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शनिवार, 22 जुलाई 2017

चीनी निवेश और राष्ट्रवाद



देश-प्रेम और राष्ट्र-भक्ति हर किसी को होता है। किसे अपना घर, परिवार, जिला, राज्य और देश नहीं प्यारा होता है। सब को प्यारा होता है। हिंदी की एक कहावत है, "नैहर का कुत्ता भी प्यारा लगता है।" हमें भी अपने देश से प्यार है। हम भी देश की आन-बान-शान पर कुर्बान हैं। लेकिन, एक बात समझ में नहीं आता है कि जब हम कोई फुलझड़ी खरीदकर लाते हैं तो लोग चिल्लाने लगते हैं कि साहब आप तो विदेशी सामान ख़रीद कर ले जा रहे हैं। यह देशद्रोह है, यह राष्ट्रद्रोह है। ऐसे लोग उन विक्रेताओं पर सवालिया क्यों नहीं होते हैं कि जनाब यह सामान मुल्क का नहीं है। इसे बेंचना अपराध है, देशद्रोह है, राष्ट्रदोह है। और असली बात यह कि विक्रेता चीनी सामान लाते क्यों है, किसकी इजाजत से लाते हैं और कैसे लाते हैं? जब परमीशन नहीं है तो ऐसे लोगों को जेल क्यों  नहीं होती है? कौन उन्हें सहायता पहुंचाता है? देशप्रेमियों-राष्ट्रवादियों को सरकार से प्रश्न करना सीखना होगा कि हमारे देश में पूँजीपतियों को चीनी सामान क्रय करने की छूट क्यों देती है?
रवीश कुमार के एक लेख का सहारा लूँ तो 2011 में भारत में विदेशी निवेश करने वाले मुल्कों में चीन का स्थान 35 वां था। 2014 में 28 वां हो गया। 2016 मे चीन भारत में निवेश करने वाला 17 वां बड़ा देश है। विदेश निवेश की रैकिंग में चीन ऊपर आता जा रहा है। बहुत जल्दी चीन भारत में विदेश निवेश करने वाले चोटी के 10 देशों में शामिल हो जाएगा। भारत के लिए राशि बड़ी है मगर चीन अपने विदेश निवेश का मात्र 0.5 प्रतिशत ही भारत में निवेश करता है। (सन्दर्भ:10 अप्रैल, 2017, हिन्दुस्तान टाइम्स ने रेशमा पाटिल इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट से)
2011 में चीन ने कुल निवेश 102 मिलियन डॉलर का किया था, 2016 में एक बिलियन का निवेश किया, जो कि एक रिकार्ड है। जबकि इंडस्ट्री के लोग मानते हैं कि 2 बिलियन डॉलर का निवेश किया होगा चीन ने। एक अन्य आंकड़े के अनुसार चीन और चीन की कंपनियों का निवेश 4 बिलियन डॉलर है। (सन्दर्भ:10 अप्रैल,2017, हिंदुस्तान टाइम्स)
कई चीनी कंपिनयों के रीजनल आफिस अहमदाबाद में है। अब महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और हरियाणा की तरफ़ जाने लगे हैं। फरवरी 2017 के चीनी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चीन की सात बड़ी फोन निर्माता कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने जा रही हैं। चीन की एक कंपनी है चाइना रेलवे रोलिंग स्टॉक, इसे नागपुर मेंट्रो के लिए 851 करोड़ का ठेका मिला है। चीनी मेट्रो के बहिष्कार को सफ़ल बनाने के लिए नागपुर से अच्छी जगह क्या हो सकती है! ( सन्दर्भ:15 अक्तूबर 2016 के बिजनेस स्टैंडर्ड )
चाइना रोलिंग स्टॉक कंपनी को गांधीनगर-अहमदाबाद लिंक मेट्रो में ठेका नहीं मिला तो इस कंपनी ने मुकदमा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अब इस कंपनी को 10,733 करोड़ का ठेका मिल गया है। यह ठेका इसलिए रद्द किया गया था कि चाइना रोलिंग स्टाक चीन की दो सरकारी कंपनियों के विलय से बनी है। विशेषज्ञों ने कहा है कि जब हम इतनी आसानी से चीन को निर्यात नहीं कर सकते तो उनकी कंपनियों को क्यों इतना खुलकर बुला रहे हैं। (सन्दर्भ:4 जुलाई 2017 के बिजनेस स्टैंडर्ड)
औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) के अनुमान के अनुसार, अप्रैल 2000 और दिसंबर 2016 के बीच चीन से कुल 1.6 अरब डॉलर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया था। लेकिन भारतीय बाजार विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह आंकड़ा दो अरब डॉलर से भी अधिक है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सवंर्धन संबंधित चीनी परिषद को कानूनी सेवाएं प्रदान करने वाले गुड़गांव के ‘लिंक लीगल इंडिया लॉ सर्विस’ के साझेदार संतोष पई ने कहा, “भारत में वास्तविक चीनी निवेश आधिकारिक भारतीय आंकड़े से तीन गुणा अधिक है।” पई ने कहा कि भारतीय आंकड़े चीन के प्रत्यक्ष निवेश पर आधारित होते हैं, लेकिन चीन का अधिकांश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हांगकांग जैसे कर पनाहगाह देशों के रास्ते होता है। पिछले साल चीन के उप वित्तमंत्री शी याओबिन ने कहा था कि चीन ने भारत में कुल 4.07 अरब डॉलर का और भारत ने चीन में 65 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। पई ने कहा, “चीन शीघ्र ही भारत के सर्वोच्च 10 निवेशकों में से एक होगा।” हालांकि छह साल पहले स्थिति अलग थी, जब देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से भारत में निवेश करने वाले कम ही थे। आज भारत की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान कंपनी पेटीएम की 40 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा और उसके सहयोगियों के पास है।
गुजरात सरकार ने चीनी कंपनियों से निवेश के लिए 5 बिलियन डॉलर का क़रार किया है। (सन्दर्भ:22 अक्तजुवर 2016-इंडियन एक्सप्रेस)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महती परियोजना 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का निर्माण का ठेका गुजरात सरकार द्वारा अग्रणी इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), चाइना को दिया गया है। 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का निर्माण 3000 करोड़ रुपये की लागत से पूरा किया जाएगा। अहमदाबाद में क्या इसका कोई विरोध हुआ, क्या होगा? कभी नहीं।
चीन भारत की बड़ी आईटी कंपनियों की जासूसी कर रहा है। भारत की एक बड़ी कंपनी को 8 मिलियन डॉलर की चपत लग गई क्योंकि जिस कंपनी के बिजनेस डेलिगेशन को भारत आना था, वो चीन चली गई। जब भारतीय कंपनी ने इसका पता किया तो यह बात सामने आई कि चीन की जासूसी के कारण उसके हाथ से ये ठेका चला गया। चीनी हैकरों ने भारतीय कंपनी के सारे डिटेल निकाल लिये थे। उस समय अखबार ने लिखा था कि खुफिया विभाग मामले की पड़ताल कर रहा है? (सन्दर्भ:15 दिसंबर 2008-डीएनए, बंगलुरु, जोसी जोज़फ़ की रिपोर्ट)
कर्नाटक सरकार चीनी कंपनियों के लिए 100 एकड़ ज़मीन देने के लिए सहमत हो गई है। (सन्दर्भ:8 जुलाई 2015-द हिन्दू)।
महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन ने चीन की दो मैन्यूफक्चरिंग कंपनी को 75 एकड़ ज़मीन देने का फ़ैसला किया है। ये कंपनियां 450 करोड़ का निवेश लेकर आएंगी। (सन्दर्भ:5 जनवरी 2016-इन्डियन एक्सप्रेस)
हरियाणा सरकार ने चीनी कंपिनयों के साथ 8 सहमति पत्र पर दस्तख़त किये हैं। ये कंपनियां 10 बिलियन का इंडस्ट्रियल पार्क बनाएंगी, स्मार्ट सिटी बनाएंगी। (सन्दर्भ:22 जनवरी 2016-ट्रिब्यून)
पिछले साल भारत में चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में काफी वृद्धि नजर आई, लेकिन पिछले साल विश्व के 164 देशों में चीन के 10 खरब युआन या 170 अरब डॉलर के विदेशी निवेश को देखते हुए यह आंकड़ा नगण्य है। अकेले अमेरिका में चीन ने 45.6 अरब डॉलर निवेश किए थे। हालांकि पिछले दो सालों में भारत और चीन के बीच नए राजनीतिक मतभेद उभरने के बावजूद भारत में चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ा है।
महाराष्ट्र के मुख्यमत्री देवेंद्र फड़णवीस की तरह हरियाणा के मुख्यमंत्री एम एल खट्टर भी चीन का दौरा कर चुके हैं. चीन का सबसे अमीर आदमी हरियाणा में साठ हज़ार करोड़ निवेश करेगा। (सन्दर्भ:24 जनवरी 2016-डीएनए)
चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पिछले साल 46.56 अरब डॉलर पहुंच गया था। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार भी 2015 के 100 अरब डॉलर के लक्ष्य से नीचे रहा था। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2014 में भारत में पांच साल में 20 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था। अगर यह वादा पूरा हो जाता है तो इससे भारत में चीन की आर्थिक उपस्थिति बढ़ जाएगी। लेकिन फिर भी यह शी के सबसे हालिया वादे का छोटा-सा हिस्सा ही होगा, जिसके अनुसार चीन पांच सालों में विदेश में 750 अरब डॉलर निवेश करेगा। समझ नहीं आता है कि एक समय इन्हीं कारोबारी रिश्तों को सरकार और अर्थव्यवस्था की कामयाबी के रूप में पेश किया जाता है और जब विवाद होता है कि इन तथ्यों की जगह लड़ियां-फुलझड़ियां का विरोध शुरू हो जाता है। क्या चीनी सामान का विरोध करने वाले भारत में चीन के निवेश का विरोध करके दिखा देंगे?
खबर है कि अलीबाबा पेटीएम में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 62 प्रतिशत करने जा रहा है। इतना ही नहीं, चीन की चौथी सबसे बड़ी मोबाइल फोन कंपनी जियोमी भारत स्थित एक नए कारखाने में हर सेकंड में एक फोन असेंबल कर रही है।
डीआईपीपी के मुताबिक, फिर भी भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और चीन के वैश्विक विदेशी निवेश दोनों स्तरों पर चीन का भारत में निवेश तुलनात्मक रूप से कम है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में चीन का कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश केवल 0.5 प्रतिशत है। जापान की तुलना में (7.7 प्रतिशत) यह बेहद कम है।
देशभक्ति के सवाल पर आप चीन का विरोध कीजिए, उसमें कुछ ग़लत नहीं है लेकिन जो आपके घर में घुस गया है, उसका विरोध कीजिए। विरोध का लक्ष्य बड़ा होना चाहिए। हमें देश की आर्थिक नीतियों पर गौर करना सीखना होगा। हमें अपने नेताओं की कथनी-करनी के फर्क को समझना होगा। हमें नेताओं के भाषणों के निहितार्थ को समझना होगा कि इससे हमारे आर्थिक व सामाजिक जीवन पर क्या असर पड़ने वाला है।  मैं यह इसलिए लिख रहा हूँ कि ताकी आप सभी अपडेट हो सकें और समाज बहुत बड़ी हिंसक वृत्ति से बच सके। व्हाटसप और फेसबुक पर होने वाले गली-गलौज से भी आप बच सकें।
आर डी आनंद
20.07.2017

