंकर खेल खेलने वाले ये मंगोल जब हिन्दुस्तानियों द्वारा पिटे तो उनके साम्राज्य के पाए हिल गये | उन्होंने हारना जाना ही नही था बड़े --- बड़े राज्य उनके आक्रमण की आंधी में तिनके की तरह उड़ गये | इन्ही मंगोलों को जफरखान ने दूसरी बार पीटा था \ वह भी उनके राज्य में घुस कर , इस विजय से जफरखान का यश हिन्दुस्तान में ही नही बल्कि सारे एशिया महाद्दीप में फ़ैल गया मंगोल उसे हिंदुस्तान का रुस्तम मानने लगे |
उसके पराक्रम और शौर्य का यश इतना फ़ैल गया कि वह कुछ दिनों में सारी प्रजा का लाडला बन गया | लोग उसकी बढाई करके फूलो न समाते थे | जफरखान ने चंगेज खान और उसके पौत्र हलाकू की सारी प्रतिष्ठा धुल में मिला दी थी | मंगोलों के लिए वह बहुत बड़ी चुनौती बन गया था | उन्होंने सिविस्तान की पराजय का बदला लेने के लिए जोरशोर से तैयारिया शुरू कर दी | मध्ययुगीन भारतीय समाज जन -- समाज वीरता की पूजा करता था | जफरखान ऐसा ही एक पूज्यनीय बीर था जिसने चंगेजखान और हलाकू के खुनी भेडिये जैसे इन मंगोलों को बार -- बार हराकर अपनी शूरवीरता की धाक जमा दी थी |
भारतवासियों ने गाँव -- गाँव , शहर -- शहर में उसकी जय जयकार की उसकी बहादुरी लोकगीतों में ढल कर पूरे साम्राज्य में गूजने लगी | वह वीर योद्दा सुलतान से भी अधिक सम्मानित व्यक्ति बन गया था | कयोकी अपने उदार और दयालु चाचा की विश्वासघात पूर्ण हत्या करने से जहा प्रजा मन ही मन सुलतान से घृणा
करती थी वहा इस वीर को पौराणिक नायको की तरह मान देती थी |
यही सम्मान जफरखान की मृत्यु का कारण बना कयोकी अलाउद्दीन जैसा खूनी दुर्दांत और धूर्त
व्यक्ति अपने अधीन सेनापति के यश को कैसे सह सकता था | उसे लगा कि उसकी सल्तनत अब गयी कि तब गयी | सचमुच उस समय तथा कथित उच्च समाज कितना नीच था और नीच समझा जाने वाला समाज कितना उच्च था | जफरखान की इस विजय ने जहा इस महान योद्दा का यश सारे एशिया महाद्दीप में फैला दिया और शत्रुओ द्वारा '' रुस्तमे हिन्द '' की पदवी पाई | वही उसे अपने लोगो द्वारा बड़े दुर्भाग्य का सामना करना पडा | सुलतान अलाउद्दीन खिलजी उसकी लोकप्रियता और प्रशंसा से जल उठा और मन ही मन उससे भयभीत होकर ईर्ष्या करने लगा |
सुलतान का छोटा भाई उलगुखान उससे और अधिक जलता था और किसी न किसी प्रकार उसे अपने रास्ते से हटाना चाहता था | अभी जफरखान नये जीते हुए प्रदेश सिविस्तान के सुदृढ़ रक्षा व्यवस्था करने में व्यस्त था कि सुलतान और उसके भाई की ईर्ष्या ने इस महान अद्दितीय सेनापति के विरुद्द जाल बुनना शुरू कर दिया |
इन लोगो ने ईर्ष्या वश उसे तुरंत अपनी जागीर सामना में लौटने का हुक्म दिया सुलतान की यह भयंकर भूल थी कयोकी जफरखान के लौटते ही मंगोलों ने उसे सहज ही फिर जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और दिल्ली को धुल में मिलाने के तैयारिया जोर -- शोर से शुरू कर दी | जफरखान के लौटते ही सुलतान उसे
समाप्त करने के योजना बनाने लगा | उसके षड्यंत्र का रूप इस प्रकार था -- या तो उस पर कृपा दृष्टि करके उसे कुछ हजार सवार देकर लखनौती ( बंगाल ) पर अधिकार करने भेज दिया जाए जहा वह दिल्ली से बहुत दूर साम्राज्य के कोने पे पडा --- पडा प्रतिवर्ष वहा से हाथी तथा राज्य कर भेजता रहे अथवा किसी उपाय से
उसे विष देकर मरवा दिया जाए या उसकी आँखे निकलवाकर उसे कैद में डाल दिया जाए |
सुलतान इस प्रकार साजिश करके रुस्तमे हिन्द जफरखान को अपनी ईर्ष्या का शिकार बनाने की सोच ही रहा था कि तभी उस पर बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी |
सिविस्तान की पराजय का बदला लेने के लिए कुतलुग ख्वाजा ने मंगोलों के 20 तुमान ( डिविजन ) लेकर हिन्दुस्तान पर हमला कर दिया | इस बार उनका लक्ष्य सीमावर्ती प्रदेशो में लूटमार करना न था बल्कि सीधा दिल्ली पर आक्रमण करना था | ख्वाजा कुतलुग अपनी प्रबल सेना के साथ सिंध पार कर के पड़ाव पर पड़ाव डालता हुआ दिल्ली की ओर बढा | उसने मार्ग में पड़ने वाले किलो नगरो कस्बो और गाँवों को लुटने व जलाने में समय नष्ट नही किया | मंगोलों के सवारों की टापे दिल्ली के निकट आती जा रही थी | देखते ही देखते मंगोलों के 20 डिविजन सवारों ने दिल्ली के चारो ओर घेरा डाल दिया | दिल्ली के घिरत ही राजधानी में हलचल मच गयी | मंगोल सवार इस झपटे के साथ आये कि उनके मुकाबले के लिए पूरी तैयारी भी न हो पाई इससे तो लोगो में और भी घबराहट फ़ैल गयी | अभी तक शहर की रक्षा करने वाली चारदीवारी की ठीक तरह से मरम्मत नही हो पाई थी |
सुलतान ने जितनी जल्दी हो सका पास के सूबों से अपनी सेना और इकठ्ठी कर ली और मंगोलों का सामना करने के लिए डट गया शहर में शरणार्थी की इतनी भीड़ हो गयी थी कि कही तिल रखने के लिए जगह नही थी | अनाज के दम आस्मां को छूने लगे थे कयोकी बंजारों और व्यापारियों के आने जाने के सब मार्ग मंगोलों ने बंद कर दिया था | सुलतान बड़े वैभव के साथ अपनी सेना लेकर दिल्ली से निकला और सीरी में छावनी डाल दी | उसने अपना शाही हराम और खजाना दिल्ली के कोतवाल अजा उल मुल्क को सौपा यही सीरी में उसने युद्द
मंत्रणा के लिए अपने सभी अमीरों मलिकों और सेनापतियो को बुलाया , जफरखान भी इस मंत्रणा में सम्मलित हुआ भावी युद्द के विषय में सभी अपने विचार प्रकट करने लगे |
मलिक अज उल मुल्क अपने समय का सबसे मोटा आदमी था | इसे सुलतान ने मोटापे के कारण बेकार जानकार दिल्ली का कोतवाल बना दिया था और विश्वस्त जानकार हरम और खजाना इसके सर्क्ष्ण में छोड़ दिया था | यह अत्यंत मोटा होने के कारण मुश्किल से चल पाटा था मंगोलों के आक्रमण से यही व्यक्ति
सबसे ज्यादा भयभीत था | वह सोचता था यदि शहर छोड़कर भागना पड़े तो वह सबसे पीछे रह जाएगा और फिर ये खून के प्यासे चंगेज व हलाकू न जाने उसके साथ क्या व्यवहार करे |
युद्द मंत्रणा में वह भी उपस्थित था , अपने भय को नीति की ओट में छिपाते हुए इस मोटे कोतवाल ने सुलतान से कहा , '' जहापनाह जब दो समान बल वाले बादशाह युद्द्भूमि में आमने सामने डट जाते है तो विजय तराजू के पलडो के समान झूलने लगते है , न जाने किसका पलड़ा भारी हो जाए , इसलिए चंगेजखान और हलाकू जैसे इन खूंखार दरिंदो से जहापनाह नीति के अनुसार ही व्यवहार करे कयोकि वक्त को देखकर हो लड़ाई या सुलह करनी चाहिए "" |
सुलतान ने जफरखान की ओर देखा , वह दृढ स्वर में बोला , '' मैं मंगोलों के पक्ष में नही हूँ , हम उन्हें दो बार पहले भी हरा चुके है औए अब तीसरी बार भी जीत हमारी ही होगी , यदि हमने दरवाजे पर ललकारते हुए दुश्मन से डर कर सुलह कर ली तो हमारी सेना की पिछली कुरबानिया बेकार हो जायेगी , दुश्मन के हौसले बुलंद हो जायेगे वह हमे और भी दबाएगा , '' |
उल्तान ने बारी बारी सभी अमींरो और मलिकों के विचार पूछे , सब ने एक मत से जफरखान के विचारों का समर्थन किया | इसके पश्चात सुलतान ने अपना मंतव्य प्रकट किया , '' जिस दुश्मन ने दो हजार
मील पार कर हमारी राजधानी को घेरा है , वह निश्चय ही बलवान है पर उसकी ललकार सुनकर चुपचाप बैठ जाना या उसके आगे झुक जाने से मेरा सिर झुकाना निश्चय ही बहुत श्रम की बात होगी मंगोलों के आगे झुक जाने से मेरा साम्राज्य बिखर जाएगा और विद्रोहियों को सिर उठाने का मौक़ा मिलेगा | दुश्मन के आगे झुकने पर मैं अपने साथियो की नजर में गिर जाउंगा तथा हरम की औरतो से आंख न मिला सकूंगा |, युद्द अवश्य होगा आराम और मोटापे से इस अज उल मुल्क को कायर बना दिया है , यह मुंशी है और मुंशी का बेटा है | यह समय इसकी बात मानने का नही बल्कि मंगोलों के खून से अपनी तलवार की प्यास बुझाने का है |
सुलतान का निर्णय सुनकर जफरखान की आँखे चमक उठी सभी अमीर और मलिक अपनी अपनी सेना सजाने लगे , सुलतान अपनी शक्तिशाली सेना को लेकर सीरी से किली की ओर बढा और मंगोलों के सामने जा डटा दोनों सेनाये आमने सामने मोर्चा लगा कर जैम गयी और युद्द की प्रतीक्षा करने लगी | जफरखान
दिल्ली की सेना के दाए बाजू पर और उलगुखान बाए बाजू पर नियत था , केंद्र भाग में स्वंय सुलतान के हाथ में था |
जफरखान ने आक्रमण में पहल की उसने तलवार खिंच ली और अपने अधीन अमीर व सेनानायको को लेकर मंगोल सेना के बाए बाजू पर टूट पडा | जफरखान का नाम और दर्शन ही मंगोलों को अधीर बनाने के
लिए पर्याप्त था | उसका नाम ही विजय का पर्यायवाची बन चुका था | हिन्दुस्तानी सिपाही उसके नेतृत्व में तीर की तरह मंगोलों पर टूट पड़े , इस प्रचंड आक्रमण का सामना वे न कर सके | थोड़ी ही देर में उनके पैर उखड गये और वे भाग खड़े हुए | रुस्तम की तरह शूरवीर जफरखान ने अपनी सेना के साथ दूर तक भगोड़ो का पीछा किया और उन्हें खदेडता हुआ तलवार से काटता हुआ 18 कोस आगे तक निकल गया मंगोल इस तरह
भाग रहे थे कि उन्हें किसी बात का होशो हवास  नही था |
योजना और युद्द नीति के अनुसार इसी समय उलगुखान को बाये बाजू की फौजों के साथ आगे बढ़कर
शत्रु पर वार  करना था जिससे उसका समूल नाश हो सके और जफरखान को सामयिक सहायता मिल सके लेकिन उसने ईर्ष्यावश  ऐसा नही किया | जब जफरखान अपने सवारों के साथ सिंह की भांति मंगोलों को खदेडता हुआ आगे बढ़ रहा था तो सुलतान अलाउद्दीन और उसका भाई उल्गुखान दोनों प्रसन्न होने के
बदले ईर्ष्या  द्वेष से जल उठे | इस विजय का सारा श्रेय अकेला जफरखान लिए जा रहा है | वह अकेला ही उन्हें भेड़ो की तरह खदेड़ कर कोसो दूर ले गया था | सुलतान के अधीन केंद्र भाग में उत्तम सेना थी | इसी तरह बाये बाजू पर उलगुखान के अधीन सबसे अच्छे अमीर और उनकी ताजादम फ़ौज थी | लेकिन इन दोनों भाइयो ने अपनी ऊँगली तक न हिलाई उन्हें इस बात का बड़ा ही अफ़सोस था कि अकेला जफरखान ही शत्रु को खदेडता
कोसो दूर निकल गया और जीत का सारा यश उसी ने ओढ़ लिया है | जब कि उनकी दो तिहाई सेना तमाशा ही देखती रह गयी  है | उन्हें ऐसा लगा मानो रुस्तमे हिन्द ने शत्रु पर जादू कर दिया हो , ईर्ष्यावश वे लोग अपने स्थानों पर फ़ौज समेत जमे रहे जफरखान के पृष्ठ भाग के लिए की रक्षा के लिए आगे नही बढ़े , उन्होंने सोचा यदि वह इसी तरह शत्रु से घिर कर लड़ते --  लड़ते मारा जाए तो यही अच्छा है |
मंगोल बेतहाशा भाग रहे थे और जफरखान जीत की उमंग में उन्हें निरंतर खदेडता जा रहा था | आखिर जान बचाने के लिए वे पेड़ो पर चढ़ कर छिप गये , जफरखान के सवार उन्हें देख न पाए तभी मंगोल सेनापति तारगी ने देखा कि जफरखान अपने जोश में इने गिने साथियो के साथ बहुत आगे बढ़ आया है और उसके पृष्ठ भाग की रक्षा के लिए दिल्ली से कोई बड़ी सेना नही आ रही है | इसलिए उसने अपने लोगो को संकेत किया देखते   -- देखते मंगोलों ने पीछे से धावा बोल कर उसे घेर लिया और उस पर वाणों की बौछार कर दी | जफरखान के इने --  गिने साथी धीरे धीरे गिरने लगे फिर भी वह निराश नही हुआ और दोगुने जोश से दुश्मन से लोहा लेने लगा | मंगोलों ने उसके घोड़े को बाणों से बुरी तरह छेद डाला | जिससे वह डगमगा कर गिर पडा | घोड़े से गिरते जफरखान पैदल युद्द करने लगा | अब वह अकेला था और चारो ओर से सैकड़ो मंगोल सवारों ने
उसे घेर रखा था | उसने धैर्य न छोड़ा , उसने तलवार छोड़कर बाणों से सवारों को गिराना शुरू किया जिसको भी उसका बाण छू जाता वह निष्प्राण होकर गिर पड़ता पर अब तो उसका तरकस भी खाली हो गया |
जफरखान हाथ में तलवार लेकर मौत का सामना करने के लिए तैयार हो गया था वह बुरी तरह घायल हो
चुका था और बार  ---- बार दिल्ली की दिशा में देख रहा था शायद उसकी सहायता के लिए सुलतान या उलगुखान की कोई सेना अ रही हो लेकिन उधर से कोई सहायता न आई  थी और न ही आई |
इसी बीच कुतलुग ख्वाजा अपने चुने हुए सवारों  के साथ आगे बढ़ा उसने वार करने वाले मंगोलों को रोककर घायल जफरखान से कहा '' जफरखान हम तुम्हारी बहादुरी से बहुत खुश है दिल्ली का सुलतान अलाउद्दीन और उसका भाई उलगुखान तुम्हारी बहादुरी से जलते है ये लोग तुम्हारे प्राण लेने पर उतारू है तभी तो उन्होंने तुम्हारी मदद के लिए अपनी फौजों में से एक भी आदमी नही भेजा और तुम्हे मौत के मुंह में अकेला धकेल दिया आ तू मुझसे मिल जा मैं तुझे अपने पिता के पास ले जाउंगा वे तुझे दिल्ली के सुलतान से भी
अधिक मान देंगे |
जफरखान ने घृणा पूर्वक कहा '' सुलतान मेरे साथ क्या व्यवहार कर रहा है इसकी मुझे जरा भी चिंता नही है , मैं तो सीधा साधा  सैनिक हूँ , युद्द क्षेत्र में शत्रु से जूझना ही मेरा एकमात्र कर्तव्य है | सुलतान द्वेष करता है तो करता रहे इससे क्या अंतर पड़ता है सुलतान से अधिक मैं जन्मभूमि को महत्व देता हूँ वह तो मुझे द्वेष नही करती मैं अलाउद्दीन के दुश्मनों से नही अपने हिन्दुस्तान के दुश्मनों से लड़ने आया हूँ शरीर में प्राण रहते हुए कोई भी मुझे इस धरती से अलग नही कर सकता |

