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रविवार, 6 दिसंबर 2015

नफरत का दौर : बाबरी मस्जिद का ध्वंस


 ध्वंस के समय उमा भारती- तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के साथ
अयोध्या में मर्यादा पुरषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मस्थली के बहाने बाबरी मस्जिद को नागपुरी हत्यारों ने 6 दिसम्बर 1992 को सुनियोजित षड्यंत्र के तहत नष्ट कर दिया था इस के पीछे मुख्य मंशा समाज में नफरत फैलाने की थी. 

भारतीय समाज में नफरत की राजनीति का कोई स्थान नही रहा है लेकिन एक छोटा समूह हर दौर में मौजूद रहा है. बौद्धों का विनाश पुष्पमित्र शुंग
के समय में एक छोटे आतंकी समूह ने राज्य की ताकत के बल पर किया था लेकिन उसके बाद भी भारतीय समाज में नफरत को अस्थायी स्वरूप नहीं मिला और वो आतंकी समूह जब सत्ता से बेदखल हुआ तो फिर पुन: सत्ता नहीं प्राप्त कर पाया. गाँधी की हत्या के बाद बाबरी मस्जिद का ध्वंस हिंदुवत्व वादियों की बड़ी आतंकी घटना थी. इस दिन भारतीय लोकतंत्र संविधान सब कुछ हारा था, जीता सिर्फ कट्टरवाद था. समय के मलहम ने बहुत सारे जख्मों को भर दिया. बाबरी मस्जिद का ध्वंस हरा भरा इस वजह से लगता है कि उन आतंकियों को हमारा न्यायतंत्र अभी तक सजा नहीं दे पाया है. ये हमारी मुख्य विफलता है.
जिस दिन हम उन आतंकियों को सजा दिलाने में सफल होंगे उस दिन भारतीय लोकतंत्र न्याय व्यवस्था का सर और ऊँचा होगा लेकिन वस्तुस्तिथियाँ इसके विपरीत हैं. इसी कारण कथित आतंकी हिंदुवत्व वादियों के हौसले बुलंद हैं. देश की बहुसंख्यक जनता नफरत की राजनीति में यकीन नहीं करती है लेकिन पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद से ओत प्रोत हिंदुवत्व वादी आतंकी समूह अब अमेरिकी साम्राज्यवाद से संचालित हो रहा है. इसी कारण इस आतंकी समूह के हौसले बुलंद हैं. हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई की परस्पर एकता ही नफरत की राजनीति को बेनकाब कर समाप्त कर सकती है. इसके अलावा कोई विकल्प नही है. नफरत की राजनीति समाप्त होने का अर्थ है कि साम्राज्यवादी मंसूबों का फ़ैल होना. हिन्दू मुसलमानों के बीच में जो नफरत की खाई ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा पैदा की गयी थी उस खाई को हिंदुवत्व वादी शक्तियां और गहरा कर रही हैं.

सुमन 

शनिवार, 5 सितंबर 2015

राम रहे टाट में - संघी रहे ठाठ में

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद राम लला टाट में और उनको टाट में पहुँचाने वाले लोग ठाठ में हैं. जब-जब चुनाव आता है तो संघ के एजेंडे में राम मंदिर निर्माण की बात जरूर आती है. अभी बिहार में चुनाव होने जा रहे हैं और संघ की बैठक में प्रधानमंत्री व संघ के कुल वक्ती कार्यकर्ता नरेन्द्र दामोदर मोदी एक कार्यकर्ता की हैसियत से उपस्थित हुए. वहां अयोध्या में राम मंदिर के मामले में संघ ने कहा कि हम राम मंदिर के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन हम सरकार की समय-सारणी के अनुसार उनके क्रियान्वयन का इंतजार करेंगे। कुछ दिन पूर्व अमित शाह ने कहा कि राम मंदिर के लिए 370 सीटें चाहिए. राम लला के नाम पर हमेशा हिन्दू जनमानस को झकझोर कर वोट लेकर सत्ता हासिल की जाती रही है और फिर उस मुद्दे को जिन्दा भी रखा जाता है जिससे धार्मिक आस्था और विश्वास को भुनाकर वोट प्राप्त कर सत्ता हासिल की जाए. उन्माद भरने के लिए यह नारा तो प्रिय है कि ' राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीँ बनायेंगे '. किन्तु यह सब हिन्दू आस्था का लाभ उठाने के लिए राजनीति का प्रयोग है जो संघ की प्रयोगशाला का सबसे बढ़िया हथियार है जिससे वोट पैदा करने का सबसे बढ़िया तरीका है. इसके अतिरिक्त न इनका राम में विशवास है न धर्म मेंसत्ता ही धर्म है. जो लोग बाबरी मस्जिद के ध्वंस के अपराधिक कृत्य में मारे गए थे उनके परिवारों का भी कोई पुरसाहाल नहीं है जब यह राम के भी नहीं हुए तो उनके नाम पर मरने वाले लोगों के भी यह नहीं हुए हैं सच्चिदानंद हरी साक्षी जो इस समय उन्नाव से सांसद हैं और जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी छोड़ दी थी तब उन्होंने कहा था , "मेरे सामने सिंघल ने महाराज वामदेव ने कहा कि आंदोलन तब तक तेज नहीं होगा, जब तक कोई मरता नहीं है। महाराज वामदेव ने कहा कि अगर बच्चे मरे, तो यह काफी बुरा होगा। सिंघल ने फिर कहा कि जब तक ऐसा नहीं होगा, आंदोलन गति नहीं पकड़ेगा।" 

साक्षी का दावा था कि बंगाल के कोठारी बंधु और राजस्‍थान के महेंद्र सिंह जैसे जाने-माने कारसेवकों को पुलिस ने कुछ खास लोगों के इशारे पर जानकर निशाने पर लिया। 

उमा भारती आज केन्द्रीय मंत्री हैं जब यह भारतीय जनता पार्टी से नाराज थी तब उन्होंने कहा था कि  कोठारी बंधुओं को  मारे जाने की जिम्मेदारी विनय कटियार के सिर पर मढ़ी थी.  उन्होंने कहा, "जो लोग मरे थे, वो विनय की गलती से। गलती भी नहीं, वो भगदड़ मची, वो गली छोटी थी। गलती मतलब वो भाग गया छोड़कर।"  संघ के लोगों ने अयोध्या में राम भक्त के मूड को समझते हुए शपथ दिलाई . शपथ यह थी, "6 दिसंबर के दिन हम राम भक्त राम लला के परिसर में यह शपथ लेते हैं कि वहां भव्य मंदिर बनाने के लिए इस ढांचे को हटाया जाना जरूरी हो गया है। राम जन्मभूमि मंदिर बनाने के‌ लिए इसे हटाना ही होगा।

जब चुनाव आता है तो संघ की प्रयोगशाला कहने लगती है कि "जय श्री राम, जय श्री राम और जय श्री राम और जब सरकार में आती है तो कहती है बैठक में यह तय किया गया है कि 'सरकार', अयोध्या में बनना चाहिए राम मंदिर. 

बाबरी मस्जिद में मूर्ति का रखवाना, फिर मस्जिद को तोडना, फिर उसको ढांचा कहना, फिर मंदिर निर्माण न करना कितने झूठ और कितने रंग बदल सकती है संघ की प्रयोगशाला, उसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता है. हिटलर का प्रचार मंत्री गोविल्स के ये आधुनिक चेले उससे कई कदम आगे हैं. राम हमेशा संघ के कारण वोट बटोरने के हथियार तो हो सकते हैं लेकिन उनकी मर्यादा को नष्ट यह संघी करके राजनीति का केंद्र बिंदु बना दिए हैं. 


सुमन

लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

पिछड़े मुसलमान



लगभग 2 वर्ष पहले मुझे पटना में पिछड़े वर्ग के मुसलमानों के एक सम्मेलन को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। इस सम्मेलन का आयोजन ‘‘तहरीक-ए-पसमांदा मुस्लिम समाज‘‘ ने किया था। सम्मेलन में लगभग 400 लोग उपस्थित थे। हर वक्ता को केवल तीन-चार मिनट बोलने के लिए कहा गया और संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अधिकारी को छोड़कर, अन्य सभी के मामले में इस नियम का पालन हुआ। सम्मेलन 11 बजे सुबहशुरू हुआ और चाय या भोजन अवकाश  के बिना 5 बजे तक चलता रहा। इस प्रकार, लगभग 150 लोगों ने सम्मेलन में भाषण दिया, जिसमें से केवल पांच हिन्दू दलित थे और एक दलितों के बीच काम करने वाला ईसाई सामाजिक कार्यकर्ता था। वक्ताओं ने मुस्लिम नेतृत्व को कोसने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसे मैं यहां दोहरा नहीं सकता। उन्होंने कहा कि उनके नेताओं को उनकी बदहाली की कोई परवाह नहीं है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सभी पार्टियों के मुस्लिम नेता, समुदाय को केवल भावनात्मक मुद्दों पर भड़काने का काम करते आ रहे हैं। इनमें शामिल हैं बाबरी मस्जिद, मुस्लिम पर्सनल लाॅ, शाहबानो व सेटेनिक वर्सेस पर प्रतिबंध जैसे मसले। उनका कहना था कि मुस्लिम पिछड़े वर्गों की हालत, हिन्दू दलितों से भी बदतर है। उन्हें न केवल समाज अछूत मानता है वरन् उनके समुदाय के सदस्य भी उनके साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहते। वक्ताओं में हलालखोर समाज के प्रतिनिधि शामिल थे। इस समाज के सदस्य, सिर पर मैला ढोने का काम करते हैं। मुस्लिम अशरफ, अपवित्रता और पवित्रता की अवधारणाओं में उतना ही विस्वाश -वास करते हैं जितना कि हिन्दू उच्च जाति के लोग। हलालखोरों को भी मस्जिदों में प्रवेश करने से हतोत्साहित किया जाता है और अगर इस समुदाय का कोई सदस्य, परिणामों की परवाह किए बगैर, मस्जिद में घुस भी जाता है तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह नमाजियों की सब से आखिर की पंक्ति में खड़ा हो। पिछड़े मुसलमानों की हालत, हिन्दू दलितों से भी खराब है क्योंकि हिन्दू दलितों को कम से कम अनुसूचित जाति के बतौर, संवैधानिक और कानूनी लाभ प्राप्त हैं जबकि सन् 1950 के राष्ट्रपति के आदेष के अनुसार, किसी गैर-हिन्दू, गैर-सिक्ख या गैर-बौद्ध को अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित करने पर प्रतिबंध है। इस तरह, वे शैक्षणिक संस्थाओं, सरकारी नौकरियों और संसद व विधानसभाओं में आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। इसी तरह, उन्हें अनुसूचित जाति, जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की सुरक्षा भी प्राप्त नहीं है। एक वक्ता, जो सारी मुसीबतों से जूझकर शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो गया था, को तब भी अशरफ समुदाय में सम्मान प्राप्त नहीं था। केवल उसकी हलालखोर बिरादरी के सदस्य उस पर गर्व महसूस करते थे। एक हिन्दू नाम का उपयोग कर वह सरकारी नौकरी पाने में सफल भी हो गया था। इस्लाम में अपनी आस्था को उसे अपने दिल के एक कोने में छुपाकर रखना पड़ता था और उसके परिवार का सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन अलग-अलग था।
सम्मेलन में दलित हिन्दू वक्ताओं ने दलित मुसलमानों की हालत पर चिंता और दुःख व्यक्त किया और यह मांग की कि गैर-हिन्दू, गैर-सिक्ख और गैर-बौद्ध दलितों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए। यहां यह महत्वपूर्ण है कि अन्य समुदायों को अनुसूचित जाति में शामिल करने से आरक्षण के लाभ और बंट जायेंगे परंतु फिर भी हिन्दू दलित, अपने मुसलमान साथियों की खातिर यह त्याग करने को तैयार थे।
इस सम्मेलन से एक बार फिर यह स्पष्ट हुआ कि मुस्लिम ‘समुदाय’, दरअसल, समुदाय है ही नहीं। इसमें कई अलग-अलग बिरादरियां हैं जैसे हलालखोर, खटीक, तेली, तंबोली, जुलाहा, बागवान, पठान, सैय्यद, शेख इत्यादि। इन मुस्लिम बिरादरियों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-अशरफ (श्रेष्ठी वर्ग, हिन्दू उच्च जातियों के समकक्ष), अजलफ (ओबीसी के समकक्ष कारीगर वर्ग) व अरज़ल (दलित हिन्दुओं के समकक्ष वे मुस्लिम बिरादरियां जो ‘अपवित्र काम’ करती हैं)। अशरफ, अजलफ और अरज़ल शब्द किसी भारतीय भाषा के शब्द नहीं हैं। ये अरबी के शब्द हैं और इनका इस्तेमाल सल्तनत काल से होता आ रहा है। तब भी इस्लाम के मानने वालों में इतना भेदभाव था कि पिछड़े वर्गों से मुसलमान बनने वालों पर शरियत कानून लागू नहीं होते थे। मदरसे केवल अशरफ और अजलफ मुसलमानों के लिए थे और अरजल बिरादरियों के बच्चों को केवल सूफी संतों और उनकी दरगाहों का सहारा था-वे दरगाहें जहां सबका स्वागत था-हिन्दुओं और मुसलमानों का, दलितों और उच्च जातियों का, महिलाओं और पुरूषों का। जब इस्लाम और ईसाई धर्म, दक्षिण एशिया पहुंचे तब उनका सामना भारत में सदियों से स्थापित जाति व्यवस्था से हुआ। जहां तक ऊँची जातियों की बात है उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि शूद्र कौन सा धर्म, परंपराएं या कर्मकांड अपनाते हैं। उन्होंने वैसे भी शूद्रों को अपने समुदाय और समाज से बाहर कर रखा था। अतः उन्हें शूद्रों के इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने से कोई फर्क नहीं पड़ता था। राज्य का मूल चरित्र सामंती था और वह हिन्दू और मुस्लिम श्रेष्ठी वर्ग के हितों का रक्षक था। वह ऊँचनीच और जन्म-आधारित भेदभाव को बनाए रखना चाहता था। आज भी मुस्लिम बिरादरियों की वफादारी, उनकी बिरादरी से जुड़े संगठनों (कुछ-कुछ जाति पंचायतों की तरह) के प्रति होती है। पारिवारिक विवादों के मामले में दारूलउलूम या मुस्लिम विधिशास्त्रीय संस्थाओं की बजाए बिरादरी से जुड़ी संस्थाओं से संपर्क किया जाता है। शैक्षणिक संस्थाएं और वजीफे आदि देने वाले संगठन भी मुख्यतः अपनी-अपनी बिरादरी के सदस्यों के लिए ही होते हैं। बिरादरियों में आपस में ही विवाह होते हैं और बिरादरी से बाहर विवाह बहुत ही कम मामलों में स्वीकार किये जाते हैं। विभिन्न बिरादरियों के बीच रोटी का व्यवहार तो शायद होता भी हो परंतु बेटी का नहीं होता।
मुस्लिम समुदाय इसलिए पिछड़ा है क्योंकि उसकी अधिकांश बिरादरियां सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हैं। परंतु अशरफ बिरादरियों की समाज में अच्छी पकड़ है क्योंकि उनमें से कई गुजरे जमाने में नवाब और जमींदार थे। उसी तरह, गुजरात की तीन व्यवसायी बिरादरियों-बोहरा, कच्छी मेमन व खोजा-भी शिक्षा व रोजगार की दृष्टि से काफी अच्छी स्थिति में हंै। यद्यपि उन्हें भी मुसलमानों के दानवीकरण के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है परंतु फिर भी अपनी शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक ताकत के कारण, उन्हें इस भेदभाव से बहुत नुकसान नहीं होने पाता। आधुनिक शिक्षा देने वाली मुसलमानों के जो चंद शैक्षणिक संस्थान हैं, उन पर अशरफों का नियंत्रण है। पहली से चौदहवीं लोकसभा तक केवल पांच पिछड़े मुसलमान सदन के सदस्य बन सके।  यही हालत राज्यसभा और विधानसभाओं की भी है। यद्यपि वर्तमान राज्यसभा में कई मुस्लिम सदस्य हैं परंतु उनमें से एक भी पिछड़े वर्ग का नहीं है। राजनैतिक पार्टियों में भी पिछड़े मुसलमानों का  प्रतिनिधित्व न के बराबर है जबकि पिछड़े मुसलमान, कुल मुस्लिम आबादी के 90 प्रतिशत से भी अधिक हैं। इसके बावजूद, समुदाय का नेतृत्व अशरफों के हाथों में हैं जो पूरे समुदाय का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं और समुदाय के सदस्यों को सेटेनिक वर्सेस, डच कार्टून, बाबरी मस्जिद और शाहबानो जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों में उलझाये रखते हैं। इसके विपरीत, पिछड़े मुसलमानों के अधिवेशन में एक भी वक्ता ने इन मुद्दों की चर्चा नहीं की। वे बेशक इस्लाम से प्यार करते हैं परंतु उनके लिए उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सामाजिक न्याय, शिक्षा इत्यादि सबसे महत्वपूर्ण हैं। इस्लाम उनके लिए एक निजी मामला है जिसके नियमों का पालन वे अपने घर की चहारदीवारी में करते हैं। इस्लाम उनके लिए आस्था का प्रश्न  है, राजनैतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए भीड़ जुटाने का हथियार नहीं। वे अशरफ मुसलमानों की तुलना में स्वयं को हिन्दू दलितों के अधिक करीब पाते हैं और वे उन लोगों से प्रभावित हैं, जो सामाजिक न्याय की बात करते हैं। उनके लिए उनकी प्राथमिक पहचान ‘दलित’ है, ‘मुसलमान’ नहीं। अन्य मुसलमानों और स्वयं में वे जो चीज एक सी पाते हैं वह है आराधना करने का तरीका और धर्म। इसके अलावा कुछ भी नहीं। अन्य मामलों में वे मुसलमानों की बजाए दलितों के अधिक नजदीक हैं। हाल के आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के एक निर्णय पर हो रही बहस को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्या मुस्लिम ‘समुदाय’ शैक्षणिक व समााजिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ वर्ग है? मेरे विचार में, भारत के मुसलमान न तो कोई समुदाय हैं और न कोई वर्ग। काका कालेलकर आयोग और उसके बाद मंडल आयोग ने मुस्लिम पिछड़े वर्गों को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किया था।
हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है और पूरे मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देना, धर्म के आधार पर भेदभाव करना होगा। मुसलमानों को आरक्षण देने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही परंतु मेरी यह राय है कि ऐसा करना वांछनीय भी नहीं है क्योंकि इससे मुख्यतः वे अशरफ बिरादरियां लाभान्वित होंगी जो पहले से ही सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक दृष्टि से आगे हैं और जिन्हें आरक्षण की कतई आवश्कता  नहीं है। बोहरा, मेमन और खोजा समुदाय में एक बड़ा शिक्षित मध्यम वर्ग है। ये तीनों समुदाय  गुजरात के हैं और ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में बंबई में बंदरगाह बनने के बाद, पष्चिमी भारत में हुए विकास से लाभांवित हुए हैं। इन समुदायों की युवा पीढ़ी आरक्षण के बिना भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद यद्यपि उनमें से कुछ डाक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट आदि बतौर काम करते हैं परंतु कुछ अपने पारिवारिक व्यवसाय को चलाना ही बेहतर समझते हैं। मस्जिदों और मदरसों के अलावा, इस समुदाय के सदस्यों ने देश भर में कई शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों व अन्य सार्वजनिक संस्थाओं की स्थापना भी की है। भारत के सभी समुदायों में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीण करने वालों का प्रतिशत 26 है। इसके मुकाबले, 17 प्रतिशत मुसलमान मैट्रिक्यूलेट हंै। परंतु इनमें भी अशरफों, जिनमें बोहरा, खोजा और मेमन शामिल हैं, की संख्या सबसे ज्यादा है। इसी तरह, जो 3.6 प्रतिशत मुसलमान स्नातक परीक्षा पास हैं और 0.4 प्रतिशत, जिन्होंने तकनीकी शिक्षा प्राप्त की है, उनमें भी अशरफों की बहुलता है यद्यपि वे कुल मुस्लिम आबादी का केवल 10 प्रतिशत हैं। ऐसी स्थिति में अगर रकार मुसलमानों की भलाई के लिए कोई सकारात्मक कदम उठाती है तो उसके सभी लाभों पर अशरफ कब्जा कर लेंगे। इसका कारण यह है कि वे पहले से ही शिक्षित हैं और आरक्षण का लाभ उठाना उनके लिए कहीं आसान होगा। इसके विपरीत, पहले से ही पिछड़े अजलफ और अरजल पिछड़े ही बने रहेंगे। बेहतर यह होगा कि सभी मुसलमानों को आरक्षण देने की बजाए, विशिष्ट मुस्लिम समूहो  या बिरादरियों को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किया जाए ताकि लाभ उन तक पहुंचे जिन्हें उसकी जरूरत है। ऐसा करके हम इस सच्चाई को भी स्वीकार करेंगे कि मुस्लिम समुदाय एकसार नहीं है।
सत्ता में आने के बाद, आंध्रप्रदेश की वाय.एस. राजशे खर रेड्डी सरकार ने कानून बनाकर मुसलमानों को  5 प्रतिशात आरक्षण देने का निर्णय लिया। इस नये कानून को आंध्रप्रदेशा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और न्यायालय ने उसे असंवैधानिक व समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया। अपने निर्णय में उच्च न्यायालय ने कहा कि आरक्षण का लाभ केवल सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को दिया जा सकता है, किसी धार्मिक समुदाय को नहीं। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी कहा कि आंध्रप्रदेश सरकार के पास ऐसे कोई आंकड़े या तथ्य उपलब्ध नहीं हैं जिनके आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंच सके कि पूरा मुस्लिम समुदाय पिछड़ा हुआ है। उच्चतम न्यायालय ने आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया। इसके बाद, आंध्रप्रदेश सरकार ने मुसलमानों के पिछड़े वर्गों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की। इस बार ऐसा करने के पहले उसने मुसलमानों के उन वर्गों के सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के संबंध में आंकड़े इकट्ठे किये। सरकार ने आंध्रप्रदेष पिछड़ा वर्ग आयोग से यह कहा कि वह मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक स्थिति का अध्ययन करे। इसके बाद सरकार ने पिछड़े वर्गों की सूची में एक नया ‘ई‘ समूह शामिल किया, जिसमें ‘मुसलमानों के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े समुदाय‘ रखे गए। परंतु आंध्रप्रदेश  उच्च न्यायालय ने इस कानून को भी रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी प्रासंगिक कारकों का संज्ञान नहीं लिया गया है और कई अप्रासंगिक कारकों का संज्ञान लिया गया है। उच्च न्यायालय ने कहा कि मुस्लिम पिछड़ों के लिए आरक्षण इसलिए भी अवैध है क्योंकि इससे उच्चतम न्यायालय द्वारा कुल आरक्षण पर लगाई गई 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन होता है।
अब समय आ गया है कि हम पिछड़ों को समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष लाने के लिए आरक्षण को एकमात्र सकारात्मक कदम मानना छोड़ें। राजनेताओं के लिए आरक्षण देना सबसे आसान होता है क्योंकि इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त संसाधन नहीं जुटाने होते। केवल एक कानून बनाकर किसी भी वर्ग को आरक्षण दे दो और उसके वोट बटोरो। मुस्लिम पिछड़ों का एक छोटा सा हिस्सा अपनी मेहनत से और निर्यात में हुई वृद्धि के कारण आर्थिक रूप से संपन्न बन गया है। इनमें शामिल हैं वाराणसी के साड़ी बुनकर, मुरादाबाद के पीतल कारीगर और अलीगढ़ के ताला उद्योग व मेरठ के कैंची उद्योग के कुछ व्यवसायी। आरक्षण की बजाए मुस्लिम समुदाय के पिछड़े तबकों को आगे बढ़ने के मौके उपलब्ध कराने के लिए बेहतर यह होगा कि सरकार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के हितों की सुरक्षा के लिए कड़े कानूनी प्रावधान करे, कारीगरों को कौशल विकास के मौके उपलब्ध कराए और उन्हें अपना व्यवसाय स्थापित करने के लिए आसान शर्तों पर कर्ज दिलवाने की व्यवस्था करे। परंतु इसके लिए यह जरूरी होगा कि संसाधनों का इस्तेमाल कुबेरपतियों के उद्योगों को अनुदान देने की बजाए गरीबों की भलाई के लिए किया जाए। ऐसा सिर्फ एक दूरदृष्टा व उदार नेता ही कर सकता है-वे बौने नहीं जो इस समय हमारे राजनैतिक परिदृष्य पर छाए हुए हैं।
  -इरफान इंजीनियर