गुरुवार, 18 मई 2017

*प्रतिशोध और प्रतिरोध*



मैं आप को दो जीवन और उनके क्रांतिकारी सिद्धांत और क्रांतिकारी  कार्यवाइयों को प्रस्तुत कर रहा हूँ। देखना यह है कि इनके सिद्धांत और कार्यवाइयों से आप कितने संतुष्ट हैं। जहाँ चारू मजूमदार को जेल में डाल कर उनकी हत्या कर दी गई थी और उनके मृत शरीर को न तो उनके घर वालों को दिया गया और न ही उनके संगठन के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को ही दिया गया। वहीं कानू सान्याल कई बार क्रांतिकारी कार्यवाइयों की वजह से जेल की यातनाएं काटे। अन्त में 2010 में उन्होंने आत्म हत्या कर लिया। आप को पड़ताल यह करना हैं कि कौन सी ऐसी परिस्थियाँ थीं जिसकी वजह से चारू मजूमदार को जेल में मार डाला गया तथा कौन सी ऐसी परिस्थिति ने जन्म लिया जिससे वृद्धावस्था में कामरेड कानू सान्याल को आत्महत्या करना पड़ा। दोनों सामाजिक ज्याजातियों के विरुद्ध एक सुन्दर समाज की रचना के लिए संघर्षरत थे। हाँ,अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों से सिर्फ इतनी ही भिन्नता थी कि जहाँ अन्य पार्टियाँ सशस्त्र क्राँति के समय से इंकार कर रही थीं,वहाँ ये दोनों क्रांतिकारी सशस्त्र विद्रोह में ही समाजवादी क्राँति को सफल मान रहे थे।
चारू मुजुमदार:
चारू का जन्म 1918 में सिलीगुड़ी में हुआ। उसके पिता एक स्वतन्त्रता सेनानी थे। 1937-38 में कॉलेज की पढ़ाई को छोड़कर चारू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए और बीड़ी कर्मचारियों को संगठित करने के प्रयास में जुट गए। इसके पश्चात वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए ताकि इसकी किसान शाखा के लिए काम कर सकें। जल्द ही उनके नाम एक गिरफ़्तारी का वॉरंट जारी हुआ जिसके कारण उन्हें बाएँ कार्यकर्ता के रूप में पहली बार भूमिगत होना पड़ा। हालांकि सीपीआई को प्रथम विश्व युद्ध के समय प्रतिबंधित किया गया था, वह सीपीआई की गतिविधियों को किसानों के बीच जारी रखे और जलपुरीगंज जिला कमिटि के 1942 में सदस्य बन गए थे। इस प्रगति से प्रेरित होकर चारू ने फ़सल को क़ब्ज़े लेने का अभियान जलपुरीगंज में 1943 के बड़े अकाल के दौरान सफलतापूर्वक चलाया। 1946 में वह तेभागा आन्दोलन से जुड़े और उत्तर बंगाल के कामगारों के लिए हथियारबंद आन्दोलन शुरू किया। इसके पश्चात वह कुछ समय के लिए दार्जीलिंग के चाय के बागानों के कर्मचारियों के बीच काम करते रहे।
सीपीआई को 1948 में प्रतिबंधित किया गया था। चारू ने अगले तीन वर्ष जेल में बिताए। जनवरी 1954 में चारू ने लीला मुजुमदार सेनगुप्ता शादी की जो जलपुरीगंज से सी पी आई की सदस्या रही थी। इस जोड़े ने सिलीगुड़ी की ओर प्रस्थान किया जो अगले कुछ सालों तक मुजुमदार की गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। यहीं पर उसके बीमार पिता और अवैवाहित बहन गम्भीर दरिद्रता का जीवन जी रहे थे।
1960 की दशक से मध्य में मजुमदार ने उत्तर बंगाल में सी पी एम में एक बाईं टुकड़ी बनाई। 1967 में नक्सलबाड़ी में एक हथियारों से लैस किसान विद्रोह छिड़ गया जिसकी अगुवाई कॉमरेड कानू सान्याल कर रहे थे। इस दल को आगे चलकर नक्सली कहा जाने लगा। ऐसे समय पर चारू ने आठ लेख लिखे थे जिनका उद्देश्य यह था कि सफल क्रांति चीनी क्रांति के मार्ग पर हिंसात्मक संघर्ष का रूप ले सकती है। 1969 में चारू ने "ऑल इंडिया कोऑरडिनेशन कमिटी ऑफ़ कम्यूनिस्ट रेवोलूशनरीज़" बनाई जिसके वह जेनेरल सेकरेटरी बने। जुलाई 16, 1972 को चारू को अपने खुफ़िया ठिकाने से पकड़ा गया और 28 जुलाई, 1972 की रात 4 बजे वह लॉक-अप में ही गुप्त रूप से मार डाले गए। मृत शरीर भी परिवार को नहीं सौंपा गया। पुलिस, निकटतम परिवारजनों के साथ शरीर को शवदाहगृह ले गई। पूरा इलाका घेरे में लिया गया था और किसी भी दूसरे रिश्तेदार को जिस्म को जलाते समय अन्दर आने की अनुमति नहीं दी।
कानू सान्याल:
कानू सान्याल (जन्म १९३२) भारत में नक्सलवादी आंदोलन के जनक कहे जाने हैं। दार्जीलिंग जिले के कर्सियांग में जन्में कानू सान्याल अपने पांच भाई बहनों में सबसे छोटे हैं। पिता आनंद गोविंद सान्याल कर्सियांग के कोर्ट में पदस्थ थे। कानू सान्याल ने कर्सियांग के ही एमई स्कूल से १९४६ में मैट्रिक की अपनी पढ़ाई पूरी की। बाद में इंटर की पढाई के लिए उन्होंने जलपाईगुड़ी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उसके बाद उन्हें दार्जीलिंग के ही कलिंगपोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिली। कुछ ही दिनों बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारु मजुमदार से हुई। जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तो उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली। १९६४ में पार्टी टूटने के बाद उन्होंने माकपा के साथ रहना पसंद किया। १९६७ में कानू सान्याल ने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की। अपने जीवन के लगभग १४ साल कानू सान्याल ने जेल में गुजारे। कुछ दिनों वे भाकपा माले के महासचिव के बतौर सक्रिय थे और नक्सलबाड़ी से लगे हुए हाथीघिसा गांव में रहते थे। और अंत में, 2010 में आत्महत्या कर लिया।
नक्सलवाद:
नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। 1967 में "नक्सलवादियों" ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। 1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।
आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के विचारधारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आँध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ रही है।
माओवाद:
माओवाद (1960-70 के दशक के दौरान) चरमपंथी अतिवादी माने जा रहे बुद्धिजीवी वर्ग का या उत्तेजित जनसमूह की सहज प्रतिक्रियावादी सिद्धांत है। माओवादी राजनैतिक रूप से सचेत सक्रिय और योजनाबद्ध काम करने वाले दल के रूप में काम करते है। उनका तथा मुख्यधारा के राजनैतिक दलों में यह प्रमुख भेद है कि जहाँ मुख्य धारा के दल वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही काम करना चाहते है वही माओवादी समूचे तंत्र को हिंसक तरीके से उखाड़ के अपनी विचारधारा के अनुरूप नयी व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं। वे माओ के इन दो प्रसिद्द सूत्रों पे काम करते हैं :
1. राजनैतिक सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है।
2. राजनीति रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति।
भारतीय राजनीति के पटल पर माओवादियों का एक दल के रूप में उदय होने से पहले यह आन्दोलन एक विचारधारा की शक्ल में सामने आया था पहले पहल हैदराबाद रियासत के विलय के समय फिर 1960-70 के दशक में नक्सलबाड़ी आन्दोलन के रूप में वे सामने आए।
भारत में माओवाद के कारण:
भारत में माओवाद के निम्नलिखित कारण हैं।
राजनैतिक:
भारत में माओवाद असल में नक्सलबाड़ी के आंदोलन के साथ पनपा और पूरे देश में फैल गया। राजनीतिक रूप से मार्क्स और लेनिन के रास्ते पर चलने वाली कम्युनिस्ट पार्टी में जब विभेद हुये तो एक धड़ा भाकपा मार्क्सवादी के रूप में सामने आया और एक धड़ा कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में. इनसे भी अलग हो कर एक धड़ा सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर चलते हुये पड़ोसी देश चीन के माओवादी सिद्धांत में चलने लगा। भारत में माओवादी सिद्धांत के तहत पहली बार हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले चारु मजूमदार के बेटे अभिजित मजूमदार के अनुसार चारू मजूमदार जब 70 के दशक में सशस्त्र संग्राम की बात कर रहे थे, तो उनके पास एक पूरी विरासत थी। 1950 से देखा जाय तो भारतीय किसान, संघर्ष की केवल एक ही भाषा समझते थे, वह थी हथियार की भाषा। जिन्होंने जमींदारों के खिलाफ, ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हथियार उठाया था। 1922 में चौराचौरी में 22 पुलिस वालों को जलाया गया था, उसमें भी सबसे बड़ी भागीदारी किसानों की थी। उसके बाद ही तो गांधीजी ने असहयोग और अहिंसक आंदोलन की घोषणा की थी। लेकिन किसानों ने तो अपने तरीके से अपने आंदोलन की भाषा समझी थी और उसका इस्तेमाल भी किया था।
आर्थिक:
विकास की बड़ी योजनाएँ भी अनेक लोगों को विस्थापित कर रही है अतीत में ये बड़े बाँध थे और आज सेज बन गए है, पुनर्वास की कोई भी योजना आज तक सफल नही मानी गयी है इससे जनता में रोष बढ़ता ही जाता है इसी रोष को लक्षित कर माओवादी पार्टी ने अपने पिछले सम्मेलन में साफ़ रूप से कहा था कि वो इस प्रकार की विकास परियोजनओं का विरूद्ध करेंगे तथा विस्थापितों का साथ भी देंगे यदि वे ऐसा करते है तो निश्चित रूप से एक राज्य के रूप में हमारा देश नैतिक अधिकार खो बैठैगा और उनके प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि अपने आप ही हो जायेगी। अगर आर्थिक कारणों को देखा जाए तो वे भी माओवाद के प्रसार के लिए काफी सीमा तक जिम्मेदार है यधपि पिछले 30 सालों में निर्धनता उन्मूलन के प्रयासों को भारी सफलता मिली है लेकिन यह भी माना ही जाता रहा कि ये योजनाएँ भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता का गढ़ रही है तथा निर्धनता उन्मूलन के आंकड़े बहुत भरोसे के लायक नहीं माने जा सकते है आबादी का बड़ा हिस्सा निर्धनता की रेखा से जरा सा ही ऊपर है, तकनीकी रूप से भले ही वो निर्धन नहीं हो लेकिन व्यवहार में है और अर्थव्यवस्था में आया थोडा सा बदलाव भी उन्हें वापिस रेखा से नीचे धकेल देने के लिए काफी होता है। फ़िर जिस अनुपात में कीमतें बढ़ जाती है उसी अनुपात में निर्धनता के मापदंड नहीं बदले जाते है इस से बड़ी संख्या में लोग निर्धनता के चक्र में पिसते रहते है; फ़िर क्या लोग इस चीज से संतोष कर लिए कि अब वो गरीब रेखा से ऊपर आ गए है ?जबकि अमीर उनकी आँखों के सामने और अमीर बनते जा रहे है फ़िर वो लोग ही क्यो उसी हाल में बने रहे ?
