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बुधवार, 24 दिसंबर 2014

क्या मुस्लिम पार्टियों से मुसलमानों का भला होगा ?


पिछले लगभग एक दशक में भारत में कई ऐसे राजनैतिक दलों का उदय हुआ है जिनमें या तो मुसलमानों का प्रभुत्व है या जिनका नेतृत्व मुसलमानों के हाथों में है। सन् 2005 में असम में मौलाना बदरूद्दीन अजमल ने एआईयूडीएफ की स्थापना की, सन् 2007 में मुफ्ती इस्माइल ने मालेगांव में मुस्लिम नेतृत्व वाला एक मोर्चा बनायाए जिसके काफी सदस्य चुनकर विधानसभा में पहुंचे। सन् 2008 में उत्तरप्रदेश के एक सर्जन मोहम्मद अय्यूब ने पीस पार्टी की स्थापना की। इसके बाद, सन् 2009 में पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने अपनी राजनैतिक शाखाए सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की नींव रखी, जिसके अध्यक्ष बने ए. सईद। जमायते इस्लामी ने अपने संस्थापक मौलाना अबू.अल.मोदूदी की सलाह, कि मुसलमानों को विभाजित भारत में राजनीति में हिस्सा नहीं लेना चाहिए और परोक्ष रूप से भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए, के लगभग 70 वर्ष बादए सोशल वेल्फेयर पार्टी ऑफ इंडिया के नाम से अपना राजनैतिक दल गठित किया। वेल्फेयर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष थे मुज़तबा फारूख और उसके वर्तमान अध्यक्ष हैं एसक्यूआर इल्यिास। इनके अतिरिक्त,ऑल इंडिया इत्तेहाद.अल. मुसलमीन ;एमआईएम ने पहली बार तेलंगाना से बाहर अपने उम्मीदवार खड़े किए और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतने में सफल रही।
प्रजातंत्र में हर हितबद्ध समूह को यह अधिकार है कि वह अपने हितों की रक्षा करने व उन्हें ब़ढ़ावा देने के उद्धेश्य से सरकारी नीतियों को प्रभावित करने और संसाधनों में अपनी वाजिब हिस्सेदारी हासिल करने के लिए प्रजातंत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले। इस अधिकार पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता बशर्ते संबंधित समूह संविधान और कानून की हदों में रहकर अपना काम करे। देश में ऐसी कई पार्टियां हैं जो विशिष्ट समुदायों या यहां तक कि जातियों के हितों की रक्षा करने के लिए गठित की गई हैं। इसके उदाहरण हैं दलितों की आवाज को बुलंद करने के लिए बनाई गईं पार्टियां जैसे रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, जस्टिस पार्टी और बहुजन समाज पार्टी। जाति.आधारित दलों में शामिल हैं,अपना दल,जो कुर्मियों का प्रतिनिधित्व करता है। इनके अतिरिक्त, हमारे देश में कई क्षेत्रीय पार्टियां भी हैं जो 'धरती के लालों' के हितों का संरक्षण करने का दावा करती हैं। इनमें शामिल हैं दक्षिण भारत की द्रविड पार्टियां और महाराष्ट्र की शिवसेना। हमारे देश में ऐसे दल भी हैं जो केवल एक धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे अकाली दल। परंतु किसी भी ऐसी पार्टी के गठन, जिसमें मुसलमानों का नेतृत्व या प्रभुत्व हो, से मीडिया व गैर.मुस्लिम समुदायों के कान खड़े हो जाते हैं। उनका डर तब और बढ़ जाता है जब ऐसी पार्टियां चुनावों में वोट हासिल कर लेती हैं। इसका कारण यह है कि हिन्दू राष्ट्रवादियों ने हमारे दिमाग में यह भर दिया है कि मुसलमान अलगाववादी, आतंकवादी और साम्प्रदायिक हैं। ज्योंहि कोई मुस्लिम पार्टी अस्तित्व में आती है,यह संदेह व्यक्त किया जाने लगता है कि अंततः वह देश को एक और विभाजन की ओर ले जाएगी। यह तो मानकर ही चला जाता है कि वह पार्टी घोर साम्प्रदायिक होगी।
पहचान की राजनीति या तो वर्चस्ववादी हो सकती है या प्रजातांत्रिक। पहचान की वर्चस्ववादी राजनीति अक्सर राष्ट्रवाद का चोला ओढ़े रहती है। वह अपने समुदाय या नस्ल को श्रेष्ठ मानती है और उसका दावा होता है कि धरती के लाल या मूलनिवासी होने के कारण उसके समुदाय को अप्रवासियों की तुलना में ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए। वह राष्ट्रीय संसाधनों और सत्ता में गैर.आनुपातिक हिस्सेदारी चाहती है।  उदाहरणार्थ, भारत के हिन्दू राष्ट्रवादी यह कहते हैं कि छोटे भाई ;अल्पसंख्यकों का कर्तव्य है कि वह बड़े भाई ;बहुसंख्यकों की सेवा करे। दूसरी ओर, पहचान की प्रजातांत्रिक राजनीति समावेशिता की बात करती है और वह सत्ता व संसाधनों में केवल अपना उचित हिस्सा मांगती है। वह अपने धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी संघर्ष करती है। इसका उदाहरण है दलित और आदिवासी पहचान की राजनीति, जो दमनकारी सामाजिक.सांस्कृतिक व्यवस्था का विरोध करती है।
एमआईएम की पहचान की राजनीति  
 एमआईएम और एसडीपीआई की पहचान की राजनीति, वर्चस्ववादी श्रेणी में आती है। एमआईएम का लक्ष्य है मुस्लिम समुदाय में साम्प्रदायिक चेतना जगाना और इस धार्मिक समुदाय को राजनैतिक समुदाय में परिवर्तित कर उसका राजनैतिक प्रतिनिधि बनना। वह इस बात पर जोर देती है कि मुसलमान अन्य समुदायों से एकदम अलग, बल्कि 'श्रेष्ठ' हैं, और इसलिए उन्हें राजनैतिक दृष्टि से भी एक होना चाहिए। सांस्कृतिक, भाषायी व नस्लीय दृष्टि से विविधवर्णी व विभिन्न पंथों में बंटे मुस्लिम समुदाय को एक करने के लिए एमआईएम मुसलमानों के'गौरवशाली अतीत' पर जोर देती है और भावनात्मक  प्रतीकों का इस्तेमाल करती है। एमआईएम शरीयत, पवित्र कुरान, इस्लाम के पैगम्बर व उर्दू भाषा जैसे कई प्रतीकों का अपनी राजनीति में इस्तेमाल करती रही है। सन् 1980 के दशक के अंत और सन् 1990 के दशक की शुरूआत में उसने बाबरी मस्जिद के प्रतीक का इस्तेमाल कर जमकर वोट कबाड़े। हैदराबाद में तस्लीमा नसरीन की एक सभा पर एमआईएम के गुंडों ने हमला किया। एमआईएम लंबे समय से यह मांग करती रही है कि तस्लीमा नसरीन और सलमान रूश्दी को भारत सरकार को वीजा नहीं देना चाहिए और उनकी किताबों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। अकबरउद्दीन ओवैसी पर घृणा फैलाने वाले भाषण देने के आरोप में एक मुकदमा भी चल रहा है।
एमआईएम ने कभी उन मुस्लिम युवकों के मानवाधिकारों की रक्षा की बात नहीं की, जिन्हें आतंकी होने के झूठे आरोपों में जेलों में ठूंस दिया गया है।
एमआईएम की शक्ति में वृद्धि और उसके प्रभाव क्षेत्र का विस्तार, हिंदू राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया स्वरूप और उसके बहाने से किया जा रहा है। एमआईएम मुसलमानों से यह कहती है कि केवल वह ही हिंदू राष्ट्रवादियों की चुनौती का उपयुक्त प्रतिउत्तर देने में सक्षम है। जबकि सच यह है कि वह हिंदू राष्ट्रवादियों को मजबूती दे रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में एमआईएम के उतरने के फैसले से हिंदू राष्ट्रवादी भारी प्रसन्न हैं। अगर एमआईएम समाज से स्वयं को अलग.थलग महसूस कर रहे महत्वाकांक्षी मुस्लिम युवकों के एक हिस्से के मत भी पाने में कामयाब हो जाती है तो इससे'आप' उम्मीदवारों की हार की संभावना बढ़ेगी। यही कारण है कि कुछ लोगों का मानना है कि चुनावी मैदान में एमआईएम के प्रवेश के पीछे भाजपा है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मुसलमानों के एक बड़े तबके ने एमआईएम का साथ दिया। यह भाजपा के उदय के साथ बढ़े धार्मिक ध्रुवीकरण का नतीजा तो था ही, इसके पीछे भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ का 'लव जिहाद' अभियान भी था। योगी आदित्यनाथ,सन् 2014 में 11 विधानसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनावों में भाजपा के प्रचार मैनेजर थे। इसके अतिरिक्त,एक अन्य भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने मदरसों को आतंकवाद के अड्डे बताया।  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रांगण में राजा महेन्द्र प्रताप की जयंती मनाने का प्रयास भी किया गया, जिससे जाटों को खुश किया जा सके और तनाव बढ़े। मुसलमानों के दानवीकरण के साथ.साथ, हिंदू राष्ट्रवादियों ने राजनैतिक शक्तिप्रदर्शन भी किए और त्रिलोकपुरी ;दिल्ली व अहमदाबाद, बड़ौदा व सोमनाथ ;सभी गुजरात में दंगे भी भड़काए। इस पूरे 'दानवीकरण' अभियान के दौरान, 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टियां चुप्पी साधे रहीं।
