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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

इस्पाती इरादों वाला कद्दावर लेखक

परसाई को याद करते हुए :22 अगस्त को जन्मदिवस पर विशेष 
नई सरकार के अच्छे दिनों की बांट जोह रहा हूं। टमाटर हमारे ऊपर 15 रुपए पाव पड़ रहा है। स्विस बैंक नसे कालाधन लौटता नहीं दिखता। चहुं ओर धर्म की जय है।  बुद्धिजीवियों को देश में नई ऊर्जा दिख रही है।


देश के बारे में सोचता हूं तो परसाई बरबस ही याद आते हैं। परसाई ने अपने समय के राजनीतिक सवालों से सीधे मुठभेड़ करते हुए अपने लेखन से सांस्कृतिक आंदोलन छेड़ा। पत्रकारिता और साहित्य को समृद्ध करने इस लेखक ने नईदुनिया और देशबंधु समेत अन्य अखबारों में अपने साप्ताहिक स्तंभों से आजादी के बाद से 70 के दशक तक पाठकों को अपने कस्बे, शहर, प्रदेश, देश और अतंराराष्ट्रीय परिदृश्य से एक तार्कित चेतना के साथ अवगत कराया। मध्यम वर्ग की मनोवृत्तियों को रेखांकित किया। परसाई ने अपने कालम्स के जरिए जो लोक शिक्षण किया वह आज की हिंदी पत्रकारिता में दुर्लभ है। परसाई के लेखन की खासियत रोज-मर्रा की आसपास की घटनाओं की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर तक व्याप्ति थी। दूसरे विश्वयु्द्ध के बाद देश और दुनिया की सभी प्रमुख घटनाओं, आंदोलनों, और व्यक्तियों के बड़े सूक्ष्म और कलात्मक व्यंग्य चित्र उनके कालमों मिल जाएंगे।
1957 के बाद से नईदुनिया में छपने वाला -सुन भई साधो- नामक स्तंभ बड़ा लोकप्रिय था। परसाई इसमें कबीर के नाम से लिखते थे। वहीं जनयुग नईदिल्ली में 1965 से अदम के नाम से ये -माजरा क्या है- नामक स्तंभ अदम के नाम से लिखते थे। दैनिक देशबंधु में -पूछिये परसाई- से नामक स्तंभ बड़ा लोकप्रिय था, जिसमें परसाई पाठकों के सवालों के जवाब अपने विशिष्ट नजरिए से देते थे। इसी प्रकार अरस्तू की चिट्ठी के अंतर्गत लिखी गई चिट्ठियों में अपने समय के जीवन यथार्थ की सटीक तीखी आलोचना मिलती है। धार्मिक पाखंड, अमानवीय आचरण, सांप्रदायिकता के खिलाफ आजीवन अपनी कलम चलाई। स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक यथार्थ को परसाई ने व्यंग्य की कलात्मक विधा से साधा और हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के बाद संभवतः सबसे बड़ी सेलिब्रिटी का दर्जा प्राप्त किया। परसाई ने अथक लेखन किया। उनके समग्र लेखन में लघु कथात्मक व्यंग्य रचनाएं, दीर्घकथा, कहानियां, ललित विचारपरक तथ पत्रात्मक निबंध, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मसलों पर व्यंग्य निबंध, संपादकीय आलेख, साक्षात्कार, व्याख्यान और उपन्यास शामिल हैं। परसाई के व्यंग्य निबंध करीब 24 पुस्तकों में संकलित हैं। परसाई की प्रमुख पुस्तकों में सदाचार का ताबीज, पगडंडियों का जमाना, जैसे उनके दिन फिरे, वैष्णव की फिसलन, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, निट्ल्ले की डायरी, पाखंड का आध्यात्म, विकलांग श्रद्धा का दौर आदि प्रमुख हैं। परसाई की रचनाओं के फुटकर अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुए। मलयामल में उनकी सर्वाधिक 4 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। परसाई ने 1956 में वसुधा नामक पत्रिका का प्रकाशन संपादन किया। उन्होंने मध्यप्रदेश में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की।
