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रविवार, 7 फ़रवरी 2016

आत्महत्यायें किसान कर रहा है और छूट उद्योगपतियों को

        स्वामी सहजानन्द सरस्वती, राहुल सांस्कृत्यायन, जयबहादुर सिंह  भातखण्डे राय, जैसे किसान नेताओं के आन्दोलन से जमीनदारी का खात्मा हुआ और देश की बहुसंख्यक आबादी के हिस्से में जमीन आयी थी।                                            
                                  यह उद्गार व्यक्त करते हुए किसान सभा के प्रदेश महासचिव व पूर्व विधायक राजेन्द्र यादव ने कहा कि देश में किसान आत्महत्यायें कर रहा है और छूट उद्योगपतियों को दी जा रही है।
                             सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि किसान जब तक संघर्ष की राह में नहीं उतरेगा तब तक देश और दुनिया में बदलाव सम्भव नहीं है। किसान सभा इस काम को पूरा करेगी।
                                                      पार्टी के सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि किसानों की एकता को तोड़ने के लिए विभिन्न राजनैतिक दल उद्योगपतियों से पैसा लेकर राजनीति व धर्म को बढ़ावा देते हैं। चुनाव में किसान की बात होती है और चुनाव के बाद उद्योगपतियों की बात होने लगती है।
                                                      डा0 कौसर हुसैन ने कहा कि यह सरकार किसान के जल, जंगल, जमीन को छीन लेना चाहते हैं और उद्योगपतियों को मुनाफा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री विदेश यात्रा कर रहे हैं।
                                                           सम्मेलन को डा0 उमेशचन्द्र वर्मा सहित कई लोगों ने सम्बोधित किया। सम्मेलन में विनय कुमार सिंह को अध्यक्ष व सत्येन्द्र कुमार को महामंत्री, कोषाध्यक्ष पुष्पेन्द्र कुमार, मंत्री नीरज वर्मा, रामनरेश वर्मा, मुनेश्वर वर्मा तथा उपाध्यक्ष में दलसिंगार, गिरीशचन्द्र को बनाया गया।
    इस अवसर पर किसान सभा के महासचिव ने एक कलेण्डर का विमोचन भी किया।


गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

चाहे जो कुर्बानी देनी पड़े।




 
बाराबंकी। जल, जंगल, जमीन बचाने की लड़ाई किसान सभा के नेतृत्व में लड़ी जा रही है जिसके तहत जनपद के विभिन्न गांव में क्रमिक भूख हड़ताल दूसरी दिन भी जारी रही।
यह जानकारी देते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सह सचिव रणधीर सिंह सुमन ने बताया कि ग्राम चन्दनपुरवा, मुबारकपुर, भगौतीपुरवा व कोना गांव में कल से क्रमिक भूख हड़ताल जारी है।
आज निम्न गांवों में क्रमिक भूख हड़ताल प्रारम्भ किया गया है। जिसमें बिशुनपुर में विष्णू त्रिपाठी, उमाकान्त प्रजापति, रमेश, रामू, मसौली में रशीद, मो0 शरीफ, सुग्रीव प्रसाद, मेराज अहमद, दयाशंकर, चन्दनपुरवा में सन्तराम, मुरली, सुखमी, रामप्रकाश, शिवप्रसाद, जगदीश, जियनपुर गांव में धनवासी, सोनावती, तारावती, रामसागर, राममनोरथ मोहम्मदपुर गांव में रामलखन, सुरेन्द्र पाल, देशराज, मलके, रामगोपाल अलीपुर गांव में राममनोहर, अर्जुन सिंह मुनेश्वर, कपिल वर्मा, पंचमलाल मलूकपुर गांव में अवधेश कुमार, विश्राम, रामनरेश, बुधराम, सुन्दरलाल व मुबारकपुर, कोनागांव, भगौतीपुर, अजगना आदि गांवों में सैकड़ों किसान क्रमिक भूख हड़ताल कर रहे हैं।
उन्होनें आगे बताया कि जनपद के किसान अपना जमीन को किसी भी कीमत पर लखनऊ विकास प्राधिकरण या बाराबंकी विकास प्राधिकरण को अधिग्रहण नहीं करने देंगे। चाहे इसके लिए जो कुर्बानी देनी पड़े।


