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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

आम आदमी कहा ? उसके हित कहा ?

आम आदमी की पार्टी -------- में आम आदमी कहा ? उसके हित कहा ?


एक सवाल श्री अरविन्द केजरीवाल से         ?

{ इन हालातो में कोई भी भ्रष्टाचार विरोधी तथा आम आदमी के लिए जनतांत्रिक राष्ट्रिय नीति व कानून तब तक कारगर नही हो सकता जब तक देश -- दुनिया के धनाढ्य वर्गो व कम्पनियों पर भारी रोक व नियंत्रण न लगाया जाए | इन नियंत्रण के बीना आम आदमी के जनतांत्रिक अधिकारों को बढाने का काम हरगिज नही किया जा सकता | इस सच्चाई के वावजूद यदि आम आदमी की पार्टी या कोई अन्य पार्टी संगठन या शक्ति धनाढ्य वर्गो पर यह नियन्त्र लगाने की बात नही करता तो उसके भ्रष्टाचार का विरोध सतही व  खोखला ही साबित होग |

24 नवम्बर के दिन राजधानी दिल्ली में एक नई पार्टी ( '' आम " ) के गठन की घोषणा कर दी गयी | यह घोषणा इस पार्टी के संचालक बने '' इण्डिया अगेन्स्ट करप्शन ' ( अर्थात भ्रष्टाचार विरोधी भारत ) नाम के संगठन के प्रमुख एवं बहुप्रचारित नेता श्री अरविन्द केजरीवाल ने अपने सहयोगियों के साथ की | उन्होंने इस पार्टी का प्रमुख उद्देश्य '' भ्रष्टाचार मुक्त '' विकेन्द्रीय जनतंत्र का निर्माण बताया | दिल्ली में जन्तर -- मन्तर

पर पार्टी निर्माण के लिए हुई बैठक में लगभग 300 सदस्यों ने भाग लिया | उसमे से 23 सदस्य उसके कार्यकारी मण्डल के सदस्य बनाये गये |

 आम आदमी की पार्टी की प्रमुख चारित्रिक विशेषता के बारे में कहा गया कि यह पार्टी राज नेताओं के प्रति आम आदमी के विरोध को परिलक्षित करेगी | नव गठित पार्टी के प्रवत्ता ने देश के सभी चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने की घोषणा करने के साथ पार्टी के चुने हुए पर नाकारा साबित हुए प्रतिनिधियों को वापस बुला लेने की बात कही | इसके अलावा पार्टी प्रवत्ता ने यह भी कहा कि पार्टी में नौजवानों एवं महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी | खासकर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए आम आदमी की पार्टी ने यह घोषित किया है कि उसकी हर प्राथमिक इकाई के दो संयोजको में से एक महिला का ओना अनिवार्य है |

आम आदमी की पार्टी के विभिन्न मुद्दों का खुसाला करते हुए श्री केजरीवाल ने कहा कि उनकी पार्टी का प्रमुख मुद्दा भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन लोकपाल कानून को लागू करना तथा आम आदमी के हित में लोकतंत्र को निचले स्तर तक पहुंचाना है |
सत्ता में आने पर उन्होंने 15 दिनों के भीतर जन लोकपाल कानून बनाने , भ्रष्ट नेताओं को जेल भेजने और 6 माह में समूची जांच पूरी करने का वायदा किया है | इसी के साथ उन्होंने 5 सालो में गरीबी , भुखमरी खत्म करने का भी वादा किया है |  आम आदमी की पार्टी के गठन की घोषणा के साथ ही पार्टी को पहले दिन वह उपस्थित सदस्यों द्वारा दिए गये एक करोड़ से अधिक की धनराशी चंदे के रूप में प्राप्त हो गयी | इन सूचनाओं के सुनने के बाद चर्चा के लिए प्रमुखत: दो सवाल बनते है | एक तो यह कि क्या यह पार्टी दरअसल आम आदमी की पार्टी ? और दूसरा यह कि पार्टी दरअसल राष्ट्र बनाने के अपने घोषित मुक्त विकेन्द्रित  जनतांत्रिक राष्ट्र बनाने के अपने घोषित उद्देश्य को पूरा कर सकती है ? आम आदमी की पार्टी पर चर्चा इसी दूसरे सवाल  के साथ शुरू किया जाये || पार्टी द्वारा राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त , विकेन्द्रित व जनतांत्रिक राष्ट्र बनाने का सीधा मतलब है कि आम आदमी की पार्टी इस राष्ट्र व समाज को किसी हद तक या पूरी हद भ्रष्टाचार से युक्त केन्द्रित और गई -- जनतांत्रिक मानती है | इसीलिए वह इसे भ्रस्थाचार से मुक्त राष्ट्र बनाना चाहिती है | इस संदर्भ में अगला सवाल बनता है है कि इस राष्ट्र से भ्रष्टाचार युक्त केन्द्रीय कृत और गैर जनतांत्रिक होने का क्या कारण है ? और आम आदमी की पार्टी उसे भ्रष्टाचार से मुक्त विकेन्द्रितकृत व जनतांत्रिक राष्ट्र बनाएगी कैसे ? आम आदमी की पार्टी के संचालको के बयानों घोषणाओं में राष्ट्र के भ्रष्टाचार से युक्त तथा गैर जनतांत्रिक होने का कोई ठोस जवाब या सबूत नही दिया है | हां राष्ट्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करने का उपाय जरुर  बताया गया है | यह वही उपाय है जिसे अन्ना हजारे साहब से लेकर उनके सहयोगी रह चुके श्री केजरीवाल जी पिछले कई महीनों से बताते रहे है | वह उपाए है जन लोक पाल कानून
आप को याद होगा कि जन लोकपाल कानून के लिए अन्ना हजारे साहेब ने दो बार अनशन भी लिया था और बाद में उसी को लेकर राजनितिक पार्टी बनाने के लिए श्री केजरीवाल तथा उनके कई सहयोगी महीनों से लगे रहे | इस बीच वे और उनके सहयोगी केन्द्रीय मंत्री खुर्शीद आलम , भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी तथा सोनिया गांधी की दामाद राबर्ट वाड्रा और फिर नरेंद्र मोदी जैसे राज नेताओ के भ्रष्टाचारो का भांडाफोड़ करते रहे | इसी तरह से उन्होंने कालेधन पर और गैस उत्पादन व वितरण में रिलायंस कम्पनी द्वारा किये गये भ्रष्टाचार को भी उठाया |
