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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

गाय न गंगा

 संघ की नागपुरी प्रयोगशाला का कोई सम्बन्ध गाय की भलाई से नहीं है और न ही गंगा से कोई मतलब है. गाय और गंगा का यह प्रयोग अपने राजनीतिक मुखौटे के वोट बैंक को बढाने के लिए करते हैं. मांसाहार का विरोध इनकी योजना का प्रमुख अंग होता है लेकिन मुनाफे के लिए इनके नेतागण बराबर इस व्यापार में शामिल होते रहते हैं. गेरुआ चोला ओढ़कर यह सारे पाप करना चाहते हैं. अभी हाल में यह खुलासा हुआ है कि बीजेपी के फायरब्रांड नेता संगीत सोम और उनके दो साथियों ने 2009 में अलीगढ़ में मीट प्रोसेसिंग यूनिट के लिए जमीन खरीदी थी। इस बात का खुलासा हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा रजिस्ट्री संबंधी दस्तावेजों की पड़ताल में हुआ। दस्तावेज बताते हैं कि अल दुआ फूड प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की इस कंपनी में सोम भी एक डायरेक्टर हैं।मीट यूनिट की  यह फैक्ट्री 'हलाल मीट का उत्पादन करने वाली बड़ी यूनिट्स' में से एक है और बेहतरीन गुणवत्ता वाला भैंस, भेड़ और बकरे का मांस उपलब्ध कराती है।
 सोम के अलावा मुइनुद्दीन कुरैशी और योगेश रावत नाम के दो लोग जमीन के इस सौदे में शामिल हैं और कंपनी के डायरेक्टर हैं। 
देवधर संघी पत्रकार ने यह स्वीकार किया है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत समेत प्रमुख प्रचारक मांसाहार करते रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रहे व पूर्व सांसद सत्यदेव सिंह के ऊपर उन्ही के नेतागण आरोप लगाते थे कि उनकी ट्रक्स गोवंशीय जानवरों को कलकत्ता स्लॉटर हाउस लेकर जाती हैं. इस तरह से संघ व भाजपा के लोग मांस व्यापार में हो रहजे मुनाफे को हासिल करने के लिए तथा राजनीतिक लाभ के लिए हिंदी बेल्ट में जनता की भावनाओ को भड़काते रहते हैं लेकिन वह कभी नहीं चाहते हैं कि गौ वंशीय पशुओं की हत्या रोकी जाए. मुनाफा तथा वोटों का रोजगार गाय व मांसाहार से चलता रहे, इसी के लिए वह सदैव कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं. एखलाक को गौ मांस के अफवाह पर यह लोग पिटवा कर मार डालते हैं लेकिन दूसरी तरफ किरण रिजिजू मोदी सरकार के मंत्री हैं वह मांस भक्षण करते हैं तो गंगा स्नान का पुन्य देश को मिलता है.
गोमांस पर प्रतिबंध की मांग कर रहे लोगों को यह कड़वी सचाई पचाने में मुश्किल हो सकती है कि पशुओं को सिर्फ गोमांस खाने वालों के लिए नहीं मारा जाता, बल्कि दवा उद्योग की जरूरतों के लिए भी ऐसा किया जाता है। दवाओं के कैप्सूल, विटामिन की दवाओं और चिकन के चारे में इस्तेमाल होने वाले जेलेटिन को जानवर की हड्डियों और चमड़े की प्रोसेसिंग से बनाया जाता है। एक फार्मा कंपनी के सीनियर ऐग्जिक्युटिव ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'किसी न किसी रूप में हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गोमांस कन्ज्यूम करते ही हैं।'इंडिया में ज्यादातर जेलेटिन मेकर्स का कहना है कि वे इसे बनाने में भैंस की हड्डियों का उपयोग करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में गोवध विरोधी कानूनों को देखते हुए कंपनियों को आने वाले दिनों में परेशान किए जाने का डर सता रहा है। http://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/ban-on-beef-to-affect-medical-care/articleshow/46671551.cms

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा गंगा है. गंगा को प्रदूषित करने का काम भी यही लोग सबसे ज्यादा करते हैं. बनारस की हाल की घटना इसका प्रमुख उदाहरण है. एक तरफ तो सरकार गंगा सफाई योजना चला रही है, दूसरी तरफ लाखों टन मिटटी की मूर्तियाँ गंगा से लेकर विभिन्न नदियों में डालने का काम यही लोग कर रहे हैं. माननीय उच्चतम न्यायलय ने साफ़ तौर पर मूर्ति विसर्जन के लिए रोक लगा दी है तो भगवाधारी रूप धारण किये हुए संघी संत, महंत कानून व्यवस्था को न मानते हुए जबरदस्ती नदियों में मूर्तियाँ डालने के लिए प्रसिद्द हैं, बनारस में जब प्रशासन ने रोका तो लाठी चार्ज करने की नौबत आ गयी और जनता को सही बात न बताकर अफवाहें फैलाकर स्वयं अपराधी की भूमिका में आ जाते हैं. ऐसे अपराधियों के खिलाफ कार्यवाई की जाए तो यह चिल्लाने लगते हैं कि हिन्दू धर्म को दबाया जा रहा है. 
गंगा या विभिन्न नदियों को सबसे ज्यादा प्रदूषित कारखाने के मालिक करते हैं और उन्ही मालिकों के चंदे से इन तथाकथित संघी संत महात्माओं के चेहरे की लाली बढती है इनकी नियत न आजादी की लड़ाई में साफ़ थी न आज साफ़ है. 

सुमन 

बुधवार, 12 मार्च 2014

असफाक को फांसी


डॉ. मो. मजीद मिया
असफ़ाकुल्ला खाँ का जन्म 1900 ईव को शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश के एक इज्जतदार घराने मे हुआ था। उनके पिता का नाम सफीकुल्ला खाँ एवं माँ का नाम मझरुनिशा बेगम थी। अस्फ़ाकुल के परिवार के ज्यादा से ज्यादा लोग अँग्रेजों के ऊंचे पदों पर आसीन थे। असफाक अपने चार भाइयों मे सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई रियासतुल्ला खाँ, राम प्रसाद बिस्मिल के सहपाठी थे। वह असफाक को अक्सर बिस्मिल की शायरी और आजादी के लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे। जिससे असफाक के दिल में बिस्मिल से मिलने की ख्वाइस होने लगी थी।
असफाक बचपन से ही क्रांतिकारियों से काफी प्रभावित थे। उनमे उम्र के साथ.साथ देश भक्ति की भावना भी बढ़ती गई और 20 वर्ष की कम उम्र मे पहुँचकर अपने देश को अँग्रेजी शासन से मुक्त कराने और देश के लिए मर.मिटने को भी तैयार हो चुके थे। इस जुनून को पूरा करने के लिए जल्द ही वह बिस्मिल से जा मिले और उनके साथ मिलकर आजादी की लड़ाई मे सरीख हो गए। जिस समय मौलाना मोहम्मद अली जौहर खिलाफत आंदोलन चला रहे थेए जिसने आगे चलकर असहयोग आंदोलन का रूप ले लिया, तब बिस्मिल एवं दूसरे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर असफाक भी आंदोलन के बारे मे लोगो को जागृत करने मे लग गए। धीरे.धीरे इन कार्यों के कारण असफाक भी अंग्रेजों की आँखों मे खटकने लगे।
1922 ईव मे असहयोग आंदोलन के समय चौरी.-चौरा के हत्या कांड की वजह से गांधीजी ने खिलाफत आन्दोलन के समापन की घोषना कर दी। असहयोग आन्दोलन के समाप्त होने से क्रांतिकारियों मे खलबली सी मच जाती है। गांधीजी के इस फैसले के कारण असफाक एवं उनके साथी नरम दल का साथ छोडकर गर्म दल के साथ हो जाते है।
क्रांतिकारियों ने समझा कि आजादी की लड़ाई को आगे चलाने के लिए हथियारों की जरूरत पड़ेगी और हथियारों के लिए रूपय की और इसके लिए क्रांतिकारियों ने फैसला किया कि अँग्रेजी सरकार पिछले कई वर्षों से भारत को लूट रही है तो क्यों न हम यह रूपय अंग्रेजों से लूट लें। इस मकसद से क्रांतिकारियों ने 8 अगस्त 1925 को काकोरी के नजदीक सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर खजाना लूट लेते हैं। इस सभी कारवाई मे असफाक ने अकेले ही छेनी और हथौड़ी की मदद से सरकारी तिजौरियों को तोड़ने मे कामयाब होता है। इस कांड को इतिहास में एक बड़ी घटना के रूप मे याद किया जाता है। काकोरी की यह घटना अंग्रेजों की शक्ति एवं घमंड पर एक तमाचे की तरह ही था, जिससे अँग्रेजी हुकूमत तिलमिला जाती है। अँग्रेजी सरकार द्वारा इस घटना की जांच की जाती है और गुप्तचर विभाग ने महीने भर इस कांड मे सामील क्रांतिकारियों को शाहजहानपुर से गिरफ्तार कर लेते हैं और असफाक वहाँ से भागने मे कामयाब हो जाता है। बनारस पहुँचकर वह एक इंजीनियरिंग कालेज मे काम करने लगते हैं पर वहाँ भी वह चैन से नहीं बैठ पाता है। वह हमेशा इस फिराक मे रहता है कि किस प्रकार देश के बाहर जा कर लाला हरदयाल से मिलकर आजादी की इस लड़ाई को आगे बढ़ाए।
लाला हरदयाल उन दिनो अमेरिका मे रहते थे। असफाक हरदयाल से मिलकर उन्हे आजादी की लड़ाई मे शामिल करना चाहते थे। उन्ही से मिलने के लिए असफाक बनारस से दिल्ली आते हैं ताकि वह जल्द ही अमेरिका जा सके। लेकिन जिन गद्दारों ने अपने स्वार्थ के लिए अंग्रेजों से जा मिले थे वह भी इसी ताक मे थे कि असफाक कब दिल्ली आए। असफाक के एक करीबी मित्र ने अंग्रेजों के साथ मिलकर असफाक को पकड़वा देते हैं। अंग्रेज़ असफाक को पड़क कर फैजावाद जेल भेज देते हैंए जहां उनके खिलाफ कत्ल,डकैती और सरकार के खिलाफ षड्यंत्र का मुकदमा चलाया जाता है और असफाक को सजा -ए- मौत की सजा सुनाई जाती है।
काकोरी शाजिस के द्वारा अँग्रेजी सरकार ने असफाक,बिस्मिल राजेंद्र लहरी और ठाकुर दर्शन सिंह को सजा -ए- मौत और बाकी सोलह क्रांतिकारियों मे से चार को उम्र कैद और बाकी को चार वर्ष की सजा सुनाई जाती है। मुकदमे के समय अंग्रेजों ने असफाक को गवाही देने के लिए मान जाए, इसके लिए अंग्रेजों ने पुलिस इंस्पेक्टर तसदीक हुसैन को असफाक के पास भेजते हैं, जो असफाक को मजहब का वास्ता देकर कहते हैं 'तुम कैसे मुसलमान हो जो एक हिन्दू का साथ दे रहे हो',' जो इस मुल्क को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है'। इसके जवाब मे असफाक कहते हैं 'बिस्मिल का हिन्दू राष्ट्र आपके अँग्रेजी सरकार से बेहतर ही होगा'।
जो लोग जेल मे असफाक के करीबी थे उनका कहना है जेल मे भी वह अंग्रेज़ो की चाल मे नहीं आए और सरकारी गवाह बनने की बात को हमेशा ठुकड़ा दिया करते थे। 19 दिसम्बर को असफाक को फांसी देने का दिन जब आता है। कुछ लोगों का कहना है फांसी के दिन असफाक दुगनी गति से फंदे की ओर बढ़ता गया और फांसी की जगह पहुँचकर फंदे को चूम लेता है, कुछ देर तक दुआ मांगता है और फंदा कस जाता है
- डॉ. मो. मजीद मिया