 नीरज वर्मा
    मंत्री
अखिल भारतीय किसान सभा
जनपद-बाराबंकी

रविवार, 18 मार्च 2012

सिंगरौली - पूँजीवाद का आतंक-2


आज दुनिया भर में जमीन और इसके नीचे दबे संसाधन उस जमीन पर फलते फूलते जनजीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा से लगे सिंगरौली से लेकर भारत के अन्य राज्यों के साथ-साथ अफ्रीका और लैटिन अमेरिका आदि के कई देश जो प्राकृतिक संसाधनों के मामले में धनी हैं, सभी जगह ऐसी ही दमनकारी ‘विकास‘ नीतियाँ हावी हो चुकी हैं। इन सभी जगहों पर इन ‘विकासपरक‘ योजनाओं का क्रियान्वयन पुलिस के माध्यम से कराया जाना यह इंगित करता है कि ये योजनाएँ जिन क्षेत्रों में संचालित की जा रही हैं, वहाँ के स्थानीय विकास से इनका कोई लेना देना नहीं है। ‘ऊर्जा राजधानी‘ सिंगरौली में पैदा होती बिजली और अन्य कीमती पदार्थों का उपभोग तो देश का संपन्न वर्ग कर रहा है, जब कि इसके लिए सारे त्याग स्थानीय निवासियों के जिम्मे पर डाल दिया गया है। भारत के गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट, जो कि इन्टरनेट पर पढ़ी भी जा सकती है, इस कटु सच्चाई को स्वीकारती तो है, पर बड़ी ही बेशर्मी से इसे न्यायोचित भी ठहराती है। यह रिपोर्ट कहती है:-
“पीढि़यों से अपनी जमीन पर रहने वाले परिवारों के लिए अपनी जगह से उजाड़े जाने और बिल्कुल ही किसी नई अपरिचित जगह पर भेज दिए जाने से ज्यादा बुरा और दर्दनाक कोई और सपना नहीं हो सकता। परिवारों को बिल्कुल ही ऐसे व्यवसाय का विकल्प देने से ज्यादा दुखदाई कुछ और नहीं हो सकता, जो व्यवसाय उन्होंने पहले कभी न किया हो। फिर भी उन्हें विस्थापित होना पड़ेगा, क्योंकि वे परिवार जिस जमीन पर हैं, उसकी आवश्यकता विकास कार्यों के लिए है, और इन्हीं विकास कार्यों से आम लोगों की सम्पन्नता और देश की प्रगति संभव हो पाएगी। अतः विस्थापित होने वाले लोग अपने समुदाय और राष्ट्र हित में एक महान त्याग कर रहे हैं। विस्थापित स्वयं कठिनाई और दबाव में एक अनिश्चित भविष्य झेलते हैं ताकि दूसरे लोग आर्थिक रूप से बेहतर और खुशी से रह पाएँ।”
एक बडे़ समुदाय की कीमत पर मुट्ठी भर लोगों को सुविधाएँ पहुँचाना, केवल भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में जारी औपनिवेषिक गतिविधियों के केंद्र में है। अफ्रीका के साथ-साथ सभी लैटिन अमेरिकी देषों में जारी प्रभावशाली वर्ग के द्वारा मूल निवासियों के शोषण को बढ़ावा देने वाली और संसाधनों की लूट को बढ़ावा देने वाली यह प्रक्रिया द्वितीय विश्व युद्ध में बुरी तरह से टूट चुके यूरोप को दुबारा मजबूत करने के लिए अपनाई गई प्रक्रियाओं का ही नतीजा है। यूरोप को दुबारा संगठित करने के लिए जो कोशिशें की गईं उन्होंने ही वल्र्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का गठन किया। आज इन्हीं वित्तीय संस्थानों के निर्देशन में और उन्हीं के द्वारा वित्तपोषित ये योजनाएँ ‘विकसित‘ देशों में उपजे संसाधनों के संकट का हल ‘विकासशील‘ देशों में खोजने की कोशिश कर रही हैं। इन योजनाओं के वैश्विक विस्तार और इन के पीछे इतने बड़े वित्तीय संस्थानों का होना यह बताते हैं कि स्थानीय सरकारों पर इन योजनाओं के क्रियान्वयन का कितना ज्यादा दबाव है। इन्हीं दबावों के चलते, और इनके इशारों पर नाचते हुए स्वयं भी मलाई के भागीदार बनने का लालच, भारत समेत इन तमाम सरकारों को जन सरोकारों से दूर कर पूँजीपतियों के सरपरस्ती के लिए मजबूर कर दिया है। यह महज संयोग नहीं है कि 26 जनवरी को भारत के राष्ट्रपति के द्वारा बाँटे गए गैलेंट्री अवार्ड ज्यादातर उन क्षेत्रों में तैनात प्रशासनिक अधिकारियों के हिस्से में आए जहाँ आज के दौर में भारतीय राज्य का क्रूरतम चेहरा दिखता है। मसलन, गैलेंट्री अवार्ड की इस लिस्ट में वह पुलिस अधिकारी अंकित गर्ग भी शामिल है जिसने छत्तीसगढ़ की आदिवासी प्राथमिक शिक्षिका को माओवाद के आरोप में हिरासत में रख कर उसका यौन शोषण किया और उसके गुप्तांगों में पत्थर ठूंस कर वीभत्स यातनाएँ दीं।
अंत में, सिंगरौली के सन्दर्भ में सवाल यह उठता है कि विभिन्न शहरों के लिए बिजली की निर्बाध आपूर्ति कर के जिसने शहरों को रौशनी से भर दिया है, उसी सिंगरौली के अँधेरे को दूर करना हमारे देश के लिए हाशिये का प्रश्न क्यों बना हुआ है? अगर सिंगरौली वनवासी, आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के बजाय एक ‘एलिट‘ अथवा ‘सभ्रांत‘ वर्ग की बहुलता का क्षेत्र होता, तो भी क्या आजादी के इन 65 वर्षों में इस कदर अनदेखी का शिकार होता?
-रवि शेखर
मो0:- 09369444528