वैसे इन व अन्य भ्रष्टाचारियो भंडफोड़ो के बिना भी राष्ट्र व समाज का थोड़ा बहुत समझदार आदमी यह जानता है कि केंद्र व प्रांत की सत्ता सरकारों में बैठे राजनेता व अफसरों की लगभग समूची जमात निजी लोभ लालच के भ्रष्टाचार में डूबी हुई है और डूबती जा रही है | बस वह यह बात नही जानता कि इस भ्रष्टाचार को सर्वाधिक बढावा देने वाले देश ए विदेश के धनाढ्य वर्ग व कम्पनिया है | कयोकी क्वाल यही हिस्से हजारो करोड़ो का भ्रष्टाचार करने करवाने में सक्षम है | फिर ये धनाढ्य हिस्से अपने धन -- पूंजी , लाभ -- मुनाफे तथा लूट के अधिकार को अधिकाधिक बढावा देने के लिए देश में नीतिया व कानून बनवाने व बदलवाने में भी सक्षम है और उसे बनवाते व बदलवाते भी रहते है | धन - पूंजी लाभ  -- मुनाफे के अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति में आपसी प्रतिद्वन्दिता भी करते रहते है | इसीलिए ये धनाढ्य हिस्से नीतिगत बदलावों के साथ अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति के लिए मंत्रियों सांसदों , विधायको अफसरों को हर तरह से भ्रष्ट्र बनाते रहे है |
इसी का सबूत है कि पिछले बीस सालो में देश दुनिया की धनाढ्य कम्पनियों को अधिकाधिक छूट व अधिकार देने वाली उदारीकरणवादी तथा निजीकरणवाड़ी नीतियों को लागू किये जाने के बाद सत्ता सरकार से लेकर आम समाज तक में कामचोरी से लेकर धन चोरी तक के भ्रष्टाचार के मामले तेजी के साथ बढ़ते जा रहे है |
अर्थनीति व राजनीति से लगभग अज्ञान आम आदमी भले ही इस सच्चाई को न जान समझ पा रहा हो , पर उपर के हिस्से से जुड़े रहे तथा नीतियों कानूनों के जाकार समझदार श्री केजरीवाल व उनके सहयोगी इसे बखूबी जानते होंगे | वे इस बात को भी बखूबी जानते होने कि लगातार वैश्वीकृत व विकेन्द्रित होती रही अर्थव्यवस्था और उसको अर्थनीति के साथ इस राष्ट्र की राजव्यवस्था व राजनीति का भी केन्द्रीयकरण बढ़ता जा रहा है | कयोकी इन वैश्वीकृत एवं केन्द्रीयकृत हो रही नीतियों को लागू करने का काम इसी केन्द्रीयकृत राज और उसकी नीतियों के जरिये होना है | और होता रहा है | उसी का परिलक्षण है कि वर्तमान दौर में न केवल वैश्विक स्तर पर उदारीकरणवादी , वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी नीतिया लागू हो रही है बल्कि अधिकाधिक केन्द्रीयकृत और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर संचालित नीतिया ( उदाहरण ) बाटो -- व राज करो की कूटनीति ---------शैक्षणिक व सांस्कृतिक नीतिया ( उदाहरण -- उपभोक्तावादी सांस्कृतिक नीतिया ) तथा सैन्य नीतिया भी लागू होती जा रही है | उन्ही नीतियों के साथ धनाढ्य व उच्च वर्गो को अधिकाधिक छूट देने के साथ धनाढ्य व उच्च वर्गो को अधिकाधिक छूट देने के साथ जनसाधारण के रूप में मौजूद आम आदमी के जनतांत्रिक अधिकारों की कटौती भी बढती जा रही है | फलस्वरूप देश की राज व्यवस्था आम आदमी के लिए अधिकाधिक गैर -- जनतांत्रिक भी बनाई जाती  रही है |
लिहाजा सत्ता सरकार से लेकर समाज तक में बढ़ता भ्रष्टाचार सत्ता का केन्द्रीयकरण और आम आदमी के प्रति उसका गैर जनतांत्रिककरण अलग -- अलग चले वाली प्रक्रिया नही है | बल्कि वह वर्तमान दौर की वैश्वीकृत की जा रही '' बाजारवादी -- जनतांत्रिक '' पर आम आदमी के लिए गैरजनतांत्रिक व्यवस्था को बढावा देने व अन्तराष्ट्रीय नीतियों व कानूनों के परिणाम है | जिसका परिलक्षण आम आदमी के जनतांत्रिक अधिकारों की कटौती के रूप में आता जा रहा है |
इसीलिए इन हालातो में कोई भी भ्रष्टाचार विरोधी तथा आम आदमी के लिए जनतांत्रिक राष्ट्रीय नीति व कानून तब तक कारगर नही हो सकता जब तक देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो व कम्पनियों पर भरी रोक व नियंत्रण न लगाया जाए | इस नियंत्रण के बिना आम आदमी के जनतांत्रिक अधिकारों को बढाने का काम हरगिज नही किया जा सकता है | इस सच्चाई के वावजूद यदि '' आम आदमी '' की पार्टी या कोई अन्य पार्टी संगठन या शक्ति धनाढ्य वर्गो पर यह नियंत्रण लगाने की बात करता तो उसका भ्रष्टाचार का विरोध सतही व खोखला ही साबित होना है | ऐसी स्थिति में महज आर्थिक भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ से अथवा जन लोकपाल कानून से भ्रष्टाचार को खत्म कर देने की घोषणा भी अन्तोगत्वा सतही  व खोखली साबित होना  है | चाहे यह कोई ऐसा जानबूझकर कर करे या अनजाने में करे | उसका यह कदम आम आदमी के नाम पर आम आदमी को उसी तरह से धोखा देने वाला साबित होते रहते है | जैसे कि '' राष्ट्र हित '' '' जनहित '' तथा धर्म जाति इलाका के विभिन्न समुदायों के हितो के नाम पर बनी और धनाढ्य वर्गो के हितो को आगे बढाती रही तमाम पार्टियों के क्रियाकलाप जनसाधारण को धोखा देने वाले साबित होते रहे है | ये पार्टिया अपने क्रियाकलापों से और अपने नाम नारों के विपरीत आम आदमी के आशा व विश्वास को तोडती रही है | उसे बारम्बार धोखे का शिकार बनाती रही है |
जहा तक आम आदमी की पार्टी के आम आदमी की वास्तविक पार्टी होने का सवाल है  ? तो इसका निर्णय हम सुधि पाठको के उपर छोड़ रहे है | वे ही आम आदमी की पार्टी के उद्देश्यों से उसके संचालन में शामिल ख़ास व उच्च स्तरीय लोगो से तथा उसे एक ही दिन में उपस्थित सदस्यों से मिले एक करोड़ रूपये से अधिक के चंदे आदि से इस नतीजे पर स्वंय पहुंचे कि यह पार्टी आम आदमी की पार्टी है या आम आदमी के नाम पर बनी ख़ास व उच्च वर्गीय लोगो की पार्टी है |


-सुनील दत्ता
पत्रकार

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा -2

  1. राजनीति में विदेशी निवेश
