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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

सांप्रदायिक हिंसा 2014.गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना,कर्नाटक व असम

गुजरात
गुजरात में 2014 में 59 सांप्रदायिक घटनाएं हुईं, जिनमें 8 लोग मारे गये और 372 घायल हुए। मई में नरेन्द्र मोदी की आमचुनाव में बड़ोदा से विजय के बाद, अनेक नेताओं द्वारा भड़काऊ वक्तव्य दिये जा रहे थे। इन लोगों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही थी। बड़ोदा में उपचुनाव होने थे क्योंकि नरेंद्र मोदी ने इस लोकसभा क्षेत्र से इस्तीफा देकर, वाराणसी का सांसद बने रहने का निर्णय किया था। उपचुनाव में भारी अंतर से जीत सुनिश्चित करने के लिए सांप्रदायिकता की आग को जलाए रखना आवश्यक था। सितंबर में विहिप नेताओं ने यह कहना शुरू किया कि गरबा में मुसलमान युवकों का स्वागत नहीं है। उन्होंने कहा कि गरबे में आने वाले मुस्लिम युवक, हिंदू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसा लेते हैं। ये नेता इसे लव जिहाद बताते थे। भडूच जिले के विहिप अध्यक्ष विरल देसाई ने यह घोषणा की कि मुसलमानों के धार्मिक स्थलों पर गरबे का आयोजन किया जायेगा।
विहिप व बजरंगदल के नेताओं द्वारा बिना किसी आधार, के बार.बार मुसलमानों पर यह आरोप लगाने से कि वे गोवध कर रहे हैं, मुस्लिम समुदाय के खिलाफ वातावरण बन गया। विहिप ने अहमदाबाद के सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील दरियापुर इलाके में गोवध के खिलाफ प्रदर्शन किया। दंगों से प्रभावित लोगों ने आरोप लगाया कि विहिप और पुलिसकर्मियों के बीच की सांठगांट से हिंसा भड़की। पुलिसकर्मी, विहिप से जुड़े 'गोरक्षकों' को समय.समय पर सूचनाएं देते रहते थे, जिनके आधार पर झूठे आरोप लगाकर निर्दोष मुसलमानों के खिलाफ मनमानी और गैर.कानूनी कार्यवाहियां की जाती थीं। पुलिसकर्मियों और विहिप कार्यकर्ताओं ने नवसारी जिले के मुस्लिम.बहुल ढाबेल गांव में छापा मारा और गोमांस बेचने के आरोप में कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। अकेले अहमदाबाद शहर में 62'गोरक्षक दल' थे, जिनमें से हर एक के चार.पांच सदस्य थे। ये लोग शहर के प्रवेश बिंदुओं पर डेरा जमा लेते थे और पुलिस के साथ समन्वय कर अपनी बेजा कार्यवाहियों को अंजाम देते थे।
25 मई को दो हिंसक गुटों के बीच पत्थरबाजी हुई,जिसके बाद कई दुकानों और वाहनों में आग लगा दी गई। इस हिंसा में चार लोग घायल हुए। हिंसा की शुरूआत तब हुई जब एक बारात निकलने के दौरान, दो अलग.अलग समुदायों के सदस्यों की कारों में भिडंत हो गई।
बड़ोदा में 25 से 30 सितंबर तक सांप्रदायिक हिंसा हुई। हिंसा की शुरूआत तब हुई जब एक निजी ट्यूशन क्लास के हिंदू मालिक ने एक मुस्लिम पवित्र स्थल का अपमान करते हुए एक फोटो, सोशल नेटवर्किंग साईट पर अपलोड कर दी। क्लास के मुस्लिम विद्यार्थियों ने पुलिस कमिश्नर से इसकी शिकायत की। जब वे शिकायत कर लौट रहे थे तब एक छोटी सी घटना के बाद उनमें और कुछ वकीलों में विवाद हो गया, जो जल्दी ही हिंसा में बदल गया। हिंसा, फतेहपुरा और हाथीखाना इलाकों में फैल गई। पंजरीगर मोहल्ले में ट्यूशन क्लास की इमारत में तोड़फोड़ की गई और दोनों समुदायों की ओर से पत्थरबाजी हुई। वाहनों को जला दिया गया और दुकानों को लूटा गया। 26 सितंबर को हिंसा और भड़क उठी और एक मुस्लिम को चाकू मारकर घायल कर दिया गया। दस अन्य लोग भी घायल हुए।
26 नवंबर को सोमनाथ में शिव पुलिस चौकी के नजदीक, लगभग 8रू30 बजे, हिंसा की शुरूआत हुई। झगड़ा दस रूपए के एक नोट को लेकर प्रारंभ हुआ, जिस पर एक मुसलमान और एक कोली दोनों अपना दावा जता रहे थे। बहसबाजी के बाद हाथापाई शुरू हो गई और मुसलमान युवक के सिर पर किसी ने एक टिफिन बॉक्स दे मारा। इससे उसे चोट आई और उसके सिर से खून बहने लगा। दोनों समुदायों के बुजुर्गों ने हस्तक्षेप किया और लड़ने वालों को अलग.अलग कर अपने.अपने घर भेज दिया। इसके करीब आधा घंटे बादए शांतिनगर के कोली इकट्ठा हो गये और सड़क के उस पार बनी मुस्लिम बस्ती पर पत्थर फेंकने लगे। सड़क पर खड़ी कुछ मोटरसाइकिलों को भी जला दिया गया।
महाराष्ट्र