बुधवार, 9 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम -4

स्वयंसेवक के रूप में
    शाखा में राष्ट्रभक्ति पर विशेष जोर दिया जाता था, मन में देश प्रेम की भावना तो थी ही, इसलिए शाखा में गाए जाने वाले गीत बहुत लुभाने लगे। एक गीत-‘संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो, भला हो जिसमें देश का, वह काम सब किए चलो’ तो मुझे कंठस्थ ही हो गया था। भारत माता को आराध्य देवी मान कर-‘तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें; और ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ का मन्त्र जपते हुए मैं खुद को धन्य समझने लगा था, इतना ही नहीं बल्कि-‘तन समर्पित मन समर्पित और ये जीवन समर्पित, चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ, जैसे राष्ट्र प्रेम के गीत और बातें मन को अभिभूत कर देती थीं। हर दिन होली दीवाली सा माहौल होता था। मुझे पक्का यकीन होने लगा था कि हम शाखा में जाने वाले लोग ही राष्ट्रभक्त हंै, जो शाखा में नहीं आते वे सब देशद्रोही है।
आर एस एस की काली बिल्ली
    जैसा कि आर.एस.एस. का दावा है कि वह अपनी शाखाओं में मानव के चरित्र निर्माण का काम करता है, उसके द्वारा तैयार व्यक्ति एक काली बिल्ली की तरह होता है, जिसको जीवन के किसी भी क्षेत्र में फेंक दिया जाए तो भी वह पीठ के बल नहीं गिरता बल्कि पैरों पर ही खड़ा होता है। अब मैं भी आर.एस.एस. की काली बिल्ली बनना चाहता था, इसलिए पूरे मनोयोग से शाखा की गतिविधियों में शिरकत करने लगा।
    शाखा में ही पहली बार मैंने भारत माता की तस्वीर के दर्शन किए, जिसमंे भारत माताजी हाथ में भगवा झंडा लिए शेर के पास खड़ी दिखाई दीं। तब मेरे मन में सवाल उठा कि भारत माता के हाथ में भगवा झंडा क्यों है, राष्ट्रध्वज तिरंगा क्यों नहीं? जवाब मिला तिरंगा झंडा तो सन 1947 में आजादी मिलने के बाद स्वीकार किया गया था, भगवा ध्वज तो आदिकाल से है, इसलिए माँ भारती के कर कमलों में वही सुशोभित है। शाखा में अनुशासन पर बहुत जोर दिया जाता, कहा जाता था कि सैनिकों की तरह पूर्णतः अनुशासित रह कर ही हम स्वराष्ट्र को सशक्त बना सकते हैं हमारा लक्ष्य है हिन्दुआंे का सैन्यकरण और सैनिकों का हिन्दुकरण इसलिए शाखा में तमाम आदेश जिन्हें ‘आज्ञा’ कहा जाता, वह भी सेना की तरह ही दी जाती, सिर्फ भाषा का फर्क था, सारी आज्ञाएँ संस्कृत में दी जाती थीं, चाहे वे दक्ष (सावधान) हो या आराम (विश्राम), स्कूल में संस्कृत के गुरूजी ने बताया था कि-संस्कृत कोई सामान्य भाषा नहीं है यह देवताओं द्वारा बोली जाने वाली भाषा है इसलिए इसे ‘देवभाषा’ कहा गया है। समस्त भारतीय महान ग्रन्थ भी इसी देवभाषा में रचे गए हैं वे चाहे वेद हो या उपनिषद, गीता हो या रामायण, यह बात मन में गहरे घर किए हुए थी सो शाखा में संस्कृत में जब भी कोई आज्ञा दी जाती थी तो वह मुझे ‘दैवीय आज्ञा’ लगती थी। शाखा में खेल के साथ-साथ बौद्धिक चर्चा भी की जाती थी, जब हम खेलते-खेलते हाँफने लगते तो एक अर्धमंडल में बैठकर बातचीत करते इसी को बौद्धिक लेना कहा जाता। इस दौरान भी बेहद सधी हुई संस्कृतनिष्ठ हिंदी में बात कही जाती, जो
सीधे दिल दिमाग पर छा जाती। बौद्धिक चर्चा के दौरान प्रश्नोतर शैली में पूछा जाता-हम कौन हंै, यह देश किसका है, कौन इसे अपनी मातृभूमि मानता है? फिर इन सवालों के जवाब दिए जाते-हम हिन्दू है, सनातनी शुद्ध आर्य रक्त, यह देश हमारा हैं, हम हिन्दू ही इसे अपनी जन्मभूमि, कर्मभूमि और पवित्र भूमि मानते हैं, हमारा देश कालांतर में सोने की चिडि़या था, इसमें दूध, दही और घी की नदियाँ बहती थीं, हम जगतगुरु थे शक, हूण, कुषाण यवन मुसलमान, पठान और अंग्रेज आए, हमारे देश को लूटा और हमें गुलाम बनाया। अन्य लोग न तो भारत को माँ मानते हैं और न ही उनकी पुण्यभूमि भारत है, किसी की येरुसलम है तो किसी की मक्का मदीना, सिर्फ हम हिन्दुओं का ही सब कुछ भारत में है, हम ही माँ भारती के सच्चे पुत्र हैं, मुझमे अन्य समुदायों के प्रति नफरत का भाव पैदा होने लगा था कि ये लोग खाते भारत का हैं और गीत मक्का, मदीना, येरुसलम के गाते हैं उनकी देशभक्ति पर मुझे संदेह होने लगा।
    हमारी शाखा हर दिन शाम के वक्त 6 से 7 बजे लगती थी। प्रारंभ में केवल भूगोल के शिक्षक ही आते थे, फिर अन्य शिक्षक भी आने लगे, खास तौर पर यहाँ के प्राथमिक शालाओं के कईं शिक्षक तनख्वाह सरकार की लेते हैं और काम आरएसएस का करते हैं। कभी कभार मांडल तहसील मुख्यालय से बड़े पदाधिकारी भी आते, इन सबको हम भाई साहब कह कर बुलाते थे, शाखा में आने वाले बौद्धिक पत्रक और अन्य साहित्य से मेरी विचारधारा मजबूत हो रही थी। मैं दिनों दिन और अधिक राष्ट्रभक्त बनता जा रहा था, मुझमें हिन्दू होने का गर्व और शुद्ध आर्य खून का अभिमान आने लगा था, बाकी लोग अपने आप ही मुझे नीच और छोटे नजर आने लगे थे।
ढीली खाकी नेकर
    शाखा के मुख्य शिक्षक के लिए यह अनिवार्य था कि वह निर्धारित पोशाक (जिसे गणवेश कहा जाता है) पहन कर आए, मैंने भी घरवालों से पैसे लेकर काली टोपी, ढीली खाकी नेकर, चमड़े की बेल्ट, भूरे मोजे और काले जूते तथा कान के बराबर एक लकड़ी (जिसे दंड कहा जाता है) खरीदा, सफेद कमीज तो थी ही, इसलिए खरीदनी नहीं पड़ी। मैं अब गणवेश पहनकर रोज शाखा स्थल पर जाने लगा था, आखिर मुख्य शिक्षक जो ठहरा, मेरा परिवार कभी भी जनसंघी या आरएसएस टाइप की विचारधारा का नहीं रहा, दादाजी से लेकर पिताजी तक इन लोगों के विरोधी ही रहे, एक मैं अपवाद स्वरूप इनके साथ लग गया, जब पहले सिर्फ खेलने जाता था, तब तक तो कोई दिक्कत नहीं थी, पर अब जब मैं पूरी ड्रेस पहन कर रोज-रोज शाखा में जाने लगा तो पिताजी ने टोकना शुरू किया, बोले ये लोग कभी हमारे सगे नहीं हुए और न ही होंगे, नहीं जाना, लेकिन मुझ पर तो देशभक्ति का ऐसा जुनून चढ़ा हुआ था कि कोई भी थोड़ा भी संघ की शाखा के विरोध में बोलता तो वह मुझे देशद्रोही ही लगता था। मेरे से बड़े भाई लोग मेरी ढीली नेकर की बहुत मजाक उड़ाते थे पर मैं सह लेता था।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम -3

