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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

दलित उत्पीड़न-झज्जर, गोहाना और अब मिर्चपुर, भाग 2


पूरे मामले में राज्य सरकार अपने कर्तव्यों को निभाने में कितनी कमजोर रही इसका आकलन इस बात से कर सकते हैं कि 21 अप्रैल को घटना होती है और 27 अप्रैल को मुख्यमंत्री हुड्डा मिर्चपुर गाँव का दौरा करने का वक्त निकाल पाते हैं। जबकि कांग्रेस पार्टी की तरफ से दलित को एकजुट करने के अभियान में जुटे राहुल गाँधी 29 अप्रैल को मिर्चपुर गाँव के दौर पर पहुँचते हैं। राहुल गाँधी के प्रस्तावित दौरे के मद्देनजर ही मुख्यमंत्री हुड्डा ने मिर्चपुर गाँव का दौरा कर तमाम भारी भरकम घोषणाएँ कर डालीं, ताकि स्थिति को सुधारते हुए राहुल गांधी के समक्ष अच्छी तस्वीर पेश की जा सके। मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली से साफ है कि वे आला कमान और खाप पंचायतों के दबाव में अपने फैसले कर रहे हैं, नहीं तो इस बात की वजह नहीं बनती है कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा खाप पंचायतों को सामाजिक संस्था करार देते हुए,उन्हें जायज ठहराते, जबकि खाप पंचायतों के फैसले बड़े पैमाने पर कानून-व्यवस्था का संकट पैदा कर रहे हैं।
मिर्चपुर घटना के बाद दलित अधिकारों से जुड़े संगठनों ने 20 मई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और एक स्वर में खाप पंचायतों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उस पर प्रतिबंध लगाने की माँग की। गौरतलब है कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाप पंचायतें कभी झूठी शान और इज्जत के नाम पर प्रेमी युवक-युवतियों की हत्या का फरमान जारी करती हैं, तो कभी गोत्र विवाद दिखाकर पति-पत्नी को भाई-बहन बनाने का हुक्म देने के चलते चर्चा में रहती हैं। यही नहीं दलितों के सामूहिक उत्पीड़न के मामले में खाप पंचायतें अहम किरदार के रूप में दिखाई देती हैं। खाप पंचायतों का निर्णायक और असरदार भूमिका में होना लोकतांत्रिक राजनीति की विफलता के सिवाय कुछ नहीं है। अफसोस की बात तो यह है कि गोत्र विवाद के मुद्दे पर राजनेता खाप पंचायतों के पक्ष में बयानबाजी करते हुए पाए गए। जिसे भारतीय लोकतंत्र की मर्यादाओं के लिहाज से शर्मनाक ही कहा जाएगा।
दलितों का उत्पीड़न जारी है। इसमें आजादी के बाद का लंबा समय बीतने के बाद से कोई खास बदलाव नहीं आया है। क्योंकि बदलाव की सियासत को अवसरवादिता और वोट बैंक की राजनीति ने हड़प लिया है। दलित उत्पीड़न के ताजा मामलों में एक खास प्रवृत्ति देखी जा रही है। जिसके तहत उन दलितों को निशाना बनाया जा रहा है, जो आर्थिक रूप से मजबूत होने की प्रक्रिया में हैं। हरियाणा का मिर्चपुर गाँव भी ऐसा है, जहाँ गाँव के बाल्मीकि परिवारों ने अपने पुराने पेशे को छोड़ दिया है। बाल्मीकि परिवारों के बच्चे पढ़ाई लिखाई कर रहे हैं। जिस लड़की की मौत हुई है, वह विकलांग होने के बावजूद संघर्ष के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए थी। कहने का मतलब साफ है कि एक वर्ग जो कल तक सामंती शोषण का शिकार रहा है, सिर उठाकर जीने की कोशिश कर रहा था, यही बात गाँव के दबंगों को नापसंद थी। मिर्चपुर हमले में जो बातें सामने आईं उसमें घरों में रखी पानी की टंकियों को तोड़ दिया गया या उन्हें तालाब में फेंक दिया गया, घर के कीमती सामानों जैसे फ्रिज, कूलर, टीवी और मोटरसाइकिल आदि साधनों को आग के हवाले कर दिया गया। आगजनी के पीछे का संघर्ष केवल प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित हमला था जो बाल्मीकि परिवारों की आर्थिक बहाली के उपायों पर चोट करने के लिए किया गया था। हरियाणा में दलित उत्पीड़न यह बताने के लिए काफी हैं कि वहाँ पर कानून-व्यवस्था खाप पंचायतों के पक्ष में खड़ी है। कुल मिलाकर आजादी के बाद हरियाणा में बन रहे हालात न केवल दलितों के उत्पीड़न के लिहाज से बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की मजबूती के लिहाज से चिंताजनक हैं, क्योंकि देश का संविधान सभी को अवसर और रोजगार के चयन की स्वतंत्रता के साथ जीवन की सुरक्षा की गारंटी देता है। बावजूद इसके राजनीति और इससे निर्देशित सरकारें जनता के
संवैधानिक हितों की रक्षा कर पाने में विफल हो रही हैं।

