शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

बिरजीस कदर का कुनबा: मोहब्बत से महरूम दस अकेली औरतों की कहानियां विनोद दास

मुंबई इप्टा की नयी प्रस्तुति : बिरजीस कदर का कुनबा: मोहब्बत से महरूम दस अकेली औरतों की कहानियां विनोद दास इन दिनों सत्ता ने आम आदमी की बुद्धि पर कब्जा करने का बीड़ा उठा रखा है। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र पर इसकी काली छाया पड़ रही है। वर्तमान पढ़ा-लिखा मानस भारतीय संस्कृति की बहुलतावादी परंपरा को छोड़कर बहुसंख्यकवाद को समर्थन देकर समझता है कि इस तरह वह अपना और अपने जैसे साहित्य -संस्कृति कर्मियों की ऐसे हमले से रक्षा कर लेगा लेकिन वह शायद भूल रहा है कि अंततः मनुष्य विरोधी अभियान के तहत एक दिन उसकी भी बारी आएगी। कुछ यही डर और कुछ प्रसिद्धि की लालसा में साहित्य -संस्कृति से सम्बद्ध एक बड़ा तबका नखदंत विहीन होकर सत्ता की चरणवंदना या बाजार के उत्सवों में लिप्त है। ऐसे परिदृश्य में अपनी सामाजिक और राजनीतिक चेतना को बचाए रखने के लिए विश्व साहित्य के क्लासिक के पास जाने से जहाँ हमें ठहरकर ज़िन्दगी को देखने की दृष्टि मिलती है ,वहीं प्रतिरोध की हमारी आंतरिक शक्तियों को संचित करने की ऊर्जा मिलती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कल साँझ हम स्पेन के कवि-नाटककार फेडरिक गार्सिया लोर्का का लगभग 90 वर्ष पूर्व लिखा अमर नाटक “द हाउस ऑफ बरनाडा अल्बा” का मंचन हम पृथ्वी थियेटर मुंबई में देखने गए। इसका हिन्दी अनुवाद हिन्दी के प्रख्यात कवि -संपादक रघुवीर सहाय ने बिरजीस कदर का कुनबा” नाम से किया था। हालाँकि इस नाटक की प्रस्तुति के लिए उर्दू रूपांतरण चर्चित पटकथाकार शमा जैदी का है। निर्देशन मसूद अख्तर ने किया। मंच की साज- सज्जा का अभिकल्पन गर्म हवा सरीखी फिल्म के प्रख्यात फिल्मकार एम.एस सथ्यू का था। तो फिर आइए बिलकिस बेगम के कुनबे में तशरीफ़ लाइए। मंच के अग्रभाग में फर्श पर बिछा फर्शपोश । बाईं ओर खड़ी चारपाई। पृष्ठभूमि में तीन दरवाज़ों वाली हवेली के भीतर झाँकता एक दरवाज़ा। बेंत से बुना एक मोंढा। पास में रखे पुराने मुस्लिम परिवारों में इस्तेमाल किया जाने वाला एक बड़ा और एक छोटा दो टोंटीदार लोटे। एक बिछी चारपाई पर सफ़ेद मसनद के साथ अस्त -व्यस्त बिखरी रंगीन ओढ़ने की चादर। पीछे चबूतरे पर रखा पानी का एक घड़ा। घड़े पर रखा गिलास। इससे सटी हुई गेरुए रंग की ऊपर जाती हुईं सीढ़ियाँ। ऊपर जाता हुआ मुस्काराता दिखता ऊँचा दरवाजा जैसे ऐलान कर रहा हो कि ऊपर छत है। देखते ही दर्शक को समझ में आ जाता है कि यह एक परंपरागत मुस्लिम परिवार के घर की संरचना है। बीच में खुली जगह को इस तरह विकसित किया गया है कि वह घर का दालान लगे। कहना न होगा कि नाटक की अधिकांश गतिविधियां इसी दालान में घटित