आर एस एस की शाखा में
    इस हादसे से हमने कोई सबक नहीं लिया, कारसेवा का जूनून भले ही उतर गया हो लेकिन देशभक्ति का ज्वर चढ़ा ही रहा, यह मात्र 13 साल की उम्र में ही चढ़ गया था, जब मैं कक्षा 6 का विद्यार्थी था, तभी देशभक्ति के सबसे प्रमुख स्वघोषित स्कूल आर.एस.एस. में भर्ती हो गया था। हुआ यह कि राजकीय माध्यमिक विद्यालय मोड़ का निम्बाहेड़ा, जहाँ मैं अध्ययनरत था, वहाँ के भूगोल विषय के अध्यापक महोदय बंशी लाल सेन ने हमारे गाँव के खेल मैदान में हम बच्चों को खेल खिलाना शुरू किया। वे बहुत अच्छा गाते भी थे और व्यायाम भी करवाते थे, हमें बहुत अच्छा लगता था। शुरू में खेल, फिर थोड़ा व्यायाम, एक दो गीत और कुछ अच्छी-अच्छी बातें, कुछ-कुछ बातें समझ में नहीं आती थीं, कुछ बातें उलझन भी पैदा करती थीं, खास तौर पर जब वे क्लास में भूगोल पढ़ाते हुए कहते थे कि-सूर्य आग का एक गोला है, जिसके पास कोई भी नहीं जा सकता है, अगर गया तो नष्ट हो जाएगा। मगर वे खेल के वक्त शाखा में सूर्य नमस्कार करवाते थे, इस दौरान ओऽम् सूर्याय नमः, रवये नमः, ओऽम् सवित्रे सूर्य नारायणाय नमः का मंत्रोचार कराते थे और हनुमानजी द्वारा सूर्य को मुँह में निगल जाने की कहानी बताते हुए सगर्व कहते थे कि-ऐसे थे हमारे बजरंग बली, जिन्होंने सूर्य भगवान को ही निगल लिया, पूरे ब्रह्माण्ड पर अँधेरा छा गया था। मैं इस बात से उलझन महसूस करने लगा, एक दिन हिम्मत करके पूछ लिया कि- गुरुदेव सूर्य देवता हंै, या आग का गोला? उनका जवाब पूर्णतः संघ परिवार की चिंतन प्रक्रिया का साक्षात् सबूत देता हुआ सामने आया, वे बोले-भैयाजी, शाखा में सूर्य देवता हैं लेकिन विद्यालय में वह आग का गोला हैं, मैं और अधिक भ्रमित हो गया, मैंने उनसे कहा कि-फिर हनुमान जी ने कैसे उन्हें निगला? उनका उत्तर था-बजरंग बली तो अतिशय बलशाली थे, सूर्य तो सिर्फ आग का एक गोला मात्र था, उन्होंने उसे न केवल मुँह में ले लिया बल्कि वे तो उसे चबा कर निगल ही जाना चाहते थे, सब लोकों पर छा गए अंधकार के बाद देवताओं ने आकर प्रार्थना की तब कहीं जा कर हनुमान जी ने सूर्य को उगला।
अन्ध आस्था
    मेरी आस्था हनुमानजी में अत्यधिक दृढ़ हो गई, मुझे भूगोल विषय बकवास लगने लगा। अब मैं भूगोल के पीरियड में भी मन ही मन हनुमान चालीसा दोहराता रहता था, मुझे मालूम था कि इस विषय में कोई दम नहीं है, दमदार तो बजरंग बली हैं। वैसे भी गुरूजी ने एक दिन शाखा में कहा था कि संशय करने वाले लोग विनाश को प्राप्त हो जाते है (संशयात्मा विनष्यति), फिर मैंने संदेह करना छोड़ दिया, श्रद्धा का नया दौर मेरी किशोरावस्था में ही प्रारंभ हो गया। भूगोल के गुरूजी ने मुझे विज्ञान से भी विमुख कर डाला। अब मेरी आस्था धर्म कर्म में बढ़ने लगी, वैसे भी गुरूजी ने शाखा में बता ही दिया था कि पूरे विश्व में हमारा धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है, तो यह खेल, गीत और व्यायाम तथा थोड़ी सी देर जो बातचीत होती थी रोज, उसका नाम शाखा था और यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा थी। यह आर.एस.एस. की हमारे गाँव में एक ब्रांच थी जो नई नई खुली थी और हम बाल गोपाल उस शाखा की टहनियाँ थे।
    हमारे गाँव की शाखा में हम बच्चों की संख्या तकरीबन 50 के आसपास थी ,सभी जातियों के बच्चे इसमें आते थे, उन जातियों के भी जो हम दलितों को नीचा समझते थे और सीधे मुँह बात भी नहीं करते थे, सब एक दूसरे को जी कह कह कर पुकारते थे, मैं भी भँवर से भँवर जी हो गया था और भँवर जी भाई साहेब होने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा था। शाखा में मैंने अप्रत्याशित सफलताएँ प्राप्त कर लीं, मैं गणनायक से मुख्य शिक्षक बना और कार्यवाह बन कर शीघ्र ही जिला कार्यालय जा पहँुचा, जहाँ पर मुझे जिला कार्यालय प्रमुख की जिम्मेदारी मिल गई
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

बुधवार, 2 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम -2

नफरत विधर्मी मुसाफिरों से
    बड़े-बड़े भाई साहबों के अजमेर में ही गायब हो जाने से हम थोड़े असहज तो हुए, थोड़े से उदास और निराश भी लेकिन जैसे जैसे ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी, निराशा का दौर जाता रहा, हमारा जुनून लौट आया, अगले स्टेशन पर स्थानीय लोगों ने हमारा जोरदार स्वागत किया, खाने को फल दिए, चाय पिलाई, बीड़ी, गुटखा भी मिला लोगों को, सब आनंद से सराबोर हो गए, ट्रेन में ज्यादातर कारसेवक ही थे, थोड़े बहुत रेगुलर यात्री भी थे, जो कि सहमे हुए बैठे थे, हमारी बोगी में कुछ मुस्लिम मुसाफिर भी थे, हमने उन्हें देख कर खूब नारे लगाए ‘भारत में यदि रहना होगा वंदेमातरम् कहना होगा।’ हमने उन्हें जी भर कर घूरा भी, इच्छा तो यह थी कि चलती ट्रेन से बाहर फेंक दें इनको, इन्हीं विधर्मी तुर्काे की वजह से हमारे भगवान राम एक जीर्ण शीर्ण ढाँचे में कैद हैं। हमारा देश, हमारे राम और उनकी जन्म स्थली पर मंदिर नहीं बनाने दिया जा रहा है, हम हिन्दू अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक हो गए हंै और ये मलेच्छ मजे ले रहे हैं, चार-चार शादियाँ करके बच्चों की फौज पैदा करके अपनी आबादी बढ़ाते जा रहे हैं। पहले देश बाँट दिया, आधे वहाँ चले गए, बाकि हमारी छाती पर मूँग दलने के लिए यहीं रह गए, ऐसे ही तरह-तरह के विचारों के चलते मैं इन मुस्लिम मुसाफिरों के प्रति नफरत के अतिरेक में डूबा हुआ था, उस वक्त मुझमें इतना गुस्सा था कि अगर मेरे हाथ में हथियार होते तो राम जन्म भूमि की मुक्ति से पहले ही इन मुस्लिम, पठान विधर्मियों को जिन्दगी से मुक्त कर देता। कुछ तो माँ भारती का बोझ हल्का होता। हमारी नफरत से घूरती आँखों ने उन्हें जरूर आतंकित किया होगा लेकिन हमें तो उन्हें इस तरह सहमे, सिमटे और भयभीत देखकर बहुत आनंद आया, जीवन में पहली बार लगा कि साले कट्टुओं को हमने औकात दिखा दी। अच्छा हुआ वे लोग चुपचाप ही रहे वरना उस रात कुछ भी हो सकता था। खैर, रात गहराती जा रही थी, धीरे-धीरे नींद पलकों पर हावी होने लगी, भजनों, नारों और उन्मादी गीतों का कोलाहल शांत हो गया, कारसेवक अब सो रहे थे, या यों समझ लीजिए कि सो ही चुके थे, मैंने अपनी उनींदी आँखों से देखा कि बाकी के यात्री अब थोड़ा राहत महसूस कर रहे थे राम के भक्तों से, फिर हम सो गए, एक मीठी सी नींद जिसमे सरयू किनारे बसी भगवान श्री राम की नगरी साकेत में प्रवेश का सुन्दर सा सपना था, जिसे जल्दी ही साकार होना था।

पहली जेल यात्रा
    रात कब बीती पता ही नहीं चला, सुबह-सुबह किसी टुंडला नामक स्टेशन पर मचे भारी शोरगुल ने नींद उड़ाई, कारसेवकों में हड़कंप सा मचा हुआ था, पुलिस ने ट्रेन रुकवा रखी थी शायद आगे नहीं जाने देंगे, जाँच शुरू हुई, सारे कारसेवक धरे गए, टिकटें हमसे ले ली गईं और स्टेशन पर उतार लिया गया। पूरा स्टेशन कारसेवकों से अटा पड़ा था, कल सुबह फिर से गगन भेदते उन्मादी नारे हवा में गुंजायमान थे-सौगंध राम की खाते है, हम मंदिर वही बनाएँगे, रोके चाहे सारी दुनिया, रामलला हम आएँगे, पर हमारी शपथ पूरी न हो सकी, मुल्ला यम की सरकार ने हमें रोक लिया था। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। रात का धुँधलका अब छँटने लगा था। भोर के उजास में हमने अपने आपको भेड़ बकरियों की तरह पुलिस के ट्रक में भरे पाया, पहले मथुरा इंटर कॉलेज ले जाए गए, जगह नहीं मिलने पर वहाँ से आगरा के बहुउद्देश्यीय स्टेडियम में बनाये गए अस्थाई जेल में ले जाए गए। वहाँ भी क्षमता से अधिक लोग पहले से ही बंद थे, इसलिए तकरीबन 80 कारसेवक बाहर ही रह गए, उनमे से एक मैं भी था,  हमने इसी जेल में जाने की जिद की, नारे लगाए, हंगामा किया, तब कहीं जा कर हमें उस अस्थाई जेल में ठूँसा गया। काफी जद्दोजहद के बाद हमें जेल में प्रवेश का सौभाग्य मिला, अन्दर घुसे, जेल क्या थी, बड़ा सा ग्राउंड था, जिसमें टेंट लगे हुए थे, दीवारें इतनी छोटी कि कोई भी कूद कर बाहर निकल सकता था लेकिन बाहर कहाँ जाते? आगरा शहर में तो कफर््यू लगा हुआ था। पुलिस पीछे पड़ी थी, इलाका अनजान था, हमें प्रेरित करके शहीदी जत्थे में भेजने वाले सारे परम पूज्य भाई साहेब लोग अजमेर से ही भाग छुटे थे, यहाँ पर हम थे या थे वीतराग संत गण, चिलमची, अफीमची, गंजेड़ी, भंगेड़ी, उनमे से कइयों ने तो गांजा पीना शुरू कर दिया। एक दो को छोड़कर बाकी सब मस्त हो गए।
       अब तो हम थे और हमारी यह अस्थायी जेल थी। ऊपर टेंट, नीचे दरी, खाने में सबसे घटिया गुणवत्ता वाली कंकर पत्थर युक्त दाल, जली हुई रोटियाँ, बेस्वाद पानी और पुलिस वालों की झिड़कियाँ खाते-खाते किसी तरह हमने अपनी जिन्दगी की पहली 10 दिवसीय जेल यात्रा पूरी की इस तरह हम चले तो थे राम जन्म भूमि के लिए और पहँुचे कृष्ण जन्म भूमि में।
गालियाँ,पत्थर ,हमला,भय और दुर्गन्ध
    जिस दिन हमें जेल से रिहा किया गया, हमारे नाम पते लिखे गए, हाथों पर जेल की मुहर लगाई गई और छोड़ दिया गया। वैसे भी जेल में जेल जैसा कुछ था ही नहीं। अन्दर ही शाखा लगती थी, बातें होती, साधू संत अपना भजन, कीर्तन और प्रवचन करते रहते थे, जेल जैसी तो कोई बात थी ही नहीं, फिर भी कैद तो कैद ही है। जेल प्रवास पूरा हुआ तो जो ट्रक हमें लाये थे, वे गायब थे, बस यूँ ही छोड़    दिए गए, शहर में अभी भी कफर््यू जारी था, सो तय यह हुआ कि रेल की पटरियों पर हो कर स्टेशन तक पहँुचा जाए, पटरी-पटरी हम आगरा केंट की ओर चले। बलिदानी मानस थोड़ा थक चुका था, कारसेवा सफल नहीं रही थी। धर्मद्रोही, मुस्लिमपरस्त मुल्ला मुलायम सिंह ने सरयू के पुल पर ही कारसेवकों पर गोलियाँ चलवा दी, सैकड़ों कारसेवक मौत का ग्रास बन गए, कइयों को गोली लगी तो कई सारे गोली लगने के डर से वेगवती सरयू के पानी में कूद कर काल कवलित हो गए। राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद का ढाँचा तोड़ना तो दूर की बात, पुलिस की सख्ती के चलते परिंदा भी वहाँ पर नहीं मार सका, वाकई मुलायम कारसेवकों के लिए मुल्ला यम साबित हुए असफलता और घनघोर निराशा तथा डर और अवसाद की स्थिति में हम किसी तरह रेंगते हुए से रेल पटरियों पर आगरा कैंट की और बढ़ रहे थे, अचानक सामने से तकरीबन एक दर्जन लोग ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते हुए आते दिखाई दिए, हम में पुनः जोश का स्फुरण होने लगा, कफर््यू के बावजूद रामभक्त हमारे स्वागत को आ गए हैं, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। बहुत अच्छा लगा, हमने अपने अंदर उत्साह महसूस किया, हमारे कदम खुद ब खुद उठने लगे पर यह क्या? ये तो मुल्ले निकले, इनके तो हाथों में पत्थर हैं, अब इनकी जबान से जय श्रीराम नहीं निकल रहा था, हमारी सात पुश्तों तक उनकी भद्दी गालियाँ पहँुच रही थी-मादर ...द यहाँ क्या लव... पकड़ने आए हो, मारो मादर ...दो को, हम तो स्तब्ध रह गए, आँखों के आगे
अँधेरा छाने लगा, आसपास की बस्ती की ओर मदद के लिए हमने कातर निगाहों से देखा। मगर सब तरफ इंकार ही इंकार के भाव थे। दरअसल इस रेल पटरी के चारों ओर सिर्फ मुस्लिम बस्ती ही थी। सामने से आए इन मुस्लिम युवाओं से छोटा सा संघर्ष हुआ, कुछ लोगों को चोटें आई, सामान भी गिरा, एक कारसेवक होतुमल की उन्होंने जमकर पिटाई की, वह भारी शरीर था, भाग नहीं पाया, उनके हत्थे चढ़ गया। हमारे पीछे भी दौड़े, पत्थर फेंके, हम आगे-आगे और वे पीछे-पीछे किसी तरह जान बचाने के लिए हमने रेलवे पुलिस थाने की शरण ली, दरोगा जी यदुवंशी निकले, मुल्ला यम के वंश के, उनके श्रीमुख से भी हजारों गालियों की बौछार से हम नहाए, जिस पुलिस से मदद की उम्मीद थी, वही लट्ठ लेकर मारने को पीछे दौड़ी, पीछे पत्थर बरसाते मुल्ले और आगे लाठियाँ लिए खड़े ठुल्ले हे भगवान, अब कहाँ जाएँ, हे राम जी, आप ही जान बचाओ अब हमारी, एक क्षण तो लगा कि अब मौत ही हमारी अंतिम मुकाम है, लेकिन जहाँ राम रक्षा मंत्र नहीं चल पाया वहाँ रेल रक्षा यंत्र ने काम किया। आगरा कैंट पर खड़ी एक मालगाड़ी के खाली डिब्बों में घुस कर हमने दरवाजे बंद करके किसी तरह जान बचाई। गालियाँ देते मुस्लिम नौजवान और पुलिसकर्मी जब वापस चले गये। तब हमारी रुकी हुई साँसे फिर से चलने लगी, मालगाड़ी के डिब्बों से निकल कर हम वापस स्टेशन पर खड़े हुए। बाद में जयपुर की ओर जाने वाली किसी ट्रेन में हम सवार हुए। ट्रेन में भारी भीड़ थी, टॉयलेट के पास खड़े रहने भर की जगह मिली। टिकट भी नहीं खरीद पाए, बेटिकट ही बैठ गए थे, भारी भीड़, भय और पाखाने की भयंकर दुर्गन्ध सब एकाकार हो गए थे। कारसेवा के दौरान शहीद होने की इच्छा अब तक मर चुकी थी, एक ही इच्छा थी कि जल्दी से जल्दी घर पहँुचा जाए, घर पर परिजनों के हाल बेहाल थे अयोध्या की खबरें सुन-सुन कर, चूँकि हम दोनों ही भाई इस कारसेवा का हिस्सा बनने चले गए थे, इसलिए माँ बाप ने सोच लिया कि हम जरूर पुलिस की गोली के शिकार हो गए होंगे और इस तरह वे बेऔलाद, मगर न तो हमें रामजी के नाम पर मौत आई और न ही वे निःसंतान हुए, महज 15 दिनों में हम घर लौट आए सही सलामत एकदम जिंदा।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश  :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम -1