-ऋषि कुमार सिंह
संपर्कः 09313129941
लोकसंघर्ष पत्रिका के सितम्बर अंक में प्रकाशित

सोमवार, 27 सितंबर 2010

दलित उत्पीड़न-झज्जर, गोहाना और अब मिर्चपुर भाग 1

उत्पीड़न और मानवाधिकार हनन के मामले में उत्तर भारत के राज्यों में होड़ सी लगी हुई है। मानवाधिकार हनन के मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है, तो दलितों के सामूहिक उत्पीड़न के मामलों में हरियाणा सबसे आगे खड़ा दिखाई देता है। हालाँकि हरियाणा में दलितों के सामूहिक उत्पीड़न की घटनाओं का इतिहास पुराना है। जो विकास के तमाम पैमाने छूने के बावजूद कहीं से भी धीमा नहीं पड़ा है। हाल में सामूहिक उत्पीड़न की घटना 21 अप्रैल को हिसार के नारनौंद के समीपवर्ती गाँव मिर्चपुर में सामने आईं। जहाँ वाल्मीकि समुदाय के घरों को जाट समुदाय के दबंगों ने मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। जिसमें 12 वीं की छात्रा सहित और उसके पिता की मौत हो गई।
गौरतलब है कि यह घटना 21वीं सदी के भारत के उस राज्य में हुई है, जिसने विकास के कथित पैमानों को छुआ है। जिसने हरितक्रांति के जरिए देश की उत्पादकता बढ़ाने में हिस्सेदारी निभाई है। लेकिन अफसोस की बात है कि हरित क्रांति जातीय दुराग्रह को तोड़ने की क्रांति नहीं कर पाई है। आर्थिक विकास के पैमाने में हरियाणा दूसरे राज्यों के मुकाबले ऊपरी क्रम में आता है, बावजूद इसके सामाजिक अपराधों के मामले में कहीं भी कोई सकारात्मक बदलाव नजर नहीं आता है। चाहे मामला खाप पंचायतों के जरिए गैर-तार्किक और मध्ययुगीन फरमान सुनाने का हो या दलितों के साथ जातीय दुराग्रह का, हरियाणा की हालत चिंताजनक है। अगर हरियाणा में दलित उत्पीडन की बड़ी घटनाओं पर गौर करें तो मिर्चपुर में दलित बस्ती पर सामूहिक हमलाकर घर जलाने की घटना कोई अकेली घटना नहीं है। बल्कि महज बीते दस साल का रिकॉर्ड देखें तो 21 वीं सदी के पहले दशक में ही इतनी घटनाएँ सामने आईं हैं, कि लोकतंत्र और सामाजिक न्याय दोनों शर्मसार हो जाएँ। 15 अक्टूबर साल 2002 में झज्जर जिले के दुलीना में पाँच दलितों को मार दिया गया। 15 फरवरी 2003 को कैथल जिले के हरसौला गाँव में 50 दलित घरों को आग के हवाले कर दिया गया। 31 अगस्त 2005 को गोहाना में 14 दलित घरों को आग लगा दी गई। 12 मार्च 2007 को करनाल के सालवाल गाँव में 16 दलित परिवारों को निशाना बनाया गया और उनके घरों को आग लगा दी गई। इसके अलावा रोहतक में राकेश लारा नामक दलित युवक की निर्मम हत्या हरियाणा में दलित उत्पीड़न की बड़ी-बड़ी घटनाएँ हैं। जबकि दलित उत्पीड़न की सैकड़ों वारदातें जो रोज-ब-रोज सामने आती हैं, उनकी गणना ही मुश्किल है।