होती हैं। इस फिज़ा में रोशनी होते ही दो ख्वातीन मंच पर नमूदार होती हैं। दोनों की गुफ़्तगू से पता चलता है कि वह दोनों बिलकिस बेगम की मुलाज़िम हैं। उसकी मालकिन बिलकिस बेगम एक सख्त दिल खातून हैं। उनके दूसरे शौहर का इंतकाल अभी चार दिन पहले हाल में हुआ है। पहले शौहर से एक बेटी फहमीदा है। दूसरे शौहर से और चार बेटियाँ हैं। हसन नाम की मुलाज़िम चरफर और तेज़ है। वह समझती है कि वह अपनी मालकिन बिलकिस बेगम के बेहद करीब है। उनकी पोशीदा राज़ों की साझेदार है। शोक में बिलकिस बेगम सफ़ेद लिबास में अपनी पांचों बेटियों के साथ छड़ी टेकती हुई आती है और सामने दालान में बिस्तर पर बैठकर अपनी करख्त आवाज़ में यह फैसला सुनाती हैं कि अगले बारह महीने कुनबे में गम का माहौल रहेगा। न तो कोई साज-सिंगार करेगा और न ही कोई घर के बाहर कदम रखेगा। मर्दों की हवा भी दीवारों को नहीं छूनी चाहिए। खिड़की के बाहर से गुज़रते हुए किसी मर्द को घर की कोई लड़की देखने की जुर्रत नहीं देखेगी। इस ऐलान से लड़कियों के चेहरों के रंग उड़ जाते हैं। इसका सबसे बड़ा असर पहले शौहर से जनी बड़ी बेटी फहमीदा पर पड़ता है। उसकी मँगनी अतहर से हो चुकी है। उसके लिए सबसे बड़ा सदमा यह है कि उसका निकाह एक साल के लिए मुल्तवी हो गया है। यहाँ पर किस्से में एक पेंच और जुड़ता है। फहमीदा को अपने सगे अब्बा से विरासत में काफ़ी धन -दौलत और ज़मीन मिली है। बिलकीस बेगम की चारों बेटियाँ इस बात को लेकर फहमीदा से डाह रखती हैं। वे जानती हैं कि उनकी सख्त दिल अम्माँ फहमीदा के अमीर होने को लेकर उनके वास्ते थोड़ी नर्मदिल रहती हैं। जेल जैसे माहौल में रहते हुए पांचों लड़कियाँ तकरीबन गुलाम हवा की आदी होती जाती हैं। लेकिन जवान दिल की चुभन उनके दिल में चुभती रहती है। कभी-कभी यह चुभन बाहर निकलकर एक भारी दर्द की तरह उनके सारे जिस्म को जकड़ लेती है और वे बेहद उदास और निराश हो जातीं हैं जब वह अपनी अम्माँ के सख्त रवैये का खामियाज़ा डाँट-फटकार और मारपीट के तौर पर भुगतती हैं । इन बेकसूर लड़कियों को जेल की सजा बिना किसी जुर्म के मिली हुई है। हकीकत यह है कि अपने कुनबे की झूठी शान और मर्यादा दिखाने के लिए एक माँ अपनी बेटियों पर बेपनाह जुल्म ढा रही हैं। जेल जैसी घर की फिज़ा में कुछ तब्दीली तब आती है जब बिलकीस बेगम की छोटी लड़की आदिला एक दिन लाल जम्पर पहनती है। आँखों में काजल-सूरमा लगाकर सिंगार करती है। चुगुलखोर और सितमज़रीफ़ हसन बुआ आग की तरह इस खबर को कुनबे में फैला देती है। एक तरह से बिरजीस बेगम के कुनबे में यह खिलाफ़त की दस्तक है। बिरजीस बेगम के सीने पर साँप लोट जाता है। वह अपनी छोटी बेटी की लानत-मलामत करती है। लेकिन मोहब्बत की कशिश पाबंदियों की बेड़ियों को कहाँ मानती है ! एक दिन दिलचस्प वाकया होता है। बड़ी लड़की