सौगंध राम की खाते है!
    बात सन् 1991की है, जब राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद का विवाद देश में चरम पर था। हवा में चारों तरफ ‘बच्चा बच्चा राम का-जन्म भूमि के काम का’ और ‘जन्म भूमि के काम ना आए वह बेकार जवानी है-जिस हिन्दू का खून ना खौले, खून नहीं वह पानी है’ जैसे नारे गूँजते थे। मेरी उम्र उस वक्त 17 वर्ष की थी, बाहरवीं कक्षा में पढ़ता था। मैं बिना घर वालों को बताए कारसेवा करने के लिए घर से भाग गया। राम शिलाएँ पूजित हो चुकी थीं, हम लोग उन दिनों भीलवाड़ा में राम मंदिर के लिए अभियान चला रहे थे। मेरी कारसेवा में शामिल होने की बेहद इच्छा थी, ताकि अपने स्वयंसेवक होने को और मजबूती दे सकूँ। अंततः मौका मिल गया और मुझे भी सैकड़ों लोगों के एक बलिदानी जत्थे में शामिल कर लिया गया। हमारी रवानगी से पहले जगह-जगह हमारे जुलूस निकाले गए, मैं बेहद रोमांचित था, मुझे याद है कि हम लोग गले में मालाएँ और सर पर भगवा पट्टी और ललाट पर रक्तिम तिलक लगा कर मुट्ठियाँ बाँधकर जय श्री राम तथा जय जय श्री राम के गगन भेदी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे.उस वक्त हम सबकी जुबान पर एक ही गीत था रामजी के नाम पर जो मर जाएँगे-दुनिया में नाम अपना अमर वह कर जाएँगे।
    मुझे यकीन था कि हमारी भिडंत जरूर मुलायम सिंह की हिन्दू द्रोही पुलिस से हो जाएगी और हम मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्री राम के नाम पर उनकी जन्म स्थली को मुक्त कराने के लिए अपना आत्मोत्सर्ग कर देंगे। हम एक ट्रेन के जरिए भीलवाड़ा से अजमेर पहँुचे, हमारे जत्थे में ज्यादातर नौजवान लोग थे और बाकी के साधू संत थे। अजमेर की एक धर्मशाला में सैकड़ों और लोग भी भगवा दुपट्टा ओढ़े पहले से ही जमा थे, इन सबको भी अयोध्या जाना था, उन्हें देख कर हमारा हौंसला दुगुना हो गया, हर चेहरा बलिदान की भावना से दमक रहा था, सबके मन में एक ही लक्ष्य था, जल्दी से जल्दी राम की जन्म भूमि तक पहुँचना और गुलामी के प्रतीक चिह्न बाबरी ढाँचे को ध्वस्त करना, हमारे साथ संघ (आरएसएस) और विश्व हिन्दू परिषद के
पदाधिकारीगण भी मौजूद थे, खाना खाने के बाद उन्होंने सबको सामूहिक दिशा निर्देश दिए कि हमें हर हाल में अयोध्या पहँुचना है, मुलायम सिंह सरकार अगर रोके, गिरफ्तारी करे या दमन करें, इस परिस्थिति में क्या करना है, उनसे कैसे बचना है, कैसे उन्हें चकमा देकर आगे जाना है। यह बताया गया। वरिष्ठ
अधिकारियों का स्पष्ट निर्देश था कि चाहे हमें खुद को क्यों ना मिटाना पड़े, गुलामी के उस कलंक बाबरी मस्जिद को उखाड़ फेंकना है, दिल कर रहा था कि उड़कर अभी भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या पहुँच जाऊँ और राम लला को मलेच्छ विधर्मियों के चंगुल से आज ही मुक्त करवा दूँ, आखिर हिन्दुओं के ही देश में हिन्दुओं के आराध्य देवता राम की जन्म स्थली पर हम गुलामी का यह बाबरी ढाँचा कब तक बर्दाश्त करेंगे। हमें साफ-साफ आदेश मिल चुका था कि किसी भी कीमत पर जान की परवाह किए बगैर हमें अयोध्या पहुँच कर बाबरी मस्जिद के ढाँचे की ओर बढ़ना है, कहा गया कि ढाँचा गिराने के लिए कुदाल, गेंती, फावड़े और सब्बल आदि हमें स्थानीय लोगों की ओर से उपलब्ध करवाए जाएँगे। अब हमारा एक मात्र लक्ष्य था-हर हाल में अयोध्या पहँुच कर बाबरी ढाँचे को गिराना और रामलला को मुक्त करवाना। शाम हुई और हम लखनऊ जाने वाली ट्रेन की ओर बढे़। भीलवाड़ा से संघ, विहिप तथा भाजपा के कई जाने माने चेहरे भी हमारे साथ आए थे, उनका साथ पाकर हमारा हौंसला बढ़ रहा था। मैंने मन ही मन भगवान श्री राम को धन्यवाद् दिया कि उन्होंने इतना शानदार मौका दिया कि आज मुझे इन बड़े-बड़े लोगों के साथ राम काज के लिए चुना गया है। मुझे लगा कि आज वाकई हर व्यक्ति राम के नाम पर शहीद होने को तत्पर है, छोटे- बड़े, अमीर-गरीब, खास या आम आदमी, सभी तरह के फर्क खत्म हो चुके हैं। लोग करोड़ों की दौलत, कारखाने, महल, ऊँचें पद और प्रतिष्ठा सब त्याग कर रामकाज करने को आतुर हैं, वाह रामजी क्या गजब लीला है तेरी हमें लग रहा था कि यह आजादी की दूसरी जंग है, हम खुद को स्वतंत्रता सेनानी समझ कर मन ही मन धन्य हो रहे थे, ऐसे उत्साह और खुशी के माहौल में हम ट्रेन पर सवार हुए। हम सबको अपना अपना टिकट दे दिया गया था यह कह कर कि अगर किसी कारणवश कोई बिछुड़ जाएँ तो खुद का टिकट तो खुद के पास होना ही चाहिए, हमें भी यह बात ठीक लगी, स्टेशन खचाखच भरा था, जाने वालों से ज्यादा पहुँचाने वाले आए थे। तनी हुई मुट्ठियों और चीखते चेहरों ने अपना पूरा दमखम वन्दे मातरम्, जयकारे बजरंगी-हर हर महादेव और जय जय श्री राम के नारों पर लगा रखा था। इतनी उत्तेजना और शोरगुल मैंने आज से पहले कभी नहीं महसूस की, ट्रेन की सीटी बज चुकी थी, हमने भी मुट्ठियाँ बाँधी और पूरा जोर लगाकर चीखे-सौगंध राम की खाते हैं-हम मंदिर वहीं बनाएँगे। हम खुश थे कि हमारा सफर अयोध्या की तरफ शुरू हो चुका था। ट्रेन सरकने लगी और हमारी बोगियों से बड़े-बड़े लोग भी सरकने लगे, अरे यह क्या? ये भाई साहब क्यों उतर रहे है, ये प्रचारक जी क्या यहीं रहेंगे, हमारे साथ नहीं चलेंगे, मैंने देखा कि धीरे धीरे तमाम सारे बड़े लोग, उद्योगपति, संघ प्रचारक, विहिप नेता और भाजपाई लीडरान ट्रेन से उतर गए, सब बड़े लोग हमें अयोध्या रवाना करके अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए पीछे रह गए हम जैसे जुनूनी दलित, आदिवासी तथा पिछड़े वर्ग के युवा एवं साधू संत और हमें सँभालने के लिए कुछेक छुटभैय्ये नेता गण जो हमें बता रहे थे कि भाई साहब दूसरे जत्थों को रवाना करके सीधे ही अयोध्या पहुँच जाएँगे, हालाँकि उन्हें नहीं आना था, वे कभी नहीं आए, वे समझदार लोग थे, इसलिए घर लौट गए। समझदार लोग सदैव ही हम जैसे जुनूनी लोगों को लड़ाई में धकेल कर अपने-अपने दरबों में लौट जाते हैं, यही उनका बड़प्पन है, शायद इन्हीं चालाकियों से ही वे बड़े बनते होंगे।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
कर्मश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

हिन्दुवत्वादियों द्वारा बाबरी मस्जिद का ध्वंस सबसे बड़ी आतंकी घटना..

 भारतीय इतिहास में आज़ादी के बाद हिन्दुवत्वादियों द्वारा बाबरी मस्जिद का ध्वंस सबसे बड़ी आतंकी घटना है। यह घटना 6 दिसंबर 1992 को जर्मन नाजीवादी विचारधारा से लैस हिन्दुवत्वादियों ने की थी और भारतीय लोकतंत्र उसको न बचा पाने पर शर्मिंदा हुआ था। फेसबुक पर मित्रों के निम्नलिखित विचार आयें हैं :-
 
 
 
Jagadishwar Chaturvedi
आज 6 दिसम्बर है।यह स्वतंत्र भारत का कलंकमय दिन है। आज के ही दिन 1992 में बाबरी मस्जिद गिरायी गयी। जब यह मस्जिद गिरायी गयी तो मसजिद गिराने वालों ने एक ऐतिहासिक मसजिद को नष्ट किया, हमारे देश के संविधान और कानून की अवमानना की।इसके अलावा उस दिन अकेले अयोध्या में 14 मुसलमान मारे गए।267घर जलाए गए या तोड़े गए।19मजार और मदरसों को क्षतिग्रस्त किया गया।4500मुसलमानों को अयोध्या छोड़कर भागना पड़ा।इसके अलावा देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। दुखद यह है कि जिन संगठनों ने यह सब काण्ड किया उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई।
Anand Pradhan
बाबरी मस्जिद का ध्वंस आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे शर्मनाक और त्रासद घटनाओं में से एक है. इस दिन भगवा सांप्रदायिक ताकतों ने एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक, बहुराष्ट्रीय और बहुभाषी भारत के विचार को मर्मान्तक चोट पहुंचाने की कोशिश की थी. इसलिए यह आज़ाद भारत के इतिहास का एक काला दिन है जिसे बेहतर समाज और देश चाहनेवालों को कभी भुलाना नहीं चाहिए.
 
Girijesh Tiwari
 
आइए, आज फिर एक बार अदम गोंडवी को याद करें
और साम्प्रदायिक सौहार्द की गंगा-जमनी तहज़ीब की हिफ़ाज़त के लिये
पहलकदमी करें.
"हिन्दू और मुस्लिम के एहसासात को मत छेडिये;
अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेडिये.

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है;
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए.

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थी, जुम्मन का घर फिर क्यों जले;
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए.

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ;
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए.

छेड़िए असली जंग, मिल-जुल कर गरीबी ख़िलाफ़;
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए !"
Saleem Akhter Siddiqui
छह दिसंबर को आज की पीढ़ी भूलती जा रही है। हो सकता है वक्त के साथ यह तारीख इतिहास में कहीं दफन हो जाए। ऐसे ही जैसे 1949 से लेकर 31 जनवरी 1986 तक का वक्फा दफन रहा था। लेकिन 1 फरवरी 1986 ने सब कुछ बदल दिया। जो एक साल पहले दो सीटें लेकर इतिहास बनने की ओर अग्रसर थे, वे अचानक हमलावर हो गए। 2 से 88 और फिर 180 तक जा पहुंचे। देश की राजनीति का घोर सांप्रदायिकरण कर दिया गया। उस फसल को देश आज तक काट रहा है। मामला भले ही सुप्रीम कोर्ट में हो, लेकिन पता नहीं कौन और कब इसे दोबारा भड़काकर देश को अस्सी के दशक जैसे डरावने दौर में ले जाए।
Ali Sohrab

मंदिर तो एक बहाना है, मक़सद नफरत फैलाना है ,यह देश भले टूटे या रहे उनको सत्ता हथियाना है।

मस्जिद भी रहे, मंदिर भी बने क्या यह बिल्कुल नामुमकिन है?
हिलमिल कर सब साथ रहें क्या यह बिल्कुल नामुमकिन है?

इक मंदिर बने अयोध्या में इसमें तो किसी को उज्र नहीं
पर वह मस्जिद की जगह बने यह अंधी जिद है, धर्म नहीं।

क्या राम जन्म नहीं ले सकते मस्जिद से थोड़ा हट करके?
किसकी कट जाएगी नाक अगर मंदिर मस्जिद हों सट करके?

इंसान के दिल से बढ़कर भी क्या कोई मंदिर हो सकता?
जो लाख दिलों को तोड़ बने क्या वह पूजा घर हो सकता?