हरियाणा के मिर्चपुर की घटना के पीछे के कारणों पर गौर करें तो जातीय वैमनस्य ही सबसे बड़ा कारण रहा। पालतू कुतिया को ईंट मारने जैसे मामूली विवाद को लेकर जाट समुदाय के दबंगों ने बाल्मीकि गाँव को घेर कर उसमें आग लगा दी। जिसमें 25 घर खाक हो गए और दो लोगों की जानें चली गईं। दबंगई ने मानवता के सामने सवाल पैदा कर दिया। शारीरिक रूप से अक्षम सुमन 12वीं की छात्रा थी। आग में घिर गई और उसकी जलने से दर्दनाक मौत हो गई। उसकी जली हुई तिपहिया साइकिल दबंगों के अपराध की भीषणता को उजागर करने के लिए काफी है। सुमन को बचाने गए उसके पिता ताराचंद भी आग की चपेट में आ गए। जिनकी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। हालाँकि अधिकारी इस बारे में अलग बयान देते हैं। उनका कहना है कि मामला नहर में नहाने को लेकर शुरू हुआ, जिसे बाद में कुछ असामाजिक तत्वों ने तूल दे दिया। हिसार जिला प्रशासन उत्पीड़न की इस जघन्य घटना को असामाजिक तत्वों के सिर मढ़ने की कोशिश कर रहा है। जबकि गाँव को सामूहिक रूप से निशाना बनाया गया। लेकिन पूरे घटनाक्रम में और उसके बाद की कार्रवाइयों में प्रशासन का चरित्र संदिग्ध बना रहा। पीड़ित दलित परिवारों ने प्रशासन पर दबंगों का साथ देने का आरोप लगाया। हालाँकि पूरी घटना को मुआवजे से रफा-दफा करने की राजनीति भी की गई। संसदीय सचिव जयबीर वाल्मीकि ने मृतकों के परिजनों में से एक-एक को सरकारी नौकरी और सभी पीड़ित परिवारों को दो-दो क्विंटल गेहँू देने की घोषणा की। जबकि पीड़ित दलित परिवारों ने अपनी लड़ाई को विस्तार दे दिया था। परिवारों ने लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराने की माँग को लेकर सुमन और ताराचंद के शवों को रखकर प्रदर्शन किया। इस माँग से बन रहे चैतरफा दबाव में पुलिस ने नारनौंद के थाना प्रभारी तथा हाँसी के तहसीलदार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। साथ में नारनौंद के थाना प्रभारी विनोद काजल को निलंबित कर दिया गया। थाना प्रभारी तथा तहसीलदार के खिलाफ दर्ज किए गए मुकदमे की एफ0आई0आर0 की प्रति की माँग को लेकर पुलिस तथा पीड़ितों के बीच झड़प भी हुई। पीड़ित परिवारों के दबाव के चलते दोनों को गिरफ्तार भी किया गया।