09733153487

रविवार, 16 सितंबर 2012

बनारस की गलिया


जो लोग बम्बई ,कलकत्ता और दिल्ली जैसे शहरों में एक बार हो आये है अथवा किसी कारणवश अब वही रहने लग गये है ,ऐसे लोग जब कभी किसी छोटे शहर में आयेंगे तो उस शहर के बारे में इस तरह बातचीत करेंगे मानो परमाणु बम का भेद बता रहे हो |  चूँकि हम कभी दिल्ली ,बम्बई गये नही इसलिए हम उनकी मुँह बाकर इस तरह निगल जाते थे जैसे बरसात में  छिपकलिया पतिंगो को |  कभी -कभी हम यह महसूस करने लगते है ,नाहक हमारी पैदाइश बनारस जैसे शहर में हुई |काश !हम बम्बई ,कलकत्ता जैसे शहरों में पैदा हुए होते |  वहा ऊँची -ऊँची इमारतो से नीचे की झांककर देखते की आदमी अंगूठे से कितना बड़ा होता है ,चौपाटी और मिलावर हिल से समुद्र की अजगर सरीखी लहरे गिनते |
इन शहरों की तारीफ़ में ख़ास चर्चा मकानों और सडको के बारे में होती है | वहा के मकान इतने ऊँचे है की सडक पर खड़े होकर उपर देखो तो टोपी गिर जाए | सड़के इतनी खुशनुमा है की पैर फिसल जाते है | चौड़ाई तो इतनी की यहा की तीन एक ही में घुस जाए | गलिया तो वहा है ही नही और जो है भी ,वे यहा की सडको की नानी से कम नही | धीरे-धीरे उनकी बातचीत का असर इस कद्र होता है की हम यहा फरमान जारी कर देते है - --  इस साल चाहे जैसे हो कलकत्ता ,बम्बई जाकर ही रहेंगे | हमारे ऐलान को सुनकर हजरत यो मुँह सिकोड़ लेते जैसे 100 ग्रेन कुनैन का मिक्सचर पी लिया हो | मस्तक पर मुठ्ठी भर बल डाले इस अंदाज से कह उठते ,'खुदा झूठ न बोलाए | आज तीन साल हो गये वहा  रहते ,पर अभी तक हम यह नही जान सके की कौन सडक किधर जाती है | फंला जगह जाने के लिए किन -किन सडको से या किस बस पर सवार होकर जा सकते है ,नही बता सकते |  रात को कौन कहे ,दिन को भी हम अक्सर रास्ता भूल जाते है |फिर आप जैसा आदमी जाए तो खो जाने में कोई शुबहा नही |दाए -बाए का ख्याल न रखे तो हवालात में बन्द हो जाए या सीधे नर्क का टिकट कटाए |  अगर आप किसी ठग या सुंदरी के चक्कर में आ गये तो बड़ा गरक ही समझिये |"
चूँकि हम अपने मा -बाप की इकलौती संतान और अपनी बेगम के इकलौते मिया है ,इसलिए मुफ्त में खो जाना या हवालात में बन्द होकर नर्क का टिकट कटाना कतई पसंद नही करते | जबकि हम पैदा होते ही अपने बाप को यह सार्टिफिकेट दे चुके है की आपकी गैरमौजूदगी में मैं और मेरी औलाद आपको पितृपक्ष के दिनों पानी जरुर देंगे |नतीजा यह होता है की हम अपना फैसला चुचाप वापस ले लेते है ,फिर कभी उधर जायंगे -यह ख़्वाब में भी नही लाते है |
यह अजीब इत्तिफाक की बात है की एक बार हमारे घर एक नजूमी आया और उसने बताया और उसने बताया की मैं बम्बई ,कलकत्ता और दिल्ली जैसे शहरों में जरुर जा सकता हूँ | बात ठीक निकली | वह अरमान जो की कुचल दिया गया था ,पुष्पित हो उठा |हम गये और वापस भी चले आये |न कही खोये ,न कही पैर फिसला |न कही टोपी गिरी ,न हवालात में बन्द हुए |ठग और सुन्दरी से भेट हुई ,पर हम उनकी चकल्लस में नही आयी |  लेकिन जो मजा बनारस की गलियों में है ,वह मजा दुनिया के किसी पर्दे में नही है |  जो आजादी यहा के हर गली -कूंचे में है उसे ये सात जन्म में नही पा सकते   |बनारसी गलियों का कुछ मजा सिर्फ मथुरा में मिल सकता है ........
बनारस की सड़के
................................बनारस में जितनी सड़के है , उससे सौ गुनी अधिक गलिया है |  यदि आप बनारस की सडको का मुआइना कर बनारस के बारे में फैसला देंगे तो यह सेंट -परसेंट अन्याय होगा |  असली मजा तो बनारस की गलियों में दुबका हुआ है |  बनारसी भाषा में उन्हें 'पक्का महाल '-'भीतरी महाल ' कहते है |  काशी खंड के अनुसार विश्वनाथ खंड -केदारखंड की तरह वर्तमान बनारस भी दो भागो में बसा हुआ है -भीतरी महाल (पक्का महाल ) और बहरी तरफ |  आपने सिर्फ बाहरी रूप अर्थात कच्चा रूप देखा है |  पक्का रूप देखना हो तो गलियों में थरान दीजिये |  यहा की सड़के अभी जुमा -जुमा आठ रोज हुए बनी है यानी 'लली ' है |   बेचारी ठीक से सुख भी नही पायी है |  यकीन   न हो तो किसी दिन गर्मी के मौसम में पैदल चलकर देख लीजिये | सुकतल्ला सडक पर चिपककर रह जाएगा और हवाली जुटा आपके पैरो में |  यदि जूता काफी मजबूत हुआ तो बनारस की धरती इस कदर प्यार से आपके कदमो को चूमेगी की उससे अपना दामन छुडाने में आप को छठी का धुध याद आ जाएगा |  अगर आपकी यह कसरत बनारसी -पठ्ठो ने देखि तो -'बोल छ्माना छे ;खिल्छे रहे पठ्ठे ,जाए न पावे 'फिकरा कास ही देंगे |कहने का मतलब यह है की बनारस की सड़के हर पैदल चलनेवाले मुसाफिरों से बेहद मुहब्बत करती है |  इनकी मुहब्बत हर मौसम में अलग -अलग ढंग से पेश आती है |बरसात में इनकी होली देश विख्यात है और बसंत ऋतू में जब ये आप पर 'गुलाल 'बरसाने लगती है तो मत पूछिए !  आनन्द आ जाता है |
स्कूलो में आप ज्योमेट्री की शिक्षा पा चुकर होंगे |  मुमकिन है की उसकी याद धुधली हो गयी हो |  यदि आप बनारस की सडको पर तहलान दे तो मजबूरन ज्योमेट्री के प्रति दिलचस्पी पैदा ओ जायेगी |  जब कोई बैलगाड़ी ,तर्क ,जीप या टैक्सी इस सडको पर से गुजरती है तब हर रंग की हर ढंग की समानान्तर रेखाए ,त्रिभुज ,चत्तुर्भुज और षटकोण के ऐसी अजीब -गरीब नक्शे बन जाती है जिसका अंश बिना परकार की सहायता के ही बताया जा सकता है |  नगरपालिका को चाहिए की वह अपने यहा के अध्यापको को इस बात का आदेश दे दे की वे अपने छात्रों को सडक पर बने हुए ज्योमेट्री का परिचय अवश्य करा दे |सुना है काशी के कुछ माडर्न आर्टिस्ट इन नक्शों के सहयोग से प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके है |
यहा की सड़के डाक्टरों की आमदनी भी बढाती है |  यही वजह है की अन्य शहरों से कही अधिक बनारस में डाक्टर है   |यदि आप किसी रिक्शे पर सवार होकर एक बार शहर की परिक्रमा कर ले तो इसका अनुभव हो जाएगा | बनारस के बाशिंदे तो इसके आदि हो गये है | यहा के कुछ गुरुओ का ,(जो लन्दन ,पेरिस और अमेरिका हो आये है )  कहना है की उन्हें हवाई जहाज या समुद्री जहाज में चक्कर देने वाली बीमारी इन सडको के हिचकोले खाने के कारण नही हुई   |इसीलिए आपको जब कभी विदेश जाने की जरूरत हो तो एक बार बनारस आकर रिक्शे की सवारी पर हिचकोले जरुर खाइए | यहा हर पांच कदम पर गढ्ढे है | जब इन गढ़ढो  में रिक्शे का पहिया फंसेगा तब पेट का सारा भोजन कंठ तक आ जाएगा | दूसरे दिन बदन में इतना दर्द हो जाएगा की आप को डाक्टर का दरवाजा खटखटाना पडेगा |
अंग्रेजी काल में जब कोई गवर्नर या अधिकारी काशी -दर्शन के लिए आता  था तब उसे ख़ास सडको से ले जाया जाता था | जब लगातार लोग यहा आने लगे तब कैंट से नदेसर तक और कैंट से पानी कल तक सीमेंट की सड़के बना दी गयी | विश्वविद्यालय के छात्र खुरापाती होते ही है \एक बार उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व गवर्नर माननीय कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी जी की मोटर लंका से अस्सी की ओर इन लोगो ने चलवा दी |  नतीजा यह हुआ की नगरपालिका ने उस सडक की खाज को दूसरे साल मलहम पट्टी लगाकर कुछ हद तक ठीक कर दिया |भगवान करे हर प्रांत के गवर्नर यहा आवे और इस प्रकार प्रत्येक सडक का खाज एक्जिमा दूर होता रहे .....
गलियों की विशेषता ...............
काशी में सडको का कोई महत्व नही है ,इसलिए बहुत कम लोग सडको पर चलते है | सडको का उपयोग जुलूस निकालते समय होता है | उस पर पैदल से अधिक लोग सवारी से चलते है | इधर कुछ ऐसे लोग (शायद मेंटल हास्पिटल से छूटकर ) आ गये है जो सडको को महत्व देने लग गये है | ऐसे लोग लम्बे सडक 'मकान बिकाऊ है 'दूकान खाली है '' अथवा 'भाड़े पर लेना है ' का विज्ञापन छपवाते है |