मंदिर तो एक बहाना है मक़सद नफरत फैलाना है
यह देश भले टूटे या रहे उनको सत्ता हथियाना है।

इस लम्बे-चौड़े भारत में मुश्किल है बहुमत पायेंगे
यह सोच के ओछे मन वाले अब हिन्दू राष्ट्र बनायेंगे।

इतिहास का बदला लेने को जो आज तुम्हें उकसाता है
वह वर्तमान के मरघट में भूतों के भूत जगाता है।

इतिहास-दृष्टि नहीं मिली जिसे इतिहास से सीख न पाता है
बेचारा बेबस होकर फिर इतिहास मरा दुहराता है।

जो राम के नाम पे भड़काए समझो वह राम का दुश्मन है।
जो खून-खराबा करवाए समझो वह देश का दुश्मन है।

वह दुश्मन शान्ति व्यवस्था का वह अमन का असली दुश्मन है।
दुश्मन है भाई चारे का इस चमन का असली दुश्मन है।

मंदिर भी बने, मस्जिद भी रहे ज़रा सोचो क्या कठिनाई है?
जन्मभूमि है पूरा देश यह इसे मत तोड़ो राम दुहाई है।

-डॉ. रण्जीत
Ranjan Yadav
आज कोई बाबरी विध्वंश का जश्न मना रहा है ,कोई गम में पागल हुए जा रहा है | लेकिन कुछ ऐसा है जो भारत के जातिवाद गद्दार समाज के खिलाफ मुहीम को अंजाम दे रहे है ,मेरा नाम उसी लिस्ट में शामिल करे |
असरफ हिन्दू और स्वरण मुस्लिम के लिए बाबरी और राम मंदिर मुद्दा दोनों में कोई अंतर नहीं है ,इनके लिए धर्म भी कोई मायने नहीं रखती है ,इनके लिए मायने रखती है तो सिर्फ और सिर्फ राज सत्ता !
देश के 60 फीसदी आबादी जब मंडल मुहीम में अपनी सविन्धानिक हक और आर्थिक हितो के लिए एकत्र हो रही थी ,तभी अडवानी मुरलीमनोहर जोशी जैसे जातिवादी असरफ स्वर्णों ने मंदिर -मस्जिद प्रकरण को आवाज दी |मंडल दब के रह गया ,आवाज दबी देश के आधी आबादी की ,अब खुद सोचे क्या इनके पाप इस जन्म में माफ़ किये जा सकते है ?
तुम्हारे शौर्य दिवस कलंक है देश पर !
संक्षेप में इनके लिए सिर्फ और सिर्फ एक शब्द "देशद्रोही गद्दार जातिवादी |
जंग जारी रहे ,लिखते रहिये लोगो को बताते रहिये ,समझाते रहिये ,गद्दार जातिवादी लोगो के चहरे सामने आनी ही चहिये | जब पेट भरा रहेगा तभी राम भजन होगा
  
Rajendra Singh
हम 6 दिसम्बर को ही भारत के संविधान को तार-तार करने वाली घटना भी हुई थी। मैं मुस्लिम भाइयो से बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए माफ़ी मांगता हूँ। हमारे समुदाय के लोगो ने जो गलत किया इस बात के लिए।
 
 
सुमन 

रविवार, 14 जुलाई 2013

बोधगया धमाके, आतंकी हिंसा और राजनैतिक एजेन्डे

आतंकी हिंसा, पिछले लगभग दो दशकों में, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के एक नए हथियार के रूप में उभरी है। 
मुंबई में सन् 1992.93 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पश्चात भड़के दंगों व गुजरात के 2002 कत्लेआम के बादए श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट हुए थे। इसके अलावा, कसाब और उसके साथियों ने 26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर आतंकी हमला किया था। ये तथ्य यह बताते हैं कि आतंकी हिंसा के कई चेहरे हैं और वह कई कारणों से उभरती है। इसी तरह की घटनाएं देश के अन्य स्थानों पर भी होती रही हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी जानें गवाईं हैं। संकटमोचन मंदिर, मालेगांवए अजमेर, मक्का मस्जिद आदि में हुए आतंकी हमलों ने देश को हिलाकर रख दिया था।
इन हमलों की जांच की एक अलग ही कहानी है। जांच प्रक्रिया पर पूर्वाग्रह हमेशा हावी रहे। चूंकि जांच प्रक्रिया को रहस्य के घेरे में रखा गया इसलिए आतंकी हमले करने वालों और उसके पीछे के कारणों के बारे में मीडिया और आमजनों में तरह.तरह के कयास लगाए जाते रहे। जहां तक आतंकी हमले करने वालों की पहचान का सवाल है, इस मामले में हर टिप्पणीकार और हर राजनेता की अलग.अलग राय रहती हैए जो अक्सर तथ्यों पर नहीं वरन् संबंधित की विचारधारा या एजेन्डे पर आधारित होती है।
हाल में ;8 जुलाई 2013 बोधगया के पवित्र तीर्थस्थल में  9 धमाके हुए। सौभाग्यवश, इन धमाकों में किसी की जान नहीं गई और केवल दो बौद्ध भिक्षु घायल हुए। धमाकों के तुरंत बाद से यह कहा जाने लगा कि ये धमाके म्यंनमार में बौद्धों द्वारा, रोंहिग्या मुसलमानों पर किए जा रहे अत्याचारों का बदला लेने के लिएए इंडियन मुजाहिदीन द्वारा किए गए हैं। यह घटनाचक्र पिछले कुछ वर्षों में कई बार दुहराया जा चुका है। पहले किसी धमाके के लिए किसी पाकिस्तानी या मुस्लिम संगठन को दोषी ठहराया जाता है और बाद में यह सामने आता है कि उसके पीछे स्वामी असीमानंद या उनके जैसे अन्य लोग थे। जो लोग आतंकी हमलों का गहराई से अध्ययन और विश्लेषण करते रहे हैं, उनका कहना है कि बोधगया पर आतंकी हमले का नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने से कुछ संबंध हो सकता है। नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को भाजपा की चुनाव प्रचार समिति का मुखिया नियुक्त किए जाने के विरोध में एनडीए से अपना नाता तोड़ लिया था। हम सब जानते हैं कि इस बात की प्रबल संभावना है कि भाजपा, मोदी को प्रधानमंत्री पद का अपना दावेदार घोषित करेगी। जहाँ तक इंडियन मुजाहिदीन का सवाल है, उसका नाम बम धमाकों के कुछ ही घंटों बाद सामने आ गया था और भाजपा ने उसे खुशी.खुशी लपक लिया। इंडियन मुजाहिदीन की क्या भूमिका है? उसपर किसका नियंत्रण है? आदि जैसे मूल प्रश्नों का उत्तर आज तक नहीं मिल सका है। कुछ सालों पहले तकए इंडियन मुजाहिदीन की बजाए हर हमले के पीछे सिमी का हाथ बताया जाता था। सिमी पर प्रतिबंध भी लगाया गया और जब प्रतिबंध को अदालत में चुनौती दी गई तो न्यायमूर्ति लता मित्तल अधिकरण ने पाया कि संस्था पर प्रतिबंध लगाने का कोई कारण नहीं था। परंतु लोगों के दिमाग में यह भर दिया गया था कि सिमी एक आतंकवादी संगठन है। कसाब जैसे लोग एक अलग श्रेणी में आते हैं जो पाकिस्तानी सेना और अल्कायदा की धुन पर नाच रहे हैं। अल्कायदा का जन्म भी अफगानिस्तान पर सोवियत कब्जे से निपटने की अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था।
जांच एजेन्सियों के सिर पर अल्कायदा का भूत इस कदर सवार था कि 9/11 के डब्लूटीसी हमले के बाद अमेरिकी मीडिया द्वारा गढ़े गए  इस्लामिक आतंकवाद शब्द को साम्प्रदायिक ताकतों और मीडिया के एक हिस्से द्वारा इस सिद्धांत में बदल दिया गया कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं परंतु सभी आतंकवादी मुसलमान हैं। अप्रैल 2006 के नांदेड़ धमाकों से लेकर मालेगांव, मक्का मस्जिद,अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाकों तक . सभी में पूर्वाग्रहग्रस्त जांच एजेसिंयों ने इसी सिद्धांत के अन्तर्गत सैकड़ों निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कियाए उनके कैरियर बर्बाद किए और पूरे मुस्लिम समुदाय का दानवीकरण किया। इसी सिद्धांत के चलते ही  फर्जी मुठभेड़ों का सिलसिला शुरू हुआ, जिनमें भाजपा.शासित गुजरात सबसे आगे था। इशरत जहां को गुजरात में सरेराह मार डाला गया और बहाना यह बनाया गया कि वह और उसके साथीए पाकिस्तानी आतंकी संगठनों से जुड़े हुए थे और गुजरात के मुख्यमंत्री की हत्या करने के इरादे से आए थे। इसी तरह,कई अन्य युवकों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। मोदी.पूजक कई पुलिस अधिकारी,जिन्होंने यह सब किया था, अब जेल की सलाखों के पीछे हैं। हेमंत करकरे ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने में आंशिक सफलता पाई जब मालेगांव धमाकों की जांच के दौरान उन्होंने असली दोषियों को ढूंढ निकाला। बाल ठाकरे, मोदी आदि द्वारा उन्हें देशद्रोही बताए जाने पर भी करकरे ने अपना काम जारी रखा।
धार्मिक ध्रुवीकरण करने के लिए, बोधगया धमाकों को म्यंनमार के घटनाक्रम से जोड़ा जा रहा है।   इस दुष्प्रचार का एक उद्धेश्य बौद्धों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काना भी है। यह प्रचार जोरशोर से जारी है और कई अखबारों ने अपनी आठ कालम की बैनर हेडलाईनों में इस आशय की घोषणाएं की हैं। भाजपा .जिसके कई सहयोगी संगठनों के सदस्य आतंकी हमलों में संलिप्तता के कारण जेल में हैं .की ओर से रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मीडिया के अनुसार, बेकरी मामले में शामिल आतंकियों ने बोधगया के मंदिर में रैकी की थी। कई चेताविनयां दी गईं परंतु सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किए गए। यह भी कहा गया कि बिहार की सरकार ने कोई एहतियाती कदम नहीं उठाए। यह साफ है कि इस घटना को म्यंनमार के त्रासद घटनाक्रम से जोड़ने की कोशिश हो रही है। इसके विपरीत, कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह का कहना है कि यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का प्रयास है और यह भी कि गैर.भाजपा सरकारों और विशेषकर नीतीश कुमार को बहुत सावधान रहना चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इन दिनों भाजपा का एकमात्र लक्ष्य 2014 के चुनाव में अपना प्रदर्शन  सुधारना है। मोदी को पार्टी का नेता घोषित कर भाजपा ने अपने कई गठबंधन साथियों को नाराज कर लिया है। इसलिए अब सत्ता में आने के लिए उसे स्वयं ज्यादा सीटें जीतनी होंगी। भाजपा जानती है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण ही वह सीढ़ी है जो उसे सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा सकती है। देश में जैसे.जैसे साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ती गईए वैसे.वैसे भाजपा की चुनावी सफलता का ग्राफ भी ऊंचा होता गया। अब भाजपा आतंकवादी हमलों का इस्तेमाल भी धार्मिक ध्रुवीकरण करने के लिए कर रही है ताकि वह ज्यादा से ज्यादा वोट कबाड़ सके। आखिर क्या कारण है कि हम इतनी जल्दी में रहते हैं? आखिर क्या कारण है कि हम किसी संगठन या व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए इतने व्यग्र रहते हैं कि जांच एजेन्सियों को अपनी प्राथमिक जांच पूरी कर लेने का समय भी नहीं देना चाहते? बिना जांच के परिणाम सामने आए कयास लगाने के अपने खतरे हैं। सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि घटना के तार म्यंनमार से जोड़े जाने से रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार और बढ़ जाएंगे। हमने देखा है कि किस प्रकार इस तरह की बैसिरपैर की बयानबाजी के कारण हर आतंकी हमले का खामियाजा मुस्लिम समुदाय को भुगतना पड़ता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी अपराध की जांच के दौरान संभावित दोषियों की सूची बनाई जाती है। परंतु अगर इस सूची को बनाने वाले पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होंगे तो इसके नतीजे में निर्दोषों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस घटना का एक पहलू, जिसे लगभग नजरअंदाज किया जा रहा है यह है कि विनोद मिस्त्री नाम के एक बढ़ई का बैग और आईडी कार्ड घटनास्थल से बरामद हुआ है। इस बैग में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पहना जाने वाला पारंपरिक परिधान पाया गया है। इससे हम क्या नतीजा निकाल सकते हैं?निर्दोष मुसलमानों की मदद करने के लिए गठिन संगठन रिहाई मंच कहता हैए जिस तरह से इस मामले में विनोद मिस्त्री का नाम सामने आ रहा है और यह पता चला है कि उसके बैग में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पहने जाने वाले कपड़े भी पाए गए हैं और जिस प्रकार उर्दू में लिखे गए पत्र मंदिर से मिले हैं उससे ऐसा लगता है कि बोधगया में एक और मालेगांव हुआ है। मालेगांव में भी घटनास्थल से एक नकली दाढ़ी जब्त की गई थी और अंत में यह पता चला कि इसके पीछे आरएसएस के लोग थे।
भारतीय राजनीति में हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा से प्रेरित कई संगठन आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। स्वामी असीमानंद,स्वामी दयानंद, साध्वी प्रज्ञा सिंह और उनके साथी ऐसे लोगों में शामिल हैं। दुर्भाग्यवश, यह गलत धारणा किसभी आतंकी मुसलमान होते हैं ने बरसों तक उन्हें बचाए रखा। निश्चित तौर पर इस मामले में निष्पक्षता से और सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर जांच किए जाने की आवश्यकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भगवान गौतम बुद्ध से जुड़े एक पवित्र स्थान को हिंसा का निशाना बनाया गया है। इसके दोषियों को सजा जरूर मिलनी चाहिए। जरूरत इस बात की भी है कि जब तक कोई ठोस सबूत न मिल जाएं तब तक इस घटना को रोंहिग्या मुसलमानों से जोड़ने से हम सब परहेज करें।