एमआईएम की राजनैतिक रणनीति यह है कि सभी मुसलमानों को एक करके उनके एकतरफा वोट डलवाए जाएं और गैर.मुस्लिम मतदाताओं को विभाजित रखा जावे। सभी मुसलमान एक होकर उसे वोट दें, यह सुनिश्चित करने  के लिए एमआईएम को मुसलमानों को यह विश्वास दिलाना होगा कि केवल कोई मुसलमान ही उनके हितों का सच्चा रक्षक हो सकता है और उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर सकता है। और यह भी कि एमआईएम ही मुसलमानों की असली प्रतिनिधि है। यह हमें जिन्ना के इस दावे की याद दिलाता है कि वे ही मुसलमानों के एकमात्र प्रवक्ता हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में औरंगाबाद व अन्य स्थानों पर चुनाव सभाओं में बोलते हुए ओवैसी बंधुओं ने स्वयं को  'निडर'बताते हुए कहा कि कोई ताकत उन्हें डरा नहीं सकती और वे मुसलमानों की खातिर कोई भी नतीजा भुगतने को तैयार हैं। उन्होंने मुसलमानों के साथ हो रहे अन्याय का हवाला देते हुए यह याद दिलाया कि मुसलमान एक समय देश के शासक थे। उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान अपनी बेहतरी चाहते हैं तो उन्हें एक होकर एमआईएम को वोट देना चाहिए।
इस रणनीति में मूलभूत कमियां हैं। इसके सहारे, एमआईएम तेलंगाना के बाहर एक.दो सीटें जीतने से ज्यादा कुछ हासिल नहीं कर सकती। और शायद यही उसका लक्ष्य भी है। अपनी लड़ाकू छवि बनाकर एमआईएम अन्य मुस्लिम प्रभुत्व व नेतृत्व वाली पार्टियों को किनारे करना चाहती है। परंतु उसकी यह रणनीति केवल उन्हीं चुनाव क्षेत्रों में सफल हो सकती है जहां मुसलमान,आबादी का कम से कम 35 प्रतिशत हैं। केवल ऐसे चुनाव क्षेत्रों में ही मुसलमानों के प्रभुत्व और उनके नेतृत्व वाली पार्टियां चुनाव जीतने की उम्मीद कर सकती हैं। समस्या यह है कि देश में केवल 19 ऐसे जिले हैं जहां मुसलमानों का आबादी में प्रतिशत 50 से ज्यादा है। इस स्थिति से मुकाबला करने के लिए एमआईएम ने दलितों के साथ सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश की। परंतु यह एक पुराना और असफल फार्मूला है, जिसका सबसे पहले इस्तेमाल हाजी मस्तान ने किया था। हाजी मस्तान एक गैंगस्टर थे, जो बाद में राजनीतिज्ञ बन गए और उन्होंने सन् 1985 में दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ का गठन किया। परंतु उनकी पार्टी एक भी सीट न जीत सकी और उसके सभी उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं।
सन् 2001 की जनगणना के अनुसार, देश में ऐसे 25 जिले हैं जिनमें 10 लाख से अधिक मुसलमान रहते हैं। इनमें सबसे बड़ा है मुर्शिदाबाद, जिसकी मुस्लिम आबादी 37 लाख है। दूसरे स्थान पर है मल्लापुरम व इसके बाद आता है दक्षिण व पूर्व चैबीस परगना। ये तीनों जिले हिंदी पट्टी के बाहर हैं। देश के 593 जिलों में से केवल 9 को मुस्लिम बहुल कहा जा सकता हैए जहां कि मुसलमानों की आबादी 75 प्रतिशत या उससे ज्यादा है। इनमें शामिल हैं लक्ष्यद्वीप और जम्मू और कश्मीर के 8 जिले। ऐसे जिलो की संख्या 11 है जिनमें मुसलमानों की आबादी 50 से 75 प्रतिशत के बीच है और 38 जिलों में वे आबादी का 25 से 50 प्रतिशत हैं। कुल 182 जिलों में मुस्लिम आबादी,10 से 25 प्रतिशत के बीच है। इन 182 जिलों में कुल मुसलमानों के 47 प्रतिशत निवास करते हैं और 65 प्रतिशत मुसलमान ऐसे जिलो में रहते हैं जहां उनकी आबादी 25 प्रतिशत से कम है।
जिन जिलों में मुस्लिम आबादी 10 से 25 प्रतिशत के बीच है वहां वे केवल अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकतेए यद्यपि वे चुनाव परिणामों को प्रभावित अवश्य कर सकते हैं। और यह भी तब होगा जब मुसलमान केवल सांप्रदायिक आधार पर वोट दें, जो कि शायद ही कभी होता हो। ऐसे कई मुसलमान हैं जो चुनावी मैदान में किसी मुसलमान के होते हुए भी हिंदू उम्मीदवार को वोट देते हैं क्योंकि वह उनकी पसंद की पार्टी का प्रतिनिधि होता है। एक बात और, इन जिलों में भी मुसलमान चुनाव परिणामों पर निर्णायक प्रभाव तभी डाल सकते हैं जब हिंदू, जातिगत, सांस्कृतिक व राजनैतिक आधार पर विभाजित हों। जिन जिलों में मुसलमानों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है, वहां स्थिति इसके उलट होती है क्योंकि एक से अधिक पार्टियां मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा कर देती हैं और मुस्लिम वोट बंट जाते हैं। कभी.कभी ऐसा भी होता है कि गैर.मुसलमान एकतरफा वोट देकर गैर.मुस्लिम उम्मीदवार को जिता देते हैं। उदाहरणार्थ,, हालिया लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश के रामपुर संसदीय क्षेत्र से भाजपा के नेपाल सिंह विजयी हो गए जबकि रामपुर में मुसलमानों की आबादी 51 प्रतिशत से अधिक है। मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों के कारण लोकसभा चुनाव के समय धार्मिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर था और इसलिए भाजपा रामपुर में सभी जातियों के वोट हासिल करने में सफल रही। मुसलमानों के वोट समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नसीर अहमद खान, कांग्रेस के नवाब काजि़म अली खान और बसपा के अकबर हुसैन के बीच बंट गए।
सहारनपुर में कांग्र्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद ने मुसलमानों को अपने पक्ष में ध्रुवीकृत करने के लिए अपनी एक सभा में कहा कि'गुजरात में मुसलमान केवल चार प्रतिशत हैं। यहां मुसलमान 42 प्रतिशत हैं। अगर वे ;भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी, रामपुर को गुजरात में बदलने की कोशिश करेंगे तो हम उनके हाथ.पांव काट डालेगे'। यहां यह महत्व्पूर्ण है कि मसूद ने जिन आंकड़ों का हवाला दिया, उनकी सत्यता संदेहास्पद है। इस तरह की बातों के कारण ही इस बार लोकसभा में मुसलमानों की संख्या,आजादी के बाद से सब से कम है। अलीगढ़ का उदाहरण लीजिए। इस संसदीय क्षेत्र की 40 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। अगर मुसलमान एकसाथ मिलकर वोट देते और हिंदू वोटों का विभाजन होता तो वहां से मुस्लिम उम्मीदवार को जीतना चाहिए था। परंतु हुआ इसके ठीक उलट। समाजवादी पार्टी के जफर आलम तीसरे नंबर पर अटक गए। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के डॉ.अरविंद कुमार सिंह जिन्हें 2,27,886 मत प्राप्त हुए और 5,14,622 वोट लेकर भाजपा के सतीश कुमार गौतम चुनाव जीत गए। अर्थात, भाजपा की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति सफल रही, मुस्लिम मतदाता विभाजित हो गए और हिंदुओं को एक करने के लिए भाजपा ने मतदान के दिन यह अफवाह फैला दी कि मतदान केंद्रों पर मुसलमानों की लंबी.लंबी कतारें लगी हैं और वे जफर आलम को जिताने पर आमादा हैं। मुरादाबाद में, जहां 45.5 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, भाजपा के कुंवर सिंह ने 4,85,224 वोट प्राप्त कर समाजवादी पार्टी के डॉ. एस.टी. हसन को हरा दिया। हसन को 3,97,720 वोट प्राप्त हुए। भिवंडी में, जहां मुस्लिम आबादी 35 प्रतिशत से ज्यादा है, भाजपा के कपिल  मोरेश्वर पाटिल 4,11,070 वोट प्राप्त कर विजयी रहे। उनके निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के विश्वनाथ रामचंद्र पाटिल को 3,01,620 वोट मिले जबकि मुस्लिम उम्मीदवारों में से सबसे ज्यादा मत प्राप्त करने वाले अंसारी मुमताज अब्दुल सत्तार को केवल 1,14,068 वोट मिले। सुब्रमण्यम स्वामी ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि भाजपा की रणनीति, मुस्लिम मतों को बांटने और हिन्दू मतों को एक करने की थी।
दरअसल,मुसलमानों को साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की आवश्यकता नहीं है। उनके लिए बेहतर यह होगा कि उन्हें पर्याप्त प्रजातांत्रिक प्रतिनिधित्व मिले ताकि वे राष्ट्रनिर्माण में हिस्सेदारी कर सकें। उन्हें अपनी साम्प्रदायिक पहचान पर जोर नहीं देना चाहिए। ध्रुवीकरण और मुस्लिम वोट बैंक का निर्माण की कोशिशों से उनका प्रतिनिधित्व कम ही होता है,जैसा कि लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के नतीजों से जाहिर है। हमें ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जिसमें सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए सभी वंचित समुदाय एकसाथ आएं और राज्य को इस बात के लिए मजबूर करें कि वह सभी नागरिकों के मानवाधिकारों का सम्मान करे। हमें साम्प्रदायिक चेतना को जगाने की आवश्यकता नहीं है। हमें समानता, स्वतंत्रता और न्याय के मूल्यों पर जोर देना चाहिए जिसकी आवश्यकता हाशिए पर पड़े सभी समुदायों को है,चाहे वे धार्मिक अल्पसंख्यक हों,भाषायी अल्पसंख्यक हों या फिर दलित,आदिवासी,महिलाएं या श्रमिक।
-इरफान इंजीनियर