आम आदमी पार्टी का बनना अचानक या अस्वाभाविक घटना नहीं है। किशन पटनायक ने एक जगह आक्रोश में कहा है कि जब देश में विदेशी धन से सब हो रहा है, पेड़ तक विदेशी धन से लग रहे हैं, तो अमुक क्षेत्र में विदेशी निवेश क्यों नहीं होगा? आज वे होते तो कहते कि विदेशी धन से चलने वाले एन.जी.ओ. जब समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र
सुधार/संवर्द्धन आदि का काम बड़े पैमाने पर करते हैं तो राजनीति क्यों नहीं करेंगे? एन.जी.ओ. पूँजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं जो उसके विरोध की राजनैतिक संभावनाओं को खत्म करते हैं। वे बताते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था अपने में पूर्ण और अंतिम है। अगर किसी समाज में समस्याएँ हैं तो वहाँ के निवासी एन.जी.ओ. बना कर धन ले सकते हैं और उन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। उसके लिए पूँजीवादी व्यवस्था का विरोध करने की जरूरत नहीं है।
देश में जब सब क्षेत्रों में धड़ाधड़ एन.जी.ओ. काम कर रहे हैं तो राजनीति भी अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे ही। आखिर सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में कितने एन.जी.ओ. वालों को खपाया जा सकता है? सुनते हैं, केजरीवाल नैक में शामिल होना चाहते थे, लेकिन वहाँ जमे उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उनका रास्ता रोक दिया। आखिर आदमी केवल प्रवृत्ति नहीं होता; उसकी अपनी भी कुछ फितरत होती है। मनमोहन सिंह का यह बच्चा रूठ कर कुछ उच्छृंखल हो गया है। उच्छृंखलता ज्यादा न ब़े, इसके लिए कतिपय पालतू बच्चे पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह उनका अपना निर्णय है या खुद मनमोहन सिंह मंडली ने उन्हें वहाँ भेजा है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है।
एन.जी.ओ. द्वारा कार्यकर्ताओं को हड़पने की समस्या पहले भी रही है। फर्क इतना आया है कि एन.जी.ओ. के जाल में पुराने लोग भी फँसने लगे हैं। यह स्थिति नवउदारवादी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में एक और ब़ा हुआ कदम है। इस बीच घटित एक वाकिये को रूपक के रूप में पॄा जा सकता है। 1995 में बनी राजनैतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) के वरिष्ठ नेता सुनील एक प्रखर विचारक और प्रतिबद्ध समाजवादी कार्यकर्ता हैं। जे.एन.यू. से अर्थशास्त्र में एम.ए. करने के बाद से वे पूर्णकालिक राजनैतिक काम कर रहे हैं। किशन पटनायक द्वारा शुरू की गई ॔सामयिक वार्ता’ का समता संगठन और बाद में सजप के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। किशन जी के रहते ही यह पत्रिका अनियमित होने लगी थी जिसकी उन्हें सर्वोपरि चिंता थी।
उनके बाद पत्रिका के संपादक बने साथी ने उसे अपना प्राथमिक काम नहीं बनाया। जबकि संपादकी की जिम्मेदारी लेने वाले किसी भी साथी को उसे अपना प्राथमिक काम स्वीकार करके ही वैसा करना चाहिए था। इस दौरान पत्रिका की नियमितता पूरी तरह भंग हो गई। अब पिछले दोतीन महीने से सुनील उसे केसलाइटारसी से निकालने और फिर से जमाने की कोशिश कर रहे हैं। सुनील राजनीति करने वाले थे और संपादक बने साथी फोर्ड फाउंडेशन से संबद्ध हैं। अब सुनील पत्रिका निकाल रहे हैं और राजनीति करने का काम किशन जी के बाद संपादक बने साथी ने सँभाल लिया है। सजप के भीतर यह फेरबदल होता तो उतनी परेशानी की बात नहीं थी। उनका मन बड़ा है! वे केजरीवाल की नई पार्टी की राजनीति कर रहे हैं। कह सकते हैं, जो जहाँ का होता है, अंततः वहीं जाता है। लेकिन इस नाटक में बड़ी मशक्कत से खड़े किए गए एक संगठन और उससे जुड़े नवउदारवाद
विरोधी संघर्ष का काफी नुकसान हुआ है। कहना न होगा कि इससे किशन पटनायक की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा है। आप समझ गए होंगे हम साथी योगेंद्र यादव की बात कर रहे हैं। हमने इस प्रसंग को रूपक के बतौर रखा है, जिसमें सुनील और योगेंद्र व्यक्ति नहीं, दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।
साम्राज्यवाद की सगुणता के कई रूप हैं। विदेशी धन उनमें शायद मूलभूत है। पूरी दुनिया में बिछा बहुराष्ट्रीय कंपनियों और एन.जी.ओ. का फंदा उसीसे मजबूती से जुड़ा है। विदेशी
धन, चाहे कर्ज में आया हो चाहे खैरात में, वह खलनायक है जो हमारे संसाधनों, श्रम और रोजगार को ही नहीं लूटता, स्वावलंबन और स्वाभिमान का खजाना भी लूट लेता है। उसके बाद कितना भी तिरंगा लहराया जाए, देशभक्ति के गीत गाए जाएँ, न स्वावलंबन बहाल होता है न स्वाभिमान। केवल एक झूठी तसल्ली रह जाती है। सोवियत संघ के विघटित होने के बाद यह प्रकाश में आया कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को वहाँ से कितना धन मिलता था। उस समय गुरुवर विश्वनाथ त्रिपाठी ने हम से बगैर पूछे ही कहा कि ॔क्या हुआ, धन क्रांति करने के लिए लिया था।’ सवाल है कि अगर लिया था तो क्रांति का क्या हुआ? एक दौर के प्रचंड समाजवादी जॉर्ज फनारंडीज पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल से धन लिया। वे भी सोचते होंगे कि उन्होंने धन समाजवादी क्रांति करने के पवित्र उद्देश्य के लिए लिया है। आज वे कहाँ हैं बताने की जरूरत नहीं। विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा।