उनका जन्म होशंगाबाद जिले के जामनी गांव में 22 अगस्त 1924 को हुआ था। मेट्रिक के दौरान उनकी माताजी की मत्यु हो गई। पिता को असाध्य बीमारी के कारण गहन आर्थिक अभाव में उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाईं। इस संघर्ष ने उन्हें इस्पाती इरादे दिए और समाज की बीमारियों को पकड़ने की दृष्टि दी। उन्होंने जंगल विभाग में नौकरी की। फिर खंडवा और जबलपुर में अध्यापन कार्य किया। 1943 से 1952 तक हाई स्कूल में अध्यापन किया और 1952 में इस्तीफा दे दिया। 1953 से 57 तक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाया और फिर नौकरी को अलविदा कह दिया। इसके बाद से आजीवन स्वतंत्र लेखन के बूते गुजर-बसर की। आजाद भारत की नब्ज पर परसाई का हाथ था और देश का तापमान उनकी रचनाओं से लोग जान लेते थे। सामाजिक, राजनीतिक जीवन की मूल्यहीनता का कोई भी पहलू उनकी विवेकदृष्टि से बच नहीं सका। समाज के उत्पीड़ित वर्ग, नारियों के प्रति परसाई में गहरी करुणा है। वे मनुष्य के ढोंग को निर्ममता से जाहिर करते हैं। उनकी रचनाओं से समकालीन भारतीय जीवन देखा-समझा जा सकता है।
परसाई का हमारे देश के एक आध्यात्मिक गुरु रजनीश के बारे में एक कोट है – अपनी कोशिश से मैं अपने को श्रद्धेय बना सकता था। ताकत के लिए बिजली के इंजेक्शन देने वाले अपने को डाक्टर कहलवा देते हैं। मेरे शहर में एक अध्यापक ने नेम प्लेट पर नाम के आगे आचार्य लिखवा लिया था। मैं समझ गया कि यह आदमी ऊंचा जाएगा। वह गया। बंबई जाकर उसने नेमप्लेट में भगवान लिखवा दिया और आजकल मान्यता प्राप्त भगवान है।
    परसाई, वाल्तेयर, शा, रसेल, सार्त्र, कामू, गोर्की, मायकोवस्की जैसे सामाजिक सक्रियतावादी लेखकों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने लेखन को सामाजिक जिम्मेदारी का औजार और नागरिक कर्म की तरह अपनाया। अपने आसपास की दुनिया को परसाई की नजर से देखो तो रोमांच होता है, परसाई जिस तरह सामाजिक व्याधियों और विद्रूप को डायग्नोस करते है, वह पाठकों को शिक्षित करने के साथ दृष्टिसंपन्न करता है जो सामाजिक बदलाव का माध्यम बनते हैं। आलोचक श्याम कश्यप के अनुसार परसाई की भाषा सहज, सरल और अत्यंत धारदार है। इसमें विभिन्न प्रकटन, स्थितियों, संबंधों और घटनाओं के यथार्थ वर्णन की अद्भुत क्षमता है। बुंदेली का हल्का सा शेड उनकी भाषा में गजब की चमक ला देता है। परसाई के गद्य में अद्भुत कलात्मकता है। भारतेंदु, प्रतापनारायण मिश्र, बाल मुकुंद गुप्त, और प्रेमचंद के जीवंत गद्य का अगली कड़ी परसाई को कहा जा सकता है। परसाई का प्रभाव उनके समकालीन और बाद के कथाकारों