भारत के आंतरिक क्षेत्र जो विकास से दूर है तथा इलाके जो आज माओवाद से ग्रस्त है वे इसी निर्धनता से ग्रस्त है। बेरोजगारी भी अनेक समस्याओं को जन्म देती है इसके चलते विकास रूका रहता है, निर्धनता बनी रहती है तथा लोग असंतुष्ट बने रहते है, यह लोगों को रोजगार की तलाश में प्रवासी बना देती है, पंजाब के खेतों में काम करते बिहारी मजदूर इसका सबसे अच्छा उदाहरण माने जा सकते हैं।
सामाजिक:
भूमि सुधार कानून जो 1949 - 1974 तक एक श्रृंखला के रूप में निकले थे, विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी हुआ लेकिन आज भी देश में भूमि का न्यायपूर्ण वितरण भूमिहीनों तथा छोटे किसानों के बीच न्यायपूर्ण तरीक से नही हुआ है। पुराने जमींदारों ने कई चालों के जरिये अपनी जमीन बचा ली और वक्त के साथ साथ जमींदारों की नई नस्ल सामने आ गयी जो बेनामी जमीन रखती है और गरीब उतना ही लाचार है जितना पहले था
अनुसूचित जनजाति और जाति के लोग भारत में लंबे समय तक हाशिये पे धकेले हुए रहे हैं वैसे मानव भले ही स्वभाव से सामाजिक प्राणी रहा हो जो हिंसा नही करता लेकिन जब एक बड़े वर्ग को समाज किसी कारण से हाशिये पे धकेल देता हैं और पीढी दर पीढी उनका दमन चलता रहता हैं।
भारत में एक बड़ी आबादी जनजातीय समुदाय की हैं लेकिन इसे मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर आज तक नही मिला हैं आज भी सबसे धनी संसाधनों वाली धरती झारखंड तथा उडीसा के जनजातीय समुदाय के लोग निर्धनता और एकाकीपन के पाश में बंधे हुए हैं। नक्सलवाद अपने शुरू के दिनों से ही बहुत ही बदनाम रहा है। आज इसे आतंकवाद की श्रेणी में गिना जाता है।
आतंकवाद एक प्रकार के माहौल को कहा जाता है। इसे एक प्रकार के हिंसात्मक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो कि अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं विचारात्मक लक्ष्यों की प्रतिपूर्ति के लिए गैर-सैनिक अर्थात नागरिकों की सुरक्षा को भी निशाना बनाते हैं। गैर-राज्य कारकों द्वारा किये गए राजनीतिक, वैचारिक या धार्मिक हिंसा को भी आतंकवाद की श्रेणी का ही समझा जाता है। अब इसके तहत गैर-क़ानूनी हिंसा और युद्ध को भी शामिल कर लिया गया है। अगर इसी तरह की गतिविधि आपराधिक संगठन द्वारा चलाने या को बढ़ावा देने के लिए करता है तो सामान्यतः उसे आतंकवाद नही माना जाता है, यद्यपि इन सभी कार्यों को आतंकवाद का नाम दिया जा सकता है। गैर-इस्लामी संगठनों या व्यक्तित्वों को नजरअंदाज करते हुए प्रायः इस्लामी या जिहादी के साथ आतंकवाद की अनुचित तुलना के लिए इसकी आलोचना भी की जाती है।
विश्व के प्रमुख आतंकवादी संगठन आईएसआईएस, अल कायदा, कौमी एकता मूवमेंट, बास्कस, आयरिश नेशनल लिबरेशन आर्मी, आयरिश रिपब्लिक आर्मी,रेड ब्रिगेड्स, शाइनिंग पाथ,  रेड आर्मी गुट, हिज्बुल्लाह्, पापुलर फ्रंट फार लिबरेशन आफ पैलेस्टाइन, अबु निदाल गुट, उल्स्टर डिफेंस एसोसिएशन, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट, डेमोक्रेटिक फ्रंट फार लिबरेशन आफ पैलेस्टाइन, पीपुल्स मूवमेंट फार लिबरेशन आफ अंगोला,सराजो, अल्फोरा विवा, फाराबंदो मार्ती लिबरेशन फ्रंट, कुक्लुल्स क्लान, नेशनल यूनियन फार द टोटल, इंडीपेंडें आफ अंगोला, तमिल इलाम मुक्ति शेर, ख्मेर रूज, नेशनल लिबरेशन आर्मी, नेशनल डिग्रीटी कमांड, विकटर पोले, कारेन नेशन लिबरेशन आर्मी, जैश-ए-मोहम्म्द, हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी, रणवीर सेना, उल्फा, बब्बर खालसा इंटरनेशनल, खालिस्तान कमांडो फोर्स, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हरकत उल मुजाहिदीन, हरकत उल अंसार, हरकत उल जेहाद-ए-इस्लामी, हिजबुल मुजाहिदीन, अल उमर मुजाहिदीन, जम्मू-कश्मीर इस्लामिक फ्रंट, स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी), दीनदार अंजुमन, अल बदर, जमात उल मुजाहिदीन, अल कायदा, दुख्तरान-ए-मिल्लत और इंडियन मुजाहिदीन, यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा), नेशनल डेमोकेट्रिक फंट्र ऑप बोडोलैंड (एनडीएफबी), पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ), पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपक, कांगलीपक कम्युनिस्ट पार्टी, मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट, आल त्रिपुरा टाइगर फोर्स, नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा,लिट्‍टे, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एमएल), पीपुल्स वार, एमसीसी, तमिलनाडु लिबरेशन आर्मी, तमिल नेशनल रिट्रीवल ट्रुप्स, अखिल भारत नेपाली एकता समाज, भाकपा-माओवादी, नक्सलवादी,माओवादी आदि हैं।
इनमें से बहुत सारे संगठन आतंकवादी हैं किन्तु बहुत से संगठन जल, जमीन,जंगल के लिए संघर्षरत हैं। बहुत से संगठन अमीरी-गरीबी को लेकर सक्रीय हैं। बहुत से संगठन जातीय दंश की वजह से क्रिया-प्रतिक्रिया की लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई धर्म के आतंक से बचने के लिए लड़ रहा है। भारत बहु भाषा-भाषी देश है। यहाँ अनेक धर्म और जातियाँ हैं। मुख्यतः भारत में वर्ण-व्यवस्था है। वर्ण-व्यवस्था का पहला और दूसरा वर्ण क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रीय हैं। क्षत्रीय राजा रहा है और ब्राह्मण उसका संचालक व चिंतक वर्ग है। इसमें भी दो वर्ग हो गए हैं जैसा कि अमूमन भारत की सभी जातियों और धर्मों में पाए जाते हैं-प्रगतिशील वर्ग। यह प्रगतिशील वर्ग वर्गीय एकता की बात तो करता है किन्तु सांस्कृतिक रूप से अभी भी अपने को डी-कास्ट नहीं कर पाया है। इसके लिए भारत की प्रगतिशील वाम वर्ग जिम्मेदार है परन्तु कोई भी वर्ग अन्ततः व्यक्तियों पर ही निर्भर करता है और व्यक्ति सिद्धांत और चरित्र पर। इससे यही लगता है कि वाम वर्ग अभी भी सिद्धांत और चरित्र के मामले में विकसित नहीं हो पाया है। यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति ईमानदार नहीं बन पाया है। कोई भी सिद्धांत मनुष्य ही तय करता है और वही लागू भी करता है। यदि मनुष्य ईमानदारी से क्रांतिकारी सिद्धांतों को समझता, तय करता और लागू करता, तो अब तक भारत से जाति और वर्ग-संघर्ष का चरण पूर्ण हो गया होता।
आज हम जिस चरण में जी रहे हैं वह चरण इतना घटिया है कि जाति और धर्म प्यारा है लेकिन मनुष्य नहीं प्यारा है। एक तरफ हम मंगल ग्रह पर हैं दूसरी तरफ हम छुआ-छूत, ऊँच-नीच,छोटी जाति-बड़ी जाति के चक्कर में रहते हैं। अनेक गाँवों-बस्तियों में दलितों का नरसंहार इसलिए कर दिया जाता है कि वे शूद्र-चमार है,भला इनकी क्या मजाल कि ये ठाकुरों-ब्राह्मणों की बराबरी करें, उनके जैसा खाएं-पीएं,पहने-ओढ़ें, शादी-ब्याह करें, घोड़ी चढ़ें,बैंड-बाजा-बारात सजाएं या फिर इनका नाम लें।
अब इसका क्या इलाज है? क्या ठाकुरों-ब्राह्मणों की मार सहें और प्रतिकार भी न करें? प्रतिकार करें तो अन्य दलित जिनकी कोई गलती नहीं है वे भी मौत के घाट उतारे जाँय? और यदि नक्सलवाड़ी में भूमिहारों-जमींदारों का विरोध करें, तो रणवीर सेना अवतार लेकर दलितों का गला काटने लगते है। क्या संभव नहीं कि नक्सलवाद का जन्म हो? ऊना में दलितों की पिटाई के बाद क्या आश्चय का विषय है कि जिग्नेश के नेतृत्व में पचासों हजार की भीड़ सडकों पर जन प्रदर्शन करने लगे? सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में महाराणा प्रताप के जुलुस के दौरान जब दलितों के 50-60 घर पेट्रोल डाल कर फूंक दिए जाय और स्त्रियों के स्तन काट लिए जाँय,तो क्या भीम आर्मी अपने सवाल उठाने के लिए प्रदर्शन न करे? और यदि प्रदर्शन करे तो पुलिस उनकी पिटाई करने लगे, फिर क्या खून का खौलना कानून का उलंघन है? लेकिन दलित आर्मी की हर हरकतें गैर कानूनी हैं क्योंकि वे पूँजीपति और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए उसकी सबसे ताकतवर शक्ति ( पुलिस और सेना) से ही उलझ गए। इसलिए, उन पर टाडा और रासुका लगाया जा सकता है, इसलिए उनको आतंकवादी संगठन घोषित किया जा सकता है, इसलिए, इन साथियों को जेल में डाल कर मारा भी जा सकता है। विकल्प है कि सभी प्रगतिशील लोग शब्बीरपुर और मेरठ जैसे घृणित जघन्य अपराधों की निंदा करें और अपराधियों के साहस को कमजोर करने का सार्थक प्रयास करें।
-आर डी आनंद