शनिवार, 28 जून 2014

बाकी हैं अभी पत्तों पे जले तिनकों की तहरीरें

मई 14 में सम्पन्न हुए लोकसभा घटना पूर्ण उत्तेजक चुनाव के परिणामों से कुछ और साबित हुआ हो या न हुआ हो यह तो लगभग सिद्ध हो ही गया हे कि इस महान देश की जनता के बड़े हिस्से को धर्मनिरपेक्षता अथवा साम्प्रदायिकता की कोई चिंता नहीं। जबकि धर्मनिरपेक्षता का राजनैतिक सामाजिक दर्शन संघर्षशील जनता ही का हथियार है। उसकी जितनी उपयोगिता दलित, दमित, वंचित वर्गों के लिए है, उतनी साधन सम्पन्न वर्गों के लिए नहीं। इतिहास इसे बार-बार प्रमाणित करता रहा है। हाल के चुनाव में कारपोरेट सेक्टर, देशी धन्ना सेठों ने जिस भामाशाही अन्दाज में पार्टी विशेष के लिए अपनी तिजोरियों के दरवाजे खोल दिए वह भी इसी यथार्थ को प्रमाणित करता है। इसके विपरीत सामाजिक समानता, न्याय के सिद्धांत तथा अवामी एकता के प्रबल पक्षधर लोग, संगठन ही प्रमुख रूप से इस दर्शन का पक्ष लेते रहे हैं। उन्होंने इस लक्ष्य को पाने के लिए कठिन संघर्ष किया, आज भी कर रहे हैं। धर्म निरपेक्षता अवाम के सभी हिस्सों के बीच मजबूत एकता का आवश्यक सिद्धांत है। यह सहसा या ईश्वरीय आदेश नहीं है कि देश की आजादी के बाद ही से साम्प्रदायिक विभेदकारी शक्तियाँ, सरकारों की जनविरोधी नीतियों के पक्ष में खड़ी होती रही हैं। जब कभी वे सत्ता में आईं तो उन्होंने उन्हीं नीतियों का अनुसरण भी किया। यहाँ तक कि वे ऐसी नीतियों कार्यवाइयों के प्रति अधिक उत्साही व उदार नजर आईं। दुःखद घटनाओं की यादें अभी पूरी तरह धूमिल नहीं हुई हैं जिनके कारण अवाम के संकटों से घिरे वर्गों को कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ा। दो भिन्न धार्मिक सामाजिक पहचान वाले वर्गों के बीच हिंसक टकराव की स्थितियों का निर्मित होना, फिर उनका भयावह तबाही के यथार्थ का रूप ले लेना अन्ततः किसके हित साधने के काम आता है, आजाद भारत के अनेक दंगों के समान गुजरात एवं जमशेदपुर दंगे भी इसका साक्ष्य प्रस्तुत कर चुके हैं। समय की शिला पर मासूम इंसानों के रक्त से लिखी इबारत बताती है कि इन दंगों में इंसानी प्राणों की बलि ही नहीं चढ़ी, बहुत कुछ जो मूल्यवान व महत्वपूर्ण था, वह भी नष्ट हुआ। देश के मेहनतकश वर्गों, जिनमें छोटे किसान, कुटीर उद्योगों में लगे लोग तथा तमाम तरह के मजदूर शामिल हैं, उनकी तबाही ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ही से अधिक गति पकड़ी। निजी उद्योग पतियों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुली लूट की छूट का इतिहास वहीं से आरंभ होता है। आर्थिक नीतियों में बड़े बदलावों का प्रस्थान बिन्दु भी वही है। एक ओर सबको साथ ले चलने, सबका हित  साधने का दावा दूसरी ओर ऐसी रणनीति को अपनाना कि सबसे अधिक सीटों वाले महाप्रदेश से दूसरे सबसे बड़े समुदाय का एक भी प्रतिनिधि लोकसभा के लिए न चुना जा सके, आबादी के अनुपात में संसद में बहुत कम प्रतिनिधित्व मिल पाना, इस समुदाय को हताश करने वाली स्थिति के प्रति राजनैतिक, सामाजिक व बौद्धिक हलकों में किसी तरह की बेचैनी के लक्षण प्रकट न होना, किन गंभीर खतरों की ओर संकेत कर रहा है, इसे बआसानी समझा जा सकता है। मंत्री मण्डल में देश के दूसरे सबसे बड़े समुदाय को न्यूनतम प्रतिनिधित्व मिलना समुदाय को निराश करने वाली स्थिति है। इस निराशा को निकट भविष्य में होने वाले चुनावों के माध्यम से कम किया जा सकता है। बनने को तो राज्य सभा भी माध्यम बन सकती है। असल चीज तो नीयत व इरादे हैं। किन्हीं भी कारणों से सत्ताधारी दल को वोट न दे सकने वाले मतदाताओं के प्रति अरुचि अथवा कटुता का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं माना जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे चुनाव अभियान का धार्मिक प्रतीकों से आरंभ होना, जैसे गंगा स्नान या आरती के दृश्य, जाहिर सी बात है इनसे धार्मिक भावनाओं का उद्वेलित होना स्वाभाविक ही था और वह हुई जिसकी परिणति धर्म निरपेक्ष देश के प्रमुख के शपथ ग्रहण समारोह में धार्मिक नारों की गूँज तथा धार्मिक नेताओं की उपस्थिति के रूप में दिखाई पड़ी। वह मूल्य और परम्पराएँ जो हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं तथा सभी वर्गों द्वारा समादृत हैं, उनके ध्वंस के उपक्रम से बचना राष्ट्रीय दायित्व के समान है। कहा जा सकता है कि एन0डी0ए0/भाजपा की भारी जीत के पीछे राजनैतिक संस्कृति में बदलाव की इच्छा के साथ ही धार्मिक भावनाओं की आवेगमयिता की भी उपस्थिति रही है। सामाजिक धु्रवीकरण ने निश्चय ही अपना काम किया है। सरकार बनने के बहुत छोटे अन्तराल के बाद ही राम मन्दिर तथा धारा 370 का मुद्दा उठने-गर्माने का संकेत तो यही है कि भाजपा अपनी पुरानी कार्य पद्धति में कोई बड़ी तब्दीली नहीं करने जा रही है जो अन्ततः कांग्रेस तथा दूसरे जातिवाद कथ्य की सेक्युलर संरचना वाली पार्टियों के काम आएगा ही। इस यथार्थ की उपेक्षा कर पाना संभव नहीं है कि मुसलमानों द्वारा कांग्रेस को वोट देने का दबाव, स्वयं कांग्रेस ने नहीं बल्कि भाजपा ने बनाया, ठीक उसी तरह जैसे मुसलमानों पर धार्मिक नेतृत्व थोपने के पीछे जैसी सक्रियता राजनैतिक दलों, (वामपंथियों को छोड़कर) की रही वैसी कोई कोशिश या इच्छा स्वयं मुसलमानों के भीतर से उठती हुई नहीं दिखाई पड़ी। मुसलमानों की बहुसंख्या ने धार्मिक नेतृत्व, मौलवी मुल्ला को मुँह लगाया भी नहीं। उन्होंने आम तौर पर अपने विवेक से मतदान किया। जाति तथा धर्म के नाम पर उन्होंने कभी मतदान किया भी नहीं। यहाँ तक कि वह अपनी तबाही को संभव करने वाले दल के साथ भी खड़े हुए। बहुधा वह मुख्य धारा के साथ रहे। इस तथ्य की ओर ध्यान जाना चाहिए कि प्रचण्ड बहुमत के बावजूद सत्ताधारी गठबंधन तीस से तैंतीस प्रतिशत मतदाताओं का ही विश्वास प्राप्त कर सका । 70 प्रतिशत मतदाता अब भी उससे सहमत नहीं हंै तो क्या 70 प्रतिशत मतदाताओं को दण्डित किया जाएगा। यदि नहीं तो शिक्षा, सेवा क्षेत्र, व्यापार तथा विधान सभाओं एवं संसद में उनका प्रतिशत में अपेक्षित वृद्धि के लिए विशेष अभियान चलाया ही जाना चाहिए। वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन ऐसा कर पाने में सक्षम है बस उसे अच्छे दिन के वायदे को याद रखने की जरूरत है।














 -शकील सिद्दीकी
मो.09839123527
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