कुतलुग ख्वाजा और तार्गी ने देखा कि ज्फ्र्खान को जीवित दशा में बंदी बनाना कठिन ही नही असम्भव है तो उसने अपने सवारों को संकेत किया मंगोल अकेले , पैदल और घायल जफरखान  पर टूट पड़े उसने यथाशक्ति शत्रु का प्रतिरोध किया लेकिन घाव लगने से वह गिर पडा और शहीद हो गया |
इसके बाद मंगोलों ने उसके शेष अमीरों और साथियो को ढूढ ढूढ कर मर डाला उसके हाथियों और महावतो की भी हत्या कर दी | इस तरह जफरखान और उसकी पूरी सेना का सफाया हो गया | जब युद्द भूमि से मीलो दूर
जफरखान पराजित मंगोल सैनिको के द्वारा शहीद हो रहा था तब सुलतान अलाउद्दीन और उसका भाई उलगुखान अपनी -- अपनी विशाल सेनाओं के साथ चुपचाप खड़े थे एक कदम भी आगे नही बढे |
यद्दपि मंगोलों ने    रुस्तमे हिन्द जफरखान   और उसके साथियो को घेर कर मार डाला था | पर उस के पराक्रम से उनकी भी कम हानि नही हुई थी | वे बुरी तरह भयभीत थे | अभी हिन्दुस्तान की पूरी फ़ौज तो मैदान में उतरी ही नही थी |
मंगोलों ने बहुत सोच  समझ  कर जान बचा कर भागने में ही कुशल समझी इसलिए वे रातो रात चुपचाप 30 कोस दूर पहुच गये  और प्रतिदिन बीस कोस पर पड़ाव डालते हुए भागकर अपनी सीमा में जा पहुचे वे किसी पड़ाव पर अधिक देर नही रुकते  | सुलतान ने मंगोलों को सिर पर पैर रखकर भागते देख उनका पीछा नही किया | इस ईर्ष्यालु शासक को मंगोलों की पराजय से अधिक ख़ुशी जफरखान के शहीद होने से हुई | मुर्ख सुल्तान ने यह भी नही देखा कि उसका बाया बाजु ही कट चूका है | बाद में वह मलिक काफूर नामक एक हिजड़े पर अधिकाधिक आश्रित होता गया | जिसने अंत में विश्वाश्घात करके सुलतान की हत्या कर दी बल्कि उसके पुत्रो को अंधा बनाकर ग्वालियर के किले में डाल दिया और बेगमो के सरे गहने तथा दूसरी सम्पत्ति छिनकर उन्हें महलो से बाहर निकाल दिया | इस तरह महाप्रतापी काल ने उस से इस मुर्खता तथा विश्वासघात का बदला व्याज समेत ले लिया | यद्दपि जफरखान युद्द भूमि में शहीद हो चूका था फिर भी उसके आक्रमण का भय मंगोलों के मन में वर्षो तक समाया रहा | यदि कभी उनके पशु पानी नही पीते तो वे कहते '' क्या तुमने रुस्तमे हिन्द जफरखान को देख लिया है जो पानी नही पी रहे हो |
यह वस्तुत: जफरखान का ही पराक्रम था जो उसने मंगोलों के प्रचंड आक्रमणों से इस देश को सुरक्षित रखा और अपने प्राण देकर भी उनके मन पर भारतीय शौर्य का इअसा सिक्का जमा दिया कि फिर वर्षो तक उन्होंने इसकी ओर मुंह भी नही किया | लेकिन अपने इस शौर्य और बलिदान का उसे क्या पुरस्कार मिला ? केवल विश्वासघात हाँ विश्वासघात ही उस युग की राजनीति और समाज का प्रथम व्यवहार था |

-सुनील दत्ता 
स्वतंत्र  पत्रकार व विचारक                     
आभार स विश्वनाथ

बुधवार, 19 जून 2013

सीदी मौला



सीदी मौला एक ऐसा चरित्र जो भारत के मध्यकाल में ठगी , चोरी और डकैती करके भी पूरे उत्तर भारत में अपने को संत कहलवाता था | ऐसे लोगो के कारण किसी  भी धर्म या समाज  की मान्यताये टूटकर बिखरती है |
भारत का शायद ही कोई गाँव या शहर होगा जिस में किसी साधू , संत , पीर या फकीर ने अपना डेरा न
जमा रखा हो , धन यश खाने के लिए तर  --  माल , वासनापूर्ति के लिए युवती चेलिया तो मिलती ही है | उस पर मजे की बात यह है कि लोग '' महाराज जी ' '' गुरु जी '' कहते हुए पैरो में झुकते चले जाते है |
साधू संत बनने के लिए किसी योग्यता की भी आवश्यकता नही , केवल सिर मुडाने , या जटा बढाने और भगवे कपडे रंगने के जरूरत है , ऐसे लाखो रंगे सियार मध्यकाल में भी थे और आज भी है |
                         संभव है इन लाखो संत , फकीरों में दो चार सत्पुरुष विद्वान् भी हो , पर निश्चय ही ज्यादा भीड़ तो मुर्ख , नशेबाज , पाखण्डियो की ही होती है | मध्ययुग में तो इन का खूब प्रभाव था -- सुलतान और उसके आमिर तक इनका आदर करते थे , फिर जनसाधारण का तो कहना ही क्या ?
कभी -- कभी ये धूर्त रंगे सियार ऐसे अपराध भी कर बैठते या रासलीला फैलाते की आम जनता लुटी सी बस
देखती रह जाती | आये दिन ये पाखंडी लोग कोई ना कोई गुल जरुर खिलाते रहते थे सीदी मौला उसी जमाने का एक भारी मक्कार धूर्त  और रंगा सियार था , जिसकी मान्यता उस समय सारे उत्तर भारत में फैली हुई थी | लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी |
दिल्ली और उस के आसपास के इलाको में सीदी की ऋद्दी सिद्दि और चमत्कारों की बड़ी धूम थी , मौला उत्तर पश्चिमी सीमाप्रांत का निवासी था और सुलतान बलबन के समय दिल्ली में आ बसा था , उसने अपने लम्बे जीवन में बलबन और उस के उत्तराधिकारियों का शासन देखा था और अब खिलजी वंश के सुलतान
जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में भी उसकी प्रतिष्ठा पूर्ववत बनी हुई थी |
                                गुलाम वंश के ध्वसावशेषो पर अब जलालुद्दीन ने खिलजी वंश की नीव रखी तो बलबनी
दरबार के कितने आमिर , जागीरदार और सरदार बेघर -- बार हो गये थे | इस क्रान्ति की आंधी ने बड़े -- बड़े सुदृढ़ स्तम्भ गिरा दिए थे | पर इस सीदी मौला के वैभव में कोई अंतर नही आया था | सीदी मौला के वैभव और ऐश्वर्य का कोई अंत नही था | उसके निवास स्थान पर हर समय लोगो की भीड़ लगी रहती थी , भिन्न --
भिन्न कामनाओं को लेकर लोग वह आते थे | आम लोगो का विश्वास था की इस महान संत की वाणी सिद्द है , वह अपने मुख से जो कुछ कह देता वह सत्य उतरता था |दुनिया भेड़ --  चाल पर चलती है , जल्दी ही सीदी मौला के चमत्कारों की कहानी चारो ओर फ़ैल गयी | लाखो लोग उस पर श्रद्दा रखते थे , एक बात तो प्रत्यक्ष थी | सीदी मौला हजारो रूपये खर्च कर के लोगो को खूब अच्छा खिलाता - पिलाता था | जल अथवा स्थल मार्ग से जो यात्री उसके खानगाह पर पहुच जाता वह बिना कुछ खर्च किये उत्तम भोजन प्राप्त करता था | उसके दस्तरखान पर नाना प्रकार के वे व्यंजन चुने जाते थे जो बड़े बड़े खान और अमीरों को भी सुलभ न थे | यह भी एक कारण था की उसके दरवाजे पर हर समय भीड़ लगी रहती थी | हर महीने हजारो मन मैदा 500 जानवरों का मांस 200 या 300 मन खांड 100 या 200 मन मिसरी खरीदी जाती थी | आटा , दाल , घी , सागभाजी , ईधन की कोई गिनती न थी | सीदी मौला का स्थान बेकार , आलसी , पेटू , निक्कमे और जाहिल लोगो का स्वर्ग बन गया था |
दिन में दो -- दो बार उत्तम प्रदार्थ लोगो में बाटे जाते थे | लोगो को इस बात पर बड़ा आश्चर्य होता था की सीदी मौला के पास इतना धन कहा से आता है , रोज हजारो सिक्को का खर्च था , वह मुफ्त भोजन ही नही बाटता था बल्कि अमीर गरीब सभी को कभी -- कभी मौज में आकर शुद्द चांदी के सिक्के भी बाटता था |
यहाँ सोने चांदी की कीमत ईट- पत्थरों से अधिक नही थी | किसी व्यापारी अथवा जरूरतमंद आदमी को उसका धन चुकाने का तरीका भी बहुत अजीब था | वह अक्सर उनसे कह देता था , '' जाओ , फला पत्थर या पेड़ के नीचे इतने रूपये दबे हुए है '' |
सचमुच वह उन्हें उतने रूपये मिल जाते , इस तरह से उसकी ख्याति और ज्यादा फ़ैल जाती | सच्चाई यह थी की मौला या उस का कोई चेला वहा  पहले ही धन दबा आता था  , इस पर भी तुर्रा यह की उसने कभी किसी से कुछ स्वीकार नही किया | सुलतान के बड़े बड़े अमीर उसके सामने थैलिया लिए खड़े रहते , उसके धनी व्यापारी शिष्य अपनी  तिजोरिया खोले रहते पर सीदी मौला ने कभी किसी से कुछ भी स्वीकार नही किया |                                     दिल्ली के सुलतान से लेकर साधारण भिखारी तक सभी लोग उसके वैभव और शाही
खर्च पर चकित थे | जनसाधारण का विश्वास था की सीदी को कीमियागिरी ( सोना बनाने की विधा ) का ज्ञान है , वह हर रात अथाह सोना बना लेता है |यह बात सच भी थी | सीदी मौला हर रात लाखो रुपयों का सोना चांदी बना लेता था , लेकिन कीमियागिरी से नही बल्कि ठगी , चोरी और डकैती से , वह सीमाप्रांत का धूर्त  और पक्का ठग था , उसने दिल्ली में अपने पाखंड का ऐसा जाल फैला रखा था की उसकी ठगी , चोरी और धूर्तता का कुछ पता ही नही चलता , वह चोरो और ठगों का गुरु या सरदार था | उसके सभी साथी ठग , चोर डाकू इतने कुशल और घुटे थे की पकड़ में ही नही आते थे | यदि उसके गिरोह में से कभी कोई पकड़ भी लिया जाता तो सीदी मौला अपने प्रभाव से उसे छुडवा लेता  | कयोकी दिल्ली का सबसे बड़ा काजी जलाल काशनी उसका अपना साथी और अव्वल दर्जे का बदमाश था | वह काजी इस गिरोह के फसने वाले आदमियों को कोई न कोई तिकड़म भिडाकर सजा से बचा लेता था |                                           इस तरह सीदी मौला ने अपनी ठगी का ऐसा अटूट जाल फैलाया हुआ था की उसके फकीरी लिबास , पाखंड और सब को मुफ्त भोजन बाटने के ढोंग के पीछे उसके सारे कुकर्म छिपे रहते इस शक्तिशाली गिरोह में केवल चुने और परखे हुए ठग , चोर और डाकू ही भर्ती किये जाते थे | ये लोग चोरी का माल अपने महान गुरु के चरणों में अर्पित कर देते थे | इस गिरोह की एक रात और एक दिन की कमाई एक लाख रूपये से कम न थी |
मौला ठगी और चोरी के माल में से कुछ अंश इन साथियो को बाट देता था और शेष को अपने खजाने में दाल लेता | इस गिरोह ने सारे उत्तर भारत में तहलका मचा रखा था | पाप की सारी कमाई खिंच -- खिंच कर सीदीमौला के पास जमा होने लगी थी |
इन लोगो पर किसी कानून की छाया भी न पड़ती थी धर पकड़ के भय से मुक्त ये लोग निर्भय होकर अपनी '' कला '' का चमत्कार दिखाकर प्रजा को लुटते रहते थे | मौला के आश्रम में दिल्ली के सुलतान की भी एक न चलती  थी | जनसाधारण इस रंगे सियार और मक्कार ठग के असली रूप से परिचित न था | उसकी ख्याति एक सच्चे फकीर के साथ -- साथ महादानी के रूप में फ़ैल रही थी |
यह धूर्त व्यक्ति दिन में साधारण वस्त्र पहने कुरान के पाठ , नमाज , रोजा आदि में लींन  रहता था | लेकिन रात आते ही उसकी जिन्दगी शाही ठाठ बाट आनंद भोग , बिलास सुरा सुंदरी की संगती में बीतती थी | यही उसकी असली जिन्दगी थी | यही उसका असली रूप था , लेकिन इस रूप से उसके कुछ विश्वस्त चेले ही परिचित थे |
भारतीय जनता का सबसे बड़ा दोष है -- उसका अन्धविश्वास , यहाँ का जनसाधारण तर्क से काम न लेकर अंधश्रद्दा व भावना से प्रेरित होकर चलता है , वास्तविकता से आँखे बंद करने के कारण जब तब ठोकर खाकर गिर भी पड़ता है \
ये धूर्त साधू दान दक्षिणा के रूप में इनकी अंधश्रद्दा के बल पर खूब गुलछर्रे उड़ाते है | यहाँ तक की लोग अपने बच्चो को दूध , दही , फल आदि न देकर इन  वैरागी संतो को चढा आते है |
यह घृणित रीति मध्यकाल में और बुरी तरह प्रचलित थी | सीदी मौला की तरह के धूर्त इनके भरोसे खूब मौज करते थे | मौला के पाखंड का अड्डा जमने से कुछ वर्ष पहले की बात है , एक बार जब वह सीमा प्रान्त की ओर से दिल्ली आ रहा था तो अजोधन में अपने समय के प्रसिद्द सूफी संत शेख फरीद के दर्शनों के गया | मौला ने अपना सिर भक्तिभाव से इस महान तपस्वी के चरणों में रख दिया |
उसकी ओर ध्यान से देखते हुए शेख फरीद ने उसे अमूल्य शिक्षा दी  थी , ऐ सीदी , तू उस दिल्ली में जा रहा है जो हिन्दुस्तान के सुल्तानों और अमीरों की राजधानी है , यह नगरी राजनितिक कपटजाल  , उखाड़ पछाड़  , षड्यंत्र और हत्याओं से भरी हुई जगह है | इसमें तू साधना करना चाहता है , तेरी मर्जी , लेकिन एक बात याद रखना , दिल्ली जाकर वह  की आम जनता का दिल जीतना , पर खबरदार यहाँ के शहजादों अमीरों , खानों मलिकों और शाही मुलाजिमो से हेलमेल मत रखना , जहा तक तुझ से हो सके इनके दरवाजे पर मत जाना और इन्हें अपने दरवाजे पर मत फटकने देना | नही तू भारी मुसीबत में पड़ जाएगा , यदि ये लोग तेरे पास आने जाने लगे तो भी इनसे बातचीत हरगिज  मत करना , यदि तू बातचीत भी करे तो राजनितिक मामलो पर तो भूल कर भी चर्चा , इनके साथ किसी षड्यंत्र में हिस्सा मत लेना |
'' एक बात और याद रखना , फकीर तो बस फकीर  ही होता है , उसके लिए सोने चांदी के टुकड़ो पर गिरना शोभा नही देता है , ऐ सीदी , याद रख , जब पास में जरूरत से ज्यादा धन इकट्ठा हो जाता है तो दिमाग में घुन लगा देता है | यदि तूने फकीरी लिबास ओढ़ कर सोना चांदी जमा किया तो तू बर्बाद हो जाएगा , यदि तूने मेरी सीख  मान ली तो तेरी प्रतिष्ठा बढ़ेगी | यदि तूने दिल्ली के राजनितिक दलदल में कदम भी रखा तो उमे फंस कर तडप -- तडप कर मरेगा तेरी हड्डी तक का पता न लगेगा , फकीरों और दरवेशो को राजपाट के इन झंझटो से जहा तक हो सके दूर ही रहना चाहिए | इसी में उनकी शान है , इसी में उनकी इज्जत है |
सीदी मौला ने सूफी संत का उपदेश सूना और उस पर अमल करने का आश्वासन दिया | वह दो तीन दिन शेख फरीद  के आश्रम में रहा | फिर दिल्ली आ पंहुचा | इस माया नगरी के ऐश्वर्य की चकाचौध ने उसे पागल बना दिया | लूट खसोट के दबे संस्कार भड़क उठे और धीरे -- धीरे उसने बड़ी सावधानी से अपना पाखंड जाल पूरी तरह फैला दिया | एक सिद्ध फकीर और महान दानी के रूप में उसकी ख्याति फैलने लगी अर्थात उसके छ्टे हुए चेलो ने फैला दी |
उसके दरवाजे पर बलबनी और खिलजी अमीर हाथ -- बांधे  खड़े रहते थे , जब तक बलबन जीवित रहा तब तक उसके दबदबे , आतंक , कुशल प्रशासन मजबूत जासूस व्यवस्था से सहम कर सीदीमौला ने अपने पंख नही निकाले थे | वह फूंक फूंक कर कदम रखता था , लेकिन बलबन के मरने के बाद दयालु सुलतान जलालुद्दीन के शिथिल शासन में उसने अपना खूब रंग जमाया |
बलबन के दरबारी अमीरों को कभी उसने पचास --  पचास हजार तक चांदी के सिक्के भेट किये थे | पर फिर भी वे अपने सशक्त स्वामी के भय से उसकी ओर आँखे उठा कर भी नही देखते थे | लौह पुरुष बलबन का शासन बड़ा दृढ था | उसने चोर डाकू और ठगों को जड़ से मिटा दिया था | लेकिन यह रंगा सियार सीदी मौला फकीरी वेश के कारण उसकी नजर में चढने से बच गया था | बलबन के मरते ही दुर्बल सुलतानो के समय उसका धंधा खूब चमका | वह अनाप  -- शनाप खर्च करता था | चोर डाकुओ का सबसे बड़ा सरदार ख़ास राजधानी में सुलतान की नाक के नीचे एक दरवेश के वेश में पूजा जाता था | उसके साथी निडर होकर प्रजा को लुटते रहते थे |
जलालुद्दीन के शासन काल ( 1290 -- 96 )
में सीदी मौला की प्रसिद्दी अपनी चरम सीमा तक पहुच चुकी थी | उसके प्रभाव में अत्यधिक वृद्दि हुई | सुलतान का बड़ा पुत्र खानखाना मौला का बहुत बड़ा भक्त और प्रशंसक था | सीदी उसे अपना पुत्र कहा करता था , सुलतान जलालुद्दीन खिलजी के बड़े -- बड़े मलिक और अमीर वहा  आया जाया करते थे | दिल्ली का प्रधान
काजी जलाल काशानी मौला का विश्वस्त साथी था | यह काजी काफी रात गये तक मौला के साथ एकान्त में गुपचुप बाते किया करता था |
सीदी मौला के चेलो द्वारा ठगी , चोरी और डकैती के कारण उसके गुप्त खजाने में सैकड़ो मन सोना चांदी , करोड़ो रूपये और मनो हीरे , मोती जवाहरात  इकठ्ठे हो गये थे | यह खजाना सुलतान के शाही खजाने से टक्कर ले रहा था , धीरे -- धीरे इस अथाह खजाने की गर्मी उसके दिल और दिमाग पर असर करने लगी , उसके मन में दिल्ली का खलीफा बनने का विचार आया , वह अपने वैभव से बगदाद के खलीफा  को भी पछाड़ देना चाहता था | इस महत्वाकाक्षा  की पूर्ति के लिए उसने योजना बनानी आरम्भ कर दी  , उसने अपने विश्वस्त साथियो से विचार  -- विमर्श किया योजना आगे बढने लगी |
जब सुलतान जलालुद्दीन खिलजी ने जून १1290 ई. में दिल्ली के सिहासन को हस्तगत किया और खिलजी वंश की नीव रखी तो बलबन के समय के बहुत से अमीर , मलिक , जागीरदार इस नये राज्य में दरिद्र हो गये थे | नये सुलतान ने उन के सारे इलाके और जागीरे छीन कर अपने विश्वस्त और वफादार साथियो को बाट दी |
अब बलबनी अमीरों के पास कोई इलाका नही बचा था |, वे दर - दर के भिखारी बन गये थे और सीदी मौला के खानगाह से भोजन पाकर किसी तरह अपने दिन काट रहे थे |
सीदी मौला के लिए इन पदच्युत आमिर और मलिकों से बढ़कर अच्छे सहायक और कहा मिल सकते थे , कयोकी अपनी जागीरे छीन जाने से इन के मन में खिलजियो के प्रति घृणा थी और बदला लेने की ताक में थे | वे सहज में ही सुलतान के खिलाफ षड्यंत्र में फंस गये |
दिल्ली का कोतवाल विरजतन और हतिया पायक बलबनी शासन में बहुत बड़े पहलवान माने जाते थे और इन को लाखो जीतल वेतन मिलता था , लेकिन खिलजियो के राज्य में वे दाने -- दाने को मोहताज हो  गये थे | ये लोग सीदी मौला के पास आने -- जाने लगे | पदच्युत अमीर और बहिष्कृत जागीरदार व मलिक तो यहाँ पहले से आते जाते थे | ये लोग और ठिकाना न होने से रात को वही सो जाते थे | सामान्य लोग यही समझते थे की संत के प्रति श्रद्दाभाव वश ये लोग दर्शन करने आते जाते है |
दयालु  सुलतान जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्द अब बड़ी  तेजी से षड्यंत्र शुरू हो गया | सीदी मौला के नेतृत्व में बलबनी मलिक और अमीर , प्रधान काजी जलाल काशानी , दिल्ली का कोतवाल विरजतन  और हतिया पायक जैसे लोग सारी --  सारी  रात बैठकर सुलतान की हत्या करने की योजना बनाने लगे |
बहुत विचार - विमर्श के बाद योजना का अंतिम रूप इस प्रकार स्थिर हुआ ---
जुमे के दिन जब सुलतान खिलजी घोड़े पर सवार होकर निकले तो फसादियो की तरह उस पर हमला करके उसकी हत्या कर दी जाए | और फिर सीदी मौला को राजगद्दी पर बैठा कर दिल्ली व पूरे हिन्दुस्तान का खलीफा घोषित कर दिया जाए | साथ ही दिवगंत सुलतान नासिरुद्दीन की बेटी से उसकी शादी कर दी जाए | काजी जलाल काशानी को '' काजिखान '' की उपाधि देकर मुलतान की सुबेदारी देना निश्चित हुआ | बलबनी
दरबार के दूसरे अमीर  और मलिकों को भी जहा तहा सूबे और इलाके जागीर में देने निश्चित हुए |
इस षड्यंत्र में एक बहुत बकवादी और लालची आदमी भी शामिल था | जब मौला अपने चेलो को हिन्दुस्तान के सूबे बाट रहा था तो इस आदमी को जागीर में अपनी मनपसन्द का इलाका न मिला जिससे वह नाराज हो गया | उसने सुलतान जलालुद्दीन के पास जाकर इस सारे षड्यंत्र का  भंडाफोड़ कर दिया |
सुलतान के कानो में इस आशय की खबरे जासूसों द्वारा पहले पहुच गयी थी की सीदी मौला का निवास स्थान बलबनी दरबार के मलिक और अमीरों का अड्डा बना हुआ है | और कई कुख्यात डाकू वहा आते -- जाते देखे गये है , वह मामले को समझ नही पाया था पर अब सारी बात उसके दिमाग में बैठ गयी |
एक दिन सुलतान जलालुद्दीन स्वंय वेश बदलकर उसके निवास स्थान पर गया वह उसने स्वंय अपनी आँखों से इन षड्यंतकारियों को संदेहजनक स्थिति में घूमते और सीदी मौला से गुपचुप बाते करते देखा था | दूसरे दिन उसने अपने सैनिको  को भेजकर इन सब धूर्तो और षड्यंत्रकारियों के साथ सीदी मौला को कैद कर लिया | मौला की गिरफ्तारी से सारी  दिल्ली में सनसनी फ़ैल गयी , मौला पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया | अगले दिन दरबार में इन सब षड्यंत्रकारियों की पेशी हुई | जब सुलतान ने अपनी हत्या का षड्यंत्र रचने और विद्रोह करने के विषय में पूछा तो उन्होंने इन आरोपों से साफ़ मना कर दिया | उन दिनों मार मारपीट कर अपराध स्वीकृत कराने का कोई कानून न था | इसीलिए सुलतान उससे सत्य न उगलवा सका |
सब कुछ जानते हुए भी वह उन्हें कानून के अनुसार दंड नही दे सका | ये भयंकर षड्यंत्रकारी और राजद्रोही किसी प्रबल प्रमाण के अभाव में यो ही बेदाग छूटे जा रहे थे |
सुलतान बड़े चक्कर में पड़ गया , वह चाह कर भी इन दुष्टों को कोई दंड नही दे पा रहा था  उसे परेशान देखकर कुछ वजीरो ने कहा , '' यदि ये व्यक्ति सचमुच निर्दोष है तो इनकी अग्नि परीक्षा ली जाए ''|
सुलतान को यह सुझाव बहुत पसंद आया , सीदी मौला तथा दूसरे धूर्तो की अग्नि परीक्षा के लिए अगले दिन प्रात: काल  का समय निश्चित हुआ |
दिल्ली में यदि सबसे सरल कोई काम है तो भीड़ इकठ्ठा करना | यदि कोई चूहा ही कुचल कर मर जाए या कोई यो ही मौज में आकर चीख पड़े तो एक मिनट में सौ दो सौ आदमी उसके आसपास इकठ्ठे हो जायेगे | फिर यदि किसी साधू -- सन्यासी की करामात की बात हो तो कहना ही क्या लाखो लोग तमाशा देखने के लिए टूट पड़ेगे |
दिल्ली की तरह भारत के अन्य नगरो में भी  यह मनोवृति देखने को मिलती है | मजमा लगाने वाले इसी भीड़ की बदौलत पेट पालते रहे है | सीदी मौला के मित्र और शत्रु सभी उसकी अग्नि परीक्षा का द्रश्य देखने के लिए आतुर हो उठे , कुछ लोग कहते थे की '' आग मौला का कुछ नही बिगाड़ सकती , दूसरे कहते थे जरा सुबह
होने दीजिये देखते है क्या होता है |
अग्नि परीक्षा का मसाचार आंधी की तरह दिल्ली तथा आसपास के इलाको में फ़ैल गया , हजारो लोग इस दुर्लभ दृश्य को देखने के लिए भारपुर के मैदान की ओर उमड़ पड़े , जहा बहुत बड़ा अलाव जलाया जा रहा था , मैदान में एक ओर शाही शामियाना लगाया गया , सुलतान , उसके खान , मलिक , अमीर तथा दूसरे दरबारियों के लिए उपयुक्त स्थान बनाये गये |
सुलतान यथा समय अपने दरबारियों के साथ मैदान में पंहुचा , लाखो लोग उत्सुकता से इस दृश्य को देखने के लिए जमा हो गये थे | सेना का पूरा प्रबन्ध वातावरण में सन्नाटा और बेचैनी थी | बहुत बड़े अलाव से आग की लपटे निकल रही थी  कोयले दहक रहे थे , सीदी मौला और उसके चेले जंजीरों से जकड़े हुए एक ओर खड़े धडकते दिल से आग के शोलो की ओर देख रहे थे , सुलतान ने अपराधियों की सच्चाई परखने के लिए
उन्हें आग में डालने के सम्बन्ध में वह बैठे हुए आलिमो , उलेमाओं से फतवा माँगा |  अब अग्नि परीक्षा के लिए फतवा देने के सम्बन्ध में आलिमो में विचार विमर्श हुआ और सभी ने सर्वसम्मति से सुलतान को अपना यह निर्णय दिया , '' अग्नि परीक्षा शरा ( मुस्लिम कानून ) के विरुद्द है , अग्नि का गुण जलाना है और जिस प्रदार्थ का गुण जलाना हो , उसके द्वारा झूठ और सच की पहचान नही हो सकती है , फिर इतने लोगो के षड्यंत्र का हाल केवल एक व्यक्ति जानता है , इतने बड़े अपराध में केवल एक व्यक्ति की गवाही शरा की दृष्टि में विशेष महत्व नही रखती है '' |
आलिमो के इस निर्णय को सुलतान ने स्वीकार कर लिया , उसने अग्नि परीक्षा का विचार त्याग दिया | इस षड्यंत्र के नेता काजी काशानी का तबादला बदायु में कर दिया बलबनी खानजादो और मलिकजादो को खोज खोज कर देश के दूर दूर के हिस्सों में इधर -- उधर भिजवा दिया | सुलतान की हत्या के लिए नियुक्त कोतवाल विरजतन और हतियापायक को कठोर दंड दिया , इन सब दुष्टों को दिल्ली से दूर भेजकर सुलतान ने उनके नेता महा धूर्त सीदी मौला की ओर ध्यान दिया  |सुलतान जलालुद्दीन ने कुपित दृष्टि से इस धूर्त की और देखा |जो अब तक संत के रूप में उत्तर भारत के लाखो लोगो की श्रद्दा का पात्र बन बैठा था | लेकिन खास दिल्ली में डेरा जमाकर हिन्दुस्तान के सुलतान की हत्या करके स्वंय दिल्ली का खलीफा बनने का सपना देख रहा था | सुलतान ने इस पाखंडी को खूब आड़े हाथो लिया और अंत में दुखी होकर अपने पास बैठे अबुबकर सूफी हैदरी तथा उसके साथियो की ओर देखकर बोला "" ऐ दरवेशो , मेरा और इस मौला का न्याय कर दो ''
अबुबकर हैदरी स्वतंत्र और उग्र विचारों का सूफी था और उसके सब साथी भी ऐसे ही थे | सुलतान की बात सुनकर हैदरी का एक शिष्य बहरी बड़ी निडरता से आगे बढ़ा और मौला के पास पंहुचकर उस्तरे था सुए से उसके शरीर को छेद -- छेद कर छलनी कर दिया |
मौला दर्द के मारे तड़प गया , वह बुरी तरह तड़प रहा था पर उस के प्राण नही निकल रहे थे | यह देखकर सुलतान के पुत्र और अमीर अरकलीखान ने अपने महावत को इशारा किया , महावत हाथी को लेकर आगे बढ़ा , महावत का संकेत पाकर उस सधे हुए जंगी हाथी ने खून से लथपथ बुरी तरह घायल मौला को अपनी सूड में उठा लिया , उसे एक बार उपर हवा में  में उछाला , जब वह अधमरा देह नीचे गिरा तो हाथी ने अपने भारी  भरकम पैर  उस पर टिका दिया और फिर उसे बुरी तरह रौद डाला | सबके सब देखते देखते मौला की हड्डिया चकनाचूर हो गयी , मांस के चीथड़े चीथड़े उड़ गये | धरती खून से रंग गयी , दिल्ली का खलीफा  बनने के उसके सपने मिटटी में मिल गये | उस दिन सांयकाल दिल्ली में कालीपीली  आंधी आई , उत्तर भारत में गर्मियों के
मौसम में ऐसी काली पीली आंधिया प्राय: आती ही रहती है | लेकिन मौला के चेलो ने सुलतान को  बदनाम करने के लिए यह बात फैलानी शुरू कर दी कि मौला की हत्या के कारण यह आंधी आई है |
इस वर्ष पूरी बरसात न होने से अकाल की स्थिति पैदा हो गयी थी , लेकिन दयालु सुलतान ने सरकारी अन्न गोदामों के दरवाजे खोल दिए थे |सुलतान ने सरकारी अन्न गोदामों के दरवाजे खोल दी थे कुटिल लोगो ने इस अकाल की स्थिति को सीदी मौला की हत्या के साथ जोड़कर सुलतान की स्थिति कमजोर करने की कोशिश की लेकिन सुलतान की उदारता , दया और करुणा के सामने सब के मुंह बंद हो गये | सारे राज्य में सुलतान और उसके अमीरों की ओर से स्थान -- स्थान पर भोजनालय खोल दिए गये जहा अकाल पीड़ित निर्धनों को मुफ्त भोजन दिया जाताथा | अगले वर्ष खूब अच्छी वर्षा हुई , इतनी अधिक फसल की संभाले न संभली , लोग अकाल और सीदी मौला की मौत को भूल गये |
-सुनील दत्ता
 स्वतंत्र पत्रकार व विचारक                 
-   आभार स . विश्वनाथ

