सोमवार, 19 जनवरी 2026

देश का महान शासक जिसकी संघी चर्चा नहीं करते हैं

देश का महान शासक जिसकी संघी चर्चा नहीं करते हैं संघी हमेशा पराजित हिन्दू राजाओ को हिन्दू महानायक के रुप में प्रस्तुत करते हैं उनके पराजित वहीं नायक होते हैं जिनको मुसलमानों ने बुरी हराया होता है अथवा लड़ाई का मैदान छोड़ कर भाग गया हो। समुद्र गुप्त एक महान शासक था और अपराजित नायक है। संघी अपनी मुखविरी सोच के आधार पर खलनायक को महान घोषित करते हैं। आईए महान समुद्रगुप्त (लगभग 335-375 ईस्वी) गुप्त वंश के महान सम्राट थे, जिन्होंने अपने सैन्य अभियानों से गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया और भारत के 'स्वर्ण युग' की नींव रखी, वे एक कुशल योद्धा, प्रशासक, कला-प्रेमी और कवि थे, जिन्हें उनके दरबारी कवि हरिषेण के प्रयाग प्रशस्ति से जाना जाता है, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया और वीणा बजाते हुए सिक्के जारी करवाए,. प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक: जन्म और माता-पिता: वे चंद्रगुप्त प्रथम और लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी के पुत्र थे. उत्तराधिकार: कई बड़े भाइयों के बावजूद, चंद्रगुप्त प्रथम ने अपनी प्रतिभा और योग्यता के कारण समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी चुना, जिसके बाद उन्होंने प्रतिद्वंद्वी कचगुप्त को हराकर सिंहासन प्राप्त किया. सैन्य विजय और साम्राज्य विस्तार: 'भारत का नेपोलियन': उन्हें वी.ए. स्मिथ ने 'भारत का नेपोलियन' कहा, क्योंकि उन्होंने कभी युद्ध में हार नहीं मानी और अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत से दक्षिण तक किया. विजय नीति: उन्होंने दिग्विजय की नीति अपनाई, जिसमें दक्षिण के 12 राजाओं को हराकर उन्हें राज्य लौटा दिए, जिससे वे 'राजाओं का राजा' (महाराजाधिराज) कहलाए. अश्वमेध यज्ञ: अपनी संप्रभुता साबित करने के लिए उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया और इसके उपलक्ष्य में सिक्के चलाए. प्रशासन और संस्कृति: कला और साहित्य के संरक्षक: वे एक महान कवि और वीणा वादक थे, जिनके दरबार में कवियों और विद्वानों का जमावड़ा रहता था. धार्मिक सहिष्णुता: वे विष्णु के भक्त थे, लेकिन सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु थे; उन्होंने बौद्ध मठों के निर्माण की अनुमति भी दी. स्वर्ण युग: उनके शासनकाल में राजनीतिक समृद्धि और सांस्कृतिक विकास हुआ, जो गुप्त काल के स्वर्ण युग की शुरुआत मानी जाती है. मृत्यु और उत्तराधिकारी: मृत्यु: लगभग 380 ईस्वी में उनका निधन हुआ. उत्तराधिकारी: उनके पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने उनके साम्राज्य का विस्तार जारी रखा.

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