काशी की अधिकाश गलिया ऐसी है ज़हा सूर्य की रौशनी नही पहुचती | कुछ गलिया ऐसी है जिनमे दो आदमी एक साथ गुजर नही सकते | इन गलियों की बनावट देखकर कई विदेशी इंजीनियरों की बुद्धि गोल हो गयी थी! जो लोग यह कहते है की बम्बई -कलकक्ता की सडको पर खो जाने का डर रहता है ,वे काशी की गलियों का चक्कर काटे तो दिन भर के बाद शायद ही डेरे तक पहुच सकेंगे | आज भी ऐसे अनेक बनारसी मिलेंगे जो बनारस की सभी गलियों को छान चुके है ,कहने में दांत निपोर देंगे |
इन गलियों से गुजरते समय जहा कही चुके तुरंत ही दूसरी गली में जा पहुचेंगे | कलकक्ता ,बम्बई की तरह सडक की मोड़ पर अमुक दूकान ,अमुक निशान रहा -याद रहने पर मंजिल तक पहुच सकते है -- पर बनारस में इस तरह के निशान - दूकान -साइनबोर्ड भीतरी महाल में नही मिलेंगे | नतीजा यह होगा की काफी दूर आगे जाने पर रास्ता बन्द मिलेगा | उधर से गुजरने वाले आपकी ओर इस तरह देखेंगे की यह 'चाईया' इधर कहा जा रहा है | नतीजा यह होगा की आपको पुन:गली के उस छोर तक आना पडेगा ज़हा से आप गडबड़ाकर मुद गये थे  |कुछ गलिया ऐसी है की आगे बढने पर मालूम होगा की आगे रास्ता बंद  है ,लेकिन गली के छोर के पास पहुचने पर देखेंगे की बगल से एक पतली गली सडक से जा मिली है | अक्सर इन गलियों में जब खो जाने में आता है ,खासकर रात के समय ,तब लगता है जैसे -ऊँचे फादो की घाटियों में खो गये है | इन गलियों में लोग चलते -फिरते कम नजर आते है | जो नजर भी आते है ,वे उस गली के बारे में पूर्ण विवरण नही बता सकते | हो सकता है ,वे भी आपकी तरह चक्कर काट रहे हो | गलियों का तिलस्म इतना भयंकर है की बाहरी व्यक्ति को कौन कहे अन्य लोग भी जाने में हिचकते है | कुछ गलिया ऐसी है जिनसे बाहर निकलने के लिए किसी दरवाजे या मेहराबदार फाटक के भीतर से गुजरना पड़ता है |
बम्बई ,कलकक्ता की तरह यहा की सडको में चार से अधिक रास्ते नही है ,पर गलियों में चार से चौदह तक रास्ते है | किस गली से आप तुरंत घर पहुंच सकते है यह बिना जाने पूछे  नही जान सकते |जिस गली से आप घर पहुच सकते है उसी गली से आप श्मशान या नदी किनारे भी जा सकते है |
गलियों का नगर
शैतान की आँत की भांति यह भूल -भुलैया संसार का एक आश्चर्यजनक दर्शनीय स्थान है | इन गलियों में कितनी आज़ादी है | नगे -घुमो गमछा पहिने चलो ,जहा जी में आये बैठो और जहा जी आये सो जाओ | कोई बिगड़ेगा नही ,भगाया नही और न डाटेगा | गावटी का गम्च्छा या सिल्क का कुर्ता पहने बनारसी रईस भी इन गलियों में छाता लगाए चलते है | शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा की जिस गली में सूर्य की रौशनी नही पहुचती ,बरसात का मौसम नही हहै ,फिर भी लोग छाता लगाकर क्यों चलते है ? कारण है -गन्दगी | मान लीजिये आप बाज़ार से लौट रहे है ,अचानक उपर से कूड़े की बरसात हो गयी |यह बात अच्छी तरह जान लीजिये --बनारसी तीन मंजिले या चार मंजिले पर से बिना नीचे झाके ठुक सकता है ,पानी फेक सकता है और कूड़ा गिर सकता है | दूकान झाड बटोरकर आपके चेहरे पर सारा गर्दा फेक सकता है | यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है ;नीचे इस सत्कार्य से घायल व्यक्ति जब गालिया देता है तब सुनकर भाई लोग प्रसन्न हो उठते है | उनका रोम -रोम गाली देने वाले को साधुवाद देगा | अगर कही वे सज्जन चुपचाप चले गये तो इसका उन्हें अपार दुःख होगा और उस दुःख को मिटाने के लिए मुख से अनायास ही निकल जाएगा ----'मुरदार निकसल !'
किसी -किसी गली में बनारसीयो  का पनाला इस अदा से पता  है की फुहारे का मजा आता है ! गर्मी के दिनों में रात को ऐसी गलियों से गुजरना और खतरनाक होता है | सोते समय 'शंका समाधान 'के लिए बनारसी अपने को अधिक कष्ट नही देगा | परिणाम स्वरूप छत के पनाले से आप पर 'शुद्ध गंगाजल 'बरस सकता है | गुस्सा उतारने के लिए ऐसे घरो में आप घुसने  की हिम्मत नही कर सकते | एक तो बाहर का भारी दरवाजा बन्द है ,दूसरे भीतर जाने पर भी यह पता चलना मुश्किल है की यह सत्कार्य किसने किया है | मुँह आपका है ,गालिया बक लीजिये और राह लीजिये ,बस! खासकर नगे पैर चलना तो और भी मुश्किल है | घर के बच्चे 'दीर्घशंका ' गलियों में रात को कर देते है | अगर इन गलियों में भगवान शंकर के किसी मस्ताने वाहन से भेट हो गयी उसने नाराज होकर आपको हुरपेटा तो जान बचाकर भागना  मुश्किल हो जाएगा | खासकर उन गलियों में जो आगे बंद मिलती है  | क्योंकि आप पीछे भाग नही सकते ,आगे रास्ता बन्द है ,बगल के सभी मकानों में भीतर से भारी सांकल लगी है और इधर सांड महराज हुरपेटते  आ रहे है ! साल में दो -एक व्यक्ति इन सांडो के कारण काशी -लाभ करते है | लगे हाथ एक  उदाहरण सुन लीजिये | अब्राहम लिकन के बाद जनरल ग्रांट अमेरिका के राष्ट्रपति हुए थे | एक बार जब वे हिन्दुस्तान में दौरे पे आये तब बनारस भी आये थे | उन्होंने इस शहर को 'एक सिटी आफ लेंस "अर्थात गलियों का शहर कहा है | कहा जाता है की उनकी पत्नी शंकर भगवान के वाहन ने अपने सींग पर उठा लिया था |
कहा जाता है की राजा रामचन्द्र के सुपुत्रों (लव -कुश ) से बुरी तरह शिकस्त खाकर पवनसुत हनुमान जी अपनी बिरादरी के साथ बनारस में आकर बस गये | आज वे इन गलियों में क्रीडा -स्थल बनाकर प्रसन्न है | ऐसी घटनाए प्राय: सुनने में आती है की गली से गुजरते समय अचानक उपर छत से पथ्थर का रोड़ा सर पर आ गिरा और बड़ी आसानी से स्वर्ग में सीट रिजर्व हो गयी | असल में यह पवनसुत के वंशजो का महज खिलवाड़ है |' खिलवाड़   '  से अगर कोई स्वर्ग पहुंच जाता है तो वह अपराध कैसे हो सकता है ? पवनसुत के वंशजो का तर्क कानून शास्त्री को घपले में डाल देता है | इस आसमानी खतरे से बचने के दो ही उपाय है -एक तो सिर पर फौजियों वाली लोहे की टोपी या फिर आपका अपना भाग्य ! क्योंकि इस तरह की फौजदारी की घटना किसी थाने में दर्ज नही होती और न इसके मुकदमे अदालत में स्वीकार किए जाते है | इन गलियों के नामकरण और उनकी दूरी को यदि आप नजरअंदाज करे तो बनारस के पोस्टल विभाग की प्रसंशा करेंगे |हर बनारसी अपने को 'सरनाम ' (प्रसिद्ध ) समझता है |मुहल्ले का एक व्यक्ति समूचे मुहल्ले की जानकारी रखता है | उसका विश्वास है की मुहल्ले के डाकिये से मुख्यमंत्री तक उसके नाम से परिचित है | काशी में 'दसपुतरिया गली " महज आठ -दस मकानों का एक मुहल्ला है ,पर वहा के रहने वाले को 'दसपुतरिया 'गली' के नाम पर पत्र मिल जाते है | इस प्रकार छोटी -छोटी गलिया यहा काफी प्रसिद्ध है | नगरपालिका भले ही नेताओं के नाम पर गलियों का नामकरण करे ,पर बनारस वाले अपनी पुरानी परम्परा नही बदल सकते |
इस गलियों में गर्मी के दिनों में शिमला का मजा ,जाड़े में पूरी का मजा ,और बरसात में पहाड़ी स्थानों का मजा अनायास मिलता रहता है | यही वजह है की बनारसी लोग पहाड़ी स्थानों में कभी नही जाते  |रहा गंदगी का प्रश्न ,सो कहा नही है | जिस गली में इमली के बीज बिखरे ही समझ ले इस गली में मद्रासी रहते है | जिस गली में मछली महकती हो ,वह बंगालियों का मुहल्ला है  |जिस गली में हड्डी लुढकी हो ,वह मुसलमान दोस्तों का मुहल्ला है | इस प्रकार हर गली में प्रत्येक वर्ग का साइन बोर्ड लटकता रहता है | अध्ययन करने वालो को इन साइनबोर्डो से बड़ी हेल्प मिलती है | मदनपुरा ,पांडये हवेली ,सोनारपुरा आदि मुहल्लों में सादिया बनती है और रानी कुआ ,कुंज्गली आदि मुहल्लों में बिकती है | गोविन्दपुरा ,राजा दरवाजा ,कोदई की चाकी में सोने चाँदी का व्यवसाय होता है  |कचौड़ी गली की कचौड़ी ,ठठेरी बाजार के पीतल के बर्तन ,विश्वनाथ गली की चुदिया ,लकड़ी के खिलौने भारत प्रसिद्ध है |मिश्रपोखरा स्थित जर्दे के कारखाने ,लोह्तिया और ख़ास में लोहे ,लकड़ी का व्यवसाय होता है |अधिक दूर क्यों ,काशी में मंगलामुखियो का व्यवसाय भी गलियों में ही होता है |दालमंडी -छ्त्ताताले ,म्द्वादिः में आशिक लोग नित्य शाम को जुटा करते है |मतलब यह की बनारस की प्रसिद्धि जिन वस्तुओ के कारण है ,उन वस्तुओ का व्यवसाय गलियों में ही होता है |
-सुनील दत्ता 
आभार विश्वनाथ मुखर्जी "" बना रहे बनारस से ''