शनिवार, 15 जून 2013

बलबन शासन का अंत


रजिया बेगम के बाद दिल्ली की राजगद्दी पर बलबन का आधिपत्य हुआ |



पिता और पुत्र

सुलतान बलबन ने भारी संघर्ष और रक्तपात के बाद सत्ता संभाली थी , अपने राज्य को स्थिरता प्रदान करने के लिए उस ने जहा अनेक सुधार किये वह अपने दरबार की ओर भी ध्यान दिया |
बलबन जानता था कि दरबार का प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के मन पर अवश्य पड़ता है , इसीलिए उसने सबसे पहले अपने दरबार की शानशौकत , साज सज्जा और वैभव में वृद्धि की और इसके बाद दरबार के कई तौर तरीके निश्चित किये जिन का पालन सभी के लिए अनिवार्य था |
बलबन अनुशासन का इतना पक्का था कि कोई भी अमीर उसके दरबार में हँसने , जोर से बोलने या बैठने की हिम्मत नही कर सकता था , देखने वालो पर उसके आलीशान दरबार का रौब पड़े बिना नही रहता था | उस समय के यात्रियों और इतिहासकारों ने बलवान के दरबार की बहुत प्रशंसा की है |
सुलतान गियासुद्दीन बलबन ने अपने अस्सी वर्ष के लम्बे जीवन में न जाने कितने संघर्ष और उतार -- चढाव देखे थे , वह एक साधारण गुलाम से अमीर , अमीर से मलिक , मलिक से खान और खान से सुलतान बना था | उसका सारा जीवन संघर्षो से जूझते हुए बीता था |
इन्ही संघर्षो ने उसे लौह पुरुष बना दिया था , उसके सुदृढ़ शासन में आम जनता बहुत सुखी और सम्पन्न थी , अब सुलतान बलबन अस्सी वर्ष से उपर का हो गया था और प्राय: अस्वस्थ रहने लगा था , इसी बीच उस पर ऐसा वज्रपात हुआ जिस से बलबन जैसा लौह पुरुष भी टूट गया | |
तेरहवी शताब्दी के उत्तरार्ध में चंगेज खान के रूप में भयानक खूनी मंगोल योद्धा मध्य एशिया से निकल कर चारो ओर मारकाट मचाने लगा | इस ने कुछ ही समय में चीन , रूस , इरान , तुर्की तथा पश्चिम एशिया के देशो को रौद डाला | चंगेज खान भ्रष्ट बौद्ध था | उसने तथा उसके पुत्र हलाकू ने एशिया और यूरोप में लाशो के अम्बार लगा दिए थे , सौभाग्य से यह भयंकर दैत्य भारत में घुस कर पश्चिम की ओर मुड गया , लेकिन उसका एक सेनापति समर खान भारतीय सीमा क्षेत्र में भी आ धमका , जिससे इस देश में बहुत आतंक फ़ैल गया |
सन 1285 ई . में चंगेज खान की मंगोल सेना ने हिन्दुस्तान पर हमला कर दिया |

