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बुधवार, 4 मार्च 2015

उद्देशिका, धर्मनिरपेक्षता व संविधान

केंद्र सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस पर जारी एक विज्ञापन पर विवाद खड़ा हो गया था। इस विज्ञापन में संविधान की उद्देशिका की जो छायाप्रति छापी गई थीए उसमें से 'समाजवाद' व 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द गायब थे। इस संबंध में भाजपा नेताओं का स्पष्टीकरण यह था कि वह, मूल संविधान की उद्देशिका की फोटो प्रति थी, जिसमें ये दोनों शब्द नहीं थे।
यह सही है कि 'समाजवाद' व 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द उद्देशिका में 42वें संशोधन के जरिये सन् 1976 में जोड़े गये थे। यह एक रहस्य बना रहेगा कि मूल संविधान की उद्देशिका का विज्ञापन में प्रकाशन सकारण था ;क्योंकि वह वर्तमान शासक दल की विचारधारा से मेल खाती है या फिर ऐसा केवल भूल से हुआ। संभावना यही है कि यह गलती नहीं थी क्योंकि शासक दल, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों में विश्वास नहीं करता और उसने इन संवैधानिक मूल्यों की कई अलग.अलग मौकों पर निंदा की है और मजाक बनाया है। जब प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के सम्राट को गीता की प्रति भेंट की थी तब उन्होंने धर्मनिरपेक्षतावादियों का मखौल बनाते हुए कहा था कि वे इस मुद्दे पर तूफान खड़ा कर देंगे और टीवी पर बहसों का तांता लग जायेगा।
गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की भाजपा सरकारें, स्कूलों के पाठ्यक्रमों में हिंदू धार्मिक पुस्तकों के अंश शामिल कर रही हैं और सरस्वती वंदना व सूर्य नमस्कार जैसे हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों को अनिवार्य बना रही हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 28 व 29 का उल्लंघन है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,ऊंची जातियों की परंपराओं को देश पर लादने की कोशिश कर रहे हैं और भाजपा सरकारें इस प्रयास को अनदेखा कर रही हैं। ये संगठन उन सभी कलात्मक अभिव्यक्तियोंए फिल्मों, विचारों व सोच पर हिंसक हमले कर रहे हैं, जिनसे वे सहमत नहीं हैं। वे अल्पसंख्यकों को जबरदस्ती हिंदू बनाने का प्रयास कर रहे हैं और हिंदुओं द्वारा अन्य धर्मों को अंगीकार करने के प्रयासों को बल प्रयोग से रोक रहे हैं। वे वैलेंटाइन डे सहित कई त्योहारों और उत्सवों के विरोधी हैं। वे अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैला रहे हैं, जिसके कारण छोटे.बड़े शहरों में अलग.अलग धर्मों के लोगों के अलग.अलग मोहल्ले बसने लगे हैं। वे हिंदू ऊँची जातियों की खानपान की आदतों को जबरदस्ती पूरे देश पर लादने का प्रयास कर रहे हैं। इस अभियान के तहत वे मवेशियों को ढोने वाली गाडि़यों को जबरदस्ती रोकते हैं, मवेशियों को अपने कब्जे में ले लेते हैं व बूचड़खानों के सामने प्रदर्शन आदि करते हैं। वे चाहते हैं कि देश में विवाह और मित्रता भी हिंदू सामाजिक पदानुक्रम के अनुरूप हों। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, गैर.हिंदुओं के बारे में दुष्प्रचार कर समाज को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित कर रहे हैं। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे युवाओं को उनकी पसंद के जीवनसाथी और मित्र चुनने के अधिकार से भी वंचित करने की कोशिश कर रहे हैं और शिक्षा संस्थानों, मीडिया व खाप पंचायतों आदि की मदद से एक विशिष्ट संस्कृति का प्रचार कर रहे हैं और उसे श्रेष्ठतम बता रहे हैं। यह सब संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ है और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए सकारात्मक प्रयास, जिसमें उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के साथ.साथ उनकी संस्कृति की रक्षा करना भी शामिल है। भाजपा सरकारए समाज के वंचित तबकों,जो पारंपरिक रूप से जाति.