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गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

फिल्मों में गब्बर, चुनाव में मोदी

 फिल्म शोले में गब्बर सिंह की चर्चा गाँव-गाँव थी.  उसी तरह आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की चर्चा गाँव-गाँव है। गब्बर सिंह को  छोटे-बड़े की ज़बान पर ले जाने का काम फिल्म ने  किया था उसी तरह नरेंद्र मोदी की चर्चा को  इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया ने करवा  रखी है।  फिल्म शोले ने अकूत मुनाफा कमाया था उसी तरह प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस चुनाव में अकूत मुनाफा कमा रहा है।  फिल्म शोले के गब्बर सिंह का अंत अच्छा  नहीं रहा उसी तरह 16 मई को मीडिया के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हश्र होने की सम्भावना है।
          धरातल पर जो चुनाव हो रहा है उसमें  सत्तारूढ़ दल कांग्रेस व सांप्रदायिक संगठनो के विरोधी दल की स्तिथि ख़राब नजर नहीं आ रही है।  जनता में मुद्दों की चर्चा बंद हो गयी है दो दल बन गए हैं।  एक मोदी हराओ और दूसरा मोदी जिताओ।  मोदी जिताओ दल में मीडिया के पत्रकार  ज्यादातर शामिल हैं. जनता की ओर से उनको समर्थन नही मिल पा रहा है। मीडिया द्वारा तरह-तरह की अफवाहें उनके प्रधानमंत्री मोदी के समर्थन में हो रही है।  कभी समाचार यह आता है कि अमेरिका मोदी के आने से घबरा रहा है तो कभी पाकिस्तान ,  चीन भी भयाकुल है।  वस्तुस्तिथि यह है कि भाजपा के अधिकांश दिग्गज नेता अघोषित तरीके से मीडिया के
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हैं।  जिलों-जिलों से जो खबरें आ रही हैं वह भी मीडिया की बातों को असत्य ही साबित कर रही हैं।  भाजपा के नेतागण उम्मीदवार  हराओ , उम्मीदवार जिताओ के खेमे में बँट गए है। जिससे बहुत सारे प्रत्याशी चुनाव प्रबंधन में कमजोर हो रहे हैं। आज नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से अपना नामांकन पत्र दाखिल किया जिसमें पार्टी के बड़े नेता शामिल नही हुए और वाराणसी के अगल-बगल के जिलों के कार्यकर्ताओं को जुटाकर भीड़ प्रदर्शित की गयी थी। कुल मिलाकर स्तिथि यह होनी है कि माया मिली न राम।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

तो यह थी उनकी मजबूत सरकार!

इन दिनों नरेंद्र मोदी से लेकर उनके आगे-पीछे चलने वाले बी.जे.पी. नेता यह कहते नहीं अघाते कि वह देश को मजबूत सरकार देंगे, राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी करेंगे और न जाने क्या-क्या करेंगे। उन्हें गलतफहमी है कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है।
    एन.डी.ए. की सरकार में कैसे-कैसे समझौते हुए और देश की इज्जत को बट्टा लगा, इसकी कई मिसालें हैं। फिलहाल सबसे शर्मनाक घटना का उल्लेख।
    दिसंबर 1999 में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी भारतीय यात्री विमान का अपहरण
कर कंधार ले गए थे। सक्षम और दृढ़ संकल्प सरकार अमृतसर हवाई अड्डे पर अपहृत विमान का रास्ता अवरुद्ध कर सकती थी। वीरोचित मुद्राएँ दिखाने वालों को कुछ नहीं सूझा। विमान के कंधार पहुँच जाने के बाद तो वीरों के हाथ-पैर फूल गए। मोदी और अन्य नेता कांग्रेस का मजाक यह कह कर उड़ाते हैं कि अजमल कसाब को बिरियानी खिलाई गई। दुष्प्रचार तो दुष्प्रचार ही ठहरा। उन्हें कौन बताए कि खाना-पीना जेल मैनुअल के हिसाब से होता है। काला सच यह है कि भाजपा के विदेशमंत्री जसवंत सिंह तीन कुख्यात आतंकवादियों को साथ लेकर
कंधार गए होंगे और उनका खाना-पीना जेल मैनुअल देख कर नहीं हुआ था।
    छोटे सरदार (अब पूर्व छोटे सरदार कहें, क्योंकि वर्तमान छोटे सरदार तो मोदी हैं) यानी तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और कंधार गए विदेशमंत्री जसवंत सिंह सत्ता से हटने के बाद मोटी-मोटी किताबें लिख चुके हैं। लेकिन ईमानदारी से यह नहीं बताया कि पर्दे के पीछे हुआ क्या था। आडवाणी और जसवंत कई इंटरव्यू भी दे चुके हैं। फिर भी सच सामने नहीं आया है। जसवंत का कहना है, ‘‘मैं रहस्योद्घाटन नहीं कर सकता। वक्त आने पर करूँगा।’’ यह मान कर चलते हैं कि बाद में भारत पर आतंक का कहर बरपा करने वाले तीन आतंकवादियों की रिहाई का फैसला सारे वीरों का सामूहिक फैसला था।
    बस एक शख्स ने आतंकवादियों की रिहाई का कड़ा विरोध किया था। संघ परिवारियों को सुन कर अच्छा नहीं लगेगा, क्योंकि वह संविधान के अनुच्छेद 370 की स्थाई उपस्थिति पर कोई समझौता नहीं कर सकता और मुसलमान भी है। इस समय केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला उस समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। बकौल फारूक, ‘‘मैंने आडवाणी को फोन करके कहा था कि हम मसूद अजहर और मुश्ताक जरगर जैसे आतंकवादियों को रिहा नहीं कर सकते, उन पर कोर्ट में केस चल रहे हैं। इसलिए रिहा नहीं किया जा सकता।
    आडवाणी ने जवाब दिया कि यह केंद्रीय कैबिनेट का फैसला है, आप मदद करें। ‘‘यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि फारूक ने किन परिस्थितियों में आडवाणी को फोन किया था। फारूक के अनुसार उस समय जम्मू में उनके राजकीय आवास पर ‘‘राॅ’’ के चीफ ए.एस. दुलात के नेतृत्व में एजेंसी की टीम पहुँच चुकी थी। अर्थात, आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले राज्य के मुख्यमंत्री से सलाह-मशविरा किए बगैर कश्मीर की जेल में बंद (तीसरा शेख उमर शेख दिल्ली की तिहाड़ जेल में था ) दो आतंकवादियों की रिहाई का फैसला कर लिया गया था। आडवाणी, जसवंत या एन.डी.ए. सरकार के किसी भी मंत्री ने आज तक फारूक के बयान का खंडन नहीं किया है। 
     एक मिसाल, देखें कांग्रेस आतंकवाद से कैसे निपटती है। 1984 में कांग्रेस की सरकार थी। प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकवादियों ने बर्मिंघम (ब्रिटेन) में भारतीय राजनयिक रवींद्र हरेश्वर म्हात्रे का अपहरण कर हत्या कर दी। वह तिहाड़ जेल में बंद लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट की रिहाई की माँग कर रहे थे। अपहरण के तीसरे दिन म्हात्रे का शव बरामद हुआ। इसके बाद तिहाड़ जेल में ही भट को फाँसी दे दी गई। एन.डी.ए. के शासन में राष्ट्रीय सुरक्षा में ढिलाई और कांग्रेसी शासन में राष्ट्रीय हितों पर अडिग रहने और समझौतावादी नीति न अपनाने के अनेक उदाहरण हैं ,जिनके बारे में फिर। 

        -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

बुधवार, 26 मार्च 2014

सत्ता पाने के लिए शीर्षासन

आरएसएस के अनुवांशिक संगठन भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है।  इसके लिए कॉर्पोरेट सेक्टर द्वारा जनित चेहरा नरेंद्र मोदी का है।  नरेंद्र मोदी ने कॉर्पोरेट सेक्टर के इशारे पर भाजपा के पुराने नेताओं को अप्रासंगिक घोषित कर उनको अलग थलग करने का कार्य बड़ी तेजी से किया है। इसमें काफी हद तक उन्हें सफलता भी मिली है। लाल कृष्ण अडवाणी को अपनी मनचाही सीट से लड़ने नहीं दिया तो जसवंत सिंह जैसे नेताओं को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ने के लिए मजबूर कर दिया।  लाल जी टंडन, केसरीनाथ त्रिपाठी, कल्याण सिंह जैसे सैकड़ों दिग्गज नेताओं को चुनाव मैदान से बाहर कर दिया है।  टिकट वितरण में रुपया, गुटबाजी, जिस्मफरोशीका भी योगदान रहा है।  जिसका एक उद्धरण यह भी है टिकट के लिए भाजपा नेता ने अपनी बेटी को बेचा, दामाद ने की हत्या
दिल्ली के निकट साहिबाबाद में भाजपा नेता धर्मवीर चौधरी की उन्हीं के दामाद ने गोली मारकर हत्या कर दी। गिरफ्तार आरोपी ने बताया कि मृत नेता अपनी बेटी को दूसरे नेताओं के साथ सोने के लिए मजबूर करते थे। साहिबाबाद के रहने वाले धर्मवीर चौधरी पार्टी के वार्ड अध्यक्ष भी थे।
उन्हें गोली मारने के बाद दामाद सुनील ने साहिबाबाद थाने में जाकर सरेंडर कर दिया। आरोपी ने बताया कि उसकी शादी 18 साल पहले मृत नेता की बेटी से हुई थी। लेकिन पिछले 8 महीने से मेरी बीवी मेरे साथ ना रहकर अपने पिता के घर में रहने लगी थी। पिता ने मेरी पत्नी को जबरदस्ती अपने घर में रखा हुआ था। वह पार्टी की ओर से टिकट पाने के लालच में नेताओं को अपनी बेटी और मेरी पत्नी को उनके घरों में गंदे काम के लिए भेजा करता था।
इलाके में रसूख होने के कारण कोई इससे उलझना नहीं चाहता था। मैं अपने ससुर की इन हरकतों से बहुत परेशान हो गया था, इस कारण आज मैंने उसे गोली मार दी। पुलिस ने बताया कि सुनील की 4 लड़कियां और 2 लड़के हैं। 
इस तरह के कितने उदहारण मिल सकते हैं यह जांच का विषय है। वहीँ पर भाजपा ने अपने पुरानी पीढ़ी के नेताओं को बेइज्जत कर वाणी से पूरी तरह पंगु बना दिया है।  वहीँ, सत्तारूढ़ दल के पुराने नेताओं को राजनितिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना प्रारम्भ किया है।  स्वप्नदर्शी नेहरू को इस वजह से भी बदनाम किया जा रहा है कि उनसे जुड़े हुए लोग सत्ता पर काबिज हैं।  दूसरे के पितामह को अपना पितामह घोषित करना और अपने पितामह को बेइज्जत करना इस चुनाव की मुख्य विशेषता भी है। जनसत्ता ने लिखा है "आज देश में संघ परिवार और उसके ‘शो ब्वॉय’ नरेंद्र मोदी, सरदार पटेल के कंधे का इस्तेमाल करते हुए नेहरू के चरित्र पर अवांछित हमले कर रहे हैं। उनकी राय में जवाहरलाल ने लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को भारतीय संविधान में गूंथ कर कोई अपराध कर दिया है। यह संयोग है कि नेहरू के उत्तराधिकारी लगातार भारतीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं। जिस विचारधारा ने आजादी की लड़ाई में खुद को महफूज रखा, वह इस बात से खौफजदा है कि नेहरू-गांधी परिवार राजनीति के शिखर पर कब तक काबिज रहेगा। इसलिए उसने कांग्रेस के सभी हिंदुत्व समर्थक नेताओं को अपने पूर्वज होने का प्रमाणपत्र जारी कर दिया है "
  यह सब इसलिए हो रहा है कि गुजरात में टाटा से लेकर सभी प्रमुख उद्योगपतियों को एक तरह से निशुल्क जमीन दी गयी है।  प्राकृतिक सम्पदाओं को उपहार स्वरूप सौंपा गया है।  बैंक ऋण एक तरह से ब्याज मुक्त है इसलिए उस लाभ को पूरे देश में प्राप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी को मीडिया द्वारा प्रचारित किया जा रहा है कि वह विकास पुरुष हैं और एक मिथ्या लहर कि बात कही जा रही है।  हाँ यह जरूर है कि मीडिया एक सम्मोहन की स्तिथि पैदा कर रही है कि मत देने तक मतदाता भ्रमित रहे। और उस भ्रम का लाभ नरेंद्र मोदी को हो और पूरे देश में कॉर्पोरेट सेक्टर को मुक्त लूट का अवसर मिल सके। 