शनिवार, 17 मार्च 2012

सिंगरौली - पूँजीवाद का आतंक




दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश भारत में साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के रूप में पूँजीवाद का आतंक कितना भयावह है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का सीमावर्ती क्षेत्र-सिंगरौली। एक समय अपनी उपजाऊ भूमि तथा घने जंगलों के लिए प्रसिद्ध रहा यह क्षेत्र या तो रिहंद डैम की वजह से डूब में आ चुका है, या फिर देश के विभिन्न बिजली परियोजनाओं का और इनमें ईधन के बतौर कोयले की सुगम उपलब्द्धता का जरिया बन चुका है। सिंगरौली का ‘महान‘ जंगल, जिसे महज 2-3 दशकों पहले के लोक गीतों में एक ऐसे सघन जंगल के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है जहाँ से पुरुषों के लौटने पर उनके घरों की महिलाएँ अपने भाग्यशाली होने का उत्सव मनाती हैं, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में एक समान रूप से फैलता बड़ी पूँजी का यह आतंक ‘जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता की सरकार‘ के जुमले को पूर्णतया खारिज करता है।
सोन, रिहंद, कन्हर आदि नदियों के घाटी में पली-बढ़ी इस क्षेत्र की मिट्टी और संस्कृति, दोनों ही काफी समृद्ध रही हैं। स्थानीय जनजातीय जीवनशैली सदा से ही मानव जीवन और प्रकृति के तालमेल का प्रतिनिधित्व करती रही है, जिसमें दोनों के बीच अन्योन्याश्रय का सम्बन्ध रहा है। जंगलों में पैदा होने वाले विभिन्न उत्पाद न केवल वनवासियों का पेट भरते रहे हैं, बल्कि अन्य जरूरतों की पूर्ति हेतु उनके धनार्जन का भी स्रोत रहे हैं। विकास के वर्तमान मॉडल के परिणाम के बतौर यह अन्योन्याश्रयी सम्बन्ध अधिकाँश क्षेत्रों में टूट चुका है, अथवा टूटने के कगार पर है। पिछली सदी के अंतिम दशक में शुरू हुई वोट की राजनीति के तहत जिस ‘विकास‘ का वादा किया गया था, उसके फलस्वरूप, इन ‘विकासवादी‘ नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जनता के द्वारा चुनी गई सरकारों ने पुलिस के डंडे पर डाल दिया है। देश भर में चल रही ये ‘विकासवादी‘ परियोजनाएँ अपने मूल में, संसाधनों के गहराते वैश्विक संकट के दौर में, नए क्षेत्रों में पूँजीवादी ताकतों के द्वारा संसाधनों की लूट का जरिया हैं। इनके खिलाफ उठने वाली आवाज को ‘कानून-व्यवस्था‘ में खलल पैदा करने की कोशिश माना जाता है। पुलिस, और कहीं-कहीं सेना की भी, सरपरस्ती में चलाई जा रही यह परियोजनाएँ देश- विदेश के प्रभावशाली वर्गों को और ज्यादा अमीर बना रही हैं, जबकि इसका सबसे बड़ा खामियाजा उस वर्ग को झेलना पड़ रहा है जो सदा से स्वयं में ही संपन्न और संतुष्ट रहा है और जिसका इस कथित लोकतंत्र के दमनकारी ‘विकासपरक‘ राजनीति में कोई दखल नहीं रहा है। विकास के इस वर्तमान मॉडल ने इस वर्ग को अपनी जमीन, व्यवसाय, संस्कृति और खुशहाली से विस्थापन के सिवाय और कुछ भी नहीं दिया है।