बुधवार, 12 सितंबर 2012

बनारस : एक दिग्दर्शन



सिर्फ काशी नगरी ही तीन लोक से न्यारी नही है ,बल्कि यहा के लोग ,उनका रहन -सहन ,उनके आचार -विचार ,यहा तक की सरकारी -गैर सरकारी संस्थाए भी अपने ढंग की निराली है |उदाहरण के लिए बनारस नगरपालिका को ही ले लीजिये |इस नगरी का निरालापन कोई मुफ्त में न देख जाए ,इस गरज से वह प्रत्येक यात्री पीछे एक आना प्रवेश -कर लेती है |जहा तक प्रवेश -कर का सवाल है ,हमे एतराज नही है |लेकिन पालिका 'निकासी -कर 'भी लेती है \कहने का मतलब यह की अगर कोई बाहरी आदमी बनारस आये और आकर वापस चला जाए तो उसे दो आने की चपत पड़ जाती है |शायद आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की घर के लोग अर्थात ख़ास बनारस के बाशिंदे भी इस कर से मुक्त नही है |चूँकि यह कर रेलवे के माध्यम से लिया जाता है >इसलिए हम -आप नही जान पाते |काशी जैसी नगरी के लिए क्या यह नियम निरालेपन का द्योतक नही है ?
सफाई पसंद शहर
इस कर  ' की बाबत कहा जाता है की यह इसलिए लिया जाता है की तीर्थ स्थान होने की वजह से यहा गंदगी काफी होती है |लिहाजा सफाई खर्च (बनाम जर्माना )'तीर्थयात्री 'कर के रूप में लिया जाता है |बनारस कितना साफ़ -सुधरा शहर है ,इसका नमूना गली -सड़के तो पेश करती ही है अखबारों के 'सम्पादक के नाम पत्र ' वाले कालम भी प्रसंशा-शब्दों से रंगे रहते है |माननीय पंडित नेहरु तथा स्वच्छ काशी आन्दोलन के जन्मदाता आचार्य विनोवा भावे इस बात के प्रत्यक्ष गवाह है |
खुदा आबाद रखे देश के मंत्रियों को जो गाहे -बगाहे कनछेदन ,मुंडन ,शादी और उदघाटन के सिलसिले में बनारस चले आते है जिससे कुछ सफाई हो जाती है ; नालियों में पानी और छुने का छिडकाव हो जाता है |
निराली भूमि
अगर आप कभी काशी नही आये है तो आपको लिखकर सारी बाते समझाई नही जा सकती |अगर आये है और इसका निरालापन नही देखा है तो यह आपके लिए दुर्भाग्य की बात है |शायद आप यह सवाल करे की आखिर बनारस में इतना क्या निरालापन है जिसके लिए ढिढोरा पीटा जा रहा है ,तो अर्ज़ है ---
विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है की पृथ्वी शून्य में स्थित है और वह सूर्य के चारो तरफ चक्कर काटती है |लेकिन इस तथ्य को भारत वासी नही मानते |उनका विज्ञान यह कहता है की पृथ्वी 'शेषनाग 'के फेन 'पर स्थित है और स्वं सूर्य उसके चारो ओर चक्कर काटता है |हमने कभी पश्चिम ,उत्तर या दक्षिण से सूरज को उगते नही देखा |यह सब विज्ञान की बाते चंडूखाने की गप्प है |एक बेपेदी का लोटा जब बिना सहारे के इधर --उधर लुढकता है तब पृथ्वी जैसी भारी गोलाकार वस्तु (बकौल पश्चिमी विज्ञान )बिना किसी लाग (सहारे ) के कैसे स्थिर रह सकती है ?बताइए ,है कोई वैज्ञानिक -खगोलवेत्ता जो उत्तर देने का साहस करे !
बनारस वालो का दृढ विश्वास है -पृथ्वी शेषनाग के फन  पर स्थित है पर उनका बनारस भगवान  शंकर के त्रिशूल पर है |शेषनाग से उनका कोई मतलब नही |इसीलिए काशी को तीन लोक से न्यारी कहा गया है |यहा गंगा उत्तरवाहिनी  है ,यहा कभी भूकम्प नही आता  |कभी -कभी शंकर भगवान जब आराम करने के लिए त्रिशूल पर पथ टेक देते है तब यहा की जमीन कुछ हिल भर जाती है |अधिक दूर क्यों ,काशी शंकर के त्रिशूल पर है या नही ,इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यहा की भूमि की बनावट है |
अब आप एक त्रिशूल की कल्पना करे जिसमे तीन फल होते है |बीचवाला फल सबसे उंचा और दोनों ओर ढलुवा होता है |बाकी दोनों फल ऊपरी दिशा में मुड़े होते है |बीचवाला फल वर्तमान चौक -ज्ञानवापी है |प्राचीन काल में काशी का महाश्मशान यही था |वर्तमान विश्वनाथ मंदिर के निकट से गंगा बहती थी |शंकर का सबसे प्रिय स्थान श्मशान होने की वजह से उसे शीर्ष स्थान दिया गया है |आज भी आधी रात के बाद शंकर के 'गण ' इस स्थान के प्रसिद्ध बाज़ार कचौड़ी गली में मिठाई खरीदने आते है |चौक के दोनों ओर भयंकर ढाल है |यह ढाल कितना भयंकर है इसका अंदाज रिक्शे की सवारी में अनुभव हो जाता है | दक्षिण का ढाल जगमबाड़ी में और उत्तर का ढाल मैदागिन में जाकर समाप्त होता है |फिर दूसरी चढाई वाला ढाल मछोदरी से राजघाट और उधर जगमबाड़ी से भदैनी तक है |इसके बाद दोनों तरह उतराई है |काशी के इस भूगोल को पढने के पश्चात अब आपको भी मानना पड़ेगा की काशी शंकर के त्रिशूल पर अवश्य स्थित है |इसमें संदेह करने की कोई गुंजाइश नही है |
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जिस प्रकार हिन्दु धर्म कितना प्राचीन है पता नही चलता ठीक उसी प्रकार काशी कितनी प्राचीन है ,पता नही लग सका |
यद्धपि बनारस की खुदाई से प्राप्त अनेक मोहरे ,ईट,पथ्थर ,हुक्का ,चिलम और सुराही के टुकडो का पोस्मार्टम हो चुका है फिर भी सही बात अभी तक प्रकाश में नही आई है |जन -साधारण में अवश्य काशी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है |कहा जाता है कि सृष्टि कि उत्पत्ति के पूर्व काशी को शंकर भगवान अपने त्रिशूल पर लादे घूमते -फिरते थे |जब सृष्टि कि उत्पत्ति हो गयी तब इसे त्रिशूल से उतारकर पृथ्वी के मध्य में रख दिया गया |
यह सृष्टि कितनी प्राचीन है ,इस सम्बन्ध में उतना ही बड़ा मतभेद है जितना यूरोप और एशिया में या पूर्वी गोलार्द्ध में है |सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में एक बार प्रसिद्ध पर्यटक बर्नियर को कौतूहल हुआ था |अपनी इस शंका को उसने काशी के तत्कालीन पंडितो पर प्रगट की,नतीजा यह हुआ कि उन लोगो ने अलजबरा कि भांति इतना बड़ा सवाल लगाना शुरू किया जिसे देखकर बर्नियर कि बुद्धि गोल हो गयी |फलस्वरूप उसका हल बिना जाने उसने यह स्वीकार कर लिया कि काशी बहुत प्राचीन है |इसका हिसाब सहज नही |अगर हजरत कुछ दिन यंहा और ठहर जाते टी सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में सिर्फ उन्हें ही नही ,बल्कि उनकी डायरी से सारे संसार को यह बात मालूम हो जाती |चूँकि पृथ्वी के जन्म के पूर्व काशी कि उत्पत्ति हो गयी थी इसलिए इसे 'अपुनभर्वभूमि ' कहा गया है |एक अर्से तक शंकर के त्रिशूल पर चक्कर काटने के कारण 'रुद्रावास 'कहा गया |प्राचीन काल में यंहा के जंगलो में भी मंगल था ,इसीलिए इसे 'आनंदवन 'और 'आनन्द-कानन ' कहा गया |इन्ही जंगलो में ऋषि -मुनि मौज -पानी लेते थे ,इसीलिए इसे 'तप: स्थली 'कहा गया |    तपस्वियों की अधिकता के कारण यंहा की भूमि को 'अविमुक्त -क्षेत्र 'की मान्यता मिली |
इसका नतीजा यह हुआ की काफी तादाद में लोग यंहा आने लगे |उनके मरने पर उनके लिए एक बड़ा श्मशान बनाया गया |  कहने का मतलब काशी का 'नाम 'महाश्मशान ' भी हो गया |