फहमीदा शिकायत करती है कि उसके मंगेतर की तस्वीर गायब है। मिल नहीं रही है। लड़कियों में नोक-झोंक होती है। सबसे छोटी लड़की आदिला बिना पूछे सफ़ाई देने लगती है कि तस्वीर उसके पास नहीं है। चूँकि वह अकुंठ रूप से साज- सिंगार करती रही है और जिस्मानी जरूरतों का नुमाया भी करती रहती है, उसे अंदेशा होता है कि तस्वीर चोरी के लिए शक की सुई उसकी तरफ घूमेगी। तभी हँसना बाँदी यह कहकर सबको चौंका देती है कि वह जानती है कि यह तस्वीर किसके पास है। वह कमरे से तस्वीर ढूंढकर लाती है और बताती है कि तीसरे नंबर की बेटी मुस्तरी के तकिये के नीचे तस्वीर मिली है। सब हैरत में पड़ जाते हैं। सिर्फ़ छोटी बेटी आदिला को हैरत नहीं होती चूँकि उसे पता है कि मुस्तरी दिल ही दिल में अतहर को चाहती है। जब रात में अतहर के साथ छोटी बेटी आदिला इश्क की रासलीला में मुब्तिला होती है तो उसकी यही बड़ी बहन मुस्तरी उसकी निगहबानी करती रहती है। यहाँ बताना ज़रूरी है कि मुस्तरी उम्रदराज़ ही नहीं,पीठ पर उसके कूबड़ है। नाक -नक्श और देखने में आदिला से कमतर है। बिलकीस बानो अपने रौद्र रूप में आती है। मुस्तरी के पास तस्वीर पाए जाने पर बिरजीस उसे मारती-पीटती है। यहाँ से नाटक में मोहब्बत का त्रिकोण शुरु होता है। अतहर को हासिल करने के लिए आदिला और मुस्तरी के बीच जबानी जंग चलती रहती है। मुस्तरी आदिला को चुनौती देती है कि अतहर का ब्याह तो फहमीदा से ही होगा क्योंकि उसके पास सबसे अधिक जायदाद है। हँसना बाँदी का भी यही मानना है। आदिला मुस्तरी को कहती है कि अतहर तुमको नहीं चाहता। वह मुझे चाहता है। मैं खूबसूरत हूँ। जवान हूँ। एक दिन फहमीदा अपनी अम्माँ बिलकीस बेगम से अपनी शादी जल्दी कराने को लेकर बात चलाती है। अम्माँ कहती है कि वह मिलने तो आता है। फहमीदा अपना शक जाहिर करती है कि उसे लगता है कि जब वह मेरे साथ होता है, उसका मन कहीं और होता है। बिलकीस अपनी चुटीले मर्दवादी तर्कों के जरिए उसे समझाती है। हसना बाँदी अपनी मालकिन बिलकीस को बताती है कि उसके बेटों ने सवेरे चार बजे अतहर को छत पर देखा था। बिलकीस उसकी बात पर भरोसा नहीं करती। उसे लगता है कि उसके मकबूल कुनबे की इज़्ज़त धूल में मिट जाएगी। वह उसे झूठी अफ़वाह फैलाने के लिए रोकती है। हसन बाँदी अपने को उसका खैरख्वाह दिखाना चाहती है। वह बेगम को जताती है कि वह यह राज़ जानती है कि जायदाद की खातिर उसने अपने पहले शौहर से शादी की थी। इस पर बिलकीस उसे धमकाती हुई कहती है कि मुझसे मत उड़ो। तुम किस तरह रंडी बनने से बची हो, मैं जानती हूँ। तुम अपनी हद और औकात में रहो। छोटी बेटी आदिला की बेताबी अतहर के लिए बढ़ती जा रही है। कभी रात में पानी पीने के बहाने तो कभी चोरी छिपे वह अतहर से मिलती रहती है। एक दिन तो मुस्तरी ने भी आदिला से भरे मन से इकबाल कर लिया कि वह