रविवार, 9 सितंबर 2012

न्यायपूर्ण समाज का संघर्ष

मजिस्ट्रेट डा. ज्योत्सना पारिख का 31 अगस्त 2011 के फैसले, जिसमें उन्होंने बाबू बजरंगी एवं डाक्टर माया कोडनानी को लम्बी अवधि के कारावास की सजाऐं सुनाई हैं, ने नरोदा पाटिया के लोमहर्षक हत्याकांड के पीडि़तों को अकल्पनीय राहत दी है। उनके लिए यह फैसला मानों ईद की खुशी को लेकर आया है। नरोदा पाटिया में सन् 2002 में क्रूरता का जो नंगा नाच हुआ थाए उसके शिकार हुए लोगों और जो मारे गये, उनके परिवारजनों को कम से कम यह सांत्वना मिली है कि उनके साथ बर्बर व्यवहार करने वालों को उनके किये की सजा मिल गई है। यह फैसला पीडितों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, घटना के गवाहों और कानूनविदों द्वारा लड़ी गई एक लम्बी लड़ाई के बाद आया है। इन सब लोगों ने हर संभव प्रयास किये कि पीडि़तों के साथ न्याय हो। ऐसा कहा जाता है कि न्याय के बिना शांति स्थापना नहीं हो सकती। इस निर्णय से यह मान्यता पुष्ट हुई है।
इस निर्णय से उन कई झूठे प्रचारों और मिथकों का पर्दाफाश भी हुआ है, जिन्हें साम्प्रदायिक शक्तियों लम्बे समय से फैलाती आ रहीं  थीं। उनमें से पहला और सबसे बड़ा झूठ यह था कि गुजरात की हिंसा, गोधरा ट्रेन आगजनी की प्रतिक्रिया थी। अब तक समाज के बड़े तबके और पूरे भारत व विशेषकर गुजरात के समाज का उस हिस्से, जिसका पूरी तरह से साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है, की यही मान्यता थी कि गुजरात के दंगे, गोधरा की प्रतिक्रियास्वरूप हुए थे। अपने निर्णय में मजिस्ट्रेट ने साफ-साफ कहा है कि “हजारों लोगों ने एक राय होकर, पहले से तय इरादे को पूरा करने के लिए, सुनियोजित ढंग से निहत्थे और डरे हुए लोगों पर हमला किया। यह हिंसा, गोधरा की ट्रेन आगजनी की स्वस्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं थी। बल्कि पहले से तय सुनियोजित हत्याकांड को अंजाम देने के लिए गोधरा कांड को बहाने बतौर इस्तेमाल किया गया।” साम्प्रदायिक ताकतों ने गुजरात दंगों को  ”स्वभाविक गुस्सा”, जिसे राज्य नियंत्रित करने में असफल रहा, का रूप देने की कोशिश की। इस धारणा के विपरीत, अदालत ने कहा है कि यह जान-समझ के अंजाम दिया गया, सुनियोजित हत्याकांड था और गोधरा घटना का इस्तेमाल, केवल बहाने के रूप में किया गया था  ताकि गुजरात में समाज को साम्प्रदायिक आधार पर वीकृत किया जा सके।
भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है। हमारे देश में कई दशकों से सांप्रदायिक दंगे ओर हिंसा होती रही है परंतु कुछ समय से इसने योजनाबद्ध  हत्याकांडो का स्वरूप ग्रहण कर लिया था। यह बात मानवाधिकार संगठनों और दंगों की जांच के लिए नियुक्त किये गये जन न्यायाधिकरण लंबे समय से कहते आ रहे थे। अदालत के फैसले से इस तथ्य की पुष्टि हुई है.
अब तक होता यह आ रहा था कि दंगों में मासूमों का खून बहता था और हिंसा करने वाले सीना फुलाये घूमते रहते थे। पंरतु मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध संगठनों द्वारा कमर कस लेने से शनैः शनैः स्थितियों बदल रही हैं। अब दंगाईयों के लिए साफ बच निकलना कठिन होता जा रहा है। नरोदा पाटिया मामले में मानवाधिकार संगठनों ने यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया कि दंगों के दोषियों के बच निकलने और अपने राजनैतिक लक्ष्य हासिल करने का सिलसिला बंद हो सके।
इस निर्णय से यह भी स्पष्ट है कि हमारी न्याय व्यवस्था स्वतः दंगों के दोषियों को सजा देने में सक्षम नहीं है इसके लिए तीस्ता सीतलवाड, गगन सेठी, हर्ष मंदर, यूसुफ मुछाला, मुकुल सिन्हा, गोविंद पवार और उनके जैसे अन्य व्यक्तियों के अथक प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है। इन लोगों ने घटना के अलग-अलग पहलुओं पर कार्य किया और एक-दूसरे के प्रयासों में मदद की और तब जाकर दोषियों को सजा और पीडि़तों को न्याय सुनिश्चित हो सका। इन लोगों को हमारी व्यवस्था की कमियों से झूझना पड़ा। उन्हें यह सुनिश्चित करना पड़ा कि पीडि़तों और गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा मिले और शिकायतों व प्रथम सूचना रपटों को ठीक ढंग से दर्ज किया जाये। उनके ही प्रयासों का यह नतीजा था कि न्याय के रास्ते में जो बाधाएं थीं, वे एक-एक कर दूर हो सकीं।
इस सिलसिले में जो पहला प्रश्न उठता है वह यह है कि क्या हालात ऐसे ही बने रहेंगे?  क्या न्याय पाने के लिए इतने सघन प्रयास किये जाने होंगे?  क्या पीडि़तों व गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने  हेतु इतनी मेहनत करना होगी? आज समय की मांग है कि हमारा समाज और राष्ट्र, पुलिस व्यवस्था व राजनैतिक नेतृत्व के  दृष्टिकोण में इस तरह का परिवर्तन लाया जावे ताकि न्याय मिलना एक सामान्य, नियमित एवं स्वचालित प्रक्रिया बन सके न कि एक अपवाद। आज भी भागलपुर, दिल्ली और मुंबई सहित कई स्थानों पर हुए दंगों और हत्याकांडों के पीडि़त न्याय पाने का इंतजार कर रहे हैं।
इस फैसले का एक पहलू है हिंसक दंगाईयों का नेतृत्व करने वाले लोगों का चरित्र। माया कोडनानी, राष्ट्रसेविका समिति के रास्ते रजनीति में आईं थीं. यह  संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधीन काम करता है। यहां यह कहना समीचीन होगा कि आर.एस.एस. के दृष्टिकोण में महिलाएँ स्वनिर्णय की क्षमता नहीं रखतीं और इसलिए जहां आर.एस.एस. में महिलाओं को कोई स्थान नहीं मिलता वहीं महिलाओं के संगठन का नाम राष्ट्रसेविका समिति है. अर्थात पुरूष  अपने निर्णय स्वयं लेते हैं जबकि महिलाऐं सेवा करतीं हैं।
गुजरात दंगों के दौरान माया कोडनानी विधायक थीं। नरोदा पाटिया में उन्होंने उन्मादी भीड़ का नेतृत्व किया। उसे भड़काया और हथियार और असलाह उपलब्ध करवाए। इसके बाद, उन्हें मंत्री बना दिया गया। जब उनका नाम दंगों के मामलों में आया तब उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया और राज्य सरकार ने उनसे नाता तोड़ लिया। यद्यपि विहिप और संघ के कुछ सदस्य इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं परंतु संघ परिवार की यह पुरानी नीति है कि जब भी उसके किसी सदस्य का किसी अपराध में शामिल होने का पर्दाफाश हो जाता है -- चाहे वह गांधी वध हो या पास्टर स्टेंस को जिंदा जलाया जाना या आतंकी हमलों में भागीदारी-- तुरंत यह घोषित कर दिया जाता है कि संघ का उस व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि सच यह होता है कि वे लोग संघ की विचारधारा में रचे-बसे होते हैं और संघ की नीतियों का ही क्रियान्वयन कर रहे होते हैं। कोडनानी ने कतिपय कारणों से यह कहा कि वे राजनीति की शिकार हुईं हैं। उनका यह बयान रहस्यपूर्ण है और हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि वे किस राजनैतिक षड़यंत्र की शिकार बनीं, यह देर-सबेर सामने आएगा।
नरोदा पाटिया हत्याकांड के एक अन्य खलनायक हैं बाबू बजरंगी, जिनके द्वारा ”तहलका” टीम के सामने किये गये अपने कारनामों के वर्णन से पूरे देश को धक्का लगा था। उन्होंने कहा था कि उन्हें तीन दिन दिये गये थे और यह भी कि वे और उनके साथी टेस्ट मैच नहीं वरन ओ.डी.आई. खेल रहे थे, जिसमें कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा स्कोर खड़ा करना होता है। बाबू बजरंगी ने यह भी फरमाया कि निरीह मुसलमानों को मारने के बाद वे राणा प्रताप की तरह महसूस कर रहे थे। शायद वे नहीं जानते कि राणा प्रताप ने धर्म के नाम या धार्मिक कारणों से किसी को नहीं मारा था। राणा प्रताप तो केवल सत्ता प्राप्त करने के लिए अन्य राजाओं से युद्धरत थे। बाबू बजरंगी शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि राणा प्रताप की सेना में बड़ी संख्या में मुसलमान सिपाही थे। राणा प्रताप के लिए लड़ते हुए उनकी फौज के जो सिपहसालार मारे गये, उनमें से एक का नाम था हाफिज खान सूर, जिनका मकबरा आज भी हल्दीघाटी में है। मध्यकालीन इतिहास को तोड़ मरोड़ कर हम उसे किस तरह नफरत फैलाने का हथियार बना रहे हैं, यह स्पष्ट है.
और श्री नरेन्द्र मोदी के अन्तःकरण का क्या? नरेन्द्र मोदी को सन् 2002 के हत्याकांड से बहुत राजनैतिक लाभ हुआ। क्या उन्हें इस हत्याकांड पर कुछ पछतावा है? क्या वे क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिये गये हजारों लोगों के लिए दो आंसू बहाना चाहेंगे?  क्या उन्हें इस बात का दुःख है कि जिन लोगों को उन्होंने राजनीति में आगे बढ़ाया, उन्हें ही हिंसा का दोषी ठहरा कर अदालतों द्वारा लम्बी सजाऐं सुनाई जा रही हैं?
हमें उम्मीद है कि हमारे देश के कर्ताधर्ता, हमारे कानून और व्यवस्था में इस प्रकार के बदलाव लायेंगे जिससे हिंसा करने वालों को स्वमेव सजा मिले और वह सजा ऐसी हो कि आगे कोई हिंसा करने या भड़काने की हिम्मत न कर सके। इस निर्णय का स्वागत है परंतु इसने कुछ प्रश्नों को भी जन्म दिया है. उन लोगों का क्या जिनका कर्तव्य था कि वे निर्दोषों को रक्षा करें, उनकी शिकायतों को गंभीरता से लें और दोषियों को सजा दिलवायें? हमें एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण की ओर बढ़ना होगा जिसमें पहले तो नफरत की आग में निर्दोष भस्म ही न हों और अगर कोई राजनैतिक ताकत, अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस प्रकार की किसी त्रासद घटना को अंजाम दे, तो उन सभी लोगों को सजा मिले, जिन्होंने षड़यंत्र रचा, हिंसा की या अपने कर्तव्यों के अनुपालन में असफल रहे। हमें विश्वास है कि हमारे देश के प्रतिबद्ध मानवाधिकार रक्षक आगे बढेगें और एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए काम करेंगे जिसमें शांति और न्याय दोनों हों।
 -राम पुनियानी


शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

न्याय की देवी की आँखें खुली हैं

माननीय उच्चतम न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति मामले की सी.बी.आई की प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कर दिया है मुख्य बात यह है कि आठ वर्ष पूर्व मायावती की पूर्व घोषित संपत्ति लगभग 11 करोड़ रुपये की थी जो अब बढ़कर लगभग 111 करोड़ हो गयी है यही मामला अगर किसी सामान्य व्यक्ति का होता तो न्यायालय यह आदेशित करता इस तारीख तक अधीनस्थ न्यायालय में उपस्थित होकर अपनी जमानत कराओ
बहुधा, यह देखने में आता है की सामान्य व्यक्तियों का उत्पीडन कानून और प्रक्रिया के नाम पर होता रहता है और असाधारण विशेषाधिकार प्राप्त उच्च न्यायालय आँख मूंदे रहते हैं लेकिन जैसे ही बड़ी-बड़ी कंपनियों, राजनेताओं, अफसरशाहों के मामले आते हैं तो उसमें प्रक्रिया यदि दोषपूर्ण हुई तो उसका लाभ उसको तुरंत मिलता साधारण व्यक्तियों के मामले में प्रक्रिया का पालन हो या हो वह दंड का भागीदार हो जाता है क्यूंकि न्याय की देवी की अब आँखें खुली हुई हैं और तराजू में पसंघा भी पैदा हो गया है इसका इलाज वर्तमान व्यवस्था में मौजूद ही नहीं

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

अदालतें भ्रष्टाचार से मुक्त हों

न्यायपालिका के पास विशाल शक्तियाँ है क्योंकि वह जो कहती है अंतिम बात होती है, अचूक एवं अमोघ। इतनी शक्तिशाली है न्यायपालिका कि जब कार्यपालिका का कोई अधिकारी कानून का उल्लंघन करता है तो जज उसके आदेश को निरस्त कर सकते हैं और हुक्मनामे की अपनी ताकत से दिशा-निर्देश दे सकते हैं। जब संसद कोई कानून पास करती है और कानून का अतिक्रमण कर देती है या मौलिक अधिकारों की सीमाओं से बाहर निकल कर आदेश जारी करती है तो अदालत उस आदेश और कार्रवाई को खारिज कर सकती है। पर जब उच्च न्यायालय कानून के बेरोकटोक उल्लंघन के अपराधी हों तो उनकी इस चूक, उनकी इस गलती के लिए कोई तरीका है संहिता। हर संविधान का एक सामाजिक दर्शन होता है, खासकर भारत के संविधान का एक सामाजिक दर्शन है। हम एक समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र हैं। यदि संविधान के इन आदेशों का उल्लंघन होता है और जजों से जिस तरह के बर्ताव की उम्मीद की जाती है वे उस बर्ताव को धता बता देते हैं तो किसी को अधिकार नहीं कि उन्हें सही रास्ते पर लाए और उनके दुराचार को ठीक करे।
“जज लोग तत्वतः दूसरे सरकारी अधिकारियों से कुछ अलग नहीं हैं। न्यायिक ड्यूटियों पर आकर भी सौभाग्य से वे इंसान बने रहते हैं। अन्य इंसानों की तरह उन पर भी समय-समय पर गर्व और मनोविकारों का, तुच्छता एवं चोट खाई भावनाओं का, गलत समझ या फालतू जोश का असर पड़ता है।”
-ह्यूगो ब्लैक
अपनी पुस्तक में डेविड पैमिक जजों के बारे में लिखते हैंः
“अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जैक्सन ने 1952 में टिप्पणी की कि “जो लोग कुर्सी पर पहुँच जाते हैं कभी-कभी घमंड, गुस्सेपन, तंग नजरी, हेकड़ी और हैरान करने वाली कमजोरियों जैसी उन कमजोरियों का परिचय देते हैं जो इंसानियत को विरासत में मिली हुई है। यह हैरानी की बात होगी, असल में चिंताजनक बात होगी कि जो प्रख्यात मस्तिष्क वाले लोग इंग्लैंड की न्यायपालिका में हैं वे अपने अवकाश, जो उन्हें विरले ही मिलता है, के दिनों में गैरन्यायिक तरीके से काम करें। हाल में लॉर्ड चांसलर हेल्शाम ने स्वीकार किया, उन्होंने कहा कि जो लोग जज की कुर्सी पर बैठते हैं कभी वे उस चीज का शिकार हो जाते हैं जिसे जजी का रोग कहते हैं अर्थात एक ऐसी हालत जिसके लक्षण हैं तड़क-भड़क, चिड़चिड़ापन, बातूनीपन, ऐसी बातें कहने की प्रवृत्ति जो मामले में फैसला करने में जरूरी नहीं होती और शार्टकट का रुझान।”
दुख की बात है कि कानून के अंदर महाभियोग-जो इस बीमारी को बढ़ने से रोकने के लिए एक राजनैतिक इलाज है- के अलावा इसका अन्य कोई इलाज नहीं। इन चिंताजनक बातों से भी बदतर बात है वह जो लार्ड एक्शन ने कही है- ”सत्ता भ्रष्ट बनाती है और चरम भ्रष्ट बनाती है।” लोकतंत्र में लोगों को न्यायपालिका की आलोचना करने का अधिकार है जिससे पारदर्शी, स्वतंत्र, अच्छे व्यवहार वाली, पक्षपात से दूर और हर किस्म की कमजोरियों से मुक्त होने की अपेक्षा की जाती है। कितना भी महत्वपूर्ण मामला क्यांे न हो हर विवाद मंे जज जो फैसला करते हैं वह उस संबंध में अंतिम फैसला होता है। अतः जजों का चयन जाँच-पड़ताल के बाद और उनकी वर्ग राजनीति और वर्ग पूर्वाग्रहों के समीक्षात्मक मूल्यांकन के बाद हद दर्जे की सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। (देखिए, पोलिटिक्स ऑफ जुडिशयरी, लेखक प्रो. ग्रिफिथ)।
“जज लोग आप कहाँ निष्पक्ष हैं?” आप सभी कर्मचारियों की तरह उसी गोल चक्कर में चलते रहते हैं और नियोक्ता लोग जिन विचारों में शिक्षित हुए हैं और पले-बढ़े हैं आप लोग भी उन्हीं मंे शिक्षित हुए और पले-बढ़े हैं। किसी मजदूर या टेªड यूनियन कार्यकर्ता को इंसाफ कैसे मिल सकता है? जब विवाद का एक पक्ष आपके वर्ग का होता है और दूसरा आपके वर्ग का नहीं होता तो कभी-कभी यह सुनिश्चित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि आपने इन दो पक्षों के बीच स्वयं को पूरी तरह निष्पक्ष स्थिति में रखा है।”
- लॉर्ड जस्टिस स्क्रटून
न्याय और न्यायतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और भाई-भतीजावाद। हाल के दिनों में न्यायापालिका में भ्रष्टाचार बहुत अधिक बढ़ा है यहाँ तक कि सर्वोच्च स्तर पर भी। गुनाहगार जजों पर संसद में महाभियोग का तरीका पूरी तरह नाकाफी और बेकार साबित हुआ है, इसका ज्वलंत उदाहरण है रामास्वामी का मामला। प्रशांत भूषण ने
न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया है, और जिसका समर्थन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा ने किया है, क्या उसमें रत्तीभर भी अतिशयोक्ति है? जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप दिन दूना रात चैगुना बढ़ते ही जा रहे हैं। महाभियोग इनका कतई कोई समाधान नहीं है। अदालतों में बकाया पड़े-मुकदमों का अम्बार बढ़ता जा रहा है, पार्किन्सन्स कानून (संख्या बढ़ा दो) और पीटर प्रिंसिपल (अयोग्यता में वृद्धि)। कोई इलाज नहीं, इसका इलाज है नियुक्ति आयोग (अपॉइटमेंट कमीशन) और एक ऐसा कार्य निष्पादन आयोग (परफार्मेन्स कमीशन) जिनके पास काफी अधिक शक्तियाँ हों। नियुक्ति आयोग के पास यह शक्ति हो कि वह कार्य पालिका द्वारा नियुक्ति के लिए सुझाए गए नामों को खारिज कर सके और नियुक्ति से पहले उनके नाम सार्वजनिक कर सके। परफार्मेन्स कमीशन के पास जजों के दुराचार के खिलाफ जाँच करने की और दोषी पाए जाने पर उन्हें बर्खास्त करने की शक्तियाँ हों। ये चीजें संविधान में संशोधन कर न्यायिक आचरण संहिता का हिस्सा होना चाहिए। प्रस्तावित उम्मीदवार के बारे में कुछ कहने का अधिकार हर नागरिक को होना चाहिए। क्यों?
एक रोमन कहावत हैः जिस चीज का हम सब पर असर पड़ता है उसका फैसला सबके द्वारा होना चाहिए। हमारी न्यायापालिका अभी भी एक प्रतिष्ठित संस्था है। उनके नियतकालिक पाठ्यक्रम होने चाहिए ताकि वे अपने विषय में पूरी तरह पारंगत रहें।

