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मंगलवार, 23 मार्च 2010

वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते


शहीद दिवस के अवसर पर विशेष

जिस पर अपना सर्वस्व लुटाया, जिसके खातिर प्राण दिए थे।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥
आँख सजल तुम्हारी होती, प्राणों में कटु विष घुल जाता।
पीड़ित जनता की दशा देखकर, ह्रदय विकल व्यथित हो जाता ॥
जहाँ देश के कर्णधार ही, लाशों पर रोटियाँ सेकते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
तुम जैसे वीर सपूतों ने, निज रक्त से जिसको सींचा था।
यह देश तुम्हारे लिए स्वर्ग से सुन्दर एक बगीचा था॥
अपनी आँखों के समक्ष, तुम कैसे जलता इसे देखते ।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिस स्वाधीन देश का तुमने, देखा था सुन्दर सपना।
फांसी के फंदे को चूमा था, करने को साकार कल्पना॥
उसी स्वतन्त्र देश के वासी, आज न्याय की भीख मांगते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
अपराधी, भ्रष्टों के आगे, असहाय दिख रहा न्यायतंत्र।
धनपशु, दबंगों के समक्ष, दम तोड़ रहा है लोकतंत्र।
जहाँ देश के रखवालों से, प्राण बचाते लोग घुमते॥
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद का सिंहासन, भुजबल से तोड़ गिराया था
देश के नव युवकों को तुमने, मुक्ति मार्ग दिखाया था॥
जो दीप जलाये थे तुमने, अन्याय की आंधी से बुझते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिधर देखिये उधर आज, हिंसा अपहरण घोटाला है।
अन्याय से पीड़ित जनता, भ्रष्टाचार का बोल बाला है॥
लुट रही अस्मिता चौराहे पर, भीष्म पितामह खड़े देखते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि बनकर, देश लुटेरे लूट रहे।
बंधुता, एकता, देश प्रेम के बंधन दिन-दिन टूट रहे॥
जनता के सेवक जनता का ही, आज यहाँ पर रक्त चूसते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
बंधू! आज दुर्गन्ध आ रही, सत्ता के गलियारों से।
विधान सभाएं, संसद शोभित अपराधी हत्यारों से।
आज विदेशी नहीं, स्वदेशी ही जनता को यहाँ लूटते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
पूँजीपतियों नेताओं का अब, सत्ता में गठजोड़ यहाँ।
किसके साथ माफिया कितने, लगा हुआ है होड़ यहाँ ॥
अत्याचारी अन्यायी, निर्बल जनता की खाल नोचते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
शहरों, गाँवों की गलियों में, चीखें आज सुनाई देती।
अमिट लकीरें चिंता की, माथों पर साफ़ दिखाई देती॥
घुट-घुट कर मरती अबलाओं के, प्रतिदिन यहाँ चिता जलते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
घायल राम, मूर्छित लक्ष्मण, रावण रण में हुंकार रहा।
कंस कृष्ण को, पांडवों को, दुःशासन ललकार रहा॥
जनरल डायर के वंशज, आतंक मचाते यहाँ घूमते।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥


-मोहम्मद जमील शास्त्री
( सलाहकार लोकसंघर्ष पत्रिका )
शहीद दिवस के अवसर पर भगत सिंह, राजगुरु सहदेव को लोकसंघर्ष परिवार का शत्-शत् नमन

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

बुरा मनो या भला क्या कर लोगे होली है : खूने जिगर भी बहाओ तो जानूँ


wishingfriends.com


रंगो की होली तो सब खेलते हैं।
खून जिगर भी बहाओं तो जानूँ।।
प्रेम के रंग में मन भी रंग जाए बन्धू।
कोई ऐसी होली मनाओं तो जानूँ।।
दो बदन मिलना केाई जरूरी नहीं।
दिल से दिल को मिलाओं तो जानूँ।।
ठुमरी वो फगुआ तो गाते सभी हैं।
प्रेम का गीत कोई सुनाओ तो जानूँ।।
मुहब्बत बढ़े और मिट जाए नफरत।
कोई रीति ऐसी चला तो जानूँ।।
रूला देना हँसते को है रस्में दुनिया।
रोते हुए की हँसाओ तो जानूँ।।
है आसान गुलशन को वीरान करना।
उजड़े चमन को बसाओ तो जानूँ
अपना चमन प्यारे अपना चमन है।
दिलोजान इस पर लुटाओं तो जानूँ।।
मिट जाए जिससे दिलो का अँधेरा।
कोई शम्मा ऐसी जलाओं तो जानूँ।।
ऐशो इशरत में तो साथ देती है दुनिया।
मुसीबत में भी काम आओ तो जानूँ।।
मुस्कराना तो आता है सबको खुशी में।
अश्कें गम पीके भी मुस्कराओ तो जानूँ।।
अपनों वो गैरों की खुशियों के खातिर।?
जमील अपनी हस्ती मिटाओं तो जानूँ

-मोहम्मद जमील शास्त्री

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। सभी चिट्ठाकार बंधुओं को परिवार सहित होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

सुमन
loksangharsha.blogspot.com

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

बोलो देश बंधुओं मेरे, वे कैसा गणतंत्र मनाएं........


