आधारित हिंदू सामाजिक व्यवस्था से बाहर थेए कि बेहतरी के किसी भी प्रयास की विरोधी है। स्वतंत्र बाजार की अवधारणा में विश्वास रखने वाले ये लोगए संसाधनों के बंटवारे का नियंत्रण बाजार के हाथ में देकर, सामंती, जातिगत व लैंगिक ऊँचनीच को बढ़ावा देना चाहते हैं। जब संसाधनों का वितरण बाजार से नियंत्रित होता है तब उससे सबसे अधिक लाभ उन वर्गों को होता है जिनका बाजार पर  प्रभुत्व है। 'मेक इन इंडिया' व 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' आदि जैसे अभियानों के जरिए और श्रम कानूनों में संशोधन कर, नियोक्ताओं के लिए कर्मचारियों को नौकरी से हटाना आसान बना दिया गया है। उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर पर्यावरणीय मुद्दों की अनदेखी की जा रही है और बड़े व्यवसायिक घरानों को मजदूरों का शोषण करने और किसानों की जमीनों पर जबरदस्ती कब्जा करने की खुली छूट दे दी गई है। इसके लिए एक नये भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने की तैयारी चल रही है जिसके अंतर्गत किसानों को अपनी जमीन मिट्टी के मोल बेचने पर मजबूर होना पड़ेगा। इस तरहए भाजपा समाजवाद की विरोधी भी है।
यद्यपि यह तथ्य है कि'धर्मनिरपेक्ष' व 'समाजवाद' शब्द संविधान सभा द्वारा स्वीकृत संविधान की उद्देशिका के हिस्से नहीं थे परंतु प्रश्न यह है कि क्या स्नातक परीक्षा पास करने के बाद, आप किसी से यह कहते हैं कि आपकी शैक्षणिक योग्यता 12वीं है ? क्या आप अपने ड्रायविंग लायसेंस या पासपोर्ट पर अपने बचपन की फोटो चिपकाते हैं
इसी तरह, हमने, एक लंबी लड़ाईए जिसमें हजारों लोगों ने अपना जीवन खपा दिया, हजारों ने शारीरिक कष्ट भोगे और अपनी जानें गंवाईं, के बाद स्वतंत्रता हासिल की है। हम आज एक प्रजातांत्रिक, समाजवादी,धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं। क्या अब हम अपने अतीत का कोई चित्र निकालकर यह घोषणा कर सकते हैं कि हम हिंदू राष्ट्र हैं और हमारा संविधान यह नहीं कहता कि हम समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष हैं? हिंदू राष्ट्र, अनिवार्यतः धर्मनिरपेक्षता.विरोधी होगा। हम यह देख रहे हैं कि किस तरह हिंदू राष्ट्र की विचारधारा को हिंदू महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, श्रमिकों और उदारवादियों पर जबरदस्ती थोपा जा रहा है।
यद्यपि धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी शब्द हमारे संविधान में बाद में जोड़े गये थे तथापि हमारे संविधान निर्माताओं के मन में इस संबंध में कोई संदेह नहीं था कि वे एक धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी संविधान का निर्माण कर रहे हैं। उन्होंने इन शब्दों का इस्तेमाल जानते.बूझते नहीं किया। उस समय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का विरोध नहीं तो कम से कम अधार्मिकता अवश्य समझा जाता था। इसके विपरीत, हमारे संविधान निर्माताओं के लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिक विश्वासों से दूरी बनाना या उनका विरोध करना नहीं बल्कि अपने पसंद के किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने व उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता था। लोकनाथ मिश्र ने संविधान सभा की एक बैठक में पूछा था कि जब अनुच्छेद 19 ;संविधान के अंतिम मसविदे का अनुच्छेद 25,नागरिकों को अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार देता है तब धर्मनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल संविधान में कैसे किया जा सकता है! दक्षिणपंथी तत्वों के कड़े विरोध के बाद भी, संविधान में किसी भी धर्म को मानने व उसका आचरण करने के साथ.साथ उसका प्रचार करने का अधिकार भी नागरिकों को दिया गया।