नई पार्टी ने स्वराज लाने की बात कही है। लेकिन वह झाँसा ही है। एन.जी.ओ. वाले कैसे और कैसा स्वराज लाते हैं उसका जिक्र हमने ॔भ्रष्टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ’ शीर्षक ॔समय संवाद’ में किया है जो अब इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में उपलब्ध है। अब दोनों ही बातें हैं। नुकसान की भी और फायदे की भी। फायदे की बात पर ध्यान देना चाहिए। जो इस नवउदारवादी प्रवाह में शामिल नहीं हुए, उनकी समझ और रास्ते अब ज्यादा साफ होंगे। जो शामिल हुए, लेकिन लौट आए, यह अफसोस करना छोड़ दें कि कितनी बड़ी ऊर्जा बेकार चली गई! ऊर्जा कभी बेकार नहीं जाती। वह जिस काम के लिए पैदा हुई थी, वह काम काफी कुछ कर चुकी है और आगे करेगी। साथी अपना काम इस बार ज्यादा ध्यान से करें। उनके पास यह ताकत कम नहीं है कि वे बदलाव नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम देश की बदहाल आबादी के साथ धोखाधड़ी नहीं कर रहे हैं।
लोग राजनीति को कहते हैं, हमारा मानना है कि मानव जीवन ही संभावनाओं का खेल है। यह भी हो सकता है मोहभंग हो और नई पार्टी से कुछ लोग बाहर आएँ। जीवन में सीख की बड़ी भूमिका होती है। उससे नवउदारवाद विरोधी आंदोलन को निश्चित ही ज्यादा बल मिलेगा। 
-प्रेम सिंह

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा -1

ऐसा माना जा रहा था कि बेतहाशा ब़ती महँगाई और बेरोजगारी तथा 2014 में होने वाले आमचुनाव के डर से नवउदारवाद के रास्ते पर यू.पी.ए. सरकार के कदम कुछ ठिठकेंगे। चौतरफा लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों से भी सरकार डरेगी। व्यक्तिगत तौर पर मनमोहन सिंह की ईमानदारी का मिथक टूटने का भी सरकार पर कुछ दबाव बनेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिछले दिनों उनकी सरकार ने बहादुराना अंदाज में, खुद अपनी पीठ ठोंकते हुए, नवउदारवादी सुधारों की रफ्तार तेज कर दी और इस तरह चुनाव के एकदो साल पहले नवउदारवादी सुधारों को स्थगित रखने की अभी तक बनी रही
बाधा को पार कर लिया। पिछले साल नवंबर में संसद में किए गए अपने वादे को तोड़ते हुए खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साल भर से स्थगित फैसले को लागू करने की एकतरफा घोषणा के साथ सरकार ने बीमा, पेंशन और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को स्वीकृति प्रदान की।
पेट्रोल और गैस के दामों में भारी वृद्धि के साथ इन घोषणाओं से सरकार ने कारपोरेट जगत और नवउदारवादी सुधारों के पैरोकारों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अमीरोन्मुख ग्रोथ की अपनी टेक पर पूरी तरह कायम है। वह गरीबों द्वारा बनाई गई अमीरों की, अमीरों के लिए सरकार है। उसने यह भी एक बार फिर से घोषित किया है कि ग्रोथ ब़ाने के लिए विदेशी निवेश ही एकमात्र संजीवनी है। हर संदेश का एक प्रतिसंदेश होता है। वह नवउदारवादी नीतियों से बदहाल जनता के लिए है कि सरकार अब उसकी चुनावी परवाह भी नहीं करने जा रही है। नवउदारवादी निजाम के पिछले दो दशकों में यह सरकार का निस्संदेह बड़ा जनता विरोधी हौसला है जो उसने दिखाया है। देश में 4 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं जिन पर उनके 20 से 25 करोड़ परिवारजनों का भार है। हर हौसले के पीछे अंदरूनी या बाहरी ताकत होती है। सरकार का ब़ा हुआ हौसला वैश्विक पूँजीवादी ताकतों की देन है।
मनमोहन सिंह जब कहते हैं कि अब कदम पीछे नहीं हटाए जा सकते। यह उनकी मजबूरी का इजहार नहीं है कि रास्ते का चुनाव एक बार हो गया तो उस पर चलना ही होगा। ऐसा नहीं है कि वे चुनाव की गलती से नवउदारवादी रास्ते पर चले गए थे और अब उस पर चलना मजबूरी बन गया है; मजबूरी में उन्हें ये सब निर्णय लेने पड़े हैं। ऐसा होता तो आगे कभी नवउदारवादी नीतियों में बदलाव की आशा बनती। मनमोहन सिंह शुरू से नवउदारवादी रास्ते को ही विकास और सब कुछ का एकमात्र और स्वाभाविक रास्ता मानते हैं। तभी उन्होंने एक बार फिर कहा है कि अगर उन्हें जाना है तो इस रास्ते पर अडिग रह कर लड़ते हुए जाएँगे। अन्यथा रोबो की तरह लगने वाले मनमोहन सिंह नवउदारवाद के बचाव में अत्यंत संजीदा हो जाते हैं ॔कुर्बान हो जाएँगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे!’
मनमोहन सिंह की इस प्रतिभा और जज्बे की पहचान सोनिया गांधी ने बखूबी की है। उन्हें यह साफ पता लग गया कि यही बंदा काम का है जो इस रास्ते पर लाखों के बोल सह कर और लाखों को गारत करके भी पीछे नहीं हट सकता। क्योंकि उनकी खुद की तरह वह कोई और रास्ता जानता ही नहीं है। मामला केवल मनमोहन सिंह को आगे रख कर राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाने भर का नहीं है। इस काम के लिए कांग्रेस में चाटुकार नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन कांग्रेस का अन्य कोई भी नेता वह नहीं कर सकता था जो मनमोहन सिंह ने किया। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सम्मिलित प्रतिभा ने कांग्रेस के इतिहास और विचारधारा को धोपोंछ कर उसे एक ॔कारपोरेट पार्टी’ में तब्दील कर दिया है। इसीलिए मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी चाहिए, जिसके जिस्म में मनमोहन सिंह का दिमाग पैदा करने की कवायद लंबे समय से की जा रही है।
लेकिन मनमोहन सिंह का कमाल कांग्रेस के कायापलट तक सीमित ही नहीं है; उन्होंने भारत की पूरी राजनीति को कारपोरेट रास्ते पर डाल दिया है। मनमोहन सिंह ने जो नवउदारवादी ॔ब्रह्मफाँस’ फेंका है, उसमें सब फँसे हैं। उसकी काट आज किसी के पास नहीं है ताकि मानव सभ्यता को पूँजीवादी बर्बरता से मुक्त किया जा सके। मनमोहन सिंह ललकार कर पूछते हैं किसी के पास है तो बताओ? ऐसा नहीं है कि लोग लड़ नहीं रहे हैं या आगे नहीं लड़ेंगे। लेकिन हर बार जीत मनमोहन सिंह की ही होती है। किसी भी तरह ॔शाइनिंग इंडिया’ की चकाचौंध में पलने वाले इस अंधे युग में पलीता नहीं लग पाता। नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी या बीच में कुछ समय के लिए कोई क्षेत्रीय क्षत्रप, अभी जीत मनमोहन सिंह की ही होनी है।