फल, सब्जी, शक्कर हुआ सपना, यही कमर तोड़ महंगाई में,
ईद का चाँद हुई दालें, सौ रुपया रोज कमाई में।
बच्चे रोटी दाल को तरसें, मटरफ़ली देखि ललचायें॥ बोलो देश.....
तीस साल तक लड़े मुकदमा, हत्यारे सब बरी होई गए।
टूटी थी अंधे की लाठी, गहनों, खेत मकान बिक गए।
शोक मनाये मात-पिता कि, न्यायपालिका के गुण गायें। बोलो देश..........
फर्जी मुठभेड़ों में जिनके, प्रिय जन स्वर्ग सिधार गए।
जो भ्रष्ट व्यवस्था, सत्ता के, गुंडों से लड़कर हार गए।
जो नीर अपराधीन नवजवान हिंसक आतंकी कहलाएं॥ बोलो देश.........
गुजरात, उड़ीसा, महाराष्ट्र में, जो जिन्दा ही दफ़न हो गए,
धू-धूकर जलते भवनों में, जिनके प्रिय बेकफ़न सो गए।
जो अपना सर्वस्व गवांकर, शिविरों में जिंदगी बिताएं॥ बोलो देश.......
गोदें सूनी हुई और जिन मांगों के सिन्दूर धुल गए।
भस्म हुए स्वर्णिम सपने, आँखों में बनकर अश्रु घुल गए।
रक्षक पुलिस बन गयी भक्षक, दंगाई मिलि आग लगायें ॥ बोलो देश......
गए कमाने मायानगरी, बीवी बच्चे आस लगाए,
राजठाकरे के गुंडों से, बचकर फिर न वापस आये।
मातम करें आश्रित या कि, संविधान की महिमा गाएं॥ बोलो देश......
संविधान की ऐसी की तैसी, करते गुंडे व्यभिचारी,
कर रहे कलंकित रक्षक पद, राठौर सरीखे अधिकारी।
जो स्वदेश में छिपते फिरते, कैसे मान सम्मान बचाएँ॥ बोलो देश.....
मृतक घोषित कर, वारिस बन, माफिया जमीन हथियाय रहे।
न्यायलयों में जा जाकर, मुर्दे फ़रियाद सुनाये रहे।
हम जीवित है हम जीवित हैं, वे जगह-जगह प्रमाण दिखाएं॥ बोलो देश.....
जिनके पुरखे देश के लिए, शीश कटाए रक्त बहाए।
मात्रभूमि की रक्षा हित जो, तन-मन-धन सर्वस्व लुटाये॥
झुग्गी झोपड़ियों में रहकर, घुट-घुटकर जिंदगी बिताएं॥ बोलो देश.......
काल बनी मेहँदी की लाली, दुल्हन के जोड़े कफ़न बन गए,
सेज सुहाग की चिता बन गयी, सारे सपने दफ़न हो गए।
चढ़ी दहेज़ की बलि वेदी पर, जिनकी बहन, बेटियाँ, माएं॥ बोलो देश......
फटे चीथड़ों में कितनी, माँ बहनें छिपकर लाज बचाएँ॥ बोलो देश......
आज भी लाखों नन्हे मुन्ने, रोते-रोते सो जाते हैं।
भूख कुपोषण बीमारी से, तड़प-तड़पकर मर जाते हैं॥
वे क्या जाने लोकतंत्र औ क्या गणतंत्र की महिमा गायें॥ बोलो देश.........
फटा सुथन्ना पहन के बुधुआ, झूम-झूम जन गण मन गाये।
नंग धडंग खड़ा दुवारे, घिसुआ देख-देख मुस्काये॥
छोडो अनंत कथा यह बंधू , आओ जन गण मंगल गाएँ॥
बुधुआ गाए, घिसुआ गाए, दुखना बंधुना काकी गाएँ।
नेता अभिनेता सब गाएँ, व्यभिचारी अचारी गाएँ॥
मिलावटखोर व्यापारी गाएँ, महाभ्रष्ट अधिकारी गाएँ।
चली आ रही वर्षों से, यह परंपरा हम आप निभाएं॥


मोहम्मद जमील शास्त्री

सोमवार, 25 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस पर विशेष: बोलो देश बंधुओ मेरे .......