शुक्रवार, 12 मई 2017

मार्क्सवाद विरोध नस्लवाद हैं



      दलितों, गरीबों और मजदूरों को दुःख से निवृत होने के लिए अनन्तः अपनाना ही पड़ेगा। बौद्ध धर्म भी एक धर्म है। एक समय अद्वितीय प्रगतिशील होने के उपरांत आज वह भी अन्य धर्मों की ही तरह कर्मकांडों में फंस गया है। जो लोग यह कहते हैं कि बौद्ध धर्म भारतीय परिवेश से निकला हुआ हिन्दू धर्म का ही अंग है, वे सही कहते हैं। धर्मों में ईश्वर की विचारधारा गरीबों का अवलम्बन होते हुए भी एक भ्रम है। धर्म झगड़े की जड़ है। पूजा प्रार्थनाएं मनुष्य के मनोबल को संतुलित रखती है लेकिन उससे अधिक वह साम्प्रदायिकता बढ़ाकर मनुष्य को दुःख पहुँचाती रहती है। मैं अपनी सारी बात गलत मान लूँ तो क्या विकल्प है कि पूँजीवादी-व्यवस्था ख़त्म हो जाय? एक बात तो आप को समझना ही चाहिए कि निजीकरण के बजाय राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। एक व्यक्ति के हाथों में अरबों-खरबों की पूँजी निरर्थक पड़ी रहती है और दूसरी तरफ लोग भूंखों मरते हैं। क्या आप को नहीं लगता है यदि पूँजी का अकाधिकारीकरण न हो तो पूरी दुनिया अमन-चैन से रह सकती है। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के लिए क्या हमें कुछ करना चाहिए? क्या सब को शिक्षा और सब को काम के लिए सामूहिक आंदोलन होना चाहिए? कोई विकल्प सोचिए।
      मैं सिर्फ दलितों की गरीबी और अशिक्षा के सवाल को ही नहीं देखता हूँ। मैं दलितवादी या आम्बेडकरवादी भी नहीं हूँ।  मुझे दलित खेमें का व्यक्ति न समझें। मैं हर जातियों-धर्मों के गरीबों-मजलूमों की धारा का व्यक्ति हूँ। सभी से तर्क प्रस्तुत करते हुए मार्क्सवाद की वकालत करता हूँ। सिर्फ दलितों के लिए शिक्षा की बात की जाय तो क्या संभव है शिक्षा पूरी हो जाएगी? बिना व्यवस्था परिवर्तित हुए, बिना समाजवादी संविधान लागू किए, किसी भी जाति, व्यक्ति व समूह को दुखों से छुटकारा नहीं मिलेगा। आप को चिंतित होना चाहिए कि परम्परावादी सवर्ण और इसके अनुसांगिक संगठन तथा दलितों के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठन दोनों मार्क्सवाद विरोधी हैं। मुझे नहीं पता कि कौन सा डीएनए का अंश इनके बीच में समरूप है। परम्परावादी सवर्ण ईश्वर को मानता है, हिन्दू धर्म को मानता है, वर्ण को मानता है, जाति को मानता है,  जातिप्रथा को तोड़ना नहीं चाहता है। हाँ, भोज में छुआछूत नहीं करता है। उठने-बैठने में भिन्नता नहीं करता है। समता की बात नहीं समरसता की बात करता है। समरसता समता का विपरीतार्थी अर्थ है। उसके लोग शादी-ब्याह जाति, कुल, गोत्र, राशि और कुंडली विचार-देखकर ही करते हैं। कम्युनिस्ट व आंबेडकरवादी पूरी जाति-व्यवस्था को ही नष्ट करना चाहते हैं। यहां पर हम-आप दो राष्ट्र के रूप में हैं। हमारे विचार आप के विचार के हमेशा विपरितार्थी ही लगेंगे। ठीक इसका उल्टा भी। यहां हम दो विचारधाराओं के व्यक्ति हैं। फिर विचारों में संतुलन का होना नामुमकिन है।
      मैं सवर्णों को साथ लेने की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि गरीब और प्रगतिशील सवर्णों को वर्गीय एकता के लिए साथ लेना चाहता हूँ और उन्हें बताता रहता हूँ कि तुम्हारे जाति के सम्भ्रांत लोग तुम्हारे लिए कभी नहीं लड़ेंगे, तुम्हारे शिक्षा और रोजगार के लिए कुछ उपाय नहीं करेंगे। सिर्फ जाति के नाम पर, मंदिर के नाम पर और हिंदुत्व के नाम पर तुम्हारा शोषण करेंगे। वर्ग की चेतना ही दलित और सवर्ण व अन्य धर्मों के गरीबों का कल्याण कर सकता है।
      जाति ही तो अमीर सवर्णों के सम्मान से जीने का आधार है लेकिन वर्ग-संघर्ष के बाद जो व्यवस्था हासिल होगी, वहां सभी जातियां और धर्म के लोग खुशहाल और सम्मान पूर्वक जिएंगे, कोई किसी का शोषण नहीं कर पाएंगे। एक दिन क्रान्ति होगी ही। हो सकता है मेरी पीढ़ी न कर पाए लेकिन सत्य हमेशा विजई होता है। यह मानवता का सबसे सुन्दर सिद्धांत है। यह अलगाववादी नहीं है। इसमें ऊँच और नीच का फर्क मिट जाएगा। यह छुआछूत नहीं करेगा। यह कामचोरों से भी काम करवाएगा। यह हराम का किसी को नहीं खाने देगा। यह व्यवस्था निजी हाथों से सब कुछ छीनकर राष्ट्रीयकरण कर देगा। अब निजीकरण में आराम और मौजमस्ती से जीने वालों को तो कष्ट होगा ही क्योंकि उन्हें भी बराबर की मेहनत करना पड़ेगी।
     कुछ लोग अच्छे हैं किन्तु वैचारिक रूप से भिन्न विचारधारा उनको गरीबों के पक्ष में क्रान्ति नहीं सहानुभूति का दृष्टिकोण देता है और आप जैसे विद्वान और ईमानदार साथियों को भी यही लगता है कि क्राँति एक स्वप्न है, ऐसा नहीं हो सकता है। वैज्ञानिक समाजवाद के लिए एंगेल्स की पुस्तक "From utopian to scientific communism" जरूर पढ़ डालें। मैं यह आग्रह नहीं पालता की आप कम्युनिस्ट हो जाएंगे लेकिन सत्य आप को कचोटेगा जरूर।
     बिना दलित के क्रांतिकारी हुए,बिना दलितों के मार्क्सवादी हुए, बिना दलितों के नेता हुए इस देश में क्रान्ति नहीं हो सकती है। जब तक सही मायने में दलित क्रांतिकारी नहीं होंगे, न ब्रह्मणवाद ख़त्म होगा न पूँजीवाद। अगर मेरी बात से सहमत हों और बाबा साहब के बातों से इत्तिफ़ाक बने, तो भी और न बने तो भी, आप अपनी राय बनाएं कि ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद कैसे ख़त्म हो? हम लोग क्या करें? मैं लेख लिखता रहता हूँ। कोई सही कहता है कोई गलत। सभी अपने -अपने विचार रखते हैं। पिछले लेख पर लोगों ने बहुत विमर्श किया। कई लोग मेरी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, फिर भी बहस तो हो रही है। लोग अपने विचार को लेकर चैतन्य तो हैं इसलिए ऊर्जा बेकार नहीं है। माना कुछ न लिखूं,  कुछ न पढूं, तो खाकर सोने का क्या मतलब? ऐसे में आप लोगों का प्रेम, गुस्सा और विचारधारा का फायदा तो देखने को मिल रहा है। कई बार इससे भी ख़ुशी मिलती है कि मेरे भाइयों में तर्क-वितर्क और लड़ने का माद्दा तो पैदा हो रहा है। आप चूंकि मेरा लेख पढ़ रहे हैं इसलिए आप से निवेदन है कि इससे पूर्व मेरा लेख "डा.आम्बेडकर का अवतारीकरण" पढ़ डालें। उस पर बहुत लोगों ने अच्छा-बुरा दोनों कमेंट्स किया है। कुछ साथी आरएसएस के भी हैं और आरएसएस को अच्छा कहते हुए बाबा साहब को अनुचित खाते में डाल रहे हैं। जो मुझसे नहीं बन पा रहा है आप लिखकर मेरे अध्याय को पूरा करें। मेरी आलोचनाओं के साथ-साथ उन  बिंदुओं को भी दिखाइए, जिससे दलित समाज का फायदा हो और अर्थशास्त्र का सत्य भी उद्घाटित हो। सिर्फ मुझ से चिढ़ने या चिढ़ाने से हमारा-आप का-दलित समाज का-गरीबों का मकसद तो पूरा नहीं होगा। उम्मीद है आप मेरी विनम्रता का मतलब समझ रहे होंगे। मैं समाज को दिशा देने के लिए लिखता हूँ, बड़े होने के लिए नहीं। कोई भी लेखक अपने नाम के लिए नहीं लिखता है। उसको यह समझ में आता है कि यह समाज की जरूरत है। एक निवेदन और कि आप जब भी आलोचना करिए तो बाबा साहब के शब्दों को रखिए जिससे मुझे भी तथा समाज को भी उसके सापेक्ष विचार प्राप्त हो।