प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह पता चलता है कि काश्य नामक राजा ने काशी नगरी बसाई :अर्थात इसके पूर्व काशी नगरी का अस्तित्व नही था |जब काश्य के पूर्व यह नगर बसा नही था तब यह निश्चित है कि उन दिनों मनु कि सन्ताने नही रहती थी ,बल्कि शंकर के गण ही रहते थे |हमे प्रस्तरयुग ,ताम्रयुग ,और लौहयुग कि बातो का पता है |हमारे पूर्वज उत्तरी ध्रुव से आये या मध्य एशिया से आये ,इसका समाधान भी हो चुका है |पर काश्य के पूर्व काशी कहा थी ,पता नही लग सका |
काशी की स्थापना
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काश्य के पूर्वज राजा थे इसीलिए उन्हें राजा कहा गया है अथवा काशी नगरी बसाने के कारण उन्हें राजा कहा गया है ,यह बात विवादास्पद है |ऐसा लगता है की इन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नही मिला ,फलस्वरूप ये नाराज होकर जंगल में चले गये |वहा जंगल आदि साफ़ कर एक फर्स्ट क्लास का बंगला बनवाकर रहने लगे |धीरे -धीरे खेती -बारी भी शुरू की |लेकिन इतना करने पर भी स्थान उदास ही रहा |नतीजा यह हुआ की कुछ और मकान बनवाये और उन्हें किराए पर दे दिया |इस प्रकार पहले -पहल मनु की संतानों की आबादी यहाँ बस गयी |आजकल जैसे मालवीय नगर ,लाला लाजपत नगर आदि बस रहे है ठीक उसी प्रकार काशी की स्थापना हो गयी |
ऐसा अनुमान किया जाता है की उन दिनों काशी की भूमि किसी राजा की अमलदारी में नही रही वरना काश्य को भूमि का पत्ता लिखवाना पड़ता ,मालगुजारी देनी पड़ती और लगान भी वसूल करते |चूँकि इस नगरी को आबाद करने का श्रेय इन्ही को प्राप्त हुआ था ,इसीलिए लोगो ने समझदारी से काम लेकर इसे काशी नगरी कहना शुरू किया |आगे चलकर इनके प्रपौत्र ने इसे अपनी राजधानी बनाया कहने का मतलब परपोते तक आते -आते काशी नगरी राज्य बन गयी थी और उस फर्स्ट क्लास के बंगले को महल कहा जाने लगा था |इन्ही काश्य राजा के वंशधर थे -दिवोदास |सिर्फ दिवोदास ही नही ,महाराज दिवोदास |कहा जाता है की एक बार इन पर हैहय वंश वाले चढ़  आये थे |लड़ाई के मैदान से रफूचक्कर होकर हजरत काशी से भाग गये |  भागते -भागते गंगा -गोमती के संगम पर जाकर ठहरे |अगर वहा गोमती ने इनका रास्ता न रोका होता तो और भी आगे बढ़ जाते |जब उन्होंने यह अनुभव किया की अब पीछा करने वाले नही आ रहे है तब वे कुछ देर के लिए वही आराम करने लगे |जगह निछ्द्द्म थी |बनारसवाले हमेशा से निछ्द्द्म जगह जरा अधिक पसंद करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने वही डेरा डाल दिया |कहने का मतलब वही एक नयी काशी बसा डाली | कुछ दिनों तक चवनप्रास का सेवन करते रहे ,दंड पेलते रहे और भांग छानते रहे |जब उनमे इतनी ताकत आ गयी की हैहय वंश वालो  से मोर्चा ले सके ,तब सीधे पुरानी काशी पर चढ़ आये और बात की बात में उसे ले लिया |इस प्रकार फिर काशीराज  बन बैठे |हैहय वालो के कारण काशी की भूमि अपवित्र हो गयी थी ,उसे दस अश्वमेघ यज्ञ से शुद्ध किया और शहर के चारो तरफ परकोटा बनवा दिया ताकि बाहरी शत्रु झटपट शहर पर कब्जा न कर सके |इसी सुरक्षा के कारण पूरे 500 वर्ष यानी 18 -20 पीढ़ी तक राज्य करने के पश्चात इना वंश शिवलोक वासी हो गया |
काशी से वाराणसी
इस पीढ़ी के पश्चात कुछ फुटकर राजा हुए |  उन लोगो ने कुछ कमाल नही दिखाया ,अर्थात न मंदिर बनवाए ,न स्तूप खड़े किए और न खम्भे गाड़े |फलस्वरूप ,उनकी ख़ास चर्चा नही हुई |कम -से -कम उन भले मानुषो को एक -एक साइनबोर्ड जरुर गाढ़ देना चाहिए था |   इससे इतिहासकारों को कुछ सुविधा होती |
ईसा पूर्व सातवी शताब्दी में ब्रम्हदत्त  वंशीय राजाओं का कुछ हालचाल ,बौद्ध -साहित्य में है ,जिनके बारे में बुद्ध भगवान ने बहुत कुछ कहा है ,लेकिन उनमे से किसी राजा का ओरिजनल नाम कही नही मिलता |
पता नही किस्मे यह मौलिक सूझ उत्पन्न हुई की उसने काशी नाम को सेकेण्ड हैण्ड समझकर इसका नाम वाराणसी कर दिया |  कुछ लोगो का मत है की वरुणा और अस्सी नदी के बीच उन दिनों काशी नगरी बसी हुई थी ,इसीलिए इन दोनों नदियों के नाम पर नगरी का नाम रख दिया गया ,ताकि भविष्य में कोई राजा अपने नाम का सदुपयोग इस नगरी के नाम पर न करे |इसमें संदेह नही की वह आदमी बहूदूरदर्शी था वरना इतिहासकारों को ,चिठ्ठीरसो को और बाहरी यात्रियों को बड़ी परेशानी होती |
लेकिन यह कहना की वरुणा और असी नदी के कारण इस नगरी का नाम वाराणसी रखा गया बिलकुल वाहियात है ,गलत है और अप्रमाणिक है | जब पद्रहवी शदाब्दी में यानी तुलसीदास जी के समय ,भदैनी का इलाका शहर का बाहरी क्षेत्र माना जाता था तब असी जैसे बाहरी क्षेत्र को वाराणसी में मान कैसे लिया गया ? दूसरे विद्वानों का मत है की असी नही ,नासी नामक एक नदी थी जो कालान्तर में सुख गयी ,इन दोनों नदियों के मध्य वाराणसी बसी हुई थी ,इसलिए इसका नाम वाराणसी रखा गया |यह बात कुछ हद तक काबिलेगौर है लिहाजा हम इसे तस्दीक कर लेते है |
भगवान बुद्ध के कारण काशी की ख्याति आधी दुनिया में फ़ैल गयी थी |   इसलिए पड़ोसी राज्य के राजा हमेशा इसे हडपना चाहते थे |  जिसे देखो वही लाठी लिए सर पर तैयार रहने लगा |नाग ,शुंग और कण्व वंश वाले  हमेशा एक दूसरे के माथे पर सेंगरी बजाते रहे |     इन लोगो की जघन्य कार्यवाही के प्रमाण -पत्र सारनाथ की खुदाई में प्राप्त हो चुके है |
ईसा की प्रथम शताब्दी में प्रथम विदेशी आक्रामक बनारस आया |  यह था -कुषाण सम्राट कनिष्क |  लेकिन था बेचारा भला आदमी |  उसने पड़ोसियों के बमचख में फायदा जरुर उठाया    पर बनारस के बहरी  अलंग सारनाथ को खूब सवारा भी |  कनिष्क के पश्चात भारशिवो और गुप्त सम्राटो का रोब एक अरसे तक बनारस वालो पर ग़ालिब होता रहा |  इस बीच इतने उपद्रव बनारस को लेकर हुए की इतिहास के अनेक पृष्ठ इनके काले कारनामो से भर गये है |मौखरी वंश वाले भी मणिकर्णिका घाट पर नहाने आये तो यहाँ राजा बन बैठे |  इसी प्रकार हर्षवर्द्धन के अन्तर में बौद्ध धर्म के प्रति प्रेम उमड़ा तो उन्होंने भी बनारस को धर दबाया |  आठवी शताब्दी में इधर के इलाके में कोई तगड़ा राजा नही था ,इसीलिए बंगाल से लपके हुए पाल नृपति चले आये |  लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रतिहारो ने उन्हें खदेड़ दिया और स्वंय 150 वर्ष के लिए यहा जम गये |  कन्नौज से इत्र  की दूकान लेकर गाह्डवाले भी एक बार आये थे | मध्य प्रदेश से दुधिया छानने के लिए कलचुरीवाले भी आये थे |कलचुरियो का एक साइनबोर्ड  कर्दमेश्वर मंदिर में है |  यह मंदिर यंहा 'कनवा 'ग्राम में है |   यही बनारस का सबसे पुराना मंदिर है |    इसके अलावा जितने मंदिर है सब तीन सौ वर्ष के भीतर बने हुए है |
वाराणसी से बनारस