अंधे भूखे अधनंगे जो, फुटपथों पर रात बिताएं
बोलो देश बंधुओं मेरे, वे कैसा गणतंत्र मनाएं
पेट की आग बुझाने खातिर, जो नित सुबह अँधेरे उठकर
अपना-अपना भाग बटोरते, कूड़े के ढेरों से चुनकर
गंदे नालों के तीरे जो, डेरा डाले दिवस बिताएंबोलो देश......
बिकल बिलखते भूखे बच्चे, माओं की छाती से चिपटे,
तन पर कुछ चीथड़े लपेटे, सोये झोपड़ियों में सिमटे
दीन-हीन असहाय, अभागे, ठिठुर-ठिठुर कर रात बिताएंबोलो देश..........
जिनका घर, पशुधन, फसलें, विकराल घाघरा बहा ले गयी
कोई राहत, अनुदान नहीं, चिरनिद्रा में सरकार सो गयी
सड़क किनारे तम्बू ताने, शीत लहर में जान गवाएंबोलो देश .........
वृद्ध, अपंग, निराश्रय जिनको, सूखी रोटी के लाले हैं,
उनके हिस्से के राशन में, कई अरब के घोटाले हैं
वे क्या जन गण मंगलदायक, भारत भाग्य विधाता गायेंबोलो देश......
बूँद-बूँद पानी को तरसें , झांसी की रानी की धरती
अभी विकास की बाट जोहती बुंदेले वीरों की बस्ती
जहाँ अन्नदाता किसान, मजदूर करें आत्महत्याएंबोलो देश..........
तीस साल के नवजवान जो, वृद्धावस्था पेंशन पाएं
सत्तर साल की वृद्धा, विधवा, भीख मांगकर भूख मिटायें
पेंशन मिला कौनो कारड़, रोय-रोय निज व्यथा सुनाएंबोलो देश ....
रात-दिवस निर्माण में लगे, जो श्रमिक कारखाने में
जिनकी मेहनत से निर्मित, हम सोते महल, मकानों में,
खुले गगन के नीचे खुद, सर्दी, गर्मी, बरसात बिताएंबोलो देश........
माघ-पूष में जुटे खेत में, जो नित ठण्ड शीत लहरी में,
तर-तर चुए पसीना तन से, जेठ की तपती दो पहरी में
हाड-तोड़ परिश्रम करेंमूल सूखी रोटी नमक से खाएंबोलो देश........

मोहम्मद जमील शास्त्री

सोमवार, 21 सितंबर 2009

कितना सूना जीवन-पथ है ...



तुम बिन लगता जग ही निरर्थ है।
कितना सूना जीवन-पथ है।
ये सूनी -सूनी राहें, कितनी कंटकमय लगती।
ये काली-काली रातें, काली नागिन सी डंसती॥
विह्वल मन कर रहा अनर्थ है ।
कितना सूना जीवन पथ है।
बात निहार थकी ये आँखें , आशाओं के दीप जलाये।
कितने निष्ठुर निर्मम ,निर्दय, सपनो में भी तुम न आए ॥
विरह व्यथित ह्रदय की कथा अकथ है
कितना सूना जीवन-पथ है॥
जब भी याद तुम्हारी आई नयनो में आंसू भर आए ।
अंतर्मन की व्यथा सदा ही हम अन्तर में रहे ॥
असहाय वेदना रोक रही साँसों का रथ है।
कितना सूना जीवन-पथ है॥
तुम क्या जानोगे प्रिय ! कैसे पल-पल बरसो सम बीते ।
मधुर मिलन की आशा में, मरके भी रहे हम जीते॥
आंखों में आ बस जाओ यही मनोरथ है ।
कितना सूना जीवन-पथ है॥
कितना कठोर है यह विछोह विष, प्रियवर हँस कर पीना ।
कैसे जियें बताओ अब मुश्किल है जीना ॥
जैसे सम्भव नही , शब्द के बिना अर्थ है।
कितना सूना जीवन-पथ है॥
खग कुल का यह कलरव , संध्या की सुमधुर बेला ।
सुरभि-पवन की मंद चल, मौसम अलबेला॥
सब कुछ तुम बिन लग रहा व्यर्थ है।
कितना सूना जीवन -पथ है ॥
रूठोगे न कभी ,कहा था, फिर मुझसे क्यों बिलग हो गए।
दुनिया के इस भीड़ में प्रिय! न जाने तुम कहाँ खो गए॥
मेरे मन के मीत बता दो तुमको कोटि शपथ है।
कितना सूना जीवन पथ है ॥

मोहम्मद जमील शास्त्री

सोमवार, 31 अगस्त 2009

जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही.....