जो कहते हैं मनमोहन सिंह अभी तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, उन्हें अपनी
धारणा पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत की राजनीति की धुरी को संविधान से उखाड़ कर पूँजीवाद की वैश्विक शक्तियों की उन संस्थाओं, जिन्होंने पूरी दुनिया पर शिकंजा कसा हुआ है, के आदेशों/मूल्यों पर जमा देने में उनकी युगांतरकारी भूमिका है। मुख्यधारा राजनीति में उनकी आलोचना करने वाले नेता दरअसल उन्हीं के आज्ञाकारी बच्चे हैं। उन्हें अभी तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कहते न थकने वाले अडवाणी और हमेशा उनकी ॔मेंटर’ को निशाना बनाने वाले नरेंद्र मोदी समेत।
उनकी यह युगांतरकारी भूमिका तभी सफलीभूत हो सकती थी जब वे भारत की कांग्रेसेतर राजनीति को भी अपने पीछे लामबंद करने के साथ बुद्धिजीवियों को भी काबू में कर पाते। ऐसा उन्होंने किया है। मनमोहन सिंह के राज में बुद्धिजीवियों की हालत का क्या कहिए! जिधर देखो मनमोहन सिंह का दिमाग ही चलता नजर आता है। किसी भी समाज के सबसे प्रखर बौद्धिक शिक्षा और शोध के संस्थानों में होते हैं। भारत के विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक मनमोहन सिंह की खुली हवा चल रही है। भारत के बुद्धिजीवियों के संदर्भ में किशन पटनायक ने जिसे ॔गुलाम दिमाग का छेद’ कहा था, वह ब़ कर बड़ा गड बन गया है।
नवउदारवादी और प्रच्छन्न नवउदारवादी बुद्धिजीवी तो मनमोहन सिंह के सच्चे बच्चे ठहरे, अपने को नवउदारवाद विरोधी कहने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग का दिवाला निकलता जा रहा है। घूमफिर कर उनका विश्लेषण पूँजीवाद का विश्लेषण होता है और तर्क भी पूँजीवाद के समर्थन में होते हैं। कारपोरेट पूँजीवाद की हर श्ौ में विकास का दशर्न करने वाले माक्र्सवादियों, गांधीवादियों और समाजवादियों की कमी नहीं है। ज्योति बसु यह पुराना मंत्र देकर गए कि पूँजीवाद के बिना समाजवाद नहीं लाया जा सकता। उनके
उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अमरीकी कूटनीतिज्ञों के सामने अपनी पीड़ा का इजहार किया कि कई तरह के दबावों के कारण वे ऊँची पूँजीवादी उड़ान नहीं भर पाते हैं। सिंगूरनंदीग्राम प्रकरण के वक्त प्रकाश करात ने विरोधियों को विकास विरोधी कह कर लताड़ लगाई थी।
भाजपाई मनमोहन सिंह के मनभाए साथी बने हुए हैं। ॔शाइनिंग इंडिया’ की पुकार सबसे पहले उन्होंने ही दी थी। पिछले दिनों ॔इंडियन एक्सप्रेस’ के स्तंभ लेखक सुधींद्र कुलकर्णी ने एक मोबाइल के विज्ञापनगीत ॔जो मेरा है वो तेरा है’ को समाजवाद के विचार का सुंदर वाहक बताया। वे वहीं नहीं रुके। उन्होंने उसे गांधी से भी जोड़ा। आप कहेंगे संघी और
गांधी? नवउदारवाद का यही कमाल है। उन्हीं दिनों उनकी ॔म्युजिक ऑफ दि स्पीनिंग व्हील : महात्मा गांधीज मेनीफेस्टो फॉर दि इंटरनेट एज’ किताब आई, जिसका दिल्ली और बंगलुरू में भव्य विमोचन समारोह हुआ। समारोह में परमाणु ऊर्जा के पैरोकार पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सहित उद्योग, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और राजनीति जगत की कई हस्तियों ने हिस्सा लिया। नवउदारवाद की बड़ी विभूतियाँ आजकल ब़चढ़ कर गांधीप्रेम का प्रदशर्न करती हैं। ध्यान दिला दें कुलकर्णी साहब भाजपा के सिद्घांतकारों में से एक हैं, जिनके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में पट्टी पॄाई जाती है कि वे ऋषियोंमुनियों की धरोहर के वारिस हैं। गुलाम दिमाग कितनी तरह के पाखंड करता है!
भारत के नागरिक समाज में मनमोहन सिंह के बच्चों की भरमार है। खुद मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की धूम है। लेकिन उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है। वे जानते हैं आरोप लगाने वाले उनके ही दूध पीते बच्चे हैं। भारत माता के स्तनों में तो पूँजीवाद ने दूध की बूँद छोड़ी नहीं है। भारत माता के बच्चे बिलखते हैं और ये चिल्लाते हैं। भारत के नागरिक समाज को गुस्सा बहुत आता है लेकिन उसे कभी ग्लानि नहीं होती। मनमोहन सिंह से ज्यादा कौन जानता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सारी फूँफा के बावजूद उसमें शामिल होने वालों ने रत्ती भर भ्रष्टाचार करना बंद नहीं किया है। वे जानते हैं केवल नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, दलाल और माफिया नहीं, हर दफ्तर के बाबू और चपरासी तक भ्रष्टाचार का बाजार पहले की तरह गरम है। पहले की तरह सरकार की गरीबों के लिए बनाई योजनाओं का ज्यादातर पैसा अफसर और बाबू खा जाते हैं।
मनमोहन सिंह जानते हैं उनसे कोई मुक्त होना नहीं चाहता। सब उनके मोहताज हैं। वरना जिस देश में पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोध की भावनाएँ हिलोरें ले रही हों, जन लोकपाल कानून जब बनेगा तब बनेगा, आंदोलन में शामिल नागरिक समाज को कम से कम अपना भ्रष्टाचार बंद कर देना चाहिए था। उससे गरीब जनता को निश्चित ही राहत मिलती। आप कहेंगे कि भावना की क्या बात? जब जन लोकपाल कानून बन जाएगा, अपने आप भ्रष्टाचार होना बंद हो जाएगा। नागरिक समाज भी बंद कर देगा। यह भ्रष्ट सरकार कानून बनाए तो!