शिवमूर्ति, अखिलेश, रवींद्रनाथ त्यागी, यशवंत व्यास,.ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जन्मेजय. स्वयंप्रकाश को देखा जा सकता है।  परसाई अपनी रचनाओं में जिस तरह राजीनीति से सीधी मुठभेड़ करते हैं उसका असर हिंदी साहित्य की तमाम विधाओं के रचनाकारों पर दिखाई देता है। संक्षेप में परसाई का समूचा साहित्य समकालीन सामजिक, राजनितिक, सांस्कृतिक, और साहित्यिक परिदृश्य में एक रचनात्मक हस्तक्षेप है, जो हमें भारत में सामाजिक बदलाव के लिए संस्कारित करता है।

-अभय नेमा, इंदौर 977446791

शनिवार, 16 अगस्त 2014

साहित्य में समाज की खोज

साहित्य में समाज के खोज के अर्थ को जानने से पहले हमें इस बात पर विचार कर लेना आवश्यक जान पड़ता है कि साहित्य और समाज में किस तरह के सम्बन्ध हैं ? क्योंकि साहित्य की अनेक परिभाषाएँ दी गईं हैं । बालकृष्ण भट्ट ने साहित्य को 'जन समूह के हृदय का विकास' माना है तो महावीर प्रसाद द्वेदी ने साहित्य को 'ज्ञानराशि का संचित कोश' माना है । मुक्तिबोध ने 'कलाकृति को जीवन की पुनर्रचना' माना है और रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को 'जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब' माना है । साहित्य समाज में होने वाली घटनाओं को केवल हूबहू प्रस्तुत नहीं कर देता बल्कि समस्याओं से निकलने की राह भी दिखाता है । शायद इसीलिए प्रेमचंद ने 'साहित्य को समाज के आगे.आगे चलने वाली मशाल' कहा है । इसके साथ ही वह साहित्य का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना नही मानते हैंए बल्कि साहित्य को व्यक्ति के 'विवेक को जाग्रत करने वाला' तथा 'आत्मा को तेजोदीप्त' बनाने वाला मानते हैं । कहने का अर्थ यह है कि सभी विद्वान साहित्य से समाज के घनिष्ट सम्बन्ध तो स्वीकार करते हैं ।
अब प्रश्न उठता है कि साहित्य में अभिव्यक्त समाज को कैसे देखा जाए ! इस पर कई सवाल उठते हैं । क्या साहित्य में अभिव्यक्त समाज को हम प्रामाणिक मान सकते हैं ? जबकि साहित्य में साहित्यकार की कल्पनाएँए आशाएँ एवं आकांक्षाएँ भी व्यक्त होती हैं । इन प्रश्नों पर विचार करते हुए हमें पाश्चात्य जगत् के विद्वानों की मान्यताओं पर भी ध्यान देना चाहिए । 'साहित्य से समाज का घनिष्ट संबंध सबसे पहले नारी मादाम स्तेल स्वीकार करते हुए साहित्य, समाज और राजनीति में भी घनिष्ट संबंध स्थापित किया ।'1 'आगे चलकर मादाम स्तेल की मान्यता का विकास तेन ने किया । तेन साहित्य को समाज के बारे में जानने के लिए प्रमुख स्रोत स्वीकार करते थे रिचर्ड हो गार्ड ने भी 'साहित्य कल्पना' से 'समाजशास्त्रीय कल्पना' का संबंध स्वीकार करते हैं ।'2 चूंकि साहित्यकार भी सभ्यताए संस्कृति और समाज की ही निर्मित है । उनकी कलपनाएँ और आकांक्षाएँ भी इसी समाज से अर्जित होती हैं, अत: साहित्य में समाहित कलपनाओं का भी समाजशास्त्रीय अधययन संभव है ।