      मजदूर विभिन्न जातियों में विभक्त है। मजदूरों-गरीबों को उनके जातियों के मोहपाश से मुक्त कराना होगा। भारत का ऐतिहासिक भौतिकवाद जातियों के मध्य से होकर गुजरता है। हर जातियों के मध्य अंतर्द्वंद है और एक जाति का दूसरी जाति के साथ अंतर्द्वंद्व है। भारत का ब्राह्मणवाद असमानता, छुआछूत और ऊँच-नीच की भावना पर आधारित हैं। जब आप फेसबुक को देखते हैं, वहाँ "आम्बेडकर का अवतरीकरण" पर आए कमेंट्स को पढ़ते हैं और देखते हैं कि जातियों की भावना कैसी विषाक्त होती है। दलित गरीब है लेकिन मार्क्सवाद से क्यों नहीं जुड़ना चाहता है? मेरे लेखों का विरोध करने वाला अधिकतर दलित ही है या फिर विशुद्ध ब्राह्मणवादी सवर्ण, ऐसा क्यों है?
     इस बार हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी जीत गई। अब तो जातियों को भी धर्म के तरफ मोड़ा जा रहा है। हिंदुत्व को इस्लाम के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है तथा दलितों को हिंदुत्व के झंडे के नीचे लाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। हैं तो सभी गरीब, लेकिन गरीबों को भी जाति और धर्म का नशा है। ये गरीब भी इस्लाम के विरुद्ध क्रियाशील हैं और कहीं-कहीं तो दलितों के विरुद्ध मुसलमान भी हैं। सारी कम्युनिस्ट पार्टियाँ मिलकर भी वर्ग-संघर्ष के लिए वर्गीय एकता बनाने में क्यों फेल हो रही हैं? आप को पता होना चाहिए कि दलित और परम्परावादी सवर्ण दोनों मार्क्सवाद का घोर विरोध भी करते हैं। कहा तो जाता है कि ब्राह्मण और दलित जातियां एक दूसरे के विरुद्ध हैं किंन्तु कौन सा ऐसा कामन फैक्टर है जो दोनों को मार्क्सवाद विरोध के लिए एक कर देता है? मुझे जहाँ तक ज्ञात है कि दोनों नस्लवादी हैं।
     दलित आम्बेडकर के जातिप्रथा उन्मूलन से इत्तिफ़ाक नहीं रखता है। वह जाति को मजबूत कर सत्ता प्राप्त करने में विश्वास रखने लगा है। ब्राह्मण अपने सुपेर्मेसी को त्यागना नहीं चाहता है। कम्युनिस्ट पार्टियों में ब्राह्मण सर्वहारा संस्कृति से आज भी महरूम है। खुद के बाद घर की दूसरी पीढ़ी कम्युनिस्ट नहीं हो पाई, क्या कारण है? जो हैं वो बहुत ही रेयर हैं,  इसलिए आम्बेडकर और दलितों के मध्य जाति के सवाल से टकराते हुए मार्क्सवाद के वास्तविक समझ को इनके बीच ले जाना होगा।
     बहुत साथियों की कोशिश तो यही रहती है किन्तु कुछ गैर विचारधारा के लोग प्रहार करके उलझाते रहते हैं। हम भी उनको जवाब देने के चक्कर में यह भूल जाते हैं कि इन पर हमें उतना ध्यान नहीं देना चाहिए जितना आवश्यक विचारों पर। इन्हें न आम्बेडकर साहब का ज्ञान है न मार्क्सवाद का और न ही ये साथी यह समझ पा रहे हैं कि दलितों के मध्य किन विषयों पर चर्चा की जानी चाहिए। वे आम्बेडकर के पक्ष में तर्क को भी गलत ठहराने की कोशिश करते हैं और मार्क्सवादी दृष्टिकोण को भी गलत साबित करते हैं। वे अपना दृष्टिकोण न आम्बेडकर साहब के विचारों पर स्पष्ट कर पाते हैं न मार्क्स पर। जो मैं लिख रहा हूँ वह तुरंत न दलितों को ग्राह्य है और न सवर्णों को ही। इस लिहाज से यह एक कठिन विषय पर व्यवहारिक लेख चल रहा है। जो साथी वर्तमान की आवश्यकता को नहीं समझेगा तथा डा.आम्बेडकर के सपनों, विचारों, दर्शन और सहयोगी की भूमिका को नहीं समझेगा तो वह गलती कर रहा होगा। आज दलितों का गलती करना कम से कम 100 साल पीछे चले जाना है।
     जब हम "जय भीम" कहते हैं तो उसका मतलब होता है "जातिप्रथा उन्मूलन" और जब "लाल सलाम"  कहते हैं तो उसका मतलब होता है "सम्पूर्ण क्रान्ति"। जब लाल सलाम का मतलब सम्पूर्ण क्रान्ति होता है तो प्रश्न उठता है कि जातिप्रथा उन्मूलन उसी में समाहित है फिर जय भीम की क्या आवश्यकता है? दरसल, जय भीम शब्द दलित से भावनात्मक रूप से जुड़ा शब्द है और जय भीम उसके लिए क्रान्ति का ही प्रयाय हैं। यदि दलित की भावनाओं को क्रान्ति के साथ नहीं जोड़ा गया तो वह भावनात्मक रूप से क्रान्ति से अलग रहेगा जबकि क्रान्ति दलितों के आर्थिक और मनोवैज्ञानिक शोषण के विरुद्ध अत्याधिक आवश्यक अवधारणा है। यदि दलित क्रान्ति को भावनात्मक जुड़ाव के कारण छोड़ दे तो मूल रूप से दलित वर्ग का ही नुकसान होता है इसलिए जय भीम के साथ लाल सलाम को जोड़ देने की आवश्यकता गंभीर रूप से महसूस किया गया है। इस शब्द से हमारे परम्परावादी-नस्लवादी दलित साथियों को भी परहेज है, और आरएसएस के लोगों को अत्यधिक क्रोध आ रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि "जय भीम और लाल सलाम" करने से दलित और अन्य जातियों के सर्वहारा वर्ग के आपस में संगठित हो जाने का खतरा उनको दिखता है।
      यदि ऐसा मुमकिन हो गया तो नस्लवादी कमजोर हो जाएंगे। इनके चालाक लोग यह नहीं चाहते हैं कि आम्बेडकर और मार्क्स एक स्थान पर खड़े हों। कुछ दलित साथी भी विरोध करते हैं किन्तु वे चालाकी वश नहीं करते हैं, बल्कि उनके अंदर यह भावना काम करती है कि कहीं मार्क्सवाद के आड़ में कोई हमारे साथ छल न कर ले, किन्तु यह साथियो का डर उन्हें नस्लवाद की तरफ ही ले जाता है जो देर-सबेर नस्लवाद की ही झोली में गिरता है। नस्लवाद की जीत दलितों,गरीबों,  मजदूरों और किसानों के हित में कभी भी नहीं होगा।
-आर डी आनंद