-वी0आर0 कृष्णा अय्यर

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

दूषित विवेचना से अपराधी को निर्दोष तथा निर्दोष को अपराधी साबित किया जाता है

डॉक्टर बिनायक सेन छत्तीसगढ़ में अपने कुछ मरीजों के साथ

डॉक्टर बिनायक सेन को सजा के प्रश्न पर पक्ष और विपक्ष में बहस जारी है। मुख्य समस्या यह है कि पुलिस या अन्वेषण एजेंसी किसी भी मामले की विवेचना करती है। उसके पश्चात आरोप पत्र न्यायालय भेजा जाता है। संज्ञेय अपराधों में अभियुक्त को पुलिस गिरफ्तार कर मजिस्टरेट के समक्ष पेश करती है। वहीँ से शुरू होते हैं जमानत के मामले। देश के अन्दर जांच एजेंसियों की विवेचना का स्तर अत्यधिक घटिया है। जिस कारण अपराधी बेदाग छूट जाते हें और निर्दोष सजा पा जाते हें। स्तिथि बद से बदतर है, हत्या के अपराध में लोग आजीवन कारावास की सजा न्यायालयों से पा गए बाद में मृतक व्यक्ति जिन्दा होकर पुन: आ गया। अपहरण के मामलों में अक्सर होता है कि अपहरण हुआ भी नहीं लोग सालों जेलों में रहे और सजा भी पा गए। ब्रिटिश कालीन विधि में यह व्यवस्था थी कि जो भी शासन सत्ता के विरुद्ध जरा सा भी जाता था। उसको राजद्रोह जैसे अपराधों में गिरफ्तार कर न्यायालय से दण्डित करा दिया जाता था। ब्रिटिश कानून से ही भारतीय दंड संहिता पैदा हुई है। इसमें जगह-जगह बड़े आदमियों के अपराधों को लघु करने तथा लघु अपराध को गंभीर अपराध बनाने की व्यवस्था है। जो साफ़-साफ़ आये दिन दिखाई भी देती है। जब पुलिस चाहती है तो गंभीर अपराध को लघु अपराध घोषित कर देती है और जब चाहती है तो लघु अपराध को गंभीर अपराध घोषित कर देती है। जिससे निर्दोष को महीनो जेल में रहना पड़ता है और अपराधी को तुरंत जमानत मिल जाती है। न्यायालय में प्रक्रिया विधि चलती है और प्रक्रिया के तहत ही फैसले होते रहते हें। अपराधों की बढ़ोतरी को देखते हुए न्यायालय दरोगा की भूमिका में आ गए हैं और उनकी समझ यह है कि ज्यादा से ज्यादा सजा देकर हम अपराध का नियंत्रण कर रहे हैं। अभी तक न्याय व्यवस्था का मुख्य सिद्धांत है कि किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए चाहे अपराधी छूट जाए लेकिन अब इस सिद्धांत में मौखिक रूप से संशोधन हो चूका है निर्दोष व सदोष देखना उनका मकसद नहीं रह गया प्रक्रिया पूरी है तो सजा दे देनी है। देश में जब तमाम सारी अव्यस्थाएं है तो उनके खिलाफ बोलना, आन्दोलन करना, प्रदर्शन करना, भाषण करना आदि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं हैं लेकिन जब राज्य चाहे तो अपने नागरिक का दमन करने के लिए उसको राज्य के विरुद्ध अपराधी मान कर दण्डित करती है। डॉक्टर बिनायक सेन जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ रहे आदिवासी कमजोर तबकों की मदद कर रहे थे और राज्य इजारेदार कंपनियों के लिए किसी न किसी बहाने प्राकृतिक सम्पदा अधिग्रहित करना चाहता है। उसका विरोध करना इजारेदार कंपनियों का विरोध नहीं बल्कि राज्य का विरोध है। इजारेदार कम्पनियां आपका घर, आपकी हवा, आपका पानी, सब कुछ ले लें आप विरोध न करें। यह देश टाटा का है, बिरला का है, अम्बानी का है। इनके मुनाफे में जो भी बाधक होगा वह डॉक्टर बिनायक सेन हो जायेगा।
यही सन्देश भारतीय राज्य, न्याय व्यवस्था ने दिया है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

सत्तारूढ़ दल की लठैत है पुलिस

सत्तारूढ़ दल के लठैत

यूपी पुलिस के दामन में दाग ही दाग हैं। आम तौर पर उसकी छवि जनता के खिलाफ बर्बर गिरोह के रूप में उभरती है, जिसे वर्दी की आड़ में कुछ भी करने की आजादी है। भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की साथ गाँठ चलती रहती है। सत्ता के इशारे पर खाकी वर्दी कुछ भी करने को तैयार रहती है।
-जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला, इलाहाबाद उच्च न्यायालय (1967 में की गयी टिप्पणी)
भारत में राजा महाराजाओं के पास शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुश्तैनी व परंपरागत लठैत होते थे जो राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए कार्य करते थे। वह लठैत लोग कभी-कभी डकैती, बलात्कार, आगजनी जैसे अपराध भी करते रहते थे। ये लठैत लोग लौकी, तुरोई से लेकर बहुमूल्य चीजें नागरिकों से जबरदस्ती छीन लेते थे। नागरिक उनके खिलाफ कुछ कर नहीं पाते थे। कभी कभी लठैत और उनके सरदार राजा की भी संपत्तियों में भी सेंधमारी कर लेते थे लेकिन राजा द्वारा उसकी अनदेखी कर दी जाती थी। उसी तर्ज पर गाँव देहात में आज भी भारतीय पुलिस व्यवस्था काम कर रही है और राज्य उसके कुकृत्यों की अनदेखी कर रहा है। आज किसी की हत्या करानी हो तो एनकाउन्टर विशेषज्ञ से मिल लीजिये ट्रांस्पेरेंसी इन्टरनेशनल के सर्वे के अनुसार भारतीय पुलिस 214 करोड़ रुपये जनता से अवैध वसूली करती है। उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती घोटाला, फायर ब्रिगेड में पम्प घोटाला सहित अनेकों घोटाले पुलिस के उच्चाधिकारियों ने किये किन्तु कोई दंडात्मक कार्यवाई उनके खिलाफ अभी तक संभव नहीं हो पायी है।
पुलिस का वर्तमान समय में प्रमुख कार्य यह है कि सत्तारूढ़ दल के नेताओं को हर संभव तरीके से खुश रखो और मनचाहे तरीके से नागरिकों को लूटो, कोई कार्यवाई नहीं हो सकती है। न्याय, संविधान, विधि का शासन सब खोखले नारे हैं। जिला पंचायत के चुनाव में पुलिस विभाग के अधिकारियों ने जिस तरह जिला पंचायत सदस्यों को डरा, धमका कर, बाद में देख लेने की धमकी देकर प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष पद की कुर्सी पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को निर्वाचित करने में अहम् भूमिका अदा की है और अब ब्लाक प्रमुख पद पर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को निर्वाचित करने के लिए पुलिस अधिकारी स्टार प्रचारकों की भूमिका में नजर आ रहे हैं। बाराबंकी जनपद के रामनगर ब्लाक में अनुसूचित जाति की क्षेत्र पंचायत सदस्य श्रीमती रामदुलारी के लड़के योगेश का अपहरण सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी संजय तिवारी ने कर लिया था लेकिन पुलिस प्रशासन ने कोई कार्यवाई न करके संजय तिवारी के हौसलों को और बुलंद किया और स्थानीय पुलिस अधिकारी उनके चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि पुलिसिया लठैतों के काले कारनामो से नागरिको को बचाने के लिए एक अलग व्यवस्था कायम करने की है जिससे वर्दी पहने अपराधियों को दण्डित कराया जा सके।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

न्याय चला अब न्याय मांगने

हमें भी इन्साफ चाहिए
उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने माननीय उच्चतम न्यायालय में समीक्षा याचिका दायर कर हाईकोर्ट के प्रति सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणियों को हटाने की मांग की है। प्रदेश की सबसे बड़ी अदालत के प्रति माननीय उच्चतम न्यायलय ने कई भ्रष्टाचार से सम्बंधित कई अहम् टिप्पणियां की थी। जिसमें यह कहा गया था कि न्यायधीशों के बेटे वहीँ वकालत कर करोडो रुपये की परिसंपत्तियां बना रहे हैं, वहां कुछ सड़ने की बू आ रही है। वहीँ इलाहाबाद बार एशोसिएशन ने टिप्पणियों के प्रति अपना अघोषित समर्थन भी व्यक्त किया है। सामान्यत: कहीं न कहीं पारदर्शिता न होने के कारण भ्रष्टाचार की बू आम जन भी महसूस करते हैं। वकालत के व्यवसाय में ज्ञान व तर्क दूर कर चेहरा देख कर फैसला करने के मामले अक्सर देखे जाते हैं।
ज्ञातव्य है कि बहराइच जनपद के एक मामले में उच्च न्यायलय इलाहाबाद ने क्षेत्राधिकार न होने के बाद भी अंतरिम आदेश पारित कर दिए थे जिसको उच्च न्यायलय इलाहाबाद की खंडपीठ लखनऊ ने आदेश को स्थगित कर दिया था। उसके विरुद्ध रजा नाम के व्यक्ति ने माननीय उच्चतम न्यायलय में एस.एल.पी दाखिल की थी। जिसपर माननीय उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में गंभीर टिप्पणिया की थी।
जिस भी देश में आम जनता न्याय पाने में असमर्थ रहती है वहां पर अव्यवस्था का दौर प्रारंभ होता है। इस समय देश में आम जन अपने को न्याय पाने में असमर्थ महसूस कर रहा है। इसलिए अव्यवस्था का दौर जारी है। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की नियुक्ति व महाभियोग दोनों जटिल प्रक्रियाएं हैं। पंच परमेश्वर की कुर्सी पर बैठ कर उनके सम्बन्ध में भ्रष्टाचार की शिकायत आना ही शर्मनाक है लेकिन आये दिन परस्पर विरोधी निर्णय न्याय की गरिमा को बढ़ा नहीं रहे हैं। समीक्षा याचिका प्रदेश की सबसे बड़ी न्यायालय ने किया है लेकिन जरूरत इस बात की थी कि समीक्षा याचिका दाखिल करने से पूर्व बहुत सारी चीजों को चुस्त दुरुस्त कर दिया जाता तो शायद टिप्पणियां स्वयं ही प्रभावहीन हो जातीं। अभी तक नारा था न्याय चला निर्धन से मिलने शायद अब यह नारा हो जाए न्याय चला अब न्याय मांगने।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