    महाराष्ट्र में सन् 2014 में साप्रदायिक हिंसा की 82 घटनाएं हुईं, जिनमें 12 लोग मारे गये और 165 घायल हुए। सन् 2014 में महाराष्ट्रए सांप्रदायिक घटनाओं के मामले में उत्तरप्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर रहा। अक्टूबर तक वहां कांग्रेस का शासन था और विधानसभा चुनाव के बाद, राज्य में भाजपा ने अपनी सरकार बनाई। घटनाएं छोटी.छोटी थीं परंतु राज्य का कोई क्षेत्र इनसे अछूता नहीं रहा। मुख्यतः यह हिंसा पश्चिमी महाराष्ट्र में केंद्रित थी। सन् 2014 में राज्य में लोकसभा व विधानसभा दोनों ही चुनाव होने थे। एनडीए व यूपीए और यूपीए के अंदर कांग्रेस व एनसीपी के बीच मराठा मतों के लिए धमासान मचा हुआ था। मराठा,महाराष्ट्र की आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हैं। यूपीए के समर्थक मुख्यतः मराठा, मुसलमान और महार थे। एनडीए ने ओबीसी व महारों के एक तबके को अपने पक्ष में कर लिया था और वह मराठाओं को अपने साथ लेने के लिए आक्रामक अभियान चला रही थी। मराठाओं को कांग्रेस से तोड़कर भाजपा के साथ लाने के लिए सांप्रदायिकता का खुलकर इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस ने इस घोर सांप्रदायिक अभियान का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि उसे यह डर था कि इससे उसकी छवि मुस्लिम.समर्थक की बन जायेगी व वह हिंदुओं के वोट खो देगी। पार्टी की सरकार ने उन हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जो मुसलमानों के विरूद्ध जहर उगल रहे थे और छोटे स्तर पर हिंसा भी भड़का रहे थे।
    पुणे में मई की 31 तारीख को धनंजय देसाई नामक व्यक्ति के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्र सेना के कार्यकर्ताओं ने बसों में तोड़फोड़ और आग लगानी शुरू कर दी। हिंसा पर उतारू इस भीड़ ने दुकानों और मकानों पर पत्थर फेंके और कई दुकानों को लूटकर उनमें आग लगा दी। पुणे और उसके आसपास स्थित मुसलमानों के धार्मिक स्थलों को भी निशाना बनाया गया। शहर के हुंडेवाणी इलाके में दो मदरसों और दो मस्जिदों पर हमला हुआ। आरोप यह था कि बालठाकरे और शिवाजी को अपमानित करते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट किया गया है। लगभग 250 सरकारी बसों को नुकसान पहुंचा। नेशनल कान्फिडेरेशन ऑफ हृयूमन राईट्स आर्गेनाईजेशंस की एक रपट के अनुसार,  फेसबुक पोस्ट और उसके बाद हुए दंगे.दोनों ही पूर्वनियोजित थे। लोनी में इस हिंदुत्व संगठन के 35 हथियारबंद गुंडों ने, जो मोटरसाइकिलों पर सवार थे, रोज बेकरी, बैंग्लोर बेकरी और महाराष्ट्र बेकरी में तोड़फोड़ की। इन तीनों के मालिक मुसलमान थे। रोज बेकरी से 35,000 रूपए नगद लूट लिए गये।
    पुलिस ने हमलावरों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही नहीं की और नतीजे में दो जून को उन्होंने और बड़ा हमला किया। काले पड़ेल, सैय्यद नगर व हादपसर बाजार में कई बेकरियों, दुकानों और होटलों में तोड़फोड की गई और उनमें आग लगा दी गई। बिस्कुट, केक आदि बनाने वाली मशीनों, फ्रीजरोंए टेम्पों,कारों और साईकिलों को टुकड़े.टुकड़े कर जला दिया गया। होटल सहारा के पास स्थित दलित बौद्धों के मकानों पर भी हमला किया गया। नीला बड़ूकोंबे और मारूथी शिंदेबाबा,जो कि दलित हैं, ने कहा कि वे लगभग 50 सालों से उस इलाके में रह रहे हैं और पहली बार उन पर हमला हुआ है। कस्बापेठ में चार हिंदू राष्ट्रवादी कार्यकर्ता, मुसलमान युवकों से हिंसक मुठभेड़ में घायल हो गये। ये लोग एक मस्जिद पर हमला करने आये थे और मुसलमान युवकों ने उनका विरोध किया। इस सिलसिले में छः मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया। हादपसर बाजार क्षेत्र में स्थित नलबंद मस्जिद पर पत्थर फेंके गये। अब्दुल कबीर की फलों की दुकान और अब्दुल रफीक बागवान के केले के गोदाम में आग लगा दी गई। उरूली देवाची में जामा मस्जिद पर हमला हुआ। एक फ्रिजए पानी की टंकी और कुछ अन्य चीजें तोड़ दी गईं। ये सभी हमले 9 से 11 बजे रात के बीच हुए। रात लगभग 9 बजे, 28 वर्षीय मोहसिन शेख नामक युवक, जो शोलापुर का रहने वाला था और आईटी इंजीनियर था, को पीट.पीटकर मार डाला गया। मोहसिन का एक मित्र, जो उसके साथ था, बच गया परंतु मोहसिन, जो कि अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था, की एक अस्पताल में मौत हो गई। दो अन्य मुस्लिम युवक एजाज़ यूसुफ बागवान और अमीर शेख,जो कि वहां मौजूद थे, भी घायल हुए। पुणे के मुसलमान व्यापारियों और दुकानदारों को कुल मिलाकर लगभग 4.5 करोड़ रूपयों का नुकसान हुआ।
तेलंगाना
    हैदराबाद के किशनगंज के सिक्ख छावनी क्षेत्र में 14 मई को सिक्खों के एक धार्मिक झंडे को कुछ अज्ञात लोगों ने जला दिया। इसके बाद लाठियों और तलवारों से लैस सिक्खों ने मुसलमानों के घरों पर हमला किया। यह दूसरी बार था जब झंडे को जलाने के मुद्दे को लेकर हिंसा भड़की और सिक्खों ने मुसलमानों पर हमला किया। तीन मुसलमान मारे गये, जिनमें से दो छुरेबाजी और एक पुलिस की गोली से मारा गया। किशनबाग में लंबे अरसे से हिंदू, मुसलमान और सिक्ख मिलजुलकर, शांतिपूर्ण ढंग से रहते आये थे।