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 
 

रविवार, 3 नवंबर 2013

नरेंद्र मोदी इस लायक नहीं हैं की उन्हें हिंदुस्तान का वजीरे आलम बनाया जाए

सभी अमेरिकी हिन्दुस्तानियों का कहना था कि नरेंद्र मोदी इस लायक नहीं हैं की उन्हें हिंदुस्तान का वजीरे आलम बनाया जाए यह बात अमेरिका में एक जलसे को खिताब करते हुए  संसद सदस्य मोहम्मद अदीब से हिंदुस्तानी अमेरिकियों ने कहा।
                          भाजपा से वजीर-ए-आजम के उम्मीदवार व गुजरात ले वजीरे आला नरेंद्र मोदी के खिलाफ मजबूती से आवाज बुलंद करने वाले संसद सदस्य मोहम्मद अदीब ने अमेरिका में रहने वाले हिन्दुस्तानियों से खिताब करते हुए उन्हें यकीन दिलाया कि हिंदुस्तान एक सेक्युलर और जम्हूरी मुल्क है।  जहाँ फिरका परस्तों के लिए कोई जगह नहीं है. लिहाजा हम हिंदुस्तान के सेक्युलर अवाम कि तरफ से यह यकीन दिलाते हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी को शिकस्त होगी और मुल्क में सेक्युलर नजरिये की हुकूमत कायम होगी। ख्याल रहे कि मोहम्मद अदीब 20 अक्टूबर से 15 दिनों के लिए अमेरिकी दौरे पर हैं। और वह 5 नवंबर को वतन वापस लौटेंगे वह हिंदुस्तानी नुमाइंदे की हैसियत से संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली में शिरकत के लिए गए हैं।
जनरल असेंबली के अपने खिताब में क्यूबा के ऊपर लगायी गयी पाबन्दी का पुरजोर मुतालबा किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के अलावा कई बड़े जलसों में शिरकत की और उन्होंने कहा कि अमेरिका में रहने वाले हिन्दुस्तानियों को इस बात की फ़िक्र हैं कि नरेंद्र मोदी जैसे शख्स को हिंदुस्तान की जिम्मेदारी सौंप दी गयी तो इस सेक्युलर मुल्क का क्या होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी हिन्दुस्तानियों का यह मानना है कि सेक्युलर नजरिया रखने वाले लोगों को बहुत सोच समझ कर फैसला करना चाहिए।
                  संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली से मुखातिब हुए उन्होंने कहा कि क्यूबा पर अमेरिका ने ईरान कि ही तर्ज पर गुजिस्ता 21 वर्षों से आर्थिक पाबन्दी लगा राखी है जिसकी वजह से वहाँ कि अर्थ व्यवस्था के हालात बदतर हैं। अदीब ने कहा की अमेरिका कि तरफ से आयत की गयी पाबन्दी बेबुनियाद  व गलत है लिहाजा उसे ख़त्म किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ के खिताब के बाद उन्होंने अमेरिकी हिन्दुस्तानियों के जरिये डेल्स मुशिगन व नॉर्थ रेले में कई जलसों को खिताब किया। इसी क्रम में न्यू जर्सी व बाल्टीमोर में कई जलसों में भी    शिरकत की।