प्रसिद्ध इतिहासकार बरनी के शब्दों में '' हमलावर समर खान चंगेज खान के कुत्तो में सबसे बहादुर कुत्ता था " |
सुलतान बलबन के बड़े पुत्र युवराज खानेमुल्तान ने इन खुनी हमलावरों का मुकाबला किया | वह बड़ा ही योग्य , नीति कुशल और शूरवीर था | सुलतान ने इसे ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था , मुलतान , लाहौर और दीपालुपुर के सूबे उसके अधीन थे | शहजादा खाने मुलतान ने बड़ी बहादुरी से हमलावर मंगोलों का सामना किया और लड़ते -- लड़ते युद्ध भूमि में ही शहीद हो गया , इस युद्ध में उसके बहुत से अमीर भी मारे गये | बहुत से लोग कैदी बना लिए गये , प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो इसी लड़ाई में कैद किया गया था |
अस्सी वर्ष के वृद्ध सुलतान बलबन के लिए यह आघात असह्य सिद्ध हुआ | बीमार तो वह पहले से चला आ रहा था , युवराज की मृत्यु से तो वह बिलकुल ही टूट गया , यो राजकाज चलाने के लिए वह अब भी दरबार में आता था और दुःख को सीने में दबा कर सारे काम निपटाता था | पर रात को यह बुढा सुलतान बच्चो की तरह फूट फूट कर रोता , पागलो की तरह अपने सिर और दाढ़ी के बालो को नोचता और कपडे फाड़ डालता | उसकी दशा दिन -- प्रतिदिन बिगडती ही जा रही थी | उसने शहीद शहजादे के नाबालिग पुत्र कैखुसरु को अपने पिता के सुबो की जागीर दे दी | उसे अपना भविष्य अंधकारमय ही दिखाई पड़ता था |
सुलतान बलवान का दूसरा पुत्र बुगराखान लखनौती ( बंगाल ) की सुबेदारी पर नियुक्त था , सुलतान ने उसे दिल्ली बुला लिया और बड़े दर्द के साथ कहा '' बेटा मेरी मौत तो उसी दिन हो गयी थी जिस दिन तुम्हारा बड़ा भाई शहजादा खाने मुलतान चंगेज खान के कुत्तो द्वारा शहीद हो गया | अब तो मैं किसी तरह अपने बूढ़े शरीर को ढोता हुआ दिन पूरे कर रहा हूँ , मेरे बेटे , राज्य करना बच्चो का खेल नही है | मैं बहुत बुढा और बीमार आदमी हूँ , दो चार दिन का मेहमान हूँ , मेरे दोनों पुत्र कैखुसरु और कैकुबाद नाबालिग होने से राज्य संभालने योग्य नही है , तुम हर तरह से सुयोग्य हो , जवान हो इसीलिए अब तुम लखनौती का मोह छोड़ कर मेरे पास दिल्ली में ही रहो और साम्राज्य की बागडोर संभालो जिससे मैं शान्ति पूर्वक मर सकू '' |
बुगरा खान , भीरु , आलसी और मनमौजी प्रकृति का व्यक्ति था , राजनीति के झंझटो में पढ़ना , समस्याओं का दृढ़ता से सामना करना , उसके वश की बात नही थी | वह लखनौती के छोटे से सूबे को पाकर बहुत संतुष्ट और प्रसन्न था | जब एक सूबे की जागीरदारी से ही खूब आराम , भोगविलास , सुख और चैन प्राप्त हो सकता है तो फिर दिल्ली की राजगद्दी पर बैठकर काटो का ताज क्यों पहने ? अपने आनद से भरपूर जीवन में चिंता का विष क्यों घोले ?
वह जातना था कि दिल्ली की राजगद्दी पर बैठकर सुख चैन से जीवन बिताना असम्भव है | अत: उसने उपरी मन से अपने पिता से ' हाँ ' , कह दिया और तीन महीने तक दिल्ली में रहकर साम्राज्य का शासन प्रबंध व राजकाज देखता रहा | दिल्ली में रहकर इस विशाल साम्राज्य के संचालन से वह थक जाता और शीघ्र उकता जाता था , उसका मन जैसे तैसे इस जंजाल से निकल भागने को करता , लेकिन सुलतान की बीमारी से वह मजबूर था |

अपने पुत्र बुगराखान को दरबार में राजकाज करते देख कर बलबन को बड़ा संतोष हुआ , उस के दिल और दिमाग से चिंता का बोझ हट गया और धीरे -- धीरे उसके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा |
बुगराखान का मन तो दिल्ली से निकल भागने के लिए छटपटा रहा था , अब बूढ़े सुलतान को स्वस्थ्य होते देख कर वह और अधिक न रुका तथा लखनौती के लिए रवाना हो गया , उसने अपने वृद्ध और रोगी पिता से आज्ञा लेने की आवश्यकता भी न समझी |
सुलतान और उस के नेतृत्व को यो मझधार में छोड़ कर बुगराखान के भागने से बलबन को बहुत धक्का लगा , उसकी हालत फिर बिगड़ गयी | उसके साथ शहीद शहजादे का पुत्र कैखुसरु तथा बुगराखान का पुत्र कौकुबाद था |
वृद्ध और मरणासन्न सुलतान बलबन अपने इन दोनों पुत्रो का मुंह देख देख कर अपने दुखी मन को बहलाया करता था | पर उसके विशाल हिन्द साम्राज्य का भार ये कोमल सुकुमार कैसे उठा सकते थे ? बाहर से साम्राज्य को चंगेज खान के खूनी भेडियो जैसे मंगोलों का बड़ा भय था जिन्होंने एशिया के देशो को रौदकर श्मशान बना दिया था | साम्राज्य के भीतर सत्ता के भूखे , लालची और कृतघ्न अमीरों की भी कमी न थी , '' कही ये कृतघ्न अमीर उसके नाबालिग बच्चो को ही कत्ल न कर डाले ? सोचते -- छोटे बलबन का मन हाहाकार कर उठता |
अपनी मृत्यु को बहुत निकट जानकार बलबन ने अपने अत्यंत विश्वास पात्र साथी महल में बुलवाए , इन में दिल्ली का कोतवाल वजीर हुसैन बसरी तथा दूसरे कई अमीर थे |
मरणासन्न सुलतान ने कापती आवाज में उनसे कहा , '' आप सब लोग मेरे अत्यंत विश्वास पात्र है , आप शासन व्यवस्था और प्रशासन के काम काजो को चलाने का दंग जानते है , मेरी मृत्यु बहुत निकट आ गयी है , मेरी इच्छा है कि मेरी मृत्यु के बाद शहजादे खाने मुलतान के पुत्र कैखुसरु को राजगद्दी पर बैठाए | अभी वह बालक है , लेकिन मैं क्या करू ? मेरा पुत्र बुगराखान को राजगद्दी से जी चुराकर अपनी मर्जी से निकल भागा है | अब मुझे आप लोगो का ही भरोसा है , आप लोग मेरे पुत्र की रक्षा करे और उसे अपना सुलतान माने '' |
सभी उपस्थित अमीरों ने सुलतान को अपनी वफादारी और स्वामिभक्ति का पूरा पूरा विश्वास दिलाया | इसके तीन दिन बाद सुलतान बलबन की मृत्यु हो गयी | कुशके लाल ( लाल महल ) से रात के समय उसका शव निकाला गया और उसे बाहर ले जाकर दफना दिया गया | सुलतान की अंतिम इच्छा के विरुद्ध खाने मुलतान के पुत्र कैखुसरु को राजगद्दी से वंचित करके उसे मुलतान भेज दिया , कयोकि ये लोग किसी विशेष कारण से शहीद शहजादे खाने मुलतान से नाराज थे , इन विश्वासघाती अमीरों ने बुगराखान के पुत्र कैकुबाद को सुलतान मुइजुद्दीन की पदवी से विभूषित करके दिल्ली के गद्दी पर बैठा दिया | कैकुबाद को सन 1286 में राजगद्दी मिली , सुलतान बनते समय उसकी अवस्था 18 वर्ष थी |
नवयुवक सुलतान कैकुबाद में कई गुण थे , वह बड़ा सुन्दर शांत स्वभाव वाला और दयालु प्रकृति का नवयुवक था , लेकिन उसके सारे गुणों को एक दुर्गुण ने दबा कर नष्ट कर दिया , वह दुर्गुण था भोगविलास में आसक्ति , बचपन से लेकर अब तक वह अपने प्रतापी दादा बलबन के कठोर अनुशासन में रहा था |
सुलतान बलबन के डर से उस के अध्यापक कैकुबाद पर कड़ी दृष्टि रखते थे | रात -- दिन लगातार उसकी गतिविधियों पर अध्यापको की सतर्क दृष्टि रहती थी , अध्यापको ने उसे विनम्र भाषण , पुरुषोचित व्यायाम था दूसरी विद्याये सिखाई थी , शहजादे पर सुरा और सुंदरी की परछाई तक नहो पड़ने दी जाती थी |
जब नवयुवक कैकुबाद ऐसे कठोर अनुशासन से निकल कर एकाएक समर्थ स्वतंत्र व शक्तिशाली सुलतान बन गया तो उस की अतृप्त वासनाए सयम का बाँध तोड़कर फूट पड़ी , उसने अब तक सीखे हुए सारे गुण , व्यायाम , कला , विद्या , हुनर , सयम सभी को एक ओर उठाकर रख दिया और रात दिन शराब पी कर सुन्दरियों की संगती में लीं रहने लगा |
अब उसे युवतियों के गोर चाँद से मुख ही प्यारे लगते और दाढ़ी मुछो वाले पुरुषो की सूरत तक से नफरत होती | वह महीनों ऐशगाह से बाहर न निकलता , शेष खान अमीर मलिक तथा दुसरे राज्य अधिकारियों ने भी सुल्तान की नकल की और रागरंग में डूब गये , बलबन का सुदृढ़ और सुसंगठित शासनतंत्र ढीला होकर चरमराने लगा |

इस मनमौजी सुलतान का मन दिल्ली से ऊब गया , यहाँ भीड़ -- भाड़ , छोटे -- बड़े मकानों और टेडी - मेढ़ी गलियों के भूलभुलैया को देखकर उस का मन कुढ़ जाता | उस की समझ में यह बात बैठती ही नही थी कि जितने लोग है , ये भी क्यों नही कच्चे मकानों की जगह महलो में रहना शुरू कर देते | ये दिल्ली वासी सुलतान और उसके अमीरों की तरह क्यों नही अच्छा पहनते और खाते ? सुलतान का दिल करता कि इन '' असभ्य '' लोगो के झोपड़ो में आग लगा दे , उसे इन '' जाहिलो और जंगली '' लोगो के बीच रहना भी मंजूर न था |
इसीलिए उसने दिल्ली छोड़कर अन्यत्र अपनी राजधानी बसाने का निश्चय किया इसके लिए पास ही किलोखड़ी में यमुना किनारे सुन्दर रमणीक स्थान चुना गया | जहा बादशाह के लिए आलीशान महल , ऐशगाह और बाग़ -- बगीचे हो | जहा उसके अमीरों के लिए भी आसमान को छूने वाली हवेलियों की कतारे हो , महलो और हवेलियों के सिवा और कुछ भी न हो |
सुलतान यह भूल गया कि उस के साम्राज्य में 95% व्यक्ति ऐसे ही है जो उसकी नई दिल्ली ( किलोखड़ी ) में रहने योग्य नही है | उसकी नई राजधानी को महल , हवेली , बाग़ - बगीचों से सजाने वाले यही वे '' जाहिल '' थे | जिन्हें इस सुन्दर नगरी में रहने की आज्ञा न थी | यदि वे न होते तो कौन अपना खून पसीना बहाकर इस आलीशान नगरी को बनाता ? यदि वे न होते तो कौन अपना पसीना बहाकर उसके लिए साम्राज्य स्थापित करता ? लेकिन उस घोर सामन्तवादी युग में ऐसी बाते सोचने की बुद्धि ही किस में थी ?
नवयुवक सुलतान ने दिल्ली के लाल महल को छोड़कर किलोखड़ी शहर के बीच यमुना तट पर ( जो अब दिल्ली का एक छोटा सा गाँव है ) अपने लिए सुन्दर -- सुन्दर रंगमहल और ऐशगाह बनवाये जिन में विषय , भोग , ऐश आराम और सुख के हजारो साधन मौजूद थे | यही यमुना किनारे उसने एक सुन्दर बाग़ लगवाया | सुलतान की देखादेखी उसके दूसरे अमीरों ने भी यहाँ अपने अपने महल बनवाये , धीरे -- धीरे दिल्ली की रौनक खीच कर किलोखड़ी में पहुच गयी | यहाँ आकर सचमुच सुलतान के साम्राज्य की कील उखड़ गयी | जिससे सारी की सारी दिल्ली सल्तनत डगमगा उठी और इससे पैदा होने वाले तूफ़ान में स्वंय सुलतान कैकुबाद सूखे पत्ते की तरह उड़ गया , कौन था उसके तख्त की कीले उखाड़ने वाला ?

वह व्यक्ति था --- मलिक निजामुद्दीन ? यह दिल्ली के कोतवाल मलिक कुल उमरा का भतीजा था , सुलतान ने इस धूर्त व्यक्ति के स्वभाव को परखे बिना ही उसे राज्य का सर्वेसर्वा बना दिया | पहले इसे दादबक ( महान्यायवादी ) और बाद में नायब ए मुल्क ( साम्राज्य का उपप्रधान ) बना दिया , साम्राज्य उसी के हाथो में थी |
सुलतान को तो सुरा और सुंदरी के उपभोग से ही समय नही मिलता था , विषय भोगो के अत्यंत सेवन से उसका योवन पुष्प खिलने से पहले ही कुम्हला गया | दिन पर दिन उसका स्वास्थ्य गिरने लगा | शरीर दुर्बल होकर पिला पद गया | लेकिन इसकी विषय लिप्सा में किसी प्रकार की कमी नही होने पाई |
मलिक निजामुद्दीन उन व्यक्तियों में से था , जिनके विषय में कहा जा सकता है कि वे जिस थाली में खाते है , उसी में छेद करते है | राज्य की बागडोर अपने हाथो में आते ही उसने अपने विरोधियो को रास्ते से हटाना शरू कर दिया , उसने सोचा , '' बूढ़े सुलतान बलबन ने 60 वर्षो तक दिल्ली साम्राज्य की देखभाल करके इसकी जड़े बहुत गहरी जमा दी थी | लोग उसके फौलादी शासन में विद्रोह न कर सके | उसके मरने से साम्राज्य में शक्ति शुन्यता आ गयी है | युवराज खाने सुलतान मर चुका है | बुगराखान लखनौती को लेकर ही मगन है | सुलतान कैकुबाद विश्यास्क्त्त होकर दीन दुनिया से बेखबर है | ऐसी दशा में मैं यदि शहजादे खानेमुलतान
के पुत्र कैखुसरु को मार डालू तो यह राज्य मेरी गोदी में पके हुए आम की तरह आ टपकेगा |

मन में इस प्रकार की दुर्भावना जमा कर इस विश्वासघाती कृतघ्न मलिक ने समय पाकर अनाडी सुलतान कैकुबाद से कहा , '' आपके दादा बलबन ने मरते वक्त कैखुसरु को सुलतान नियुक्त किया था लेकिन हमने चतुराई से आप को ही सुलतान बनाना उचित समझा | कैखुसरु आपके हिन्द साम्राज्य का हिस्सेदार है , वह कितने ही मलिक और अमीरों से मिलकर आपको मारने का षड्यंत्र रच रहा है जिससे आपका पूरा साम्राज्य ही उसका हो सके | विषयों में अंधे बने सुलतान ने सच्चाई जाने बिना ही कैखुसरु की हत्या करने के फरमान पर अपने हस्ताक्षर कर दिए | इसके बाद मलिक निजामुद्दीन ने कैखुसरु को दिल्ली आने का फरमान भेजा जब अभागा शहजादा मुलतानस से रोहतक पहुंचा तो मलिक के भेजे हुए हत्यारों ने उसे कत्ल कर दिया |
इस हत्या से दिल्ली ही नही सारे साम्राज्य में हलचल मच गयी | मलिक निजामुद्दीन का हौसला और बढ़ा , वह किसी बात पर सुलतान के एक वजीर ख्वाजा खतीर से नाराज हो गया | इस पर उसने वजीर को गधे पर चढा कर सारी दिल्ली और किलोखड़ी के बाजारों में घुमाया |
वजीर के इस घोर अपमान से राजधानी में आतंक छा गया | अब उसकी दृष्टि नये मुसलमानों पर पड़ी , वस्तुत: ये मंगोल थे जो बलबन के समय इस्लाम धर्म स्वीकार कर यही राजधानी में बस गये थे | इन नये मुसलमानों में बहुत एकता थी | और इनका एक बहुत शक्तिशाली गुट था | मलिक ने इन्हें अपनी योजना की पूर्ति में बाधक जानकार उखाड़ फेकने का निश्चय किया |
एक दिन नशे में मदहोश सुलतान से इनकी चुगली करते हुए कहा कि ये सुलतान के खिलाफ साजिश कर रहे है , इसी नशे की हालत में उसने इनकी हत्या करने के फरमान पर दस्तखत करा लिया और अचानक ही एक बहुत बड़ी सेना के सहायता से इन नये मुसलमानों की बस्ती को घेर लिया और सब को स्त्री बच्चो समेत कैद कर लिया | इन सभी कैदियों को पकड़कर निर्दयी मलिक यमुना किनारे ले गया और वह इन सब को क़त्ल कर डाला , यहाँ तक कि स्त्रियों और बच्चो को भी मार डाला हजारो मुसलमानों और उनके स्त्री बच्चो की इस सामूहिक हत्या से सारी दिल्ली में आतंक फ़ैल गया |
इस जघन्य हत्याकांड के बाद मलिक ने इन अभागो की सुनी बस्ती को लुट लिया और उसमे आग लगा दी | इसके नबाद उसने मुलतानके अमीर शेख और बरन के जागीरदार मलिक तुजकी
को मरवा डाला | ये दोनों ही बलबन के बड़े प्रसिद्ध और शक्तिशाली मलिक थे |