शनिवार, 6 मई 2017

*जातिप्रथा और आरक्षण*

जातिप्रथा उन्मूलन हो जाय, तो समझो हिन्दू धर्म ख़त्म हो गया। हिन्दू धर्म को जिन्दा रखना है, तो जातियों का बने रहना जरूरी है। हिन्दू धर्म में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व आ जाय, तो फिर बचेगा क्या। यदि सभी सामान हो जाँय, तो हिन्दू धर्म का मूल दर्शन वर्ण-व्यवस्था ख़त्म हो जाएगा। यदि वर्ण-व्यवस्था ख़त्म हो जाएगा, तो ब्राह्मण की सर्वोच्चता ख़त्म हो जाएगी। क्या ऐसा संभव होने दिया जाएगा कि ब्राह्मण की सर्वोच्चता ख़त्म हो जाय? यदि नहीं, तो जातियों को कभी भी ख़त्म नहीं होने दिया जाएगा।
     ब्राह्मणवाद शब्द अनुचित है। ब्राह्मणवाद कहने से एक साधारण ब्राह्मण भी उसका अर्थ ब्राह्मण ही लगाता है और संगठित होने लगता है। हम जितना ही ब्राह्मणवाद-ब्राह्मणवाद उच्चारित करेंगे, ब्राह्मण हमारे विरुद्ध तो संगठित होगा ही, अन्य सवर्णों और ओबीसी को भी हिन्दू के नाम पर संगठित कर हमें कमजोर करेगा।            
     बाबा साहब ने जातिप्रथा उन्मूलन के लिए कहा था। हमें जातिवाद शब्द का प्रयोग कर उनके प्रतिक्रियात्मक क्रोध को कम करना पड़ेगा। जातिप्रथा उन्मूलन से ब्राह्मण जातियाँ भी विरोधात्मक रुख नहीं अपनाती हैं, बल्कि बहुत से लोग हामी भरकर जाति तोड़ने की बात भी स्वीकारते हैं, जिससे वर्ग की एकता कायम होगी और जाति विहीन भारत का मार्ग प्रशस्त होगा।
     आरक्षण ख़त्म कर दो। मुझे जाति के बदले आरक्षण नहीं चाहिए। मैं जानता हूँ यह बैशाखी अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए बहुत बड़ी कायरता के रूप में कार्य कर रही है। जिस दिन दलित कहा जाने वाला यह वर्ग आरक्षण विहीन हो जाएगा, इसके पास जुझारू आंदोलन के सिवा कोई विकल्प नहीं बचेगा। तब इसकी कायरता ख़त्म होगी और यह अपने वास्तविक हक़ के लिए संघर्ष करेगा। जरूर संघर्ष करेगा और ईमानदारी से संघर्ष करेगा। यदि फिर भी संघर्ष नहीं करेगा, तो मरेगा। पुनः दास बनकर सेवा करेगा।
     नहीं, मैं किसी को खुश करने के लिए ऐसा नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि, दलित वर्ग की जाहिलियत, स्वार्थी और कायरपना को निजात दिलाने के लिए उसकी आँखें खोलने के लिए लिख रहा हूँ। यह वर्ग जातिवाद का सारा इल्जाम ब्राह्मणों पर लगाता है, परन्तु अपनी जाति का प्रमाण-पत्र खुद ही बनवाकर धोबी-चमार-पासी होने का सबूत देता है। आखिर कैसे लड़ेगा जातिवाद से? जातिप्रथा तोड़ने के लिए सबसे पहले पहल कौन करेगा? जो नीचता का बोध करता है वही तो अपनी जाति को तोड़ेगा। फिर बाद में सवर्णों की जाति तोड़ने अथवा उन्मूलन का सवाल उठता है। जब तक आरक्षण रहेगा, दलित जातिप्रथा उन्मूलन का संघर्ष नहीं करेगा। एक हद तक दलित जातियाँ कायर हो चुकी है। मैं जानता हूँ आरक्षण होने की वजह से ही मुझे नौकरी मिली है। काश! ऐसा न हुआ होता, तो आज सवर्णों का चुभता हुआ ताना न सहना पड़ता। जिस दिन रोटी, कपड़ा और मकान का सवाल पैदा हुआ, उस दिन दलितों के सम्मुख जीने-मरने का सवाल भी पैदा हो जाएगा। उस दिन नीव की ईंट हिल जाएगी। फिर भी, जोश नहीं आया, तो गुलामी सिद्ध है।
     जिन्हें अपनी नींव की ईंट हिलवानी होगी, वो आरक्षण ख़त्म कर देंगे।
     क्यों डर रहे हैं? इनकी मजाल नहीं की आरक्षण ख़त्म कर दें। हाँ, डरेंगे, लड़ेंगे नहीं, तो आरक्षण जरूर ख़त्म हो जाएगा। एक बात बताइए, आप को आरक्षण चाहिए कि सम्मान? आरक्षण चाहिए, तो कैसे जाति की लड़ाई लड़ेगे? फिर, क्यों ब्राह्मणवाद-ब्राह्मणवाद चिल्लाते हैं? क्यों जाति का दोष ब्राह्मणों पर मढ़ते हैं? यदि जातिवाद की लड़ाई लड़नी है तो आरक्षण छोड़ना पड़ेगा, जाति-प्रमाण-पत्र बनवाना छोड़ना पड़ेगा। सम्मान का एक पल का जीवन गुलामी के हजारों वर्षों के जीवन से बेहतर होता है।
     आरक्षण पर मैं आप से पहले भी बात कर चुका हूँ। आरक्षण न जाति आधारित होनी चाहिर और न आर्थिक आधार पर। सिर्फ नौकरियां बढ़ाई जाँय और सब को शिक्षा सब को काम का प्रावधान किया जाय।
     15 लाख दलित नौकरी कर रहे हैं जिससे 3 करोड़ दलित खा-पी रहा है। 27 करोड़ निरक्षर है। न खेत है, न मजदूरी। वह खेत मजदूर है। उसके लिए आरक्षण से कौन सा फायदा दिलवा रहे हैं? क्या प्रतिनिधित्व का आधार वह तय नहीं करता है, फिर कहाँ गया उसका उचित हिस्सा? उसकी रोजी-रोटी के लिए दलित और संविधान क्यों चुप हो जाता है? उन गरीबों के लिए भी सोचिए कि क्या उन्हें ये आरक्षण और संविधान कुछ दे सकता है? खाया-अघाया दलित चिंतित हो जाता है कि यदि उसका आरक्षण ख़त्म हो गया, तो उसका क्या होगा। जो यहाँ तक आरक्षण के सहारे पोजीशन तैयार किया है,पल भर में बालू की भीत की तरह ढह जाएगा और पुनः उन दलित गरीबों के मध्य जाना और रहना पड़ सकता है जो निरक्षर और गरीब हैं, प्रतिदिन 20/- खर्च करने भर को ही कमा पाते हैं। यह अर्जुन सेन कमिटी की रिपोर्ट है। ऐसा मैं नहीं लिख रहा हूँ।
     मैं यही चाहता हूँ कि छीनने का माद्दा पैदा करो। बैशाखी पर कब तक चलोगे। यह सही है कि आरक्षण न होता, तो मुझे शायद नौकरी क्या शिक्षा भी न मिली होती। किन्तु, अब तो 3 करोड़ दलित पढ़े हैं। 3 करोड़ ब्राह्मण भी पढ़ा-लिखा है। आंदोलन इतना तीव्र करो कि संविधान को अपने (गरीबों) अनुकूल बदल दो। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को ला दो। आरक्षण डा.आम्बेडकर का त्रिसूत्र कभी नहीं दिला सकता है।
     डा.आम्बेडकर आरक्षण नहीं चाहते थे। वह पृथक निर्वाचन चाहते थे। गांधी जी के आमरण अनसन की वजह से डा.आम्बेडकर को पूना पैक्ट कर मजबूरन आरक्षण स्वीकार करना पड़ा। यदि पूना पैक्ट न हुआ होता,तो क्या आरक्षण मिलता? फिर क्या होता? तो क्या दलितों को नौकरियां न  मिलतीं? दलित उस समय क्या करता?
     पृथक निर्वाचन अच्छा है अथवा आरक्षण? यदि पृथक निर्वाचन अच्छा है, तो हमें आरक्षण के बदले पृथक निर्वाचन की जोरदार माँग उठानी चाहिए। उसके लिए पुनः संघर्ष करना चाहिए। उस समय डा.आम्बेडकर अकेले थे, इस समय 3 करोड़ दलित पढ़े-लिखे हैं। कुर्बानी दे सकते हैं। यदि अपने ही गरीब भाइयों के पेट पर लात मार कर  आरक्षण पर ही गुजारा करना है, तो मुझे दलित समाज से कुछ नहीं कहना है।
     आप ने मेरे सही मर्म को समझ लिया है और लोगों को समझाया भी, किन्तु सुविधा संपन्न दलितों को सम्मान नहीं आरक्षण चाहिए। अपने भाइयों के लिए न रोटी, कपड़ा, मकान की बात करते हैं, न आरक्षण की सुबिधाओं की। और सच ये है कि इन्हीं की बदमाशियों का परिणाम होता है कि दूर-दराज में गरीब दलितों की सवर्णों द्वारा प्रतिक्रिया स्वरूप पिटाई होती रहती है।
-आर डी आनंद