स्रोत्र :
इंक़लाब

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

नरेंद्र मोदी अकेला फेंकू नहीं है

अगले आम चुनाव में करीब आठ महीने रह गए हैं। अभी 11 नवंबर और 4 दिसंबर के बीच देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। लोकतंत्र के नाते ऐसे में जरूरी है देश के सामने दरपेश समस्याओं और चुनौतियों पर गंभीर राजनीतिक बहस हो। बहस के केंद्र में ऐसे विचार, नीतियां और कार्यक्रम हों जिनसे विशोषकर देश की मेहनतकश जनता, जो थोड़ेसे उच्च और उच्च मध्यवर्ग को छोड़कर देश की अधिकांश आबादी है और गरीब है, का जीवन जल्द से जल्द सुखसुविधापूर्ण हो; वह शिक्षित, स्वस्थ, सुरक्षित और स्वाभिमानी बने; और उसके संविधानप्रदत्त अधिकार सहजता से उपलब्ध हों। आजादी के बाद करीब सात दशकों में यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है, बहस में इसकी ईमानदारी से गहरी जांचपड़ताल हो, ताकि लक्ष्य जल्द से जल्द हासिल किया जा सके।
गंभीर बहस की जिम्मेदारी मुख्यतः राजनीतिक पार्टियों, बुद्धिजीवियों और सचेत नागरिक समाज की बनती है। इनके द्वारा की जाने वाली बहस का प्रभाव सामान्य जनता पर होता है और वह उसमें अपने स्तर से हिस्सेदारी और योगदान करती है। प्रबुद्ध वर्ग और सामान्य जनता के सम्मिलित विमशर से चुनाव में अच्छी बहस का माहौल बन सकता है, जिसमें से नए विचार और समाधान निकल कर आ सकते हैं। भारत की राजनीति में, खास कर चुनावों के वक्त, जब तक यह होता रहा, नीतिनिर्धारण का काम कुछ हद तक संविधान के नीतिनिर्देशक तत्वों की रोशनी में होता रहा। उस दौर में कोई भी पार्टी या नेता जनता और उसके हित के मुद्दों को छोड़ कर कारपोरेट घरानों की चापलूसी और ताबेदारी की वैसी हिम्मत नहीें दिखा सकता था जो आज दिखई जा रही है।
नवउदारवादी दौर में भारत की राजनीति भारत के संविधान के निर्देशानुसार भारत की मेहनतकश जनता के लिए नहीं चलाई जा रही है। इस सच्चाई को छिपाने के लिए गंभीर और टिकाऊ बहस की जगह उत्तरोत्तर थोथी बहस ने ले ली है। मुख्यधारा प्रिंट और इलैक्टॉनिक मीडिया दोनों में यह देखा जा सकता है। इस बार 2009 के आमचुनाव के समय की बहस से भी स्तर काफी नीचे चला गया है। इस बार नीतियों की नहीं, केवल नामों को लेकर ॔बहस’ चल रही है। ॔कलियुग केवल नाम अधारा’ की टेक पर कांग्रेस और भाजपा ने अगला चुनाव जीतने का मंसूबा बांधा है। ज्यादातर नागरिक समाज उनके तय किए गए नामों तक राजनीतिक बहस को सीमित किए हुए है।
हम लोगों ने जेपी की पुण्यतिथि 8 अक्तूबर से लेकर उनकी जयंती 11 अक्तूबर तक आयोजित सोशलिस्ट पार्टी के ॔समाजवाद लाओपूंजीवाद हराओ’ अभियान के तहत दिल्ली के कुछ इलाकों में 11 सूत्री परचा बांटा और नुक्कड़ सभाएं की। हमारा मकसद आने वाले आम चुनाव में कारपोरेट पूंजीवाद और उसकी एजेंट सरकारों और राजनीति के बरक्स समाजवादी विचारों पर बहस छेड़ने का था। रिक्शा वालों और रेहड़ीपटरी-खोका वालों ने परचा उत्साह से लिया और उसे तुरंत पॄा। लेकिन सुबह पाकोर्ं में हवाखोरी करने वाले शहरियों में कई ने हमारी कवायद की उपेक्षा करते हुए कहा कि यह सब छोड़ो, मोदी को लाओ; वह सब कुछ ठीक कर देगे। परचे की सामग्री पॄना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा। कांग्रेस ॔सोनिया मैया’ और ॔राहुल भैया’ का नाम भजने में लगी रहती है और चाहती है कि बाकी लोग भी वैसा ही करें। कांग्रेसभाजपा की राजनीति के साथ संगत करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों में भी एक ही व्यक्ति/परिवार का नाम चलता है।
कांग्रेस और भाजपा के भीतर से निकल कर उन्हीं के नक्शोकदम पर चलने वाली आम आदमी पार्टी (आप) में भी एक के अलावा दूसरा नाम नहीं है। सामंती संस्कारों पर पलने वाली भारत की कारपोरेट पॉलिटिक्स में कांग्रेस भाजपा से आगे निकलने की हड़बड़ी में आम आदमी के नाम पर जमा हुए लोगों ने नीति की जगह नाम की महिमा को अच्छी तरह पहचान लिया है। भारत में नाम की महिमा पुरानी और खासी रही है जो धर्म से निकल कर समाज को अपनी गिरफ्त में लेते हुए राजनीति में गहरी जड़ जमा चुकी है। ध्यान दिया जा सकता है पिछले दिनों हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में अन्ना नाम की कैसी पुकार मची थी। उसी आंदोलन से यह पार्टी निकल कर आई है और अन्ना उसके साथ नहीं आए तो अन्ना को लाने वाले का नाम आगे किया गया है।
एक मायने में इस पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा को भी पीछे छोड़ दिया है। उसने चुनाव के कई महीने पहले पोस्टरों और होडिरंगों पर प्रचार कर दिया कि दिल्ली के मतदाताओं ने उनके नेता को भारी बहुमत से मुख्यमंत्री चुन लिया है। चुनाव की घोषणा नहीं हुई थी, अधिसूचना तो अभी तक जारी नहीं हुई है; अन्य पार्टियों की बात छोड़िये, खुद ॔भावी मुख्यमंत्री’ की पार्टी का एक भी विधानसभा क्षेत्र से एक भी उम्मीदवार घोषित नहीं हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री चुन लिए जाने का फतवा जारी कर दिया गया। इसकी परवाह किए बगैर कि लोकतंत्र और दिल्ली के मतदाताओं की इससे ज्यादा तौहीन नहीं हो सकती। मजेदारी यह कि भाजपा ने अब जाकर अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया है। लेकिन आप ने भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष को बतौर मुख्यमंत्री ॔आप’ और कांग्रेस से फिसड्डी घोषित कर दिया। कांग्रेस ने भी अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा आज तक नहीं की है। ॔आप’ के सर्वेशूरवीरों ने वर्तमान मुख्यमंत्री को कांग्रेस की अगली मुख्यमंत्री घोषित करके उन्हें करारी शिकस्त दे दी। बतौर मुख्यमंत्री ही नहीं, बतौर विधायक भी।
यह हमारे दौर का बड़ा विद्रूप है कि लोकतंत्र के इस उपहास को मुख्यधारा मीडिया दिनरात ॔गंभीरतापूर्वक’ परोस रहा है। हिंदी के एक लेखकबुद्धिजीवी ने ॔आप’ को बुद्धिजीवियों की शरणस्थली बताते हुए अफसोस जाहिर किया है कि दो नाम यानी अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल मिल कर चलते तो व्यवस्था बदल जाती। पता नहीं क्यों उन्होंने रामदेव का नाम छोड़ दिया, दोनों जिनके साथ मिल कर व्यवस्था परिवर्तन कर रहे थे? विश्व बैंक और फोर्ड फाऊंडेशन से धन लेकर ॔मेरा गांव मेरा देश’ की सेवा करने वालों को उन्होंने गांधी, जेपी, लोहिया और नेहरू जी के समकक्ष बिठा दिया है। बेहतर होता इस नामावली में भगत सिंह और बाबा साहब को भी शामिल कर लेते।
पिछले दो साल से यह लगातार हो रहा है कि आजादी के महान सेनानियों और विश्व स्तरीय चिंतको को अनर्गल ंग से नवउदारवाद के एजेंटों के साथ घसीटा जा रहा है। यह शायद ही कोई स्वीकार करे कि ये स्वतंत्रता सेनानी और चिंतक इन स्वनामधन्यों जैसे ही ॔देशभक्त’ थे। दरअसल, इन फर्जी देशभक्तों के नाम को ऊंचा उठाने के लिए देश के मूर्द्धन्य नेताओं को सस्ता बनाया जा रहा है। हमें बताया गया कि एक टीवी चैनल की ॔बहस’ में हिंदी के एक अखबार के संपादक ने ॔आप’ की आलोचना करने के लिए हम पर परोक्ष कटाक्ष किया। नाम शायद उन्होंने इसलिए नहीं लिया बड़े नामों के बीच छोटा नाम नहीं आना चाहिए। ऐसे लोगों का तर्क है कि ॔आप’ के नेता फलां तारीख तक विदेशी फंडिंग लेते थे, उसके बाद लेना बंद कर दिया है। यानी, नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली है! जहिर है, ॔आप’ के ये समर्थक पिछली फंडिंग की बात करके अभी की विदेशी फंडिंग और चुनाव क्षेत्रों को अनिवासी भारतीयों द्वारा गोद लेने के ॔प्रयोग’ से जनता का ध्यान हटाना और उसका औचित्य प्रतिपादन करना चाहते हैं।
॔आप’ द्वारा चुनाव के लिए विदेशों से धन लेने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक वकील की जनहित याचिका स्वीकार कर सरकार को जांच के आदेश दिए हैं। एक अन्य वकील ने गृह सचिव और मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रतिवेदन देकर अविलंब जांच और कार्रवाई की मांग की है। लेकिन यह चर्चा मीडिया में जोर नहीं पकड़ती। जोर पकड़ेगी तो कांग्रेसभाजपा से परेशान लोग ॔आप’ के बजाय अन्य पार्टियों की तरफ रुख कर सकते हैं जिनमें कुछ अभी भी समाजवाद/सामाजिक न्याय की बात करती हैं। कुछ छोटी पार्टियां भी देश में हैं जो जड़मूल से कारपोरेट पूंजीवाद का विरोध करती हैं और समाजवादी व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध हैं।
॔बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा’ सत्ता में हिस्सेदारी का यह नवउदारवादी नुस्खा, जिसे आत्मसात करने में कांग्रेसभाजपा और क्षेत्रीय क्षत्रपों को काफी लंबा समय लगा, ॔आप’ और उसके समर्थकों ने घुट्टी में ही पी लिया है। हमने कुछ साल पहले ॔युवा संवाद’ में लिखा था कि नवउदारवाद के दौर में निर्लज्जता ही उसके समर्थकों का आभूषण बन गई है। सत्ता की चादर समस्त निर्लज्जताओं को ंक देती हैं कारपोरेट राजनीति का यह मूल पाठ अच्छी तरह पॄ कर ॔आप’ ने राजनीति की शुरुआत की है। ॔आप’ का बड़बोलापन भी गौर करने लायक है। डरा हुआ आदमी ज्यादा जोर से हनुमान चालीसा पॄता है। ॔आप’ और उसके मुख्यमंत्री को इतने प्रतिशत वोट मिले हैं, ॔आप’ बहुमत की सरकार बनाएगी, रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण का जलसा होगा, वहीं जनलोकपाल बना दिया जाएगा, उसी दिन से देश से भ्रष्टाचार का बीजनाश हो जाएगा ये सब डरे हुए मन की आवाजें हैं। एनजीओ चलाने वाले जब राजनीति चलाने का काम करेंगे तो शुरू में उनका डरना स्वाभाविक है। हारने पर ॔घर के रहेंगे न घाट के’!
नरेंद्र मोदी को कांग्रेस के एक नेता ने ठीक ही ॔फेंकू’ नाम दिया है जो चल निकला है। लेकिन नरेंद्र मोदी अकेला फेंकू नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर जंतरमंतर और फिर रामलीला मैदान पर जुटे एक से एक फेंकुओं को याद किया जा सकता है। उन्होंने न केवल दूसरी, बल्कि किसी तीसरी आजादी को भी एक डग में नाप लिया था! आजादी और क्रांति आंधी के आमों से भी सस्ते शब्द हो गए थे। कहने का आश्य यह है कि नरेंद्र मोदी और नामीगिरामी लोगों की आनुवंशिकी एक ही है।
नवउदारवादी बहस में तैरने वाले ये सभी नाम, जाहिर है, नवउदारवादी नीतियों के समर्थक हैं, जो ऊपर से बन कर आती हैं। पार्टियां ओर उनके नेताओं के नाम भले अलगअलग हों, वर्गस्वार्थ सबका एक है। भारत की मुख्यधारा राजनीति में वर्गस्वार्थ की प्रबलता का यह प्रमाण है। और साथ ही इस बात की गारंटी कि इनके चलते देश की मेहनतकश जनता को, समाजवादी क्रांति तो दूर की कौड़ी है, कभी उसका संवैधानिक देय भी नहीं मिल सकता। यह तर्क, जो ॔आप’ के समर्थकों ने चलाया हुआ है, कि किसी भी तरह कांगेस भाजपा से निजात मिले, दरअसल, कारपारेट पूंजीवाद के विरोध की राजनीति से निजात पाने का तर्क है। वर्ग स्वार्थ की इस ताकत को तोड़ने के लिए समाजवाद के समर्थकों को और ज्यादा प्रतिबद्धता के साथ गंभीर बहस और संघर्ष चलाने की जरूरत है। पूंजीवादी बर्बरता से बचने का यही रास्ता है।
-प्रेम सिंह