कर्नाटक
    कर्नाटक में कुल मिलाकर 68 सांप्रदायिक घटनाएं हुईंए जिनमें 6 लोग मारे गये और 151 घायल हुए। बीजापुर में नरेंद्र मोदी के शपथ लेने का जश्न मनाने के लिए 26 मई को पूर्व केंद्रीय मंत्री बासवन्ना गौड़ा पाटिल के नेतृत्व में जुलूस निकाला जा रहा था। इसके दौरान हुई हिंसा में 12 लोग घायल हुए। कई लोगों को उनकी इच्छा के विरूद्ध गुलाल लगा दिया गया। इसके बाद हुए विवाद में कई दुकानों और फुटपाथ पर धंधा करने वालों पर हमले हुए। लगभग एक लाख रूपये की संपत्ति नष्ट हो गई और 15 व्यक्ति घायल हुए।
असम
    नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड ;एनडीएफबी के सोनवीजीत धड़े ने पिछले साल लगभग 100 लोगों की हत्यायें कीं, जिनमें बांग्लाभाषी मुसलमान और आदिवासी शामिल थे। केंद्र व राज्य सरकारों ने इस हथियारबंद सेना को खत्म करने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए हैं।
    दो मई को नारायण गुरी, बकसा में 72 में से 70 मकानों में आग लगा दी गई। कुल मिलाकर 48 लोग मारे गये और 10 लापता हैं। कुछ लोग अपनी जान बचाने के लिए बैकी नदी में कूद गये। उनके बच्चे नदी में बह गये और उनमें से कई को गोली मार दी गई। इस हमले में जिंदा बचे लोगों के अनुसार यह जनसंहार बोडो लिबरेशन टाईगर्स के पूर्व सदस्यों ने अंजाम दिया था। बोडो टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट में इन लोगों को वनरक्षक नियुक्त किया गया है। इन्हें सरकारी तौर पर बंदूकें उपलब्ध कराई गईं हैं, जिनका इस्तेमाल इस हमले में किया गया। इस हमले के पीछे बोडो टेरिटोरियल कांउसिल के उपप्रमुख खंपा बोरगोयारी का हाथ बताया जाता है जो कि बोडो टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट के वन विभाग के प्रभारी हैं। यह जनसंहार गैर.बोडो रहवासियों को सबक सिखाने के लिए किया गया था क्योंकि उन्होंने अत्याचारी प्रशासन के खिलाफ मत दिया था।
    इस हमले का कारण बना बोडो पीपुल्स फ्रंट के विधायक व असम के पूर्व कृषि मंत्री प्रमिला रानी ब्रम्ह का यह बयान कि मुसलमानों ने 16वीं लोकसभा के चुनाव में बोडो पीपुल्स फ्रंट के उम्मीदवार को वोट नहीं दिये। इसके पहले, हरभंगा मतदान केंद्र पर मतदान के दौरान हुई हिंसा के बाद पुलिस द्वारा मुसलमानों के खिलाफ की गई क्रूरतापूर्ण कार्यवाही से हमलावरों को प्रोत्साहन मिला। जब चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो पता चला कि गैर.बोडो मतों के कारण, 'सम्मिलित जनगोष्ठिया एक्यामंच' के नाभा उर्फ हीरा सरानिया ने प्रमिला रानी ब्रम्ह को बड़े अंतर से पराजित किया।
    इसके बाद, 23 दिसंबर को एनडीएफबी के सोनवीजीत धड़े के कार्यकर्ताओं ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर 78 लोगों की जाने ले लीं। कुल मिलाकर 46 लोग सोनितपुर में मारे गये, 29 कोकराझार में और तीन चिरांग जिले में। आदिवासियों द्वारा जवाबी हमले में चार बोडो भी मारे गये। इस अंधाधुंध गोलीबारी में मारे जाने वालों में से अधिकांश ईसाई आदिवासी थे। उन पर हमला राज्य सरकार द्वारा इस हथियारबंद गिरोह के खिलाफ की गई कार्यवाही का बदला लेने के लिए किया गया।
    कोकराझार जिले के गुंसाई क्षेत्र के माणिकपुर और दीमापुर गांव में आदिवासियों ने कर्फ्यू के दौरान बदले की कार्यवाही करते हुए बोडो निवासियों के कई घरों में आग लगा दी। पुलिस द्वारा हमलावरों को तितरबितर करने के लिए गोली चलाईं गईं जिसमें तीन आदिवासी मारे गये। इनको मिलाकर, सोनितपुर जिले में हिंसा में मारे गये लोगों की संख्या 46 हो गई।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 12 मई 2014

असम नस्लीय सांप्रदायिक हिंसा का तांडव


हाल में ;मई १.२, २०१४ असम के कोकराझार में ४४ बांग्लाभाषी मुसलमानों की हत्या ने एक बार फिर क्षेत्र के बोडो व मुस्लिम रहवासियों के बीच पसरे तनाव को रेखांकित किया है। इस हिंसा के पीछे बोडोलैण्ड पीपुल्स फ्रन्ट का हाथ बताया जाता है, जिसकी विधायक प्रमिलारानी ब्रह्म ने कथित रूप से कहा था कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार व असम के मंत्री वर्तमान चुनाव में विजय हासिल नहीं कर पाएंगे क्योंकि मुसलमानों ने उन्हें वोट न देकर एक गैर.बोडो उम्मीदवार को वोट दिया है। विधायक ने नहीं बताया कि उन्हें यह कैसे पता चला कि मुसलमानों ने किसे वोट दिया है। बताया जाता है कि उनके इस वक्तव्य के बाद हिंसा भड़क उठी। परंतु केवल इस वक्तव्य को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराना ठीक न होगा। दोनों समुदायों के बीच अविश्वास का गहरा भाव है और उनके आपसी संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हैं। इसी के चलतेए क्षेत्र में जुलाई २०१२ में हिंसा हुई थी। हालिया हिंसा सन् २०१५ में असम में होने वाले विधानसभा चुनाव के सिलसिले में मुसलमानों को चेतावनी देने का प्रयास भी है।