अतहर को चाहती है। लेकिन आदिला को किसी बात की परवाह नहीं। एक शाम जब अतहर ने अपनी मंगेतर फहमीदा को बताया कि वह कस्बे से बाहर जा रहा है और शाम उससे मुलाकात करने नहीं आएगा। बाद में पता चलता है कि उसने झूठ बोला था। वह रात में मिलने आया था। बिलकिस बेगम अपनी बेटी आदिला को रोकना चाहती है, वह नहीं मानती। वह अपनी माँ से कहती है कि अगर अतहर का ब्याह फहमीदा से हो भी जाए तो घर से दूर एक छोटी झोपड़ी में उसकी दूसरी औरत की तरह रह लेगी और जब अतहर का मन होगा, मुझसे मिलने आ जाया करेगा। आदिला की ऐसी फ़ाहिशा बातें सुनकर बिलकीस बेगम आग बबूला होकर आदिला को मारने के लिए अपनी छड़ी उठाती है। आदिला अपने हाथों से पहले तो उसकी छड़ी रोकती है। फिर उसकी छड़ी तोड़कर उसे फ़र्श पर फेंक देती है। पूरे दालान में सन्नाटा छा जाता है। ऐसा इस कुनबे में कभी नहीं हुआ था। सब लड़कियां सिर झुकाकर पिटती रहती थीं। बिलकिस बेगम को लगता है कि उनका रौबदाब खत्म हो जाएगा। उधर घोड़ों की हिनहिनाहट और आदिला को बुलाने के लिए अतहर सीटी बजाकर इशारा कर रह रहा है। गुस्से में बिलकीस बानो बंदूक निकाल कर और अतहर को मारने के लिए बाहर जाती है। बंदूक की गोली चलने की आवाज़ सुनायी देती है। आदिला को लगता है कि उसकी अम्माँ ने उसके प्रेमी अतहर को मार दिया है। हारे मन से बिलखती हुई वह अपने को कमरे में बंद कर लेती है । सब लड़कियां और बाँदियाँ दरवाजा खटखटाकर खोलने की उससे गुज़ारिश करती हैं। दरवाजा खोला जाता है। गले में दुपट्टा बांधकर आदिला ने खुदकुशी कर ली है। इस दृश्य को प्रकाश व्यवस्था के जरिए प्रभावी तरीके से दर्शाया जाता है। बाद में पता चलता है कि बिलकीस बेगम में अतहर पर गोली चलायी लेकिन निशाना चूक गया। अतहर घोड़े पर बैठकर भाग गया। बिलकीस दालान में खड़ी होकर फिर ऐलान करती है कि इस मामले में सब खामोश रहेंगे। कोई ज़बान नहीं खोलेगा कि आदिला पेट से थी। वह तेज़ आवाज में कहती हैं कि आदिला कुँवारी मरी है। अपनी झूठी इज़्ज़त बचाए रखने के लिए वह अब भी इकबाल नहीं कर पा रही है कि उसकी बेटी अतहर से मोहब्बत करती थी। अगर वह आदिला के मुहब्बत को मान लेती तो उसे अपनी बेटी को खोना नहीं पड़ता। हालाँकि हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है कि झूठी मान-मर्यादा पर बेटी को कुर्बान करना बिलकीस बेगम को मंजूर है। ऊँची जाति का घमंड भी बिलकीस बानो को है। उनकी एक लड़की का रिश्ता कुरेशी जैसी छोटी जाति से आया था लेकिन उन्होंने उसे कुबूल नहीं किया था। यह पूरा नाटक उच्च मध्यवर्गीय रूढ़िग्रस्त मुस्लिम परिवार के इर्द-गिर्द घूमता है। पितृसत्ता किस तरह से सूक्ष्म रूप से काम करती है, इसकी एक उम्दा मिसाल यह नाटक है कि कुनबे में किसी मर्द की नामौजूदगी के बावजूद एक औरत मर्द की तरह अपने परिवार को सामंती