लेकिन भावना उतनी बुरी नहीं होती। राष्ट्रीय भावना भी नहीं। भावना में निस्संदेह एक ताकत होती है। किशन पटनायक ने अपने ॔प्रबल आर्थिक राष्ट्रवाद का समाधान’ लेख में कहा है कि अपनी खदानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देना सही है या गलत, इस पर बहस करने वाला उनकी रक्षा नहीं कर पाएगा। सवाल यह उठाया जा रहा था कि केवल भावनाओं में बह कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करना ठीक नहीं है। अभी लोग समझ नहीं रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बहुत गहराई में जाकर नुकसान किया है। अपने वर्गस्वार्थ के लिए इसने भावना की ताकत को नष्ट कर दिया है। यह सही है कि इस आंदोलन के केंद्र में खायापिया और कुछ हद तक अघाया मध्य वर्ग है। लेकिन शुरू से ही वह जनभावना का शिकार करने की नीयत से परिचालित है। उसके वर्गस्वार्थ की सिद्धि में नवउदारवाद की मार से तबाह जनसामान्य शामिल हो जाए तो उसका काम पूरा हो जाएगा। इसके लिए अब उसने अपनी राजनैतिक पार्टी बना ली है जिस पर हम थोड़ा आगे विचार करेंगे।
चाहते मनमोहन सिंह भी हैं कि पूँजीवाद का काम बिना भ्रष्टाचार के चले। लेकिन पिछली तीनचार शताब्दियों का उसका इतिहास बेईमानी और भ्रष्टाचार का इतिहास रहा है। जब अमरीका में लीमैन ब्रदर्स और गोल्डमैन फैक्स बैंक दिवालिया हुए तो पता चला कि उसके बड़े अफसर किस कदर भ्रष्टाचार में डूबे थे। उपनिवेशवादी दौर के प्रमाण हैं कि उपनिवेशों में आने वाले यूरोपीय मालामाल होकर अपने देश वापस जाते थे। उपनिवेशवादियों ने भ्रष्टाचार की चाट साहब लोगों के स्थानीय अमले को भी अच्छी तरह लगा दी थी। भारतेंदु ने कहा था ॔॔चूरन साहब लोग जो खाता पूरा हिंद हजम कर जाता।’’ अंग्रेज बहादुर के वारिस अगर हिंद हजम कर रहे हैं तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है। यह व्यवस्था छोटे और मेहनत करने वाले लोगों के शोषण और बड़े और मेहनत नहीं करने वाले लोगों की बेईमानी पर चलती और पलती है। सभी जानते हैं देश में कानूनों की कमी नहीं है और न ही जन लोकपाल कानून बनने से भ्रष्टाचार खत्म होने वाला है। इस व्यवस्था के समर्थक ही कह सकते हैं कि इसे मिटाए बिना भ्रष्टाचार मिटाना है।
यह सही है कि सरकार के नवउदारवादी सुधार तेज करने के निर्णय के पीछे मुख्यतः कारपोरेट पूँजीवाद की वैश्विक शक्तियाँ हैं। मनमोहन सिंह भारत में उन शक्तियों के स्वाभाविक और सफल एजेंट हैं। इसलिए उन्हें अमरीकी दबाव और खुदरा व्यापारियों की तबाही के आरोप सनसनी फैलाने वाले लगते हैं। लोग समझते नहीं, लेकिन वे यही कहना चाहते हैं कि अमरीकी दबाव कब नहीं रहा और पिछले 25 सालों में गरीबों की तबाही कब नहीं हुई? वे कहते हैं कि उनके आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने से लेकर आज तक यह आरोप लगाए जाते रहे हैं। न वे पहले रुके, न अब रुकेंगे। हायतौबा करने की जरूरत नहीं है। उससे कुछ नहीं होने वाला है। अमीरोन्मुख ग्रोथ ब़ाने के लिए गरीबों को महँगाई और बेरोजगारी की मार झेलनी होगी।
उन्हें प्रतिरोध करना छोड़ कर महँगाई और बेरोजगारी में जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह को आश्चर्य होता है कि 20 साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद लोगों को यह आदत नहीं पड़ी है। उन्हें यह आदत डालनी ही होगी। कम से कम तब तक जब तक कि उनका सफाया नहीं हो जाता!
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकता महँगाई और बेरोजगारी रोकना नहीं, उसके चलते होने वाले प्रतिरोध का दमन करना बन गई है। संसाधनों की मिल्कियत कंपनियों को सौंपने और खुदरा समेत विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों को न्यौतने के फैसलों के विरोध का दंड कड़ा होता है। मनमोहन सिंह जब कहते हैं, उन्हें जाना है तो लड़ते हुए जाएँगे, तो उनकी लड़ाई को कोरा लोकतांत्रिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनके दिमाग में अपनी लड़ाई में सुरक्षा बलों को शामिल रखने की बात होती है। देश के कई हिस्सों में जो हालात बने हुए हैं वे बताते हैं कि देश को पुलिस स्टेट बनाने में उन्हें कोई हिचक नहीं है।
सरकार के खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की समीक्षा हम यहाँ नहीं करने जा रहे हैं। उसके लिए हमारा ॔खुदरा में विदेशी निवेश : नवउदारवाद के ब़ते कदम’ (॔युवा संवाद’, फरवरी 2012) ॔समय संवाद’ देखा जा सकता है। हम यह कहना चाहते हैं कि खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सीनाजोरी फैसले के पीछे भले ही और निश्चित ही वैश्विक पूँजीवादी व्यवस्था और उसे चलाने वाली संस्थाओं/शक्तियों का हाथ है, लेकिन उसका एक बड़ा कारण घरेलू भी है। यह फैसला मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने इसलिए बेधड़क होकर लिया है, क्योंकि पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नवउदारवाद के वास्तविक विरोध के समस्त प्रयासों को पीछे धकेल दिया या धूमिल कर दिया है।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेता अब राजनैतिक पार्टी बना रहे हैं। वह पार्टी, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, चुनावों में कांग्रेस और भाजपा का नहीं, बल्कि नवउदारवाद की वास्तविक विरोधी और समाजवाद की समर्थक छोटी पार्टियों, जनांदोलनकारी संगठनों/समूहों और लोगों का विरोध करेगी। महज संयोग नहीं है कि कांग्रेस का हाथ भी आम आदमी के साथ है और नई पार्टी बनाने वाले भी ॔मैं आम आदमी हूँ’’ लिखी टोपी पहनते हैं। चलतेचलते पता चला है कि उन्होंने पार्टी का नाम भी आम आदमी पार्टी रखा है। मनमोहन सिंह के ये बच्चे उनकी सहूलियत के लिए उनकी जमात को ही नहीं, एजेंडे को भी आगे ब़ाएँगे।
कौन है आम आदमी?