बोडो निवासियों की पार्टी ने यह आशंका व्यक्त की है कि उनके उम्मीदवार की हार से बोडोलैण्ड राज्य की उनकी मांग को धक्का लगेगा। यह मांग उनके एजेण्डे पर सबसे ऊपर है। बोडो निवासियों में व्याप्त असंतोष और बांग्लाभाषी मुसलमानों की परेशानियों का लंबा इतिहास है। जुलाई २०१२ में इस तनाव ने हिंसा का रूप ले लिया था और बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी जिलों कोकराझार व चिरांग, जिनका प्रशासन बोडो क्षेत्रीय परिषद के हाथों में है, और डूबरी के एक हिस्से में हुए खूनखराबे में १०८ लोग मारे गए थे, जिनमें ७९ मुसलमान, २२ बोडो व ४ अन्य शामिल थे। इसके अतिरिक्त, लगभग चार लाख लोग अपने घरों से बेघर हो गए थे।
इस तनाव और समस्या की जड़ में है यह गलत धारणा कि बंगालीभाषी मुसलमान बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। यद्यपि भाजपा और मोदी बार.बार यह कह रहे हैं कि वे वर्तमान चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ रहे हैं परंतु सच यह है कि वे सांप्रदायिकता भड़काने के मौके ढूंढते ही रहते हैं। देश के पूर्वी हिस्सों में अपने भाषणों में मोदी ने बंगाल की मुख्यमंत्री पर यह आरोप लगाया कि वे बांग्लादेशी घुसपैठियों की देखभाल पर अधिक ध्यान देती हैंए बंगाल के रहवासियों की देखभाल पर कम। असम में उन्होंने यह तक कह डाला कि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में एक सींग वाले गैंडो को इसलिए मारा जा रहा है ताकि बांग्लादेशी घुसपैठियों के रहने के लिए जगह खाली कराई जा सके। उन्होंने यह धमकी भी दी कि घुसपैठिये अपना सामान बांध लें क्योंकि १६ मई को उन्हें यह देश छोड़कर जाना होगा। इस तारीख को चुनाव नतीजे आने वाले हैं और मोदी को पूरा भरोसा है कि वे ही देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे।
असम समस्या एक नासूर बन चुकी है। नौकरियों और जीवनयापन से संबंधित मुद्दों को तंगदिल ताकतों ने सांप्रदायिक रंग दे दिया है। वहां पर'असम केवल असमियों के लिए''का नारा दिया जा रहा है। ठीक उसी तरहए जैसे कि मुंबई में शिवसेना कहती रही है कि'महाराष्ट्र केवल मराठियों के लिए है'। असम में इस दुष्प्रचार और उसके कारण उपजी शत्रुता का पहला प्रगटिकरण था नैल्ली कत्लेआम ;१९८३, जिसमें लगभग ३,००० लोग,मुख्यतः बंगाली मुसलमान, लालुंग कबीलाईयों के हाथों मारे गए थे। यह कत्लेआम असम आंदोलन के दौरान हुआ था। यह आंदोलन असम की मतदाता सूचियों से 'बांग्लादेश के गैर कानूनी प्रवासियों' के नाम हटाने की मांग को लेकर चलाया जा रहा था। इस हत्याकांड की जांच के लिए त्रिभुवन प्रसाद तिवारी आयोग नियुक्त किया गया था परंतु इस आयोग की रपट कभी सार्वजनिक नहीं हुई। बोडो लोगों के आन्दोलन के बादए बोडो क्षेत्रीय परिषद बनाई गई और चार जिलो कोकराझार,चिरांग, बक्सा और उदयगिरी का प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी बोडो को सौंप दी गई। इनमें से तीन जिलों में जुलाई २०१२ में भारी हिंसा हुई। यह दावा कि बोडो इस क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं और उन्हें अपनी नस्लीय पहचान सुरक्षित रखने और अपने हितों की रक्षा करने का अधिकार है, में कोई दम नहीं है क्योंकि इस क्षेत्र में बोडो, कुल आबादी का २२ से २९ प्रतिशत ही हैं। स्वायत्तशासी परिषद के जरिए उन्हें मिले अधिकारों का बोडो ने जमकर दुरूपयोग किया है और समाज के दूसरे तबकों को हाशिये पर पटक दिया है। यह भी सही है कि बोडो क्षेत्रीय परिषद के निर्माण के बाद भी बोडो ने अपने हथियार नहीं डाले जबकि परिषद की स्थापना की मांग को स्वीकार करने की यह आवश्यक शर्त थी।
आबादी संबंधी आंकड़ों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि असम में बांग्लाभाषी मुसलमानों के बसने की प्रक्रिया अंग्रेजों की नीतियों के कारण शुरू हुई थी। बांग्लाभाषी मुसलमान, असम में बहुत लंबे समय से रह रहे हैं। उदाहरणार्थ,असम में सन् १९३१ में मुसलमानों की आबादी एक लाख से अधिक थी। अंग्रेज शासन के शुरूआती दौर में बंगाल की आबादी बहुत अधिक थी और बंगाली, राजनैतिक दृष्टि से अत्यंत जागरूक थे। उस समय असम की जनसंख्या अत्यंत विरल थी। अंग्रेजों ने २०वीं सदी की शुरूआत में एक ष्मानव रोपण नीति बनाई, जिसके तहत बंगालियों को असम में बसाया जाना था। इसके तीन उद्देश्य थे.पहलाए बंगाल पर आबादी का दबाव कम करना। दूसरा, बंगाल में बार.बार होने वाले अकालों व वहां फैल रहे जनाक्रोश को कम करना और तीसरा,असम में लोगों को बसाकर वहां से टैक्स इकट्ठा करना।