गुरुवार, 5 सितंबर 2013

देश में लूट-खसोट कायम रखने के लिए है फर्जी आतंकवाद


    देश में फर्जी आतंकवाद के नाम पर की गई हत्याओं में गुजरात के गृहमंत्री अमित शाह के साथ राजस्थान के पूर्व गृहमंत्री गुलाब चन्द्र कटारिया का भी नाम आया। इंटलीजेंस ब्यूरो के अधिकारी राजेन्द्र कुमार ने फर्जी सूचनाएँ तैयार कीं तथा हिन्दुत्ववादी नेताओं के इशारे पर गुजरात के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों ने एनकाउन्टर के नाम पर हत्याएँ कीं। हद यहाँ तक हो गई कि इशरत जहाँ के एन्काउन्टर को सही साबित करने के लिए इंटलीजेंस ब्यूरो के अधिकारी राजेन्द्र कुमार ने ए.के.-47 पुलिस अधिकारियों को उपलब्ध कर्राइं। वर्तमान में गुजरात के अपर पुलिस महानिदेशक पृथ्वी पाल पाण्डेय को उच्चतम न्यायालय से भी कोई रिलीफ नहीं मिली, अन्त में उन्हें जेल जाना पड़ा। गुजरात में डी.जी. बंजारा समेत कई पुलिस अधिकारी कई वर्षों से जेलों में हंै। वहीं भारत सरकार के अण्डर सेक्रेटरी आर.वी.एस. मणि ने एक बयान में यह कहकर कि मुम्बई आतंकी घटना व संसद हमले में सरकार भी शामिल थी, देश में फैले कथित आतंकवाद की पोल खोल दी। आई.एस.आई. आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान में बम धमाके करने लगती है, उसी की नकल इस देश में भी जारी है।
    नौ साल पहले अहमदाबाद के कोतरपुर में चार लोगों की लाष के साथ पुलिस सामने आई। बताया गया ये चारो आतंकी थे, जो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारना चाहते थे। इन चार लोगों  में एक 19 साल की युवती भी थी इषरत।
    पुलिस की कहानी को गुजरात हाईकोर्ट ने फर्जी करार दिया है। सी.बी.आई. जाँच चल रही है। गुजरात में हुआ यह एक एनकाउंटर नहीं है, जिसे फर्जी बताया गया हो। इसके साथ ही राजस्थान के सोहराबुद्दीन, तुलसी प्रजापति के एनकाउंटर भी फर्जी बताए जा रहे हैं। सोहराबुद्दीन एकाउंटर में राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाबचंद्र कटारिया, गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह और कई बड़े पुलिस अधिकारी आरोपी बनाए गए हैं।
    सोहराबुद्दीन की पत्नी बताई जाने वाली कौसर बी की कहानी तो और भी खौफनाक है। कौसर बी के साथ पुलिस वालों ने पहले बलात्कार किया। उसके बाद जब उसने पुलिस को बेनकाब करने की बात कही तो उसे पुलिस वालों ने बड़ी ही बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया।
    सी.बी.आई. के अनुसार सोहराबुद्दीन के फर्जी एनकाउंटर के अलावा गुजरात के गृह राज्यमंत्री अमित शाह उसकी पत्नी कौसर बी की हत्या के इल्जाम में गले तक फँसे हैं। इस मामले के चलते शाह अपना मंत्री पद गँवा चुके हैं। उन्हें जेल भी जाना पड़ा है। फिलहाल, वह जमानत पर हैं।
    इषरत जहाँ फर्जी एनकाउंटर के करीब एक साल बाद 22 नवंबर, 2005 को कौसर बी, उसका पति सोहराबुद्दीन और दोस्त तुलसी प्रजापति आंध्र प्रदेष की एस.आर.टी.सी. की बस से आ रहे थे, अचानक साँगली के करीब बस के आगे पुलिस की गाड़ी आ गई। सोहराबुद्दीन और कौसर बी कुछ समझ पाते, इससे पहले बस के अंदर गुजरात ए.टी.एस. और राजस्थान पुलिस की टीम घुसी।
       उसने कौसर, उसके पति सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति को कब्जे में लिया और टोयटा क्वालिस, जिसका नंबर हर-25-7007 था, उसमें बिठा लिया। अब क्वालिस गुजरात की तरफ चल पड़ी। पुलिस इन्हें पकड़ कर गांधीनगर के बाहरी इलाके जमीयतपुरा के एक फार्म हाउस में ले लाई।
26 नवंबर, 2005 को कौसर बी के पति सोहराबुद्दीन को उससे अलग कर दिया गया। पुलिस वाले सोहराबुद्दीन को लेकर कहीं और चले गए। उसी दिन सोहराबुद्दीन को फर्जी मुठभेड़ में कत्ल कर दिया गया। अब क्या होगा कौसर बी का। पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था।
    सी.बी.आई. को दर्ज कराए गए कुछ पुलिस वालों के बयानों की माने तो कौसर बी को लेकर ए.टी.एस. के डी.आई.जी. डी.जी. वंजारा निष्चिंत थे। लेकिन अचानक एक फोन कॉल ने डीजी वंजारा के होष उड़ा दिए।
    ये फोन था गुजरात के गृह राज्य मंत्री अमित शाह का। अमित शाह ने वंजारा से कहा कि कौसर बी का जिंदा रहना बेहद खतरनाक है। उसे ऐसे ठिकाने लगाया जाए कि उसकी लाष तक न मिले।
    इस एक फोन कॉल ने कौसर बी का भविष्य तय कर दिया। इसके बाद कौसर बी को अरहाम फॉर्म पर 28 नवंबर की आधी रात को जहर का इंजेक्षन दिया गया। कौसर बी की हत्या में डिप्टी एस.पी. एन.के. अमीन का बड़ा हाथ है। अमीन को ही यह जिम्मेदारी मिली थी कि कौसर बी को खत्म करें और उसकी लाष ठिकाने लगाएँ।
      फर्जी मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन के मारे जाने के एक दिन बाद उनकी पत्नी कौसर बी के साथ एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (ए.टी.एस.) के एक पुलिसकर्मी ने बलात्कार किया था। बलात्कार के बाद वह बहुत जोर से चिल्लाते हुए पुलिस वालों को बेनकाब करने की धमकी देने लगी।
         सब इंस्पेक्टर रैंक का यह पुलिसकर्मी अहमदाबाद के बाहरी इलाके में स्थित कोबा के अरहाम बंगले की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था। यह बंगला बी.जे.पी. कॉरपोरेटर सुरेंद्र जीरावाला का है। पुलिस का मानना है कि कौसर बी को बंगले में उस समय लाया गया, जब सोहराबुद्दीन को पुलिस एन्काउंटर के लिए विषाल सर्किल ले जा चुकी थी।
    घटना के बारे में बताते हुए सूत्रों ने कहा कि कौसर बी के लगातार शोर मचाने से ही आई.पी.एस. ऑफीसर डीजी वंजारा और राजकुमार पांड्या वहाँ पहुँचे।
    बलात्कार करने वाले पुलिसकर्मी को थप्पड़ लगाने के बाद वे दोनों कौसर बी को चुप कराने की कोषिषों में लग गए। इसके बाद ही मेहसाना के एक डॉक्टर की मदद से कौसर बी को ज़हर दिया गया।
    कौसर बी की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने उनकी डेड बॉडी को जलाने के लिए साबरमती के भगवती टिंबर मार्ट से 400 किग्रा. लकड़ी का इंतजाम किया। लकड़ी ला रहे ट्रक के बीच रास्ते में फँस जाने पर उसे निकालने के लिए क्रेन की मदद भी ली गई। ट्रक और क्रेन पहले ही बरामद किए जा चुके हैं।
      राजस्थान के पूर्व गृहमंत्री और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया की मुष्किलें और बढ़ सकती हैं। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर में आरोपी बनाने के बाद अब सी.बी.आई. ने तुलसी प्रजापति एनकाउंटर में भी उनकी भूमिका की जाँच शुरू कर दी है। जाँच एजेंसी के अनुसार इस मामले में गांधीनगर में कटारिया से एक बार पूछताछ हो चुकी है।
    तुलसी प्रजापति का एनकाउंटर दिसंबर 2006 में उत्तर गुजरात के अंबाजी के पास हुआ था। उस समय कटारिया राजस्थान के गृहमंत्री थे। तुलसी सोहराबुद्दीन का विष्वस्त था। सी.बी.आई. का मानना है कि संभव है कि तुलसी एनकाउंटर की भी जानकारी कटारिया को रही हो।
      उन पर कत्ल, अपहरण, सबूत मिटाने, साजिष जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। सवाल यह कि आखिर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस है क्या? दरअसल यह केस किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। इसमें खाकी, खादी, माफिया और गुंडों का ऐसा गठजोड़ है जिसने मिलकर एक गहरी साजिष रची। सी.बी.आई. इस साजिष की तह तक पहुँच चुकी है।
     26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद सर्किल और विषाला सर्किल के टोल प्वाइंट पर हुई सोहराबुद्दीन की हत्या। सुबह तड़के 4 बजे इस सड़क पर अचानक कई चेहरे प्रकट हुए। गुजरात ए.टी.एस. के चीफ डीजी बंजारा के साथ आए राजस्थान पुलिस के सुपरिंटेंडेंट एम0एन0 दिनेष। कांस्टेबल अजय परमार से कहा गया कि वह ए.टी.एस. दफ्तर के पीछे पड़ी एक हीरो होंडा मोटरसाइकिल लेकर आए। सोहराबुद्दीन शेख को भी वहाँ लाया गया।
    राजस्थान पुलिस का एक सब इंस्पेक्टर मोटरसाइकिल पर बैठा और थोड़ी दूर जाकर अचानक नीचे कूद गया। उसी वक्त सोहराबुद्दीन को भी चलती कार से नीचे धक्का देकर सड़क पर गिरा दिया गया। उसको चोट लगी, और उसी के साथ चार पुलिस इंस्पेक्टरों ने अपने सर्विस रिवॉल्वर से सोहराबुद्दीन पर आठ गोलियाँ दाग दीं। वंजारा ने कांस्टेबल परमार से सोहराबुद्दीन के निर्जीव शरीर को सिविल अस्पताल ले जाने को कहा।
    आखिर एक आम गैंगस्टर से दो राज्यों के रसूखदार मंत्रियों अमित शाह और गुलाबचंद्र कटारिया की क्या दुष्मनी हो सकती है? यह सच छिपा है गुजरात और राजस्थान में मौजूद अरबों की मार्बल लॉबी में। सोहराबुद्दीन दरअसल, आई.पी.एस. अभय चूड़ास्मा के इषारे पर इसी लॉबी से पैसे वसूल रहा था। इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा चूड़ास्मा डकार जाता था।