हम हर बार सोचते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर नहीं लिखेंगे। लेकिन ऐसी बाध्यता महसूस होती है कि इस परिघटना का साथसाथ कुछ न कुछ विश्लेषण होना चाहिए। गंभीर विश्लेषण और मूल्यांकन बाद में विद्वान करेंगे ही। आम आदमी पार्टी के बारे में पाँचसात सूत्रात्मक बातों के अलावा हमें कुछ नहीं कहना है। पहली यह कि नवगठित पार्टी छोटी पार्टियों, मसलन समाजवादी जन परिषद (सजप) और जनांदोलनों, मसलन जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम.) में तोड़फोड़ करने में कामयाब हुई है। जाहिर है, इस दिशा में आगे भी काम जारी रहेगा। दूसरी यह कि अन्ना हजारे से इस पार्टी का अलगाव नहीं है। पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने उन्हें अपना गुरु बताया है और अन्ना ने पार्टी के ॔अच्छे’ उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का भरोसा दिया है। पूरे आंदोलन में सक्रिय रहने वाली मेधा पाटकर कहती हैं कि आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा, भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने की जरूरत है। यानी वे यह बता रही हैं कि अलग पार्टी बनाने का फैसला करने वाले महज आरोप लगाने वाले हैं और उसमें शामिल नहीं होने वाले भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने वाले। लेकिन वह काम बिना राजनीति के और पूँजीवादी व्यवस्था को बदले बगैर नहीं हो सकता। इस काम के लिए उनसे बारबार कहा गया लेकिन उन्हें वह रास्ता पसंद नहीं है। उन्हें देखना चाहिए कि वे वाया अन्ना, केजरीवाल की पार्टी में शामिल हो गई हैं।
जो लोग अपने को अन्ना के साथ मान कर पार्टी से अलग मान रहे हैं, वे खुद अपने को मुगालते में रखने की कोशिश करते हैं। पार्टी न अन्ना से अलग है, न रामदेव से और न दोनों की मानसिकता से। मनमोहन सिंह से अलग तो है ही नहीं।
तीसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि इस पार्टी के निर्माण की पूरी रणनीति कपट से भरी रही है। संप्रदायवादियों और आरक्षण
विरोधियों को पूरा भरोसा दिलाने के बाद अब  धर्मनिरपेक्षता वादियों और सामाजिक न्यायवादियों को अपने लपेटे में लेने की कोशिश की जाएगी। चुनावी जीत के लिए जरूरी मुसलमानों को वोट बैंक बनाने की भी कोई जुगत रची जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि कपटपूर्ण रणनीति से निकली पार्टी का नाम भी कपट से भरा है, जिस पर हम आगे विचार करेंगे। यहाँ यह बताना चाहते हैं कि इस पूरे खेल में कपटक्रीड़ा के साथ एकदूसरे को इस्तेमाल करने का खेल भी चल रहा है। बानगी के लिए अन्ना और केजरीवाल के बीच की लप्पझप्प देखी जा सकती है। अन्ना ने केजरीवाल से अपना और आई.ए.सी. का नाम इस्तेमाल करने से मना किया है। यह बात उनके ख़याल में तब नहीं आई जब केजरीवाल उन्हें ॔मसीहा’ बना रहे थे।
अन्ना भी एन.जी.ओ. की पैदावार हैं और केजरीवाल भी। बाकी जीवन व्यापारों की तरह एन.जी.ओ. व्यापार भी स्थैतिक यानी ठहरा हुआ नहीं होता। लिहाजा, अन्ना के एन.जी.ओ. व व्यक्तित्व और केजरीवालों के एन.जी.ओ. व व्यक्तित्व में समय के अंतराल के चलते काफी फर्क है। लोहिया का शब्द लें तो नए एन.जी.ओ. बाज लोमड़ वृत्ति के हैं। उसके सामने अन्ना जैसा कच्छप गति वाला व्यक्ति इस्तेमाल होने को अभिशप्त है। अन्ना के समय में मीडिया क्रांति नहीं हुई थी। लोग बताते हैं कि उन्हें फोटो वगैरह खिंचवाने के लिए मीडिया वालों का काफी इंतजार करना पड़ता था। कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। मीडिया में प्रसिद्धि की उनकी भूख का केजरीवाल ने बखूबी इस्तेमाल किया है। अभी दोनों में और टीम के बाकी प्रमुख लोगों में एकदूसरे को इस्तेमाल करने के दावपेंच देखने को मिलेंगे। एकदूसरे को इस्तेमाल करने का खेल इसकी जरा भी शर्म किए बगैर चलेगा कि ये सभी महाशय पूँजीवादी साम्राज्यवाद के समग्र खेल में इस्तेमाल हो रहे हैं। आप कह सकते हैं फिर भला मनमोहन सिंह को ही क्यों शर्म आनी चाहिए!
चौथी बात यह कि ॔यूथ फॉर इक्वैलिटी’ में विश्वास करने वाली पार्टी यह भलीभाँति जानती है कि भारत में युवा शक्ति का मतलब अगड़ी सवर्ण जातियों के युवा होते हैं। इस पार्टी का दारोमदार उन्हीं पर है और रहेगा। सुना है पार्टी की स्थापना के मौके पर तलवार वगैरह भाँजी गई हैं। पाँचवी बात यह कि समाजवादियों ने एक बार फिर अपनी ॔जात’ दिखा दी है। अभी तक वे संघियों और कांग्रेसियों के पिछलग्गू थे, अब एन.जी.ओ.बाजों के भी हो गए हैं। किशन पटनायक को गुरु मानने वाले केजरीवाल के शिष्य बन गए हैं। मामला यहीं नहीं रुकता। जो वरिष्ठ समाजवादी लोहिया को ही पहला, अकेला और अंतिम गुरु मानते रहे और दूसरों को चरका देते रहे, उन्हें भी केजरीवाल को राजनैतिक गुरु मानने में परेशानी नहीं हुई। मेधा पाटकर ने अन्ना को गुरु कबूल किया है तो वे केजरीवाल की गुरुबहन हो गइरं। आजकल के गुरु लोग अपनी सुरक्षा का निजी इंतजाम रखते हैं। भारतीय किसान यूनियन ने खुद आगे ब़ कर यह जिम्मेदारी उठा ली है।
छठी बात यह है कि इस पार्टी के बनाने में वे सभी शामिल हैं जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल और उसके समर्थक थे। क्योंकि यह पार्टी, जैसा कि कुलदीप नैयर ने उसकी तारीफ में कहा है, ॔आंदोलन की राख से उठी है’। अति वामपंथियों से लेकर अति गांधीवादियों तक ने अन्ना की टोपी पहन ली थी। उनमें सामान्य कार्यकर्ता, बड़े नेता और बुद्धिजीवी शामिल थे। आज भी अपने को अल्ट्रा माक्र्सवादी जताने वाले कई साथी केजरीवाल के ॔पोल खोल’ कार्यक्रम पर उन्हें सलाम बजाते और उनके आंदोलन में नैतिक आभा कम न हो जाए, इस पर चिंतित होते देखे जा सकते हैं। यहाँ हम थोड़ा बताना चाहेंगे कि हमने बिल्कुल शुरू में आगाह किया था कि कम से कम ऐसे राजनैतिक संगठनों और लोगों को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए जो समाजवादी विचारधारा और व्यवस्था में विश्वास करते हों। लेकिन जब ए.बी. बर्द्धन और वृंदा करात जैसे अनुभवी नेता रामलीला मैदान जा पहुँचे तो बाकी की क्या बिसात थी। राजनैतिक डर उन्हें उस आंदोलन में खींच ले गया जिसमें उमा भारती से लेकर गडकरी तक, चौटाला से लेकर शरद यादव तक शिरकत करने पहुँचे। बाद में तो सबके लिए खुला खेल फरुर्खाबादी हो गया।