प्रशासन की लापरवाही और पक्षपातपूर्ण रवैय्ये की पोल खुलकर उस समय फिर सामने आ गई, जब आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट का जायजा लेने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह और मानवाधिकार आयोग की टीम मिर्चपुर गाँव के दौरे पर पहुँची। जब मानवाधिकार आयोग की टीम गाँव में मौजूद थी, तभी दबंगों के समर्थन में एक महापंचायत वहाँ पर चल रही थी। इस महापंचायत पर एतराज जताते हुए मानवाधिकार की टीम ने जिलाधिकारी ओ0पी0 श्योराण से जवाब तलब किया तो जिलाधिकारी का जवाब भी कम आश्चर्य प्रकट करने वाला नहीं था। उन्होंने टीम को बताया कि महापंचायत केवल इसी बात पर हो रही है कि पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं करे, बल्कि महापंचायत के लोग आरोपियों को पुलिस के यहाँ हाजिर कर देंगे। मिर्चपुर का दौरा करने के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह ने हिसार जिला प्रशासन के कामकाज से असंतोष जाहिर किया। उन्होंने कहा कि घटना के समय नारनौंद के थाना प्रभारी और तहसीलदार गाँव में मौके पर मौजूद थे और दलित बस्ती पर जाट दबंगों के धावे के समय दोनों अधिकारियों ने दलितों की सुरक्षा को लेकर कोई कदम नहीं उठाया, जिसकी वजह से इतनी बड़ी घटना हुई, इसलिए इस घटना में दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं। साथ में उन्होंने प्रशासन पर असंवेदनशील होने का भी आरोप लगाया। गौरतलब है कि घटना के बाद मिर्चपुर गाँव पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था, लेकिन गाँव में जाटों की महापंचायत चल रही थी। पीड़ित परिवारों का अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक था। मिर्चपुर गाँव से 40 परिवार पलायन कर हिसार लघु सचिवालय में सुरक्षा और दूसरी जगह बसाने की माँग को लेकर लोकासंघर्ष पर बैठ गए। हालात के गंभीर होने का अंदाजा लगते ही हरियाणा के मुख्यमंत्री ने मिर्चपुर गाँव का दौरा कर मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रूपये का मुआवजा और एक परिजन को नौकरी देने की घोषणा की। कहा गया कि गाँव में पुलिस बटालियन 24 घंटे तैनात रहेगी, जब तक ग्रामीण अपनी सुरक्षा को लेकर संतुष्ट न हो जाएँ। कुल मिलाकर जिला प्रशासन जिस मामले को रोकने में विफल रहा, उसे मुआवजे और लुभावनी घोषणाओं के सहारे भरने की राजनीति होने लगी।