एच व्ही कामथ चाहते थे कि उद्देशिका इन शब्दों से शुरू हो ''ईश्वर के नाम पर हम भारत के लोग''। ए थानू पिल्लई ने कामथ के इस संशोधन के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि यह आस्था की स्वतंत्रता के विरूद्ध होगा। रोहिणी कुमार चौधरी, कामथ के संशोधन में एक और संशोधन करना चाहते थे। उनका कहना था कि संविधान इन शब्दों से शुरू होना चाहिएए 'देवी के नाम पर'। पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने भी कामथ के संशोधन का विरोध करते हुए कहा कि ईश्वर के नाम से संविधान की शुरुआत करना, ईश्वर को लोगों पर लादने के बराबर होगा और यह संविधान द्वारा हर एक को दी गई विचार, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास और आराधना की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। कामथ ने अपने संशोधन प्रस्ताव पर मतदान कराने पर जोर दिया। उसके पक्ष में 41 और विपक्ष में 68 वोट पड़े। इसी तरह, कामथ के संशोधन के अन्य रूपांतरों, जिनमें 'परमेश्वर के नाम पर','सर्वशक्तिमान की कृपा से' से संविधान के शुरुआत करने की बात कही गई थी आदि भी ध्वनिमत से अस्वीकार कर दिए गए। ब्रजेश्वर प्रसाद ने जोर देकर कहा कि धर्मनिरपेक्ष शब्द, संविधान का हिस्सा बनना चाहिए क्योंकि राष्ट्रीय नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता पर बहुत जोर दिया था और इससे 'अल्पसंख्यकों' का मनोबल बढ़ेगा।
इस तरहए यद्यपि 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द संविधान की उद्देशिका में शामिल नहीं किया गया क्योंकि उस समय उसका अर्थ, आज के उसके अर्थ से बहुत भिन्न था परंतु साथ ही संविधान सभा ने 'ईश्वर के नाम पर' आदि जैसे शब्दों से संविधान की शुरुआत करने के प्रस्ताव को खारिज कर यह संदेश भी दिया कि वह एक मध्यमार्ग पर चलने की इच्छुक है।
इसी तरह, कई संशोधनों द्वारा यह प्रस्ताव किया गया था कि 'समाजवाद'शब्द उद्देशिका में शामिल किया जाए। धर्मनिरपेक्षता की तरह,उस काल में समाजवाद शब्द का अर्थ भी उसके आज के अर्थ से बहुत भिन्न था। उस समय समाजवाद का अर्थ था उत्पादन के सभी साधनों पर राज्य का नियंत्रण और संपत्ति के निजी स्वामित्व का उन्मूलन। उस समय ये नीतियां अपनाना, भारत के लिए संभव नहीं था। मौलाना हसरत मोहानी ने प्रस्तावित किया कि उद्देशिका में भारत को सोवियत संघ की तर्ज पर'भारतीय समाजवादी गणतंत्रों का संघ' कहा जाना चाहिए। शिब्बन लाल सक्सेना के संशोधन प्रस्ताव में अन्य चीजों के अलावा, इन शब्दों को उद्देशिका में शामिल करने की बात कही गई थी.'भारत को सर्वप्रभुता सम्पन्न, स्वतंत्र, प्रजातांत्रिक,समाजवादी गणतंत्र'। ब्रिजेश्वर प्रसाद चाहते थे कि 'भारत को समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने के लिए सहकारी राष्ट्रमंडल के रूप में' इन शब्दों से उद्देशिका शुरू हो। परंतु ये सभी संशोधन खारिज हो गए।
संविधान में महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों व सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अन्य वर्गों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाये जाने से संबंधित प्रावधान शामिल किए गए। संविधान के निर्माताओं ने संविधान के भाग.चार में राज्य के नीतिनिदेशक तत्वों को शामिल किया, जिसमें अन्य चीजों के अलावा यह कहा गया है कि राज्य अपनी नीतियों का इस तरह संचालन करेगा कि 'जिससे  समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो, जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो' ;अनुच्छेद 39 'ख' व 'आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि धन और उत्पादन.साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो' ;अनुच्छेद 39 'ग'। संविधान पूरी तरह तैयार हो जाने के बाद 25 नवंबर को संविधान सभा में दिये गए अपने भाषण में डॉ. आंबेडकर ने संविधान को 'सामाजिक प्रजातंत्र' का वाहक बताया। उन्होंने कहाए 'हमें अपने राजनीतिक प्रजातंत्र को सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना होगा। राजनैतिक प्रजातंत्र, लंबे समय तक नहीं चल सकेगा,यदि उसका आधार सामाजिक प्रजातंत्र नहीं होगा।'