    कहा जाता है कि गुजरात और राजस्थान की मार्बल लॉबी ने सोहराबुद्दीन की वसूली से आजिज आकर गृह राज्यमंत्री अमित शाह से संपर्क साधा। ये लॉबी गुजरात और राजस्थान में राजनैतिक पार्टियों के लिए धनकुबेर की तरह काम करती है। आरोप है कि अमित शाह ने अभय चूड़ास्मा से सोहराबुद्दीन को रास्ते से हटाने को कहा। शायद शाह अंदर की कहानी नहीं जानते थे। उन्हें इस बात की भनक तक नहीं थी कि जिस गैंगस्टर से वे धनवान कारोबारियों को बचाने की कोषिष में हैं वह दरअसल खुद अभय चूड़ास्मा का ही पैदा किया हुआ राक्षस है।
     किसी भी तरह राजस्थान में कहीं छिपे बैठे सोहराबुद्दीन को गुजरात लाना था। उसे गुजरात में किसी नए इल्जाम में फाँसने की साजिष बुनी गई। अभय चूड़ास्मा ने सोहराबुद्दीन को लालच दिया। रमण पटेल नाम के एक कारोबारी से पैसे ऐंठने के बहाने उसे गुजरात बुलाया गया। सोहराबुद्दीन ने अपने दो प्यादों सिलवेस्टर और तुलसी प्रजापति को भेजा। दोनों ने पॉपुलर बिल्डर के मालिक रमण पटेल पर गोली चलाई।
    इधर गोली चली उधर सोहराबुद्दीन के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज हो गई। सोहराबुद्दीन हैरान रह गया, उसे शक हो गया कि हो न हो अभय चूड़ास्मा उसके साथ डबल क्रॉस कर रहा है। वह एक साल के लिए गायब हो गया। तब पुलिसवालों ने एक बार फिर लालच का फंदा फेंका। सोहराबुद्दीन का साथी तुलसी प्रजापति उसमें फँस गया, वह बिक गया और वह सोहराबुद्दीन से दगा करने, उसका पता देने को तैयार हो गया।     गुजरात ए़.टी.एस. और राजस्थान पुलिस की टीम ने आंध्र प्रदेष एस.आर.टी.सी. की बस को साँगली के पास रोका। यह बस हैदराबाद से साँगली जा रही थी। सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसी प्रजापति इसी बस में थे। इन्हें पकड़कर गांधीनगर के बाहरी इलाके जमीयतपुरा के एक फार्म हाउस लाया गया। यहाँ दो दिन रखा गया और इन दो दिनों में सब कुछ बदल गया। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि सोहराबुद्दीन को रास्ते से हटाने के बाद अभय चूड़ास्मा ने खुद कम से कम 12 कारोबारियों को फोन किया। धमकी दी कि या तो पैसे दे दो या फिर वह उन्हें सोहराबुद्दीन के कत्ल के इल्जाम में फँसा देगा। बताया जाता है कि चूड़ास्मा ने इस तरह करीब 15 करोड़ रुपए उगाहे और ये पैसा खुद जय पटेल और यष चूड़ास्मा नाम के लोगों ने जमा किया।
    सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का इकलौता चष्मदीद गवाह तुलसी प्रजापति सोहराबुद्दीन के साथ ही उठाया गया था लेकिन फिर उसे सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का पुलिस गवाह बनाकर छोड़ दिया गया। बाद में राजस्थान पुलिस ने उसे दूसरे मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उसी वक्त यह मामला मीडिया में आया और सुप्रीम कोर्ट के आदेष पर केस सी.आई.डी. के पास आया तो वंजारा और शाह घबरा गए। लगा कहीं प्रजापति ने मुँह खोल दिया तो सारा खेल बिगड़ जाएगा। सो एक और एनकाउंटर की कहानी रची गई।
    तुलसी के एनकाउंटर के लिए जगह चुनी गई-बनासकांठा। बनासकांठा यानी वह जिला जो ए.टी.एस. के अफसर वंजारा के अंडर में आता था। 27 दिसंबर 2006 को राजस्थान से गुजरात पेषी के लिए प्रजापति को लाया जा रहा था। रास्ते में ही गोलियाँ चलीं और उसे मार डाला गया। कहानी बनाई गई कि उसने अपने एक साथी के साथ मिलकर पुलिस पार्टी की आँखों में मिर्च पाउडर डाल दिया और गोलियाँ चलाईं, जवाबी गोलीबारी में वह मारा गया। लेकिन सी.आई.डी. की जाँच में पुलिस की यह कहानी झूठी साबित हुई।
    सोहराबुद्दीन मामले में सी.बी.आई. चार्जषीट में गुलाबचंद्र कटारिया का नाम आने के बाद तुलसी प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले में भी उनका हाथ होने की बात कही जा रही है। सी.बी.आई. ने तुलसी प्रजापति मुठभेड़ को एक परफेक्ट मर्डर करार दिया था। सी.बी.आई. ने अपनी चार्जषीट में प्रजापति की हत्या का मोटिव भी साफ किया है। साथ ही सीधे-सीधे गुजरात के गृहराज्य मंत्री अमित शाह को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब इसमें राजस्थान के पूर्व गृहमंत्री गुलाबचंद्र कटारिया का नाम सामने आया है।
    सी.बी.आई. ने अपनी चार्जषीट में प्रजापति मुठभेड़ को परफेक्ट मर्डर बताते हुए दावा किया है कि उसे सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वह सोहराबुद्दीन और कौसर बी की हत्या का सबसे अहम गवाह था। सी.बी.आई. के मुताबिक सोहराबुद्दीन और कौसर बी को जब साँगली से गुजरात पुलिस ने अगवा किया उस समय तीसरा शख्स तुलसी ही था। सी.बी.आई. ने अहम खुलासा करते हुए यह भी बताया कि डी.जी. बंजारा के कहने पर ही सोहराब और कौसर को अपने साथ लेकर तुलसी आ रहा था। इसी दौरान साजिष के तहत तीनों को आधे रास्ते से उठा लिया गया।
    सी.बी.आई. ने अपनी चार्जषीट में बताया है कि सोहराबुद्दीन और तुलसी मामले एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। तुलसी सोहराबुद्दीन के दो खास आदमियों में शामिल था। दूसरा आदमी सिल्वेस्टर था। तुलसी को बाद में पुलिसवालों ने अपने जाल में फँसा लिया और उसने सोहराबुद्दीन से दगा करके, उसका पता पुलिस को दे दिया।
    उसी वक्त यह मामला मीडिया में आया और सुप्रीम कोर्ट के आदेष पर केस सी.आई.डी. के पास आया। सी.बी.आई. ने अपनी चार्जषीट में बताया है कि सोहराबुद्दीन और तुलसी मामले एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। सबूत के तौर पर सी.बी.आई. ने चार्जषीट में अमित शाह और पुलिस अधिकारियों के बीच 26-11-2005 से लेकर 30-11-2005 तक की कॉल डीटेल्स को रखा है। इसके मुताबिक आई.पी.एस. राजकुमार, डीजी बंजारा और पूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह के बीच उस दौरान काफी बातचीत हुई। जब तुलसी को अहमदाबाद कोर्ट में पेषी के लिए उदयपुर से बार-बार लाया जा रहा था। चार्जषीट में सी.बी.आई. ने इस आधार पर दावा किया कि तुलसी को मारने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी। यही नहीं सी.बी.आई. के अनुसार जब तुलसी को अहमदाबाद लाया जा रहा था उस दौरान 27-11-2006 से 29-11-2006 के बीच अमित शाह, गुजरात पुलिस और राजस्थान पुलिस के बीच अचानक कई बार बातचीत होती है।
    सी.बी.आई. ने चार्जषीट में इस बात का भी जिक्र किया कि जब सोहराबुद्दीन के भाई की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने केस को डी.जी. पी0सी0 पांडे को सौंपा तो पांडे ने आईजी गीता जौहरी के साथ मिलकर न सिर्फ अपने पद का बेजा इस्तेमाल किया बल्कि जाँच में भी ढील दी। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन पुलिस अधिकारी वी0एल0 सोलंकी ने इस मामले में अपनी रिपोर्ट 1 सितंबर 2006 को तैयार कर ली थी लेकिन इसे 7 जनवरी 2007 को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा गया।
    चार्जषीट पर लिखा है कि 11 और 22 दिसंबर 2006 को अमित शाह ने अपने दफ्तर में गुप्त बैठक भी बुलाई थी। इसमें डी.जी.पी. पांडे, एडिषनल डी.जी. पी0 जी0सी0 रायगर, आई0जी0 गीता जौहरी शामिल थीं। इस बैठक में अमित शाह ने पुलिस अधिकारी सोलंकी की जाँच रिपोर्ट पर नाराजगी जताते हुए गीता जौहरी को जाँच के पेपर नष्ट करने को कहा था। सी.बी.आई. के मुताबिक रायगर ने इस साजिष में शामिल होने से मना किया तो उसका ट्रांसफर कर दिया गया जबकि पांडे और जौहरी अपनी इच्छा से साजिष का हिस्सा बने थे। सी.बी.आई. की चार्जषीट के मुताबिक 18 दिसंबर 2006 को तत्कालीन जाँच अधिकारी वी0एल0 सोलंकी ने प्रजापति से उदयपुर जेल जाकर पूछताछ की इजाजत माँगी थी लेकिन साजिष में शामिल गीता जौहरी ने इसे यह कहकर टाल दिया कि उन्होंने इसकी अनुमति बड़े अधिकारियों से माँगी है। बाद में गीता जौहरी ने यह कहकर मना कर दिया कि बड़े अधिकारियों ने पूछताछ की इजाजत नहीं दी है।
    यहाँ तक कि गीता जौहरी ने वह खत भी नष्ट कर दिया जिसमें तुलसी से पूछताछ की इजाजत माँगी गई थी।
     चार्जषीट में लिखा है कि उदयपुर जेल से आखिरी बार जब तुलसी प्रजापति को अहमदाबाद लाया जा रहा था तब भी आरोपी अधिकारी लगातार एक दूसरे के संपर्क में थे। सी.बी.आई. ने बाकायदा सबूत के तौर पर इसकी कॉल डीटेल्स भी दी है।
      28 दिसंबर 2006 को तुलसी प्रजापति की हत्या के बाद मौका ए वारदात पर एक देसी रिवॉल्वर रख दी गई। यही नहीं सी.बी.आई. ने बताया कि मुठभेड़ को अंजाम तक पहुँचाने वाले आषीष पंड्या ने खुद ही अपने कंधे पर गोली चलाई और मुठभेड़ में जख्मी होने की कहानी बनाई।
    आज जरूरत इस बात की है कि देश में संसद पर हमला हो या 26/11 की मुम्बई आतंकी घटना या देश में आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम नौजवानों के एनकाउन्टर का मामला हो या आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी की बात हो, सबकी उच्च स्तरीय जाँच कराकर उसमें शामिल अधिकारियों पर फर्जी एनकाउन्टर व फर्जी गिरफ्तारियों के मामले में मुकदमे चलाए जाएँ।
        उत्तर-प्रदेश में सीरियल बम विस्फोट कांड में गिरफ्तार खालिद मुजाहिद व तारिक कासमी की गिरफ्तारी को लेकर गठित आर.डी. निमेष कमीशन ने कथित आर.डी.एक्स. डेटोनेटर जिलेटिन राड की बरामदगी व गिरफ्तारी को फर्जी माना है।
 -तारिक खान
मो0-09455804309