सुलतान कैकुबाद राजनीति और प्रशासन की कला में बिलकुल कोरा था , विषय लिप्सा ने उस के शरीर और मन बहुत दुर्बल बना दिया | मलिक निजुआमुद्दीन का उस के उपर बहुत प्रभाव था |यदि उसका कोई स्वामिभक्त अमीर मलिक निजामुद्दीन के अत्याचार और आतंक के विषय में सुलतान से कुछ कहता तो वह मूर्खतावश सारी बाते मलिक से कह देता कि अमुक आदमी तुम्हारे विषय में यह कह रहा था अथवा कभी -- कभी तो वह इन शुभचिंतक सेवको को सीधा यह कहकर मलिक के हवाले कर देता , '' ये लोग हमारे -- तुम्हारे बेच फूट डालना चाहते है ; '' |
मलिक निजामुद्दीन इन लोगो को तडपा - तडपा कर मार देता , नतीजा यह हुआ कि सुलतान से सच्ची बात कहने का किसी में साहस न रहा | मलिक का हौसला और बढ़ गया |
मलिक निजामुद्दीन का सुलतान के साम्राज्य व शासन प्रबंध में ही नही अपितु ख़ास रंगमहलो तक में भारी दबदबा था | मलिक की बेगम नवयुवक सुलतान की '' धर्ममाता '' बनी हुई थी ||
सुलतान के हरम का संचालन इसी कर्कशा और खूसट औरत के हाथ में था |
कामुक सुलतान इस कुटिल दम्पत्ति के हाथो की कठपुतली बन गया | मलिक के इस प्रभाव को देखकर बहुत से अमीर अपने प्राण बचाने अथवा अधिक लाभ पाने की आशा में उसके झंडे के नीचे आ गये | इस तरह उसकी शक्ति और भी बढ़ गयी | शक्ति बढ़ने के साथ उसका दिमाग भी सातवे आसमान पर रहने लगा |
एक दिन मलिक के चाचा एवं ससुर मलिक कुल उमरा फकरुद्दीन ने , जो दिल्ली के कोतवाल थे | उसे एकांत में समझाया , '' बेटा , मैंने और तेरे पिता ने अस्सी वर्ष तक दिल्ली की कोतवाली की है | हम लोग कभी राजनितिक हथकंडो में नही पड़े | इसीलिए अब तक सुरक्षित रहे | तुम भी इन राजनितिक कुचक्रो षडयंत्रो , हत्याओं , लूटमार और उखाड़ पछाड़ से दूर रहो , इसी में तुम्हारा कल्याण है | यदि तुमने राजगद्दी के लोभ से विषयान्ध दुर्बल सुल्तान को मार भी दिया तो उसके अमीर तो तुम्हारी जान के ग्राहक हो ही जायेंगे | मरने के बाद भी इस पाप का जबाब खुदा को देना होगा |
बूढ़े और अनुभवी कोतवाल की इस शिक्षा का मलिक पर कोई असर नही हुआ | वह उसी खोटी चल पर चलता रहा |
मलिक निजामुद्दीन के आतंक , अत्याचार , और सुलतान के विषय भोगो में लिपटे रहने की कहानिया सारे देश में फ़ैल चुकी थी | सुलतान कैकुबाद का पिता बुगराखान लखनौती का सूबेदार था | बलबन की मृत्यु के बाद उसने स्वंय को स्वतंत्र सुलतान घोषित कर के फतवा पढवाया था | जब से उसके कानो में दिल्ली की ये घटनाए पहुची तो वह अपने पुत्र की प्राण रक्षा के लिए चिंतित हो उठा | पिता और पुत्र के बीच संदेशो और भेटो का आदान प्रदान चलता रहता था | उसने बार बार अपने बेटे को शिक्षाए लिख कर भेजी कि वह विषय भोगो में न फंस कर अपने राज्य की देखभाल में मन लगाये , लेकिन सुल्तान पर इन उपदेशो का असर नही हुआ |
पत्रों से कोई प्रभाव न पड़ता देखकर बुगराखान ने अब स्वंय अपने पुत्र से मिलने का विचार किया और इस आशय का एक पत्र दिल्ली भेजा | जिसे पढ़कर सुलतान का सोया हुआ पितृ प्रेम
जाग उठा | और वह अपने पिता से मिलने को उत्सुक हो उठा | दिल्ली और लखनौती के बीच कई सन्देश और पत्रों का आदान प्रदान होने के बाद यह तय हुआ कि पिता और पुत्र अवध में सरयू नदी के तट पर मिलेंगे |
सुलतान ने प्रसन्न मन से अवध यात्रा की तैयारी करने का आदेश दिया | सुलतान के उत्साह और धूमधाम से यात्रा की तैयारी ने मलिक निजामुद्दीन के कण खड़े कर दिए | उसने सोचा , '' कही ऐसा न हो कि बुगराखान अपने पुत्र को उसके विरुद्ध भडका दे , '' उसने पहले तो सुलतान को जाने से रोकना चाहा पर जब सुलतान के हठ के आगे उसकी एक न चली तो उसे सेना साथ ले जाने की सलाह दी | कैकुबाद ने यह सलाह मान ली | दिल्ली का सुल्तान अपने पिता से मिलने के लिए जल्दी से जल्दी पड़ाव पर पड़ाव डालता हुआ सरयू नदी के किनारे जा पहुचा |

बुगराखान कोजब अपने पुत्र सुलतान के सेना सहित आगमन का पता चला तो वह समझ गया कि दुष्ट मलिक ने उसके बेटे को उलटी -- पट्टी पढाई है | फिर भी मिलने की तैयारिया की | उसने जंगी हाथी , सवार तथा फौजे सजा कर धूमधाम से सरयू के पूर्वी तट पर डेरा डाल दिया | पिता और पुत्र की छावनिया सरयू नदी के किनारे आमने -- सामने पड़ गयी | दो तीन दिन तक संदेशो का आदान -- प्रदान चलता रहा | अन्त में निश्चय हुआ कि बुगराखान नदी पार करके अपने पुत्र के दरबार में कदमबोसी के लिए आयेगा |
जब दिल्ली के अमीरों का यह सन्देश बुगराखान को मिला तो उसने कहा , '' भले ही कैकुबाद मेरा बेटा है , फिर भी वह दिल्ली का सुलतान है | मैं पिता होते हुए भी उसका छोटा सा सूबेदार हूँ | मैं दिल्ली सुलतान के कदम चूमने दरबार में अवश्य जाउंगा इसी में दिल्ली के सुलतान और सल्तनत की इज्जत है | मैं इस इज्जत को कायम रखूंगा | दूसरे दिन सुलतान कैकुबाद की छावनी में दरबार सजाया गया , पिता और पुत्र के ऐतिहासिक मिलन की इस घटना को अमर बनाने के लिए दरबार की शानशौकत और साज सजावट खूब तडक भड़क के साथ हुई | दिल्ली का नवयुवक सुलतान कैकुबाद अपने खान मलिक , अमीर और दूसरे अधिकारियों सहित शाही गौरव के साथ दरबार में राजगद्दी पर बैठा था | थोड़ी देर बाद उसका पिता बुगराखान अपने चुने हुए अमीरों के साथ सुलतान के आगे कदमो में अपना सिर झुकाने आया | उसने दरबार में घुसते ही ऊँचे मंच के उपर रत्नजटित राज सिहासन पर अपने भाग्यशाली पुत्र को बैठे देखा तो उस का हृदय आनंद से खिल गया | उसने पिता पुत्र के सम्बन्ध को भुलाकर दिल्ली सुलतान के सामने धरती पर तीन बार अपना माथा रगडा और फिर सिहासन की ओर बढ़ा | सुलतान कैकुबाद पत्थर के एक बुत की तरह अपलक नेत्रों से इस सारे कार्यक्रम को देख रहा था | उसका वृद्ध पिता उसके सामने धरती पर माथा रगड़ रहा था | वह अब और अधिक न सारे चिन्ह एक ओर हटा दिए और सिहासन से उठ खड़ा हुआ , वह एक क्षण के लिए झिझका और फिर '' अब्बाजान '' कहता हुआ दौड़ कर उसकी छाती से जा लगा |
पिता और पुत्र दोनों के इस मिलन को देखकर उस समय बड़े -- बड़े पत्थर दिल वाले सभी अमीर तुर्क रो पड़े | सारे दरबार में भावुकता का दौर बह चला | जिसे देखो वही आँसू भा रहा था |
कुछ समय बाद पिता और पुत्र ने धैर्य धारण किया | सुलतान कैकुबाद सादर अपने पिता को राज सिहासन तक ले गया और उसे अपने बराबर बैठाया | दोनों ओर से भेटो का आदान -- प्रदान हुआ | औपचारिक राजनितिक वार्तालाप हुआ और फिर एकांत में दोनों कुछ समय बाते करते रहे | वातावरण बड़ा ही सुखद आह्लादकारी था | राज्य को लेकर पिता और पुत्र में प्रेम तथा सौहार्द उत्पन्न होना -- यह सरयू तट की शाश्वत विशेषता है |
इसी प्रकार कई दिनों तक पिता और पुत्र की भेटे होती रही , एक दिन बुगराखान ने सुलतान को जमशेद के कहानी सुनाई '' मेरे लाडले बेटे ' इस प्रकार विषय भोगो में डूब कर तुम अपना स्वास्थ्य और साम्राज्य तो नष्ट कर ही लोगे , उन महान सम्राटो के उपदेशो का भी अनादर कर डोज ' |
भावना में बहकर वह रो पडा , ममता ने उसके हृदय पर अधिकार जमा लिया \ सुलतान ने पिता के चरणों में सिर रखकर कहा '' अब्बा हुजुर , इस बार आप माफ़ कर दे , दोबारा आपको कोई शिकायत सुनने को नही मिलेगी , मैं इन बुरे कामो से तौबा करता हूँ |
सुलतान ने कहा , '' बेटा तुम तब तक सफल नही हो सकते जब तक दुष्ट निजामुद्दीन का तुम पर प्रभाव है '' |
'' मैं मलिक को भी चतुराई से ठिकाने लगा दूंगा , '' सुलतान ने आश्वासन दिया |
बुगराखान ने आह भरकर कहा , '' बेटा बहुत सोच समझकर फूंक -- फूंक कर कदम रखना , तुम ने न जाने कितने आस्तीन के साँप पाल रखे है |
यह उन दोनों की अंतिम भेट थी | दोनों ने आँसू भरी आँखों से एक दूसरे को विदा किया | पिता से मिलने के बाद विषय लोलुप्त सुलतान कैकुबाद के जीवन में एकदम परिवर्तन आ गया | उसने शारब से पूरी तरह तौबा कर ली | सुन्दरियों के जमघट को दूर हटा दिया अब वह एक कर्मठ युवक की तरह राजकाज देखने लगा था | सुलतान के इस परिवर्तन से मलिक निजामुद्दीन का माथा ठनका , उसे अपने हाथ से साम्राज्य की बागडोर खिसकती दिखाई दी | उसने सुलतान के मन और सयम को विचलित करने के लिए षड्यंत्र रचा | वह किसी अद्दितीय अल्हड युवती की तलाश में व्यस्त हुआ जिसमे सहज आकर्षण हो | उसकी खोज सफल हुई और उसने एक बेश्या की अति सुन्दर , चतुर , वाचाल अल्हड बछेडी की तरह मदमस्त एक नवयुवती लड़की को ले लिया और पड़ाव के आगे बीच रास्ते में खेतो की मेड़ो पर एक ऐसी जगह बैठा दिया , जहा सुलतान की नजर उस पर पड़ कर ही रहे , साथ ही ऐसा हो कि वह उस स्थान पर सुलतान को अकस्मात मिलती सी जान पड़े |

अगले दिन सुलतान की सवारी उस रास्ते से निकली तो उसने खेत की मेड पर एक सुन्दर ग्राम्य गीत गाती हुई उस आकर्षक कन्या को देखा जिसके रोम -- रोम से सौन्दर्य और लावण्य का स्रोत फूट रहा था | सुलतान इस अल्हड युवती के मधुर आवाज , रूप माधुरी अदा , शोखी हाजिर जबाबी और कविता पर सौ जान से कुर्बान हो गया | वह सुंदरी कविता में ही बाते करती थी | उसकी वेश भूषा बड़ी भव्य और आकर्षक थी | उसके हाव - भाव किसी भी जितेन्द्रिय का धैर्य और सयम डिगाने के लिए पर्याप्त थे |
सुलतान का मन उस सुन्दरी बाला के रूप जाल और हाव - भाव पर बुरी तरह रीझ गया | वह एक बार गिरा तो बस गिरता ही चला गया | उस अल्हड , मस्तानी लड़की के एक कटाक्ष पर ही वह अपने पिटा की सारी शिक्षा भूल गया | शराब और सुंदरी से बचने की सारे प्रतिज्ञाए पानी में बह गयी | उसकी जिन्दगी फिर उसी पुराने ढर्रे पर चलने लगी | मलिक अपनी सफलता पर फुला न समाया | लेकिन अब उसके पापो का घडा भर चुका था | एक दिन अचानक सुलतान की मोह निद्रा टूटी | उसे अपने पिता के वाक्य याद आये , उसने बड़ी कुशलता से इस दुष्ट मलिक को विष देकर मरवा दिया | इस तरह उसने इस महत्वाकांक्षी निर्कुश व्यक्ति से अपनी प्राण रक्षा कर ली |
मलिक निजामुद्दीन में यदि राजद्रोह व अमीरों के प्रति द्वेषभाव न होता तो वह सोने का आदमी था , वह कुशल प्रशासक , परिश्रमी , धुन का पक्का था | उसके मरते ही सारा प्रशासनिक ढाचा चरमरा कर गिर पडा | अति विषय सेवन से दुर्बल होकर सुलतान को अर्धांग ने धृ पकड़ा | अब वह खात पर पडा पडा कराहने के अलावा और कुछ नही कर सकता था | दिन प्रतिदिन उसकी दशा बिगडती जा रही थी | इधर राज्य में बड़ी अराजकता फैलने लगी | इस भयंकर स्थिति को देखते हुए बलबनी अमीरों ने कैकुबाद के नन्हे से पुत्र को शम्सुद्दीन का खिताब देकर दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया | देश में अशांति और अराजकता के बादल गहरे होते जा रहे थे |
इस अराजकता का लाभ जलालुद्दीन खिलजी ने उठाया | वह समाना का नायब और बरन का जागीरदार था | उसने अपने सरदारों को एकत्रित करके विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया | जलालुद्दीन खिलजी के साहसी पुत्रो ने पांच सौ सवार लेकर एक दिन अचानक महल पर हल्ला बोल दिया और नन्हे सुलतान को उठा ले गये | इसी बीच खिलजियो ने एक मलिक को सुन्ल्तान कैकुबाद की हत्या करने भेजा सुलतान ने पहले कभी इस मलिक के पिता को मरवा डाला था | यह मलिक एक शक्तिशाली सैनिक दस्ते के साथ महल में घुस गया |
सुलतान अर्धांग रोग से अपंग और लाचार होकर पलंग पर पडा था वह फटी फटी आँखों से इन हत्यारों को देखता रहा | मलिक ने सुलतान को तीन -- चार ठोकरे मारी , फिर उसे उठाकर यमुना में फेंक दिया | ठोकरों और बीमारी से अधमरे सुलतान की दुर्बल काया को यमुना की लहरों ने अपनी बाहों में समेत लिया |
सुलतान कैकुबाद के इस करूं अंत के साथ दिल्ली पर तुर्कों का शासन समाप्त हो गया और खिलजियो की पताका फहराने लगी |

-सुनील दत्ता
 स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक 
आभार -- स . विश्वनाथ

बुधवार, 22 मई 2013

नारी होना ही बहुत बड़ी सजा थी

मध्यकाल में नारी होना ही बहुत बड़ी सजा थी  | हिन्दू -- मुस्लिम समाज में फिर भी उनमे से एक ऐसी वीरागना  मलिका  रजिया बेगम  ने अपने साहस -- आत्मबल से उस काल में यह साबित कर दिया कि नारी की शक्ति किसी पुरुष से कम नही आंकी जा सकती है |


दिल्ली
का सुलतान इल्तुतमिश , कुतुबुद्दीन ऐबक  का योग्तम दास था , ऐबक स्वंय भी सुलतान मुहम्मद गोरी का दास था , सुलतान के दास का दास होने के कारण उसे राजगद्दी पर बैठते समय अनेक समस्यायों , संघर्षो  और चुनौतियों का सामना करना पडा था |

इल्तुतमिश ने 26 वर्ष तक सफलता पूर्वक राज किया था , कुतुबुद्दीन ऐबक ने जितने भी भारतीय प्रदेश जीते थे उस ने उन सबको संगठित क्र के शासन सूत्र में पिरो दिया और एक सुदृढ़ साम्राज्य की नीव डाली दी | 
सन 1236 के अप्रैल का महीना था , मौसम सुहाना था , अभी वातावरण में ज्यादा गर्मी नही थी , प्रतापी सुलतान इल्तुतमिश दिल्ली के शाही महल में  चार महीनों से बीमार पडा हुआ था |

गत  दिसम्बर माह में जब वह खोख्रो का  दमन करने के लिए हिमालय की ठंठी पहाडियों में भटक रहा था तो उसे  वही सर्दी लग गयी थी , जुकाम और बुखार ने उस के बूढ़े शरीर को बुरी तरह जकड़ लिया था , वैद्य , हकीमो ने कितनी ही दवाइया दी लेकिन कोई असर नही हुआ |

सुलतान की दशा दिन --- प्रतिदिन बिगडती ही चली गयी , कुछ समय पहले उस का बड़ा  पुत्र महमूद  युवावस्था में ही मर गया था , बूढ़े सुलतान को यह चोट रात दिन  खलती रहती थी कयोकि उस के बाकी पुत्र नाबालिग थे , हाँ उस की पुत्री रजिया  अवश्य समझदार और योग्य थी , रजिया की अभी सत्तरह -- अठारह  वर्ष की ही थी , लेकिन उस में एक सुयोग्य राजकुमार और सशक्त उत्तराधिकारी के समस्त गुण  विद्यमान थे |

29 अप्रैल , 1236 ई . को सुलतान की दशा अचानक बहुत  शोचनीय हो गयी थी  | लगता था , मानो उस का अंतिम दिन आ पहुंचा है , एक ओर  शाही हकीम सिर झुकाए खड़ा था , दूसरी ओर सुलतान का प्रधान मंत्री , मुशरिफ  अल ममालिक विराजमान था , एक ओर ' चालीसी तुर्क '' अमीर खड़े थे , सुलतान ने इन '' चालिसियो '' की एक जमात बना दी थी |  हिन्दुस्तान की बड़ी -- बड़ी  जागीरे , और प्रशासन में ऊँचे -- ऊँचे पद इन्ही लोगो के हाथो में थे , इस ' चालीसी अमीर ' गुट को सुलतान ने अपने समर्थन के लिए बनाया था | इस में उस ने अपने चुने हुए विश्वस्त साथियो को रखा था , ये '' चालिसिये '' उस के  साम्राज्य के आधार स्तम्भ थे |
मरणासन्न सुलतान के बराबर वाले कमरे में उसका परिवार था , जहा उस की बेगमे और बच्चे दम  साध कर , चिक से सारा  दृश्य देख रहे थे , अपने पिता की यह शोचनीय दशा देख कर रजिया बहुत गंभीर हो
उठी थी , उस की आँखे बार -- बार भर आती थी |  सुलतान ने अपने '' चालिसियो '' की ओर देखकर कहा , '' लगता है , अल्लाह के यहाँ से मेरा बुलावा आ गया है , अब मुझे केवल आप लोगो पर भरोसा है , कही ऐसा न हो कि जिस सल्तनत को हम ने खून से सींच कर खड़ा किया है , उस की  ईट - ईट बिखर जाये . |
चालिसियो  में से बदरुद्दीन सुकर नामक एक तुर्क अमीर ने अपनी जमात की ओर से सुलतान को यह आश्वासन दिया , '' हुजुर , हम पर भरोसा रखे , हम लहू की  आखरी बूंद तक आप के  नमक का हक अदा करेगे , इस सल्तनत और शाही खानदान पर  किसी तरह की आंच न आने पाएगी ''