जन जीवन की वहां सुरक्षा , मात्र कल्पना,
भक्षक बन गया जहाँ रक्षक ही
कहाँ मिले गंतव्य पथिक को
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही
कैसे हरा भरा उपवन हो कैसे कलि-कलि मुस्काए
कैसे कोयल मधुरस घोले कैसे कहो वसंत ऋतू आए

आग लगा दे जब उपवन का संरक्षक ही
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही

अधरों पर मुस्कान हो कैसे , कैसे मिटे दुराशा मन की
कैसे सुख और शान्ति आए , कष्ट मिटे कैसे जन-जन की

हत्यारा बन गया जहाँ पर आरक्षक ही
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही

हिंसा जहाँ पूज्य हो ,कैसे मानवता को प्राण मिले
जीवन के इस महाशिविर से बोलो कैसे त्राण मिले

अन्धकार का ग्रास बन गया जब दीपक ही
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही

कैसे फिर किलकारी गूंजे, मुरझाया चेहरा मुस्काये
भूख- प्यास- भय की तड़पन से मानव कैसे मुक्ति पाये

राज धर्म को भूल गया जब जन नायक ही
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही

मानवता का गला घोटकर लोकतंत्र की बलि चढाते
धर्म के ठेकेदार- अहिंसा के शिक्षक ही

कैसे बचे अस्मिता बोलो , कैसे जीवन ही सुरक्षित
जहाँ लुटेरे साधू वेश में धरती पर फिरते हो हुलाषित

बटमार बन गया भू का चिन्तक
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही

पग-पग पर जब जाल बिछे हो बाधिकों ने डेरे डालें हों
भेड़े वहां सुरक्षित कितनी जहाँ भेडिये रखवाले हों

कैसे पहुंचे पार डुबो दे जब खेवक ही
जब भटक गया पथ प्रदर्शक ही

-मोहम्मद जमील शास्त्री

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

ह्रदय-उपवन में एक बार ,प्रिय ! ........


युग-युग से प्यासे मन का , कुछ तो तुम प्यास बुझाते।
ह्रदय-उपवन में एक बार ,प्रिय ! अब तो जाते॥

प्रतिक्षण रही निहार, अश्रुपूरित में आँखें राहें।
मधुर मिलन को लालायित ये विह्वल व्याकुल बाहें

दुःख भरी प्रेम की नगरी में, कुछ मधुर रागिनी गाते
ह्रदय-उपवन में एक बार , प्रिय ! अब तो जाते

इस निर्जन उपवन में भी, करते कुछ रोज बसेरा
यहीं डाल देते प्रियवर ! मम उर में अपना डेरा॥

करते हम तन - मन न्योछावर ,जीवन - धन - दान लुटाते
ह्रदय - उपवन में, एक बार, प्रिय ! अब तो जाते।

सेज सजाकर तुम्हें सुलाते , निशदिन सेवा करते।
इक टक पलकें खोल, नयन भर तुमको देखा करते

निज व्यथित नयन - वारिधि में, प्रिय ! स्नान कराते
ह्रदय उपवन में एक बार , प्रिय ! अबतो जाते

अब पलक -पाँवडे राहो में , नयनो के बिछा दिए है।
पग-पग पर हमने प्राणों के, दीपक भी जला दिए है॥

शून्य - शिखर जीवन - पथ हे, मंगलमय इसे बनाते
ह्रदय - उपवन में एक बार, प्रिय! अब तो जाते

कट सकेंगी तुम बिन , जीवन की लम्बी राहें
रुक सकेंगी तुम बिन , दुःख- दर्द भरी ये आहें॥

निर्जीव व्यथित मम उर में , आशा का दीप जलाते
ह्रदय उपवन में एक बार, प्रिय ! अब तो जाते॥

खुले रहेंगे सजल नयन , तृष्णा का अंत होगा।
मधुर-मिलन जीवन , एक बार भी यदि होगा॥

विनती है यही तन-मन की, श्वासों में बस जाते।
ह्रदय-उपवन में एक बार-प्रिय ! अब तो जाते॥