संविधान सभा ने संविधान में 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्दों को शामिल करने की जिम्मेदारी आने वाली पीढि़यों के लिए छोड़ दी। सभा में अपने अंतिम भाषण में डॉ. आंबेडकर ने जैफरसन को उद्धत करते हुए कहाए 'हम हर पीढ़ी को एक अलग राष्ट्र मान सकते हैं,जिसे बहुमत के आधार पर, किसी भी सिद्धांत या मूल्य को अंगीकृत करने का अधिकार होगा। एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी पर किसी भी तरह के बंधन लादने का अधिकार उसी प्रकार नहीं है, जिस प्रकार एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र के निवासियों पर अपने मूल्य या सिद्धांत लादने का'।
डॉ. आंबेडकर को यह एहसास था कि भारत एक ऐसे संविधान को अंगीकार कर रहा है जो सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है जबकि भारत में घोर सामाजिक असमानता व्याप्त है। '26 जनवरी 1950 को हम एक विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करेंगे। राजनीति में समानता होगी परंतु सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता का बोलबाला होगा। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट और हर वोट की बराबर कीमत के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे। दूसरी ओर,हमारे सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण, हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम हर व्यक्ति के मत की समान कीमत के सिद्धांत का उल्लंघन करेंगे। इस तरह के विरोधाभासों के बीच हम कब तक जियेंगे ? कब तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता नहीं लायेंगे ? अगर हम लंबे समय तक लोगों को सामाजिक और आर्थिक समानता से वंचित रखेंगे तो हम अपने राजनैतिक प्रजातंत्र को खतरे में डालेंगे। हमें इस विरोधाभास को जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी खत्म करना होगा। अन्यथा जो लोग असमानता से पीडि़त हैं, वे इस सभा द्वारा कठिन परिश्रम से तैयार किये गए राजनीतिक प्रजातंत्र के ढांचे को तहस नहस कर देंगे।'
हमें डॉ.आंबेडकर के इन प्रबुद्ध वचनों को याद रखना होगा। भारत में जिस तेजी से आर्थिक और सामाजिक असमानताएं बढ़ रही हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है। आखिर कब तक हम हिंदुत्व की विचारधारा का प्रयोग कर उन लोगों को, जो समाज के हाशिये पर पड़े हैं और निर्धनता से पीडि़त हैंए यह विश्वास दिलाते रहेंगे कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता उनके ;हिंदू हितों के विरूद्ध है। दिल्ली के चुनाव में आप की शानदार विजय का संदेश यही है कि आमजनों को ज्यादा लंबे समय तक ऐसे विकास के मोहजाल में, फंसाकर रखना संभव नहीं होगा, जो केवल कुछ उद्योगपतियों के खजाने भरता हो।
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 13 जनवरी 2013

लड़ना जानती हैं बेटियाँ-2

एक ओर रोज़गार तथा व्यावसायिक शिक्षा के अवसरों का बड़े नगरों तक केन्द्रित होते जाना, विपुल सम्पदा तथा आधुनिकता की चकाचैंध का बढ़ना, दूसरी ओर सामाजिक पिछड़पन, शिक्षा व रोज़गार के अवसरों का सीमित होना, आधुनिकता के अवदानों की वंचना। फलस्वरूप ग्रामीण अंचलों, छोटे शहरों तथा अन्य पिछड़े क्षेत्रों से युवा वर्ग तथा दूसरे आयुवर्ग के लोगों का बड़े नगरों की ओर पलायन। ऐसे में युवाओं पर जीवन शैली को बदलने का दबाव बनना लाज़मी है। खुली हवा में साँस लेने के लिये बेचैन बेटियाँ जबरन थोपी गयी वर्जनाएं तोड़ती हैं, अपनी साहसिकता में कुछ ख़तरे भी उठाती हैं। मुक्ति के चिन्तन के साथ आगे बढ़ना है तो ख़तरे उठाना ही होंगे, मुक्तिबोध को याद कीजिये-
तोड़ने होंगे गढ़ और मठ सब
जाना होगा दुर्गम पहाड़ो के उस पार

    यही वह मक़ाम है जहाँ बदलती सोच और जीवन पद्धति तथा जड़ संस्कारों के साथ होने वाले टकराव से पैदा हुए अन्तर्विरोध सामने आते है। रिश्तों की स्वाभाविकता तथा पवित्रता पर सन्देह करने वाले मुखर होते हैं। इस स्वाभाविकता व पवित्रता पर छापा मारने के लिये वह व्याकुल हो उठते हैं।