ढंग से चलाती है। सदियों से चले आ रहे उन्हीं परंपरागत रुग्ण मूल्यों और संस्कारों को अपनाती है चाहे सामाजिक मान-मर्यादा का मामला हो या रीति रिवाज या छोटी -बड़ी जाति का। पूरे कुनबे में दस औरतें है। स्वामित्व की डोर बिलकीस बेगम के पास है। बिलकीस बेगम और उनकी सनकी माँ के साथ पाँच बेटियाँ दो बाँदियों के साथ रहती हैं। नाटक में एक दफा लड़कियों की खालाजान की भी आमद होती है। मगर कुनबे में एक भी मर्द नहीं दिखता। मर्दों का ज़िक्र तो होता है। फहमीदा का मंगेतर और आदिला के इश्क में गिरफ़्तार अतहर का साया नाटक की कहानी को आगे बढ़ाता है लेकिन ये सभी खातून मर्दों के साथ और मोहब्बत से महरूम हैं। एकाध हैं तो चोरी छिपे। मर्दों को लेकर उनके मन में इच्छाएं ही नहीं, कामेच्छाएं भी हैं। ऐसा होना सहज भी है। सभी युवा हैं और उनके भीतर देहराग बजता है। वे अपने घर की मुंडेर से जब खेतों में काम करते हुए बलिष्ठ और सुंदर किसानों को देखती हैं तो पुरुष गंध और प्रेम के सहज अधिकार से वंचित लड़कियों की मुरझाई देहों में उनकी अतृप्त कामनाएं अंगड़ाई लेने लगती हैं। प्रेम एक सामाजिक मूल्य है। लेकिन उसके लिए परिवार में लोकतान्त्रिक वातावरण अपेक्षित है। बिलकीस बेगम के कुनबा एक उपनिवेश की तरह है। यहाँ निजी कामनाओं और आकांक्षाओं को अपने भीतर दफन करने के अलावा इन युवतियों के पास कोई विकल्प नहीं दिखता। नाट्य निर्देशक ने इन कामनाओं को मूर्त रूप में दिखाने के लिए एक नृत्य दृश्य प्रस्तुत किया। फसल कटने के बाद लड़कियों के इस नृत्य संरचना को रश्मि ने अत्यंत कलात्मकता से सृजित किया। नाटक के गमगीन माहौल में नृत्य का यह पहला उल्लास भरा दृश्य आता है जो दर्शकों के लिए राहत की सौगात है। पितृसत्ता के अनेक रंगों को नाटक में जगह मिली है। शुरु में ही बाँदी हसना बताती है कि किस तरह एक मर्द ने उससे मोहब्बत का इज़हार किया। फिर उससे बोला कि जल्दी उसके घर उसकी माँ उसका रिश्ता माँगने आएगी लेकिन वह इंतज़ार करती ही रह गयी। फिर पता चला कि उसने किसी और से शादी कर ली। नाटक शमा जैदी के चुटीले संवादों में पितृसता के बहुस्तरीय परतों को उकेरा गया है। लेकिन मैंने नोट किया कि जब पितृसत्ता की ताकत को हास्य के जरिए निशाना बनाया जाता था तो हमारे पीछे और बगल में बैठे दर्शक लुत्फ़ लेकर खूब हँसते और तालियाँ बजाते थे। पितृसत्ता का यह साक्षात उदाहरण सभागार में प्रकट हो रहा था। इस नाट्य प्रस्तुति में तीन चार –दृश्य बिम्ब प्रभावी और सुंदर थे। एक दृश्य दस्तरखान का था जब लड़कियों की खाला उनसे मिलने आती हैं। फहमीदा अपनी सगाई की अंगूठी खाला को दिखाती है। हाथ में खाने की रकाबियाँ लिए हुए यह दृश्य पारिवारिक गर्माहट से दर्शकों को सराबोर कर रहा था। नाटक के अंत में आदिला के खुदकुशी का कारुणिक दृश्य बिंब भी