बांग्लादेशी घुसपैठियों के संबंध में जमकर दुष्प्रचार किया जा रहा है। परंतु पिछली सदी के जनसंख्या संबंधी आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में रह रहे मुसलमान,वहां स्वाधीनता के पहले से रह रहे हैं। सन् १९४७ में देश के विभाजन के समय कुछ नये लोग यहां बसे। इसके पश्चात,सन् १९७१ में हुए भारत.पाकिस्तान युद्ध, जिसके नतीजे में बांग्लादेश अस्तित्व में आया, के बाद भी कुछ मुस्लिम असम में आकर बस गए। सन् १९७१ के बाद से असम में नए मुसलमान प्रवासी नहीं आए हैं। नील्म दत्ता की पुस्तक 'मिथ ऑफ बांग्लादेशी एण्ड वायलैंस इन असम' बताती है कि बांग्लादेश में प्रवासियों के बसने का सिलसिला १०० वर्ष से भी अधिक की अवधि से जारी है और सन् १९७१ के बाद से, प्रवासियों की संख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई है। सन् १९८५ में हुए असम समझौते के अंतर्गत, सन् १९७१ तक असम में बसे सभी लोगों को भारतीय नागरिक के सारे अधिकार दे दिए गए हैं। इस समझौते के अनुसार, सन् १९७१ या उससे पहले से यहां रह रहे सभी प्रवासी, भारत के पूर्ण नागरिक हैं और अधिकांश मुसलमान इसी श्रेणी में आते हैं। कहने का अर्थ यह नहीं है कि असम में एक भी गैरकानूनी प्रवासी नहीं है। परंतु उनकी संख्या बहुत कम है और वे मुख्यतः आर्थिक कारणों से यहां आकर बसे हैं।
इन तथ्यों के बावजूद,सांप्रदायिक राजनीति के पैरोकार इस मुद्दे को जमकर उछालते आए हैं। वे इन गरीब व मजबूर प्रवासियों को घुसपैठिया कहते हैं। बांग्लादेश से जो हिन्दू भारत में आकर बसे हैं उनके लिए वे शरणार्थी शब्द का प्रयोग करते हैं जबकि मुसलमानों को घुसपैठिया बताते हैं। सन् २०१२ की हिंसा को सांप्रदायिक ताकतों ने राष्ट्रवादियों ;बोडो व विदेशियों ;मुसलमानों के बीच संघर्ष बताया था। इलाके में रह रहे बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों की हालत बहुत खराब है। उन्हें नीची निगाहों से देखा जाता है और उनमें से कई को मत देने का अधिकार भी नहीं है। उनमें से अनेक को 'डाउटफुल' ;संदेहास्पद मतदाता घोषित कर दिया गया है। नफरत फैलाने वाली ताकतें यहां अतिसक्रिय है और यह मिथक फैलाया जा रहा है कि शासक दल,वोटों की खातिर घुसपैठियों को बढ़ावा दे रहा है। सच यह है कि जो लोग पड़ोसी देशों से हमारे देश में आ भी रहे हैं वे केवल आर्थिक मजबूरी के कारण ऐसा कर रहे हैं। हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में लाखों नेपाली विभिन्न प्रकार के काम कर अपना पेट पाल रहे हैं। परंतु उन्हें कभी निशाना नहीं बनाया जाता क्योंकि वे हिन्दू हैं। इसके विपरीत, बांग्लादेश से रोटी.रोजी की तलाश में भारत आने वाले मुसलमानों को देश का दुश्मन करार दे दिया जाता है।
वर्तमान हिंसा के पीछे चुनाव प्रचार के दौरान किया गया विषवमन है। बोडो लोगों ने क्षेत्रीय परिषद के गठन के बाद भी अपने हथियार नहीं डाले हैं और यह हिंसा का एक प्रमुख कारण है। इस मुद्दे पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। यह मांग भी की जा रही है कि अल्पसंख्यकों को आत्मरक्षा के लिए बंदूक आदि के लायसेंस दिए जाने चाहिए। परंतु ऐसा करने से हिंसा में और बढ़ोत्तरी होने की संभावना है। बेहतर तो यह होगा कि पुलिस या सेना का उपयोग कर, बोडो लोगों के पास जो अवैध हथियार हैं उन्हें सख्ती से जब्त किया जाए। इस तरह की मानवीय त्रासदी से निपटने के लिए राज्य और केन्द्र, दोनों सरकारों कौ फौरी कदम तो उठाने ही चाहिए,दूरगामी नीति भी बनानी चाहिए। विस्थापितों का पुनर्वास होना चाहिए और क्षेत्र का विकास। विकास के अभाव के चलते ही इलाके में नफरत की राजनीति शुरू हो गई है। दोनों समुदायों के आपसी संबंधों को सौहाद्रपूर्ण बनाया जाना अतिआवश्यक है।
 -राम पुनियानी

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल


पिछले दिनों निचले असम के कोकराझार और तीन अन्य जिलों में हुई व्यापक हिंसा के बारे में समाचारपत्रों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। जुलाई के पहले सप्ताह में शुरू हुई हिंसा, जिसने 19 जुलाई के बाद जोर पकड़ लिया, में 58 व्यक्ति मारे गए। वर्तमान में इस इलाके में एक असहज शांति व्याप्त है। इस हिंसा ने चार लाख से अधिक लोगों को शरणार्थी बना दिया है। इनमें से तीन लाख मुसलमान हैं। शरणार्थी 27 अलगअलग राहत शिविरों में रह रहे हैं। समाचारपत्र, सामान्यतः, केवल घटनाओं का विवरण देते हैं, उनके पीछे के कारणों का विश्लेषण नहीं करते और न ही समाचारपत्रों में किसी मसले के गहन अध्ययन पर आधारित सामग्री प्रकाशित होती है।
जब मुख्यमंत्री तरूण गोगोई से किसी ने कहा कि असम जल रहा है तो वे आगबबूला हो गए। श्री गोगोई, सच यह है कि असम वास्तव में धूधूकर जल रहा है। असम समस्या की जड़ें कोकराझार में बोडो व मुसलमानों के बीच हिंसा और बोडो क्षेत्रीय परिषद में आए दिन होने वाले विवादों से कहीं गहरी हैं। ये दोनों तो असम के आंतरिक सामाजिक संघर्ष के बाहरी लक्षण मात्र हैं। असम में तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि बांग्लादेशी मुसलमानों के राज्य में घुसपैठ करने संबंधी झूठे प्रचार पर रोक नहीं लगती।
सन 1980 के दशक में चला एएएसयू आंदोलन और उसके बाद हुआ नेल्ली नरसंहार, इस आंतरिक टकराव का पहला प्रकटीकरण थे। नेल्ली में बांग्लाभाषी मुसलमानों (तथाकथित बांग्लादेशियों) और ललुंग कबीलाईयों के बीच हिंसा हुई थी जिसमें 3000 से अधिक मुसलमान मारे गए थे। बांग्लादेशी होने का आरोप लगाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इस जनसंहार से पूरे असम के मुसलमानों में इतना आतंक व्याप्त हो गया था कि जब मैं इस घटना की जांच के लिए असम पहुंचा तब एक भी असमिया मुसलमान कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं था।
सन 2008 में मुसलमानों और बोडो के बीच हिंसा का एक और दौर हुआ जिसमें 55 लोग मारे गए। जिन मुसलमानों को बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनमें से अधिकांश ब्रिटिश शासनकाल में असम में बसे थे। नेल्ली में बंगाली मुसलमानों ने मुझे बताया कि उनके पुरखे सन 1930 या उसके भी पहले वहां आकर बसे थे और उन्हें खाली पड़ी जमीनों पर खेती करने के लिए लाया गया था। ये लोग बहुत मेहनती हैं जबकि असमिया अहोम और पहाड़ी कबीलाई ललूंग आरामतलब हैं और खेती में ज्यादा मेहनत करना नहीं चाहते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेल्ली में 3000 से अधिक मौतों के बावजूद घटना की कोई आधिकारिक जांच नहीं हुई। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि 3000 मासूमों को क्रुरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिए जाने के घटनाक्रम की जांच करवाने तक की जरूरत महसूस नहीं की गई।
दक्षिणपंथी भाजपा इस मामले में आग में घी डालने का काम करती रही है। वह बिना किसी आधार के अत्यंत अतिश्योक्तिपूर्ण आंकड़े प्रस्तुत कर यह आरोप लगाती रही है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुसलमान असम में बस रहे हैं। सन 1980 तक असम में आरएसएस की कोई खास पकड़ नहीं थी परंतु अब गांवगांव तक उसका फैलाव हो गया है और उसके कार्यकर्ता रातदिन मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच खाई खोदने के काम में जुटे हुए हैं। वैसे असम में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक सौहार्द का लंबा इतिहास रहा है। इन सौहार्दपूर्ण रिश्तों के निर्माण में एक ओर शक्रदेव तो दूसरी ओर आजम फकीर ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं थीं।
असम ही नहीं, भाजपा को पूरे देश में कहीं भी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ते नहीं भाते। अपनी हिन्दुत्ववादी राजनीति को आगे ब़ाने के लिए भाजपा हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी करने के लिए बांग्लादेशियों के मसले का इस्तेमाल करती रही है। असम में साम्प्रदायिक सौहार्द के लम्बे इतिहास के चलते भाजपा के लिए असमिया मुसलमानों पर निशान साधना लगभग असंभव था। इसलिए उसने बांग्लादेशी मुसलमानों का मिथक ईजाद किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि असम में बांग्लाभाषी मुसलमान नहीं हैं और यह भी सही है कि हाल के वषोर्ं में कुछ बांग्लाभाषी मुसलमान असम में आकर बसे हैं । इनमें से कुछ बांग्लादेश से आए हैं और कुछ पिश्चम बंगाल से।
परंतु अधिकांश बांग्लाभाषी मुसलमान ब्रिटिश काल से असम में बसे हुए हैं और वैज्ञानिक तरीके से एकित्रत किए गए ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं जिनसे यह पता चल सके कि वास्तव में कितने बांग्लादेशी प्रवासी पिछले कुछ दशकों में असम में आए हैं। वहां कोई नेशनल पापुलेशन रजिस्टर भी नहीं है। पूरा मसला प्रचार और केवल प्रचार पर आधारित है और इसके जरिए आमजनों को विभाजित करने और उनके मन में तरहतरह की भ्रांतियां फैलाने में साम्प्रदायिक तत्वों को सफलता मिली है। इस आरोप, कि कांग्रेस सरकार बांग्लादेशी मुसलमानों को असम में बसने की इजाजत इसलिए दे रही है ताकि उसका वोट बैंक ब़ सके, ने गैरकांग्रेसी राजनैतिक दलों को प्रभावित किया है।