अपने वफादार साथियो से यह आश्वासन पा कर , सुलतान के पीले और मुरझाए मुखं पर संतोष की छाया दिखाई दी . उस ने कापते हाथो से , अपने सिरहाने रखी अपनी वसीयत निकाली और उसे वजीरे आजम , मुशरिफ अल ममालिक के हाथो सौपते  हुए कहा , '' वजीरे आजम , इस वसीयत में मैं ने अपनी इच्छा प्रगट  कर दी है, मेरी यही ख्वाहिश है कि मेरे बाद मेरी बेटी रजिया हिन्दुस्तान की मलिका बने . ''

'' रजिया ? '' आश्चर्यचकित  हो कर वजीरे आजम ने कहा |
''हाँ रजिया , '' सुलतान ने प्रयत्न कर के स्वर में दृढ़ता लाते हुए कहा ,
मेरे सभी बच्चो में रजिया सुयोग्य है , मुझे पूरा भरोसा है कि वह मेरे बाद हिन्दुस्तान की सल्तनत को अच्छी तरह संभाल सकेगी , रजिया , बेटी रजिया ,  रजिया को बुलाओ , वजीरे आजम '' रजिया पास के कमरे में ही थी , पिता का  सन्देश पाते ही सत्तरह --  अठ्ठारह साल की उस तेजस्वी  शहजादी  ने धीर --  गंभीर कदमो से उस कमरे में प्रवेश किया , उसने अपने मुख पर नकाब या बुर्का  नही डाल रखा था , उस का सारा शरीर मोती जैसी आभा से दमकता  था  |  मुंख मंडल को गहरी उदासी ने घेर रखा था , बड़ी -- बड़ी आँखों में करुणा उतर आई थी | चमकता मुख , स्टेज आँखे उदात्त और भव्य  व्यक्तित्व , रोम रोम में  टपकता हुआ लावण्य -- इन सब विशेषताओं से वह उस भीड़ में अलग ही दिखाई देती  थी |
अभी उस का विवाह नही हुआ था , वह किशोरी ही थी | लेकिन उस ने  शस्त्र विद्या और राजनीति शास्त्र का अच्छा ज्ञान था वह पिता के साथ राजकाज में हाथबटाती थी | शिकार में भी साथ रहती थी | संकटो से जूझना उस ने सीख  लिया था |  रजिया धीरे -- धीरे चलकर अपने पिता के पैरो की ओर खड़ी हो गयी , उसकी बड़ी -- बड़ी  सतेज आँखे इस समय सजल थी , रजिया की उपस्थिति ने  उस उदास वातावरण को कुछ हल्का कर दिया |अपनी बेटी को सामने देखकर सुलतान की आँखों में चमक आ गयी , उसने '' चालिसियो '' को संकेत कर के कहा कि वे उसे  पलंग पर बैठा दे |
दो अमीरों ने सुलतान को सहारा दे कर पलंग पर बैठा दिया | सुलतान ने अपनी वाणी में बल ला कर कहा , '' मैं अपने सभी वफादार  वजीरो और अमीरों के सामने पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी बेटी रजिया को  सल्तनते हिन्द की मलिका मुकर्रर करता हूँ | वह मेरी दौलत और सारी सल्तनत की एक मात्र वारिस है , आज से आप सभी रजिया को ही सुलतान मान कर उसके हुकम को पूरा करे और हर तरह से उस की रक्षा करे , ''


वजीरे आजम ने हिचकते हुए कहा , '' हुजूरे आला , रजिया औरत है , इतनी बड़ी सल्तनत के  बोझ को वह अपने नाजुक कंधो पर कैसे उठा सकेगी ? सल्तनतो में कई  तरह की  मुश्किलात पेश आती है , सल्तनत के बाहर चंगेजखान के लड़ाकू खूंखार मंगोल  कबीले देशो को उजाड़ते फिर रहे है ; न जाने हिन्दुस्तान की ओर कब उन का रुख  हो जाए , ऐसे नाजुक वक्त में रजिया को तख़्त पर बैठाना कहा तक मुनासिब होगा
जहापनाह ? ''  सुलतान इल्तुतमिश ने कड़ी नजरो से वजीर के ओर देखा , उस नजर में घृणा थी ,
सुलतान ने कहा , '' वजीरे आजम , रजिया को मैंने जन्म दिया है , मैं अच्छी तरह   जानता  हूँ कि उस में कितनी योग्यता है , उसमे किसी भी नौजवान से अधिक  शक्ति  है , हथियार चलाने और निशाना लगाने में अच्छे -- अच्छे योद्धा उस का  मुकाबला नही कर सकते , राजनीति और शासन प्रबंध में उस की बुद्धि खूब मंजी
हुई है , यदि उसे वफादार साथी मिल  गये तो वह अपना और अपने खानदान का नाम  इतिहास में जरुर रोशन करेगी , इसीलिए आप सब लोग अपने सुलतान की इस आखरी  इच्छा को अवश्य पूरा करे , मेरी रजिया एक दिन बड़ी बनेगी और खूब नाम कमाएगी .
यह कहते -- कहते सुलतान की आँखे भर आई , स्वर काप उठा , उसने  प्यार से अपनी होनहार बेटी के सिर पर हाथ फेरा , रजिया अपने पिता की छाती  पर सिर रखकर सिसक उठी . वातावरण में गहरी उदासी छा गयी , ''
चालिसियो ' ने कुरआन पाक पर हाथ रख कर  कसम खाई कि वे रजिया के प्रति  वफादार रहेगे और जी जान से उस की सेवा करते रहेगे , वजीर मुशरिफ अल ममालिक ने भी रजिया को मलिका  बनाने की स्वीकृति दे दी .| सुलतान के मुख पर  शान्ति छा गयी , धीरे -- धीरे उस की आँखे बन्द होती गयी , सांस रूकती गयी ,
कुछ ही क्षण बाद उस प्रतापी सुलतान का जीवन दीप बुझ गया , रजिया अपने पिता के शव पर पछाड़ खा कर गिर पड़ी और फूट - फूट कर रोने लगी |
सुलतान के  मरते ही उसकी बेगमो और बच्चो ने उस कमरे में रोते -- रोते प्रवेश किया , वे लाश को घेर कर विलाप करने लगे , सभी वजीर और अमीर बाहर निकल सभा भवन में  इकट्ठे हुए , भविष्य की योजनाये बनने लगी |
 न जाने क्यों वे रजिया को  सुलताना नही बनाना चाहते थे , संभवत: उन के पुरुष होने का दंभ इस का कारण
हो , पुरुष होकर वे एक औरत का हुकम माने , उसके आगे सिर झुकाए इससे बढ़कर  दुसरा अपमान उन के लिए और क्या हो सकता था ? वे भूल गये कि अभी -- अभी मृत  सुलतान के सामने वे रजिया के प्रति वफादार रहने और उसे सुलतान बनाने की  सौगंध खा कर आ रहे है , उधर सुलतान की आँखे बन्द हुई और इधर इन  विशवासघाती कृतघ्न अमीरों ने कुरआन पाक की सौगंध भुला दी |
मध्यकाल में  नारी ही बहुत बड़ी सजा थी , हिन्दू  --- मुस्लिम दोनों समाज में उसके उपर बंधन ही
बंधन थे | वह पुरुषो की वासना तृप्ति का साधन और उस के लिए बच्चो को जन्म  देने वाली एक मशीन मात्र थी उसकी शिक्षा का कोई प्रबंध न था |  अपने हरमो में भेड़ -- बकरियों की तरह स्त्रियों की भीड़ इकट्ठी करने वाले पाखंडी पुरुष के अपने दुराचार की कोई सीमा न थी | परन्तु वह स्त्रियों से फिर भी  पवित्रता और पतिव्रत धर्म की निष्ठा की आशा करता था | इसलिए शंकालु पुरुष  उन्हें घर से बाहर कदम न रखने देता था , बुर्का और घुघट के कठोर बन्धनों  में उन्हें कस  दिया गया था |  ऐसे  भयंकर अन्धकार पूर्ण युग में एक  स्त्री का राजगद्दी पर बैठना दम्भी पुरुषो की दृष्टि में अनहोनी दुर्घटना  तो थी ही , युग -- युग  से अधिकार भोगने वाला घमंडी पुरुष भला यह कैसे सह   सकता था कि एक औरत उस पर हुक्म चलाए ?
सुलतान  इल्तुतमिश के अंतिम संस्कार के पश्चात वजीरे आजम ममालिक तथा '' चालीसी '' अमीरों ने रजिया को उत्तराधिकारी पद से वंचित कर के रुकनुद्दीन नामक शहजादे  को राजगद्दी पर बैठाया , जिसकी माँ शाह तुरकान कभी शाही महल में नौकरानी  थी , पर बाद में अपने हुस्न और नाज नखरो से बेगम बन बैठी थी ,| वह बड़ी ही  निष्ठुर और क्रूर औरत थी , साथ ही बड़ी ही महत्वाकाक्षी  और अधिकार लोलुप भी ,
सल्तनत की सर्वेसर्वा यही दुष्ट स्त्री बनी हुई थी कयोकि इस का बेटा रुकनुद्दीन  बड़ा ही मुर्ख , विलासी और आराम पसन्द नवयुवक था | विदूषक , भाड़ और सारंगी  वादकों की संगति में उसे खूब मजा आता था , नई -- नई सुंदरी बालाओं के साथ  मौज मस्ती करना उस का मनोरंजन था |
वह शराब के नशे में धुत्त रहता था , अपनी इन वासनाओं की पूर्ति के लिए वह पानी की तरह धन भा देता था , कभी --  कभी वह शराब पी कर हाथी पर चढ़ जाता और दिल्ली के बाजारों व गलियों में सोने के सिक्के बिखेरता चलता था |  सुलतान को भोग विलास से वक्त ही नही  मिलता था कि वह राज्य का प्रबंध भी देख सके , राज्य तो उस निष्ठुर माँ के  हाथ में था , वह तो उसके हाथ की कठपुतली मात्र था |
शाह तुरकान ने   अधिकार पाते ही कुछ ऐसा रुख बदला कि उसके अत्याचारों से सारे राज्य में  हाहाकार मच गया | वह नौकरानी से रानी बनी थी अत: अपने निम्न विचारों की  ग्लानी को धोने के लिए उसने अपनी उच्च विचार रखने वाली सौतो को खूब पीड़ित  किया |


इल्तुतुमिश की इन बेगमो को उस ने शाही महल से धक्के दे कर बाहर निकल दिया और उन्हें  दिल्ली की गलियों में भीख मांगने के लिए विवश कर दिया , उसने दिगवंत सुलतान के नन्हे से शहजादे  कुतुबुद्दीन की आँखे निकलवा ली और उसे कत्ल कर के  फिकवा दिया |
बेगम शाह तुरकान के इन घृणित कार्यो से राज्य में भारी आतंक फ़ैल गया , '' चालीसी गुट '' के अमीरों में भी बेचैनी फैली बेगम शाह तुरकान के इन घृणित कार्यो से राज्य में भारी आंतक फ़ैल गया , ' चालीसी गुट '' के अमीरों में भी बेचैनी फैली कयोकि उसका बेटा तो सुलतान बन कर  शराब और शबाब के नशे में रात दिन खोया रहता था  | और इधर यह क्रूर स्त्री  अपने आये दिन के अत्याचारों और अनुचित हस्तक्षेपो से शासन तंत्र को चौपट कर रही थी , सल्तनत के भीतर बहुत अराजकता फ़ैल गयी थी |
कुतुबुद्दीन की  हत्या से उत्तजित  हो कर उसके भाई अवध के सूबेदार गियासुद्दीन मुहम्मद ने  अवध में विद्रोह खड़ा कर दिया और  बंगाल से दिल्ली की ओर आते हुए शाही खजाने को लुट लिया |
बदायु में भी विद्रोह भड़क उठा था और बंगाल ने अपनी  स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी , उधर बाहर से साम्राज्य की उत्तर [ पश्चिमी  सीमाओं पर भी नया संकट उपस्थित हो गया , चंगेजखान के सेनापति मलिक
शैफुद्दीन ने पंजाब पर  हमला कर दिया और मंगोलों के दल सुलतान के दरवाजो तक पहुँच गये थे , पर सौभाग्य से कच्छ के सूबेदार ने उन्हें परास्त कर के  सिंध पार धकेल दिया |
इस विजय के बाद  उत्तर पश्चिमी सुबो के सूबेदारों ने , जो चालीसी गुट में से थे , सुलतान रुकनुद्दीन के विरुद्ध एक मोर्चा बना लिया था , वह इन विद्रोहियों को दबाने के लिए दिल्ली से पंजाब की ओर रवाना हुआ किन्तु उस का मंत्री जुनैदी सेना के एक बड़े भाग के साथ विद्रोही अमीरों से जा मिला , मंत्री के इस  विश्वासघात से रुक्नुद्धीन घबरा उठा , उधर दिल्ली वासी ने भी उस की माँ के अत्याचारों से दुखी हो कर विद्रोह कर दिया |
निष्ठुर बेगम शाह तुरकान ने इल्तुतमिश की लाडली बेटी रजिया की हत्या का षड्यंत्र  रचा कयोकि रजिया वास्तव में राज्य की सच्ची उत्तराधिकारिणी थी , साथ ही वह बहुत वीर और गुणवती भी थी |  इसलिए प्रजा भी उसे बहुत चाहती थी |
शाह तुरकान ने रजिया के क़त्ल के लिए जो हत्यारे भेजे , वे अपने काम में सफल न हो सके कयोकि रजिया को पहले ही इस षड्यंत्र की गंध लग चुकी थी | इसलिए वह अपने शुभ चिंतको के बीच  एक गुप्त स्थान पर छिप गयी थी |
दिल्ली वासी को जब इस षड्यंत्र और रजिया के पलायन की खबर लगी तो उन का धैर्य जाता रहा , नगर वासी क्रुद्ध हो उठे , उन्होंने शाही महल घेर लिया और बेगम शाह तुरकान को बंदी बना लिया |
सुलतान रुकनुद्दीन को जब दिल्ली वासी के विद्रोह और अपनी माँ के बन्दी होने का समाचार मिला तो वह तुरंत राजधानी लौटा , उसकी आधी सेना को वजीर जुनैदी अपने साथ बहका कर ले गया था और विद्रोही अमीरों से मिल गया था ; शेष सेना ज्यो ही वह दिल्ली में घुसा त्यों ही वह  सेना भी उसे छोड़ कर दिल्ली वासियों की ओर चली गयी और रजिया का समर्थन करने लगी |
अब तो रुकनुद्दीन अकेला पड़ गया , वह घबरा कर किलोखड़ी  में जा छिपा , इन '' चालीसी ' तुर्क अमीरों ने माँ बेटे को कैद कर लिया और 9 नवमबर 1236 ई , में शहजादी रजिया को राजगद्दी पर बैठा दिया और इस तरह सुलतान की अंतिम इच्छा पूरी की |
लेकिन राजगद्दी पर बैठते समय रजिया के चारो ओर समस्याए मुंह बाए खड़ी  थी  , साम्राज्य में चारो ओर अराजकता और अव्यवस्था फैली हुई थी , वजीर विश्वासघात पर उतारू थे | अधिकाँश '' चालीसी '' अमीर उस की जड़ काटने के लिए तैयार थे |
रजिया को दिल्ली के तख्त से उखाड़ने के लिए वजीर मुहम्मद जुनैदी तथा मुल्तान , लाहौर , हांसी और बदायु के सूबेदार अपनी -- अपनी सेनाये लेकर दिल्ली पर चढ़ आये | परिस्थिति बड़ी ही विकट  थी , रजिया  ने अपनी सहायता के लिए अवध के सूबेदार नुसरतुद्दीन  तयारसी को बुलाया , वह अभी गंगा पार भी नही कर पाया था कि '' चालीसी ' तुर्क अमीरी ने उस पर हमला कर के उसे मार डाला |
इस तरह रजिया का अंतिम सहारा भी जाता रहा , फिर भी रजिया सुल्ताना ने धैर्य और साहस न खोया , वह अपनी छोटी सी सेना लेकर राजधानी से बाहर निकली और विद्रोही अमीरों के सामने यमुना किनारे मोर्चा जमा लिया |
शत्रु की सेना अधिक थी , इसीलिए रजिया ने कूटनीति से काम लिया , उसने बदायु के सूबेदार इजुददीन जानी और मुल्तान के सूबेदार अयाज के पास अपने गुप्त निमत्रण भेजे कि इस दुनिया में अकेली रजिया को केवल उन्ही के बांहों का सहारा चाहिए , वह अपने इन वफादार अमीरों का स्वागत शाही महल में करना चाहती है न कि युद्ध क्षेत्र में , वह उनसे मिलने के लिए बेचैन है और उनके लिए पलके बिछाए बैठी है |
रजिया जैसी सुंदरी मलिका किसी को प्रेम निमंत्रण दे और वह न पसीजे , ऐसा भला कैसे संभव होता ? इसलिए इन दोनों प्रबल सूबेदारों ने रजिया की वफादारी का प्रेम निमंत्रण झटपट  स्वीकार कर लिया और उस से मिलने के लिए समय माँगा | रजिया ने मुल्तान और बदायु के सूबेदारों से मिले वफादारी के पत्रों को को विद्रोही अमीरों की छावनी में खूब प्रचारित करवाया जिसे उनके संघ में अविश्वास और फूट की भावना पैदा हो गयी , उन में इतनी घबराहट फैली कि हांसी का सूबेदार शैफुद्दीन कुजी , लाहौर का सूबेदार अलाउद्दीन जानी तथा वजीरे आजम जुनैदी  -- ये तीनो  घोड़ो पर बैठकर निकल भागे |
रजिया को ज्यो ही इन विश्वासघातियो के पलायन का समाचार मिला , उसने तुरंत उनके पीछे अपने घुड़सवार दौडाए , घुड़सवारो ने तेजी से उनका पीछा किया और कुजी तथा जानी को रास्ते में ही मार डाला , लेकिन जुनैदी बच कर पहाड़ो में जा छिपा और वही भूखा प्यासा भटक कर मर गया |
अपने शत्रुओ का इस प्रकार से आधार तोड़कर रजिया ने दृढ़ता से अपने पैर जमाए औए शासनतंत्र को सुसंगठित किया , बंगाल और सिंध जैसे दूरवर्ती प्रदेशो में भी अनुकूल व्यवस्था की जिससे ब्रम्हपुत्र से ले कर देवल तक सभी प्रदेशो में शान्ति चा गयी | उसने सभी सुबो में अपने विश्वस्त सरदार और सूबेदार नियुक्त किये , अपनी शक्ति , कुशलता राजनीतिक निपुणता और प्रतिभा के बल पर रजिया ने राज्य को स्थिरता प्रदान की , सभी लोग उसके गुणों की प्रशंसा करते न अघाते थे |
रजिया में एक श्रेष्ठ शासक के सभी गुण विद्यमान थे | उसमे केवल एक ही अवगुण था कि वह स्त्री थी , उस भयंकर मध्यकालीन राजनीति  में एक स्त्री के लिए कोई स्थान न था , लेकिन रजिया किसी और ही धातु की बनी हुई थी , उसने बुर्का एक ओर उठा कर रख दिया , वह पुरुष वेश धारण कर के दरबार लगाती थी , एक योद्धा की तरह हथियारों से सुसज्जित होकर , घोड़े पर सवार होकर वह अपनी सेनाओं का निरीक्षण  करती थी | रजिया का यह शाही रॉब और चमक दमक '' चालीसी '' अमीरों को जरा भी नही सुहाता था , पर रजिया को इन ईर्ष्यालु मर्दों की जरा भी प्रवाह नही थी , तुर्क अमीरों की द्वेषाग्नि पर घी की तरह एक घटना ने भी काम किया |
रजिया ने अबीसीनिया के एक हब्शी युवक जलालुद्दीन याकुत को शाही घुडसाल का नायक बना दिया , जब कभी रजिया दरबार में जाने , छावनी में निरीक्षण  करने अथवा शिकार खेलने के लिए जाते समय घोड़े पर सवार होती तो यही अफ़्रीकी युवक याकुत उसे अपनी बलिष्ठ बाहों में उठाकर घोड़े की पीठ पर सवार करता था , इसी तरह वही उसे अपनी बाहों में उठाकर नीचे उतारता था |
अभिमानी तुर्क अमीर अपनी सुल्ताना को एक हब्शी की बाहों में उतरते -- चढ़ते देख इर्ष्या व क्रोध से भभक उठते , उनका वश चलता , तो वे याकुत को कच्चा ही चबा जाते पर रजिया के भय से विवश थे | उन्होंने रजिया को बदनाम करने के लिए याकुत के साथ उसका नाम जोड़ना शुरू  कर दिया , लेकिन उस युग के इतिहासकारों को रजिया के इस काम में प्रेम की गंध दिखाई नही दी थी , यदि कोई ऐसी वैसी बात होती तो वे इसका उल्लेख अवश्य करते | 
रजिया इन कृत्घन, विश्वासघाती अमीरों के मन की  कुढ़न को जानती थी , उसे इन को जलाने और चिढाने में बहुत मजा आता था | अत: उस अफ़्रीकी युवक की बाहों का सहारा लेकर इन तुर्क अमीरों के अभिमान पर निरंतर चोट करती रहती , वह एक ओर धीर गंभीर , कुशल और प्रवीण शासिका थी तो दूसरी ओर वह एक चुलबुली अल्हड युवती भी थी जिसे इन घमंडी मर्दों के मिथ्या गर्व को खंडित करने में आनद आता था |
याकुत के रजिया सुलतान के विशेष कृपापात्र बन जाने का समाचार सुनकर सबसे ज्यादा धक्का पंजाब और मुल्तान के सूबेदार अयाज को लगा , अयाज भी रजिया के रूप - यौवन   का पुजारी था | उसे आशा थी कि  हिन्द की मलिका रजिया के प्यार को वह एक न एक दिन अवश्य पा लेगा पर बीच में यह हब्शी याकुत न जाने कहा से आ टपका | उसे अपनी कल्पनाओं का सुनहरा महल ढहता प्रतीत होने लगा , निराश हो कर अयाज ने पंजाब में विद्रोह खड़ा कर दिया |