    जि़म्मेदार व सभ्य नागरिक का विवेक व संस्कार न दे सकने वाला शिक्षा तंत्र तथा परिवार संस्था की कमज़ोरी के कारण भी हालात बिगड़े हैं। नशे के ख़तरों को जानते हुए भी सरकारों द्वारा शराब की सुलभता को नित नया विस्तार देने की नीतियों ने भी सामाजिक अराजकता को नयी उठान दी है। यह उपनिवेशवादी प्रवृत्ति है, जो संकेत करती है कि सरकारें जानता को अपना उपनिवेश बना कर रखना चाहती है। आर्थिक लाभ तथा युवा पीढ़ी में संघर्षशीलता की धार को कुन्द करने की मंशा से शराब माफि़याओं से सरकारों की साँठ-गाँठ किसी से छिपी नहीं है। जनविरोधी सत्ताएँ हमेशा ही से अपने विरुद्ध प्रतिरोध की संभावना को कुन्द करने के लिये नशाखोरी का इस्तेमाल करती आयी हैं। समूचे शिक्षा तंत्र, आबकारी नीति, की क़ानून, पुलिस व्यवस्था तथा न्याय प्रणाली की सघन समीक्षा के साथ समानुपातिक सामाजिक विकास को सिद्धान्त लागू किए बिना हालात में अपेक्षित तब्दीली संभव नहीं है। स्त्री के सम्मान को, उसकी प्रगति की समस्त संभावनाओं को सुनिश्चित कर सकने वाले सांस्कृतिक दृष्टिकोण की भी उतनी ही ज़रूरत है। उल्लेखनीय है कि सरकारें अपने कार्यक्रमों में सजी-धजी महिलाओं को सज्जा की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करती हैं। ऐसी सुन्दरियाँ उन्हें सम्मोहित करती हैं, जिनके अधरों पर मादक मुस्कान हो, शब्द नहीं, चेहरे पर मृदुलता हो तनाव नहीं। आंखों में चमक हो, प्रश्न नहीं।
    इसे बाज़ार वादी दृष्टिकोण ही कहा जायेगा। रोजे़ रौशन की तरह यह सब पर अयाँ (प्रकट) है कि आक्रामक होते बाज़ार तथा बाज़ारवादी दृष्टिकोण ने स्त्री का संकट बढ़ाया है। उसे माल बेचने का साधन, कई बार तो स्वयं उसे माल बना दिया। उपभोक्ता को ललचाने के उपक्रम मे वो स्वयं उपभोक्ता सामग्री में बदलते हुए यौन वस्तु बन गयी है। सभी तरह के विज्ञापनों के स्त्री विरोधी चरित्र पर फ़ौरी तौर पर अंकुश लगाने की आवश्यकता तो है ही।
    विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने के उद्देश्य से टी0वी0 सीरीयल्स बनाने वालों ने बाज़ारवादी शक्तियों से धृणित समझौते किए हैं। जिस प्रकार भारतीय सिनेमा ने स्त्री के साथ विराटता ग्रहण करता आघातक़ारी विश्वासघात किया ठीक उसी तरह चैनल्स भी आमतौर पर स्त्री को अवमूल्यित करने के षड्यन्त्रों का हिस्सा बने हुए हैं। इन सीरियल्स में स्त्रियाँ या तो एक दूसरे के विरुद्ध षड्यन्त्र कर रही होती हैं अथवा अपना गर्भ किराये पर उठा रही होती है। उनकी दिलचस्पी प्रायः ग़ैर वैवाहिक, इतर पति सम्बन्धांे में होती है, धार्मिक परम्पराओं, आरोपित सामाजिक मूल्यों को बचाने या फिर स्त्री की रुढि़वादी छवि को सुरक्षित रखने में। चैनल्स ने फि़ल्मों के समान ही धार्मिक अन्ध विश्वास कर्मकाण्ड तथा रुढि़वाद के महिमामण्डन से स्त्री की कठिनाई को जटिल बनाया है। उसकी सामाजिक गतिविधि को बाधित किया है तथा उसके भीतर विकसित हो सकने वाले आत्म विश्वास को पीछे की ओर धकियाया है। सिनेमा में तो तब भी एक ख़ास दौर में सही सामाजिक उद्देश्य को ख़ास महत्व प्राप्त रहा है। यर्थाथवादी सिनेमा तथा समान्तर सिनेमा की भी एक धारा रही है। स्त्री संघर्षशीलता अपनी वास्तविक ज़मीन खोजती हुई चित्रित हुई है। कुछ फि़ल्मों में तो अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष में वो नेतृत्व कारी भूमिका में है। इन संघर्षों के सरोकार वृहत्तरता लिए हुए है। आज के सिनेमा तथा चैनल्स ने तो जैसे स्त्री की इस संघर्षशीलता का दाह संस्कार ही कर दिया। आज के सिनेमा (सब नहीं), सीरियल्स तथा विज्ञापनों के लिये स्त्री केवल देह रह गयी है। देह जिस पर हाथ फेरने मात्र से काला आदमी गोरा और मोटा आदमी स्मार्ट हो जाता है।