अब तक विदेशी आक्रमक के रूप में वाराणसी में कनिष्क  आया था | जिस समय कलचुरी वंश के राजा गांगेय कुम्भ नहाने प्रतिष्ठान गये हुए थे ,ठीक उसी समय नियालतगिन चुपके से आया और यहा से कुछ रकम चुराकर भाग गया |  नियालतगिन के बाद जितने विदेशी आक्रमक आये उन सबकी अधिक कृपा मंदिरों पर ही हुई | लगता है इन लोगो ने इसके पूर्व इतना उंचा मकान नही देखा था |  देखते भी कैसे ?   सराय में ही अधिकतर ठरते थे जो एक मंजिल से ऊँची नही होती थी |  यहा के मंदिर उनके लिए आश्चर्य की वस्तु रहे | उनका ख्याल था की इतने बड़े महल में शहर के सबसे बड़े रईस रहते है ,इसलिए उन्हें गिराकर लूटना अपना कर्तव्य समझा |  नियालतगिन के बाद सबसे जबर्दस्त लुटेरा मुहम्मद गौरी सन 1914 ई. में बनारस आया |  उसकी मरम्मत पृथ्वीराज पांच -छ बार कर चुके थे ,पर जयचंद के कारण उसका शुभागमन बनारस में हुआ |  नतीजा यह हुआ की उस खानदान का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट गया |  सन 1300 ई ,में अलाउद्धीन खिलजी आया | उसके बाद उसका दामाद बाबर्कशाह आया ,जिसे 'काला पहाड़ ' भी कहा गया है |सन 1494 ई. में सिकन्दर लोदी साहब आये और बहुत कुछ लाद  ले गये |  जहागीर ,शाहजहा और औरंगजेब की कृपा  इस शहर पर हो चूकि है | फरुखासियर और ईस्ट इंडिया कम्पनी की याद अभी ताजा है |  पता नही ,इन लोगो ने बनारस को लुटने का ठेका क्यों ले रखा था ?  लगता है ,उन्हें लुटने की यह प्रेरणा स्वनामधन्य लुटेरे महमूद गजनबी से प्राप्त हुई थी |  संभव है, उन दिनों बनारस में काफी मालदार लोग रहा करते थे अथवा ये लोग बहुत उत्पाती और खतरनाक रहे हो   |इसके अलावा यह संभव है की बनारस वाले इतने कमजोर रहे की जिसके में  आया वही दो धौल जमाता गया |  खैर कारण चाहे जो कुछ भी रहे हो बनारस को लुटा खूब गया है ,इसे धार्मिक  और इतिहास के पंडित दोनों ही मानते है | बनारस को लुटने की यह परम्परा फरुखसियर के शासनकाल तक बराबर चलती रही |इन आक्रमणों में कुछ लोग यहा बस गये |   उन्हें वाराणसी नाम श्रुतिकटु लगा ,फलस्वरूप वाराणसी नाम घिसते -घिसते बनारस बन गया |जिस प्रकार रामनगर को आज भी लोग नामनगर   कहते है |  मुगलकाल में इसका नाम बनारस ही रहा |

बनारस बनाम मुहम्मदाबाद
औरंगजेब जरा ओरिजनल टाइप शासक था |  सबसे अधिक कृपा उसकी इस नगर पर हुई |  उसे बनारस नाम बड़ा विचित्र लगा |  कारण बनारस में न तो कोई रस बनता था और न यहा के लोग रसिक रह गये थे |   औरंगजेब के शासनकाल में इसकी हालत अत्यंत खराब हो गयी थी |   फलस्वरूप उसने इसका नाम मुहम्मदाबाद रख दिया |
मुहम्मदाबाद से बनारस
मुगलिया सल्तनत भी 1857 के पहले उखड़ गयी |   नतीजा यह हुआ की सात समुन्द्र सत्तर नदी और सत्ताईस देश पार कर एक हकीम शाहजहा के शासनकाल में आया था ,उसके वंशधरो ने इस भूमि को लावारिस समझकर अपनी सम्पत्ति बना ली |   पहले कम्पनी आई ,फिर यहा की मालिकन रानी बनी |  रानी के बारे में कुछ रामायण प्रेमियों को कहते सुना गया है की वह पूर्व जन्म में त्रिजटा थी |  संभव है उनका विश्वास ठीक हो   |ऐसी हालत में यह मानना पडेगा की ये लोग पूर्व जन्म में लंका में रहते थे अथवा बजरंगबली की सेना में लेफ्ट -राईट करते रहे होंगे | गौरांग प्रभुओ की 'कृपा से ' हमने रेल ,हवाई जहाज ,स्टीमर ,मोटर ,साइकिल देखा |  डाक -तार ,कचहरी और जमीदारी के झगड़े देखे |  यहा से विदेशो में कच्चा माल भेजकर विदेशो से हजारो अपूर्व सुन्दरिया मंगवाकर अपनी नस्ल बदल डाली |
ये लोग जब बनारस आये तब इन्होने देखा --यहा के लोग बड़े अजीब हैं |  हर वक्त गहरे में छानते है ,गहरेबाजी करते है और बातचीत भी फराटे के साथ करते है |  कहने का मतलब हर वक्त रेस करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने इस शहर का नाम 'बेनारेस' रख दिया |
बनारस से पुन:वाराणसी
ब्राह्मणों को सावधान करने वाले आर्यों की आदि भूमि का पता लगानेवाले डाक्टर सम्पूर्णानन्द को यह टेढा नाम पसंद नही था |  बहुत दिनों से इसमें परिवर्तन करना चाहते थे पर मौक़ा नही मिल रहा था |लगे हाथ बुद्ध की 2500 वी. जयंती पर इसे वाराणसी कर दिया |  यद्धपि इस नाम पर काफी बमचख मची ,पर जिस प्रकार संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश बन गया ,उसी प्रकार अब बनारस से वाराणसी बनता जा रहा है |
भविष्य में क्या होगा ?
भविष्य में वाराणसी रहेगा या नही ,कौन जाने |  प्राचीनकाल की तरह पुन:वाराणसी नाम पर साफा -पानी होता रहे तो बनारस बन ही  जाएगा इसमें कोई संदेह नही | जिन्हें वाराणसी बुरा लगता हो उन्हें यह श्लोक याद रखना चाहिए ---------
ख़ाक भी जिस जमी का पारस है ,
शहर मशहूर यही बनारस है |
पांचवी शताब्दी में बनारस की लम्बाई आठ मील और चौड़ाई तीन मील के लगभग थी |  सातवी शताब्दी आते -आते नौ -साढे नौ मील लम्बाई और तीन -साढे तीन मील चौड़ाई हो गयी |
ग्यारहवी शताब्दी में ,न जाने क्यों इसका क्षेत्रफल पांच मील में हो गया | इसके बाद १1881 ई. में पूरा जिला एक हजार वर्ग मील में हो गया | अब तो वरुणा -असी की सीमा तोडकर यह आगे बढती जा रही है ; पता नही रबड़ की भाति   इसका घेरा कहा तक फ़ैल जाएगा | आज भी यह माना जाता है की गंगा के उस पार मरने वाला गधा योनी में जन्म लेते है ,जिसके चश्मदीद गवाह शरच्चन्द्र चटर्जी थे |  लेकिन अब उधर की सीमा को यानी मुगलसराय को भी शहर बनारस में कर लेने की योजना बन  रही है | अब हम मरने पर किस योनी में जन्म लेंगे ,इसका निर्णय शीघ्र होना चाहिए ,वरना इसके लिए आन्दोलन -सत्याग्रह छिड़ सकता है | बनारस में शहरी क्षेत्र उतना ही  माना जाता है जहा की नुक्कड़ पर उसके गण अर्थात चुंगी अधिकारी बैठकर आने -जाने वालो की गठरी टटोला करते है | इस प्रकार अब बनारस शीघ्र ही  मेयर के अधिकार में आ जाएगा |
                            