*क्या करें क्या न करें*


     मैंने तो 2007 में एक लेख "बसपा का घटता जनाधार" लिखकर स्पष्ट कर दिया था कि सुश्री मायावती जी का जनाधार गिर रहा है और अगला दसक उनका आखिरी दसक होगा। बस दुखद ये है कि ये बहुजन का भी वह दसक है जो इसे घोर कठिनाइयों में घसीट रहा है। इसके बाद, यह दसक डा.आम्बेडकर के क्रांतिकारी मूल विचारों को भी वाट लगाने का प्रारंभिक वर्ष है।
     अब जातिप्रथा उन्मूलन शब्द का उच्चारण करना होगा। ब्राह्मणवाद शब्द कहना-लिखना दलितों-बहुजनों-मूलनिवासियों को बंद करना पड़ेगा। इस शब्द के उच्चारण से ब्राह्मण वर्ग अपने को अधिक गोलबंद करने में सफल हुआ है और दलितों पर इल्जाम आसानी से मान लिए जाने लगे हैं। इस शब्द की प्रतिक्रियात्मक शक्ति रक्तबीज की तरह बढ़ जाती है और दलित बलहीन-मतहीन-वोटहीन होता जाता है।
     जातिप्रथा के दोष को बता कर दलित सवर्णों को भी कन्विंस कर सकता है, यह कि हम सब के जाति के नेता अपने वोट ध्रुवीकरण के लिए हमारा प्रयोग तो करते हैं किन्तु हमारे बच्चों के शिक्षा, रोजगार, आवास, मेडिकल, हमारी आवश्यक आवश्यकताओं को बिल्कुल ध्यान नहीं रखते हैं। हम उन्हें चुनते हैं, बस हमारा उतना ही अधिकार व हित है।
     हमारे जाति ध्रुवीकरण को भय के रूप में प्रोजेक्ट करके अन्य जातियों को भयभीत करने के लिए प्रयोग में रखते हैं। और, ऐसा हर जाति के नेता सत्ता में आने पर करते हैं।
     वास्तव में, सत्ता पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमिटी होती है और सत्ता का मुखिया उसका मैनेजर।
     ऐसी स्थिति में सिर्फ और सिर्फ एक बात ही काम की हो सकती है कि हम संसदीय लोकतंत्र के दौरान ईमानदारी और वैचारिक क्राँति के द्वारा बहुजन वैचारिक रूप से ईमानदार होकर चुनाव के लिए सक्षम, ईमानदार और चरित्रवान नेता पैदा करे, उसे जिताए, और बारगेनिंग की शक्ति प्रदान करे। किन्तु उस खतरे के लिए भी विमर्श करते रहें जो सत्ता में आए हुए संत्री-मंत्री पर अंकुश रख सके। नहीं तो वही सब घटेगा जो आज बसपा के साथ घटा है।
    किन्तु मैं संसदीय राजनीति को सिर्फ बहुजन को मजबूत करने तक ही उचित मान रहा हूँ। जैसे ही बहुजन मजबूत हो,  बिना किसी हीलाहवाली के उसे इस संविधान को बहुजन लायक बनाने के लिए क्राँति करनी होगी, क्योंकि संसदीय राजनीति में बहुमत दल सुन्दर से सुन्दर मानवहित के शर्तों-सिद्धांतों को बदल देता है। केवल नया संविधान ही मानव हित-बहुजन हित की रक्षा का प्रबंध कर सकता है।
     एक और अंतिम बात यह कि ऐसा हम सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि सवर्णों के लिए भी हम शोषण विहीन मूल्यों को स्थापित करेंगे। हाँ, जातिप्रथा उन्मूलन की लड़ाई शुरू तो दलित करेगा, परन्तु फ़ाइनल दलित नहीं करेगा। फ़ाइनल करने के लिए हमें हर जातियों के क्रांतिकारी लोगों को साथ में लेना पड़ेगा। यहाँ भी बहुजन अथवा सर्वहारा संस्कृति के बात को नहीं भूलना चाहिए। सांस्कृतिक क्रांन्ति लगातार चलना पड़ेगा। सभी जातियों के क्रांतिकारी लोगों को माफ़िया-बाहुबलियों-गुंडों-जाति
वादी नेताओं-पूँजीपतियों और अपने जाति-धर्म के विरुद्ध जुझारू संघर्ष करते रहना पड़ेगा।
     बसपा को तो 22 प्रतिशत वोट मिले हैं। ऐसा नहीं कह सकते हैं कि आप के लोगों ने वोट नहीं दिया है, किन्तु दूसरों के वोट लेने से आप वंचित रहे और यह आप की नपुंसकता के कारण नहीं हुआ है बल्कि वैचारिक कमजोरी की वजह से हुआ है। सुश्री मायावती जी के माफ़िया ब्राह्मणों को साथ लेने की वजह से हुआ है। ऐसे ब्राह्मणों को साथ लेने की वजह से हुआ है जो दलितों को राजनैतिक हरवाह बनाने के लिए खुली छूट पा गए। हमारे नेता पैदा होने से रोक दिए गए। ऐसा इस नाते हुआ कि सुश्री मायावती ने सभी 403 विधानसभा सीटों पर बीएसपी कैंडिडेट्स के जातिगत आंकड़े अनाउंस किए थे। इसमें 87 (21%) दलित, 97 (24%) मुस्लिम, 106 (26%) ओबीसी और 113 (28%) (ब्राह्मण 66, ठाकुर 36, बनिया-वैश्‍य-कायस्‍थ 11) सवर्ण कैंडिडेट्स शामिल हैं। बसपा का अब तक का गणित यही रहा है कि दलित और मुस्लिम एकजुट होकर अगर उसके पक्ष में वोट करते हैं तो दूसरे दलों को परेशानी उठानी पड़ सकती है। उत्तरप्रदेश में करीब 19 फीसदी मुस्लिम और 22 फीसदी दलित हैं। वहीं, कुल 54 फीसदी पिछड़ी जाति का वोट बैंक है। 70 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्‍लिमों की संख्या 20 फीसदी से ज्‍यादा है। ईस्ट यूपी की 20, वेस्ट यूपी की 10, सेंट्रल यूपी की 5 और बुंदेलखंड की एक सीट पर मुस्लिम वोटर्स की संख्या 55 से 60 फीसदी है। सुश्री मायावती जी 22.5 प्रतिशत दलित मत और 19 प्रतिशत अल्पसंख्यक मत तथा कुछ सवर्ण और कुछ ओबीसी तथा अन्य ओबीसी को मिलाकर जीत का पक्का हिसाब जोड़ रखी थीं।
    भारत में 24.39 करोड़ परिवार में रहते है। उनमें से 17.91 करोड़ परिवार ग्रामीण इलाकों में रहते है। अनुसूचित जाति-जनजाति के 3.86 करोड़ परिवार, यानी 21.53 प्रतिशत ग्रामीण भारत में रहते है। 2.37 करोड़ (13.25 प्रतिशत) ग्रामीण एक कमरें मे रहते है और उनके घर के छप्पर और दीवारें पक्की नही हैं। 65.15 लाख ग्रामीण परिवारों में 18.59 वर्ष आयु वर्ग के पुरुष सदस्य नहीं हैं। 68.96 लाख परिवारों की प्रमुख महिलाएं हैं। 5.37 करोड़ (29.97 प्रतिशत परिवार भूमिहीन है व मजदूरी करके जीते है। 17.91 करोड़ परिवारों में से 3.3 करोड़ यानी 18.46 प्रतिशत परिवार अनुसूचित जातियों से हैं तो 1.9 करोड़ (10.97 प्रतिशत) अनुसूचित जनजातियों के। अनुसूचित जाति के 1.8 करोड़ (54.67 प्रतिशत) परिवार भूमिहीन हैं और आदिवासियों के 70 लाख यानी 35.62 प्रतिशत। अनुसूचित जाति और जनजाति को शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण होते हुए भी 3.96 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 4.38 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग ही नौकरी में हैं। सार्वजनीक क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जाति यों की भागीदारी 0.93 प्रतिशत है जबकि अनुसूचित जनजाति की 0.58 प्रतिशत है। निजी क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जातियों की भागीदारी 2.42 प्रतिशत है तो अनुसूचित जनजाति का 1.48 प्रतिशत है।
ग्रामिण भारत में रुपये 5000 प्रतिमाह में जीवन जीने वाले अनुसूचित जाति के 83.53 प्रतिशत परिवार हैं और अनुसूचित जनजाति के 86.56 प्रतिशत। शेष लोगों में 5000 रूपये में बसर करने वाले परिवार 74.49 प्रतिशत हैं। 0.46 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 0.97 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति तथा 2.46 प्रतिशत शेष परिवारों के पास चार पहिया गाडिय़ां हैं। नौकरियों में भागीदारी का निम्न विवरण है :
ऊंची जाति: ७६.८%
ओबीसी:   ६.९%
अनुसूचित जाति:  ११.५%
अनुसूचित जनजाति: ४.८%  
जब तक इन बिंदुओं पर चर्चा-परिचर्चा नहीं होगा, तब तक आप न दलित हित में कुछ कर पाएंगे और न सवर्ण के गरीबी का कोई अनुमान लगा पाएंगे। वैसे तो सवर्ण हर जगहों पर अधिक कब्ज़ा करता हुआ दिखता है किन्तु वास्तविक मूल्याङ्कन यह नहीं है। वास्तविक मूल्यांकन में खोज का विषय यह है कि कितने सवर्ण गरीब है जिनको कोई भी सवर्ण नेता कुछ नहीं देता है, न राजनैतिक रूप से न आर्थिक रूप से। जबकि सामाजिक सर्वोच्चता का मुकुट पहना कर उनका दोहन बिना चारा-पानी दिए करते रहते हैं। और, गरीब दलिरों का आंकड़ा देखकर सक्षम दलितों को और बसपा सुप्रिमों सुश्री मायावती को ईमानदारी से गरीबों के उत्थान के लिए योजनाएं बना कर चुनावी रणनीति तैयार करनी चाहिए।
-आर डी आनंद