-ऋषि कुमार सिंह
संपर्कः 09313129941
लोकसंघर्ष पत्रिका के सितम्बर अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 25 जून 2010

कितने मुनासिब हैं विशेष पुलिसिया दस्ते- अंतिम भाग

विशेष बलों के जरिए होने वाली फर्जी गिरफ्तारियों का सिलसिला उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल भी मनगढ़ंत कहानी पर फर्जी गिरफ्तारी करने के मामले में अदालत में मुँह की खा चुकी है। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की करतूत तब सामने आईं, जब अदालत ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किए गए कथित आतंकियों को रिहा कर दिया। इन कथित आतंकियों को स्पेशल सेल ने 2005 में मुठभेड़ के बाद दिल्ली से गिरफ्तार किया था। इन पर भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून पर हमले की साजिश का आरोप था। जिसे स्पेशल सेल ने एक बड़ी कामयाबी के तौर पर प्रचारित किया था। जबकि गिरफ्तार किए गए सभी चारो लोग पुलिस की तरफ से पेश की गई चार्जशीट के विरोधाभासी ब्यौरों के आधार पर निचली अदालत द्वारा बरी कर दिए गए हैं। अदालत ने स्पेशल सेल के कामकाज से असंतोष व्यक्त करते हुए बार-बार टिप्पणी की है कि स्पेशल सेल ने अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल किया है। दिल्ली पुलिस ने मार्च 2005 में जिन चार लोगों को आतंकी बताकर गिरफ्तार किया था, पाँच साल बाद जब वे छूटे तो उनके पास न तो वह उल्लास था और न वे सपने, जो उन्होंने पुलिसिया साजिश का शिकार होने से पहले सँजोये थे।
आउट ऑफ टर्न प्रमोशन लेकर फर्जी एनकाउंटर करके अपनी पीठ थपथपाने वाली पुलिस से जन्मे विशेष दस्ते अब आतंकवाद और नक्सलवाद के नाम पर लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में ये सवाल करना सहज हो जाता है कि आखिर देश का संविधान जो आजादी, जो सहूलियतें देता है, उसको नुकसान पहुँचाने वाले पुलिसकर्मी निर्दोष कैसे हो सकते हैं? क्या इन दस्तों के कारनामों से संविधान की मूल भावना को चोट नहीं पहुँचती है? दरअसल राजनीति में दिनों-दिन बढ़ती जा रही गैर-जिम्मेदारी ऐसे सवालों से मुँह चुरा रही है। जबकि सत्ता अपने अपने अपराध को छिपाने के लिए खौफजदा समाज बनाने की कोशिश में है। एक ऐसा समाज जहाँ हर किसी को केवल अपने जान और माल की चिंता में ही व्यस्त रहने की मजबूरी हो और सत्ता के पक्षपाती कदमों के संगठित
प्रतिरोध की स्थितियाँ ही न बन पाएँ। यही कारण है कि अधिकारों का दुरुपयोग करने के तमाम आरोपों के बावजूद विशेष पुलिस दस्तों को बनाए रखा जा रहा है। सत्ता भययुक्त समाज बनाने के लिए
धीमी न्याय प्रक्रिया का फायदा उठाकर इन बलों का बखूबी इस्तेमाल कर रही है। यही कारण है कि किसी भी बड़ी वारदात के बाद चैबीस या अड़तालीस घंटे के भीतर एक साथ कई गुनाहगारों की गिरफ्तारी हो जाती है। साजिशकर्ता जानते हैं कि जब तक मामला निष्कर्ष पर पहुँचेगा और अदालत का फैसला आएगा, तब तक बात पुरानी हो चुकी होगी। इसके अलावा ये विशेष दस्ते फर्जी गिरफ्तारियों और मनगढंत कहानियों के जरिये अपने औचित्य का भी बचाव करते हैं। क्योंकि जब तक इस तरह के अपराध होते रहेंगे या होने की सम्भावनाएँ जताई जाती रहेंगी, तब तक इन विशेष दस्तों के बने रहने का तर्क मजबूत रहेगा। कुल मिलाकर विशेष दस्तों को मिलने वाली विशेष सुविधाएँ इस तरीके के भ्रष्टाचार के लिए मनोबल देती हैं।
कहने का साफ मतलब है कि जब देश का सामान्य कामकाज सामान्य नियमों से चल सकता है,तो विशेष कानून और विशेष कार्य बल कितने जरूरी हैं? अगर ऐसे बलों की आवश्यकता है तो यह तय करने की जिम्मेदारी किसकी है कि इन बलों से नैसर्गिक न्याय की अवधारणा को कोई चोट न पहुँचे। अगर कोई नागरिकों की गरिमा को नुकसान पहुँचाता है तो ऐसे लोगों को दंडित करने की जिम्मेदारी किसकी है ? वक्त रहते सामान्य विधि प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाना जरूरी है, ताकि किसी भी तरह के विशेषाधिकार के बल पर नागरिकों की अस्मिता पर चोट करने वाली कारगुजारियों को रोका जा सके। ऐसे में इन विशेष पुलिसिया दस्तों को भंग किया जाना मानवाधिकारों के संरक्षण में पहला कदम साबित होगा।