असम तब तक हिंसा और तनाव के झंझावातों में फंसा रहेगा जब तक कि बांग्लाभाषी मुसलमानों के असम में बसने संबंधी आरोपों का पुरजोर व प्रभावी ंग से खण्डन नहीं होता। ऐसा भी नहीं है कि केवल बांग्लादेशी या बांग्लाभाषी मुसलमान असम में आ रहे हैं। हिन्दीभाषी बिहारी भी बड़ी संख्या में असम में बस गए हैं। राजस्थान के मारवाड़ी भी वहां हैं और उनका उत्तरपूर्वी राज्यों के व्यापारव्यवसाय पर लगभग पूण्र नियंत्रण है। परंतु कतिपय राजनैतिक कारणों से फोकस केवल बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों पर ही किया जा रहा है।
इस समस्या का एक अन्य कारण है बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना। यह परिषद ऐसे इलाके में शासन कर रही है जहां बोडो आबादी केवल 29 प्रतिशत है और अन्य लोगों में वे बांग्लाभाषी मुसलमान शामिल हैं जिन्हें ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा जूट की खेती करने के लिए वहां बसाया गया था। वे सौ से अधिक वषोर्ं से वहां रह रहे हैं। केन्द्र सरकार ने अतिवादी बोडो आंदोलनकारियों से, जो कि एक स्वतंत्र बोडो राज्य की मांग कर रहे थे, समझौता करने की खातिर बोडो क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद की स्थापना को मंजूरी दी थी।
प्रश्न यह है कि बोडो परिषद बनाकर उसे संबंधित इलाके के विकास संबंधी और अन्य निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार कैसे दिया जा सकता है जबकि क्षेत्र में बोडो, कुल आबादी का केवल 29 प्रतिशत हैं। परिषद की स्थापना से सभी गैरबोडो नाराज हैं और वे चाहते हैं कि इस परिषद को भंग कर दिया जाए। उनकी शिकायत है कि उन्हें विकास में उनका उचित हिस्सा नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर, बोडो अपनी आबादी इतनी ब़ाना चाहते हैं कि वे उस इलाके में बहुसंख्यक हो जाएं और इस आधार पर बोडो परिषद के गठन को औचित्यपूर्ण ठहराया जा सके।
हिंसा के पीछे एक अन्य कारण यह है कि समझौते के अनुसार, बोडो अतिवादियों को अपने हथियार समपिर्त करने थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया और आज भी ये अतिवादी अपनी बंदूकें लिए क्षेत्र में घूमते रहते हैं और गैरबोडो रहवासियों को आतंकित करते हैं। बोडो अतिवादियों को आज भी आग्नेय अस्त्र आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं और सरकार ने मुख्यतः राजनैतिक कारणों से उनसे ये अवैध हथियार जब्त करने की कोई कोशिश नहीं की है। असम की सरकार एक गठबंधन सरकार है, जिसका एक हिस्सा बोडो नेशनल फ्रंट भी है और इस कारण मुख्यमंत्री, बोडो को नाराज नहीं करना चाहते।
कोकराझार में हिंसा 6 जुलाई को तब शुरू हुई जब मोटरसाईकिलों पर सवार और बंदूकों से लैस चार बोडो युवक एक गांव में पहुंचे और दो मुसलमानों की हत्या कर भाग गए। जिला प्रशासन ने उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की क्योंकि जिले के डिप्टी कमिश्नर और कलेक्टर, दोनों ही बोडो हैं। इसके बाद अज्ञात लोगों (जिन्हें बंगाली मुसलमान माना जा रहा है) ने चार पूर्व अतिवादी बोडो को मार डाला और फिर बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई। अब जाकर जिले के डिप्टी कमिश्नर और कलेक्टर को हटाया गया है और कलेक्टर का निलंबन भी कर दिया गया है।
अगर यही कार्यवाही पहले कर दी जाती तो बड़े पैमाने पर हुआ खूनखराबा और तबाही रोकी जा सकती थी। परंतु मुख्यमंत्री, जिला प्रशासन की अकर्मणयता के मूक दशर्क बने रहे और उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। जब हिंसा फैलने लगी तब मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार से सहायता मांगी और सेना की तैनाती किए जाने का अनुरोध किया। परंतु सेना के इलाके में पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी थी और हिंसा नियंत्रण के बाहर हो गई थी। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री डॉ़ मनमोहन सिंह की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री को हिंसा रोकने के लिए कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए वरन वे स्वयं भी प्रभावित इलाके में पहुंचे। प्रधानमंत्री की यात्रा के पहले तक मुख्यमंत्री ने हिंसाग्रस्त क्षेत्र में जाने की जहमत नहीं उठाई थी।