साम्यवादियों अब क्या होगा

    लाल सलाम क्या है? लाल सलाम क्रांतिकारी अभिवादन है। कोई व्यवस्था जब मनुष्यों का शोषण चौतरफा करने लग जाती है तो उसे बदल देना नितांत आवश्यक हो जाता है। कुछ लोग यह जिम्मेदारी उठाते हैं तो अपने साथियों में प्रेरणा भरने के लिए लाल सलाम करते हैं। जैसे हिन्दू-जयराम, श्रीराम, सीताराम, जयश्रीकृष्ण, राधे-राधे, मुसलमान-अस्सलाम वालेकुम, आंबेडकरवादी-नमो बुद्धाय, जय भीम, देश के रक्षक-जय हिन्द, देश के आजादी आंदोलन के समय आंदोलनकारी-भारत माता की जय, बंदेमातरम् इत्यादि करते हैं। कम्युनिष्ट के अभिवादन का तरीका लाल सलाम होता है।
    प्रश्न है सिस्टम नष्ट कैसे किया जाय? सिस्टम नष्ट करने में कौन-कौन हमारे शत्रु हैं और कौन दुश्मन? इन्हें चिन्हित करना पड़ेगा। इस सिस्टम के बाद कौन सा सिस्टम लागू किया जाय? राम के समय में राम राज की कल्पना की गई किन्तु वह सामंती व्यवस्था थी और उसी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया जो कई दूसरे वर्गों के लिए उचित नहीं होगा। पूँजीवाद वर्तमान में चल रहा है। साम्राज्यवाद पूँजीवाद का ही विकृत रूप है जो भूमंडलीकरण के बहाने एकाधिकारी पूँजी को जन्म देकर पल्लवित-पोषित कर रहा है। इस व्यवस्था में दुनिया के 100 लोगों के पास पूरी संपत्ति का 99 प्रतिशत है तथा 99 प्रतिशत लोग 1 प्रतिशत में गुजर-बसर कर रहे हैं। कुछ लोगों के पास ऐसो आराम बाकी मुफ़लिसी और बदहाली की जिंदगी जिएंगे। समाजवाद नेहरू और आम्बेडकर का सपना था किन्तु वे सरकारी तौर पर उसे लागू करना चाहते थे जो बहुमत होने नहीं देता है। बचा तानाशाही, अब बड़ाई तानाशाही से सभी डरते हैं। साम्यवाद में है सर्वहारा की तानाशाही अर्थात बहुमत की तानाशाही। जो बहुमत के नियंत्रण में रहेगा। आप को ओशो पसंद हैं किन्तु ओशो ने भी कोई व्यवस्था नहीं दी है जिस पर राजकीय व्यवस्था चलाया जा सके। कोई व्यवस्था सोचिए फिर उस पर कार्य किया जाय जिससे कम्युनिस्ट का अत्याचार न हो, मारकाट न हो। जनमत क्या है?
     मानवता का विकास ही वर्ण संकरता पर आधारित है। यह गाली नहीं है। गाली लगती जरूर है। गंदे खून के नाते कोई गन्दा नहीं होता वर्ना पूरा रामायण और महाभारत काल के वीर और बुद्दिजीवी सब के सब वर्ण संकर हैं। वर्ण संकरता ही है जो मनुष्य को अपंग होने से बचाता है। रोगी होने से बचाता है। अंधे होने से बचाता है। यह तो खून की सुद्धता है जो अधिक बइमान है। एक ही खून में शादी-ब्याह करिए, देखिए कितनी कमीनी प्रजाति पैदा होती है। ये जो अधिक गंदे लग रहे है, ये शुद्ध खून का नतीजा है। गड़बड़ियां विचारों की भौतिक परिस्थितियों में है।
     जय भीम। आप पढ़ते भी हैं और उसे अपने दिल पर भी लेते हैं। दोनों ही स्थितियों में ईमानदार हैं। संस्थागत कमियों के कारन हम लोग क्रियागति परिणति तक नहीं पहुँच पाते हैं। अभी कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो क्रान्ति के लिए तैयार हो। सर्वहारा संस्कृति व भीम संस्कृति का आभाव है। क्रान्ति के लिए जनगण में एकरूपता नहीं बन पाई है। क्रान्ति के लिए क्रन्तिकारी सिद्धांत और पार्टी की आवश्यकता है। नौकरी की स्थिति में हम लोग बहुत एक्टिव होकर पार्टिसिपेट नहीं कर सकते हैं। जितना कर सकें उतना प्रयाप्त है।
    अब क्राँति की जरूरत नहीं है। जनता का विश्वाश मोदी में जम गया है, अब मोदी समाजवाद लाएंगे। मोदी के समाजवाद से सभी को खुश रहना सीखना होगा। जो क्राँति की बात करेगा वोलार दिया जाएगा। क्राँति में खून बहता है इसलिए मोदी साहब नहीं चाहते हैं कि गरीब खून बहाए। देश-राष्ट्र का विकास होगा तो गरीबों का भी विकास होगा, गरीबी का भी विकास होगा। अब साम्यवादी बदमाशी न करें। बदमाशी करेंगे तो ओलारे जाएंगे। साम्यवादियों के दुर्दिन शुरू। अब भी संभल जाओ साम्यवादियों, समय है। फिर न कहना कि मोदी साहब ने समझाया नहीं।
    वैसे भी दलित आम्बेडकर वाली कुछ कर नहीं रहा था। अपनी ढपली-अपनी राग अलाप रहे हैं। जातिप्रथा उन्मूलन के बजाय जाति को दलित मजबूत कर रहा था इसलिए आम्बेडकर दलितों के लिए बेकार हो चुके थे। बहन मायावती ने जाति का ध्रुवीकरण किया। दलित ने उनको सत्ता का स्वाद चखाया परन्तु माया बहन को समाज और आम्बेडकर कम दिखे। उन्हें सत्ता और सर्वजन के गुंडे ही समझ में आए। जनता ने सोचा जब मेरी भी सरकार गुंडों की सरकार है तो किसी की भी सरकार बने, क्या हर्ज है। कोउ होय नृप हमें का हानी।
    और ये कम्युनिस्ट एक हो ही नहीं सकते है। किसी को मार्क्स, किसी को लेनिन, किसी को स्टालिन, किसी को माओ, किसी को विनोद मिश्रा, किसी को कानू सान्याल, किसी को चंद्र शेखर, किसी को चाओ मजूमदार पसंद हैं तो फिर मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और वर्ग-संघर्ष का फार्मूला पर किसी को एक मत होना नहीं है। वर्गीय एकता बनाने से कोई मतलब नहीं। चिंतन की एकरूपता से कोई मतलब नहीं। जनवादी केन्द्रीयता से कोई मतलब नहीं। ऐसी स्थिति में मोदी जी का समरसतावाद और बीजेपी अच्छा है।
    जनता खुश है कि देश से काला धन मोदी ने ख़त्म कर दिया। आप इस बात को समझो या न समझो, जनता ने इस बात को समझा, माना और वोट दिया। आप के समझने से क्या होता है। आप जनता को बेवक़ूफ़ कहते रहो। मोदी पर इलज़ाम लगते रहो। फासीवाद की आहट सुनते रहो, क्या मतलब?
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आर डी आनंद
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