गुरुवार, 22 जनवरी 2026
मोदी की नीतियों का पोस्टमार्टम प्रदूषण को भारत के लिए टैरिफ से ज्यादा बड़ा खतरा है- गीता गोपीनाथ
मोदी की नीतियों का पोस्टमार्टम
प्रदूषण को भारत के लिए टैरिफ से ज्यादा बड़ा खतरा है- गीता गोपीनाथ
उन्होंने कहा कि जब नए कारोबार और आर्थिक विकास की बात होती है, तो चर्चा ज्यादातर व्यापार, टैरिफ और नियमों तक सीमित रहती है, जबकि प्रदूषण को उतनी अहमियत नहीं दी जाती।
पिछले साल लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत को बाहर की हवा (PM2.5, धुआं, गाड़ियों का प्रदूषण, फैक्ट्रियां) के प्रदूषण से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
प्रदूषण से देश के विकास को लंबे वक्त का नुकसान
गीता गोपीनाथ ने बताया कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत से परिवारों पर असर पड़ता है, कामकाजी लोगों की संख्या घटती है और देश के लंबे समय के विकास को नुकसान होता है।
गीता ने बताया कि भारत में प्रदूषण एक बड़ी चुनौती है और इसका असर अब तक लगाए गए किसी भी टैरिफ से कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला है।
उन्होंने कहा कि प्रदूषण की वजह से लोगों की काम करने की क्षमता घटती है, इलाज पर खर्च बढ़ता है और देश की आर्थिक गतिविधियों पर बुरा असर पड़ता है। इससे विकास की रफ्तार धीमी होती है।
गीता गोपीनाथ ने कहा कि प्रदूषण सिर्फ भारत की अंदरूनी समस्या नहीं है, बल्कि यह उन विदेशी निवेशकों के लिए भी चिंता का विषय है जो भारत में इन्वेस्ट करने के बारे में सोच रहे हैं।
विदेशी इन्वेस्टर निवेश करने से पहले पर्यावरण भी ध्यान में रखते हैं
गीता गोपीनाथ ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक जब भारत में कारोबार शुरू करने और यहां रहने की योजना बनाते हैं, तो वे पर्यावरण को भी ध्यान में रखते हैं। खराब हवा और खराब रहने की स्थिति, खासकर सेहत से जुड़े खतरे, निवेशकों को रोक सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यह चिंता उन भारतीयों के लिए और भी ज्यादा है जो रोज प्रदूषित शहरों में रहते और काम करते हैं। प्रदूषण पर कंट्रोल और नियमों में ढील जैसे मुद्दों पर तुरंत पॉलिसी लेवल पर कदम उठाने की जरूरत है।
भारत जब खुद को एक ग्लोबल आर्थिक और मैन्युफैक्चरिंग सेंटर के तौर पर पेश कर रहा है, तब ये बातें साफ करती हैं कि साफ शहर और बेहतर जीवन स्थितियां बहुत जरूरी हैं।
उन्होंने कहा कि प्रदूषण से निपटना सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह लोगों की जान बचाने, आर्थिक विकास बढ़ाने और भारत को विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बनाने से जुड़ा है।
लैंसेट रिपोर्ट में दावा- भारत में प्रदुषण जानलेवा खतरा बना
भारत में वायु प्रदूषण अब सिर्फ एक पर्यावरण की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह लोगों की जान और देश की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज ने 29 अक्टूबर 2025 को जारी रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में भारत में PM 2.5 नामक बारीक प्रदूषक कणों के कारण 17 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुईं। ये 2010 के मुकाबले 38% ज्यादा हैं। इनमें से करीब 44% मौतें कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ्यूल) के जलने से हुईं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ कोयले के कारण करीब 3 लाख 94 हजार लोगों की मौत हुई, जिनमें से ज्यादातर मौतें थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाले प्रदूषण की वजह से हुईं। इसके अलावा सड़कों पर चलने वाले वाहनों में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल से भी बड़ी संख्या में मौतें जुड़ी हैं।
2022 में बाहरी वायु प्रदूषण से ₹30 लाख करोड़ का नुकसान
लैंसेट की यह रिपोर्ट 71 शैक्षणिक संस्थानों और UN एजेंसियों से जुड़े 128 एक्सपर्ट्स ने मिलकर तैयार की है। रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका मारियाना रोमानेलो ने कहा कि भारत के लिए एक अलग रिपोर्ट तैयार की गई है, क्योंकि देश जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से बहुत ज्यादा प्रभावित है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि 2022 में बाहर की हवा (PM2.5, धुआं, गाड़ियों का प्रदूषण, फैक्ट्रियां) के प्रदूषण से होने वाली मौतों का आर्थिक नुकसान करीब 339 अरब डॉलर (करीब 30 लाख करोड़ रुपए) रहा। यह भारत की कुल अर्थव्यवस्था का करीब 9.5% है।
घर के अंदर होने वाला प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, लकड़ी, कोयला और अन्य गंदे ईंधन से होने वाले घरेलू प्रदूषण के कारण ग्रामीण इलाकों में ज्यादा मौतें हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति एक लाख लोगों पर 125 मौतें दर्ज की गईं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 99 रहा।
2024 में लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024 में भारत के लोगों को औसतन करीब 20 दिन भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा। इनमें से लगभग एक-तिहाई दिन ऐसे थे, जो जलवायु परिवर्तन के बिना नहीं होते।
रिपोर्ट के मुताबिक, बहुत गर्मी के कारण लोगों को पहले के मुकाबले ज्यादा समय तक खतरनाक तापमान में काम करना पड़ा। इसका असर देश की कामकाजी क्षमता पर पड़ा और 2024 में करीब 247 अरब घंटे के कामकाजी नुकसान हुआ। इसका सबसे ज्यादा असर खेती और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ा।
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