-राम पुनियानी

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

कांग्रेस और भाजपा में कई समानताएं






यू.पी.ए-2 अब अल्पमत में है और एसपी, बीएसपी व आरजेडी द्वारा बाहर से दिए जा रहे समर्थन पर उसकी सरकार जिन्दा है। अब से लगभग एक साल बाद, उसे आमचुनाव का सामना करना है। अपने आखिरी साल में सरकार को अपने गठबंधन के साथियों और मित्र दलों के भारी दबाव और खींचातानी का सामना करना पड़ रहा है। यू.पी.ए-2 का सबसे बड़ा दल कांग्रेस, आर्थिक सुधारों के अपने एजेन्डे को लागू करने के लिए बेचैन है। इन सुधारों से मूलतः उच्च आर्थिक वर्ग और कारपोरेट जगत को लाभ मिलेगा, जो कि अपनी संपत्ति व आमदनी में दिन-दूनी, रात-चैगुनी वृद्धि करना चाहता है। इसे ही अर्थशास्त्री व राजनीतिज्ञ आर्थिक प्रगति बता रहे हैं।
क्षेत्रीय क्षत्रप, यू.पी.ए सरकार को जीवनदान देने और मध्यावधि चुनाव टालने के बदले लूट में अपना हिस्सा मांग रहे हैं। नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वह पिछड़े राज्य की परिभाषा पर पुनर्विचार करे, ताकि इन राज्यों की सूची में बिहार शामिल हो सके और वे अपने राज्य के विकास के लिए केंद्र से विशेष पैकेज प्राप्त कर सकें। मुलायम सिंह यादव भी अपने राज्य के लिए अधिक केंद्रीय सहायता प्राप्त करने के लिए रूठने-मनाने का खेल खेल रहे हैं।
यू.पी.ए-2 का गठन, सांप्रदायिक ताकतों से मुकाबला करने और उन्हें सत्ता से दूर रखने के लिए किया गया था। यू.पी.ए-2 सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और उसे विदेशी निवेशकों के लिए खोलने की दिशा में आक्रामक प्रयास किये। भारतीय बाजार के उदारीकरण और उसमें  कॉर्पोरेट जगत का दबदबा बढ़ने से आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे देशों की कंपनियों को, भारत में निवेश कर, यहाँ की श्रमशक्ति का शोषण करने और यहाँ के बाजार से मुनाफा कमाने का मौका मिला। यह भी सही है कि यू.पी.ए ने सरकार की जवाबदेही बढ़ाने के लिए कुछ कानून भी बनाये यद्यपि अब वह सूचना के अधिकार को सीमित करने का प्रयास कर रही है। कुछ और कल्याणकारी विधिनिर्माण भी हुआ, जिसमें शामिल है खाद्य सुरक्षा अधिनियम। परन्तु इन नए कानूनों को उतने अच्छे ढंग से लागू नहीं किया गया जितना कि किया जा सकता था। विभिन्न घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों ने यू.पी.ए की छवि को गहरी चोट पहुंचाई।
यद्यपि यू.पी.ए का गठन फिरकापरस्ती से लड़ने के लिए किया गया था तथापि उसने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। फर्जी मुठभेड़ों में मुसलमानों को मारने का सिलसिला जारी रहा। कांग्रेस-शासित राज्यों में भी, हर बम धमाके के बाद, बिना किसी सुबूत के, बड़ी संख्या में मुसलमान  युवकों को गिरतार किया जाता रहा। जांच खत्म होने तक इंतजार करना तो दूर की बात रही, जांच शुरू होने से पहले ही आतंकी हमलों के लिए मुसलमानों को दोषी करार दे देना आम बात बनी रही। अफजल गुरु को चोरी-छुपे फांसी दे दी गयी ताकि वह फांसी में विलम्ब के आधार पर, अपनी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की अपील न कर सके। उसे उसके कानूनी अधिकारों से वंचित किया गया। अफजल गुरु को जल्दी से जल्दी फांसी देने की मांग सांप्रदायिक ताकतें कर रहीं थीं। धुले में दंगों के दौरान, पुलिस ने निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया। असम में हिंसा में 70 से अधिक लोग मारे गए और 4 लाख को अपने घरबार छोड़ कर भागना पड़ा। अभी भी बोडोलैंड में मुसलमान स्वयं को असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं।
यूपीए शासनकाल में मुसलमानों और ईसाईयों के साथ भेदभाव जारी रहा और वे दूसरे दर्जे के नागरिकों का जीवन बिताने पर मजबूर रहे। सच्चर समिति की सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया गया और केवल प्रधानमंत्री के 15-सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत, बहुत मामूली राशि, अल्पसंख्यकों के अत्यंत गरीब तबके को उपलब्ध करवाई गई। यह वह तबका है जिसे अपने ही समुदाय में भी भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है। अल्पसंख्यक-बहुल जिलों के विकास के लिए धनराशि तो आवंटित की गई परंतु इससे अल्पसंख्यकों को कोई खास लाभ नहीं पहुंचा क्योंकि गलत नीतियों और पर्यवेक्षण की कमी के कारण, इस धनराशि को उन जिलों में अन्य विकास कार्यों पर खर्च कर दिया गया। मुस्लिम-बहुल इलाकों में शैक्षणिक संस्थाओं की कमी और गरीबी के चलते मुसलमान, शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े बने रहे। यूपीए ने साम्प्रदायिक दंगे और चिन्हित हिंसा रोकने के लिए कानून बनाने के अपने चुनावी वायदे को इस तथ्य के बावजूद पूरा नहीं किया कि राष्ट्रीय सलाहकार  परिषद ने इस कानून का एक मसविदा तैयार कर दिया था।
कांग्रेस पर यह आरोप भी है कि उसने राज्यों की शक्तियों और अधिकारों पर अतिक्रमण किया और देश के संघीय ढांचे को कमजोर किया। एनआईए व एनसीटीसी का गठन इसी दिशा में उठाया गया कदम था। खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में लिए गए निर्णय भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण थे। यूपीए के कुछ गठबंधन साथियों ने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया कि वह उनके हितों को नुकसान पहुंचा रही है।
दोनांे बड़े राजनैतिक गुट-यूपीए 2 और एनडीए-परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान यूपीए का हुआ है। छोटे दल अपने मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए ऐसी मांगें कर रहे हैं जिन्हें पूरा करना असंभव है। गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के छोटे दलों की विरोधाभासी मांगों के बीच संतुलन स्थापित करने की हर संभव कोशिश के बाद भी, असंतुष्ट दलों और व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। परंतु इस संदर्भ में हमें यह भी याद रखना होगा कि एनडीए जब शासन में आई थी तब वह 23 पार्टियों का गठबंधन थी परंतु जब वह सत्ताच्युत हुई, तब उसमें मात्र 6 पार्टियां बचीं थीं।
यूपीए-2 से टीआरएस ने स्वयं को इसलिए अलग कर लिया क्योंकि उसका मानना था कि कांग्रेस, तेलंगाना राज्य की स्थापना के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही है। तमिलनाडू में चुनाव के ठीक पहले, एमडीएमके ने गठबंधन को इसलिए अलविदा कह दिया क्योंकि उसकी शिकायत थी कि डीएमके उसे पर्याप्त सीटें नहीं दे रही है। पीडीपी ने कांगे्रस का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन कर लिया। मुस्लिम इत्तेहादुल मुसलमीन इसलिए अलग हो गई क्योंकि उसके विचार में कांग्रेस, साम्प्रदायिक हो गई थी। टीएमसी और झारखण्ड विकास मोर्चा ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में वृद्धि के मुद्दों पर यूपीए से नाता तोड़ लिया। और अभी हाल में, डीएमके ने यूपीए से अलग होने की घोषणा कर दी क्योंकि वह श्रीलंका सरकार के एलटीटीई के विरूद्ध चलाए गए सैन्य अभियान के दौरान किए गए युद्ध अपराधों के विरोध में, संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग में प्रस्तुत प्रस्ताव पर भारत सरकार के रूख से प्रसन्न नहीं थी।
एनडीए भ्रष्टाचार, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण, देश की सुरक्षा से समझौता और अकुशल शासन के मुद्दों को लेकर यूपीए पर लगातार हमले कर रही है। वह आक्रामक राष्ट्रीयता की हामी है, जिसका उद्धेश्य है आर्थिक और सामाजिक श्रेष्ठिवर्ग, अर्थात उत्तर भारतीय उच्च जाति के पुरूषों, का प्रभुत्व बनाए रखना। एनडीए चाहती है कि दलित, महिलाएं, आदिवासी, श्रमिक व अल्पसंख्यक जो कि शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, वंचित और दमित बने रहें। नितिन गडकरी और येदियुरप्पा के बारे में मीडिया द्वारा किए गए खुलासों से भाजपा का भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान कुछ कमजोर पड़ा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं भाजपा को अयोध्या का राम मंदिर फिर से याद आने लगा है। हाल में विहिप ने अहमदाबाद में एक बैठक आयोजित कर राम मंदिर के जिन्न को बोतल से निकालने का भरपूर प्रयास किया।
यद्यपि एनडीए ने प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है तथापि यह साफ है कि चूंकि भाजपा इस गठबंधन का सबसे बड़ा दल है इसलिए उसी का कोई नेता प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होगा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाजपा, नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करने की दिशा में बढ़ रही है। परंतु अंततः ऐसा होगा या नहीं, यह केवल समय ही बताएगा। नरेन्द्र मोदी के रास्ते में कई भाजपा नेता और एनडीए के अनेक सदस्य दल रोड़ा बने हुए हैं। नरेन्द्र मोदी ने और अधिक आक्रामक निजीकरण-उदारीकरण नीतियां अपनाने का वायदा किया है, जिनसे विकास के नाम पर मुख्यतः कारपोरेट जगत को लाभ पहुुंचेगा।

कांग्रेस और भाजपा में कई समानताएं हैं, यह बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है। परंतु यह भी साफ है कि दोनों दलों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। दोनों उदारीकरण के हामी हैं यद्यपि कांग्रेस ‘मानवीय चेहरे‘ के साथ उदारीकरण की बात करती रही है जिसमें सूचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा अधिनियम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना व दलितों और आदिवासियों के हितार्थ कई अन्य कदम शामिल हैं। कांग्रेस की नीति यह है कि इन योजनाओं के जरिए दलित और आदिवासी नेतृत्व के एक हिस्से को ‘राष्ट्रीय मुख्यधारा‘ में शामिल कर लिया जाए।
भाजपा ने ‘शाईनिंग इंडिया‘ का अपना नारा त्याग दिया है परंतु उसकी रीति-नीति वही पुरानी है। कुछ चुनिंदा क्षेत्रों का विकास करो, कारपोरेट जगत के हितों को पर्याप्त तरजीह दो और सावरकर की ‘भारत का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण‘ की नीति के अनुरूप, भारतीय समाज को एकसार और संस्कृतनिष्ठ बनाने का प्रयास करो।
दोनों के साम्प्रदायिक एजेन्डा हैं। दोनों साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को बढावा दे रही हैं और दोनों बहुसंख्यक समुदाय का विशेष ध्यान रखती हैं। परंतु इनमें कुछ अंतर भी हैं। भाजपा ने अब तक अपने विस्तारवादी राष्ट्रवाद (अखंड भारत) को त्यागा नहीं है। इस अखंड भारत की सीमाएं, संपूर्ण दक्षिण एशिया और उसके भी आगे तक फैली हुई हैं। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसके विस्तारवादी राष्ट्रीय एजेन्डा में अधिक से अधिक पाक-अधिकृत कश्मीर को भारत में शामिल करना है।
कांग्रेस के एकसार राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों को ‘‘राष्ट्रीय मुख्यधारा’’ में शामिल करने के नारों का ही यह परिणाम है कि अल्पसंख्यक, समाज के हाशिए पर पटक दिये गये हैं। राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल करने का असली अर्थ है विभिन्नताओं को हतोत्साहित करना और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की तरह जीने के लिए प्रेरित करना। अधिकारों का केन्द्रीयकरण और देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने की कोशिश भी समाज को एकसार बनाने की नीति के अनुरूप है। विभिन्नता के संरक्षण के लिये बहुवादी और संघीय ढांचा आवश्यक है।
भाजपा, सŸाा के केन्द्रीयकरण, समाज को एकसार बनाने और हिन्दू धर्म के सैन्यीकरण के लिए बल के इस्तेमाल से विभिन्नता को कुचलना चाहती है। इसके लिए वह ‘‘अलगाववादी अल्पसंख्यको’’ और ‘‘राष्ट्रविरोधी अल्पसंख्यकों’’ पर निशाना साध रही है। अल्पसंख्यकों के मुंह पर कालिख पोतने के लिए उन्हें आतंकवादी, कई पत्नियां रखने वाले, राष्ट्रविरोधी और बर्बर बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि उनके अस्तित्व मात्र से अन्यों के हितों को खतरा है। ऐसा आरोप लगाया जाता है कि जिस दौर में देश की सŸाा अल्पसंख्यकों के हाथों में थी, उन्होंने हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने की हर संभव कोशिश की। यह भी प्रचारित किया जाता है कि हिन्दुओं और अल्पसंख्यकों के बीच अनवरत् युद्ध जारी है और इस युद्ध का अन्त तभी होगा जब दोनों में से केवल एक समुदाय ही बचेगा। यह भी आरोपित है कि अल्पसंख्यक इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए धर्मपरिवर्तन को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
दोनों ही सरकारों के शासनकाल में साम्प्रदायिक दंगे हुए और दोनों ने ही दंगा करने वालों और भड़काने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने में हिचकिचाहट दिखायी। अगर अल्पसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य नफरत फैलाने वाले भाषण देता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाती है। परन्तु यही काम जब बहुसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य करता है तो उसे चुपचाप स्वीकार कर लिया जाता है। और कई मामलों में तो उसे समर्थन भी मिलता है। कांग्रेस नेतृत्व ने भी कभी इस परिभाषा को साफ शब्दों में खारिज नहीं किया कि हिन्दू-भारतीय वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि, सिन्धु नदी से लेकर हिन्द महासागर के बीच फैली पवित्र भूमि में है।
भाजपा, इससे भी एक कदम आगे बढ़कर अल्पसंख्यक समुदायों के धर्मों को विदेशी धर्म बताती है जो देश के बाहर से आये हैं और इसलिए ‘‘राष्ट्रीय’’ हितों के खिलाफ हैं। कुल मिलाकर, भाजपा और हिन्दुत्ववादी ताकतें, अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को ही राष्ट्रीय हितों के खिलाफ मानती हैं। भाजपा की अल्पसंख्यकों के प्रति उदारता की सीमा है मुस्लिम समुदाय की धार्मिक संस्थाओं और चर्च का भारतीयकरण करने की शर्त। राज्यों की भाजपा सरकारें इस तरह के कानून बना रही हैं जिनसे उच्च जातियों की खानपान संबंधित आदतों को पूरे समाज पर थोपा जा सके। शैक्षणिक संस्थाओं में एक धर्म विशेष को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और सभी धर्मों के विद्यार्थियों को इस धर्म  के कर्मकाण्डों का पालन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। बहाना यह है कि ये कर्मकाण्ड धार्मिक नहीं वरन् सांस्कृतिक और सार्वभौमिक हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने स्कूलों में भगवत् गीता की पढ़ाई को इस आधार पर अनिवार्य बना दिया है कि गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है।
हिन्दुत्व, जिसका झंडा भाजपा उठाये हुये है, विचारधारा और नीतियों के स्तर पर प्रजातंत्र, विभिन्नता, बहुवाद और बहुसंस्कृतिवाद के विरूद्ध है। ये सभी मूल्य हमारे संविधान का हिस्सा हैं। भाजपा के लिए आस्था, कानून से बड़ी है। अगर हिन्दुत्ववादियों की चले तो वे आस्था को कानून का आधार बना दें। भाजपा ने यह मांग की थी कि भारतीय संसद एक कानून के जरिए हिन्दुओं की इस आस्था कि भगवान राम ठीक उसी स्थान पर जन्में थे जहां बाद में बाबरी मस्जिद बनायी गई, के आधार पर जमीन के उस टुकड़े को राम मंदिर के निर्माण के लिए हिन्दुओं को सौंपे।
यदि हमें भारत में प्रजातंत्र को जीवित रखना है तो हमें सभी प्रकार की सांप्रदायिक व कट्टरपंथी ताकतों को शिकस्त देनी होगी। सांप्रदायिकता और कट्टरवाद को हराने के बाद ही हम प्रजातंत्र को मजबूती देने और ऐसी संस्थाओं का निर्माण करने में सफल हो सकंेगे जो विभिन्नता और बहुवाद का पोषण करें और जनता के प्रति जवाबदेह हों।
 -इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 21 मार्च 2013

बेनी बाबू गलत नहीं कहते हैं।

केन्द्रीय इस्पात मंत्री श्री बेनी वर्मा ने 16 मार्च को गोंडा में कहा था, '...कांग्रेस तुमको नहीं पूछने वाली है। समर्थन दे रहे हो इसलिए पैसा लेते रहो। खूब कमिशन खाओ...परिवार में लुटाओ...विदेश में जमा करो। बेनी प्रसाद वर्मा यह नहीं करेंगे। अपराध और बेईमानी तो तुम्हारा पेशा है। सबसे बड़ा अभिशाप है इस प्रदेश के लिए मुलायम सिंह यादव। मायावती भी लुटेरी थीं लेकिन ये लुटेरा और गुंडा दोनों है। कैसे बचाओगे अपने प्रदेश को। आतंकवादियों से इसके रिश्ते हैं। बेनी प्रसाद वर्मा को मरवा डालोगे तो सौ बेनी प्रसाद पैदा होंगे। अभी तुम्हारा आखिरी कार्यकाल है। तुम क्या डराना चाहते हो। कांग्रेस से हम नहीं डरे, तो तुम तो अभी चुहिया हो।'
 'यदि मैं आतंकवादी हूं तो प्रमाण पेश करें और मुझे जेल में डालें। बेनी प्रसाद वर्मा की औकात ही क्या है, उन्हें मंत्रिमंडल से तत्काल हटाया जाए।'
-मुलायम सिंह यादव, सपा प्रमुख

'मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा। माफी मांगने का सवाल ही नहीं। बाबरी मस्जिद गिराना आतंकवाद था, उसके दोषी कल्याण से मुलायम ने हाथ मिलाया। मेरे इस्तीफे की मांग करने वाले वह कौन हैं?'
-बेनी प्रसाद वर्मा, केंद्रीय इस्पात मंत्री
 
यह भी सच है कि मुलायम सिंह ने बाबरी मस्जिद  ध्वंस के नायक कल्याण सिंह से हाथ मिलाया, साक्षी महाराज की भी जय जयकार की। राजनाथ सिंह को गाजियाबाद से सांसद बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बाबरी मस्जिद ध्वंस से पहले हिंदुत्व वादी शक्तियों को ललकार कर व अयोध्या में गोली चलवा कर हिंदुत्व वादियों को नयी उर्जा प्रदान की थी जिसका परिणाम यह हुआ था की बाबरी मस्जिद ध्वंस हो गयी।  
                          बेनी ने कहा कि उन्होंने अपने बयान में आतंकवाद को किसी भी धर्म से नहीं जोड़ा। बेनी ने कहा, उनका मतलब था कि मुलायम ने कल्याण सिंह को मंत्री बनाया। साक्षी महाराज का साथ दिया। गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी को जिताने के लिए सपा ने गुजरात जाकर चुनाव लड़ा। 
             उत्तर प्रदेश में सपा की रणनीति यह रहती है कि भारतीय जनता पार्टी बढे और मुसलमान अपनी सुरक्षा के लिए समाजवादी पार्टी को वोट देते रहे। इसी नीति के तहत नगर पंचायतों के चुनाव में भाजपा को वाक ओवर देकर अधिकांश जगहों पर उसके प्रत्याशियों को जिताने में सपा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बाराबंकी जनपद में कभी भी नगर पालिका परिषद में भाजपा का अध्यक्ष नही हो पाया था लेकिन इस बार भाजपा का अध्यक्ष चुनाव जीता है। सपा के एक साल के शासन में सत्ताईस दंगे हो चुके हैं।
                    समाजवादी पार्टी के द्वारा कुख्यात अपराधियों और उनके गिरोहों को विधायक, सांसद व मंत्री बनाया जाता है। इसके विपरीत बेनी बाबू की बिरादिरी के ददुआ डकैत ने उनसे संरक्षण चाह तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया था। मुलायम सिंह यादव व उनका परिवार अपने कारनामो के कारण सी बी आई से डरता है। बेनी बाबू डरते नही हैं। 