सोमवार, 11 मार्च 2013

आडवाणी की खरी खरी, फिर भ्रमित करने लगा संघ परिवार!

आडवाणी की खरी खरी, फिर भ्रमित करने लगा संघ परिवार! लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि जनता का मूड कांग्रेस के खिलाफ तो है हीए बीजेपी से भी उसका मोहभंग हुआ है!लालकृष्ण आडवाणी ने माना है कि लोगों का उनकी पार्टी से कुछ हद तक मोहभंग हुआ है और इससे वह दुखी हैं।भ्रष्टाचार के खिलाफ बीजेपी से जीरो टॉलरेन्स की उम्मीद रखने वाले आडवाणी ने कहा, बीजेपी ने कर्नाटक मामले जो रुख अपनाया, उससे वास्तव में मुझे निराशा हुई है। आडवाणी ने कहा कि केन्द्र में कांगेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार घोटालों की सरकार है!साथ ही आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान को विकास के लिये रोल माडल बताया उन्होंने कहा कि घोटालों से घिरी सरकार देश का भला नही कर सकती!

भाजपा के पिछले लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्रित्व के दावेदार १०१४ के लोकसभा चुनावों में भाजपाई प्रधानमंत्रित्व के कारपोरेट ​​समर्थित दावेदार नरेंद्र मोदी के खिलाफ खरी खरी बोले, इस चौंकानेवाली खबर के पीछे चुपे राज का खुलासा अभी होना बाकी है। पर ज्यादा ​​संभव है कि यह कोई संघ परिवार का अंदरुनी सत्ता संघर्ष का मामला कमए बल्कि सुनियोजित चुनावी रणनीति ज्यादा है। दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों की गति तेज करते हुए कांग्रेस ने जो उग्रतम धर्म राष्ट्रवाद का विकल्प चुना है, उसके आगे असहाय से होते जा रहे संघ परिवार का यह निर्णायक पदक्षेप है, जिसका तत्पर्य नये सिरे से हिंदुत्व की शुद्धता और नैतिकता की स्थापना करते हुए संघ परिवार की साख की स्थापना करना है, जो अगला चुनाव जीतने के लिए अनिवार्य पूर्व शर्त है और इसके लिए लौह पुरुष से बेहतर प्रवक्ता कौन हो सकते हैं भारतीय गणराज्य, इसके संविधान, ​​लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए अहम है कि इस तिलिस्म का इलाज निकाला जाये। मीडिया ने तो 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए नरेन्द्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी लगभग घोषित कर ही दिया है। मोदी ने भी अपनी महत्वाकांक्षा छिपाई नहीं और गत सप्ताह राजधानी में हुई भाजपा राष्ट्रीय परिषद की बैठक में एक तरह  से खुद को उम्मीदवार घोषित कर दिया।शुरू से अंत तक इस मीटिंग में मोदी ही छाए रहे। निचले स्तरों तक भाजपा कार्यकर्ताओं में मोदी के प्रति जबरदस्त समर्थन के ठोस प्रमाण के कारण ही शायद ऐसा हो सका। जो लोग यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि भाजपा प्रधानमंत्री पद के लिए अपने उम्मीदवार की घोषणा करेगी उन्हें भारी निराशा हाथ लगी। ऐसा करने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है और अभी तक यह शुरू नहीं हो सकी।
गौरतलब है कि बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में आडवाणी समेत भाजपा के 19 नेताओं को नामित करने के मामले में सुनवाई दो अप्रैल तक के लिए टल गई है। इस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत सभी को बरी कर चुकी है।फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट भी मुहर लगा चुकी है। इसके बाद सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से दोबारा साजिश के आरोप तय करने मी मांग की है। आरोपियों में आडवाणी, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, प्रवीण तोगड़िया, विष्णुहरि डालमिया और साध्वी ऋतंभरा आदि शामिल हैं।

बीजेपी को नरेंद्र मोदी के बढ़ते कद के बीच वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने चौंकाने वाला बयान दिया है। एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में आडवाणी ने कहा कि लोगों का कांग्रेस के साथ.साथ बीजेपी से भी मोहभंग हो चुका है। इस मोहभंग के चलते आडवाणी बेहद दुखी भी हैंए हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि पार्टी का भविष्य बेहतर है।पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी पर निशाना साधते हुए आडवाणी ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कर्नाटक के तत्कालीन सीएम वाईएस येदुरप्पा के मामले में बीजेपी ने जो रवैया अपनाया वो गलत था। द वीक को दिए इंटरव्यू में आडवाणी ने कहा कि पिछले कुछ साल से वो ये देखकर दुखी हैं कि जनता का मूड यूपीए सरकार के खिलाफ तो है हीए लेकिन बीजेपी के प्रति भी मोहभंग हुआ है।

ये पहला मौका नहीं है जब आडवाणी ने इस तरह का बयान देकर बीजेपी में ही बहस का विषय छेड़ दिया हो। पिछले कुछ समय से आडवाणी खुलकर इस तरह के बयान देते रहे हैं। वैसे भी आडवाणी इन दिनों हाशिए में चल रहे हैं। बीजेपी कार्य़कारिणी की बैठक में भी उन्हें मार्गदर्शक बता दिया गया। ऐसे में आडवाणी की खरी.खरी बातें कहकर पार्टी को असहज स्थिति में डाल रहे हैं।

इसके उलट मध्यप्रदेश में आडवाणी ने शहडोल संभागीय मुख्यालय में उमरिया, अनूपपुर एवं शहडोल में चौबीस घंटे बिजली उपलब्ध कराए जाने वाली प्रदेश सरकार की योजना अटल ज्योति अभियान की औपचारिक रुप से घोषणा करते हुए कहा कि इस सरकार में रोज ही नये नये घोटाले सामने आ रहे हैं।

अपने पैंतीस मिनट के संबोधन में अपनी छह यात्राओं और राम मंदिर का जिक्र  करते हुए कहा कि जब उन्होने सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा कर जयश्री राम का नारा बुलंद किया और संकल्प दिलाया कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण होना चाहिये ।

लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि  वर्ष 1989 में हुए आम चुनाव में संसद में भारतीय जनता पार्टी के सांसदों की संख्या दो से बढ़कर छियासी हो गई थी।उन्होने कहा कि यह चमत्कारी परिवर्तन राम मंदिर का प्रताप था। हांलाकि आडवाणी ने यह भी कहा कि धर्म व मंदिर के नाम पर जनता प्रेरित तो होती है लेकिन विकास के नाम पर जनता का जुड़ाव ज्यादा हो जाता है।

अपने संबोधन के दौरान उन्होने दो बार नरेन्द्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान की प्रशंसा की।


आपके और हमारे कान खड़े होने के लिए एक और खबर उत्तर प्रदेश से आयी है, जिसका संबंध २०१४ तक हिंदू राष्ट्र का सपना पूरा करने से संबंधित संघ परिवार के अविचल एजंडा सै है।उत्तर प्रदेश विधानसभा में आज बेरोजगारी भत्ता के सवाल पर सरकार को धोखेबाज बताकर सदन से बहिर्गमन कर रहे भारतीय जनता पार्टी को राजस्व मंत्री ने ष्रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगेए तारीख नहीं बताएंगे कहकर जवाब दिया।बीजेपी के सतीश महानाए रामचंद्र यादव और तीन अन्य विधायकों के सवाल के जवाब मे राजस्व मंत्री अंबिका चौधरी ने बताया कि बेरोजगारी भत्ते के लिए कुल 12 लाख 26 हजार आवेदन आये थे जिसमे 10 लाख 73 हजार लोगों को बेरोजगारी भत्ता दिया गया।

बीजेपी के हुकुम सिंह ने कहा कि जो लोग बेरोजगार है और उन्हें भत्ता नहीं मिला तो क्या उन्हें पेंशन दी जाएगी। चौधरी के जवाब से असंतुष्ट भाजपा बीजेपी ने सदन का बहिर्गमन किया।

बहिर्गमन कर रहे बीजेपी सदस्यों को चौधरी ने ष्रामलला हम आएंगेए मंदिर वहीं बनाएंगे, तारीख नहीं बताएंगे कहकर जवाब दिया। चौधरी का आशय था कि बीजेपी खुद धोखेबाज हैं। राम तक को नहीं छोड़ा और दूसरे को धोखेबाज बता रही है।

ऐसे में जब भारतीय जनता पार्टी में हर ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने की मांग उठ रही है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक गोविंदाचार्य अलग ही सुर अलाप रहे हैं। उनके अनुसार लालकृष्ण आडवाणी ज्यादा अनुभवी हैं और उन्हें मोदी की जगह 2014 के आम चुनाव में भाजपा का प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जाना चाहिए।

अंतिम चयन होने से पूर्व 3 स्तरों पर परामर्श होगा। प्रथमया भाजपा के अंदरए दूसरे नम्बर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंदर और तीसरे क्रम पर राजग के अंदर। वास्तविकता यह है कि पहले स्तर पर भी अभी तक परामर्श शुरू नहीं हुआ। बेशक प्रधानमंत्री के सपने देखने वाले अन्य उम्मीदवार फिलहाल चुप हो गए हैंए शायद वे चुनावी निर्णय का समय आने पर यूं ही मौन नहीं बैठेंगे क्योंकि इस शीर्ष पद की आकांक्षा रखने वाले आधा दर्जन नेता स्वयं उम्मीदवार हैं।

मोदी को अकेला चलने वाले के रूप में देखा जाता है और अपने पार्टी सहकर्मियों के साथ उनके संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं हैं। लालकृष्ण अडवानी अभी दौड़ से बाहर नहीं हुए हैं और उनका प्रभाव कई रूपों में सामने आएगा जैसा कि उन्होंने गडकरी को एक ही झटके में समाप्त करके दिखाया था। मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से पूर्व पार्टी को उनकी खूबियों के साथ.साथ गोधरा कांड के दुष्प्रभावों को भी मद्देनजर रखना होगा।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है दूसरा यानी आर.एस.एस.का पड़ाव। भाजपा को जन्म देने वाला यह मूल संगठन भी गत 10 वर्षों के दौरान मोदी पर अधिक प्रसन्न नहीं क्योंकि गुजरात में उन्हीं के कारण की आर.एस.एस.गतिविधियां बहुत बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। अभी भी भाजपा पर आर.एस.एस. की पकड़ काफी मजबूत है और अपना सपना साकार करने के लिए मोदी को नागपुर स्थित संघ मुख्यालय से अवश्य ही समर्थन प्राप्त करना होगा।