राम भक्त हुए लखनऊ बैंच के भक्त


आप राम कहानी को पढ़ने जाते हैं तो उसे दोहराने को मजबूर होते हैं। अब रामकथा और आस्था के आधार पर न्याय आया है तो यह भी दोहराने की मांग करेगा और अब हम भविष्य में एक नए किस्म के न्याय से मुखातिब होंगे जिसका आधार रामकथा या ऐसी ही कोई पौराणिक या मिथकीय कथा होगी जिसके आधार न्याय का पाखंड रचा जाएगा। इस तरह की बेबकूफियां अनेक इस्लामिक देशों में होती रही हैं।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच का जब से फैसला आया है। रामभक्त अब लखनऊ बैंच के भक्त हो गए हैं। मैं उन्हें लखनऊभक्त के रूप में ही चिह्नित करूँगा। वे लखनऊ बैंच के जजमेंट को यूनीवर्सल बनाने में लगे हैं। आस्था के सिद्धांत को कानून का सिद्धांत बनाना चाहते हैं। यह लखनवी न्याय है। इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने की सोच रहे हैं। वे लखनऊ बैंच के जजमेंट को न्याय का आदर्श आधार
बता रहे हैं।
लखनवी न्याय में अनेक संभावित खतरे छिपे हैं। पहला खतरा तो यही है कि इसमें न्याय बुद्धि से काम नहीं लिया गया। यह भारत के अब तक के न्याय पैमाने को अमान्य करके लिखा गया फैसला है। दूसरी बात यह है कि इस फैसले को अंतिम फैसला नहीं मान सकते। तीसरी बात यह कि इसमें विविधता के सिद्धांत की उपेक्षा हुई है। चौथी बात यह है कि इस फैसले का आधार रामकथा और उससे जुड़ी मान्यताएं हैं।
उपरोक्त चारों बातों की रोशनी में लखनऊ बैंच का जजमेंट न्याय नहीं हैए राय है। उस पर पक्ष.विपक्ष में जो कुछ बोला जा रहा है वह भी न्याय नहीं है राय है। यह अतीत को आधार बनाकरएधार्मिक मान्यताओं को आधार बनाकर दी गई राय है। इसने न्याय की बहस को कानून के बाहर कर दिया है।
अब लोग न्याय पर नहीं राय पर बातें कर रहे हैं। राय के आधार पर मंदिर.मसजिद का तर्क रचा जा रहा है। बाबरी मसजिद के गिराए जाने के बाद से न्याय की बातें नहीं हो रही हैं आस्था की बातें हो रही हैं। बाबरी मसजिद के अस्तित्व के बारे में रथयात्रा के पहले न्याय और विविधता पर केन्द्रित होकर ज्यादा बातें होती थीं लेकिन बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद विविधता और न्याय की बजाय आस्था और राय पर
बातें होने लगीं। लखनऊ बैंच के जजों का फैसला इसी अर्थ में न्याय नहीं राय है।
लखनवी राय को राम के जन्म के साथ कम राम के राज्य या एंपायर के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। जिन जजों ने रामजन्मस्थान के रूप में बाबरी मसजिद की विवादित जमीन को रामजन्म स्थान चिह्नित किया है। उन्होंने राजा दशरथएउनके पुत्र राम एअयोध्या राजधानी और राम के शासन को ध्यान में रखकर फैसला लिखा है। न्याय बुद्धि में राम के एंपायर का आना स्वयं में ही समस्यामूलक है। न्यायबुद्धि किसी
राजा के देश के आधार पर जब फैसलादेने लगे तो कम से कम उसे न्याय नहीं कहते राय कहते हैं।
राम के एंपायर को आधार बनाते समय न्यायाधीशों ने अपने लिए धार्मिक मुक्ति का मार्ग चुन लिया। वे अपना फैसला राम के एंपायर को एउनके भक्त समुदाय को सुनाकर चले गए। वे इस बात को भूल गए कि न्याय को एंपायर का आधार नहीं बनाया जा सकता। रामभक्त जब बाबर के युग की बातें करते हैं राममंदिर के पक्ष में तर्क गढ़ते हैं तो वे भूल ही जाते हैं कि बाबर के बहाने न्याय को नहीं एंपायर को आधार बना रहे
हैं। एंपायर के आधार पर न्याय नहीं किया जा सकता। फैसले का आधार तो न्याय और विविधता ही हो सकती है।
जज यह जानते थे कि बाबरी मसजिद का फैसला एक राजनीतिक फैसला है और राजनीतिक फैसले एंपायर के आधार पर नहीं न्याय और विविधता के आधार पर ही किए जाने चाहिए। एंपायर के आधार पर फैसला करने के कारण ही लखनवी न्याय में आधुनिककालएआधुनिकबोधए भारत का संविधान और न्याय सब एकसिरे से गायब है। इस फैसले में राय की एकता और भाषा की एकता भी है। इस अर्थ में जजों ने भाषिक वैविध्य को भी अस्वीकार किया
है।
इस जजमेंट के बाद जिस तरह की राय राजनीतिक सर्किल से आई है उसे राजनीतिक राय ही कह सकते हैं न्यायकेन्द्रित राय नहीं कह सकते। यहां तरह.तरह की राजनीतिक राय व्यक्त की गई है। कांग्रेस से लेकर कम्युनिस्टों तकएआरएसएस से लेकर मुलायम सिंह तक सबने राजनीतिक राय व्यक्त की है। न्याय को आधार बनाकर राय नहीं दी है। इसमें राजनीतिक विचारों की चर्चा खूब हो रही है।
लखनवी राय के पक्ष.विपक्ष में जो कुछ भी बोला जा रहा है वह राजनीतिक विचारों की अभिव्यक्ति है। लखनऊ बैंच का फैसला जजमेंट नहीं राजनीतिक राय है। न्याय में कनवर्जेंस नहीं होता। विविधता होती है। लखनऊ बैंच ने डायवर्जेंस को अस्वीकार किया है। वहां तीन जजों की राय में कनवर्जंस हुआ है।
जो लोग अल्पसंख्यकों की बात कर रहे हैं। मुसलमानों की बात कर रहे हैं वे भी मुसलमानों को सामाजिक इकाई के रूप में नहीं देख रहे हैं बल्कि भाषिक इकाई के रूप में देख रहे हैं। अल्पसंख्यक या मुसलमान को सामाजिक इकाई मानने की बजाय भाषिक इकाई मानना स्वयं में इस समुदाय का अवमूल्यन है। भारत की सामाजिक विविधता को अस्वीकार करना है।
सब जानते हैं भारत में एक नहीं अनेक अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन वे सिर्फ अब हमारे भाषिकगेम का हिस्सा मात्र हैं। हिन्दू संगठनों के द्वारा रथयात्रा के साथ अल्पसंख्यकों को भाषिकगेम में तब्दील करने की जो प्रक्रिया आरंभ हुई थी उसने अल्पसंख्यकों की सामाजिक इकाई के रूप में पहचान ही खत्म कर दीएलखनवी न्याय उस प्रक्रिया की चरम अभिव्यक्ति है। इस फैसले ने अल्पसंख्यकों पर
हिन्दुओं के प्रभुत्व की मुहर लगा दी है।
हमारे देश की समग्र राजनीति ने अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का वर्गीकरण कुछ इस तरह किया है कि उससे कोई भी अल्पसंख्यक समूह कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन सकता है। अब अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े होने के लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है उसका राजनीतिक दलों से लेकर न्यायाधीशों तक में जबर्दस्त अभाव दिखाई देता है। अल्पसंख्यक.बहुसंख्यक के आधार पर वर्गीकृत राजनीति ने न्याय की
नजर से अल्पसंख्यकों को देखने का नजरिया ही छीन लिया है। हमें साठ साल के बाद सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद पता चला कि मुसलमानों को 60 सालों में हमारी राजनीतिक व्यवस्था ने किस रौरव नरक में ठेल दिया है। लखनऊ बैंच का फैसला उसी बृहत्तर प्रक्रिया हिस्सा मात्र है। अब हमारे देश में अल्पसंख्यक हैं लेकिन वे भाषिकगेम में हैंएसामाजिक समूह के रूप में उन्हें विमर्श और न्यायपूर्ण
जीवन से बेदखल कर दिया गया है।
अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक केटेगरी में बांटकर देखने के कारण ही धीरे.धीरे अल्पसंख्यक हाशिए पर गए हैं और आज स्थिति इतनी बदतर है कि अल्पसंख्यकों के पक्ष में खुलकर बोलने वाले को बेहद जोखिम उठाना पड़ता है। खासकर जब न्याय देने का सवाल आता है तो अल्पसंख्यकों को भारत में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। अल्पसंख्यकों को अपने समुदाय के अंदर और बाहर दोनों तरफ से खतरा है।
मजेदार बात यह है कि लखनऊ बैंच में तीन जज थेए दो की एक राय और एक जज की अलग राय थी लेकिन तीनों की भाषा एक ही है। भाषिकगेम में उनकी अंतर्वस्तु में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। तीनों जज बाबरी मसजिद के बारे में राम कथा की विवरणात्मक .कथात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। न्याय में इस तरह के भाषिकखेल के अपने अलग नियम हैं। उत्तर आधुनिक विचारक जेण्एफण्ल्योतार के अनुसार इस तरह के भाषाखेल
और कथानक के बारे में न्याय के आधार पर विचार नहीं किया जा सकता।
राम हमारे कथानक का हिस्सा हैं एकथानक में राम इतने ताकतवर हैं कि उनकी सत्ता को अस्वीकार करना मुश्किल है। लखनऊ बैंच के जजों ने रामकथानक को जजमेंट का आधार बनाकर न्याय की ही विदाई कर दी। कथानक के आधार पर न्याय नहीं हो सकता। कथानक भाषिकखेल का हिस्सा होता है न्याय का नहीं। जब आप कथानक के खेल में फंसे हैं तो उसे तोड़ नहीं सकते। न्याय पाने के लिए कथानक के खेल के बाहर आना जरूरी है लेकिन तीनों जज और उनके लिए जुटे वकीलों का समूचा झुंड रामकथानक को त्यागकर बाबरी मसजिद की बातें नहीं कर रहा है।
संघ परिवार की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने बाबरी मसजिद विवाद को न्याय के पैराडाइम के बाहर कथानक के पैराडाइम में ठेल दिया है। अब राम कथानक के पैराडाइम में घुसकर आप संघ परिवार को पछाड़ नहीं सकते। राम कथानक के पैराडाइम के कारण ही बाबरी मसजिद का विवाद भाषिकगेम में फंस गया। कोई भी दल रामकथा को अस्वीकार नहीं कर सकता। रामकथा का भाषिकगेम सभी रंगत की राजनीति को हजम करता रहा है। यह टिपिकल पोस्ट मॉडर्न भाषिकगेम है। इस भाषिकगेम के बाहर निकलकर ही न्याय की तलाश की जा सकती है। लेकिन यदि रामकथानक के आधार पर बातें होंगी तो भाषिकगेम में फसेंगे और ऐसी अवस्था में जज कोई भी हो जीत अंततः संघ परिवार की होगी।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाषिकगेम हमेशा मिलावटी होता है। उसमें शुद्धता नहीं होती। रामजन्म के भाषिकखेल में भी मिलावट है। यह बहुस्तरीय मिलावट है। इस गेम में तैयार राम कहानी में न्याय के लिए भी सुझाव हैं और वेही सुझाव लखनऊ बैंच ने माने हैं। राम कहानी का भाषिकगेम जिन्होंने तैयार किया उन्होंने अपने विरोधियों को भी अपनी बातें मानने के लिए मजबूर किया
कथा का भाषिकखेल छलियाखेल है। वे इसके जरिए कांग्रेस को छल चुके हैंएराजीव गांधी को छल चुके हैं। अब उसी भाषिकगेम ने जजों को भी छला है। रामकथा के भाषिकगेम को संघ परिवार और भारत के पूंजीपतिवर्ग ने वैधता प्रदान की है और संघ परिवार ने रामगेम में जो कहा उस पर अपनी सिद्धाततः सहमति दी है व्यवहार में निर्णय लिया है। रामकथानक के भाषिकखेल की यह विशिष्ट उपलब्धि है।
न्यायपालिकाएराजनीतिक दलों और जनता से कहा जा रहा है कि राममंदिर अयोध्या में नहीं बनेगा तो क्या पाकिस्तान में बनेगा। न्यायपालिका की जिम्मेदारी बनती है कि वह रामकथा की पवित्रता की रक्षा करे। यही वह दबाब है जिसके गर्भ से लखनवी न्याय आया है।
लखनवी न्याय के आने के साथ ही रामकथा पर न्याय की भी मुहर लग गयी है। अब राम कथा भी कानूनी हो गयी है। अब राम जन्म को कानूनी मान्यता मिल गयी है। इस कानूनी मान्यता के बड़े दूरगामी परिणाम होंगे। यह न्याय की भाषा के बदलने की सूचना भी है।
रामकथानक की आंतरिक प्रकृति है ष्रिपीट मीष्ए संघ परिवार ने बड़े ही कौशल के साथ रामकथा को अपना विचारधारात्मक अस्त्र बनाया है और रामकथा को बार.बार दोहराने के लिए सबको मजबूर किया और उसका प्रभाव जजमेंट में भी पड़ा है अब भविष्य में अन्य जजों पर यह दबाब रहेगा कि ष्रिपीट मीष्।
आप राम कहानी को पढ़ने जाते हैं तो उसे दोहराने को मजबूर होते हैं। अब रामकथा और आस्था के आधार पर न्याय आया है तो यह भी दोहराने की मांग करेगा और अब हम भविष्य में एक नए किस्म के न्याय से मुखातिब होंगे जिसका आधार रामकथा या ऐसी ही कोई पौराणिक या मिथकीय कथा होगी जिसके आधार न्याय का पाखंड रचा जाएगा। इस तरह की बेबकूफियां अनेक इस्लामिक देशों में होती रही हैं। धार्मिक कथानकों और
मान्यताओं के आधार पर वहां पर न्याय होता रहा है और इससे न्याय घायल हुआ है। संभवतःहम राम मंदिर बनाने के बहाने फंडामेंटलिज्म के मार्ग पर चल पड़े हैं।