हम देखते हैं कि साहित्यिक रचना एक सामाजिक कर्म है और कृति एक 'सामाजिक उत्पादन' । रचना दृ भाषाए भाव और विचारों का विन्यास है । रचना का मर्म उसकी संवेदना और उसकी मानवीय चिंताएं सामाजिक मनोभूमि पर ही प्रतिष्ठित होती हैं । एक सर्जक किसी रचना को जो रूप.आकार और कल्पना देता है वह समाजनिष्ठ होती है । समाज जो कि एक अमूर्त अवधारणा है, उसका सघन और अधिक वर्चस्वकारी रूप हम समूह और समुदाय में देखते हैं । साहित्य रचना और बोध की प्रक्रिया कभी भी अपने सामाजिक संदर्भ से अप्रभावित नहीं रही है । चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य की मनुष्यता की अभिव्यक्ति कला और साहित्य के माघ्यम से होती है । साहित्य यदि संवेदनवान होता है तो इसीलिए की उसमें मानव जीवन की उपस्थित भी है । मानव वस्तु नही है इसीलिए उसकी संवेदना वस्तु की तरह ठोस नही होती । साहित्य सृजन हमारा भौतिक सौन्दर्य नही है बल्कि वह हमारी आत्मा का सौन्दर्य हैए वह हमारी भावना और मानस का सौन्दर्य है । मनुष्य के प्रत्येक विचार उसके भाव, उसके कार्य, समुदाय अथवा समाज के भावों,विचारों तथा कार्यों से अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध रहते हैं । क्योंकि समाज से बाहर व्यक्ति का सामाजिक अस्तित्व ही नही रहता । इसीलिए तो जिसे असामाजिक या व्यक्तिवादी साहित्य कहा जाता है उसका भी समाज से एक तरह का रिश्ता होता है और साहित्य में समाज को खोजने का अर्थ निश्चित करते समय इसका भी ध्यान रखना चाहिए ।
हम देखते हैं कि केवल रचना में ही समाज नही होता बल्कि रचना के हर स्तर पर यहाँ तक कि शिल्प, भाषा,संरचना सबमें समाज की अभिव्यक्ति होती है । अब सवाल उठता है कि क्या साहित्य में समाज सीधे.सीधे उतरता है ? अगर हमें कुछ साल पहले का इतिहास जानना हो तो क्या हम साहित्य की मदद ले सकते हैं ?यदि हम स्तंत्रता संग्राम के समय का साहित्य उठाते हैं तो पाते हैं कि उस समय का साहित्य लोगों को जागरुक कर रहा था । इस संदर्भ में अमृतलाल नागर की 'गदर के फूल' और मैथलीशरण गुप्त की 'भारत.भरती' जैसी रचनाएँ देखी जा सकती हैं । स्वतंत्रता संग्राम के समय की रचनाओं में विद्रोह के स्वर मुखर हो रहे थे, इसलिए उस समय की कविताओं, कहानियों,उपन्यासों और नाटकों को प्रतिबंधित किया जा रहा था । अत: स्पष्ट है कि साहित्य समाज और राजनीति से निर्पेक्ष नहीं होता है और अगर देखा जाए तो साहित्य का इतिहास भी समाज के इतिहास से कटा नहीं रह सकता क्योंकि साहित्य का इतिहास भी समाज से जुड़ा हुआ होता है । किसी विद्वान ने सही ही कहा है कि साहित्य में सिर्फ तिथियाँ नही हैं, बाकी वह पूर्ण सामाजिक इतिहास होता है । इसलिए यदि हम सामाजिक इतिहास को ठीक से समझना चाहते हैं तो हमें साहित्य के शरण में जाना पड़ेगा । आज तक जो भी इतिहास लिखे गये हैं उसमें अधिकांश शासक वर्ग के दृष्टिकोण से लिखे गये हैं जिसमें प्राय: कुलीन वर्ग का ही प्रतिनिधित्व रहता है । आम जन प्राय: उसमें से गायब ही रहता है । यह सब तभी जान पाते हैं जब हम उस इतिहास में अभिव्यक्त समाज की खोज करते हैं । शायद इसीलिए आज 'सबल्टर्न हिस्ट्री' की मांग हो रही है । और इस प्रकार के इतिहास लेखन में उस समय का साहित्य काफी मदद्गार साबित हो सकता है । जैसे मध्ययुगीन स्त्रियों, दलितों एवं वनवासियों की स्थिति के बारे में 'रामचरितमानस' से जाना जा सकता है ।