आरएसएस के प्रचारक के गोविंदाचार्य ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अनुभवहीन करार देते हुए प्रधानमंत्री पद के योग्य मानने से इन्कार कर दिया और उन्होंने पार्टी के बुजुर्ग नेता आडवाणी को इस प्रतिष्ठित पद के लिए उम्मीदवार बनाने की वकालत की। एक अंग्रेजी समाचार चैनल से बातचीत में उन्होंने कहाए श्देश का सामना करने से पूर्व उन्हें और समय दिया जाना चाहिए। मैं समझता हूं कि हमें एक अनुभवी प्रधानमंत्री की जरूरत है। मैं महसूस करता हूं कि एलके आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह और अन्य नेता कैबिनेट मंत्री बनकर अनुभव हासिल करें। गोविंदाचार्य ने यह कहते हुए भाजपा कैडरों की इस मांग को ठुकरा दिया सवाल यह नहीं है कि कौन ज्यादा लोकप्रिय है। यहां योग्यता की बात है। नरेंद्र जी को पहले नौसिखिया बनकर अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

संजय जोशी को हटाने के पीछे नरेंद्र मोदी का हाथ होने के सवाल पर गोविंदाचार्य ने कहा, श्किसी भी नेता को बेहतर कूटनीतिज्ञ होना चाहिए। अगर आप अपनी पार्टी के साथ समझौते में अडियल रूख बनाए रखते हैं तो आप कैसे दूसरी पार्टियों को विश्वास में लेंगे। राजनीति में संयम रखना एक कला है। उन्होंने कहाए मैं समझता हूं कि उतावलापन का माहौल बना रहता है तो यह न मोदी के लिए सही होगा न ही देश के लिए।गोविंदाचार्य के अनुसार गुजरात के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री पद के लिए एकमात्र स्वत: योग्य उम्मीदवार नहीं है। उन्होंने कहाए देश को चलाने के लिए विविधता और विरोधाभास की जरूरत होती है। साथ ही नेता में लचीलापन भी होना चाहिए। प्रधानमंत्री के पास ढेर सारे गुण होने चाहिए जिसे मोदी जी ने अब तक नहीं दिखाया है।

अगले आम चुनाव के दौरान 87 साल के होने जा रहे आडवाणी की उम्र के बारे में जब गोविंदाचार्य से पूछा गया तो उन्होंने कहाए उनकी सेहत को देखने की जरूरत है। जब ज्यादातर युवा नेता एक दिन का धरना तक नहीं कर पाते ऐसे में आडवाणी ने खुद को ज्यादा योग्य साबित किया है।गोविंदाचार्य का यह बयान दिल्ली में संपन्न हुए दो दिवसीय भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की उस सम्मेलन के बाद आया है जिसमें पार्टी नेताओं और कैडरों की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करने की जोरदार मांग उठी थी।
-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

पहले अलगाव के चक्रव्यूह को तो तोड़ें, बंधु !