हमारे अनेक ब्लॉग पाठक आस्था के आधार पर हाल ही में आए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले पर मुग्ध हैं। हम उम्मीद कर रहे हैं कि वे राम.राम जपते.जपते इस भवसागर को आसानी से पार कर जाएंगे। आस्था को इन लोगों ने तर्कएविज्ञानए आधुनिक न्यायएसंविधान आदि सबसे ऊपर स्थान दिया है।
संघ परिवार आस्था के आधार पर आम लोगों को बेबकूफ बनाने में लगा हैए मेरे ब्लॉगर दोस्त आस्था के नशे में डूबे हैं उन्हें अब राम मंदिर दे ही दिया जाए और एक राम मंदिर नहीं सारे देश को राम मंदिर में तब्दील कर दिया जाए।
देश की सारी जनता से कहा जाए कि वह अपने घरएइमारतएस्कूलएकॉलेज.विश्वविद्यालयए न्यायालयएविज्ञान की प्रयोगशालाएं आदि सबको राम मंदिर में तब्दील कर दे। जनता सड़कों पर रहेएखुले आसमान के नीचे रहे। हम सबके घरों को भव्य राम मंदिरों में रूपान्तरित कर दिया जाए।
संघ परिवार और रामभक्तों को इस देश में प्रत्येक इमारत को भव्य राम मंदिर में रूपान्तरित करने का जिम्मा दे दिया जाए। सारा देश राम का है और रामभक्तों का है। राम और राम भक्तों को तो भारत में सिर्फ राममंदिर चाहिए चाहे उसके लिए कोई भी कीमत देनी पड़े। वे बच्चों की तरह राम लेंगे .राम लेंगे की रट लगाए हुए हैं। हम चाहते हैं कि इस प्रस्ताव पर सभी रामभक्त गंभीरता से सोचकर जबाब दें कि
देश की सभी इमारतों को भव्य राम मंदिर में रूपान्तरित क्यों कर दिया जाए।
हम अब कुछ पैदा करेंगेए ज्ञान की बातें करेंगेएन रेशनल बातें करेंगेएन विज्ञान की चर्चा करेंगेएहम पढ़ेंगे ओर लिखेंगे। इंटरनेटएटीवीएरेडियो आदि का धंधा भी बंद कर दिया जाए सिर्फ राम धुन होगीएराम की इमेज होगी। अधिक से अधिक सरसंघचालक के कुछ अमरवचन होंगे जिन्हें हम सुनेंगे और धन्य हो धन्य हो करेंगे।
आस्था में राम हैं। सारे वातावरण में राम हैं। यह देश राम का है और राम के अलावा इस देश में किसी भी देवी.देवता और मनुष्य की आस्था का कोई महत्व नहीं होगा। राम के प्रति आस्था के खिलाफ कोई अगर जुबान खोलेगा तो उसका वध होगा। राम हमारी राष्ट्रीय आस्था के प्रतीक हैं अब आगे से हम राम का ही उत्पादन और पुनरूत्पादन करेंगे।
राम घरों में रहेंगे मनुष्यों घरों के बाहर रहेगें। वैज्ञानिकोंएइंजीनियरोंएवकीलोंए न्यायाधीशोंए अध्यापकोंएआस्तिकों.नास्तिकोंएनागरिकों और सभी किस्म के पेशवर लोगों को उनके धंधे से हटा दिया जाएगा अब आगे से हम सिर्फ आस्था खाएंगेएआस्था पीएंगे आस्था में जीएंगे। अब इस देश में सिर्फ रामभक्त रहेंगे। जो रामभक्त नहीं हैं वे अपने लिए अन्य देश खोज लें और हमारे राम जो भारत के बाहर
अन्य देशों में चले गए हैं वहां से हम सभी राम मूर्तियों को ले आएंगे। राम को हम विदेशों में नहीं रहने देंगे। गुस्ताखी देखो की जब एकबार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महाज्ञानी पुरातत्व विशेषज्ञों ने बता दिया और उस पर लखनऊ न्यायालय के न्यायसंपन्न न्यायाधीशों ने मुहर लगा दी कि राम का जन्म कहां हुआ था तो इस बात को तो दुनिया की अब तक की सबसे महान खोज मान लिया जाना चाहिए
और जो लोग नहीं मान रहे हैं उनकी व्यवस्था वैसे ही की जाए जैसी रामजी ने राक्षसों की कीथी।
हमें खुश होना चाहिए कि हमारा देश सिर्फ राम का है यहां राम और रामभक्तों के अलावा किसी की नहीं चलेगी। हमारे यहां संसदएअदालतएसंविधान और उसमें प्रदत्त नागरिक अधिकारों का अब कोई महत्व नहीं रह गया है अब राम हमारे देश में जन्म ले चुके हैं और हमें उन सैंकड़ों.हजारों किताबों को आग के हवाले कर देना है जो राम के विभिन्न किस्म के रूपों की चर्चा करती हैं। उन विद्वानों को रामभक्तों की
कैद में ड़ाल देना है जो राम को नहीं मानतेएराम जन्म को नहीं मानते। अयोध्या को तो अब रामभक्त एकदम स्वर्ग बनाकर छोडेंगे और भारत को रामराज्य और स्वर्गलोक। हम चाहते हैं कि रामभक्त और संघ परिवार जल्दी से जल्दी मिशन राम मंदिर को सारे राष्ट्र में साकार करे हो सके तो रातों .रात रामजी से मिलकर सभी इमारतों को राममंदिर में तब्दील करा दें। जब देश राम और देशवासी राम के तो किसी
तर्कएविवेकएविज्ञानएन्याय आदि के आधार पर सोचना नहीं चाहिए। जय श्री राम।


जगदीश्वर चतुर्वेदी
संपर्क
jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in
साभार
hastakshep.com



बुधवार, 13 मई 2009

बेबस हम है...



(हिन्दुस्तान अखबार से साभार )
पुलिस का मानवीय चेहरा
उत्तर प्रदेश में पुलिस का मानवीय चेहरा यह है कि पुलिस जुर्माने से दंडनीय अपराधो में थानों में लाकर जबरदस्त पिटाई करती है और पैसा वसूलती है कानून यह कहता है कि जुर्माने से दंडनीय अपराधो में मौके पर (जहाँ गिरफ्तारी दिखाई जाती है) जमानत दे दी जानी चाहिए लेकिन पुलिस रुपया वसूलने के लिए थानों में थर्ङ डिग्री का इस्तेमाल करती है । शासन प्रशासन और उच्च अधिकारियो का संरक्षण थानों कि पुलिस को प्राप्त होता है और हिस्सेदारी होती है । हमारी न्यायपालिका स्थानीय स्तर पर खामोश रहती है । कोई व्यक्ति विरोध नही कर सकता है न्याय पालिका के पास अवमानना से करने का मजबूत डंडा है । आम आदमी उत्पीडन से बचने का लिए जाए तो जाए कहाँ ? बेबस हम है ।

सुमन
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