यह महत्वपूर्ण है कि असम में दंगे भड़कने की यह पहली और आखिरी घटना नहीं है। अगर त्वरित और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आगे भी खूनखराबे, आगजनी और दंगों का दौर चलता रहेगा। सबसे पहला कदम, जो कि तुरंत उठाया जाना चाहिए, वह है बोडो अतिवादी युवकों का नि:शस्त्रीकरण। इन युवकों तक आग्नेय अस्त्र किस रास्ते से पहुंच रहे हैं इसका पता लगाकर उस पर रोक लगाई जानी चाहिए। बोडो युवकों को खुलओम हथियार लेकर घूमने और गैरबोडो रहवासियों को आतंकित करने की इजाजत कोई सरकार नहीं दे सकती।
बोडो अतिवादी, गैरबोडो निवासियों से जबरिया पैसे की वसूली भी करते हैं और जो लोग पैसे देने से इंकार करते हैं उनके पशु और अन्य घरेलू सामान लूट लिया जाता है। इस तरह की घटनाओं के कारण जनता में भारी आक्रोश है। यह कहना मुश्किल है कि सरकार बोडो अतिवादियों से हथियार छीनने के लिए प्रभावी कदम उठा सकेगी या नहीं क्योंकि बोडो, सत्ताधारी राजनैतिक गठबंधन के हिस्से हैं।
दूसरे, बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना से उत्पन्न समस्याओं से निपटने की भी जरूरत है। बोडो कुल आबादी के एकतिहाई से भी कम हैं परंतु क्षेत्र का शासन उनके हाथ में है। एक तरीका तो यह हो सकता है कि बोडो क्षेत्रीय परिषद में गैरबोडो सदस्यों को पर्याप्त संख्या में शामिल किया जाए। क्षेत्र के अल्पसंख्यक समुदाय को शासन के पूरे अधिकार सौंपना, केन्द्र सरकार का एक अन्यायपूर्ण कदम था। मुसलमानों के अतिरिक्त वहां कोच्ची, राजभोंगशी, संथाल और आदिभाषी भी हैं हालांकि गैरबोडो में मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है। अतः या तो बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना के लिए फरवरी 2003 में किए गए समझौते को रद्द किया जाना चाहिए या परिषद में गैरबोडो प्रतिनिधियों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।
तीसरे, बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के बारे में अतिश्योक्तिपूर्ण प्रचार का प्रभावी खण्डन किया जाना चाहिए और वैज्ञानिक आंकड़े देश के सम्मुख प्रस्तुत किए जाने चाहिए। बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के बारे में दुष्प्रचार से न केवल असम बल्कि पूरे देश में अकारण तनाव फैल रहा है।
ये कुछ कदम हैं जो हालात को बेहतर बनाने के लिए तुरंत उठाए जा सकते हैं। इस समस्या को केवल कानून और व्यवस्था की समस्या मानना भूल होगी। यह एक राजनैतिक समस्या है जिसका राजनैतिक हल निकाला जाना चाहिए। कुछ बोडो नेता अत्यंत गैर जिम्मेदाराना बयान जारी कर रहे हैं और यह दुर्भाग्यपूण्र है कि नेशनल काऊंसिल आफ चर्चिस ऑफ इंडिया के महासचिव श्री रोजर गायकवाड़ ने यह बेसिरपैर का वक्तव्य जारी किया है कि बांग्लादेशी मुसलमानों ने असम में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। यह गैरजिम्मेदारी की हद है।
यह सचमुच दुःखद है कि असम के पड़ोस में स्थित म्यानामांर में वहां के सैनिक शासकों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों का बड़े पैमाने पर कत्ल किया जा रहा है और इसके लिए भी उसी बहाने का उपयोग किया जा रहा है जिस बहाने से भारत में बंगाली मुसलमानों को मारा जा रहा है। यह स्थिति इसलिए भी और दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि हमारा देश एक प्रजातंत्र है। हां, एक महत्वपूर्ण फर्क यह है कि भारत में केन्द्र सरकार और विशेषकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असम में भड़की हिंसा की आग को बुझाने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं जिनमें तीन सौ करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा शामिल है। म्यानांमार में तो वहां की सैनिक तानाशाह सरकार क्रुरतापूर्वक रोहिंग्या मुसलमानों को मौत के घाट उतार रही है और अपनी इस कार्यवाही को औचित्यपूर्ण भी ठहरा रही है।
किसी भी क्षेत्र में बाहर से आकर लोगों के बसने को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है परंतु इस अप्रवासन का राजनैतिक हित साधन के लिए दुरूपयोग नहीं होना चाहिए और न ही आंकड़ों की बाजीगरी की जानी चाहिए। शांति स्थापना के लिए राजनैतिक परिपक्वता तो आवश्यक है ही यह सुनिश्चित किया जाना भी जरूरी है कि असम में एक शताब्दी से भी अधिक समय से रह रहे जातीय व भाषायी समूहों को सुरक्षा मिले और प्रगति व समॢद्धि में हिस्सेदारी भी।

डॉ़ असगर अली इंजीनियर
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