(समाप्त)

-ऋषि कुमार सिंह
मोबाइल: 09313129941

गुरुवार, 24 जून 2010

कितने मुनासिब हैं विशेष पुलिसिया दस्ते

देश में उत्तर प्रदेश पुलिस प्रताड़ना से होने वाली मौतों में सबसे आगे है, तो मानवाधिकार हनन के भी मामले में किन्हीं दूसरे राज्यों से पीछे नहीं है। हाल के दिनों में विशेष पुलिसिया दस्तों के द्वारा किए गए कथित मुठभेड़ों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जबकि इन विशेष पुलिसिया दस्तों का गठन संगठित अपराधों और आतंकी वारदातों से निपटने के नाम पर किया गया था, लेकिन वक्त बीतने के साथ ये विशेष दस्ते सवालों के घेरे में आ गए। ये विशेष दस्ते अपने कामकाज के तरीके में मानवाधिकार हनन का केंद्र बन गए हैं। गौरतलब है कि हरियाणा में अपराधियों से निपटने के लिए बनाई गई स्पेशल टास्क फोर्स ऐसे ही आरोपों के चलते भंग कर दी गई। हरियाणा एस0टी0एफ0 पर सर्राफा व्यापारियों से पैसे वसूलने का आरोप लगा। सी0सी0टी0वी0 कैमरे में कैद हुईं तस्वीरों के आधार पर एस0टी0एफ0 के सात जवानों समेत एस0टी0एफ0 के मुखिया अशोक श्योराण को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। हरियाणा की घटना से यह बहस जरूरी हो गई है कि सामान्य पुलिस की तुलना में एस0टी0एफ0 जैसे विशेषाधिकार प्राप्त दस्ते कितने उपयुक्त होते हैं, क्योंकि अपराधियों पर नकेल कसने की लिए बनाए गए ये दस्ते कई संगीन आरोपों में घिरते जा रहे हैं। इन दस्तों पर न केवल बेगुनाहों को फँसाने का आरोप है, बल्कि जबरन उगाही, सरेआम हथियारों का प्रदर्शन, बिना नम्बर प्लेट की गाड़ी से चलने जैसे कई आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं।
केवल उत्तर प्रदेश में इन विशेष पुलिसिया दस्तों के कामकाज को लेकर लगातार अँगुली उठती रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस की एस0टी0एफ0 और ए0टी0एस0 पर दर्जनों फर्जी गिरफ्तारियाँ करने का आरोप है। इस बात को लेकर समय-समय पर मानवाधिकार संगठनों ने न केवल एस0टी0एफ0 व ए0टी0एस0 को भंग करने की, बल्कि फर्जी गिरफ्तारियों के मामले में ए0टी0एस0 अधिकारियों का नार्को टेस्ट कराने की माँग भी की है। फर्जी गिरफ्तारियों की असलियत तब सामने आई, जब अदालतों में साक्ष्यों के अभाव में या पकड़े गये लोगों के घटनास्थल पर मौजूद न होने के पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत ने फैसला सुनाया। पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार किया गया राजू बंगाली नामक युवक बेकसूर पाया गया, हालाँकि एस0टी0एफ0 ने उसे हूजी का कमांडर बताया था। ए0टी0एस0 और एस0टी0एफ0 ने राजू बंगाली की निशानदेही पर जिन लोगों को गिरफ्तार किया था, वे लोग अभी तक जेलों में रहने को मजबूर हैं। उत्तर प्रदेश में एस0टी0एफ0 की फर्जी गिरफ्तारियों का दूसरा साक्ष्य 19 नवम्बर 2009 को लखनऊ की अदालत में सामने आया, जब 23 जून 2007 को लखनऊ में विस्फोटक छुपाने के मामले की सुनवाई चल रही थी। उत्तर प्रदेश एस0टी0एफ0 ने अज़ीज़ुर्रहमान नाम के शख्स को पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार करते हुए जो कहानी पेश की थी, उसके अनुसार 22/23 जून की रात अजीजुर्रहमान लखनऊ में मौजूद था। जबकि 22 जून को पश्चिम बंगाल की सी0आई0डी0 ने अजीजुर्रहमान को चोरी के आरोप में कोर्ट में पेश किया था। जहाँ अलीपुर कोर्ट के मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने उसे 6 दिन की रिमांड पर भेजा था, कोर्ट की तरफ से जारी की गई रिमांड की सर्टीफाइड कॉपी इस बात का सबूत है। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल का अदालती दस्तावेज यह साबित करता है कि अज़ीज़ुर्रहमान किसी भी सूरत में 22/23 जून 2007 को लखनऊ में नहीं हो सकता है। गौरतलब है कि एस0टी0एफ0 ने हूजी के कथित एरिया कमांडर जलालुद्दीन उर्फ बाबू की निशानदेही पर अज़ीज़ुर्रहमान को दो अन्य लोगों एस के मुख्तार और मोहम्मद अली अकबर के साथ गिरफ्तारी की थी। तीनों की निशानदेही पर 11 जुलाई 2007 को मोहनलालगंज के गढ़ी गाँव से विस्फोटक भी बरामद किया था। जबकि जलालुद्दीन उर्फ बाबू को 23 जून 2007 को लखनऊ के रेजीडेंसी के पास से गिरफ्तार किया गया था। एसटीएफ ने बाबू को संकट मोचन मंदिर और श्रमजीवी एक्सप्रेस में हुए बम धमाकों का मास्टरमाइंड बताया था।
सबसे अफसोसजनक हालत यह है कि अज़ीज़ुर्रहमान की फर्जी गिरफ्तारी के सबूत सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस, एटीएस और एसटीएफ तीनों एक दूसरे को जिम्मेदारे ठहराने लगे। एडीजी राजीव जैन ने ए0टी0एस0 को जिम्मेदार बताया, जबकि ए0टी0एस0 प्रमुख सब्बरवाल ने ए0टी0एस0 बनाये जाने से पहले का मामला बताकर बचने की कोशिश की। वहीं एस0टी0एफ0 प्रमुख व ए0डी0जी0 बृजलाल ने पूरे मामले पर ए0टी0एस0 को जिम्मेदार बताया और कारण दिया कि इस तरह के सारे मामले ए0टी0एस0 ही देख रही है। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश पुलिस, ए0टी0एस0 और एस0टी0एफ0 तीनों जिम्मेदारी लेने से बचते दिखाई दे रहे हैं। जबकि तत्कालीन डी0जी0पी0 विक्रम सिंह ने बाकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाकर यह घोषणा की थी कि 22/23 जून 2007 की रात तीनों यानी अजीजुर्रहमान, एस0के0 मुख्तार और अली अकबर लखनऊ में मौजूद थे। जलालुद्दीन उर्फ बाबू के गिरफ्तार होने की खबर टेलीविजन पर देखकर वे भाग गए थे। कुल मिलाकर अदालत में सामने आया पूरा वाक़िया यह साबित करने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश में मानवाधिकारों के लिए ये विशेष अधिकार संगठन किस तरह का खतरा पैदा कर रहे हैं? गौरतलब है कि अज़ीज़ुर्रहमान की गिरफ्तारी फर्जी होने के ठोस सबूत के बावजूद अदालत ने अज़ीज़ुर्रहमान की जमानत याचिका खारिज कर दी। मुकदमें की पैरवी कर रहे एडवोकेट मोहम्मद शुऐब ने असंतोष व्यक्त करते हुए अपना वकालतनामा वापस ले लिया। चूँकि पूरी न्याय व्यवस्था साक्ष्यों के होने या न होने पर काम करती है, ऐसे में ठोस साक्ष्यों की अवहेलना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

-ऋषि कुमार सिंह
मोबाइल: 09313129941
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