अत्यंत प्रभावी ढंग से पेश किया गया था। फसल कटने की बाद गाया गीत कर्णप्रिय था। इतने गमगीन माहौल में उमंग से भरा नृत्य आँखों के लिए सचमुच एक सुख था। इस प्रस्तुति में ध्वनि के प्रभावी प्रयोग की चर्चा न करना नाइंसाफी होगी। कम नाटकों में ही ध्वनि को लेकर रचनात्मक प्रयोग किए जाते हैं। इस प्रस्तुति के अनेक प्रसंगों में ध्वनि के सटीक इस्तेमाल करके कथ्य की प्रभुविष्णुता में वृद्धि की गयी। अजान की गूँज, कुत्तों का भोंकना, घोड़ों को हिनहिनाना, दरवाजा खटखटाने के लिए धम -धम की आवाज़, गोली चलने की आवाज़, अतहर द्वारा आदिला को बुलाने के सीटी भरे इशारे, छत पर अतहर की पदचाप आदि तत्काल स्मरण में आ रहे हैं। सबसे प्रभावी ध्वनि प्रयोग लड़कियों की कामेच्छाओं को प्रकट करने के लिए घोड़ों के हिनहिनाने को माध्यम से सुनने को मिलता है। बताने की जरूरत नहीं, घोड़ों को हमेशा से ही पुरुषोचित भावनाओं से जोड़ा जाता रहा है। पुरुष स्पर्श से वंचित लड़कियों में घोड़ों के हिनहिनाने से कामोत्तेजना को उद्दीप्त करने का दृश्य रचा गया है। जहाँ तक अभिनय की बात है, इसमें एक दो अभिनेत्रियों को छोड़कर सभी इप्टा के नए सदस्य हैं। निवेदिता बाउनथियाल ने बिलकीस बेगम के रूप में सख्त खातून की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। नाटक में हसना बाँदी की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। यह पात्र घर की मालकिन और उनकी पांचों बेटियों के बीच पुल का काम करता है। वह कभी मालकिन से दोस्ताना बर्ताव करती है और कभी उसकी जासूस बनकर उनकी बेटियों की हरकतों का कच्चा -चिठ्ठा खोलती रहती है। दिलचस्प यह है कि वह ऐसी केन्द्रीय धुरी बन जाती है जिसमें वह उन बेटियों की दोस्त की तरह रहती है। शायद यही कारण है कि बेटियाँ उसे अपने परिवार के सदस्य के रूप में अपनी बुआ का दर्ज़ा देती हैं । यही नहीं, उसे हसना बुआ से संबोधित करती हैं। इस भूमिका को प्रगति कोठारी ने संवेदनशीलता से निभाया। बिलकीस बेगम की सनकी माँ और बेटियों की नानी भी मंच पर दो बार आती हैं। दोनों दृश्यों में उनकी भूमिका छोटी है लेकिन अपने अभिनय से वह दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। इस पात्र को भी नाट्य कथा के प्रसंग के अनुकूल ही प्रस्तुत किया गया है। वह एक कोठरी में कैद रहती हैं। मौका पाकर वह दो बार कोठरी से बाहर आती हैं। उम्रदराज़ होने के बावजूद पहले दृश्य में बुढ़ापे की सनक में वह अपने ब्याह के सुंदर सपने देखती है और दूसरे दृश्य में संतान जन्म देने की इच्छा को व्यक्त करती हैं। इस नाटक का सबसे जटिल चरित्र मुस्तरी है। वह उम्रदराज़ है और उस मर्द को मन ही मन में चाहती है जिसका उसकी छोटी बहन को जिस्मानी तौर से रिश्ता चल रहा है। यही नहीं, वह उसकी बड़ी बहन का मंगेतर भी है। कुरूप और