विकास के इसी मॉडल को अपनाते हुए सिंगरौली क्षेत्र में जमीन और जंगल की जबरदस्त लूट मची है। स्थानीय मिट्टी की सम्पन्नता बड़ी देशी- विदेशी कंपनियों के लिए लालच का केंद्र बनी हुई है। 1979 में एन0टी0पी0सी0 परियोजना की शुरुआत के तत्काल बाद से इस क्षेत्र में सभी बड़े औद्योगिक घरानों का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला गया। हजारों लाखों सालों से वनों से आच्छादित इस पूरे इलाके में तमाम सरकारी गैर सरकारी सर्वेक्षणों के पश्चात जैसे-जैसे बहुमूल्य खनिज, यथा कोयला, बाक्साइट, लोहा, ताँबा, सोना, मीथेन आदि मिलते चले गए, वैसे-वैसे वनों के साथ-साथ वनवासी समाज, ‘तीसरी दुनिया‘ के तमाम संसाधन संपन्न क्षेत्रों की तरह यहाँ भी, विकास के मॉडल में एक अवरोध के बतौर देखा जाने लगा। तीन दशक पहले एन0टी0पी0सी0 परियोजना के प्रथम प्लांट के कारण जिन परिवारों का विस्थापन हुआ था, उनके साथ कई लोकलुभावन वादे किए गए थे। परिवार के एक सदस्य को नौकरी, रहने के लिए जमीन, घर बनाने के लिए जरुरी आर्थिक मदद एवं रिहाइश की नई जगह के करीब स्कूल तथा अन्य जरुरी सुविधाएँ जैसे अस्पताल, बच्चों के लिए खेल के मैदान आदि तमाम आश्वासन का सपना दिखा कर सीधे-सादे आदिवासियों से इनकी जमीनें ले ली गईं। पहले प्लांट के स्थापना के तीन दशक बाद आज भी कई परिवार ऐसे हैं जो पुनर्वास की राह देख रहे हैं। इन तीन दषकों के दौरान सरकारी और निजी कंपनियों की लाइन लग गईं और आज सिंगरौली क्षेत्र में रिलायंस और एस्सार समूह जैसी कम से कम 50 कम्पनियाँ काम कर रही हैं। इन सभी की उपस्थिति और कामकाज के जारी रहने का एकमात्र अर्थ है- निरंतर विस्थापन। ऊर्जा राजधानी के नाम से मषहूर किए गए सिंगरौली में आज सबसे बड़ा मुद्दा विस्थापन ही है। बमुश्किल 2 पीढि़यों पहले तक इस क्षेत्र के निवासियों के लिए उनकी कृषि योग्य छोटी सी जमीन ही सब कुछ हुआ करती थी। जंगल में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लिए जंगल में उत्पन्न होने वाले प्राकृतिक उत्पाद ही सुख चैन और संतुष्टि से भरी जिन्दगी के संसाधन थे। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। चिल्का डांड पंचायत के राजेश, सरकार और कंपनियों के द्वारा किए गए धोखे के बारे में बताते हैं- ‘हमें दो बार विस्थापित किया जा चुका है। सबसे पहले हम जहाँ थे वहाँ सर्वप्रथम एन0टी0पी0सी0 को कोयला मिला। उस जगह से हटा कर हमें काफी दूर बसा दिया गया। नौकरियों और अन्य तमाम वायदे किए गए और इंतजार करने को कहा गया। इसके पहले कि वायदे पूरे किए जाते, दूसरी कंपनी एन0सी0एल0 ने हमें वहाँ से भी, कोयला होने की बात कह कर, विस्थापित कर दिया। आज 15 वर्षों से हम यहाँ हैं। इन्होंने सुविधाएँ तो दूर, हमारी जिन्दगी नरक बना दी है।‘ तीन तरफ से खान और एक तरफ खान से कोयला ले जाने के लिए बिछाई गई रेल लाइन से घिरे चिल्का डांड पर एक बार फिर विस्थापन का संकट मंडरा रहा है। अब की बार गाँव वाले इकट्ठा हैं और अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने हटने से मना कर दिया है, लेकिन कंपनी ने कोयला खनन का काम भी शुरू कर दिया है। गाँव से बमुश्किल 50 मीटर की दूरी पर ब्लास्टिंग की जाती है, जिससे बडे़ बडे़ पत्त्थर और कोयले का टुकड़ा आबादी वाले क्षेत्रों में रोजाना गिरता है। दोपहर 1 बजे से 4 बजे तक वे घर के अन्दर रह कर अपनी जान तो अब तक बचाए हुए हैं, पर इतने नजदीक बडे़-बडे़ बमों से ब्लास्टिंग के कारण घरों की दीवारों में पहले ही दरारें पड़ चुकी हैं। देखना यह है, कि ब्लास्टिंग के दौरान रोजाना छिपने के लिए कब तक उनके घर बचे रहते हैं। चिल्का डांड इस किस्म का अकेला गाँव नहीं है, जो बार-बार परेशानियां झेल रहा है। कुछ ही दूरी पर बसा पेडर्वा गाँव भी इसी श्रृंखला का दूसरा नाम है, जिसे पहले ही दो बार विस्थापित किया जा चुका है।
-रवि शेखर
क्रमश:
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