-मोहम्मद जमील शास्त्री

रविवार, 23 अगस्त 2009

सरकारी गुंडन से बन्धु, बोलो कैसे जान बची॥

यह कविता मह्जाल के श्री सुरेश चिपलूनकर साहब को सादर समर्पित


असहाय गरीब मरैं भूखे, राशन कै काला बाजारी
मौज करें प्रधान माफिया , कोटेदारों अधिकारी

भष्टाचारी अपराधिन से, कइसे देश महान बची
सरकारी गुंडन से बंधू, बोलो कैसे जान बची

जब गुंडे , अपराधी, हत्यारे, देश कै नेता बनी जई हैं
भष्टाचारी बेईमान घोटाले बाज विजेता बनी जई हैं

फिर विधान मंडल संसद, कै कइसे सम्मान बची
सरकारी गुंडन से बंधू, बोलो कैसे जान बची

अब देश के अन्दर महाराष्ट्र, यूपी-बिहार कै भेदभाव
धूर्त स्वार्थी नेता करते, देशवासीयों में दुराव

कैसे फिर देश अखण्ड रही, कइसे राष्ट्रीय गान बची
सरकारी गुंडन से बंधू , बोलो कैसे जान बची

रक्षा कै जिन पर भार वही, अब भक्षक बटमार भये
का होई देश कै भइया अब, जब चोरै पहरेदार भये

कैसे बची अस्मिता जन की , कइसे आन मान बची
सरकारी गुंडन से बंधु , बोलो कैसे जान बची

देश कै न्यायधीशौ शामिल, हैं पी .एफ. घोटाले मा
नहा रहे हैं बड़े-बड़े अब, रिश्वत कै परनाले मा

जब संविधान कै रक्षक भटके, कइसै न्याय संविधान बची
सरकारी गुंडन से बन्धु, बोलो कैसे जान बची

साध्वी शंकराचार्य के, भेष में छिपे आतंकी
लेफ्टिनेंट कर्नल बनकर, विध्वंस कर रहे आतंकी

आतंकी सेना कै जवान ? फिर कैसे हिन्दुस्तान बची
सरकारी गुंडन से बन्धु ,बोलो कैसे जान बची

मठाधीश कै चोला पहिने, देश मा आग लगाय रहे
मानव समाज मा छिपे भेडिये , हिंसा कै पाठ पढाय रहे

नानक चिश्ती गौतम की धरती, कै कइसै पहचान बची
सरकारी गुंडन से बन्धु, बोलो कैसे जान बची

बलिदानी वीर जवानन कै, अब कइसै सच सपना होई
नेहरू गाँधी अशफाक सुभाष , कै कइसै पूर संकल्पना होई

नन्हे मुन्नों के होठन पर, फिर कैसे मुस्कान बची
सरकारी गुंडन से बन्धु, बोलो कैसे जान बची

मोहम्मद जमील शास्त्री

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

सरकारी गुन्ड़न से बंधू , बोलौ कैसे जान बची॥


नेता पुलिस दुऔ हत्यारे ,कैसे मान सम्मान बची।
सरकारी गुन्ड़न से बंधू, बोलौ कैसे जान बची ॥

नेता जी सत्ता के बल पर, घर औ जमीन हथियाय रहे।
जो करें शिकायत थाने पर, थानेदारो लातियाय रहे ॥

असहाय गरीब किसानन कै, अब कैसे खेत मकान बची।
सरकारी गुन्ड़न से बंधू, बोलौ कैसे जान बची ॥

अपराधी चोर लुटेरा अब, सत्ता कै दामन थाम रहे।
औ बड़े-बड़े आइ ए एस , सब उनका ठोक सलाम रहे ॥

कैसे देश की महिमा, कैसे देश कै गौरव गान बची।
सरकारी गुन्ड़न से बंधू, बोलौ कैसे जान बची ॥

जहाँ देखो ठेकेदारन कै, बस अब तौ तूती बोल रही।
माफिया कै नजर भाई टेढी , अफसरन कै कुर्सी डोल रही॥

कैसे ई दूषित समाज से, भारत कै पहिचान बची।
सरकारी गुन्ड़न से बंधू , बोलौ कैसे जान बची॥

ईमानदार अधिकारीं का सत्ता कै गुंडे डांट रहे।
भष्टाचारी अफसर नेता, सब मिलिकै बन्दर बाँट रहे॥

सीधे साँचे अधिकारिन कै , अब कैसे ईमान बची।
सरकारी गुन्ड़न से बंधू , बोलौ कैसे जान बची॥

मोहम्मद जमील शास्त्री

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