यदि रजिया चाहती तो अयाज को उसी समय ठिकाने लगा सकती थी जब उसने राजगद्दी संभालते समय दूसरे कई विद्रोही अमीरों को ठिकाने लगाया था , लेकिन इस के साथ उसने दया का व्यवहार किया था जिसका बदला वह विद्रोह से दे रहा था  |
रजिया को इस बात का पता भी न था कि अयाज ने अपने मन में उसके प्रति मुहब्बत का रोग पाल रखा है , इस विद्रोही सूबेदार को दबाने के लिए रजिया दिल्ली से सेना लेकर पंजाब की ओर बढ़ी |
उस तेजस्वी साम्राज्ञी रजिया के पास आते ही अयाज का सारा साहस , बल , पराक्रम और विद्रोह पानी की तरह बह गया , उसने बिना युद्ध किये ही रजिया के आगे आत्मसमर्पण कर दिया |
रजिया ने दयावश इस कृत्घन अमीर के प्राण तो नही लिए पर उससे पंजाब और मुल्तान की सुबेदारी छीन ली और उसे सिंध पार खदेड़  दिया , यह दिसम्बर 1239 ई की घटना है |

विद्रोहियों को ठिकाने लगा कर रजिया 15  मार्च 1240 ई को दिल्ली वापस लौटी लेकिन ख़ास दिल्ली में भी '' चालीसी '' गुट के तुर्क अमीरों  ने उस के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर दिया ,| शाही महल के प्रधान अधिकारी इख्तेयारुद्दीन ऐतिगीन को याकुत के बढ़ते हुए प्रभाव और अधिकार से बहुत इर्ष्या हो गयी थी , उसने अल्तुनिया नामक सशक्त सरदार के साथ मिलकर याकुत को क़त्ल करने का षड्यंत्र रचा |
उस समय सुलतान रजिया की सेना भटिंडा के ओर गयी थी अत: विद्रोहियों ने इस मौके का पूरा -- पूरा लाभ लाभ उठाया और 3 अप्रैल 1240 को अचानक शाही महल पर हमला कर दिया , याकुत ने चुने हुए सवारों के साथ इन विश्वासघातियो का सामना किया , लेकिन उसकी एक न चली , विद्रोहियों ने उसे कत्ल कर दिया और महल के भीतर जा कर रजिया को पकड़कर अल्तुनिया को सौप दिया |
अल्तुनिया सरहिंद का सूबेदार था , उसने रजिया को अपने किले के भीतर कैदखाने में डाल दिया , विद्रोहियों ने रजिया के सौतेले भाई बहराम को राजगद्दी पर बैठकर सुलतान घोषित किया | बहराम नाबालिग था , | इसलिए ऐतिगीन उसका संरक्षक बन कर राज प्रबंध देखने लगा , लेकिन शहजादा  बहराम जल्दी ही अपने सरक्षक की मनमानी से तंग आ गया और कुछ दिन बाद 30 जुलाई को दो तुर्कों द्वारा ऐतिगीन को मरवा डाला उसका मन्त्री घायल होकर भाग निकला , शहजादे  ने बदरूद्दीन  सुकर को अपना सरंक्षक नियुक्त किया |
इल्तुतमिश ने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए अपने विश्वासपात्र चालीस व्यक्तियों को '' अमीर '' बनाया था | इन अमीरों के ठाठ ही निराले थे | इनको बड़ी - से बड़ी जागीरे मिली हुई थी कुछ प्रान्तों के सूबेदार भी थे , कुछ के हाथो में बड़ी -- बड़ी सेनाये थी | इनका वैभव सुलतान से किसी भी तरह कम न था , उस पर भी ये लोग लुट खसोट से बाज न आते थे |
इन अमीरों में परस्पर इर्ष्या द्वेष भी बहुत था , ये सभी स्वार्थी , घमंडी , निर्दयी विश्वासघाती और सत्ता लोलुप थे | इल्तुतमिश के साम्राज्य और परिवार को इन दुष्ट '' चालिसियो '' ने नष्ट कर दिया , उस कि संतान का खून बहाया और रजिया जैसी बुद्धिमती सुल्ताना को दर - दर  की ठोकरे खाने को विवश कर दिया , धन और सत्ता के लोभ में पागल होकर विचरने वाले इन भयानक  मगरमच्छो ने समाज और सल्तनत के शांत सरोवर में हलचल मचा दी |


रजिया अत्यंत साहसी और धैर्यवती  थी , सरहिंद के सूबेदार की कैद में वह बड़े धैर्य से विपत्ति के दिन काट रही थी | सूबेदार अल्तुनिया कभी -- कभी कैदखाने में रजिया के खैर खबर लेने चला आता था | रजिया के मुख पर अब भी राजसी तेज विद्यमान था | इस विपत्ति में भी शाही रॉब उसके रोम रोम से टपकता था , उसका उमड़ता यौवन किसी भी पुरुष को अपना गुलाम बनाने में समर्थ था |
अल्तुनिया दिल्ली के घटनाओं से सतुष्ट नही था '' चालीसी '' तुर्क अमीरों ने उसे अपना अगुआ बना कर बेचारी रजिया को सिंहासन से हटा दिया था , | याकुत को मरवा दिया था लेकिन सभी ऊँचे -- ऊँचे पद और बड़ी बड़ी जागीरो की बंदर बाट  में उसे अलग कर दिया था , इससे उसे बड़ा दुःख हुआ और उसे रजिया से सहानुभूति भी हो गयी थी | उसने कैदखाने में रजिया की सुविधा बढ़ा दी |
चतुर रजिया ने इन बढती हुई सुविधाओं और सूबेदार के मुख पर बदलते भावो को देखकर ताड़ लिया कि अल्तुनिया उससे मिलने के लिए कैदखाने में आया तो रजिया ने मुस्कुरा कर पूछ ही लिया , '' सूबेदार साहब , कुछ दिनों से बहुत परेशान नजर आने लगे है , लगता ही , दिल्ली की सारी  जिम्मेदारी सुलतान और उसके  वजीरे आजम ने आप के नाजुक कंधो पर डाल रखी है ' |
अल्तुनिया ने इस व्यंग का कोई उत्तर नही दिया , वह सुनी आँखों  से इस परम सुन्दरी , साहसी वीरागना  को अपलक देखता रहा जिसने चार वर्ष तक बड़ी होशियारी से हिन्दुस्तान की इतनी बड़ी सल्तनत को संभाले रखा था | लेकिन उस जैसे कृतघ्न और विश्वासघाती लोगो के कारण ही  वह आज कैदखाने में पड़ी कष्ट पा रही है , उसने ठंठी सांस भर कर कहा , '' बेगम साहिबा , क्या दिल्ली भी सचमुच कोई भुलाने लायक शहर है ' ?

रजिया फुंकार उठी , ' क्या कहा बेगम साहिबा ? किसी की बदकिस्मती का इस तरह मजाक नही उड़ाना चाहिए , सूबेदार साहब , बेगमे शाही महलो में ही रहती है , कैदखाने में नही सडती , मुझे रजिया ही कहो , ''

अल्तुनिया और अधिक  न  सह सका , इस फटकार से उसकी आँखों में आँसू आ गये , वह उस  तेजस्वनी मलिका के आगे घुटनों के बल झुक गया और भरे हुए कंठ से  बोला , '' खुदा ही जानता है , बेगम साहिबा , कि मुझे अपने किये पर कितना पछतावा है , मैं बहुत बड़े धोखे का शिकार हुआ हूँ , अल्लाह की कसम , मैं जब तक तुम्हे वापस दिल्ली के तख्त पर बैठा न देख लूंगा , चैन से न बैठूंगा , ''

अल्तुनिया की आवाज में दृढ़ता थी , उसके बहते हुए आँसू इस सच्चाई की गवाही दे रहे थे |
रजिया का नारी हृदय विचलित हो उठा , उसने भरे हुए दिल से कहा , '' सारी दुनिया जानती है सूबेदार साहब , कि अब्बा हुजुर ने मरते समय सब के सामने मुझे सल्तनते हिन्द वारिस बनाया था , लेकिन इन विश्वासघाती लोगो ने मेरे खिलाफ षड्यंत्र रच  कर मुझे तख्त से कैदखाने की कोठरी में पहुंचा दिया   |    यद्दपि मुझ से जहा तक हो सका पूरी होशियारी से मैंने राज्य की व्यवस्था की थी | मुझे तिनके का भी सहारा मिल जाए तो मैं इन विश्वासघातियो को उनकी करनी का मजा चखा दूँ , इल्तुतमिश की बेटी रजिया के जीते जी कोई दूसरा दिल्ली के तख्त पर नही बैठ सकता , '' |

रजिया ने आगे बढ़कर अल्तुनिया के आँसू पोछे , सूबेदार इस सौभाग्य पर पुलकित हो उठा , उसने कमर से अपनी तलवार खोल कर रजिया के कदमो में रख दी और भावावेश  में बोला  '' मैं मलिका -ए -हिन्द का अदना सा गुलाम हूँ , जो भी हुकम मिलेगा जान की बाजी लगा कर पूरा करूंगा '' |
रजिया ने तलवार उठाकर उसकी कमर में  बाँध दी और कापती आवाज में कहा '' सूबेदार साहब , आप मेरे गुलाम नही मालिक है , अल्लाह की यही मर्जी मालुम होती है , इस तलवार को अपने कमर में संभालिये कयोकि अभी दुश्मनों से बदला लेना बाकी है , यह नाचीज रजिया अज से आपकी है , सिर्फ आपकी .... '' कहते -- कहते उसने अपना सिर अल्तुनिया के विशाल वक्ष पर टिका दिया | 
सूबेदार अल्तुनिया ने आज सब कुछ पा लिया  |
अगले दिन रजिया के साथ उसका निकाह हो गया , उसने कुरान पर हाथ रख सौगंध खाई कि वह अपनी दुल्हन रजिया को वापस दिल्ली के तख्त पर बैठायगा |

सरहिंद में युद्ध की तैयारिया शुरू हो गयी , सूबे के कोने -- कोने से आ कर युवक फ़ौज  में भर्ती होने लगे , कुछ ही महीनों में एक अच्छी खासी फ़ौज उसके अधीन तैयार हो गयी |
रजिया अपने राजगद्दी वापस लेने के लिए अपने पति व फ़ौज के साथ दिल्ली की ओर बढ़ी , कैथल के निकट विद्रोही अमीरों ने अपनी सेनाओं के साथ रजिया का सामना किया 13 अक्तूबर को दोनों सेनाओं में घोर युद्ध हुआ जिसमे रजिया की पराजय हुई रजिया अपने बचे खुचे सैनिको एव पति के साथ युद्ध भूमि से हट गयी | उनकी दशा बहुत सोचनीय थी | मन में निराशा व्याप्त थी |
उस युग के समाज में चल कपट , झूठ फरेब षड्यंत्र , रिश्वत , धोखा कूट कूट कर भरा हुआ था | यदि रजिया शुरू में इस सच्चाई को समझ लेती तो वह आस्तीन के इन सापो का फन पहले ही कुचल देती और हरे भरे  साम्राज्य को इन के विषैले  दांतों से बर्बाद न होने देती | पिछले दिन की पराजय से वह टूट चुकी थी पर अब भी उसे बहुत आशा अपनी हिन्दू सेना पर थी उसकी सहायता के लिए तेजी से बढती चली आ रही थी | दिल्ली के मुसलमानों ने अब हिन्दुओ को भी अपनी सेना में भर्ती करना शुरू कर दिया था | यद्दपि उन्हें ऊँचे पद नही दिए जाते थे , रजिया ने भी एक ऐसी ही सेना संगठित की थी | लेकिन अफ़सोस उसके धूर्त अमीरों ने इस सेना को सुल्ताना से मिलने ही नही दिया , उसे बीच में ही गुमराह कर दिया |

हिन्दुओ की एक बड़ी सेना रजिया की मदद के लिए 14 अक्तूबर को प्रात: काल ही युद्ध भूमि में पहुँच गयी थी , इस नई हिन्दू सेना के आ जाने से विद्रोही अमीर शहजादा बहराम -- सभी बुरी तरह घबरा  उठे , उन्होंने एक कुटिल चाल चली और इस सेना के नायक के पास जाकर कहा , '' अब लड़ाई व्यर्थ है कयोकि एक दिन पहले ही रजिया और उसके पति की हार हो चुकी है ; वे दोनों  लड़ते -- लड़ते मारे गये है , इसलिए यही अच्छा है कि आप हमारी ओर आ जाओ ''
अमीरों ने उनके सामने सोने की मोहरों से भरी बीस थाल रख दिए , सोने की चमक ने अपना जादू दिखाया , कहा तो वे रजिया की मदद करने आये थे कहा अमीरों के उकसाने पर उन्होंने रजिया की असुरक्षित छावनी पर हमला कर दिया |
हिन्दू सेना यह सोच कर कि रजिया तो मर चुकी है , अत: अपनी वफादारी समाप्त जान कर , उस छावनी पर टूट पड़ी रजिया अपने पति सहित सोते हुए मारी गयी उसकी छावनी लुट गयी | अभागिन रजिया को कदम -- कदम पर विश्वासघाती मिले , यदि उसे दो चार भी विश्वस्त सरदार मिल गये होते तो वह सल्तनत की जड़े और गहरी जमा देती , फिर भी चार साल के छोटे समय में उसने इतनी बाधाओं के होते हुए भी इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया  |
जिन चालीसी अमीरों ने उसे पग -- पग पर धोखा दिया , राह में काटे बिछाए , वे किसी के भी सगे नही निकले | उन्होंने शहजादा  बहराम का कत्ल किया , भोले भाले सुलतान नासिरुद्दीन को खूब परेशान किया | उसके योग्य वजीर बलबन को   पदच्युत करा के निकलवाया , लेकिन अब उनके पापो का घडा भर चुका था | जब सत्ता बलबन के हाथ आई तो उसने चुन चुन कर इन धोखेबाज अमीरों को मारकर सल्तनत को सुदृढ़ता और स्थिरता प्रदान की   | दिल्ली में तुर्कमान दरवाजे के अन्दर रजिया बेगम की  कब्रगाह  आज भी विद्यमान है उसके भाई बहराम ने इस अभागिन शहजादी की लाश कैथल से दिल्ली मंगवा ली थी यह बंदिनी राजकुमारी इस दरगाह में अपने कब्र के नीचे शान्ति से चिरनिद्रा में सो रही है |

-सुनील द
त्ता
पत्रकार                                                 आभार -स . विश्वनाथ