    16 दिसम्बर को घटित घटना के विरुद्ध बेटियों का अप्रत्याशित रूप से बड़ी संख्या में प्रतिरोध के मैदान में उतरना, उनकी जीवटता, दृढ़ता तथा ख़तरे उठाने के हौसले ने मैथिलीशरण गुप्त के ‘मर्दानी’ को झुठलाते हुए साबित किया है कि वे लड़ीं इसलिये कि वह लड़कियाँ थीं। स्त्री थीं, वह लड़ी मर्दों या मर्दानों की अपेक्षा अधिक जुझारू तरीके़ से। यक़ीनन बेटे भी लड़े, भाई भी लड़े मज़बूती से लड़े लेकिन संवेदनहीनता की सीमाएँ लाँघ जाने वाली सरकार को झुका सकने वाली धार संघर्ष को बेटियों के कारण ही प्राप्त हुई।
    भारतीय समाज की ऐतिहासिक उपलब्धि को अपेक्षित परिणामों तक पहुँचाने के लिये आवश्यक है कि बेटियाँ-बेटे, बहनें भाई सब यह समझें कि समानता के सिद्धान्त पर आधारित यौन हिंसा विरोधी सामाजिक चेतना को व्याप्तता में विकसित किए बिना यादगार संघर्ष के लक्ष्य केा प्राप्त कर पाना कठिन है। इसके लिये सघन सामाजिक विमर्श तथा व्यापक संवाद बनाना ही होगा। जिसकी शुरुआत यक़ीनन परिवार ही से करनी होगी।
    ऐसी प्रत्येक घटना को तत्ववादी शक्तियाँ सामाजिक नैतिकता के आधार पर अपनी स्थिति मज़बूती करने के लिये इस्तेमाल करती आयी हैं धर्म गुरुओं की स्त्री विरोधी सोच ने उसके अवसाद को अधिक दंश कारी बनाया है। सह शिक्षा लिबास, सामाजिक सक्रियता तथा आज़ादाना विचरण हमेशा उनके निशाने पर रहे हैं। वह भूल जाते हैं कि बलात्कार तथा दूसरे प्रकार की यौन हिंसा के पीछे स्त्री पुरुष यानी कि लड़के लड़कियों के बीच एक मोटी दीवार का, घने अजनबी पन और सान्निध्य का कुण्ठाजनक अभाव प्रमुख रूप से उपस्थित है। यौन उत्तेजना को गति देने वाले वातावरण ने लड़के-लड़कियों को एक दूसरे के निकट आने की ललक को बढ़ाया है। बावजूद इसके बलात्कार के लिये इस ललक केा कारण मानना तथ्य संगत नहीं है। बलात्कार से इतर यौन हिंसा की दूसरी गतिविधियों में इस ललक की उपस्थिति संभव हो सकती है। सच पूछिये तो सह शिक्षा ने  हालात को भयावह हद तक जाने से बचाया है, अनुभव बताते हैं कि सह शिक्षा की व्याप्तता हालात को बेहतर बनायेगी बिगाड़ेगी नहीं। समाज के आधुनिक विकास के लिये स्त्री का घर से बाहर निकलना नितान्त आवश्यक है, स्वयं उसके सुख के लिये आत्मनिर्भरता बेहतर स्थिति हो सकती है। धर्मों-मजहबांे से स्त्री के सेविका स्वरूप को आदर्श स्त्री का चिंतन लेने वाले उसकी आज़ादी, आत्मनिर्भरता, सामाजिक भागीदारी को कैसे स्वीकार कर सकते हैं।
    समाज के आधुनिक विकास को अवरूद्ध करना आत्मघाती साबित होगा। आधुनिकता के इस महा अभियान में सबकी साझी भूमिका है फिर भी लड़कियों की तरक़्क़ी बताती है कि समाज सभ्यता तथा आधुनिकता के किस मुहाने तक पहुँच पाया है। मध्य युगीन जीवन मूल्यों से हम कितना मुक्त हो पाये हैं।
    जिस समाज में औरतों को खुली हवा में साँस लेने, खिलखिलाने, चीख़ने, ज्ञान के नये क्षेत्रों में जाने, आत्मनिर्भर होने तथा अपनी प्रतिभा के जौहर दिखाने अपनी अस्मिता के संघर्ष पर पाबन्दी हो, वह समाज नहीं क़ैद ख़ाना है। ऐसे कै़दख़ाने की सलाख़ों का टूटना ही बेहतर है।

     -  शकील सिद्दीक़ी
लोकसंघर्ष पत्रिका में शीघ्र प्रकाश्य

शनिवार, 12 जनवरी 2013

लड़ना जानती हैं बेटियाँ-1

मंजू अरुण की एक कविता की पंक्तियाँ हैं-
 
 ‘‘बेटियाँ
    यदि ताड़ की तरह बढ़ती हैं तो,
    छतनार की तरह फैलती भी हैं।’’

    और सच आज वह फैल गयी हैं, चारों तरफ़, मुट्ठी भींचे सीना ताने। क्षोभ, क्रोध, आवेश और आहत भाव से कुछ पश्चाताप से भी कि वह बचा नहीं पायीं दरिन्दगों की दरिंदगी की निशाना बनी अपनी एक साथी को। फिर भी एक, थोड़ा झीना ही सही एक आश्वस्त भाव है उनके पास कि वह सत्ता के मद से डूबे लोकतांत्रिक तानाशाहों को कुछ तो झुका पायीं, जो कह रहे थे, सरकारें जनता के पास नहीं जाया करतीं, वह जनता की बेटी का शव लेने एयरपोर्ट तक पहुँच गये, शमशान घाट भी। अब वह जनता के पास जाने के अवसर की तलाश में है। जनता जब सरकार के द्वार पर जम की गयी, तब वह थोड़ा विचलित हुए। जनता यदि सरकार चुनती है, तो उसे उखाड़ भी फेंकती है। हालाॅकि सरकारंे तो सिर्फ़ चुनने का अधिकार देना चाहती हैं। जैसे पुरुष (अधिकांश) अपनी वासनाओं की तुष्टि, स्वादिष्ट भोजन, ढेर सारे सुखों, अपनी नस्ल चलाने तथा स्त्री को स्त्री बने रहने के लिये विवाह करता है, उसे एक घर देता है। पुरुष ज़्यादातर उस स्त्री को बहुत पसन्द करता है जो घर में रहे। उसी तरह जैसे सरकारें घर में रहने वाली जनता को बहुत पसन्द करती हैं। जनता को घर में रखने के लिये ही तो उसने इतने सारे मादक टी0वी0 चैनल्स दिए हैं, नेट का रोमांच दिया है। स्त्री जो जनता ही का हिस्सा है, कात्यायनी की एक कविता के अनुसार ‘‘यह स्त्री सब कुछ जानती है/पिंजरे के बारे में/जाल के बारे में/यंत्रणा गृहों के बारे में।’’ इसलिये कभी-कभी ही सही वह निकलती हैं घरों से बाहर। इस बार बेटियों के साथ बेटे भी थे। बहुत से लोग इस कारण चिंतित हैं कि बेटियाँ स्कर्ट और जींस में बाल लहराते हुए निकलीं। उन्होंने दुपट्टे तक नहीं ओढ़ रखे थे। वह दिन में मोमबत्तियाँ जलाती हैं, रात में डिस्को जाती हैं।  हिंसा के विरुद्ध सड़कों पर निकलती बेटियों के प्रति यह शब्द कम वीभत्स हिंसा नहीं है। इसमें अवमानना का दंश भी है। जिसकी चुभन आज भी जारी है।
    देश की राजधानी में क्रूर हिंसा की इतनी बड़ी घटना घट गयी हो और सरकार के अधीन काम करने वाला प्रशासन जि़म्मेदार मंत्री इस तरह का व्यवहार करें जैसे दरिन्दों ने पाश्विकता की सीमाएँ न तोड़ी हों, जुम्मन मियाँ की बकरी मर गयी हो। संवेदनशीलता का ऐसा भयानक ह्रास कम देखने में आया है। साम्प्रदायिक या जातीय दंगों के दौरान तो यह होता है कि एक वर्ग दूसरे वर्ग के संहार, स्त्री के साथ बलात्कार पर चुप रहता है, या प्रसन्न होता है, दुखी कम लोग होते हैं। गर्भवती स्त्री का पेट फाड़कर भू्रण को आग में फेंकने, बलात्कार की फोटोग्राफ़ी की घटनाएँ उसी गुजरात में घटी जहाँ शान्ति और अहिंसा का बखान सबसे अधिक होता है। जो राष्ट्र पिता की जन्मभूमि है। जहाँ आसाराम बापू का आश्रम भी है। समझना होगा कि स्त्री के साथ हिंसा के विरुद्ध कट्टर कि़स्म के निर्पेक्ष दृष्टिकोण की आवश्यकता है। निर्पेक्षता का तात्पर्य चुप रहना नहीं, धर्म जाति और वर्ग के भेद से मुक्त होना है। परन्तु ऐसे अवसरों पर प्रायः सघन मौन ही प्रकट सच के रूप में सामने आया। समानता के सिद्धान्त पर विश्वास करने वाले व्यक्तियों एवम् संगठनों ने अवश्य प्रतिरोध दर्ज कराया, आन्दोलन किए। बलात्कारियों के प्रति सम्मति का भाव रखने वाले नरेन्द्र मोदी तो युवा हृदय सम्राट कहे जाने लगे। दिल्ली की घटना पर विराटता, विशेष रूप से युवजन में आक्रोश का फूट पड़ना एकदम स्वाभाविक है,वह लम्बे समय में शनैः शनैः संचित कथा का विस्फोट था। निश्चय ही वह बलात्कार व स्त्री के प्रति हिंसा की जघन्यतम् घटना थी तो क्या कम जघन्य घटनाओं पर मौन और बलात्कारियों के साथ सहानुभूति को उचित मान लिया जाये। आखि़र एक राजनैतिक दल के रूप में भारतीय जनता पार्टी के सम्बन्ध में बलात्कार की समस्या को लेकर बलात्कार विरोधियों का क्या रवैया होना चाहिये। यह विचारणीय विषय है। स्वयं कांग्रेस की सरकारों के समय में विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासियों, दलित और मुस्लिम महिलाओं के साथ क्रूर बलात्कार हुए। भारत-पाकिस्तान सहित कुछ दूसरे देशांे में धर्म व नस्ल की आड़ में किए गये बलात्कार की घटनाओं के विरुद्ध महत्वपूर्ण लेखन दिखाई पड़ा। सआदत हसन मन्टो की कहानी खोल दो पिछले साठ वर्षों से लगातार चर्चा में है। हमारे देश में भी गुजरात की घटनाओं को लेकर तीखा बौद्धिक हस्तक्षेप हुआ है। धर्म निरपेक्ष व्यक्तियों-संगठनें ने ऐतिहासिक महत्व का काम किया है। प्रश्न बस इतना है, कि ऐसे व्यक्तियों या संगठनों की सामाजिक स्वीकृति का अनुपात क्या है? क्या वह पाकिस्तानी समाज में मन्टो की लोकप्रियता जैसा है।
कड़े क़ानूनों, कड़े दण्ड तथा उतनी ही कड़ाई से उन्हें लागू किए जाने की त्वरित अनिवार्यता से कौन इंकार कर सकता है, फिर भी स्त्री के साथ हिंसा, विशेष रूप से बलात्कार के प्रति घनी सामाजिक चेतना