उनमें यह डर नहीं पैदा होता अगर उन्होंने समाजवाद की किताबी से ज्यादा जमीनी राजनीति की होती। वे विवेकानंद से लेकर अंबेडकर तक को अपने शास्त्र में फिट करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके शास्त्र से कोई स्वतंत्र संवाद किया जा सकता है, जैसा कि भारत में आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया ने किया, यह उन्हें बरदाश्त नहीं है। उन्हें चीन का ॔मार्केट सोशलिज्म’ मंजूर है, लेकिन ॔देशी समाजवाद’ की बात करने के बावजूद भारतीय समाजवादी चिंतकों को बाहर रखते हैं। दरअसल, यह डर हमेशा बने रहना है; उसी तरह जैसे शास्त्र को प्रमाण मानने वाला ब्राह्मण हमेशा डरा रहता है और रक्षा के लिए बारबार देवताओं के पास भागता है।
सातवीं बात यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नवउदारवाद के खिलाफ वास्तविक संघर्ष को निरस्त करने की राजनीति पहले से निहित थी। उसे ही तेज करने के लिए नई पार्टी बनाई गई है। लिहाजा, कुछ भले लोगों का यह अफसोस जताना वाजिब नहीं है कि राजनीति जैसी गंदी चीज में इन अच्छे लोगों को नहीं पड़ना चाहिए। आठवीं बात यह कि एनजीओ वालों को धन देकर काम कराने की आदत होती है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में यह काम खूब हुआ है। पार्टी में भी होगा। एक वाकिया बताते हैं। हम लोग सितंबर के अंतिम सप्ताह में जंतर मंतर पर एफ.डी.आई. के खिलाफ क्रमिक भूख हड़ताल पर थे। 23 सितंबर को वहाँ केजरीवाल का कार्यक्रम था। सुबह दस बजे से कुछ युवक और अधेड़ तिरंगा लेकर एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगाने लगे। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे इक्कीस सौ रुपया की दिहाड़ी पर हरियाणा से आए हैं।
जैसा कि अक्सर होता है, जंतर मंतर पर पूरा दिन और कुछ देर के लिए होने वाले कई कार्यक्रम थे। केजरीवाल के समर्थकों द्वारा बजाए गए डी.जे. की तेज आवाज ने सभी को परेशान करके रख दिया था। देशभक्ति के फिल्मी गीत बारबार बजाए जा रहे थे। पुलिस का एक वरिष्ठ कांस्टेबल हमारे पास आया कि हम उन्हें तेज आवाज में डी.जे. बजाने से रोकें, क्योंकि वे उसके कहने से नहीं मान रहे हैं। डी.जे. पूरा दिन लगातार बजता रहा। शाम के वक्त केजरीवाल आए और उनका भाषण शुरू हुआ तो उनके समर्थकों ने हमसे आदेश के स्वर में माइक व भाषण बंद करने को कहा। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें डपटा तो वे आँखें दिखाने लगे। हमने खुद उन्हें समझा कर वहाँ से हटाया।
नौवीं बात है कि कांग्रेस और भाजपा का चेहरा काफी बिगड़ गया है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं में एक भी ॔अंतर्राष्ट्रीय’ केंडे का नहीं है। पूँजीवादी साम्राज्यवाद के नेटवर्क से जुड़े अपने अधीनस्थ देशों में साफसुथरे चेहरों की पार्टी, जो लोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करे, अमरीका की अभिलाषा होती है। जो देश उसके नेटवर्क में फँसने से इनकार करते हैं वहाँ वह खुद हमला करके अपने माफिक नेता बिठा देता है। पार्टी का पंजीकरण हुए बिना ही अगले आम चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा बताती है कि नई पार्टी के लिए धन की कोई समस्या नहीं होगी।
दसवीं और अंतिम बात यह कि यह सब प्रदशर्न ॔मैं अन्ना हूँ’, ॔मैं केजरीवाल हूँ’, ॔मैं आम आदमी हूँ’ हद दरजे का बचकानापन है। मुक्तिबोध ने भारत के मध्य वर्ग की इस प्रवृत्ति को ॔दुखों के दागों को तमगेसा पहना’ कह कर अभिव्यक्त किया है। कपट, इस्तेमालवृत्ति और लफ्फाजी से भरे आंदोलन से कोई जेनुइन राजनैतिक पार्टी नहीं निकल सकती है।
पार्टी को एक तरफ छोड़ कर ॔आम आदमी’ पर थोड़ी चर्चा करते हैं जिसकी दावेदारी में कांग्रेस और भाजपा नई पार्टी के साथ उलझे हैं। लाखोंकरोड़ों में खेलने वाले लोग जब ॔मैं आम आदमी हूँ’ की टोपी लगाते हैं तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों के उपहास में निकलता है। अगर लाखों की मासिक तनख्वाह और फोर्ड फाउंडेशन जैसी पूँजीवाद की जमी हुई संस्थाओं से करोड़ों का फंड पाने वाले लोग अपने को आम आदमी कहें, तो यह गरीबों के सिवाय अपमान के कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर जो अकूत खर्चा किया गया है, वह दरअसल इस पार्टी के निर्माण पर किया गया खर्च है। आम आदमी से अगर मुराद गरीबों से है, जैसे कि दावे हो रहे हैं, तो कोई उन्हें इतना धन देने वाला नहीं है कि वे अपनी पार्टी धन की धुरी पर खड़ी कर सकें। गरीबों की किसी भी पार्टी को याराना पूँजीवाद का यार, याराना मीडिया दिनरात तो क्या, कुछ सेकेंड तक नहीं देगा। लिहाजा, यह स्पष्ट है कि आम आदमी का अर्थ गरीब आदमी नहीं है न कांग्रेस के लिए, न आम आदमी की टोपी पहनने वालों के लिए। आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनैतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ॔व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ॔आम आदमी, आम आदमीआम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विशष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में  गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुइरं, वे शुरू से ही मेहनतमजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं।
सब टी.वी. पर एक सीरियल आर.के. लक्ष्मण की दुनिया’ आता है। उसका उपशीर्षक होता है ॔आम आदमी के खट्टे मीठे अनुभव’। यह सीरियल उस आम आदमी की तस्वीर पेश करता है जो आम आदमी की अवधारणा में निहित रही है। ये आम आदमी ज्यादातर नौकरीपेशा हैं, साफसुथरी और सुरक्षित हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट में रहते हैं, मोटेताजे सजेधजे होते हैं, स्कूटरकार आदि वाहन रखते हैं, आमदनी बहुत नहीं होती लेकिन खानेपीने, बच्चों की पॄाई लिखाई, सैरसपाटे-पिकनिक, बच्चों के कैरियर आदि ठीक से संपन्न हो जाते हैं।
मध्य वर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्य वर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें होना ही नहीं चाहिए। भारत का यह ॔महान’ मध्य वर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है।
भारत का मध्य वर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि इस आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियाँ हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियाँ देती हैं। इसी आधार पर पार्टी के नेताओं ने युवकों का आह्वान किया है कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएँ और मध्य वर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहाँ उनकी जात भी ऊँची होगी और वर्गस्वार्थ भी बराबर सधेगा।
-प्रेम सिंह
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