                                                      
-सुनील दत्ता
.साभार विश्वनाथ मुखर्जी की पुस्तक  ""बना रहे बनारस से  ""

रविवार, 17 अप्रैल 2011

बनारस विस्फोट 2010 और मीडिया ट्रायल, भाग 3


बनारस विस्फोट 2010 और मीडिया ट्रायल, भाग 1

बनारस विस्फोट 2010 और मीडिया ट्रायल, भाग 2

यदि हम इसके बाद के समाचारों को देखें तो यह आभास होता है कि इण्डियन मुजाहिदीन के बहाने से संजरपुर और आजमगढ़ को टारगेट करने का एक अभियान चल पड़ा है। हालाँकि पहले ही दिन जिस प्रकार से आजमगढ़ का नाम आया उससे यह लगने लगा था कि कोई अज्ञात शाक्ति जाँच की दिशा को आजमगढ़ की ओर मोड़ने का प्रयास कर रही है। वह सिलसिला कुछ इस प्रकार आगे बढ़ता है:- ‘‘आजमगढ़ से जुड़ रहे हैं वाराणसी विस्फोट के तार, दिल्ली पुलिस को शक विस्फोट में फरार आतंकी डाॅ0 शहनवाज और असदुल्ला पर’’ शीर्षक से अमर उजाला लिखता है............. ए0टी0एस0 ने दिल्ली पुलिस की थ्योरी को जाँच में शामिल कर लिया है (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 6) उसी दिन के हिन्दुस्तान ने सीधे डाॅ0 शाहनवाज या अन्य किसी पर शक की सूईं नहीं घुमाई, परन्तु ‘‘नजरें फिर इण्डियन मुजाहिदीन पर’’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में डाॅ0 शाहनवाज के नाम को हाई लाइट करने का प्रयास अवश्य मालूम होता है। पत्र लिखता है- 9 आरोपित पहले की वारदातों के बाद एजेंसियों के हत्थे चढ़ चुके हैं लेकिन डाॅ0 शाहनवाज सहित 7 आरोपित सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं.............।
गिरफ्तार किया गया मो0 सैफ डाॅ0 शाहनवाज का छोटा भाई है। डाॅ0 शाहनवाज के बारे में जो जानकारी है उसके अनुसार 2006 में बिहार के सीवान जिले से बी0यू0एम0एस0 की डिग्री प्राप्त कर लखनऊ के मेयो अस्पताल में काम कर चुका है लेकिन 13 सितम्बर 2008 को दिल्ली ब्लास्ट के बाद से फरार है (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 3 आजमगढ़)। 9 दिसम्बर को दैनिक जागरण ने अपने पहले पृष्ठ पर जो खबर छापी है उसमें तो लगभग डाॅ0 शाहनवाज को बनारस विस्फोट का आरोपी बना ही दिया है। समाचार पढ़ने पर किसी को भी यही आभास होगा कि मामला हल हो चुका है बस आधिकारिक घोषणा ही बाकी है। शीर्षक है- शाहनवाज का नाम आते ही सक्ते में संजरपुर, खुफिया एजेंसियों ने शक की सुईं यहाँ के डाॅ0 शाहनवाज की तरफ घुमाई है। हालाँकि यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया कि शाहनवाज कौन और कहाँ का रहने वाला है।.......... वैसे खुफिया सूत्रों की मानें तो डाॅ0 शाहनवाज ही मंगलवार की शाम वाराणसी में गंगा आरती के समय हुए विस्फोट का सूत्रधार है और वह संजरपुर का ही रहने वाला है। डाॅ0 शाहनवाज के बारे में आई0बी0 के हवाले से वाराणसी विस्फोट के पहले और बाद में भी यह समाचार छप चुका है कि वह शारजह पहुँच गया है। कितनी विचित्र बात है कि यहाँ उसके सम्पर्क सूत्रों का पता लगाने से पहले ही उसे सूत्रधार घोषित कर दिया गया। इस प्रकार के समाचार जाँच एजेंसियों के लिए निमन्त्रण जैसे लगते हैं कि कहीं भटकने की जरूरत नहीं है। संजरपुर और आजमगढ़ चले आइए गुत्थी सुलझ जाएगी। इन समाचारों की विश्वसनीयता का अन्दाजा दैनिक जागरण में प्रदेश सरकार के हवाले से प्रकाशित उस समाचार से किया जा सकता है जिसका शीर्षक है ‘‘अहम सुराग के लिए जी तोड़ मशक्कत’’, पत्र आगे लिखता है......... प्रदेश सरकार ने माना कि वाराणसी में मंगलवार को हुए आतंकी विस्फोट को लेकर उसे कोई सुराग नहीं मिल पाया है............ घटना को अंजाम देने वाले संगठन की पहचान नहीं हो सकी है........ घटनास्थल से बैटरी रिमोट कंट्रोल डिवाइस एवं छर्रे भी नहीं मिले हैं............. बृजलाल ने पत्रकारों को बताया कि ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है जिससे पुख्ता तौर पर किसी आतंकी संगठन का नाम लेकर कहा जा सके कि उसने घटना को अंजाम दिया है........... रासायनिक जाँच करके यह पता लगाया जाएगा कि विस्फोट को अंजाम देने वाला आतंकी संगठन कौन सा हो सकता है।.......... वाराणसी विस्फोट के पीछे डाॅ0 शाहनवाज की भूमिका होने के बाबत पूछे गए सवाल पर उन्हांेने कहा कि विस्फोट में डाॅ0 शाहनवाज शामिल था या नहीं इस बारे मंे अभी तक कोई सुबूत नहीं मिले हैं और न ही ए0टी0एस0 ने पूछ-ताछ के लिए किसी को उठाया है (दैनिक जागरण 9 दिसम्बर पृष्ठ 11)।
ए0डी0जी0 उ0प्र0 के उपर्युक्त स्पष्ट बयान से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि किसी संगठन, व्यक्ति या स्थान विशेष का नाम लेकर उस समय तक प्रकाशित सभी समाचार आधारहीन थे। इसे मात्र कयास या अनुमान ही कहा जा सकता है। परन्तु इस आशय की खबरों को लेकर जिस प्रकार सभी अखबारों में समानता पाई जाती है उस पर सवाल उठना लाजिमी है कि वे अधिकारी, सुरक्षा एजेंसियाँ या खुफिया सूत्र कौन से हैं जिनको उद्धृत करके यह एक तरफा समाचार प्रकाशित हुए और लगभग सभी समाचार पत्रों में इन्हीं सूत्रों के हवाले से छपे। यह मात्र संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछे अवश्य कुछ शक्तियाँ हैं जो लगातार समाचार माध्यमों को एक ही प्रकार के इनपुट्स देती रही हैं ताकि जाँच कोे एक खास दिशा दी जा सके। 9 दिसम्बर को इन सभी समाचार पत्रों ने वाराणसी विस्फोट पर सम्पादकीय भी लिखे हैं जो काफी संतुलित हैं।
इसकी सराहना इस लिए भी की जानी चाहिए कि इसमें ए0डी0जी0 कानून व्यवस्था के बयान की झलक भी है और निष्पक्ष जाँच के लिए प्रेरित करने की सामग्री भी। इसके बावजूद डाॅ0 शाहनवाज, संजरपुर और आजमगढ़ को लक्ष्य बनाकर छपने वाली खबरों का सिलसिला जारी रहा। अमर उजाला 10 दिसम्बर पृष्ठ 2 आजमगढ़ में ‘‘शाहनवाज संग तीन अन्य संदिग्धों की तलाश’’ शीर्षक से लिखता है.......... मंगलवार को हुए आतंकी विस्फोट के मामले में आजमगढ़ के डाॅ0 शाहनवाज के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी होने के बाद से यहाँ उसके सम्पर्कों की तलाश शुरू हो गई है। गुरुवार की शाम तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है जिनसे किसी अज्ञात स्थान पर पूछ ताछ चल रही है।
(धमाके में आई0एम0 के स्लीपर एजेन्ट का इस्तेमाल सम्भव) शीर्षक से हिन्दुस्तान (10 दिसम्बर पृष्ठ 10) लिखता हैं............. वाराणसी में हुए बम धमाके को लेकर खुफिया विभाग (आई0बी0) के हाथ पूरी तरह खाली हैं। आई0बी0 को अभी पुख्ता तौर पर यह पता नहीं है कि बम धमाके को अंजाम किस आतंकी संगठन ने दिया है और उसका उद्देश्य क्या है।............. कामन वेल्थ खेलों से पहले मिले इनपुट्स के आधार पर दिल्ली पुलिस के अधिकारी मान रहे हैं कि इसके पीछे इण्डियन मुजाहिद (आई0एम0) का हाथ हैं, हालाँकि इस मामले में अभी तक दिल्ली पुलिस के हाथ में कुछ नहीं है।