यदि हमें स्वतंत्रता के बाद आंचलिक क्षेत्र में किस तरह राजनीतिक स्थिति थी उसे समझना होता है तो हम रेणु के 'मैला आंचल' को लेते हैं । यदि हम दलित जीवन की यंत्रणा को समझना चाहते हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि सहित अनेक दलित साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ते हैं,और वर्तमान समय में देखा जाय तो स्त्री जीवन की विडम्बनाओं, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूरी अभिव्यक्ति मैत्रेयी पुष्पा, प्रभाखेतान, अनामिका आदि की रचनाओं में प्रखर रूप से सामने आयी हैं और यदि हम उत्तर भारत के किसानों के जीवन को समझना चाहते हैं तो 'गोदान' को उठाते हैं । यहाँ मेरे कहने का अर्थ यही है कि इन सारी रचनाओं नें अभिव्यकत समाज की खोज करते हैं तभी हम यह जान पाते कि' 'गोदान' किसान जीवन की महागाथा है' । हजारी प्रसाद द्वेदी ने तो प्रेमचंद के विषय में यहाँ तक कह देते हैं कि 'अगर आप उत्तर भारत के समस्त जनता के आचार दृविचार जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता' । इस प्रकार के विचार साहित्य में समाज के खोज के अर्थ को अच्छी तरह से साबित करते हैं । बीसवीं सदी के दूसरे.तीसरे दशक का सामाजिक इतिहास 'गोदान' से अच्छा कहाँ मिलेगा ।
साहित्य में समाज के खोज की प्रक्रिया में उपलब्ध समाजशास्त्रीय पद्धतियों से बहुत मदद मिल सकती है । उदाहरण के लिए रणेन्द्र के उपन्यास 'ग्लोबल गाँव के देवता' में आदिवासी जीवन की समस्याओं, विस्थापन की समस्या तथा जमीन्दार एवं आदिवासी समुदाय के बीच के संघर्षों को मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय पद्धति एवं ,अस्मितावादी, आलोचना पद्धति की मदद् से बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं । इसी तरह से विभिन्न रचनाओं में समाज की खोज संरचनावादी, अनुभववादी आदि अध्ययन पद्धतियों से भी की जा सकती है ।
साहित्य में समाज के खोज का उद्देश्य, साहित्य के सामाजिक आधार को रेखांकित करना है तथा समाज की बदलती परिस्थितियों के साथ साहित्य में परिवर्तन को बतलाना है । इस प्रक्रिया के तहत'नए समाज' के निर्माण में रचनाकार की आकांक्षओं और 'रचना प्रक्रिया' को महत्व देना भी आलोचक का दायित्व हो सकता है ।
इस प्रकार साहित्य में समाज गहरे रूप से व्याप्त है और उसकी खोज की जानी चाहिए क्योंकि साहित्य 'अंतत तिथिरहित सामाजिक इतिहास है ।'
संदर्भ.सूची
1-    मैनेजर पाण्डेय . साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, तृतीय संस्करण - 2006, पृष्ठ संख्या - 13
2.   वही पृष्ठ संख्या - 18
सहायक.ग्रंथ.सूची
1.   मैनेजर पाण्डेय . आलोचना की सामाजिकता,वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,2005
2.    संपा..निर्मला जैन . साहित्य का समाजशास्त्रीय चिंतनए हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, नई दिल्ली विश्वविद्यालय, 1986
-सोनम मौर्या
पी.एच.डी.
प्रथम वर्ष
मोबाइल नं.9013892748
जे. एन. यू.
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