शनिवार, 10 नवंबर 2012

दिल्ली:18 बार बसी और उजड़ी


दिल्ली , कितना आकर्षण है इस शब्द में ! प्रत्येक भारतीय के दिल में बसी हुई यह दिल्ली प्राचीन काल से इस देश की महत्वपूर्ण नगरी और राजधानी है , दसवी सदी के अंतिम चरणों में '' ढिल्ली '' नाम से बसाई गई , यही नगरी मध्यकाल में दिल्ली नाम से प्रसिद्ध हुई .
भारत का इतिहास वस्तुत: दिल्ली का ही इतिहास है , यह नगरी 18 बार बसी और उजड़ी है , यदि इस के मूक खंडहर बोल सकते तो वे ईरानी , शक , कुषाण , हूण , अरब
, तुर्क , मुग़ल ,मंगोल , अफगान और अंग्रेजो के आक्रमण , विनाश व निर्माण की रोमांचक कहानी कह उठते |
दिल्ली के बार -- बार बसने और उजड़ने की कहानी कुछ तो खंडहरों में कुछ इतिहास के पन्नो में सुरक्षित है , दिल्ली का रोमांचक इतिहास वस्तुत: मध्यकाल से आरम्भ होता है | हम अपनी कथा का आरम्भ अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान से करते है जिन्हें उस समय के मुसलिम इतिहासकारों तथा सुल्तानों ने '' राय पिथौरा '' कहा है |
सम्राट बीसलदेव तथा विग्रहराज चतुर्थ का चौहान वंश के शासको में वही स्थान है , जो गुप्त वंश के सम्राटो में समुद्रगुप्त का है . महाराज बीसलदेव ने अजमेर और सांभर के छोटे से राज्य को अपने पराक्रम से साम्राज्य में बदल दिया , वह बहुत शूरवीर और कवि थे . उनके एक हाथ में तलवार और दूसरे में लेखनी रहती थी , उन्होंने परिहारो को परास्त क्र के दिल्ली जीती और यहाँ के प्रसिद्ध लौह स्तंभ पर 1163 ई. में अपना अभिलेख खुदवाया |
बीसलदेव का राज्य विन्ध्याचल से हिमालय तक फैला हुआ था , उन के अंतिम दिनों में तोमर राजा अनगपाल ने चौहानों से दिल्ली को स्वतंत्र करा लिया था , लेकिन जब बीसलदेव का भाई सोमेश्वरदेव राज सिंहासन पर बैठा तो उस ने पूरे दलबल के साथ दिल्ली पर आक्रमण कर के उसे अपने राज्य में मिला लिया |
इस विजय के बाद अनगपाल अजमेर के चौहानों को एक कर देने वाला सामंत मात्र बन क्र रह गया , इसी सोमेश्वरदेव की कर्पूरीदेवी नामक रानी से 1058 ई. में एक पुत्र का जन्म हुआ , जिसका नाम पृथ्वीराज रखा गया . इस राजकुमार के शासन काल में चौहानों का उत्कर्ष चरम सीमा पर पहुंच गया | हिन्दुस्तान के महान सम्राटो में उसकी गिनती होने लगी | पृथ्वीराज चौहान ने जब राजगद्दी संभाली तो उन्होंने दिल्ली को सम्पूर्ण भारत की केन्द्रीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया , इस का जो गौरव प्राचीनकाल में था , वही अब सदियों बाद इसे मिला , पृथ्वीराज का शासन सुदूर पंजाब तक फैला हुआ था , उन्होंने विजय प्राप्त कर के अपनी शक्ति सुदृढ़ की और अपने दादा बीसलदेव की भाँती चौहान शक्ति की विजयपताका दूर -- दूर तक फहरा दिया | पृथ्वीराज ने 1182 ई . में चंदेलो को हरा कर कालिंजर के सुदृढ़ दुर्ग पर अधिकार जमाया , महोबा के शासक परमाल को परास्त कर के सब पर अपनी शक्ति का सिक्का बैठा दिया और गुजरात के राजा भीमदेव को ललकार कर सारे उत्तर भारत में एक प्रचंड सम्राट के रूप में कीर्ति स्थापित की | यही नही , उत्तरपश्चिम सीमा से जब डाकुओं की तरह टूट पड़ने वाले तुर्कों को कई बार मारपीट कर ठिकाने लगाया तो पृथ्वीराज के भय से भयभीत हो कर तुर्क दस्यु भारत के भीतरी प्रदेशो में घुसने से कतराने लगे . मध्य एशिया के तुर्क उन्हें भयवश '' राय पिथौरा '' कहकर पुकारते थे | मुसलिम इतिहासकारों ने इस हिन्दू सम्राट को सर्वत्र '' राय पिथौरा '' ही लिखा है |

मध्यकाल में कुछ राजा पुरानी परम्परा के अनुसार स्वंयवरो का आयोजन क्र के अपनी कन्याओं का विवाह करते थे , इन स्वंयवरो में प्राय: युद्ध भडक उठता था . एक राजकुमारी के माथे पर सिंदूर लगता भी न था की दूसरी हजारो सुहागिने कुछ ही देर में सिंदूर से सदा के लिए वंचित हो जाती , यह अजीब सिवाज था . स्वंयवरो में कलह और युद्ध न हो -- ऐसा नही देखा गया , इतिहास गवाह है की स्वंयवरो की परिणिति विनाशकारी युद्धों के रूप में हुई |
कभी -- कभी स्वंयवर में एक पक्ष बलपूर्वक कन्या का अपहरण भी कर लेता था जिस से खूब तलवारे चलती और हिन्दू जाति एक मामूली सी बात के लिए आपस में लड़ कर दुर्बल होती रहती |
मध्य काल में भी स्वंयवर और राजकुमारी के अपहरण जैसी घटाए जब -- तब होती रही है , इनमे
संयोगीता स्वंयवर की घटना तो ऐसी है , जिस ने भारत का इतिहास ही बदल दिया -- दो वीर राजपूत राजा घोर शत्रु बन गये |
ईसा की बारहवी शताब्दी के अंतिम वर्षो की बात है , उन दिनों कन्नौज के राजा जयचंद की परम सुन्दरी कन्या सयोगीता के स्वंयवर की बहुत धूमधाम थी . संयोगीता जितनी सुन्दर थी उतनी गुणवती और कला निपुण थी , राजा जयचंद ने अपनी एक मात्र पुत्री के स्वंयवर में भारत के सभी प्रसिद्ध राजाओं और राजकुमारों को निमंत्रण दिया था , लेकिन दिल्ली के यशस्वी सम्राट पृथ्वीराज चौहान को जानबूझ क्र निमंत्रण नही भेजा कयोंकि वह '' राय पिथौरा '' की बढती हुई शक्ति से बहुत जलता था | जयचन्द्र की दिल्ली पर बहुत पहले से नजर थी , वह तोमरो की क्षीण शक्ति को जानता था . जयचन्द्र ने एक बार दिल्ली पर धावा भी बोला था , लेकिन राजा अनगपाल ने अजमेर के चौहानों की सहायता से उसे हरा कर भगा दिया , इस विजय के बाद अनगपाल ने दिल्ली का प्रदेश पृथ्वीराज को सौप दिया और स्वंय संन्यास धारण कर के तीर्थ यात्रा करने निकल गया , जयचन्द्र न दिल्ली को भूल सका और न अपनी पराजय को , वह '' राय पिथौरा '' की भयावह शक्ति को जानता था . इसी ईर्ष्या के कारण जयचन्द्र ने पृथ्वीराज के पास निमंत्रण नही भेजा , बल्कि उसका अपमान करने के लिए स्वंयवर सभा के द्वार पर पृथ्वीराज की मूर्ति द्वारपाल के रूप में खड़ी कर दी |
जयचंद ने अपनी और से पृथ्वीराज को नीचा दिखाने में कोई कसर न छोड़ी , लेकिन उसे यह न मालुम था की उस की पुत्री सयोगीता मन ही मन पृथ्वीराज से प्रेम करती है और उसे पति रूप में वरण करने का दृढ निश्चय कर चुकी है . उसे इस बात का आभास तक न हुआ की संयोगीता ने गुप्त रीति से दिल्ली सम्राट के पास अपनी प्रेमपाती भेज कर उसे कन्नौज बुलवा लिया है |
सयोगीता का प्रणय सन्देश पा कर '' राय पिथौरा '' अर्थात दिल्ली सम्राट अपने चुने हुए सामन्तो और योद्धाओं को ले कर रणभूमि में जा पहुंचा , जैसे ही स्वंयवर सभा में राजकुमारी संयोगीता ने पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में जयमाला डाली वैसे ही सम्राट तुरंत उस के पास पहुँच गया सबको ललकारते हुए बोला '' राजकुमारी ने सब के सामने दिल्ली नरेश पृथ्वीराज के गले में जयमाला डाल दी है , मैं वही पृथ्वीराज चौहान अपनी पत्नी संयोगीता को अपने साथ दिल्ली लिए जा रहा हूँ , जिसे इस बात में आपत्ति हो वह ख़ुशी से शस्त्र परीक्षा कर सकता है '' यह कह कर सम्राट ने संयोगीता को हाथ का सहारा दे कर अपने घोड़े पर बैठाया और संकेत पाते ही दोनों को लेकर वह स्वामिभक्त घोड़ा हवा से बाते करने लगा |
सारी सभा हक्की बक्की रह गयी , पीछे राजा जयचन्द्र ने पृथ्वीराज को पकड़ने के लिए सेना भेजी , लेकिन सम्राट के बहादुरों सामन्तो ने उसका मुंह मोड़ दिया , पृथ्वीराज सकुशल दिल्ली पहुँच गया और वहा विधि विधान पूर्वक संयोगीता के साथ विवाह किया . राजा जयचन्द्र अपमान का कडवा घुट पी कर रह गया | संयोगीता का दिल्ली आगमन मानो सौभाग्य की सूचना लेकर आया . विवाह के कुछ दिन बाद ही सम्राट को नागौर में एक गुप्त खजाना मिलने की सूचना मिली , उन्होंने अपने बहनोई चितौड़ नरेश समरसिंह को लिखा की वह इस खजाने की खुदाई अपनी निगरानी में कराए |
जब खजाने की खुदाई की गयी तो उसमे नौ करोड़ स्वर्ण मुद्राए निकली , इतना बड़ा खजाना या तो पांड्वो का था या गुप्त सम्राटो का | जब खजाने के मिलने से पृथ्वीराज की शक्ति और बढ़ी , उन्होंने समरसिंह को भी इस सोने में से कुछ भाग भेट करना चाहा लेकिन चितौड़ नरेश ने यह भेट स्वीकार नही की , समरसिंह , राय पिथौरा के बहनोई ही नही अभिन्न मित्र भी थे , वह उन की बहन पृथा के पति थे |

जयचंद को पृथ्वीराज का यह सौभाग्य फूटी आँख भी न सुहाया , दिल्ली की बढ़ी हुई शक्ति उस के कलेजे में कील की तरह गड़ती जाति थी , फलत: उसने गौर देश के सुलतान मुहम्मद गोरी को हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया
मुहम्मद गोरी स्वंय हिन्दुस्तान के भीतरी प्रदेशो को जीतने की ताक में था , लेकिन रास्ते में पृथ्वीराज की शक्ति उस के लिए बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई थी , ऐसे समय जयचंद का निमंत्रण उस के लिए तपती दोपहरी में शीतल छाया से कम न था , अत: उस ने साहस कर के राय पिथौरा से दो -- दो हाथ करने का निश्चय किया और सैनिको तैयारियों में लग गया
दिसम्बर 1190 ई. में मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज के राज्य सीमाओं का अतिक्रमण कर के भटिंडा पर धावा बोल दिया , यह नगर पृथ्वीराज के राज्य की उत्तरी सीमा पर सुदृढ़ चौकी के रूप में था , तुर्कों ने एकाएक हमला कर के नगर और दुर्ग को घेर लिया |
दुर्ग में थोड़े से ही सैनिक थे वे इस आकस्मिक आक्रमण के लिए बिलकुल तैयार न थे , अत: तुर्कों ने बड़ी सरलता से इस किले पर अधिकार जमा लिया सुलतान ने काजी जिआउद्धिन को भटिंडा का सूबेदार नियुक्त किया और उसके अधीन 1200 तुर्क सवार रख दिए , इस बार मुहम्मद गोरी भटिंडा की जीत से ही संतुष्ट हो गया और वापस अपने देश लौटने की तैयारी में लग गया
दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज चौहान को ज्यो ही भटिंडा के पतन का समाचार मिला त्यों ही उस ने तुर्कों को पंजाब से मार भगाने की तैयारी में जुट गया और अपनी गजसेना व अश्वसेना लेकर वह तुरंत उत्तर की ओर बढा , जब गौर सुलतान मुहम्मद को पृथ्वीराज के आगमन का समाचार मिला तो उसका माथा ठनका , उसे तो जासूसों से यह खबर मिली थी की पृथ्वीराज अपनी नई रानी के साथ रांगरंग में मस्त है और उसे राजकाज की कोई सुधबुध नही है , उसने बहुत सोच विचार कर राय पिथौरा का सामना करने का निश्चय किया |
सुलतान ने करनाल के पास तरावली के मैदान में छावनी डाल दी और चौहानों की प्रतीक्षा करने लगा , कुछ दिन बाद पृथ्वीराज की सेनाओं ने भी उसके सामने अपना मोर्चा जमा लिया |
युद्ध आरम्भ हुआ , वीर योद्धाओं ने सुलतान के दाए और बाए बाजुओ पर इतनी तेजी से धावा बोला की तुर्कों के पैर उखड़ गये और वे तितरबितर हो कर भाग निकले , लेकिन सुलतान की अधीनता में केन्द्र भाग अंत तक जमा रहा , राय पिथौरा के छोटे भाई गोविन्दराज ने अपनी जंगी हाथियों और सवारों के लेकर शत्रु के केंद्र पर धावा बोला और उसे चारो और से घेर कर शिंकजे में कसना शुरू किया |
सुलतान की सेना में घबराहट फ़ैल गयी , गोविन्दराज भी अपने यशस्वी भाई की तरह बलवान था , उसके सवारों ने ख़ास सुलतान पर तेजी से हमला किया गोविन्दराज तुर्कों को मारता काटता सुलतान के सामने जा पहुंचा , सुलतान ने मृत्यु को सामने देखकर बड़ी तेजी से गोविन्दराज पर तलवार चलाई , चोट जबड़े पर पड़ी , जिससे वह कुछ कट गया |
गोविन्दराज ने निशाना बाँध कर अपना बरछा फेंका , वह सुलतान की बांह में घुस गया और वहा गहरा घाव हो गया , सुलतान इस चोट से विचलित हो गया , बांह में से तेजी से रक्त बहने लगा और उस पर बेहोशी छाने लगी , सुलतान की इस अवस्था का आँखों देखा हाल इतिहासकार सिराज ने '' तबकातेनासिरी '' में इस प्रकार लिखा है : ------- ' सुलतान ने अपने घोड़े का मुंह घुमाया और भाग चला , घाव में अत्यधिक पीड़ा के कारण वह और अधिक न भाग पाया , इस्लामी सेना की पराजय हुई , जिस से उसे अपार क्षति उठानी पड़ी . सुलतान तो घोड़े से गिरा जा रहा था , यह देख क्र एक शेरदिल योद्धा खिलजी नवयुवक ने सुलतान को पहचान लिया , उस के पीछे वह उछल पडा और बेहोश सुलतान के गिरते हुए शरीर को अपनी बांहों में थाम क्र घोड़े को ऐड लगाई तथा युद्धक्षेत्र से दूर ले गया '
जब मुसलमानों ने सुलतान की ऐसी दशा देखी तो उन के भी पैर उखड़ गये और वे जान बचाकर भागे , सैनिको ने 40 कोस तक उनका पीछा किया पर घायल सुलतान उनके हाथ न लगा , वह एक गुप्त स्थान पर छिपा हुआ था |
जब सैनिको के खोजी दस्ते दूर निकल गये तो तुर्क सैनिक अपने घायल और मरणासन्न सुलतान को एक पालकी में डाल कर आगे बढे , धीरे -- धीरे दुसरे भगोड़े सैनिक भी उन के आसपास इकठ्ठे हो गये , उन के मन में '' राय पिथौरा '' का आतंक बुरी तरह समाया हुआ था , इसलिए वे ताबड़तोड़ कूच पर कूच करते जा रहे थे , सिंध नदी को पार कर के ही उन की जान में जान आई | अपनी राजधानी पहुँच कर सुलतान कई महीने पंलग पर पडा इलाज कराता रहा स्वस्थ होते ही उस ने सबसे पहले युद्धभूमि से भागने वाले सैनिको और सरदारों को दंड दिया और उनका मुंह काला कर के सारी नगरी में घुमाया , इसके बाद उस ने नए सिरे से अपनी सेना का संगठन किया और पिछली हार का बदला लेने के लिए आक्रमण की तैयारियों में लग गया | वीरभूमि भारत में कभी भी शौर्यपराक्रम की कमी नही रही है लेकिन यहाँ के राजाओं की युद्ध नीति में मुख्य दोष यह रहा है की वह आक्रामक न हो कर रक्षात्मक ही रही , वे सदैव रक्षात्मक युद्ध लड़ते रहे अर्थात पहल करने का मौक़ा विदेशी आक्रमणकारी को देते रहे , उन्होंने यह कभी नही सोचा की दुश्मन को अपनी धरती पर आने ही क्यों दे | इससे पहले की वह हमारे घर में घुसकर लूटमार करे , क्यों न हम ही उसे उसी के घर में जा दबोचे और अपनी धरती को रणक्षेत्र न बनने दे | पृथ्वीराज के हाथो मुहम्मद गोरी बुरी तरह तबाह हो गया था और अपनी लुटीपिटी भयभीत , घायल सेना के साथ ताबड़तोड़ भागा जा रहा था , यदि उस समय पृथ्वीराज उसे गजनी तक जा खदेड़ता तो उसका का मार्ग रोकने वाला कोई नही था , गजनी में यदि एक बार वह अपनी तलवार चमका देता तो फिर शताब्दियों तक के लिए भारत सुरक्षित रह जाता , पृथ्वीराज को अगले वर्ष ही अपनी इस भूल का की सजा मिल गयी और यह देश आगामी लगभग 800 वर्षो के लिए गुलाम बन गया |

क्रमश :

सुनील दत्ता 
 साभार ----- स . विश्वनाथ
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