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

बाबरी मस्जिद के दो दशक बाद

आज से बीस वर्ष पहले ;6 दिसम्बर 1992 बाबरी मस्जिद ढ़हा दी गई थी। यह घटना भारत के इतिहास पर एक बदनुमा दाग है। इस घटना को अंजाम दिया था साम्प्रदायिक ताकतों ने और इससे भारतीय राजनीति एक अवांछित दिशा में मुड़ गई। इस दिशापरिवर्तन का खामियाजा हम आज भी भोग रहे हैं। लिब्रहान जांच आयोग ने अपनी रपट में साफ कहा है कि बाबरी मस्जिद को संघ परिवार द्वाराए सोची.समझी साजिश के तहत, ढहाया गया था। आज भी संघ परिवार इस कुकर्म को अपनी बड़ी उपलब्धि मानता है और हर वर्ष 6 दिसम्बर को शौर्य दिवस मनाता है।
संघ परिवार और उसकी विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाले बुद्धिजीवी यह मानते  हैं कि बाबरी मस्जिद को जमींदोज करके राष्ट्रनिर्माण की नींव रखी गई थी। दूसरी  ओर, जिन व्यक्तियों की प्रतिबद्धता प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्षता के प्रति है, उनकी यह मान्यता है कि इस दिन भारतीय राजनीति व धर्मनिरपेक्षता शर्मसार हुई थी। इस घटना ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को गति दी। इस त्रासद दिन से शुरू हुई साम्प्रदायिक ताकतों के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रियाए जिसके नतीजे में भाजपा एक शक्तिशाली राजनैतिक दल के रूप में उभरी। इससे हमारी संस्कृति शनैः.शनैः उदारता से संकीर्णता की ओर और बहुवाद से साम्प्रदायिकता की ओर बढ़ने लगी। समाज में अलगाव का भाव बढ़ा और कमजोर वर्गों के प्रति सहिष्णुता घटी। जहां साम्प्रदायिक ताकतों का बोलबाला बढ़ने लगा  वहीं तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी कांग्रेस इस घटनाक्रम को या तो चुपचाप देखती रही या इस प्रक्रिया को और तेज करने में हाथ बंटाती रही। कांग्रेस, बाबरी मस्जिद की रक्षा करने में असफल रही और इस कारण उसे इस हद तक सिद्धांतविहीन माना जाने लगा कि कुछ लोग उसकी तुलना भाजपा से तक करने लगे। यह कहा जाने लगा कि भाजपा जो काम सीना ठोक कर, खुलेआम करती है, कांग्रेस वही काम दबे.छुपे ढंग से, पर्दे के पीछे से करती है। ये दोनों पार्टियां इस समय भारतीय राजनीति के शीर्ष पर हैं। भाजपा की साम्प्रदायिकता के प्रति नीतिगत प्रतिबद्धता है वहीं कांग्रेस, राजनैतिक फायदे के लिए साम्प्रदायिकता का सहारा लेने में जरा भी नहीं सकुचाती। बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना, उसके तुरंत बाद हुई साम्प्रदायिक हिंसाए उसकी प्रतिक्रिया में हुए बम धमाके और इन सबके दौरान पुलिस की भूमिका से प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध तबका हतप्रभ रह गया। उसे गहरा धक्का लगा। जब बाबरी मस्जिद ढहायी जा रही थी तब उसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस दूसरी तरफ देख रही थी। साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान भी पुलिस या तो मूक दर्शक बनी रही या फिर दंगाईयों के साथ हो ली। साम्प्रदायिक दंगों के बाद भी पुलिस की भूमिका अत्यंत संदिग्ध रही है। यद्यपि साम्प्रदायिक हिंसा का मुख्य शिकार अल्पसंख्यक होते हैं तथापि दंगों के बाद सबसे ज्यादा संख्या में उन्हीं की गिरफ्तारियां होती हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर, अधिकांश पुलिसकर्मी बहुसंख्यकवादी साम्प्रदायिकता के प्रति अपने प्रेम के चलते, कानूनी प्रक्रिया का खुलेआम मखौल बनाते हैं।
साम्प्रदायिक  हिंसा का एक निश्चित ढर्रा होता है। सन् 2001 की जनगणना के अनुसारए मुसलमानों का देश की कुल आबादी में प्रतिशत 13ण्6 है। परंतु दंगों में मरने वालों में 90 प्रतिशत से अधिक मुसलमान होते हैं। मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रहों से समाज में उनके विरूद्ध हिंसा के लिए उपजाऊ भूमि तैयार हो गई है। राजनैतिक पार्टियों के नेतृत्व व नौकरशाही और पुलिस के बड़े तबके सहितए समाज का अधिकांश हिस्सा इन पूर्वाग्रहों की गिरफ्त में है और इसका शिकार होते हैं असहाय व निर्दोष अल्पसंख्यक। यह मानकर चला जाता है कि वे अपराधी हैं और हिंसा में विश्वास रखते हैं। यह सोच अधिकारियों व राज्यतंत्र की कार्यशैली में स्पष्ट प्रतिबिंबित होती है।

इस हिंसा के चलते समाज का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है। यह ध्रुवीकरण इस सीमा तक बढ़ गया है कि स्कूलोंए कालेजों और उन चन्द कार्यस्थलों में.जहां मुसलमानों को  रोजगार मिल पाता है.धार्मिक आधार पर भेदभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इस ध्रुवीकरण के कारण ही साम्प्रदायिक ताकतें चुनावों में जीत हासिल कर पा रही हैं और सत्ता पर काबिज होने में भी सफल हो रही हैं। मुंबई में साम्प्रदायिक हिंसा का नेतृत्व शिवसेना ने किया था। दंगों के बाद हुए चुनावों में उसे भारी सफलता मिली।  लिब्रहान व श्रीकृष्ण जैसे न्यायिक जांच आयोगों की रपटें सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में कैद हैं। साम्प्रदायिक पार्टियां तो इन रपटों को रद्दी कागजों का ढेर समझती ही हैंए कांग्रेस भी सत्ता में आने पर इनकी सिफारिशों को लागू करने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं दिखाती। वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई पार्टी बहुसंख्यक समुदाय को नाराज करने के लिए तैयार नहीं है। इस मामले में न्यायपालिका की भूमिका भी कोई खास प्रशंसनीय नहीं रही है। अगर इस देश में कानून का राज होता तो वे लोग जो समाज में नफरत फैलाते हैंए वे लोग जो दंगे भड़काते हैं और वे लोग जो दंगों में निर्दोषों की जान लेते हैंए आज सींखचों के पीछे होते। इसकी बजाए वे सड़कों पर दहाड़ रहे हैं और उन्हें ष्हिन्दू हृदय सम्राटष् जैसे तमगों से नवाजा जा रहा है। यह संयोग नहीं है कि बाल ठाकरेए जिन्होंने 1992.93 के मुंबई दंगों का नेतृत्व किया था और नरेन्द्र मोदीए जो 2002 के गुजरात कत्लेआम के केन्द्र में थे.दोनों को ही हिन्दू हृदय सम्राट की पदवी दी गई। साम्प्रदायिक सोच की जकड़ से न्यायपालिका भी नहीं बच सकी है। यही कारण है कि गुजरात दंगों के शिकार हुए लोगों को न्याय तभी मिल सका जब उनके मामले गुजरात से बाहर के न्यायालयों में स्थानांतरित किए गए। इलाहबाद उच्च न्यायालय के अयोध्या मामले में फैसले में तीन में से दो जजों ने सुबूतों से ज्यादा तव्वजो आस्था को दी और यह हुक्म सुनाया कि ष्ष्विवादास्पद भूमि को सभी दावेदारों के बीच बराबर.बराबर बांट दिया जाए।ष्ष् ऐसी मांग न तो मामले के पक्षकारों ने की थी और न ही ऐसा करना विधि सम्मत है। साम्प्रदायिक हिंसा और ध्रुवीकरण के कारण विभिन्न समुदायों के लोगों के बीच भावनात्मक दीवारें तो खड़ी हुई ही हैंए भौतिक दीवारें भी खड़ी हो गई हैं। साम्प्रदायिक हिंसा के निशाने पर रहने वाले समुदाय के सदस्य अपने.अपने मोहल्लों और दड़बों में सिमट गए हैं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के भरसक प्रयासों के बावजूद शिक्षाए उदारवादी मूल्यों और प्रगति की रोशनी उन तक नहीं पहुंच पा रही है। मुंबई में अवश्य मोहल्ला समितियों ने कुछ सकारात्मक भूमिका निभाई थी और कुछ हद तक वे आज भी ऐसा कर रही हैं। इस पहल के पीछे थे कुछ पुलिस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ताए जो समाज में शांति और सद्भाव के पक्षधर थे।

दुर्भाग्यवष, देश के सामने खड़ी इस भारी समस्या का मुकाबला करने के लिए न राज्यतंत्र और न ही सामाजिक संगठनों ने पर्याप्त प्रयास किए। सरकार ने "नेशनल फाउंडेशन ऑफ कम्यूनल हारमोनी" की स्थापना अवश्य की परंतु उसका एजेंडा और उसके संसाधन इतने सीमित हैं कि वह समाज के विभिन्न तबकों में धर्मनिरपेक्ष.प्रजातांत्रिक मूल्यों के संबंध में जागृति फैलाने के विशाल व कठिन काम को करने में सक्षम नहीं है। एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित स्कूली पाठ्यपुस्तकों में सकारात्मक परिवर्तन किए गए हैं परंतु इनका प्रभाव भी सीमित है क्योंकि राज्यों के शिक्षा बोर्डों ने इन परिवर्तनों को नहीं अपनाया है। पुलिस व नौकरशाही को साम्प्रदायिकता से जुड़े मुद्दो के प्रति संवेदनशील बनाने का काम न के बराबर हुआ है। यह बहुत आवश्यक है कि पुलिस व नौकरशाहों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों के पाठ्यक्रमों में व्यापक सुधार लाए जाएं। निश्चित ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को उनके मूल कार्य से संबधित प्रशिक्षण दिया जाना अनिवार्य है परंतु राष्ट्रीय एकीकरण से संबंधित मसलों के बारे में उन्हें शिक्षित किया जाना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक, जो कि साम्प्रदायिक हिंसा पर काफी हद तक काबू पाने में हमारी मदद कर सकता थाए ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।

सामाजिक संगठनों की भी अपनी सीमाएं हैं। कुछ सामाजिक  संगठनों ने केवल पीड़ितों  को न्याय दिलाने के काम  तक स्वयं को सीमित रखा  है और उन्होंने प्रशंसनीय उपलब्धियां भी हासिल की हैं परंतु समाज में साम्प्रदायिक विचारधारा के फैलाव से उत्पन्न समस्या इतनी व्यापक है कि उससे मुकाबला करने के संसाधन सामाजिक संगठन नहीं जुटा सकते। कुछ संगठन जनजागृति के कार्यक्रम चला रहे हैं परंतु उनकी पहुंच सीमित है और वे उन लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जहां उनको पहुंचना चाहिए। नुक्कड़ नाटकों, गीतों, फिल्मों आदि के जरिए, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के प्रचार.प्रसार का काम यद्यपि चल रहा है तथापि वह अभी अपने शुरूआती दौर में ही है। हमें एक लंबी राह तय करनी है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य ही हमारे राष्ट्र के निर्माण की नींव बन सकते हैं। बाबरी मस्जिद का ढ़हाया जाना राष्ट्रीय एकता को तोड़ने का प्रयास था। इसके बाद साम्प्रदायिक ताकतों की बढ़ती ताकत ने घाव पर नमक छिड़कने का काम किया है। हमें आशा है कि बाबरी कांड से राज्यतंत्र व सामाजिक संगठनों ने उपयुक्त सबक सीखे होंगे और जो दानवी ताकतें बाबरी मस्जिद के मलबे से उभरी हैं उनसे मुकाबला करने के लिए प्रभावी व दूरगामी नीतियां व कार्यक्रम बनाए जाएंगे। ;
 -राम पुनियानी


गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

बाबरी मस्जिद ध्वंस पर

बाबरी मस्जिद का ध्वंस आज के दिन हिन्दुवत्व वादियों के नेतृत्व में हुआ था। सरकार पहले से ही चुप थी। सरकार पर कारपोरेट जगत का कब्ज़ा या उसके रुपयों से बनने वाली सरकारें देश और प्रदेश में स्थापित हो रही हैं। कारपोरेट जगत चाहता है कि  जल, जंगल, जमीन पर उसका कब्ज़ा बढ़ता ही जाए। वह बहुसंख्यक आबादी के हिस्से की जमीन से निकलने वाली बहुमूल्य धतुवों को वह बेच कर अत्यधिक मुनाफा कमा सके। बहुसंख्यक आबादी के हिस्से की हवा पानी वह भी बेचें और मुनाफा कमाए क्यूंकि मुनाफा कमाने के लिए उद्योगों द्वारा आवश्यक प्रबंध न किये जाने से बहुसंख्यक आबादी की हवा भी नष्ट होती  है। पानी को तो वह लगभग नब्बे प्रतिशत नष्ट कर ही चुके हैं। शेष पानी पर कब्ज़ा करना चाहते हैं वह पंद्रह रुपये लीटर पानी भी बेच लेते हैं। उनकी लूट खसोट के सम्बन्ध में कोई सवाल न उठ खड़ा हो इसलिए आवश्यक है जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता जैसे भावनात्मक सवालों को लेकर बहुसंख्यक जनता वाक् युद्ध से लेकर मल्ल युद्ध तक करती रहे और उनका मुनाफा बढ़ता रहे। बाबरी मस्जिद का ध्वंस उसी कड़ी का एक हिस्सा रहा है। कट्टरपंथियों की जमात उनकी सेवक रही है। सरकार उनकी गुलाम। यदि देश में संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष सरकार होती तो संभव ही नहीं था बाबरी मस्जिद का ध्वंस। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद देश में साम्प्रदायिकता का जो दौर चला उसमें महंगाई, भुखमरी, शोषण, अत्याचार जैसे मुद्दे गायब हो गए और नयी आर्थिक नीतियों के आधार पर कारपोरेट घरानों की लाखों-लाख करोड़ रुपयों की लूट आरंभ हो गयी। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष कारपोरेट घरानों की कठपुतलियां ही साबित हो रही हैं। 

सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

चुनावी समीकरण और धर्मनिरपेक्ष मूल्य

उत्तरप्रदेश में फरवरी 2012 में हुए चुनावों में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। चुनाव परिणाम आने के पहले तक कांग्रेस यह दावा कर रही थी कि नतीजे विस्मयकारी होंगे अर्थात कांग्रेस का प्रदशर्न आशातीत रहेगा। नतीजों से यह साफ हो गया कि न तो कांग्रेस के दावों में कुछ दम था और न ही उसकी अपेक्षाएं यर्थाथपूर्ण थीं। चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी के नेतृत्व में उत्तरप्रदेश के कांग्रेस नेताओं ने जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया। मुसलमानों को आरक्षण का लालच दिया गया और बाटला हाऊस मुठभेड़ पर श्रीमती सोनिया गांधी के आंसुओं का विशद विवरण सुनाया गया। अब यह साफ है कि इन सबका मुस्लिम मतदाताओं पर कोई असर नहीं पड़ा। अभी कुछ वषोर्ं पहले तक कांग्रेस के मुसलमानों ेजिसे पार्टी के विरोधी मुस्लिम वोट बैंक भी कहते हैंसे काफी सौहार्दपूर्ण संबंध थे। यह समझा जाता था कि चूंकि मुसलमान साम्प्रदायिक भाजपा का साथ नहीं दे सकते इसलिए उनके पास धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
आईए, हम स्थिति का यर्थाथपरक विश्लेषण करें। यह सही है कि मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा यह अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए भाजपा को मत देने का विकल्प उपलब्ध ही नहीं है। भाजपा साम्प्रदायिक राजनीति की प्रतीक है और आरएसएस की राजनैतिक शाखा है। आरएसएस अपने परिवार की विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसी अनेक संस्थाओं के साथ मिलकर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के अपने एजेन्डे पर काम कर रहा है। जहां तक साम्प्रदायिक हिंसा का सवाल है, सन 1984 के सिक्खविरोधी दंगों के दौरान कांग्रेस की भूमिका अत्यंत निंदनीय थी। मुसलमानों के कत्लओम और मुस्लिमविरोधी साम्प्रदायिक दंगों की भी कांग्रेस मूकदशर्क बनी रही। कांग्रेस ने दंगा पीड़ितों को न्याय दिलवाने के लिए कभी कुछ नहीं किया तब भी नहीं जब वह सत्ताधारी गठबंधन में शामिल थी या अकेले सत्ता में थी। सन 1992-93 के मुंबई दंगों के पीड़ितों को नजरअंदाज करना और उन्हें हाशिए पर पटक देना कांग्रेस की इस कुत्सित प्रवॢत्ति के उदाहरण हैं। मक्का मस्जिद, मालेगांव, अजमेर, समझौता एक्सप्रेस आदि आतंकी हमलों के बाद कांग्रेसशासित राज्यों की सरकारों ने निर्दोष मुस्लिम युवकों को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन नौजवानों को गिरफ्तार किया गया, उन्हें शारीरिक प्रताड़ना दी गई, उनके कैरियर बर्बाद कर दिए गए और बाद में सुबूतों के अभाव में बिना कोई मुआवजा दिए उन्हें रिहा कर दिया गया। उनके सामाजिकआर्थिक पुनर्वसन के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए।
इन सब कमियों के बावजूद, मुस्लिम समुदाय को इस बात का अहसास है कि कांग्रेस उसकी उतनी बड़ी शत्रु नहीं है जितनी कि भाजपा। गुजरात में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हुए मुसलमानों के कत्लओम ने इस अहसास को और मजबूत किया है। गुजरात में राज्य के प्रजातांत्रिक शासनतंत्र का चरित्र रातोंरात फासीवादी बन गया और वह हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों के इशारों पर नाचने लगा। मुसलमान इस तथ्य से भी नावाकिफ नहीं हैं कि अंततः यह साबित हो गया है कि देश में हुए कई आतंकी हमलों के पीछे संघी विचारधारा वाले और संघ से जुड़े हुए लोग थे और भाजपा ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की।
सन 1998 से 2004 के बीच केन्द्र की एनडीए गठबंधन सरकार के कार्यकलापों पर नजर डालने से कांग्रेस और भाजपा के बीच का अंतर और स्पष्ट हो जाता है। यदि मुसलमान चुनावी मैदान में भाजपा के अस्तित्व को भूल भी जाएं तो भी हमें कांग्रेस के इस दावे की सूक्ष्मता से जांच करनी होगी कि वह एक धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है। हम पाते हैं कि इस मामले में कांग्रेस का रिकार्ड मिश्रित रहा है। एक ओर कांग्रे्रस ने सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की निुयक्ति की जिससे मुसलमानों की आर्थिकसामाजिक बदहाली देश के सामने आ सकी। दूसरी ओर समिति व आयोग की सिफारिशों पर अमल की गति इतनी धीमी है कि यह समझ पाना ही मुश्किल है कि अमल की दिशा में कोई प्रयास हो भी रहा है या नहीं। आतंकित मुसलमानों को ऐसी सरकारी नीतियों की दरकार है जो उन्हें उस घुटन से मुक्ति दिला सकें जो उनके विरूद्ध भयावह हिंसा और उनके दानवीकरण से जन्मी है। मुसलमानों को उनके मोहल्लों में कैद कर दिया गया है। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी सेवाओं में आरक्षण पाने की इच्छा रखता है परंतु इस सिलसिले में केवल चुनावी वायदों से उन्हें बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। विशेषकर तब जबकि वे सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की रपटों को धूल खाते देख रहे हैं।
बाटला हाऊस मुठभेड़, उसकी गहन जांच कराने से यूपीए2 का इंकार और मुस्लिम युवकों को आतंकी करार देने के अभियान ने मुसलमानों को गहरा धक्का पहुंचाया है। मुसलमान आगे ब़ने के लिए, आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए और अपनी योग्यतानुसार काम पाने के लिए छटपटा रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि मुसलमानों के ये सपने पूरे हो सकें। बाटला हाऊस मुठभेड़ की निष्पक्ष जांच कराने में कांग्रेस का रूचि न लेना यह दशार्ता है कि पार्टी में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भाव देने वाले कदम उठाने का राजनैतिक साहस नहीं है। श्रीमती सोनिया गांधी के आसुंओं से मुसलमानों की जानें बचने वाली नहीं हैं। दिल्ली के पड़ोस में स्थित कांग्रेसशासित राजस्थान में पुलिस का एक मस्जिद में घुसकर वहां मौजूद लोगों पर गोलियां चलाना अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है।
ऐसा लगता है कि कांगे्रस नेतृत्व में ऐसे लोगों की अच्छीखासी तादाद है जो धर्मनिरपेक्षता के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नहीं हैं। इस मामले में कांग्रेस अवसरवादी नीतियां अपनाती रही है। वह कुछ दूर तक तो आगे ब़ती है परंतु प्रजातांत्रिकधर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए निर्णयात्मक कदम उठाने से झिझकती है। यह सर्वज्ञात है कि सरकारी तंत्र का जबरदस्त साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है और धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करने के लिए दृ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। उत्तरप्रदेश में मुसलमानों के सामने दो विकल्प थेमुलायम सिंह और कांग्रेस। मुलायम सिंह ने भी कुछ समय के लिए कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था। ये वही कल्याण सिंह हैं जिनके मुख्यमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद ़ढहाई गई थी। , के शासनकाल में उत्तरप्रदेश में मऊ और कुछ अन्य स्थानों पर दंगे भी हुए थे। इसके बावजूद मुसलमानों ने मुलायम सिंह को कांग्रेस की तुलना में कम बुरा समझाऐसा चुनाव नतीजों से जाहिर है।
क्या यह वही कांग्रेस है जिसके महात्मा गांधी और पंडित नेहरू जैसे नेताओं ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था? आज की कांग्रेस का ुलमुल रवैया और उसकी कथनी व करनी में फर्क मुसलमानो को स्वीकार्य नहीं है। कांग्रेस के युवा नेताओं के दिमागों में भी साम्प्रदायिकता का जहर भर गया है। क्या सवा सौ साल पुरानी इस पार्टी को यह आवश्यक नहीं लगता कि वह अपने कार्यकर्ताओं में धर्मनिरपेक्षता की समझ विकसित करे? क्या कांग्रेस को अपने सदस्यों को यह नहीं बताना चाहिए कि अल्पसंख्यकों के बारे में फैलाए गए मिथकों और पूर्वाग्रहों का सच क्या है? क्या कांग्रेस नेताओं को यह नहीं जानना चाहिए कि किस तरह महात्मा गांधी ने हिन्दूमुस्लिम एकता की खातिर अपनी जान न्यौछावर कर दी थी और कैसे पंडित नेहरू, बहुवादी मूल्यों की रक्षा के लिए एक चट्टान की तरह डटे रहे थे? किसी भी पार्टी का निर्माण करते हैं उसके आम कार्यकर्ता और उनकी सोच। जब वे देखते हैं कि उनकी पार्टी के नेतृत्व का रवैया ही ढुलमुल है तो वे यह समझ नहीं पाते कि वे साम्प्रदायिक राजनीति के प्रति क्या रूख अपनाएं और दंगों के शिकार मुस्लिम समुदाय के साथ कैसा व्यवहार करें, क्या संवाद रखें? उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम, कांग्रेस के लिए एक चेतावनी हैं। अगर उसे भारतीय प्रजातंत्र की रक्षा करने का महती उत्तरदायित्व निभाना है तो उसे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की विरासत पर चलना होगा, उनकी राह अपनानी होगी।
-राम पुनियानी

रविवार, 25 दिसंबर 2011

हिन्दुत्व की राजनीति बाबरी से अन्ना तक

इस महीने (दिसंबर 2011) बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के उन्नीस साल पूरे हो गए। इस अवसर पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने मस्जिद के पुनर्निर्माण की माँग फिर से उठाई। इस माँग के पूरी होने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही, यह एक ऐसी राजनैतिक गुत्थी बन गया है जिसका कोई हल नजर नहीं आ रहा है। कई अलगअलग राजनैतिक ताकतें, इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनीअपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहीं हैं।
यहां हम एक बार फिर दुहराना चाहेंगे कि हिंदुत्व का हिंदू धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। हिंदुत्व तो संघ परिवार की राजनीति का नाम है। हिंदुत्व, संकीर्ण सोच व सांप्रदायिक दृष्टिकोण की राजनीति है। हिंदुत्व, दरअसल, उच्च जातियों के हिंदुओं के उस तबके की सोच को प्रतिबिंबित करता है जो प्रजातंत्र का खात्मा कर देना चाहता है। हिंदुत्व का पैरोकार वर्ग अपेक्षाकृत समॢद्ध और अधिकांशतः शहरी है। हिंदुत्व की राजनीति का उद्देश्य, हिंदू राष्ट्र की स्थापना है जहां समाज के ॐचे तबके का वर्चस्व होगा और जहां सामंती मूल्यों का बोलबाला होगा। जो खेल खेला जा रहा है वह है सामंती मूल्यों व जन्मआधारित ॐचनीच को गौरवशाली परंपरा के नाम पर आधुनिक कलेवर में परोसना।
बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना केवल एक राष्ट्रीय स्मारक का विनाश नहीं था बल्कि उसके साथ ही भारतीय राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ जिसमें राजनीति के प्रांगण में अब तक दबेछिपे ंग से काम कर रहीं सांप्रदायिक राजनैतिक ताकतें, खुलकर अपना कुत्सित खेल खेलने लगीं। इसके चलते अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा ब़ी और भारतीय संविधान के मूल्यों का मखौल बना। बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना, दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने की ओर सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का पहला कदम था।
बाबरी घटना के तुरंत बाद भाजपा राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया परंतु इससे समाज का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न रूक सका। जमकर सांप्रदायिक हिंसा हुई और हाशिए से खिसककर भाजपा, राजनीति के मंच के केन्द्र में आ पहुँची। वह सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी। भाजपा के पितृसंगठन आऱएस़एस़ की समाज में स्वीकार्यता ब़ने लगी। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह, सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। मुसलमानों के अलावा ईसाई अल्पसंख्यक भी सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर आ गए। पॉस्टर ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जला दिया गया और देश के कई हिस्सों में ईसाई मिश्नरियों के विरूद्ध हिंसा हुई। इसका चरमोत्कर्ष था कंधमाल में खूनी मारकाट।
मूलतः प्रजातंत्रविरोधी व हिंदू राष्ट्र की पक्षधर भाजपा पहली बार सन 1996 में केन्द्र में सत्ता में आई। उस समय सभी अन्य पार्टियों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया। सत्ता का लालच भी उन्हें न बांध सका परंतु बाद में, शनै:शनै: राजनैतिक पार्टियाँ, सत्ता की खातिर भाजपा से जुड़ने लगीं। उन्हें बाबरी मस्जिद ़हाने के आरोपियों से हाथ मिलाने में कोई संकोच नहीं हुआ। उन्हें उन लोगों से कोई परहेज न रहा जिन्होंने पूरे देश में भारी खूनखराबा मचाया था। भाजपा केन्द्र में सत्ता में आ गई और इससे विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसे संघ परिवार के अन्य सदस्यों की बन आई। वे मनमानी पर उतर आए। राज्यतंत्र और पुलिस बलों का तेजी से सांप्रदायिककीकरण होने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भगवाधारियों ने अपने हाथपैर फैलाने शुरू कर दिए। वैज्ञानिक सोच व तार्किकता के स्थान पर आस्था व विश्वास शिक्षा के आधार बनने लगे।
इससे भाजपा की ताकत और ब़ी। चुनावों में जीत उसके लिए आसान होती गईं। संघ का प्रचार तंत्र केवल अल्पसंख्यकों का दानवीकरण नहीं करता, वह बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के "खतरे" का भय भी उत्पन्न करता है। इससे संघ का प्रचार और धारदार बन जाता है और मध्यमार्गी भी संघ के झंडे तले जुटने लगते हैं। कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही, दक्षिण भारत में भाजपा के पैर जमाने की शुरूआत हुई। भाजपा की राजनैतिक विचारधारा पूरे देश में अपनी जडें़ जमा रही है। उसकी जडें़ और मजबूत, और मोटी होती जा रहीं हैं।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के साथ ही कई प्रक्रियाएं शुरू हुईं। हिंसा पीड़ित न्याय पाने से वंचित कर दिए गए। उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जीने पर मजबूर कर दिया गया। बाद में, आतंकवाद का मुद्दा भी मुसलमानों के दानवीकरण का बहाना बन गया। ईसाई अल्पसंख्यक भीविशेषकर आदिवासी इलाकों मेंसाम्प्रदायिक ताकतों के शिकार बनने लगे।
9/11 के बाद, अमरीकी प्रचारतंत्र अल्कायदा को आतंकवाद का स्त्रोत बताने लगा। मुसलमानों व इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना शुरू कर दिया गया। अमरीकी मीडिया ने "इस्लामिक आतंकवाद" शब्द ग़ा। तेल संसाधनों पर कब्जे की राजनीति में सफलता की खातिर आमजनों की विचारधारा और सोच में जहर घोलना शुरू कर दिया गया। भारत में भी मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार ने नई ॐचाईयाँ छूईं। इस्लाम की शिक्षाओं और मुसलमानों को आतंकवाद के लिए दोषी ठहराया जाने लगा। यह झूठा प्रचार अत्यंत होशियारी से किया गया।
आऱएस़एस़भाजपा की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामाजिक धु्रवीकरण को चरम पर पहॅुचा देने के बाद अब इन तत्वों ने अन्ना हजारे के आंदोलन के नाम पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का अभियान शुरू कर दिया है। वे एक ऐसे तंत्र का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें "लोकपाल" नामक सर्वशक्तिमान संगठन, हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों व संस्थाओं पर नजर रखे। ऊपर से देखने से ऐसा लग सकता है कि लोकपाल से देश की समस्याएं सुलझेंगी। परंतु दरअसल इससे एक ऐसी संस्था अस्तित्व में आएगी जिसपर प्रजातांत्रिक नियमकानून लागू नहीं होंगे। कुछ लोग और संगठन, जो जनता का एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं और "अन्ना संसद के ऊपर हैं" जैसे बेमानी नारे लगा रहे हैं, असल में पर्दे के पीछे से देश के संचालन के सूत्र अपने हाथों में लेना चाहते हैं। अन्ना आंदोलन ने एक ऐसे सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है जो यह मानता है कि पहचान से जुड़े मुद्दे (राम मंदिर) और भ्रष्टाचार जैसे मसले, जो कि असली बीमारी के लक्षण मात्र हैं, ही देश की मूल समस्याएं हैं। उन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों व समाज के अन्य वंचित समूहों की समस्याओं से कोई लेनादेना नहीं है। पहचानआधारित मुद्दे और बाहरी लक्षणों से जुड़े मसले, राजनैतिक यथास्थितिवाद के हामी होते हैं और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले सभी समूहचाहे वे ईसाई कट्टरपंथी हों, इस्लामिक कट्टरपंथी हों या हिंदुत्ववादी भी यही चाहते हैं।
अब चूंकि राममंदिर मुद्दे की चमक खो गई है इसलिए सामाजिकराजनैतिक यथास्थितिवादी तत्वों ने भ्रष्टाचारविरोध का पल्ला थाम लिया है। यह एक चालाकी भरा कदम है। "मैं अन्ना हूँ" "हम जनता हैं" जैसे नारों से वंचित वर्ग स्वयं को अलगथलग महसूस कर रहे हैं। अन्ना आंदोलन के कर्ताधर्ताओं का संदेश साफ है। इस देश की व्यवस्था केवल "शाईनिंग इंडिया" वर्ग से निर्देशित होगी और वंचित वर्ग सदा हाशिए पर रहेंगे।
संघहिंदुत्व राजनीति, समाज का धु्रवीकरण व सांप्रदायिकीकरण करने व मूल मुद्दों से समाज का ध्यान हटाने के लिए नित नई रणनीतियाँ अपनाता रहता है। जहाँ पहले रथ यात्राओं व सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने में भूमिका अदा की वहीं अब भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दे का इस्तेमाल उस राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है जिसका लक्ष्य सामाजिक असमानताओं को बनाए रखना है।

राम पुनियानी
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