के फ़ौरी निर्माण की भी उतनी ही ज़रूरत है। इसके साथ ही समानता की चेतना जिसमें लैंगिक समानता भी शामिल है, अनिवार्य सिद्धान्त के रूप जीवन में सक्रियता आवश्यक है। वरना वर्गो, धर्मों, जातियों और सम्प्रदायों में विभाजित समाज में स्त्री के साथ हिंसा के ख़तरे हमेशा बने रहते हैं, बल्कि बने हुए है। समानता की प्रखर सामाजिक चेतना के अभाव मंे उनके प्रति उसी अनुपात में सम्मति का भाव भी बना रहता है। प्रतिशोध की आग बुझाने का वह आसान सा साधन जो बनी हुई है। अपराध रोकने में क़ानून तथा त्वरित कार्यवाही की उपयोगिता अपनी जगह लेकिन अपराध की संभावनाओं को कम करने के लिये अपराध विरोधी सामाजिक वातावरण का निर्माण भी लाज़मी है। क़ानूनों से अपराधियों को या अपराध करने की मंशा रखने वालों को हतोत्साहित तो किया जा सकता है, स्त्री के प्रति पुरुष की पारम्परिक सोच को नहीं बदला जा सकता। 16 जनवरी के उपरान्त लगातार घटती बलात्कार की घटनाएँ जिसका साक्षात उदाहरण है, पुलिस, न्याय व्यवस्था तथा प्रशासन में उनके प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता का संचार भी संभव नहीं। पितृ सत्ता ने अपने साम्राज्य की लम्बी अवधि में पुरुष मानसिकता को फ़ासीवादी सोच के क़रीब ला खड़ा किया है। जिसके सामंतवादी वैचारिकता से गहरे रिश्ते हैं।
    समाज की केन्द्रीय सोच और अपराध के अन्र्तसम्बन्धों को समझना कठिन नहीं है। यह स्थिति गम्भीर सांस्कृतिक संकट की ओर भी संकेत करती है। भारतीय गतिविधियों में बदलती हुई प्राथमिकताओं के अनुरूप स्पेस स्वीकार कर सकने वाले सांस्कृतिक विवेक का निर्माण नहीं हो सका है। बावजूद इसके उनकी सामाजिक सक्रियता को नया विस्तार मिला है। बहुत से लोग, जिनमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अलमबरदार भी हैं तथा राजनेता और वैज्ञानिक भी कि बेटियों की बढ़ती सामाजिक भागीदारी को ही उनके प्रति जघन्य होती हिंसा का मूल कारण घोषित कर रहे हैं, ऐसे में वेशभूषा का उल्लेख तो आता ही है। कुछ पुरातन पंथी सहशिक्षा के सर इन हालात का दोष मढ़ रहे हैं। यह भूलते हुए कि हमारे समाज को ज़्यादा ख़राब होने से सह शिक्षा ने ही बचाया है। वह इस हक़ीक़त की ओर से आँखें मून्द लेते हैं कि देश में बलात्कार सहित दूसरी यौन हिंसा की घटनाएँ पारपम्परिक या घरेलू वेशभूषा वाली महिलाओं के साथ अधिक घटित होती हैं। ख़ौफ़नाक आँकड़ों का सच यह है कि सड़कों, पार्कों, सिनेमा हालों, रेस्ट्रां, माल्स या इस प्रकार के दूसरे सार्वजनिक स्थलों की अपेक्षा यौन हिंसा की घटनायें घरांे, खेतों, खलिहानों, नारी व बाल आश्रमों में अधिक सुनाई पड़ती है। सम्बन्धी, पड़ोसी तथा निकट परिचित लड़कियों का यौन उत्पीड़न करने में सबसे आगे हैं। रोली शिव हरे ने अपनी एक टिप्पणी में मध्य प्रदेश के आंकड़े दिए हैं कि मात्र एक वर्ष (2011) में बलात्कार के चैंतीस हज़ार मामले दर्ज हुए, पति द्वारा की गयी हिंसा के तक़रीबन सैंतीस हज़ार मामले सामने आये। समूचे देश के स्तर पर इस प्रकार कि हिंसक घटनाएँ कितने बड़े पैमाने पर घटित होगी, अनुमान लगा पाना कठिन नहीं है। जबकि प्रत्येक तीसरे मिनट पर बलात्कार होता हो।
    अपराध के समूचे यथार्थ पर फि़लहाल बात न करें तो भी स्त्री के प्रति बढ़ते हुए अपराध की पृष्ठभूमि में सक्रिय सामाजिक विकास की असमानता बढ़ने वाली, असमानुपातिक पद्धति से पैदा हुई नक़ली चकाचैंध, विसंगतियों और कुण्ठा की भूमिका पर ध्यान दिए बिना अपने समय के सच की आँखांे में आँखें डाल पाना कठिन है। यह सहसा अथवा फि़ल्मों या टी0वी0 सीरियल्स का प्रभाव मात्र नहीं है कि हिंसा और अपराध हमारे समाज की स्थाई प्रवृत्ति बनती जा रही है। इसे आर्थिक विकास, शासन पद्धति, सामाजिक संगठनों, सभी प्रकार की धार्मिक नैतिकता तथा अध्यात्म की ऐतिहासिक विफ़लता के रूप में देखा जाना चाहिये। अनिवार्य मानवीय मूल्यों, न्यूनतम सांस्कृतिक प्रतिमानों तथा सामाजिक संहिता की भी अवसाद पूर्ण पराजय यहाँ दिखाई पड़ती है।




-शकील सिद्दीक़ी
क्रमश:

लोकसंघर्ष पत्रिका में शीघ्र प्रकाश्य 
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