-मसीहुद्दीन संजरी
क्रमश:

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बनारस विस्फोट 2010 और मीडिया ट्रायल, भाग 2


बनारस विस्फोट 2010 और मीडिया ट्रायल, भाग 1


लगभग सभी समाचार पत्रों में यह खबर भी छपी थी कि गाँव में प्रवेश करने वाले वाहनों को देख कर ग्रामवासी सहम जाते हैं। शायद पत्रकार बन्धुओं ने इसका अर्थ यह निकाला कि ए0टी0एस0 या किसी सुरक्षा एजेंसी के लोगों के आने की आशंका को लेकर सन्देह और भय के कारण ऐसा होता है। परन्तु इस असहजता का एक बड़ा कारण आरोपी युवकों और गाँव के प्रति स्वयं मीडिया का रवैया भी रहा है। ग्रामवासियों में यह आम धारणा है कि पत्रकार बन्धु कितनी ही लुभावनी और सहानुभूतिपूर्ण बातें करें पर छपने वाले समाचार एक पक्षीय और समुदाय विशेष के लोगों की छवि को धूमिल करने वाले ही होते हैं।
बनारस धमाके के बाद जब कुछ पत्रकारांे ने ए0टी0एस0 वालों से गाँव में आने के बाबत सवाल किया तो कई लोगों ने उन्हें बताया कि मंगलवार 7 दिसम्बर को दिन में 10-11 बजे के बीच चार से पाँच अज्ञात लोग जो किसी एजेन्सी से सम्बन्धित लगते थे संजरपुर बाजार में घूमते हुए देखे गए थे। उनके पास कुछ फोटो भी थे। परन्तु किसी समाचार पत्र ने बनारस धमाके से पहले इन अज्ञात लोगों की गतिविधियों का समाचार नहीं प्रकाशित किया। बटाला हाउस काण्ड के बाद से कई अवसरों पर ऐसे समाचार प्रकाशित हुए जो मनगढ़ंत, घोर आपत्तिजनक और वास्तविकता से कोसों दूर थे। गाँव के लोग उस समाचार को अब भी नहीं भुला पा रहें हैं जिसमें कहा गया था कि आतिफ और सैफ के बैंक खातों से बहुत ही अल्प अवधि में तीन करोड़ रूपयों का लेन देन हुआ है। हालाँकि यह समाचार बिल्कुल ही निराधार और झूठा था और इस आशय का प्रमाण भी पत्रकारों को दिया गया परन्तु किसी ने अब तक इसका खण्डन नहीं किया। शायद इन्हीं कारणों से पत्रकार ग्रामवासियों का विश्वास नहीं जीत पा रहें हैं और ग्रामवासी जब उन्हें देखकर असहज होते हैं तो पत्रकार उसका अलग अर्थ निकालते हैं......................।
ये वे समाचार थे जिन्हें देखा और परखा जा सकता है तथा इनकी सत्यता को प्रमाणित भी किया जा सकता है इसी वजह से हमने इन्हें तथ्यात्मक समाचारों की श्रेणी में रखा है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि इनमें स्पष्ट भिन्नता मौजूद है जिसे बहुत आसानी के साथ महसूस किया जा सकता है। दूसरी ओर वे समाचार हैं जिनका सम्बन्ध घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और उनके संगठन से है। यह जाँच का विषय है और जब तक कोई स्पष्ट संकेत न मिल जाय कोई भी समाचार सम्भावना और अनुमान की परिधि से बाहर नहीं जाना चाहिए। परन्तु समाचार माध्यमों ने इस लक्ष्मण रेखा को बार-बार पार किया है। वाराणसी धमाके के बाद भी आई0एम0 संजरपुर और आजमगढ़ को लेकर जिस तरह भावनात्मक समाचारों का प्रकाशन देखने को मिला वह बटाला हाउस काण्ड के पश्चात शुरू हुए मीडिया ट्रायल के विस्तार जैसा लगता है। 7 दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे
दशाश्वमेध घाट पर विस्फोट होता है। कथित रूप से आधे घंटे के बाद 7 बजे शाम को घटना की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 का ईमेल आता है। इसी ईमेल के आधार पर मुम्बई पुलिस आयुक्त संजीव दयाल की पत्रकार वार्ता के अंश सभी समाचार पत्रों में घटना के तीसरे दिन 9 दिसम्बर को प्रकाशित हुए जिसमें उनका कहना था............. बनारस धमाके की जिम्मेदारी लेने वाले आई0एम0 के आका इकबाल भटकल और रियाज भटकल पाक में हैं (हिन्दुस्तान 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 1)।........... लेकिन निश्चित तौर पर इण्डियन मुजाहिदीन के मुख्य खिलाड़ी पाकिस्तान में बैठे हैं और वहीं से आतंक का खेल चला रहे हैं। यह पूछने पर कि मुख्य खिलाड़ी से उनके क्या मायने हैं? दयाल ने कहा निश्चित तौर पर भटकल बन्धुओं से (अमर उजाला 9 दिसम्बर पृष्ठ नं0 6)। मुम्बई पुलिस आयुक्त का इण्डियन मुजाहिदीन और भटकल बन्धुओं पर इस आरोप का आधार आई0एम0 द्वारा भेजा गया ई-मेल था। हालाँकि ई-मेल जाँच की दिशा को भटकाने के लिए भी भेजा जा सकता है। इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे, पहले घटना से सम्बन्धित अन्य समाचारों पर, जिनका सिलसिला विस्फोट के अगले दिन से ही शुरू हो गया, इण्डियन मुजाहिदीन का ई-मेल उसका स्रोत नहीं हो सकता।
7 दिसम्बर को लगभग साढ़े 6 बजे शाम को विस्फोट के बाद समाचार पत्रों के प्रकाशन में मुश्किल से चार घण्टे का समय रह जाता है। चारांे ओर अफरा-तफरी और अफवाहांे का माहौल है। इण्डियन मुजाहिदीन के ई-मेल के अलावा कोई दूसरा सुराग नहीं है और उस ई-मेल की प्रमाणिकता की जाँच अभी होना बाकी है। घटना स्थल पर कोई अवशेष न पाए जाने के कारण जाँच का रुख भी तय नहीं हो पा रहा है ऐसी स्थिति में जब कि समाचारों के प्रकाशन में चार घण्टे से भी कम समय है, फिर भी अगले दिन के समाचार पत्रों में घटना को अंजाम देने वाले सम्भावित कई संगठनों का नाम आया, उस में इण्डियन मुजाहिदीन के साथ आजमगढ़ की ओर भी उँगली उठाई गई। खास बात यह है कि उन्हीं संगठनों को शक के दायरे में रखा गया जिनसे मुस्लिम समुदाय पर ही आरोप आता हो। ................... वैसे तो हाल फिलहाल अधिकारी हूजी और सिमी पर शक कर रहे हैं परन्तु इसमें लश्कर के हाथ होने का भी सन्देह है (हिन्दुस्तान 8 दिसम्बर पृष्ठ नं0 15)। उसी दिन के दैनिक जागरण में आजमगढ़! पूर्वांचल (पृष्ठ 7) पर दो बड़ी खबरें छपीं। एक का शीर्षक है, ‘‘आतंकियों का ठिकाना रहा है आजमगढ़’’ और दूसरे का (शक की सुईं जनपद के फरार आतंकियों पर) पत्र आगे लिखता है..................... रात 9 बजे जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने वाराणसी मंे हिरासत में लिया हैं और जो कागजात उनके पास से मिले हैं, उससे यह आशंका और मजबूत हो गई है कि विस्फोट के तार आजमगढ़ से जुड़े हैं। सूचनाओं के बाद ए0टी0एस0 की एक टीम आजमगढ़ के लिए रवाना हो चुकी है। अमर उजाला की उसी दिन पृष्ठ नं0 14 पर हेड लाइन है-छः आतंकी अब भी फरार, कचहरी ब्लास्ट के आरोपी हैं दो आतंकी, इसी के साथ पिछले कुछ धमाकों और आजमगढ़ के गिरफ्तार और लापता युवकों की खबरें भी हैं। परन्तु उन धमाकांे का उल्लेख कहीं नहीं किया गया है जिनमें पहले सिमी. या हूजी जैसे संगठनों पर आरोप लगा था और अन्धाधुन्ध तरीके से मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार भी किया गया था लेकिन बाद में अभिनव भारत, सनातन संस्थान तथा संघ व उससे जुड़े अन्य संगठनों के सदस्यों के नाम प्रकाश में आए। उनमें से कई अब जेल में हैं और कई लापता। एक समाचार और, जो प्रमुखता से सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ वह था भाजपा के बनारस बन्द का। भाजपा की यह प्रतिक्रिया जिस तीव्रता के साथ आई उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह इसके लिए पहले से तैयार थी। इतने कम समय में घटना की पूरी जानकारी जुटा पाना आसान नहीं वह भी आतंकी विस्फोट जैसे गम्भीर मुद्दे पर।

-मसीहुद्दीन संजरी
क्रमश:
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