ब्रिटिश राज के अंत के बाद जमींदारियों और रियासतों के उत्तराधिकारियों को सत्ता का हस्तांतरण हो गया। भारतीय समाज की मूल सामंती ढांचे में बिना किसी परिवर्तन के। उलट इसके देश के विभाजन के जरिये बहुजन मूलनिवासियों के आंदोलन के आधार बने बंगाल और पंजाब का​ ​ विभाजन हो गया। जनसंख्या स्थानांतरण के अमानवीय रक्तरंजित प्रयोग के तहत न केवल एक फीसद सत्तावर्ग के लिए जीवन के हर क्षेत्र​ ​ में वर्चस्व कायम हो गया, बल्कि हजारों साल से विदेशी हमले के बावजूद देश में विभिन्न संप्रदायों और धर्मों के समन्वय का जो माहौल​ ​ कायम रहा, उस विरासत की हत्या हो गयी। हिंदू और मुस्लिम राष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर विभाजन हो गया और शरणार्थी पुनर्वास के​ ​ जरिये बंगाल में जनसंख्या समायोजन के जरिये देश भर के राजनीतिक समीकरण को हमेशा के लिए बदल दिया गया।हिंदू राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि की खोज भारत विभाजन के इतिहास में किये बिना हम सांप्रदायिकता और अलगाव के विरुद्ध लड़ाई कर ही नहीं सकते। ​
​मैं लगातार लिखता बोलता रहा हूं कि मनुस्मृति कोई धर्मशास्त्र नहीं है, यह विशुद्ध अर्थशास्त्र है। नैतिकता और प्रकृतिवाद के दार्शनिक ​​आधार से अलग धर्म हमेशा नागरिक की संप्रभुता के अपहरण का सर्वोत्तम शस्त्र है। सत्ता और धर्म का चोली दामन का साथ है।संसाधनों,संपत्ति और अवसरों  पर एकाधिकार से धर्म का एजंडा बनता है, जो हिंदू राष्ट्रवाद की आत्मा है। समाज की मूल संरचना परंपरागत जाति​ ​ व्यवस्था, भौगोलिक अलगाव और विभाजन से उत्पन्न सांप्रदायिक विद्वेष की वजह से सामंती ही बनी रही। पर ब्रिटिश हुकूमत के दौरान कानून का राज सीमित तौर पर लागू हो जाने,राष्ट्रीय स्वत्तंत्रता आंदोलन में विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, समुदायों की साझेदारी और यूरोप में औद्यौगीकरण व नवजागरण के असर  से भारत में सीधे सीधे मनुस्मृति व्यवस्था लागू नहीं की जा सकी।डा. भीमराव अंबेडकर संविधान मसविदा समिति के अध्यक्ष थे.शायद यह बहुत बड़ी वजह थी कि अनुसूचितों के अधिकारों को संवैधानिक गारंटी मिल गयी।पांचवी और छठीं अनुसूचियों के जरिये आदिवासियों के जल जंगल जमीन के हक हकूक के संरक्षण के प्रवधान भी किये गये। संविधान समीक्षा कमिटियों, कारपोरेट लाबिइंग और हिंदुत्व के पुनरूत्थान के के बावजूदए खुले बाजार और अमेरिका इजराइल के साथ सैन्य परमाणु गठबंधन के बावजूद भारत में अब भी दक्षिण एशिया के दूसरे देशों के ​​मुकाबले लोकतंत्र के लिए थोड़ी बहुत बेहतर जगह बची हुई है, यह अब भी संविधान के काम करते रहने की वजह से है। इस संविधान की ​​आत्मा सबके लिए समान अवसर, समता, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता में निहित हैं।
राजनीतिक तौर पर हम लोग बेहतर हालत में हैं और अपने राजनीतिक अधिकारों का बखूब इस्तेमाल करते हैं।आज जो राजनीति बेनकाब ​​हो रही है और सभी दलों के राजनेता बेपर्दा होते दीख रहे हैं, वह लोकतांत्रिक प्रणाली की कामयाबी की वजह से ही है।​
​असली समस्या लेकिन अर्थ व्यवस्था और सामाजिक वर्चस्ववादी मूल संरचना को लेकर है।खुले बाजार की व्यवस्था राज्य और सरकार की भूमिका ही खत्म कर देती है, इसीलिए अबतक जो राजनीतिक अधिकार हमें मिले हुए हैं, वे आहिस्ते आहिस्ते खत्म हो रहे हैं। बाजार के हितों और ​​वैश्विक व्यवस्था से जोड़ दी गयी अर्थव्यवस्था में पूंजी के वर्चस्व और देशी सामंती तत्वों के एकाधिकार दोनों के लिए भारतीय संविधान की​ ​ बजाय तमाम धर्मशास्त्र और उनसे बढ़कर भागवत गीता के नियतिवाद व मनुस्मृति के बहिष्कारवादी अनुशासन ज्यादा प्रासंगिक हैं।​​इसीलिए हम डा. मनमोहन सिंह को नवउदार युग का पूरा शरेय देने के लिए तैयार नहीं है। विदेशी पूंजी का प्रवाह तो हरित क्रांति, बड़ी ​​परियोजनाओं और रक्षा सहयोग के मार्फत साठ के दशक में ही शुरू हो गया था। १९६२ में भारत चीन युद्द के बहाने भारतीय राजनय की​ ​ दिशा पूरब से घूमकर पश्चिम हो गयी। इंदिरा जमाने में से दूरदर्शन क्रांति शुरू हो गयी तो राजीव के जमाने में कृषि को आर्थिक धूरी से ​​निकालकर उत्पादन प्रणाली को तकनीक, निर्माण, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र से जोड़ दिया गया।राष्ट्र का सैन्यीकरण साठ के दशक से ही ​​जारी रहा। भूमि सुधार, संसाधनों के बंटवारे, सामाजिक न्याय जैसे आंदोलनों के दमन का लंबा इतिहास है। पर राष्ट्र को दमनकारी सैन्य ​​व्यवस्था में तब्दील करने की प्रक्रिया हिंदुत्व के पुनरूत्थान से ही शुरू हुआ। बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दरम्यान इंदिरा गांधी को दुर्गास्वरुप बताने से लेकर, सिख नरसंहार और बाबरी ध्वंस से लेकर गुजरात नरसंहार तक का अनंत सिलसिला है। वैश्विक व्यवस्था की दोनों बड़ी ताकतों अमेरिका और इजराइल के साथ ग्लोबल हिंदुत्व के गठजोड़ से भारत में अंबेडकर के संविधान को खारिज करके मनुस्मृति व्यवस्था लागू करने का संघ परिवार का एजंडा है।इस प्रक्रिया में डिजिटल सिटिजनशिप बहिष्कार का सबसे सरल उपाय तो है ही, नागरिको की एफडीआई और मोसाद की तर्ज​ ​ पर निगरानी की भी सर्वोत्तम व्यवस्था है, जिसके पूरा हुए बिना बाजार की ताकतों का वसंत अभी विलंबित है।
कालाधन की रिसाइक्लिंग ही विदेशी निवेश है, अगर यह बात समझ में आ जाती है तो कारपोरेट सर्वात्मक आक्रमण और आर्थिक सुधारों के विरोध के बिना भ्रष्टाचार और कालाधन के खिलाफ मुहिम की असलियत साफ हो जाती है।फिरभी केजरीवाल के गुरिल्ला युद्ध कहे  यह तो साबित हो गया कि हमाम में सारे के सारे नंगे हैं। पर असल मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा मूल सामाजिक ढांचे में बदलाव का है। मुद्दा जाति उन्मूलन का है। मुद्दा ​​आदिवासियों की स्वायत्ता का है। मुद्दा सामाजिक न्यायए कानून का शासनए समान अवसर व समता का है। मुद्दा भूमि सुधार का है। मुद्दा ​विस्थापन, आजीविका और रोजगार का है। मुद्दा किसानों और कृषि के संकट का है। मुद्दा संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की​ ​ विरासत का है। क्या हम इन मुद्दों को संबोधित कर पा रहे हैं?
​​​गुजरात को खुला बाजार बनाने से पहले वहां हिंदुत्व का सबसे निर्मम प्रयोग हुआ। अब यह प्रयोगशाला पूर्वोत्तर में स्थानांतरित हैए क्योंकि गुजरात को खुला बाजार बनाने में अभूतपूर्व सफलता मिल चुकी है। अब वहां अबाध पूंजी निवेश और बाजार के लिए गुजरात गौरव और हिंदुत्व के ​​साथ साथ अमन चैन का माहौल भी चाहिए। गुजरात नरसंहार के दौरान अनुसूचितं को हिंदुत्व की पैदल सेना बनाने के नायाब प्रयोग के ​​बाद हिंदू राष्ट्रवाद को सत्ता में स्थानांतरित करके मनुस्मृति शासन के अंतिम लक्ष्य हासिल करने के लिए हिंदू राष्ट्रवाद के सर्वाधिनायक के​ ​ तौर पर नरेंद्र मोदी का उत्थान जरूरी है, जो नरम हिंदुत्व के महानायकों को परास्त कर सकें। इसलिए अस्सी नब्वे दशक के उन्माद की​ ​ तरह फिर सामाजिक समरसता का राग अलापा जा रहा है। कथाएं फिर फिर बांची जा रही हैं। पुराणों और उपनिएदों की गंगाएं बहायी जा​ ​ रही है। अमेरिका, ब्रिटेन और इजराइल तक मोदी को मान्यता देने में पीछे नहीं है क्योंकि वैश्विक व्यव्स्था सांस्कृतिक वर्चस्व और बहिष्कार के सिद्धांतों के मुताबिक ही चलते हैं। मजे की बात तो यह है कि बाजार के सबसे बड़े प्रवक्ता नरेंद्र मोदी और सबसे बड़ी विरोधी ममता बनर्जी, दोनों के तार इजराइल से जुड़ते हैं। कस्मीर हो या पूर्वोत्तर या महाराष्ट्र हम आंतरिक सुरक्षा और खुफिया निगरानी के लिए इजराइल पर निर्भर ह। बंगाल समेत तमाम राज्यों के इजराइल से संबंध बन रहे हैं। ममता बनर्जी मुस्लिम वोट बैंक को अटूट बनाये रखने के लिए मदरसों और मौलवियों को अनुदान से लेकर खुद को नमाजी बतौर पेश करती हैं, इससे इजराइली राजदूत को अपनी पेंटिग उपहार देते हुए उससे द्विपाक्षिक संबंध बनाने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। दूसरी तरफ चंडाल आंदोलन के लिए विख्यात मतुआ धर्म अपनाने की घोषमा करने के बावजूद वे बंगाली हिंदू राष्ट्रवाद के पुनरूत्थान के जरिये  वामपंथ का नामोनिशन मिटाने में लगी है, अपने उग्र वामपंथी तेवर के साथ। सरकारी कर्मचारियों को दस दिनों के उत्सव अवकाश देने के बाद उनके राज में पूजा के चारों दिन अखबारे के दफ्तर बंद रखने का इंतजाम भी हो गया। रामलीला और रामायण का यह मौजूदा माहौल​ ​ धार्मिक आस्था का मामला नहीं है। बाबारी विध्वंस से पहले रामायण महाभारत युग को याद करें और उसके बाद राजग के विनिवेश राज​​ कोए तो असली खतरा आपको मालूम होगा।​
सबसे बड़ा मुद्दा है नीति निर्धारण और राजकाज में जनप्रतिनिधियों और संसद की भूमिका का शून्य हो जाने का। तमाम कानून और निर्णय  कारपोरेट दबाव से केबिनेट के जरिए बिना संसद से अनुमोदित कराये अल्पमत सरकार पास करती जा रही है और इसका कोई प्रतिरोध नहीं हो पा​ ​ रहा। क्योंकि नीति निर्धारण के बारे में जनता को कोई सूचना ही नहीं होती। मुख्यधारा की कारपोरेट मीडिया आर्थिक अंग्रेजी अखबारों में कारपोरेट जगत को तो पूरी सूचनाएं दे देता है। पर भाषायी और सामान्य समाचारपत्रं में इसकी चर्चा तक नही होती।इसीलिए मैंने लंबे अरसे से घटनाओं और राजनीतिए क्रिया प्रक्रिया की बजाय नीति निर्धारण को ही अपने लेखन का मुख्य विषय बनाया हुआ है। चूंकि अश्वमेध के घोड़े तमाम क्षेत्रों​ ​ में समान वेग से दौड़ रहे हैं, इसलिए विषयांतर जैसा दीखने के बाजजूद तमाम सूचनाएं एकसाथ देने की काशिश मेरी रोजमर्रे की जिंदगी​ ​ है। पर इन सूचनाओं से आखिर होगा क्या अगर हम अपने लोगों को, निनानब्वे फीसद बहिष्कृतों को बचाने की कोई भी कोशिश नहीं कर ​​सकें?
 भारत के आजाद होने के बाद से अलगाव और बहिष्कार सत्तावर्ग का मूल हथियार हैं। समूचा कश्मीर और पूर्वोत्तर इसी वजह से सशस्त्र सैन्यबल  विशेषाधिकार कानून के मातहत है १९५८ से। दंडकारण्य समेत तमाम आदिवासी इलाके सैन्य दमन के शिकार हैं। पांचवी और छठीं अनुसूची लागू होना तो दूर, भूमि सुधार की गुंजाइश ही नहीं , पर जल जंगल जमीन और आजीविका से विस्थापन और बेदखली निनानब्वे फीसद लोगों की नियति इसी अलगाव और बहिष्कार के जरि, अकेले पड़कर निहत्था हो जाने और अंततः मारे जाने की नियति है।पार्टीबद्ध, फर्जी विचारधाराओं​​ और फंडिंग तक सीमित  मिशन, यूनियनों, समाज में शामिल  होकर हम  जातिव्यवस्था की हजारों खांचों के अलावा अलगाव और बहिष्कार को मजबूत करने के नये तंत्र में शामिल हैं, जो अंततः मनुस्मृति शासन का ही द्योतक है।जैसे विश्वभर में धर्म तंत्र ने भगवान, ईश्वर और अवतारों के मिथक के जरिये जनता को गुलाम बनाये रखा है, ठीक उसी तरह राजनीति, समाज,यूनियन और संगठनों में भी हम इन्ही ईश्वरों, भगवान और अवतारों के शिकंजे में हैं, जहां वैज्ञानिक वस्तुवादी दृष्टिकोम का निषेध है और हर सवाल पूछनेवालेए नास्तिक को सजाए मौत का प्रावधान​​ है।​
पहले इस चक्र व्यूह को तो तोड़ें। साठ के दशक से हम सुनते रहे हैं कि राजनीति से मोहभंग से नई चेतना का उन्मेष। अस्सी के दशक से​​ सुन रहे हैं कि उत्तरभारत में सामाजिक न्याय के लिए उथल पुथल और वंचितों, बहिष्कृतों की सत्ता में भागीदारी। पर मनुस्मृति के खुले बाजार के तंत्र में मारे जाने वाले अब सिर्फ बहिष्कृत समुदायों के लोग ही नहीं हैं, सामाजिक बहिष्कार और अस्पृश्यता के अलावा इसका आर्थिक दायरा पूरे निनानब्वे फीसद को अपनी चपेट में ले चुके हैं। हम लगातार एक दशक से प्रतिबध्द सामाजिक कार्यकर्ताओं से निवेदन करते रहे  हैं कि अलगाव की इन दीवारों को ढहा दैंदें और जनप्रतिरोध की साझा जमीन तैयार करें, जिसके बिना न मुक्ति संभव है, न स्वतंत्रता, न स्वायत्तता, न समता, न समान अवसर और सामाजिक न्याय, न बहुजन या सर्वजन हित और न ही लोकतंत्र, अस्तित्व या​ ​ जीवन। आइनस्टीन ने सही कहा है कि जो जीवन को व्यर्थ समझते हैं वे जीने के लायक नहीं है। जो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को ​​फिजूल मानते हैं, उनके लिए भी जीवन उसी तरह गैरप्रासंगिक है।
-पलाश विश्वास

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

फैसला कीजिये : मोदी बड़े या अडवाणी


हिन्दुवत्व वादी खेमे के सबसे बड़े राजीनीतिक दल में अडवाणी बड़े या मोदी को लेकर घमासान चल रहा है और हिन्दुवत्व वादी तत्व संशय की स्तिथि में हैं। अडवाणी जी ने पहले अपनी रथ यात्रा निकाल कर जनता दल की सरकार को ध्वस्त कर दिया था और फिर बाद में बाबरी मस्जिद ध्वंस करा कर पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे करवाए थे लेकिन पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना की मजार पर जाकर उनका गुणगान भी किया था वहीँ दूसरी तरफ टनाटन हिन्दुवत्व वादी नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं। गोधरा ट्रेन कांड के बाद पूरे गुजरात में भारतीय नागरिकों का कत्ले आम कराया था और अब उनके खिलाफ मुंह खोलने वाले आई.पी.एस अफसर संजीव भट्ट निलंबित होकर जेल की हवा खा रहे हैं। डी.डी बंजारा के समय गुजरात में आतंकवाद के नाम पर सरेआम नौजवानों को गोलियों से एनकाउंटर के नाम पर मार डाला गया था लेकिन हिन्दुवत्व वादी नरेंद्र मोदी जी का ह्रदय जरा सा भी नहीं पिघला। नरेंद्र मोदी साहब ने अभी कुछ दिन पूर्व सद्भावना उपवास किया था और एक चापलूस ने इस्लामी टोपी लगाने के लिये भेट की तो उन्होंने सख्ती से मना कर दिया। अडवाणी जी अगर होते तो टोपी अवश्य लगा लेतेअब फैसला हिन्दुवत्व वादी शक्तियों को करना है कि उनका नेता मोदी है या अडवाणी ?

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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