कुबड़ी होने का एहसास उसे तो है ही, उसकी छोटी बहन आदिला भी उसकी कमतरी पर छींटाकशी करती रहती है। एक कुरूप को क्या प्रेम करने का हक नहीं है, इसके दर्द को अपने अभिनय की भाव-भंगिमा से अभिनेत्री सबा ने बखूबी व्यंजित किया है। आदिला तो कैदखाने सरीखे कुनबे में बगावत की आग जलाती है। उसे अपनी देह और खूबसूरती पर अभिमान है। सजना संवरना और दिल फेंकना उसकी फितरत है। वह कभी चुलबुली दिखती है तो कभी ईर्ष्या से भरकर तंज़िया रुख अख्तियार कर लेती है। जरूरत पड़ने पर वह तानाशाही की प्रतीक अपनी अम्माँ की सजा देने वाली छड़ी को तोड़कर फेंक देती है। इश्क में इतनी डूबी कि अपना जिस्म प्रेमी को हवाले करने और उसकी दूसरी औरत की तरह गरीबी में गुज़र -बसर करने के लिए तैयार रहती है। इतनी भावुक कि प्रेमी के गोली से मरने के अंदेशे भर से खुदकुशी कर लेती है। ऐसे पात्र की विविधवर्णी भूमिका को निभाने वाली प्रिया मेहता अभिनेत्री का स्वागत किया जाना चाहिए जिसने रंगकर्म की दुनिया में हाल में प्रवेश किया है। अन्य पात्रों ने भी अपनी भूमिका को कथ्य के अनुरूप संवेदनशीलता से निभाया है। नाटक के दृश्यों की दृष्टि से मंच की सभी रंग सामग्री का उपयोग इस नाटक के निर्देशक करते हैं चाहे छत हो जहाँ से बाहर फसल काटने का दृश्य लड़कियां देखती हैं या पीने का पानी का घड़ा हो जब छोटी लड़की आदिला को उसके प्रेमी से मिलने से रोकने के लिए बाँदी घड़े से गिलास में पानी निकाल कर उसे देती है या पृष्ठभूमि में झाँकता हुआ कमरा जहाँ नाराज होने पर लड़की दरवाज़ा खोलकर चली जाती है या खुदकुशी करने के लिए दरवाज़ा बंद कर लेती है और बाहर से हाथ से दरवाज़ा पीट कर सभी औरतें उसे खोलने की इल्तजा करती हैं। हमें यह समझना होगा कि देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की संरचना तभी सशक्त होगी जब हमारे घर-परिवार के भीतर लोकतंत्र होगा। बिलकीस बेगम के कुनबे में लोकतंत्र न होने से इन पांचों बहनों के बीच न तो प्यार मोहब्बत है और न ही बहनापा । सभी के बीच रंजिश और ईर्ष्या है जबकि सभी अपनी माँ की तानाशाही का शिकार हैं। वे माँ की तानाशाही के खिलाफ़ एकजुट भी नहीं होती। कुनबे में लोकतंत्र न होने से बिलकिस बानो माँ अपने वात्सल्य के सहज गुण को भी खो देती है जिसके लिए माँ की वंदना ईश्वर के प्रतिरूप के रूप में की जाती है। आज हमारे देश में जिस तरह लोकतान्त्रिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है और आम नागरिकों के बीच घृणा के बीज बोए जा रहे हैं, ऐसे में कुनबे के भीतर लोकतंत्र की जरूरत को रेखांकित करने वाला यह नाटक बिलकीस बेगम का कुनबा प्रासंगिक और ज़रूरी नाटक है। इप्टा की इस नयी टीम की ताज़ा प्रस्तुति का स्वागत किया जाना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

Share |